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| अरमापुर की नाई की दुकान |
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| दो कौड़ी की चाय |
हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै
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| अरमापुर की नाई की दुकान |
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| दो कौड़ी की चाय |
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| शहीदों की प्रतिमाओं का पुनर्स्थापन |
इस घटना का शहर में व्यापक विरोध हुआ। शहर के विकास पुरुष का कोई बयान नहीं आया। बुलडोजर बाबा के आदेश पर नगर निगम के दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। ठेकेदार ब्लैक लिस्ट हो गया। परसाई जी की बात याद आ गई :
"शासन का घूँसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है, पर न जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूँसा पड़ जाता है।"
शहर के लोगों के व्यापक विरोध के बाद आनन-फानन में मूर्तियां जोड़-जाड़ कर फिर से स्थापित की गईं। जिन लोगों ने मूर्तियां गिराये जाने पर कुछ नहीं कहा था वे भी लपकते हुए मूर्तियों को माला पहनाते दिखे। सीमेंट के खंभों पर बिना उद्घाटन नामपट्ट के शहीदों की प्रतिमाएं फिर से स्थापित हो गईं।
मूर्तियों पर उद्घाटन कर्ताओं के नाम दर्ज करवाना जनप्रतिनिधियों का बड़ा लालच होता है। जिसके नाम जितने ज़्यादा नामपट्ट लगते हैं वह अपने को उतना अमर समझता है। एक बोरी सीमेंट और सौ ईंटों से बने निर्माण पर भी नाम पट्ट लगाने के लिए लालायित रहते हैं लोग। कई बार निर्माण से ज़्यादा खर्च नामपट्ट में होता है।
किसी इमारत के उद्घाटन में लोकार्पण की परम्परा फौरन बंद होनी चाहिए। नाम लिखे जाना बंद हो जाना चाहिए। अधिक से अधिक इमारत के बनने का समय लिखा जाना चाहिए। लेकिन ऐसा होने लगे तो फिर जनप्रतिनिधि बेचारे किस मुँह देश सेवा का कर सकेंगे। उनका उत्साह मारा जाएगा।
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| सैफ का बनाया रेखाचित्र |
काकोरी शहीदों के बुत फिर आ खड़े हुए! ************************************
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
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सत्ता की बेशर्म राजनीति और सरकार के चालू कल-पुर्जों का ’करिश्मा’ देखिए कि शाहजहांपुर की सरजमीं पर बुत बने खड़े काकोरी के अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खां और रोशन सिंह, जिन्हें 19 दिसम्बर, 1927 को फांसी पर चढ़ाकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने चैन की नींद सोने का सपना देखा था जो अंततः 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी के सवेरे के साथ ध्वस्त हो गया। हम आज़ाद हो गए।
और फिर स्वतंत्रता के रजत जयंती वर्ष 1972 में इस शहर की ज़मीन पर खड़ी की गई उनकी बेजान मूर्तियों को 23 मार्च, 2026 की रात्रि में चोरी-चुपके प्रशासन की बेरहम, अंधी और असंवेदनशील बुलडोजरी ताकत ने अपने नुकीले पंजों से फिर ज़मींदोज़ करने जो षड्यंत्र रचा, उसका नाकामयाब ’ड्रामा’ सिर्फ चंद (चार) दिनों में ही नेस्तनाबूद हो गया और उन्हें शहीदों को अपनी धरती पर पुनर्स्थापित करने पर मजबूर कर दिया।
जब काकोरी शहीदों के भग्नावशेष बोल उठे
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दरअसल, जब काकोरी के इन शहीदों की प्रतिमाएं बुलडोजर से गिराकर मिट्टी में मिला कर उनके भग्नावशेष (प्रशासन की भाषा में मलवा) शहर से बाहर डंपिंग ग्राउंड में डलवा दिया गया, तब लोगों को सवेरे उनके इस ’क्रांतिकारी कारनामे' का पता चला। गनीमत यह कि हमारी भी नींद समय से खुल गई।
लोग शहरों-शहरों बोल उठे। शाहजहांपुर ही नहीं, इलाहाबाद, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, संगरूर, जालंधर, बरेली, रुद्रपुर, मेरठ, मुरादाबाद, उदयपुर और देश के अनेक दूरस्थ इलाकों से एक साथ आवाजें उठीं---’काकोरी शहीद ज़िंदाबाद’, ’उत्तर प्रदेश सरकार मुर्दाबाद’, ’ज़िला प्रशासन और नगर निगम अधिकारी हाय-हाय’।
ये आवाजें सत्ता के पिछलगुओं के अलावा हर कंठ से उठीं। विदेशों में कनाडा, कैलिफोर्निया, जर्मनी, लाहौर तक यह स्वर गुंजायमान हुआ।
बे-लगाम व्यवस्था की छाती पर शहीद प्रहार करते रहेंगे
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प्रशासन की मुंदी आँखें जैसे भौचक्की रह गईं। स्वनामधन्य जिलाधिकारी बौखलाहट में ज़िले के काकोरी शहीदों की गिनती तीन से बढ़ाकर चार बता रहे थे, मेयर महोदया कह रही थीं कि उन्हें कोई जानकारी नहीं बल्कि वे नवरात्रि के व्रत में डूबी थीं, नगर आयुक्त भी हड़बड़ी में खुद की जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ रहे थे, और सूबाई सरकार में इस शहर के प्रतिनिधि और कैबिनेट मंत्री के मुंह पर तो जैसे मजबूत वाला टेप चिपका दिया हो।
गौरतलब यह कि अधिकारीगण ठेकेदार पर दोषारोपण कर रहे थे और ठेकेदार मजदूरों को मुजरिम मान रहे थे। मैंने कहा कि शायद इस प्रकरण में अपराधी कोई और नहीं, सिर्फ बुलडोजर है जो रात्रि के अंधेरे में खुद चलकर गया और उसने शहीद प्रतिमाओं को ध्वस्त कर दिया।
शहीदों का विस्थापन ना-मुमकिन है
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25 मार्च को दोपहर शहर में हमारी प्रेस कांफ्रेंस से पहले नगर आयुक्त महोदय ने फोन कर मुझसे कहा कि वे मिलकर कुछ बात करना चाहते हैं। मैंने दो घंटे बाद का समय निर्धारित किया। वे होटल में मिलने आए, लेकिन यह भी सही है कि बढ़ते जनाक्रोश के बीच प्रशासन ने तीन दिन के भीतर गुपचुप ढंग से फैसला ले चुके थे कि शहीद प्रतिमाओं के खंडित अवशेषों को जोड़-गांठ कर और रंग-रोगन पोत कर उन्हें पुनर्स्थापित कर दिया जाए। वही उन्होंने मुझे बताया। यह भी कहा कि वे शर्मिंदा है कि अपने कार्यकाल में उन पर यह कलंक लगा। उन्होंने यह भी बताया कि दोषियों के विरुद्ध FIR करा दी गई है, कुछ सस्पेंशन हुए हैं, और किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। रात भर में मूर्तियों के नए ’बेस’ तैयार करा लिए गए और 26 मार्च को बहुत सबेरे शहीदों के ज़ख्मों और टूटे बुतों के टुकड़ों पर पॉलिश पोत कर फिर बेहयाई के साथ उन्हें खड़ा कर दिया गया।
इसके बाद नगर आयुक्त महोदय ने पुनः स्थापित किए गए बुतों की तस्वीरें मुझे व्हाट्सएप पर भेजीं। शहीद अशफ़ाकउल्ला के पौत्र को मैंने अब वहां होने वाले उस ’जश्न’ में जाने से रोक दिया जिसे थोड़ी देर में वह बेशर्म सत्ता आयोजित करने वाली थी जिसमें फिर महापौर महोदया को न जाने किस मुंह से काकोरी शहीदों और भारतमाता की जय का नकली उदघोष करना पड़ा। अद्भुत नज़ारा और अनोखी निर्लज्जता! इस अवसर पर वहां न जाने ऐसे कितने लोग अपनी हाजिरी देकर अपनी फोटोएं उतरवा रहे थे जो चार दिन पहले शहीदों के लिए गए इस ’वध’ में शामिल थे।
शहीद फिर सीना तान कर खड़े हो गए
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देश और मनुष्यता के लिए शहीद होने वाले क्रांतिकारी रक्त-बीज हैं। उन्हें ज़मीन में दफ़नाओगे तो वे फिर अपने छाती फुलाकर उठ खड़े होंगे।
साम्राज्यवादी सरकारें मुर्दाबाद!
अमर शहीद ज़िंदाबाद!!
सुधीर विद्यार्थी जी की पोस्ट का लिंक : https://www.facebook.com/share/p/1CnYGdAnuK/?mibextid=wwXIfr
फेसबुक की पोस्ट ब्लॉगर पर रखना अपना कीमती सामान बैंक के लॉकर में रखने जैसा है। खराब या अच्छा जैसा भी है लेखन तो है। कम से कम ऐसा तो है जो हमें लेखक होने का भरम दिलाये रहता है।
फेसबुक पर लिखने की शुरुआत 16 साल पहले हुई थी। 15 फ़रवरी, 2010 को। इसके पहले अपने ब्लॉग पर ही लिखते थे। ब्लॉगिंग पर लिखने की शुरूआत 20 अगस्त, 2004 को हुई थी। मतलब क़रीब साढ़े 21 साल पहले। इस दौरान कुल मिलाकर लगभग 3284 लिखी। मतलब औसतन लगभग 150 प्रति वर्ष। ब्लॉगिंग के समय पोस्ट लिखने का औसत लगभग 85 पोस्ट प्रति वर्ष था। फेसबुक में आने का बाद यह औसत 180 ( ब्लॉग के मुकाबले लगभग दोगुना) हो गया। इसका कारण शायद फेसबुक पर पोस्ट लिखने में आसानी रही। ब्लॉग पर लिखने के पहले थोड़ा सोचते थे कि क्या लिखें? फेसबुक में लिखने के बाद भी नहीं सोचते -क्या लिख गए।
ब्लॉगिंग के दिनों में इससे कमाई के किस्से सुनते थे। यह कि कई ब्लॉगरों ने नौकरी छोड़कर ब्लॉगिंग से कमाई शुरू की और लखपति हो गए। हमारे ब्लॉग पर आजकल तक एक चवन्नी की कमाई नहीं हुई। उसमें विज्ञापन ही नहीं लगे हैं। फेसबुक पर अलबत्ता आज देखा तो 52 डॉलर की कमाई हुई है। मतलब आज के 4876.31 रुपए। फेसबुक से कमाई के जो तमाम फ़ंडे बताये हैं लोगों ने लेकिन उनको अपनाने का धीरज और मन बन नहीं पाया।
अभी तक अपन फेसबुक पर ही पोस्ट लिखते थे । लेकिन अब ब्लॉग पर भी पोस्ट किया करेंगे। ब्लॉग पर कैटेगरी के हिसाब से पुरानी पोस्ट पढ़ना और खोजना ज़्यादा आसान है। लिंक लगाना भी ब्लॉग पर ज़्यादा सुगम है। फेसबुक पर आप किसी दूसरे प्लेटफार्म का लिंक लगाओ, फेसबुक नखरा करेगा। जबकि ब्लॉगर इस मामले में उदार है। आप यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी भी साइट का कोई भी लिंक लगाओ ब्लॉग कभी नखरा नहीं करता। अलबत्ता फेसबुक पर मोबाइल से फोटो लगाना आसान है।ब्लॉग पर मोबाइल की फ़ोटो लगाने में अभी मसक्कत करनी होती है। कोई तरीका होगा जरूर। सीखेंगे। लगायेंगे।
ब्लॉगिंग के दिनों से अभी तक पाठक, प्रसंशक, पसंदीदा लेखक लगातार बदलते रहे हैं। कई लोग हैं जिनकी हर पोस्ट पढ़ने का मन करता है। उनमें से कुछ आलटाइम फ़ेवरिट हैं। कुछ लोगों का लिखा टाइप्ड लगने लगता है। मेरे लिखे पर भी लोगों की ऐसी ही कुछ धारणा होगी। मेरे पाठक भी बदलते रहे। कभी हर पोस्ट पर लाइक, टिप्पणी करने वाले कई, कई बार महीनों तक नहीं दिखते।
2004 में ब्लॉगिंग से शुरू करके अब तक मेरी दस किताबें आ गईं हैं। ब्लॉगिंग जब शुरू की थी तो ऐसा कोई इरादा नहीं था। लेकिन मजाक-मजाक में किताबें आती गईं। आने वाले समय में भी अगर आलस्य पर नियंत्रण रहा तो इस साल भी दो-तीन किताबें शायद आ जायें।
इस बीच कई बार पॉडकास्टिंग करने के भी विचार आया। अपना यूट्यूब चैनल नियमित करने की सोची। लेकिन एक तो अपनी आवाज और दूसरे तकनीकी लफड़े और तामझाम के चलते ऐसा हो नहीं सका। अच्छा ही हुआ शायद।
मेरे पाठक मित्रों की प्रतिक्रियाएं, रचनात्मक टिप्पणियां और सुझाव मेरे लेखन का प्राणतत्त्व हैं। इसके लिए मैं अपने पाठक मित्रों का शुक्रिया अदा करता हूँ।
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सुबह चाय बनाने के लिए गैस चूल्हा ऑन किया। स्पार्क हुआ लेकिन चूल्हा जला नहीं। पता चला गैस सप्लाई बाधित है। सोसाइटी के व्हॉट्सएप ग्रुप में देखा । घंटे भर पहले का मेसेज था -'गैस पाइप लाइन रिपेयर का काम चल रहा है। चार-पाँच घंटे गैस सप्लाई बाधित रहेगी।'