Monday, June 01, 2026

तैराकी सीखने का तीसरा दिन


 आज सुबह तैराकी सीखने के निकलने में थोड़ी देर हो गई। नतीजा स्वीमिंग पूल में 8.05 पर पहुंचे।
रास्ते में लाल पैथालॉजी में काम करने वाली बच्ची घर से लैब की तरफ़ जाती दिखी। दिखी कल भी थी। कहीं सैंपल लेने जा रही थी। हमारे यहाँ से भी एक बार सैंपल ले जा चुकी है। उसको देखकर हमने हाथ हिलाया लेकिन उसने देखा नहीं। कान में ईयर प्लग लगाए किसी से बात करती या शायद मोबाइल देखती चली जा रही थी।
ईयर प्लग लगाकर चलते हुए या सामने खड़े होकर बात करते इंसान को देखकर लगता है कि शायद वह आपसे कुछ कह रहा है। लेकिन आप जब ध्यान देते हैं तो पता चलता है कि वह किसी और से मुखातिब है।
स्वीमिंग पूल पहुंचकर नाम लिखवाया। अटेंडेंस लेने वाली बालिका ने कहा -'आपने अभी तक फार्म नहीं जमा किया।'
हमने कहा -'कल जमाकर देंगे।'
उसने कहा -'कल नहीं परसों जमा कर दीजिएगा। मंगलवार को स्वीमिंग पूल बंद रहता है।'
नाम लिखते हुए आज उनसें अनूप ही लिखा -अनूपा नहीं लिखा। आज जेंडर चेंज नहीं करवाना पड़ा।
स्वीमिंग पूल में जाकर बताया -'बबलिंग, फ्लोटिंग सीख ली। आज क्या करना है?'
'आप हाथ चलाने का अभ्यास करिए। बाहर आ जाइये सीख लीजिए।' -कोच ने कहा। उसने सहायक कोच से कहा -'सर को हाथ चलाना सिखा दो।'
सहायक कोच ने सिखाया। हमने उससे कहा -'हमारा हाथ डिसलोकेट हो जाता है। इसलिए पूरा हाथ घुमाने वाली एक्सरसाइज करना मुश्किल होगा।'
अभी तक तैराकी न करने, सीखने का बड़ा कारण हमारे कंधे का अचानक उखड़ जाना भी रहा। कभी भी कंधे का जोड़ कंधे से समर्थन वापस ले लेता। हाथ लटक जाता। एक बार बच्चे को हल्के से चपतियाने के लिए हाथ आगे बढ़ाते ही कंधा उखड़ गया। नतीजतन बच्चों को फिर कभी चपतियाया नहीं। बच्चे समझते रहे -'पापा अच्छे हैं, कभी कोई सजा नहीं देते।'
एक बार गुलमर्ग में ट्रक से उतरते समय कंधा उखड़ गया था। रात में। बहुत परेशान हुए। फिर देर तक कोशिश करने में अपने आप जुड़ भी गया।
कोच ने हमको आधा हाथ घुमाकर पानी काटने वाली एक्सरसाइज बतायी। अभ्यास कराया। बताया -'पहले नमस्ते मुद्रा में हाथ रखिए। हाथ आगे लाइए। घुमाइए। दोनों बाहें दूर करिए। घुमाकर फिर पास लाइए। फिर नमस्ते मुद्रा तक पहुँचिये।'
हमने दो-तीन बार उसके सामने अभ्यास किया। फिर पानी में उतर गए। पानी में खड़े होकर काफ़ी देर पानी काटते हुए अभ्यास करते रहे। बबलिंग और फ्लोटिंग भी की। साथ के लोग तैरते हुए बगल से गुजर रहे थे। कोई नीचे से भी। किसी की टांगे भी लगीं। हमारी टांगे भी किसी को लगीं। सॉरी, सॉरी, इट्स ओके, कोई बात नहीं की आवाजें स्वीमिंग पूल में गूंजती सुनाई दीं।
हमने बताया कि सीख लिया तो कोच ने कहा -'पानी काटने का अभ्यास करते हुए पूल में चलने की प्रैक्टिस कीजिए।' हमने कई बार पूल की चौड़ाई चलते हुए तय की। अगल-बगल, दायें-बायें बच्चे, बुजुर्ग, बच्चियाँ, जवान और महिलायें अलग-अलग तरह के अभ्यास कर रहे थे। पूरा स्वीमिंग पूल लोगों से भरा-पूरा था।
कोच लोग आराम-आराम से इधर-उधर टहलते हुए आपस में बतियाते चाय पाते स्वीमिंग पूल के आसपास टहल रहे थे। एक कोच सेठ की तरह गद्दी पर बैठा था। कोई कुछ पूछता तो दाएँ-बायें कुछ-कुछ बता देते। एकदम किसी सरकारी दफ्तर सरीखा माहौल लग रहा था। बातचीत करते हुए स्वीमिंग सिखाने वाली बालिका के यहाँ भंडारे पर जाने की बात हो रही थी।
अभ्यास करते हुए घंटा हो गया। सीटी बज गई। पूल से बाहर निकलने का आदेश हो गया। हम पाँच मिनट देरी से आए थे, पाँच मिनट देर तक रहकर पूल से निकले।
रास्ते में दिहाड़ी मजदूर अपने ग्राहकों का इंतजार करते खड़े दिखे। एक चाय वाला वहाँ खड़ा नीबू की चाय बेच रहा था। हम बिना चाय पिए घर की तरफ़ बढ़ गए यह सोचते हुए कि घर में दूध की चाय पियेंगे।
आगे एक जगह से फल ख़रीदे। फल वाले ने मुँह में पान मसाला भरकर फल तौले। हमने आदतन उसको मसाला खाने के नुकसान बताये। उसने मेरे उकसावे पर वहीं खड़े-खड़े पान मसाला खाना छोड़ने की प्रतिज्ञा कर ली। यह भी कहा -' अगली बार आयेंगे तो मसाला खाते हुए नहीं देखेंगे।' हमने कहा -' हम अभी लौटकर आते हैं।' उसने कहा -' अभी तो खा लिए। अगली बार पक्का नहीं खाते मिलेंगे।'
'अगली बार जब आएँगे तब देखा जाएगा।' कहते हुए हम गाड़ी स्टार्ट करके घर आ गए।
यह हमारा स्वीमिंग सीखने का तीसरा दिन था।
गुलमर्ग में कंधा उखड़ने और जुड़ने का क़िस्सा यहाँ पढ़ सकते हैं ।

यह हमारा स्वीमिंग सीखने का तीसरा दिन था।


Sunday, May 31, 2026

तैराकी सीखने का दूसरा दिन

 


आज तैराकी सीखने का दूसरा दिन था। सबेरे आठ बजे से नौ बजे की क्लास थी। आठ बजने में कुछ मिनट पहले पहुँच गए। अटेंडेंस लगाने वाली मैडम ने नाम लिखा Anupa . हमने देख लिया। नाम के हिसाब से लिंग बदलने का खतरा देख कर हमने फौरन आख़िरी का a कटवाया। मैडम ने बिना एतराज किया नाम सही कर दिया। लगा कि एक आम इंसान और चुनाव आयोग में अंतर होता है।

सॉवर लेकर पानी में उतरे। तैराकी कोच से पूछा -'आज क्या करना है?' उसने कहा -'पानी में पांव चलाने का अभ्यास करो।'
हम पानी से ऊपर आकर किनारे पानी में पांव डालकर पांव चलाने लगे। साइकिल जैसी चलाने हुए। पास से गुजरते बच्चे ने कहा -'अंकल, पाँव मोड़िए नहीं। सीधा रखिए।'
बच्चा उमर में छोटा है। लेकिन तैराकी हमसे पहले से सीख रहा है। सीनियर तैराक है। सीनियर की बात माननी चाहिए। नौकरी के दिनों में अपने एक सीनियर की बात याद आई। एक घामड़, अकुशल और कामचोर सीनियर से किसी मसले पर तू तड़ाक होने पर उन्होंने जूनियर को समझाइस देते हुए कहा था -'सीनियरिटी का हमेशा लिहाज करना चाहिए (सीनियरटी मस्ट बि रिस्पेक्टेड)। उस समय तो नहीं लेकिन बाद में लगा कि शायद वे अपने लिए भी सम्मान सुरक्षित रखने का इंतज़ाम कर रहे थे।
हमने पाँव सीधे करके पानी में चलाने लगे। कोच ने देखते हुए कहा -'पंजे फैलाकर चलाइये पांव।' हमने पंजे फैला लिए। पाँव चलाते रहे।
हमको पचास बार चलाने के लिए कहा था । हमने पाँच-छह बार 'पचास बार बार पानी में पांव चलाने का अभ्यास किया। इसके बाद कोच के कहने पर पानी में उतर गए। अब हमको पानी में पांव चलाने थे।
साँस अंदर लेकर मुँह पानी में घुसाया। रेलिंग हाथ से पकड़े रहे। शरीर पानी में सीधा हो गया। हम पानी में पैर चलाने का अभ्यास करते रहे। साँस रोककर पानी में मुँह किए पैर चलाते हुए गिनती गिनते रहे। पहली बार दस तक, फिर पंद्रह, बीस करते हुए चालीस तक की गिनती गिनने तक पानी के अंदर मुँह किए, साँस रोके पाँव चलाते रहे। कोच को दिखाया। उनसे दूसरी कोशिश में अंगूठा ऊपर करके हमको पास कर दिया। मतलब ठीक कर रहे थे हम।
बाद में देखा कि लड़का नुमा लगती वह कोच लड़की थी। शायद उसने भी जल्दी में ही बॉब्ड कट बाल कटवाये हैं। क्या पता वह Sudipti की फेसबुक फ्रेंड हो और उनसे ही प्रेरणा लेकर हेयर स्टाइल बदला हो। फ़ैशन भी संक्रामक होता है।
पैर चलाते हुए पीछे की तरफ़ से गुजरते हुए पांव किसी के शरीर से टकराए। हमने सॉरी बोला। उसने कहा -'कोई बात नहीं। जबसे आए हैं पूल में तबसे रोज़ लातें खा रहे हैं।'
पूल में एक युवा जोड़ा तैरने का अभ्यास कर करा था। एक-दूसरे का हाथ पकड़े तैरने का अभ्यास कर रहे थे। मोबाइल बाहर रखा था नहीं तो उनका पूँछकर उनका फ़ोटो खींचते।
एक छूटके बच्चे को उसके माता-पिता गुब्बारे नुमा कमर पेटी बांधकर उसको पानी में उतारने का प्रयास कर रहे थे। बच्चा पानी में जाने से मना कर रहा था। मम्मी से चिपक गया। मम्मी ने झुककर उसको पानी में डालने की कोशिश की। बच्चे ने मम्मी के कपड़े कसकर पकड़े हुए थे। ऊपर के कपड़े खिंचने के चलते मम्मी ने बच्चे को पानी में डालने का प्रयास छोड़ दिया। हमने बिना माँगी सलाह दी-'तुम लोग ख़ुद पानी में उतरो तब बच्चा आसानी से पानी में चला जाएगा।' उन्होंने कहा -'कल से जाएँगे।'
शायद उन लोगों ने बच्चे की फ़ीस जमा थी। 3600/- रुपए। शायद बच्चे को ही सिखाने का प्लान होगा उनका। अपने लिए खर्च नहीं करना चाहते होंगे।
पूल में पानी साफ़ था। नीचे का फर्श दिख रहा था। हमारे पंजे भी। कई महिलायें भी पूल में तैराकी सीख रहीं थीं। तीस-चालीस लोग थे। सब सीखने वाले जोन में जहाँ पानी की गहराई साढ़े चार फीट है।
कई बार फ्लोटिंग और पानी में पाँव चलाने का अभ्यास किया। केवल एक बार पानी मुँह में गया। ख़ासी आई। बाक़ी चकाचक रहा। अभ्यास करते-करते एक घंटा बीत गया। सेशन खत्म होने की सीटी बज गई । लोग बाहर निकलने लगे। हम सबसे बाद में निकले।
कोच ने कहा -'अंकल दूसरे दिन के हिसाब से आप अच्छा कर रहे हैं। हफ़्ते भर में तैरना सीख जायेंगे।'
उसने बताया यहाँ चार-पाँच सौ लोग स्वीमिंग करने आते हैं। सुबह छह से नौ, शाम को पाँच से दस। शाम को भीड़ ज़्यादा होती है। सुबह पाँच कोच रहते हैं, शाम को आठ। स्वीमिंग पूल मार्च से अक्टूबर तक चलता है। कोच ने सलाह दी- 'फूल टाइम मेम्बरशिप ले लीजिए, फ़ायदा रहेगा।'
हमने उससे पूछा -'जब स्वीमिंग पूल नहीं चलता है तो क्या करते हो?'
उसने कहा -' कुछ नहीं। कोई काम नहीं मिलता। आप कोई काम दिलवा सकते हैं तो बताइए।'
हमने सोचा कहें -'हम ख़ुद कोई काम खोज रहे हैं, मिल नहीं रहा। तुमको कैसे दिलायें?' लेकिन फिर कहे नहीं। उसको लगता उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। अच्छी बात नहीं है यह।
बाहर आकर कार का लॉक दूर से खोला। गाड़ी की न लाइट जली, न कोई आवाज हुई। गाड़ी शांत खड़ी थी। पास जाकर देखा तो दरवाज़ा खुल गया। लाइट न जलने का कारण समझ में आया। हम गाड़ी बिना बंद किए चले गए थे। गाड़ी एक घंटे बैटरी पर चलती रही। थोड़ी देर और चलती तो फिर स्टार्ट नहीं होती। रोड साइड असिस्टेंस वाले को बुलवाना पड़ता। घंटे-आधे घंटे और ठुक जाते।
याद आया कि गाड़ी जब ठीक तरह से बंद होती है तो दरवाजा बंद करते समय 'गुड बाई।' बोलती है। सुबह शायद हम बिना 'गुड बाई' सुने चले गए। अब तय किया 'गुड बाई' सुनकर ही आगे बढ़ा करेंगे।
घर आते समय देखा कि सड़क किनारे दिहाड़ी मजदूरों की लाइन लगी थी। लोग उनसे बातचीत करते हुए दिखे। आज अपेक्षाकृत बहुत कम लोग थे वहाँ। शायद आज लोगों को काम मिल गया होगा। इतवार होने के चलते लोग अपने घरों में काम कराने के लिए ले गए उनको। यह भी हो सकता है कि कुछ दिहाड़ी मज़दूर अपने घर चले चले गए हों।
यह हमारा तैराकी सीखने का दूसरा दिन था

Saturday, May 30, 2026

तैराकी का ककहरा



 आज तैराकी सीखने का पहला दिन था।  स्वीमिंग पूल  में पहली बार उतरे। ककहरा सीखा तैराकी  का। 

सीखने के पहले तैयारी भी की। कल स्वीमिंग कास्ट्यूम खरीदने गये। कई दुकानों में पूछने के बाद एक जगह मिला । घुटन्ना , कैप और पानी वाला चश्मा। सबसे मंहगा चश्मा पड़ा। सब मिलाकर 1250 रुपए खर्च हो गए।

जब हम स्वीमिंग के कपड़े  खरीदने जा रहे था तब सड़क के बीच वाली फ़ुटपाथ पर तमाम चूल्हे जलते दिखे। दिहाड़ी मजदूर खाना बना रहे थे। खुले आसमान के नीचे  रात के अंधेरे में खाना बनाते लोग। सबेरे यहीं से दिहाड़ी का जुगाड़ करेंगे। रात में पानी बरसा तो कहाँ रुकेंगे इसका अंदाज़ नहीं। 

सबेरे गए तो दिहाड़ी मजदूर तैयारी करते दिखे। कोई खाना बना रहा था, कोई बातें। अभी उनकी मंडी सजी नहीं थी। कुछ देर में सजेगी। 

स्वीमिंग पूल में बाहर गाड़ी खड़ी करके अंदर गए।     3500/- रुपए महीने के और 100/- रजिस्ट्रेशन के जमा किया। पैसा जमा किया एडमिशन हो गया। फार्म और मेडिकल आराम से जमा किया जाएगा। 

अपना सामान जमा करके सीधे पूल में उतर गए। तीन-चार उस्ताद तैराकी सिखाने वाले वहाँ बैठे। निर्देश दे रहे थे। पानी में उतर कर हमने पूछा -'हमारा पहला दिन है। बताओ क्या करें?' 

'मुँह से साँस लेकर  पानी के अंदर नाक से साँस छोड़ने की प्रैक्टिस करिए।' -तैराकी उस्ताद इतना बताकर दूसरे तैराक को कुछ सिखाने लगा।

हमने  पानी के बाहर   मुँह  सांस लेकर , नाक से सांस छोड़ने का अभ्यास किया।  इसके बाद सर पानी के अंदर घुसाया। नाक से सांस  छोड़ी।  पानी के बुलबुले  गुड़-गुड़ करके निकले। शरीर थोड़ा ऊपर उठा। हमें लगा अगली साँस भी हमें पानी के अंदर ही लेनी है। लेने की कोशिश की, पानी मुँह के अंदर चला गया। हम ऊपर आ गए। हमें लगा हमारी तकनीक में कोई गड़बड़ी है। अभ्यास से सीख जायेंगे। दो तीन बार करने पर भी ऐसा ही हुआ।

जब पानी के अंदर सांस लेने में सफल नहीं हुए तो बगल वाले बच्चे ने बताया -' पानी के अंदर सांस सिर्फ़ छोड़नी है। लेनी बाहर है। अंदर साँस नहीं लेनी है ।' 

मतलब हम ग़लत तरीक़े से साँस ले रहे थे। लेकिन गलती करने के बाद सीख भी गए। जो बात गुरु ने नहीं सिखाई वह हमारी गलती ने सिखा  दी।

हमको लगा -' किसी काम को सीखने में ग़लतियाँ सबसे बड़ी गुरु होती हैं। जो चीज गुरु नहीं सिखा सकता वह ग़लतियाँ सिखा देती हैं।'

इसके बाद हमने पानी के बाहर मुँह से साँस लेना और पानी में नाक से सांस छोड़ने का अभ्यास किया। किनारे बैठ स्वीमिंग कोच को बताया। उसने कहा -'पचास बार प्रैक्टिस करिए।' हमको 'पूल वर्क' देकर वह दूसरे को गाइड करने लगा। 

हमने पचास बार की जगह सत्तर बार साँस लेने, छोड़ने  का अभ्यास किया। सत्तर पर रुक गए। सोचा अब आगे दूसरी कोई एक्सरसाइज सीखेंगे। 

साँस लेने छोड़ने के अभ्यास के बीच अगल-बगल तैरते लोगों को देखते रहे। एक बच्चा सीखते हुए हमारे बगल से निकला। हमने उसको निकलते हुए देखा। हाथ में वह सेफ़्टी बेल्ट की तर्ज पर गुब्बारे जैसा बाँधे था।

हमने कोच को बताया कि पचास साँसे ले लीं। अब बताओ क्या करें। उसने कहा  फ्लोटिंग करिए। पानी में सीधे लेट जाइए। हाथ लंबे करके। हमने सोचा -' पानी कोई बिस्तर है जो उसमें लेट जाएँ?  क्या मजाक है?'

उसने फिर समझाया -'साँस लेकर हाथ लंबे करके सांस रोकिए। पानी में सीधे हो जाइए।' 

हमने किया। हो भी गया। पानी में सीधे लेट गए। जैसे रस्सी में बँधा कपड़ा तेज हवा में फड़फड़ाता हुआ सीधा हो जाता है उसी तरह हम पानी में सीधे हो गए। चार -पाँच बार किया। इसके आगे और करते तब तक सीटी बज गई। टाइम पूरा हो गया। 

हम पानी से बाहर आ गए। शरीर हल्का महसूस हो रहा था। कोच ने कहा -'बाक़ी कल सिखायेंगे। सब सिखा देंगे।' 

हमको श्रीलाल शुक्ल जी की लिखी बात याद आई -"नदी के किनारे जो मल्लाह रहते हैं उनके बच्चे होश सँभालने के पहले ही नदी में तैरना शुरू कर देते हैं।" 

हमने सोचा हमारे परिवार वाले अगर  नदी किनारे रहते होते न जाने कब तैरना सीख चुके होते। 3600/- महीना बचते। लेकिन अब क्या किया जा सकता है। नदी न नहीं स्वीमिंग पूल ही सही।

आज घंटे भर में तैराकी का ककहरा सीखा। तैराकी की वर्णमाला के दो अक्षर बबलिंग और फ्लोटिंग सीख गए। बाक़ी का सबक कल सीखेंगे। 

बाहर आकर स्वीमिंग पूल के किनारे सेल्फी लेकर बच्चों को भेजी। बच्चों ने शाबासी देते हुए कहा -'बढ़िया है।' 

आप भी अगर अभी तक नहीं सीखें हैं तैरना तो सीख लीजिए। मजेदार है। 







Friday, May 29, 2026

काम का इन्तज़ार करते दिहाड़ी मजदूर





सात महीने पहले लक्षद्वीप में स्कूबा डाइविंग करते हुए तय किया था -'स्वीमिंग सीखना है।' घर से आशियाना आते-जाते  स्वीमिंग पूल के पास से गुज़रते समय ख़ुद से किया यह वायदा याद आता। मंगलवार को स्वीमिंग पूल देखने गए। पता चला साप्ताहिक बंदी रहती है मंगल को। वहाँ के कैफ़े में चाय पीकर लौट आए।

कल फिर गए स्वीमिंग पूल के बारे में पता करने। घर के पास के  मोड़ पर एक आदमी लहराते हुए मोटरसाइकिल चलाता दिखा। लहराते हुए मोटरसाइक़िल चलाते हुए आदमी मुस्करा रहा था।  महिला मोटरसाइकिल के लहराने से पीछे बैठी महिला का संतुलन गड़बड़ा रहा था। वह अपने हाथ इधर-उधर करते हुए  संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी। खिलखिलाते हुए। संतुलन बनाने के बाद बाइक सवार का कंधा थाम लिया। मोटरसाइकिल का लहराना बंद हो गया। महिला का संतुलन बन गया। चालक की मुस्कान बंद हो गई। महिला की खिलखिलाहट भी चौड़ी मुस्कान में तब्दील हो गई। 

जिस समय  बाइक पर बैठी महिला खिलखिलाते हुए अपने हाथ उठाकर संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी उस समय उसके हाथ की हथेली में रची मेंहदी दिख रही थी। एक झलक भर दिखी हमें। उस झलक के साथ ही मुझे किशन सरोज जी के गीत  का मुखड़ा याद आ गया :

जन्म-जन्मों ताल-सा हिलता रहा मन।

 वह मोटरसाइकिल सवार मोड़ से आगे चला गया। अपन भी आगे बढ़ गए। स्वीमिंग पूल के पास दिहाड़ी मजदूरों की लाइन लगी थी। काम की तलाश में। पुरुष और महिला दोनों से उनमें। अपने पास आते हर इंसान को वे अपने लिए रोजगार की संभावना के रूप में देखते। उस इंसान के आगे बढ़ जाने पर वे फिर किसी दूसरे इंसान का इन्तज़ार करने लगते जिससे उनकी दिहाड़ी का इंतज़ाम हो सके। हम अपनी गाड़ी स्विमिंग पूल के बाहर खड़ी करके अंदर चले गए। 

स्वीमिंग पूल में लोग अपनी तैराकी करके वापस जा रहे थे। रेट पता किए। 3500/- रुपए महीना लगेंगे स्वीमिंग के। और जानकारी लेकर हम वाहर आ गए । वहीं बने कैफे में चाय पी। फिर वापस लौट लिए।

बाहर आकर फिर दिहाड़ी मजदूर दिखे । उनकी तरफ़ गए तो उनमें से अधिकतर मेरी तरफ़ आशा भरी नजरों से देखने लगे।  एकाध ने पास आकर पूछा भी -'लेबर चाहिए? ' 

हमारे ' नहीं '  कहते हुए उनकी रुचि हममें ख़त्म हो गई। हम वहीं खड़े होकर उनमें से एक से बतियाने लगे। उसके साथ खड़े लोग हमारी बातचीत को बेमन से सुनते रहे। 

उन  श्रमिकों में राजगीर का काम करने वालों के औजार उनकी साइकिल पर टंगे थे। तीन -चार लोग होंगे राजगीर। वे अपनी साइकिलों के पास खड़े थे। कुछ लोग बैठे भी थे। एक आदमी  उकड़ू बैठा जमीन पर सीधे, चित्त लेटे मोबाइल में कोई रील जैसी चीज देख रहा था। मोबाइल देखते हुए अपनी उँगली से रील आगे सरकाता जा रहा था। उसे देखकर लगा मानो वह मोबाइल में पेट पर रील स्क्रॉल करने के बहाने अपनी उँगली दायें से बायें फिरा रहा था। इससे मोबाइल के पेट में भी गुदगुदी मच रही होगी। लेकिन शायद उसको भी मजा आ रहा होगा। तभी वह बिना किसी एतराज के रील-रील पर दिखाता जा रहा था।  शायद मन ही मन मुस्करा भी रहा हो। 

लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि ज्यादातर लोग मजदूरी के लिए आए हैं। 300 से 400 रुपए दिहाड़ी के मिलते हैं। राजगीर की दिहाड़ी हज़ार-बारह सौ रुपये हैं।  आजकल गर्मी के चलते काम कम मिलता है। बमुश्किल महीने में दस -बारह दिन। सब
 भगवान भरोसे है। 

लखनऊ में सरकारी नियमानुसार अकुशल मजदूर की न्यूनतम मजदूरी 433 रुपए प्रतिदिन है। लेकिन इसको लागू करवाना सरकार की क्षमता के बाहर है। समाज सरकार से ज़्यादा प्रभावकारी है।

सुबह के दस बज चुके थे। हमने पूछा अब भी मजदूरी मिलने की आशा है? उसने कहा -'हाँ, आजकल लोग देरी से उठते हैं। कभी-कभी देर से आते हैं। क्या पता मिल ही जाये मजदूरी। मजदूरी न मिलने पर कम दाम पर भी लोग चले जाते हैं। दिन बेकार करने से अच्छा कुछ मिल जाये। भूखे रहने से अच्छा कम पैसे में काम कर लेना। हमको अंसार कंबरी की गीत पंक्ति याद आ गई :

हम भी बाज़ार में आ गये ‘क़म्बरी’
अपनी क़ीमत को अब और कम क्या करें

हम उन लोगों को वहीं अपनी दिहाड़ी के इंतज़ार में छोड़कर घर वापस आ गए।







Thursday, May 28, 2026

खोना मोबाइल का

कुछ दिन पहले अपन डिस्पेंसरी गए। दवा लिखवानी थी। ऑटो खरीदा रैपिडो एप से। ऑटो आ गया। हम बैठे। चल दिए।

घर से चौराहे तक तो मामला ठीक रहा। चौराहे के आगे ऑटो दायीं तरफ़ मुड़ गया। हमारे हिसाब से बायें मुड़ना था। हमने ऑटो वाले से बायें चलने को कहा। उसने बताया कि मैप में दायें दिखा रहा है। हमने कहा -'बायें चलो।'

ऑटो वाला बायें चल दिया। मोबाइल में रैपिडो एप बार-बार बता रहा था कि हम मंजिल से अलग जा रहे हैं। लेकिन हम मैप को नकारते हुए चलते रहे। ऑटो को दायें, बायें, सीधे चलने का संकेत देते रहे। उस जगह पहुँचे जहाँ हमारे हिसाब से डिस्पेंसरी थी।

ऑटो वाले को पैसे दिए। उतरकर देखा वहाँ डिस्पेंसरी का 'डी' तक नहीं था। ग़लत जगह आ गए यह सोचना भी ग़लत लगा।

ग़लत समझे जाने का डर भी हमसे कई बार तमाम ग़लतियाँ करवाता है।

लेकिन सच यही था। हमने सोचा किसी से पूछ लें लेकिन यह सोचकर नहीं पूछा कि जिससे पूछेंगे वह हँसेगा। सोचेगा -'बताओ, इतनी बार जा चुके डिस्पेंसरी। फिर भूल गए।'

हमने फिर गूगल मैप देखा। फिर ऑटो किया। जिस जगह डिस्पेंसरी दिख रही थी वहाँ का ऑटो कर लिया। वहाँ पहुँचकर देखा कि वहाँ डिस्पेंसरी थी तो लेकिन हमारी CGHS वाली नहीं थी। हमने इस बार शरम का दामन छोड़कर एक मित्र से पूछ ही लिया। उसने बताया कि डिस्पेंसरी की जगह बदल गई है। अब वह बंगला बाजार चली गई है। मतलब मैप सही बता रहा था। हमने दो बार ऑटो करके सौ रुपये बर्बाद कर दिए थे।

मैप पर ऑटो का किराया देखा। पचास रुपए बता रहा। हमने ऑटो वाले से कहा -'छोड़ दो वहाँ। एप के हिसाब से पैसे ले लेना।'

उसने कहा -'सौ रुपए लगेंगे।'

हम भलमनसाहत, नैतिकता जैसे घराने के शब्द बोलते हुए ऑटो से नीचे उतर आए। एक बार फिर ऑटो किया।ऑटो आया। बैठे चल दिए। आधे घंटे के अंतराल में यह हमारी तीसरी ऑटो की सवारी थी।

तीसरी ऑटो में बैठते ही पता चला कि हमारा दूसरा मोबाइल साथ नहीं था। हमने इधर-उधर खोजा। नहीं मिला। पिछले दोनों ऑटो के नंबर रैपिडो एप्प से लेकर फ़ोन किया। दोनों लोगों ने अपना ऑटो देखकर बताया -'उनके ऑटो में नहीं छूटा है मोबाइल।'

हम मोबाइल वियोग में दुखी होते हुए डिस्पेंसरी गए। दवा लिखवाई। एक बारगी तो मन किया डॉक्टर मैडम से पूछ लें -'मोबाइल खो गया है। उसके वियोग को कम करने की दवाई है क्या कोई? लेकिन फिर पूछा नहीं। क्या पता वो बुरा मान जाती। आजकल लोग जरा-जरा सी बात पर तो बुरा मान जाते हैं।'

अपने खोए मोबाइल में बार-बार घंटी बजाते रहे। कुछ देर तक तो बाजी घंटी। बाद में वह भी बंद हो गई। जिसको मिला होगा उसने बंद कर दिया होगा।

हमने एक बार फिर ऑटो वालों को फ़ोन किया। उन्होंने फिर मना किया। उनकी बात मानने के अलावा कोई चारा भी नहीं था।

रास्ते में और घर आकर भी हम याद करते रहे कि उस मोबाइल में क्या-क्या था। याद किया तो इतनी बातें याद आई की मन दुखी हो गया। न जाने कितनी यादें सुरक्षित थीं उस मोबाइल में। कई फोटो। संदेश। और न जाने कितनी यादें। आठ साल से ज़्यादा का साथ था मोबाइल का। स्क्रीन चटक गई थी। लेकिन काम बखूबी करता था। कहीं जाते तो साथ ले जाते। अब वह बेचारा कहाँ धूप में परेशान हो रहा होगा। हम मोबाइल के खोने से ज़्यादा इस बात से दुखी थे कि बेचारा बेजुबान मोबाइल अकेला परेशान हो रहा होगा।

मोबाइल खोजने की कोशिश में गूगल की शरण में गए। आख़िरी लोकेशन देखी। वह तीन किलोमीटर दूर क़िला के पास थी। हम फौरन गाड़ी लेकर वहाँ गए। हमको पहले वाले ऑटो वाले पर शक था कि उसने ही मार लिया मोबाइल। किसी पर शक करने में कोई खर्च नहीं पड़ता। इसलिए शक करने का चलन आम है दुनिया में।

मोबाइल की आख़िरी लोकेशन के पास पहुंचते हुए हमें लगा कि ऑटो वाला मेरा मोबाइल लिए बैठा होगा। हम उसको मोबाइल के साथ पकड़ लेंगे। लेकिन वहाँ कोई ऑटो दिखा नहीं। एक आदमी चारपाई पर लेटा बदन तोड़ रहा था।

हमने उससे अपनी मोबाइल व्यथा बताई। पूछा कि कोई ऑटो वाला आया था यहाँ? उसने मना किया। हमने फिर पहले वाले ऑटो वाले को फ़ोन किया। उसने फिर बताया कि उसके ऑटो में मोबाइल नहीं छूटा

फिर हमने अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करते हुए पूछा -'हमारे बाद कोई सवारी बैठाई थी क्या किला की तरफ़ की?'

उसने बताया -'हाँ बैठाई थी।'

हमें लगा कि क़िले के पास मोबाइल पाया गया। सवारी क़िले तक आई। उसके पास ही होगा मेरा मोबाइल। हमने अपने ज्ञान का उपयोग करते हुए सोचा कि उसने भुगतान गूगल पे से किया होगा। उससे उसका नम्बर पता करके पकड़ लेंगे। मोबाइल मिल जाएगा।

लेकिन ऑटो वाले ने मेरी इस आशा पर पानी फेर दिया यह बताकर कि उसने दस रुपये नकद दिए थे। आन लाइन भुगतान नहीं किया था। हम अपना दुखी मन वापस लौट आए।

इसके बाद कई बार मोबाइल की लोकेशन देखी। घंटों मेरा मोबाइल बेचारा किला के पास दिखता रहा। लेकिन मिला नहीं। बेचारा मोबाइल भूखा, प्यासा किस हाल में कहाँ होगा यही सोचकर दुखी होते रहे। उसको पेट भरने को बिजली मिली होगी या भूखा ही रखा गया यही सब सोचकर दुखी होते रहे। दुखी होने में अभी कोई प्रतिबंध भी तो नहीं है। लोग तो बिना कारण दुखी होते रहते हैं। हमारे पास तो कारण था।

दो दिन तक हम मोबाइल को किला में पड़ा हुआ देखते रहे। कई बार कॉल किया। हर बार वह स्विच ऑफ़ या रेंज से बाहर बताता रहा। हमने गूगल की सुविधा से मोबाइल को खोया हुआ दिखाया। सिम ब्लॉक किया। ऑन होने की स्थिति में उसके फ़ैक्ट्री सेटिंग मॉड में करने का निर्देश दिया। अगले दिन जाकर दूसरा सिम लिया। ई सिम लिया इस बार। दोनों सिम एक ही मोबाइल में रहने लगे। पता नहीं उनमें आपस में बातचीत होती है या वे भी आधुमिक पड़ोसियों की तरह एक-दूसरे की निजता में दखल न देने वाले अंदाज़ में रहते हैं। एक दूसरे से निर्लिप्त रहते हैं।

आज अचानक सुबह फिर याद आ गई उस बिछुड़े हुए मोबाइल की। पता नहीं कहाँ होगा। क्या पता उसमें कौन सी सिम चल रही होगी। दिन में कितने घंटे चलता होगा। जहाँ होगा वहाँ बिजली आती होगी या नहीं। उसकी फ़ोटुएँ किस हाल में होंगी?

तमाम और भी बातें सोचते हैं लेकिन क्या फ़ायदा वह सब बताने का। अब यही सोचकर मन को तसल्ली दे रहे हैं कि हमारा और मोबाइल का साथ इतने दिन का ही था। रमानाथ अवस्थी जी कविता याद आ रही है :

आज आप हैं हम हैं लेकिन
कल कहाँ होंगे, कह नहीं सकते
ज़िन्दगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

Wednesday, May 27, 2026

पोस्ट ऑफिस में कुछ घंटे

कल पोस्ट ऑफ़िस जाना हुआ। एक चिट्ठी भेजनी थी कानपुर। घर के पास कई कोरियर की दुकानें हैं लेकिन सोचा कि देखें यहाँ का पोस्ट ऑफिस कैसा है।

पोस्ट ऑफ़िस की बात सोचते ही पोस्टमैन की याद आती है। देश के बड़ी आबादी हाईस्कूल में पोस्टमैन का निबंध लिखकर पास हुई है। आज अगर पोस्टमैन पर निबंध लिखकर इम्तहान पास करने वाले मिलकर पार्टी बना लें तो आराम से देश में न सही तो किसी प्रदेश में आराम से अपनी सरकार बना सकते हैं।

आशियाना पोस्ट ऑफिस छुटकी सड़क पर था। नुक्कड़ पर एक छुटके से कमरे में बना पोस्ट ऑफिस देश के अतीत का गौरव गान करता सा था लगा। तसल्ली से चलता पंखा। उससे भी तसल्ली से चलता कंप्ट्यूर। पोस्ट ऑफिस हालाँकि आनलाइन है। सारा काम कम्प्यूटर पर होता है। लेकिन बुजुर्ग कम्यूटर धीरे बहुत आहिस्ते चलते दिखे। जरा सा चलते हाँफ जाते। हमारे आगे चार लोग लगे थे। काफ़ी देर वे आगे ही लगे रहे। स्पीड पोस्ट की इंट्री कछुआ चाल से हो रही थी। लाइन में खड़े-खड़े सोचा कि जितनी देर में चार लोगों की इंट्री होती है उतनी देर में तो कानपुर में ख़ुद जाकर चिट्ठी थमा आते। काउंटर पर एक महिला और एक पुरुष थे। महिला युवा,पुरुष बुज़ुर्गियत की तरफ़ कदम बढ़ाता। गोल गले का कुर्ता पहने महिला के कान में छोटा सा कुंडल देखकर मन किया पूछें कि यह प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद तो नहीं खरीदा। लेकिन फिर नहीं पूछा। न पूछने का कारण महिला का मुस्कराता चेहरा और उसके बाक़ी गहने ग़ैर सोने के बने होना था। हम कोई सोने के बारे में सवाल पूछते तो क्या पता वह असहज हो जाती। उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो जाती।

बुज़ुर्गियत की तरफ़ बढ़ता पुरुष हाथ में मोबाइल लिए कुछ करने में मशगूल था। एक ग्राहक ने पैसा जमा करने की बात कही तो उसने कहाँ -'अभी डाक बाटने गए हैं पोस्टमैन साहब। वे आयेंगे तब जमा करेंगे पैसा।' पोस्टऑफिस में बिकने वाले सामान के दाम की लिस्ट लगी थी। मेघदूत पोस्टकार्ड के दाम 25 पैसे लिखे थे। 25 पैसे के सिक्के (चवन्नी) को देखें जमाना हो गया। 30 जून 2011 से इसे वैध मुद्रा के रूप में बंद कर दिया गया है। जो मुद्रा वैध नहीं उसमें खरीदारी कैसे होगी? बिना आनलाइन ख़रीद के ऐसा शायद संभव न हो। पोस्टकार्ड इसीलिए शायद चलन से बाहर हो गए हैं। हमने खरीद के लिहाज से पूछा तो पता चला कि पोस्टकार्ड अब सिर्फ़ मुख्य डाकघर में मिलते हैं। सामान्य पोस्टकार्ड पचास पैसे का है। वह भी मुख्य डाकघर में ही मिलता है।

हमारे आगे लाइन में लगे भाई साहब को भी स्पीड पोस्ट करनी थी। उनकी इंट्री आधी हुई थी कि बिजली चली गई। साथ ही कंप्यूटर भी बिजली के साथ ही चला गया। बिजली से कम्प्यूटर का बड़ा याराना है। बिजली भले कम्प्यूटर की परवाह न करे लेकिन कंप्यूटर बिना बिजली के नहीं चलता। एकतरफा याराना है कम्प्यूटर का बिजली से। केवल कम्प्यूटर ही नहीं पंखा, बत्ती और कई चीजें बिजली से एकतरफा प्रेम करते हैं। बिजली जाने के बाद कंप्यूटर बंद हो जाने पर ग्राहक लोग ज्ञान वर्षा करने लगे। यूपीएस होना चाहिए, कम्यूटर नया होना चाहिए जैसी ग्राहकोचित बयान जारी करने लगे। महिला और पुरुष इन बयानबाजी से निर्लिप्त बिजली आने का इंतजार करते रहे। काउंटर के बाहर रखी बैटरी और दीगर सामान इस बात का इशारा कर रहे थे कि कभी वहाँ यूपीएस भी रहा होगा। अब वह मार्गदर्शक मंडल में शामिल होकर आपने बिकने का इंतज़ार कर रहा था।

मुख्यमंत्री जी ने शहरों में चौबीस घंटे और गांवों में 18 घंटे बिजली उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। लेकिन उनके आदेश स्थल से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही बिजली बिना बताये ग़ायब हो गई। बिजली को अदृश्य होने का फ़ायदा मिला। दृश्यमान होती तो इस हरकत पर उस पर बुलडोजर चल गया होता। बिजली को शायद मुस्लिम न होने का फ़ायदा भी मिला। वैसे भी बुलडोजर चलाना और बिजली बजाना अलग तरह के काम हैं। निर्माण और ध्वंस में हमेशा अंतर होता है।

बिजली जिस तरह बिना बताये गई थी उसी तरह बिना बताये आ भी गई। हमें लगा काम बिजली की गति से आगे बढ़ेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। काउंटर पर बैठी महिला ने बताया -'पंद्रह मिनट लगेंगे कम्प्यूटर को शुरू होने में। इसके बाद ही इंट्री होगी।'

बिजली आने के पंद्रह मिनट बाद कम्यूटर की साँसे वापस लौटीं। इंट्री शुरू हुई। इंट्री होने के बाद स्पीड पोस्ट की पर्ची निकली। चार इंच लंबी, दो इंच से कम चौड़ी पर्ची प्रिंट करते लाइन प्रिंटर लगातार किरकिराता रहा। शायद अपने काम का हल्ला मचा रहा था। उसके हल्ले का अनुवाद कर सकते तो शायद सुनाई देता -'देखो हमने यह पर्ची छापी है। हमसे पहले के किसी प्रिंटर ने यह काम नहीं किया होगा।' प्रिंटर चार इंच लंबी पर्ची छापने के लिए 12 इंच से ज़्यादा इधर-उधर टहलता रहा।

इस बीच लाइन में लफड़ा हो गया। बिजली जाने और वापस आने के बीच एक बुजुर्ग हमारे पीछे लाइन के बीच में शामिल हो गया। पहले से खड़े आदमी ने उसको टोंका तो उसने कहा -'मैं तुमसे पहले लाइन में लगा हूँ।' दोनों में पहले मैं, पहले मैं होने लगा। पहले से खड़े आदमी ने उदारवादी अंदाज़ में कहा -'आप मुझसे कहते कि जल्दी है तो मैं मना थोड़ी करता आपको आगे लगने से। लेकिन आप झूठ बोलकर आगे लग रहे हैं यह ग़लत बात है।'

हमें उसकी बात सुनकर ताज्जुब हुआ। आज जब देश-दुनिया के बड़े-बड़े लोग, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बिना रुके लगातार पूरी बेशर्मी से झूठ बोलकर अपनी राजनीति चमकाते हुए सत्ता में बने हुए हैं तब लखनऊ के एक मोहल्ले में एक आदमी दूसरे आदमी के झूठ बोलने का बुरा मान रहा है। इस बात की कहीं किसी ने शिकायत ने कर दी तो मुझे डर है उसके यहाँ ईडी, सीबीआई न भेज दी जाये।उसके घर पर मिसाइल से हमला न कर दिया जाये। कोई एंकर पाकिस्तानी बताते हुए उसके देशनिकाले का आह्वान न कर दे।

लाइन में झूठ बोलकर आगे लगने की बजाय पूछकर आगे लगने की बात से मुझे गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में मोहसिना (हुमा कुरैशी) और फैजल खान (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) के बीच का रोमाटिंक सीन याद आ गया जिसमें मोहसिना फैजल ख़ान को बिना पूछे उसके हाथ पर अपना हाथ रखने पर कहती है -" बिना पूछे आप हाथ कैसे रख दिए मेरे हाथ पर। पूछ के रखिए हाथ, कोई मना थोड़ी है। लेकिन परमिशन लेनी चाहिए न।" बाद में कुछ लोगों ने बुजुर्ग के लाइन में अनिधकृत प्रवेश की पुष्टि की तो वह नाराज होकर लाइन से त्यागपत्र देकर कहीं और चला गया। किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। काउंटर पर इंट्री करती हुई महिला यह सब वार्तालाप मुस्कराते हुए सुनती रही। हम उसे मुस्कराते हुए देखते रहे। वह बिना मुस्कराते हुए कुछ अधिक ख़ूबसूरत लग रही थी।

मुस्कराते हुए लोग हमेशा ख़ूबसूरत लगते हैं। आप भी लगेंगे। हमारी बात पर भरोसा करिए। पक्का लगेंगे। खूबसूरत।

मुस्करा तो काउंटर पर बैठा बुज़ुर्गियत की तरफ़ बढ़ता पुरुष भी रहा था। लेकिन उसकी मुस्कान उतनी खिलकर दिख नहीं रही थी। क्योंकि एक तो वह सर झुकाकर मुस्करा रहा था। उसका ध्यान मोबाइल पर था। उसका आधा ध्यान मोबाइल में था इसलिए वह पूरा मुस्करा भी नहीं रहा था। उसकी आधी मुस्कान का बड़ा हिस्सा भी मोबाइल में चला जा रहा था। बची हुई मुस्कान का बड़ा हिस्सा उसकी बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी में उलझ जा रहा था। मुस्कान दाढ़ी से बाहर आते हुए सहम सी रही थी जैसे कोई बालिका किसी कँटीली झाड़ियों के बीच से गुजरते हुए अपने कपड़े काँटों में उलझने से बचाते हुए निकलती होगी उसी तरह उसके चेहरे से मुस्कान सहमती सी निकल रही थी। इसीलिए कम खूबसूरत लग रही थी।

बिजली आने के बाद कंप्यूटर ऑन होने की प्रक्रिया में लगे समय के बीच हमने महिला से अनुरोध किया कि वह स्पीड पोस्ट का पैसा ले ले। लेकिन उसने लिया नहीं। बोली -'इंट्री हो जाये तब लेंगे। पता नहीं इंट्री हो या न हो।'

इस बीच बिजली और कम्प्यूटर की धीमी गति पर अपनी राय हाजिर करते हुए एक ग्राहक ने कहा -'सरकार बीएसएनएल और पोस्ट ऑफिस दोनों को बर्बाद किये है। पोस्ट ऑफिस में बाबा आदम जमाने का कंप्यूटर रखें है। इतना धीमा सर्वर। हद्द है।'

उस ग्राहक द्वारा सरकार का विरोध सुनकर हम सहम गए। हमें लगा कहीं सरकार ने सुन लिया तो ग़ज़ब हो जाएगा। हमारे ऊपर भी कहीं कार्रवाई न हो जाए यह कहते हुए -'तुमने सरकार की बुराई की भले न हो लेकिन सुनी तो।' सरकार की निंदा के अपराध में भागेदारी तो बनती है।

हमने सरकार की बुराई करने वाले ग्राहक की तरफ़ वाला अपना कान कसकर बंद कर लिया और पूरे ध्यान से अपना काम करती महिला को देखते रहे। वह काम में जुटी रही। बिजली जाने, कम्प्यूटर पुराना होने, यूपीएस न होने के भड़काऊ बयानों से बिना प्रभावित हुए। शायद इसी को स्थितिप्रज्ञ स्थिति कहते हैं।

आख़िर वह शुभ मुहूर्त भी आया जब लाइन प्रिंटर ने मेरा स्पीड पोस्ट का रसीद किरकिराते हुए छापकर दे दिया। महिला ने मेरा मोबाइल अपने हाथ में लेकर अपने पास सुरक्षित रखें स्कैनर को स्कैन करके 55 रुपए भुगतान करने को कहा। हमने बिना मोलभाव किए भुगतान कर दिया। उसने हमें रसीद थमा थी। हमने रसीद ध्यान से देखी। इसके बाद काउंटर पर बैठे बुज़ुर्गियत की तरफ़ कदम बढ़ाते मोबाइल में डूबे पुरुष को देखा और अंतत: महिला को देखते हुए पोस्ट ऑफिस के छटके कमरे से बाहर आ गए।

बाहर आकर एक बार फिर पोस्टमैन का निबंध मन ही मन दोहराया :

"पोस्टमैन एक सरकारी कर्मचारी होता है। वह खाकी यूनिफॉर्म पहनता है। साइकिल पर चलता है। वह दरवाज़े-दरवाज़े जाता है।" पूरा निबंध मन में दोहराते हुए सोच रहे हैं कि क्या अब भी पोस्टमैन का निबंध स्कूलों में याद कराया जाता है? आपको याद है पोस्ट मैन पर निबंध?

Tuesday, May 26, 2026

सबेरे की चाय और ब्लिंकिट


ब्लिंकिट डिलीवरी करने वाले भाई 


 सबेरे चाय बना रहे थे। पानी चढ़ाया। गैस जलाई। चीनी डाली। बाहर जाकर तुलसी की पत्ती तोड़कर लाए। डाल दी गरम होते पानी में। इसके बाद दूध का नंबर था।

दूध निकालने के लिए फ्रिज खोला। देखा दूध जमा हुआ था। कल काफ़ी देर खुले में रखा रहा। गर्मी में। अपनी अनदेखी से उसका मूड उखड़ गया होगा। फ्रिज में रखे-रखें जम गया। चाय के लिए अपने को अनुपलब्ध घोषित कर दिया। मानो बयान जारी कर दिया -' तुम हमारी बेइज्जती करोगे, हम तुम्हारा काम (चाय) बिगाड़ेंगे।'
दूध न होने पर गैस बंद कर दी। पहले सोचा बिना दूध की चाय पी जाये। लेकिन फिर दूध का इंतजाम करने की सोची। सबसे आसान विकल्प ब्लिंकिट पर आर्डर करना लगा। दूध का पैकेट 72 रुपए का आता है। अगर केवल दूध आर्डर करते तो 30 रुपए डिलीवरी के पड़ते। साथ में कुछ और मंगा लिया। 614 रुपए का आर्डर हुआ। 72 रुपए का दूध मंगाने में 30 रुपए का डिलीवरी खर्च बचाने के लिए पाँच सौ से ऊपर का और खर्च।
बाजार की शातिर हरकतें हैं। इतनी सफ़ाई से आपकी जेब काटता है कि खर्च करने को आप अपनी समझदारी मानते हैं। बेवक़ूफ़ी की बातों को 'मास्टर स्ट्रोक' बताने के देश व्यापी चलन के मुताबिक़ हमने इसे अपना 'मास्टर स्ट्रोक' समझने की कोशिश की। लेकिन फिर लगा इतनी बेवक़ूफ़ी भी ठीक नहीं।
ब्लिंकिट वाले भाई आठ मिनट में आ गए। पिछले दिनों डिलीवरी टाइम पर बड़ा हल्ला मचा था। केंद्रीय मंत्री की सलाह के बाद ब्लिंकिट ने अपने ब्रांड प्लेटफॉर्म से 10-मिनट डिलीवरी का दावा हटा दिया था । इसका मतलब है कि अब कंपनी डिलीवरी के लिए किसी तय समयसीमा को फिक्स नहीं करेगी। लेकिन डिलीवरी उसी हिसाब से हो रही है। आठ मिनट, दस मिनट।
हमने ब्लिंकिट वाले भाई साहब से पूछा -'इत्ती सबेरे आ गए ड्यूटी पर।'
ब्लिंकिट भाई बोले -' हाँ, सबेरे तीन घंटे 'ब्लिंकिट निपटाते' हैं। 150-200 रुपए मिल जाते हैं। पचास रुपये का पेट्रोल। बाक़ी बच जाते हैं।'
" 'ब्लिंकिट निपटाने' के बाद क्या करते हैं? " -मैंने पूछा।
एक ऑफ़िस में काम करते हैं। मोटर साइकिल स्टार्ट करके जाते हुए ब्लिंकिट ब्रदर ने बताया।
ब्लिंकिट से आए सामान को खोल कर डब्बों में भरा। गैस ऑन करके 'चाय-यज्ञ' दुबारा शुरू किया। चाय बनाई। चाय पीते हुए सोचने लगे -' निठल्ले बैठे-बैठे समय बर्बाद करने की बजाय अपन भी कुछ देर ब्लिंकिट निपटायें तो कैसा रहे? कुछ कमाई ही होगी।'
यहाँ कमाई का मतलब अनुभव की कमाई। लोगों ने मिलना, बातचीत करना अपने आप में रोचक बात है। पैसे भी आयेंगे ही। आजकल कई काम करने की सोचते हैं। लेकिन सोच पर अमल करने में आलस्य हमेशा हावी हो जाता है। आलस्य के साथ कुछ नया काम करने में हिचक भी बड़ी बाधा है। लंबी सरकारी नौकरी के बाद पेंशन शुदा इंसान कुछ नया करने लायक नहीं रहता शायद। लफ्फाजी के सिवा कुछ कर नहीं पाता निठल्ला रिटायर्ड इंसान।
आपका क्या सोचना है इस बारे में?