Wednesday, January 30, 2019

पेंशन कोचिंग सेंटर


सूरज भाई ने पिल्लों को सड़क पर टहलते देखा तो धूप-छांह की कुछ लाइने बना दीं। बोले ये धूप वाले भाग का क्षेत्रफल निकालो।

पिल्ले आपस में ' मिसकौट' करने लगे। कैसे निकलता है बे क्षेत्रफल। एक बोला -'गूगल कर बे। गूगल सब जानता है। बता देगा। आजकल दुनिया में सब सवाल के हल गूगल ही जानता है।'
दूसरा पिल्ला बोला -'अबे गूगल कैसे करें। नेटवर्क ही नहीं आ रहा है। हिल रहा है गोला स्क्रीन पर। बदलना पड़ेगा सर्विस प्रोवाइडर। '
तीसरा तब तक बगल की घास पर लोटपोट होने चला गया। इसके बाद पेड़ के पास टेड़ा होकर जमीन को सींच आया। सिंचाई के पैसे नहीं चार्ज किये उसने। गूगल से कम दरियादिल थोड़ी है।
चौथा इन सब से निर्लिप्त धूप स्नान कर रहा था। आँख मूंद कर। जबसे उसने नई 'शरीफ पेंशन स्कीम' की खबर सुनी है तब से वह शरीफ बनने में लग गया है। बिना किसी को बताये 'पेंशन कोचिंग सेंटर' ज्वाइन कर लिया है। रोज शाम को जाता हैं। अभी मौन रहना और आंख मूंदना सिखाया है। एक दिन आंख मूंदकर सो गया। जागने पर गुरु जी ने पीठ ठोंकी और कहा -'तू बहुत तेजी से सीख रहा है। जल्दी से सच्चा शरीफ बनेगा।'
साथ के पिल्ले उसकी मजाक उड़ाते हैं। कहते हैं -'देख बेट्टा कहीं शरीफ बनने के चक्कर में नवाज शरीफ न बन जाना। मौन रहना सीख गया तो कोई पिंजड़ें के अंदर कर देगा। भौंकना भूल कर सिर्फ पूंछ हिलाता रह जायेगा। कुत्तों की पहचान उनके भौंकने में है। मौन रहना तो गधों का काम है।'
लेकिन वह मन से कोचिंग में लगा है। मौन रहने पर कोई टोंकता है तो पूछता है -'दुनिया भर के तमाम लफड़े देखते हुए भी उनको अनदेखा करके जीने वाले लोग क्या गधे हैं?'
किसी के पास कोई जबाब नहीं पाकर वह अपने को सही मान लेता है। भौंकना भूलकर मौन रहना सीख रहा है।
गुरु जी ने उसको कोचिंग क्लास का मॉनिटर बना दिया। वह तबसे किसी पिल्ले के कोचिंग ज्वाइन करने की राह देख रहा है जिस पर वह मॉनिटरी झाड़ सके।
आगे क्या हुआ पता नहीं चला। लौटकर पूँछेगे।

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Tuesday, January 29, 2019

ओस के कपड़े पहने धूप में नहाती पत्ती

सबेरे की चाय पी रहे थे। बगल में मेज पर रखा मोबाइल नागिन डांस टाइप करने लगा। लगा कोई गड़बड़ डाटा खा गया है। हाजमा खराब हो गया है। ऐंठ रहा है पेट। मोबाइल पर हम वैसे ही खफ़ा रहते हैं आजकल। काफ़ी टाइम खा जाता है। उसको ऐंठते देख खुश टाइप होने का मन किया। लेकिन हुए नहीं। केवल अनदेखा कर दिया।

मोबाइल को अनदेखा करके चुस्कियाते हुये लैपटॉप में घुस गये। मोबाइल फ़िर डांस करते हुये अकड़ने लगा। ज्यादा अकड़ा और आवाज भी तेज तो हाथ बढाकर उठाये। देखा सूरज भाई का कॉल था। हेल्लो, गुडमार्निंग के बाद मजाक का सिलसिला शुरु हुआ। हम बोले-’ भाई जी राशिफ़ल आ रहा है। अपनी राशि बताओ तो आज का भाग्यफ़ल बतायें।’
सूरज भाई भन्नाये हुये थे। बोले - ’यार, ये तुमको राशिफ़ल की पड़ी है। यहां धरती के ऊपर कोहरे के बादल सुरक्षा गार्डों की तरह खड़े हैं। आने नहीं दे रहे हमारी किरण बच्चियों। कह रहे हैं अपना पासवर्ड बताओ। टोकन दिखाओ। अजब-अजब तमाशा करते हैं ये धरती के चौकीदार। मन किया पूरी धरती को गर्मा के खल्लास कर दें। लेकिन फ़िर तुम्हारा ध्यान आ गया तो छोड़ दिये। तुम्हारी चाय का लिहाज कर गये।’
हमने फ़ौरन कोहरे को हड़काया। कोहरा ऐसे फ़ूटा जैसे सरकारें बदलते ही नए बने माननीयों के तमाम आपराधिक मुकदमें फ़ूट लेते हैं। सूरज भाई साथ में बैठकर चुस्कियाने लगे। बहुत दिन बाद साथ चाय पी रहे थे। चीनी कम होने के बावजूद चाय मीठी लग रही थी। सूरज भाई कहने लगे -’तुम और कुछ भले न जानते हो लेकिन चाय अच्छी बनाते हो।’
हमको कुछ समझ में नहीं आया तो मुस्करा दिए। कुछ समझ में न आने पर मुस्करा देना सबसे सुरक्षित रहता है। थोड़ी बेवकूफी मिला दो मुस्कान में तो और सुरक्षित। मुस्कान और मूर्खता का गठबंधन सबसे घातक होता है।
सूरज भाई ने अपनी रोशनी के थान के थान हमारे लॉन में बिछा दिये। सारी घास चमकने लगी। ओस की बूंदे मोतियों की तरह चमकने लगी। किरणों की चमक और घास का बिस्तरा देखकर पास के पेड़ की एक पत्ती पेड़ से कूदकर घास पर बिना पैराशूट उतर गयी। पत्ती घास के बिस्तर पर लेट गयी- दिगंबर। धूप में मजा आने लगा तो वह उलटपुलट कर पूरी तरह धूप में नहाने लगी।
घास पर पसरी ओस की बूंदे उसके ’ओस मसाज’ जैसा करने लगी। पत्ती के पूरे बदन पर ओस की मालिश हो गयी। ऐसा लगा कि पत्ती ओस के स्किन टाइट कपड़े पहने हुये बगीचे की घास पर पसरी धूप स्नान कर रही हो। पत्ती का आत्मविश्वास और खिलंदड़ापन देखकर लग रहा है उसके पास मोबाइल होता तो पक्का सेल्फ़ी फ़ेसबुक पर अपलोड करके ’चैलेन्ज एक्सेप्टेड’ हैसटैग के घोड़े हांक चुकी होती।
बगीचे में क्यारियों लगे पौधे धूप की सप्लाई पाकर बौरा गये। उनके हाल ऐसे हो गये एक ही सेठ से ’चुनाव चंदा’ पाये दो नेता आपस में एक-दूसरे के खिलाफ़ बयानबाजी करते हुये गदर काटते हैं। दोनों को एक दूसरे की अलग-अलग दिशा में झुके हुये देखकर लगा एक ही ठेके की दारू पीकर निकले हुये दारूबाज सड़क के अलग-अलग किनारों पर टुन्न पड़े हों। कुछ पौधे बीच की स्थिति इधर गिरें या उधर गिरें जैसी बातें सोचते हुये अनिर्णय की स्थिति में थे। वे बहुमत की तरफ गिरने की सोचते हुए दोनों तरफ गिरने वाले पौधों की गिनती कर रहे थे।
चाय की अन्तिम बूंद पीने के बाद सूरज भाई ने चल दिये। चलते हुये टीवी पर भाग्यफ़ल बता रहा था- ’आपका आज का दिन अच्छा है। किसी भले आदमी से मुलाकात होने का सुयोग है।’ वे चलते हुये मुस्कराये और हमको देखकर मुस्कराते हुये -’ अब तुमको भी भला आदमी बताने की साजिश हो रही है। बच के रहो।’
हम भी मुस्करा दिये। बगीचे में देखा कि धूप में अलसाई सी आरामफ़र्मा पत्ती के आसपास तमाम पत्ते और कुछ और पत्तियां भी पसर गये थे। लगता है सबने वाकई चुनौती स्वीकार ली हो।
आप क्या कर रहे हैं? । निकल्लीजिये। नहाइये धूप में। अभी धूप मुफ्त है। क्या पता कल इस पर भी कोई सेस लग जाये। वह मॉल्स में बोतलों में बिकने लगे। एक पैकेट के साथ दो मुफ्त के ऑफर के साथ। इससे पहले कि सूरज की रोशनी पर कोई टैक्स लगे नहा लीजिये धूप में जी भर कर। जी लीजिये मन भर।

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Tuesday, January 22, 2019

पुस्तक मेले के किस्से-5


पुस्तक मेले में कई मित्रों से मुलाकात हुई। कई मित्रों ने किताबें खरीदकर ऑटोग्राफ़ लिये। कुछ मित्र तो खासकर मिलने और किताब लेने आने आये। मिनी सेलेब्रिटी का एहसास सा कराते। दोस्तों से पहली बार मिलने के बावजूद पुरानी जान-पहचान का एहसास हुआ।

शाम को सुभाष जी की ’हंसती हुई कहानियां’ का विमोचन हुआ। हम खरीद चुके थे। उस पर सुभाष जी के दस्तखत भी ले लिये थे। शाम को विमोचन के समय हमको भी बैठा दिया सुभाष जी ने कुर्सी में। बोले –बैठो। हम बैठ गये। सुभाष जी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल के अनुसार 47 किताबों के लेखक हैं सुभाष जी। बस तीन कम पचास किताब। अपन की कुल जमा 5 किताबें आई हैं। 5 किताबों का लेखक 46 किताबों के महालेखक की किताब का विमोचन करे। हम सकुचाये बैठे रहे।
कार्यक्रम शुरु हुआ। संचालक ने बोलने के लिये बोला- हमने मना किया। लेकिन सुभाष जी बोले- ’अनूप शुक्ल भी बोलेंगे।’ बोलना पड़ा। अशोक चक्रधर जी, प्रेम जन्मेजय जी, आलोक पुराणिक जी , खुद सुभाष जी भी बोले। अच्छा बोले। अशोक चक्रधर जी ने हंसती हुई कहानियां को हंसी से जोड़ते हुये अपनी कविता भी सुना दी:
“हंसी आती है
तो आती है,
नहीं आती तो नहीं आती।“
बाद में हमको लगा कि मौका चूक गये। अपन भी हंसी पर लिखी कविता सुना देते:
“हंसी का भी बहुत बड़ा परिवार है
कई बहने है जिनके नाम है-
सजीली,कंटीली,चटकीली,मटकीली
नखरीली और ये देखो आ गई टिलीलिली,
हंसी का सिर्फ एक भाई है
जिसका नाम है ठहाका
टनाटन हेल्थ है छोरा है बांका
हंसी के मां-बाप ने
एक लड़के की चाह में
इतनी लड़कियां पैदा की
परिवार नियोजन कार्यक्रम की
ऐसी-तैसी कर दी।
हंसी की एक बच्ची है
जिसका नाम मुस्कान है
अब यह अलग बात कि उसमें
हंसी से कहीं ज्यादा जान है।“
लेकिन अब समय चूकि पुनि का पछताने। दिन भर कई किताबों के विमोचन करवाने वाले सुभाष जी अब खुद अपनी किताब का विमोचन करवा रहे थे। जैसे कोई पण्डित जी कई शादियां करवाने के बाद अपने लिये मण्डप में बैठ जाये। विमोचन के बाद विमोचित किताब साथ विमोचन करने वाले को भेंट की गयी। विमोचन मेहनताना। हमको पहले किताब खरीदने का अफ़सोस हुआ। लेकिन अब जो हुआ सो हुआ। विमोचन की खबर सुभाष जी की फ़ेसबुक वाल से ही :

“ हास्य कहानी संग्रह 'हँसती हुई कहानियां' का विमोचन प्रभात प्रकाशन के स्टाल पर हुआ।संग्रह का लोकार्पण करते हुए प्रो.अशोक चक्रधर ने कहा कि हास्य मनुष्य को बेहतर बनाने में मदद करता है। वह मनुष्य को आईना दिखाने का काम भी करता है। सुभाष चन्दर ने व्यंग्य के साथ हास्य पर भी उल्लेखनीय काम किया है। उनका हास्य अधरों को ऊर्ध्व बनाने का काम करता है।इसका सबूत उनका यह तीसरा हास्य कथा संग्रह है। इस अवसर पर डॉ प्रेम जनमेजय ने कहा कि सुभाष चन्दर को चुनौतियों को स्वीकार करना अच्छा लगता है। व्यंग्य का इतिहास नहीं था ,उन्होंने व्यंग्य का इतिहास लिख दिया।हिंदी में हास्य कथाओं पर काम नही हो रहा था।उन्होंने तीन हास्य संग्रह दे दिए।आलोक पुराणिक ने कहा कि सुभाष चंदर जी जैसे बड़े लेखक जब हास्य के क्षेत्र में उतरते हैं तो व्यंग्य के मठाधीश भी हास्य को नकारने का साहस नहीं जुटा पाते।कानपुर से पधारे व्यंग्यकार अनूप शुक्ल ने कहा कि हास्य के क्षेत्र में यह बड़ा काम है। सुभाष चंदर ने कहा कि पाठक हास्य पढ़ना चाहता पर आलोचक उस पर बात नहीं करना चाहता।उसे लगभग अश्लील और दोयम दर्ज़े का मानकर चलता है।इस प्रवृत्ति से बचने की जरूरत है। इस अवसर पर श्रवण कुमार उर्मलिया,कमलेश पांडे,संतराम पांडे,डॉ पवन विजय,डॉ. अनीस अहमद,सुनील जैन राही,नीतू सिंह राय,अनिता यादव, अनिल मीत,अमित शर्मा,राजीव तनेजा,फ़ारूक़ आफरीदी,प्रवीन कुमार,सत्यदीप कुमार,निर्मल गुप्त,अर्चना चतुर्वेदी,सरिता भाटिया,संगीता कुमारी,अलंकार रस्तोगी,तरुणा मिश्र,बलराम अग्रवाल,दीपशिखा,आरके मिश्र,शंखधर दुबे,संदीप तोमर,सुनील चतुर्वेदी,छत्र छाजेड़, पंकज शर्मा,संजीव,अतुल चतुर्वेदी,समीक्षा तेलंग,शशि पांडे,सुनीता शानू ,एम एम एम.एम. चन्द्राआदि उपस्थित थे।संचालन प्रभात प्रकाशन के व्यवस्थापक प्रभात शर्मा ने किया।“
इस संग्रह की कुछ कहानियां हमने पढी हैं। सुभाष जी ने आम जिन्दगी से जुड़े मजेदार किस्से इसमें लिखे हैं। किताब के बारे में अलग से लिखा जायेगा।
पुस्तक मेले के दौरान खूब सारे लेख लिखे गये। अभी भी लिखे जा रहे हैं। कईयों में विमोचनातुर वरिष्ठों के मजे लिये गये हैं। चुटकुले भी बने। लेकिन विमोचन करने वाले वरिष्ठ लोगों का पक्ष रखने वाले लेख नहीं आये। लोग विमोचन करवाना भी चाहते हैं और विमोचन करने वाले के मजे भी लेना चाहते हैं। इस बारे में श्रीलाल शुक्ल जी के एक लेख का अंश देखिये:
“लिखने का एक कारण मुरव्वत भी है। आपने गांव की सुन्दरी की कहानी सुनी होगी। उसकी बदचलनी के किस्सों से आजिज आकर उसकी सहेली ने जब उसे फ़टकार लगाई तो उसने धीरे समझाया कि ” क्या करूं बहन, लोग जब इतनी खुशामद करते हैं और हाथ पकड़ लेते हैं तो मारे मुरव्वत के मुझसे ‘नहीं’ नहीं कहते बनती।” तो बहुत सा लेखन इसी मुरव्वत का नतीजा है- कम से कम , यह टिप्पणी तो है ही! उनके सहयोगी और सम्पादक जब रचना का आग्रह करने लगते हैं तो कागज पर अच्छी रचना भले ही न उतरे, वहां मुरव्वत की स्याही तो फ़ैलती ही है।“
कवि यहां यह कहना चाहता है कि अधिकतर विमोचन , भूमिका लेखन मुरव्वत का नतीजा होता है। कोई मुरव्वत के चलते आपकी किताब की भूमिका लिख रहा है, विमोचन करने आ रहा तो यह उसकी भलमनसाहत भी है। इसकी तारीफ़ भी होनी चाहिये। सिर्फ मजे लेना बहुत नाइन्साफी है।
भलमनसाहत से याद आया कि पुस्तक मेले में प्रेम जनमेजय जी और Subhash Chander जी की भलमनसाहत का नाजायज फ़ायदा उठाते हुये हमने अपनी साल भर पहले आई किताबों के फ़िर से विमोचन करवा लिये। तारीफ़ भी झटक ली। प्रेम जी ने कहा कि अनूप शुक्ल बिना लाग लपेट के अपनी बात कह लेते हैं । सुभाष जी ने बताया कि अनूप शुक्ल को पढने में मजा आता है। इन वक्तव्यों के वीडियो अलग से।
हमने तारीफ़ तो करवा ली अपनी किताबों की लेकिन बाद में अपराध बोध भी हुआ कि जबरियन तारीफ़ करवा ली। कित्ती खराब बात है। लेकिन अब जो हुआ सो हुआ। उदारमना प्रेम जी और सुभाष जी इसके लिये माफ़ कर देंगे।
पुस्तक मेले के किस्से और भी हैं। वे सब अब फ़िर कभी फ़ुटकर तरीके से आयेंगे। एक बेहतरीन अनुभव रहा यह मेला।

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Monday, January 21, 2019

पुस्तक मेले के किस्से-4




बोधि प्रकाशन पर विमोचन तक दोपहर हो चुकी थी। सुबह का खाया हुआ ठिकाने लग चुका था। पेट ने हल्ला मचाना शुरु कर दिया था। इधर से उधर टहलते हुये थकान ने भी अपना जलवा दिखाना शुरु कर दिया था। बोधि पर ही निर्मल गुप्त जी Nirmal Gupta मिले। वे कोई बैठने की जगह तलाश रहे थे। मेले में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। पुस्तक मेला इस मामले में मॉल्स की तरह ही था जहां सिर्फ़ बेचने-खरीदने की सिलसिला होता है। तसल्ली से बैठने का कोई जुगाड़ नहीं। मॉल्स की परिकल्पना करने वालों को लगता होगा कि एक बार कोई बैठ गया तो बिक्री का सिलसिला रुक जायेगा। वही हाल पुस्तक मेले का था।

इस बीच आलोक पुराणिक जी Alok Puranik पधार चुके थे। गले में रंगीन मफ़लर फ़ंसाये हुये अपने प्रशंसकों से घिरे आलोक पुराणिक जी ने कई दुकानों पर मुफ़्त में किताबों का साथ फ़ोटो खिंचाये। किताबों के बारे में राय जाहिर की। आपसी बातचीत में जुम्लेबाजी भी की।
रेशू वर्मा Reshu Verma भी वहां मौजूद थीं लेकिन इस बार उनकी ’कैमरा-तोप’ साथ नहीं थी। रेशू के भाई जी भी साथ में थे। रेशू ने आलोक पुराणिक जी को इस बात के लिये काम भर का शर्मिन्दा किया कि वे अभी तक अपन को किसी बचत और निवेश की इस्कीम में पैसा लगाने के लिये अभी तक राजी नहीं कर पाये। असल में लेखन तो आलोक पुराणिक जी का साइड बिजनेस है उनका असल काम तो लोगों को बचत और निवेश के लिये उकसाने का है। उसी में भाई जी फ़ेल हुये अभी तक। आलोक जी ने उसी समय प्रण किया कि अनूप शुक्ल के पैसे जल्दी ही ठिकाने लगवाकर दिखायेंगे। लेकिन अनूप शुक्ल के पैसे भी कम चालाक थोड़ी हैं। किसी निवेश इस्कीम के हमले पहले ही वे बाजार के बंकरों में जाकर छिप गये हैं। बाजार पैसे का मायका होता है न ! पैसे को मौका मिलते ही वह अपने मायके फ़ूट लेता है।

लेखक मंच के पास खड़े बतियाते हुये NotNul नाटनल वाले Neelabh Srivastav मिले। उन्होंने सुखद-सूचना दी कि हमारी पहली किताब ’पुलिया पर दुनिया’ की कुछ रॉयल्टी मिलनी है मुझे। हमने बिना सोचे तय किया कि बाकी किताबें भी नॉटनल पर चढवायेंगे। नॉटनल की एक इस्कीम आई है जिसमें आप 999 रुपये में साल भर पत्रिकायें आनलाइन पढ सकते हैं। इसका सदस्य बनना है।
वहीं पर राजीव तनेजा जी से मुलाकात हुई। ब्लॉगिंग के दिनों के साथी। अनेक मजेदार यादें उनके साथ जुड़ी हैं। मिलना पहली बार हुआ। उनकी किताब ’फ़ैलसूफ़ियां’ पिछले साल आई थी। इस साल एक और आ गयी। पास ही स्टॉल पर उनकी किताबें थीं। साथ जाकर किताबें खरीदकर उनके दस्तखत झटके। फ़ोटो भी खिंचाये गये।
इस बीच भूख की फ़ौजों ने पेट को हर तरफ़ से घेर लिया था। समर्पण के अलावा कोई चारा नहीं था। Kamlesh Pandey जी भी पेट की आग से हलकान थे। हम दोनों बाहर निकले। पास ही दुकान से छोले-भटूरे और चाय की पर्ची कटवाई। 100 रुपये के दो छोले-भटूरे तीस रुपये की चाय। छोला भटूरा धड़ल्ले से बिक रहा था। बिना विमोचन और बिना हलवाई के ऑटोग्राफ़ के। किसी भटूरे पर हलवाई के दस्तखत –सप्रेम, सस्नेह, प्यार सहित के साथ नहीं दिखे। केवल तेल की टपकती हुई बूंदें। 30 रुपये की चाय ढाबे की चाय की मुकाबले छह गुना मंहगी। भटूरे तो हमने जल्दी-जल्दी हड़बड़ाते हुये खा लिये। हड़बड़ी का आलम ऐसे समझिये जैसे कोई सिद्ध विमोचक विमोचन समय बोलने के पहले किताब के पन्ने पलटकर देख ले। इसके बाद किताब के बारे में बोल दे।

छोले-भटूरे खाने में हड़बड़ी का कारण भावना प्रकाशन पर होने वाला विमोचन था। अर्चना चतुर्वेदी और Samiksha Telang की किताब के विमोचन का समय हो गया था। अर्चना चतुर्वेदी का पहला उपन्यास ’ गली तमाशे वाले’ आ रहा था तो समीक्षा तैलंग का पहला व्यंग्य संग्रह ’जीभ अनशन पर है’ का विमोचन था। समीक्षा हमारे बचपन के मित्र विकास तैलंग के घर-परिवार से हैं। लिखती वे पहले भी थीं लेकिन उनके ही अनुसार फ़ेसबुक पर ’व्यंग्य की जुगलबंदी’ में शामिल होने के बाद उनके लेखन में गति आई। ऐसा और लोगों ने भी कहा है। मजे की बात कि व्यंग्य की हर गतिविधि पर नजर रखने वाले लोगों ने इस बात को नोटिस नहीं किया।
समीक्षा के घर-परिवार के अधिकतर लोग संगीत के धुरन्धर हैं। ग्वालियर घराने से जुड़े हैं। समीक्षा अपनी पीढी की अकेली लेखिका हैं इसलिये उनके घराने में उनका जलवा और खुशी का कारण बनी है उनकी किताब।
समीक्षा के व्यंग्य संग्रह की भूमिका व्यंग्य की दुनिया के धुरंधर प्रेम जन्मेजय, Subhash Chander और Alok Puranik ने लिखी है। आगे-पीछे फ़्लैप पर Vivek Ranjan Shrivastava और Udan Tashtari समीर लाल की सम्मतियां हैं। मतलब पहली किताब गाजे-बाजे के साथ आई है। अर्चना चतुर्वेदी का उपन्यास भी धड़ल्ले से बिक रहा है। प्रकाशक ने खुद बताया कि आते ही 250 प्रतियां बिक गयीं। उपन्यास पर लोगों की रोचक प्रतिक्रियायें आ रही हैं। एक मित्र ने बताया –’ अच्छा लग रहा है उपन्यास। अपने गुरु से तो बढिया लिखा है अर्चना ने।’ गुरुजी मतलब कौन ? पूछते ही फ़ोन कट गया। पता चला बैटरी खल्लास हो चुकी थी। दुबारा लगाने पर फ़ोन लगा ही नहीं। इसलिये गुरुजी का खुलासा नहीं हो पाया।

अरे हम भी कहां विमोचन के किस्से सुनाने लगे। जबकि अभी तो हम छोले-भटूरे की दुकान पर थे। भूख का संहार करते हुये हम गरम भटूरे को कम गरम छोले के साथ ठिकाने लगा रहे थे कि लगा हम लेट हो गये। और स्पीड से भटूरे उदरस्थ करते हुये, भटूरे के मोटे किनारे प्लेट में छोड़ते हुये हम जल्दी से थर्मोकोल की प्लेट को कूड़ेदान के हवाले करके मेले की तरफ़ चल दिये। चाय छोड़ दी। मेले में घुसे लेकिन भावना प्रकाशन नहीं मिला। खो गया हो कहीं मानों। मेला एकदम भूलभुलैया हो गया। कई मोड़ घूमने के बाद जब पहुंचे तब तक किताबों का विमोचन हो गया था। कुछ विमोचक किताबों के बारे में बोल चुके थे। मिठाई का दौर शुरु हो चुका था। हमने भी कुछ बोला समीक्षा की किताब के बारे में। यह भी कहा कि बहुत दिनों बाद उनके लिखने का अनशन टूटा है। आशा है अब वे निरंतर लिखती रहेंगी।
अर्चना जी की किताब के बारे में प्रेम जनमेजय जी, Subhash Chander जी, डॉ DrAtul Chaturvedi जी Alok Puranikऔर अन्य लोगों ने अपनी राय रखी। विमोचन स्थल पर Shashi Pandey शशि पाण्डेय भी थीं। उनकी किताब पर लिखने और उनका इंटरव्यू लेने के मेरे वादे की याद उन्होंने। मैंने फ़िर से वादा किया कि जल्दी ही लिखेंगे और इंटरव्यू भी होगा जल्दी। शशि और समीक्षा एक साथ खड़ीं थीं। मैंने उनकी फ़ोटो ली। कैमरा बेचारा 'संयुक्त सौंदर्य' से चौंधिया सा गया। विमोचन के बाद तो और भी फ़ोटोबाजी हुई। पुस्तक मेले में लेखकों के साथ सबसे ज्यादा फ़ोटोबाजी घटनायें होती हैं। समीक्षा के पति सुयश की , जिनको समीक्षा ने अपनी किताब भी समर्पित की है, इस मामले में चकाचक तारीफ़ करनी होगी कि वे विमोचन के लिये अबूधाबी से साथ आये। तारीफ़ तो अर्चना चतुर्वेदी के पतिदेव की भी खूब करनी बनती है जिन्होंने न सिर्फ़ बकौल अर्चना चतुर्वेदी –“मेरे खोये-खोये रहने को झेला...वक्त-बेबक्त खाना खाया (कई बार बनाकर भी) घर के बुरे होते हाल को बर्दाश्त किया, उपन्यास की कमियां और खूबियां गिनाईं पर मुझ पर भरोसा रखा और मेरा पूरा पूरा सपोर्ट किया” बल्कि विमोचन के समय पूरी फ़ोटोग्राफ़ी/वीडियोग्राफ़ी की।
इस शानदार विमोचन के बाद अपन एक बार फ़िर रुझान प्रकाशन की दुकान की तरफ़ टहलते हुये आ गये। इसके बाद सुभाष चंदर जी की किताब हंसती हुई कहानियों का विमोचन भी होना था।

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Friday, January 18, 2019

पुस्तक मेले के किस्से -3


१. दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं- एक वे जो लेखक होते हैं और दूसरे वे जो लेखक नहीं होते।
२. पूरी दुनिया अदीब और गैर अदीब लोगों में बंटी हुई है।
३. लेखक दो तरह के होते हैं- एक वे जिनकी किताब छप चुकी होती है, दूसरे वे जिनकी नहीं छपी होती।
ये सब बातें हमने तब लिखी थीं जब अपन की कोई किताब नहीं आई थी। विस्तार से बांचने का मन करे तो इधर पहुंचे http://fursatiya.blogspot.com/2012/03/blog-post_12.html
पुस्तक मेले में टहलते हुये लगा कि अपन विमोचन के दर्शक बनने के लिये ही आये हैं। किताबें देख ही नहीं पाये। कई किताबें सोची थी लेने के लिये , ले नहीं पाये। मेला असल में कई दिन घूमने का मामला है। बिना विमोचन-भंवर में फ़ंसे घूमना चाहिये तभी सच्चे मायने में किताबें देख पायेंगे। लेकिन ऐसा हो कहां पाता है।


बोधि प्रकाशन पर निवेदिता भावसार की कविता किताब ’बज रही है डुगडुगी’ और अलंकार रस्तोगी के तीसरे व्यंग्य संकलन’ डंके की चोट पर’ का विमोचन था। निवेदिता की कवितायें अलग तरह की हैं। छुटकी-छुटकी कवितायें बिना पढे रही नहीं जाती। कविताओं की तरह ही उनकी टिप्पणियां भी मनभावन होती हैं। अपनापे भरी। उनकी कविताओं के बिम्ब नये-नवेले टाइप के हैं। पढकर मन खुश हो जाता है। निवेदिता से पुस्तक मेले में पहली मुलाकात हुई। बोधि प्रकाशन से छपी उनकी किताब अच्छी सी कलेवर वाली। अपनी कविताओं के बारे में निवेदिता लिखती हैं:
“एक नार्मल सी जिन्दगी जीते-जीते कविता कब मेरे जीवन का हिस्सा हो गयी, मुझे खुद नहीं पता। पहले प्रेम सी आयी कविता। मेरी हर कविता एक कहानी है और मुझे ये सारी कहानियां आप सभी से ही मिली हैं।"

निवेदिता एक कविता में आह्वान क्या करती हैं देखिये:
“इस धरती पे वास्तुदोष है
पलट दो दिन को रात से सूरज को चांद से
अलग कर दो समंदर से सारी नदियां । समंदर को बांट दो।
आदमियों औरतों से कहो छाल पहनें
सभी अपना नाम बदल रख लें आदम और हव्वा
और पूजें फ़िर से आग को पानी को हवा को।“
’बज रही है डुगडुगी’ के बाद अलंकार रस्तोगी का डंका बजा। अलंकार रस्तोगी व्यंग्य जगत के उन लोगों में से हैं जो निरन्तर सक्रिय होने के साथ काम भर के सुदर्शन भी हैं। उनके तीसरे व्यंग्य संग्रह ’डंके की चोट पर’ का शानदार विमोचन हुआ। सुभाष चन्दर जी , प्रेम जन्मेजय जी और व्यंग्य से जुड़े कई धुरन्दर मौजूद थे। जो नहीं मौजूद थे अलंकार ने बाद में उनके सीने पर अपनी किताब सटवाकर, माइक के सामने बुलवाकर विमोचन में शामिल करा लिया। जो मिला उससे जबरियन अपनी किताब का विमोचन करवा लिया। यहां तक कि अनूप मणि त्रिपाठी को सोते से उठाकर विमोचन करवाया। खैरियत की बात यह कि किसी विमोचन पीडित किसी शक्स ने अभी तक कोई एफ़ आई आर नहीं कराई है अभी तक। वैसे भी 'अनूप' नाम के लोग अनोखे होने के साथ आदतन शरीफ होते हैं।



अलंकार की यह तीसरी किताब है। देखने में तीनों किताबों में यह सबसे खूबसूरत किताब लगती है। लेख भी अच्छे लग रहे हैं। उन पर विस्तार से पढने के बाद। अलंकार को बधाई।
विमोचन के फ़ौरन बाद हमने अलंकार की किताब खरीदकर उस पर उनके दस्तखत कराये। इस बीच कोई कैमरा फ़िर सुभाष जी के सामने लग गया। उन्होंने हमसे किताब लेकर अपने सीने से सटाई और अलंकार के बारे में ’विमोचन-बयान’ जारी किया। बोधि प्रकाशन से निकलने के बाद हमने देखा कि हमारे साथ की ’डंके की चोट पर’ में से अलंकार के ऑटोग्राफ़ गायब है। बिना ऑटोग्राफ़ की किताब बिना किसी पंच के व्यंग्य सरीखी लग रही थी। फ़िर हमें ध्यान आया और हमने सुभाष जी के बैग से किताब बरामद कर ली। अब हमारे पास ’डंके की चोट पर’ की दो प्रतियां थीं। हम किताबों की चोरी चोरी नहीं कहलाती के स्वर्णिम सिद्धांत का पालन करते हुये आराम से दूसरी किताब पचा सकते थे। लेकिन हमने ईमानदारी का परिचय देते हुये बोधि प्रकाशन पर दूसरी किताब वापस कर दी। अब जब वापस कर दी तो बता भी रहें हैं ताकि सनद रहे और ईमानदारी के कुछ नम्बर मिल सकें।

किताबें इधर-उधर होना गैर इरादतन भी होता है। हमने अपनी खरीदी हुई सारी किताबें रुझान प्रकाशन में रख दी थीं। लौटते हुये सभी किताबें बटोर लाये। आने पर देखा कि हमारे साथ दो किताबें ऐसी भी चली आई हैं जो हमने खरीदी नहीं थीं। इनमें से एक निवेदिता भावसार की किताब ’बज रही है डुगडुगी’ है जिस पर निवेदिता ने ’तेज भाई के लिये’ लिखकर ऑटोग्राफ़ दिये थे। दूसरी किताब सूर्यबाला जी का व्यंग्य संकलन है –देश सेवा के अखाड़े में। इस पर कोई नाम नहीं लिखा है इसलिये पता नहीं है किसकी किताब है। तेज भाई से बमार्फ़त निवेदिता अनुरोध है कि वे अपना पता भेजें तो हम उनको किताब भेज देंगे , डाकखर्च भी हम ही उठा लेंगे( लापरवाही की इतनी सजा तो मिलनी ही चाहिये)। सूर्यबाला जी की किताब भी जिनसे छूट गयी हो रुझान प्रकाशन पर उनको भी पता लेने पर भेज देंगे अपनी तरफ़ से।
जब हम बोधि प्रकाशन पर थे तब ही हमारी एक पोस्ट पर बजरंग बिश्नोई जी का कमेंट आया कि उनकी कविता की किताब ’मेरी नाव तैयार है’ बोधि प्रकाशन पर मौजूद है। हमने उसे भी खरीदा। इसके अलावा अंशु प्रधान की किताब ’हुक्काम को क्या काम’ और विवेक कुमार मिश्र की कविता पुस्तक ’कुछ हो जाते पेड़ सा’ भी ली। लीलाधर मंडलोई जी ने किताबों का विमोचन का काम किया। उनकी ’राग सतपुड़ा’ भी ली। किताब का समर्पण देखिए:
’सतपुड़ा’ के लिये
जो हमारा
पुरखा है।
मुझे लगा यह किताब कविताओं की होगी। लेकिन इस किताब में सतपुड़ा से जुडी स्मृतियां हैं। गद्य गीत से छुटके-छुटके लेख आत्मीय लेख। इन लेखों का रचना समय २०१६ है। पढते हुये बहुत अच्छा लग रहा है।

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Thursday, January 17, 2019

पुस्तक मेले के किस्से-2

"दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।"
बाबा नागार्जुन की ये कविता पंक्तियां अनायास याद आईं सुभाष चन्दर जी Subhash Chander अमित शर्मा Amit Sharma की किताब का विमोचन करते हुये अपनी बात कह रहे थे। ' बहुत दिनों बाद' कई बार आया वक्तव्य में तो यह कविता याद आई। सुभाष जी ने अमित शर्मा की तारीफ़ करते हुये कहा-’मित्रों बहुत दिनों के बाद अमित शर्मा के रूप में ऐसा व्यंग्यकार सामने आया है जिसको शिल्प की समझ है, जिसको विट और आयरनी में अन्तर पता है, जिसको हास्य और व्यंग्य में अन्तर पता है। उन्होंने अमित शर्मा को अलंकार रस्तोगी Alankar Rastogi, अनूप मणि त्रिपाठी Anoop Mani Tripathiऔर शशिकांत सिंह 'शशि' की बाद की पीढी का रचनाकार बताते कहा-’अखबारों में छपे यह अच्छा है, खूब लिखें यह अच्छा है लेकिन और आगे जाने के लिये लम्बा लिखना होगा, व्यंग्य कथायें लिखें, सरोकारी व्यंग्य लिखें।
सुभाष जी ने इत्ती गम्भीर बातें कहते हुये बीच में ’बिचल्ला’ जोड़ दिया और कहा-’ जो लोग मुझे जानते हैं वे अच्छे से जानते होंगे कि मैं आराम से झूठ नहीं बोलता और खासकर तब तो जरूर बोलता हूं जब अनूप शुक्ल पीछे खड़े हों।’
अब आप लगाते रहिये मतलब इस बात का लेकिन यह तय नहीं हो पायेगा कि सुभाष जी की इस बात का मतलब क्या था ! क्या वे वहां झूठ बोल रहे थे? क्या वे आराम से नहीं थे? इस वाक्य की विस्तार से व्याख्या की आवश्यकता कि कवि वास्तव में कहना क्या चाहता है?
यह लिखते हुये एक जुमला भी आ गया जेहन में जिसका लब्बो और लुआब है -’लेखक के बारे में सबसे ज्यादा झूठ उसकी किताब के विमोचन के मौके पर बोला जाता है।’
विमोचन के बाद अमित ने सहज ही विनम्रता से अपनी बात कही। बताया कि वे पिछले ढाई साल से व्यंग्य के इलाके में आये हैं। अभी व्यंग्य के विद्यार्थी हैं। व्यंग्य के दिग्गजों से सीखते हुये आगे बढने की कोशिश करेंगे। वनिका प्रकाशन और सुभाष जी और अन्य मित्रों को भी उन्होंने धन्यवाद दिया।
अलंकार रस्तोगी ने भी उनके बारे में बताते हुये कहा -’यह उनका पहला व्यंग्य संकलन है। कम समय में उनके व्यंग्य लेखन को देखकर लगता है वे मुकम्मल तैयारी के साथ आये हैं व्यंग्य के मैदान में। उनके पंच दूर तक मार करते हैं। आशा है वे अपने पूर्वजों की परम्परा को आगे बढायेंगे।
कमलेश पाण्डेय जी Kamlesh Pandey ने भी अमित की तारीफ़ करते हुये कहा- ’ अमित के कुछ लेख फ़ेसबुक पर पढे। उन्होंने बरबस ध्यान आकर्षित किया। उनके लेख के शीर्षक कैची होते हैं। आशा है वे बड़ी रचनायें लिखेंगे।
इसके बाद सुभाष जी ने अनूप शुक्ल को बोलने के लिये कह दिया। अनूप शुक्ल का हलक सूख गया। वे बोलने से बचने के लिये ही पीछे हो गये थे। विमोचन के पहले अमित शर्मा को पीछे से लगभग जबरियन आगे लाये थे अनूप शुक्ल। खुद पीछे हो गये थे। अमित शर्मा को अनूप शुक्ल आगे न लाते तो क्या पता किताब का विमोचन हो जाता और लेखक पीछे रह जाता। वीडियो और फ़ोटो में लेखक नदारद रहता।
बहरहाल जब नाम बुला ही दिया गया तो कुछ कहने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था तो अनूप शुक्ल ने कहा-’अमित जी के व्यंग्य संग्रह की डिलीवरी लेने के लिये मैं कानपुर से यहां आया हूं। उनको शुभकामनायें। सुभाष चन्दर जी नये लोगों को फ़ंसा देते हैं। जहां कोई नया लिखता है वे कहते हैं बड़ा लिखें। इस चक्कर में आदमी घबड़ा जाता है। मैं अमित जी से कहना चाहता हूं कि इनके झांसे में न आयें जैसा मन आता हो वैसा लिखें। ये फ़ंसाने वाले गुरु जी लोग हैं। कोई छोटा लिखेगा, अच्छा लिखेगा तो ये कहेंगे बड़ा लिखो। आप इन सबके झांसे में आये बिना जो मन आये वो लिखिए। खूब लिखिए। अगले साल खूब किताबें आयें।'
इसके बाद अनूप शुक्ल ने विमोचन के बाद अमित शर्मा की किताब का पहला ग्राहक होने का सुख हासिल करते हुये अमित शर्मा से दस्तखत कराये किताब पर। अमित शुक्ल ने किताब पर लिखा -’आदरणीय अनूप सर को सप्रेम’। प्रेम तो ठीक लेकिन कोई समझेगा कि किताब सप्रेम भेंट की गयी है। लेकिन यह प्रेम मुझे १९० रुपये का पड़ा। १५० पेज की किताब १९० रुपये में मतलब एक पेज प्रेम एक रुपये छब्बीस पैसे का पड़ा।
प्रेम और स्नेह के दाम वसूलने की हिन्दी व्यंग्य लेखकों में पुरानी परम्परा है। परसाई जी ने अपनी डेढ रुपये की पहली किताब अपनी अभिन्न मित्र मायाराम सुरजन को भेंट करते हुये लिखा-’ मित्र मायाराम सुरजन को सस्नेह।’ मायाराम सुरजन जी ने दो रुपये दिये थे। अठन्नी वापस मांगी तो परसाई जी ने कहा- ’अठन्नी का स्नेह नहीं हो गया क्या?’ तो इस तरह अमित शर्मा हमारी खरीदी को हमको प्रेम सहित देकर अपने पूर्वजों की परम्परा से जुड़ गये।
यह तो हुई अमित की किताब की विमोचन की बात। अब किताब पर इंशाअल्लाह अलग से लिखा जायेगा। जल्ली ही।
इसके बाद और किताबों के साथ सुशील सिद्धार्थ जी के आह्वान पर लिखी गयी किताब ’व्यंग्यकारों का बचपन’ का भी विमोचन हुआ। कई महत्वपूर्ण और सक्रिय व्यंग्यकारों की बालकुंडली इस किताब में है। जिस समय यह किताब बन रही थी उस समय सुशील जी हमसे तन्न-भन्न मुद्रा में थे इसलिये हमसे लेख मांगा नहीं उन्होंने। किताब बहुत अच्छी बनी है। सुशील जी होते तो बहुत खुशी से सबको इस पर लिखने के लिये कहते लेकिन वे अपनी अनुपस्थिति में ही वहां सबकी यादों में हैं।
वनिका प्रकाशन के बाद अपने रुझान प्रकाशन की तरफ़ बढे जहां हमारा प्रकाशक हमारे इंतजार में था। कुश Kush Vaishnav की तबियत कुछ गड़बड़ थी। नया नवेला प्रकाशक बेचारा गुमटी भर की जगह के ४०००० रुपये चुकायेगा तो बीमार तो पड़ेगा ही। मुझे लगता है जो भी छोटे प्रकाशक आते हैं उनमें से कई तो किराये भर की किताबें बेंच नहीं पाते होंगे। आयोजक सरकार है इस मेले की। मुझे लगता है प्रकाशकों से इतना ज्यादा किराया लेना पुस्तक संस्कृति के प्रसार के लिये गड़बड़ है।
इस बीच किसी चैनल के नौसिखिया पत्रकार ने कमलेश पाण्डेय जी की किताब ’ बसंत की सेल्फ़ी’ और मेरी किताब ’सूरज की मिस्ड कॉल’ पर हमारी बातचीत रिकार्ड की। दोनों नौसिखिया। उसकी आवाज धीमी हमारी रिकार्डिंग हड़बड़िया। नतीजा दो नौसिखियों के गठबंधन से गड़बड़ाई एक रिकार्डिंग नेट पर आ गई।
तब तक समय हो गया था अलंकार रस्तोगी की किताब ’डंके की चोट पर’ के विमोचन का। उधर से बुलौवा आ रहा था। उसके किस्से फ़िर कभी।
अमित शर्मा के विमोचन पर कही बात मैंने याद से लिखीं। पूरी और सही बातें सुनने के लिये संबंधित वीडियो देखें जिसका लिंक यह है।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10215973098853782

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Wednesday, January 16, 2019

पुस्तक मेले के किस्से-1



अब जब कुंभ मेला शुरु हो गया है तो पुस्तक मेले के किस्से क्या सुनायें। लेकिन यादें हल्ला मचा रही हैं कि हमको भी सुनाओ। हमारे बारे में नहीं बताओगे तो समर्थन वापस ले लेंगे । यादों की सरकार गिर जायेगी। मजबूरन हमको पुस्तक मेले की यादें साझा करनी पड़ रही हैं। क्या करें मजबूरी है ! सरकार बचाने के लिये सब कुछ करना पड़ता है !
पुस्तक मेले के लिये रिजर्वेशन काफ़ी पहले से करा लिया था। इतवार के दिन छुट्टी थी। उसी हिसाब से शनिवार को रिजर्वेशन कराया। यह सोचकर की इतवार को पांव फ़िराकर वापस आ जायेंगे।
मेले में कमलेश पांडेय Kamlesh Pandey जी के साथ पहुंचे। उनकी शानदार कार में। मेले के एकदम बगल में कमलेश जी का दफ़्तर ! वहीं पार्किंग में कार खड़ी करने की मंशा से वे दफ़्तर पहुंचे। लेकिन वहां तैनात दरबान ने कार अंदर लाने से मना कर दिया। बोले-’ आज छुट्टी है।’ शायद उसने यह समझा कि ये भी कोई मेले के फ़ोकटिया दर्शक हैं जो पार्किंग का खर्च बचाने के लिये खुद को दफ़्तर का बता रहे हैं।
कमलेश जी ने तमाम दलीलें दी। खुद को असली दफ़्तर वाला बताया। परिचय पत्र दिखाया। लेकिन दरबान टस हुआ । पहलू बदला। लेकिन 'टस से मस' नहीं हुआ। धीमे से लेकिन साफ मना करके मुंडी अखबार में घुसा ली। कमलेश जी ने फ़िर विनम्रता का चोला त्यागकर रौद्र रूप धारण किया। चोला बदलते ही उनकी गाड़ी को उनके ही दफ़्तर में प्रवेश मिला।
गाड़ी को दफ्तर में प्रवेश भले मिल गया लेकिन काम भर की बेइज्जती का एहसास करा गया भाई जी को। वो तो कहो कि हम साथ में थे इसलिये बेइज्जती आधी बंटवा ली इसलिये मामला निपट गया वर्ना फ़ुल बेइज्जती भारी पड़ती कमलेश भाई को। हमको अपने दफ़्तरों पर एक बार फ़िर से प्यार उमड़ा जहां से दसियों साल बाद भी जाते हैं तब भी गेट फ़ौरन खुल जाते हैं। दिल्ली भौत बेइज्जती कराती है। रमानाथ जी गल्त नहीं कहते थे:
सम्मान सहित हम सब कितने अपमानित हैं (दिल्ली के लिये ही कहा होगा)
यह बात गांव की पगडंडी बतलाती है।
बहरहाल उस संक्षिप्त बेइज्जती को हमने अपनी गांठ में बांधा और तय किया कि इस पर एक लेख लिखा जायेगा। लेखक अपनी बेइज्जती पर और कर भी क्या सकता है सिवाय लेख लिखने के।
मेले के पहले खूब सारी चाट-पकौड़े की दुकाने खुली चल रहीं थी। छोले-भटूरे धड़ल्ले से बिना विमोचन के बिक रहे थे। बिना लोकार्पण के सब कुछ उदरस्थ हो रहा था।
मेले में घुसे। घुसने के पहले टिकट कटाया। टिकट खिड़की पर ही लिखा था - ’ दिव्यांगों, वरिष्ठ नागरिकों और स्कूली बच्चों के लिये प्रवेश मुफ़्त।’ हमको लगा कि काश दिव्यांगों की तुक मिलाते हुये व्यंग्यांगकों को भी छूट मिल जाये। यह भी सोचा कि किसी व्यंग्य के स्कूल का छात्र बताकर छूट ले ली जाये। लेकिन उसमें लफ़ड़ा था। पता लगा जिस व्यंग्य के स्कूल का छात्र बतायें अपन को उसका हेडमास्टर मना कर दे यह कहते हुये कि यह दूसरे स्कूल के फ़ंक्शन में पाया गया था इसलिये इसका यहां से ’स्कूल निकाला’ हो गया है।
बहरहाल चूंकि टिकट कटा चुके थे इसलिये अंदर घुसने के अलावा कोई चारा नहीं था। घुसे। मेले में घुसते ही कई जगह पसरी गीली मिट्टी ने हमको अपने आलिंगन में लेने में की कोशिश की। लेकिन हम सावधान रहे। रपटे लेकिन संभल गये।

मेले में घुसते ही सब तरफ़ दुकानें ही दुकानें दिख रहीं थीं। किताबों की दुकानें। उनका किस्सा इंशाअल्लाह फ़िर जल्ली ही।

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