| भंडारे का खाना खाकर फुटपाथ पर आराम करते गोपाल और उनका भतीजा टिंगू |
कल शाम को मेडिकल सर्टिफिकेट बनवाने के बाद बाजार गए। कुछ सामान लेना था। बहुत दिन बाद साइकिल चला रहे थे। घर से बाहर निकलकर पता चला दोनों पहियों में हवा कम है। सोचा आगे कहीं भरवा लेंगे। लेकिन फिर याद आया कि जो सामान लेना था उसका नमूना तो घर में ही छूट गया। हमने सोचा -'अपन भी अजब नमूने होते जा रहे हैं। अक्सर चीजें भूल जाते हैं।'
बुज़ुर्गियत का हमला है या भुलक्कड़पन का हल्ला यह तय किए बिना घर वापस लौटे। लौटकर सामान उठाया। फिर सोचा हवा भी भर लें। दस रुपये ही बचेंगे।
पंप उठाकर पहिए की छुच्छी खोली। छुच्छी खोलते ही हवा बड़ी तेज बाहर निकल के भागी। ऐसे जैसे हारी हुई पार्टी के विधायक पार्टी छोड़कर भागते हैं। हमने फौरन हवा भरने वाले पंप का पाइप छुच्छी में लगाकर बंद कर दिया। हवा भरकर फिर निकल लिए।
सड़क पर गाड़ियाँ तेज आ-जा रहीं थी। अँधेरा हो गया था। किनारे-किनारे आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए बाज़ार पहुँचे। सामान ख़रीदा। इसके बाद आगे बढ़े। पूल के सामने की तरफ़ वाली सड़क के बीच के चौड़े डिवाइडर पर दिहाड़ी मजदूर आराम कर रहे थे। कुछ लोग खाना बना रहे थे।
| सड़क पर आराम करते दिहाड़ी मजदूर |
एक जगह रुककर साइकिल से उतरकर हम उन लोगों से बतियाने लगे। तीन लोग अगल-बगल लेटे हुए थे। बात करने पर एक उठकर बैठ गया। बाक़ी दो लेटे रहे। सीतापुर के रहने वाले थे। दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। ईंटा-गारा ढोने का काम। हमको देखकर बोले -'आपकी शक्ल जानी-पहचानी लग रही है।' पता चला हमारे बगल वाले घर में मजूरी करते समय उससे बातचीत हुई थी। गोपाल यादव नाम है। सीतापुर से आए हैं। महीना-पंद्रह दिन काम करते हैं, फिर घर चले जाते हैं। दिहाड़ी के छह सौ रुपये मिलते हैं। ठेकेदार कितना लेता है, काम कराने वाला उसको कितना देता है इससे उनको मतलब नहीं। उनको दिहाड़ी के छह सौ चाहिए।
अपने दोस्त के बारे में बताया कि उसको शाम को एक साहब के यहाँ गमला पुताई का काम मिल गया। तीन सौ रुपये उसके मिले। नौ सौ रुपये कमाई हो गई।
बाक़ी लोगों को खाना बनाते देख हमने गोपाल से पूछा -'तुम नहीं बना रहे खाना?'
'आज मंगलवार था। भंडारा में मिल गया खाना। दोपहर को खाया फिर शाम को भी। दिन भर का हो गया खाना।'- गोपाल ने बताया।
'इस तरह तो हर मंगलवार खाने के पैसे बच जाते होंगे?' -हमने कहा।
'नहीं, कभी -कभी ऐसी जगह काम मिलता है जहाँ भंडारा पास में नहीं लगता। तब दोपहर में बाहर खाना होता है।शाम को बना लेते हैं।'- गोपाल ने बताया।
एक झोला टाइप का सर के नीचे दबाये लेटे थे गोपाल। हमने पूछा -' खाना कैसे बनाते हो? तुम्हारे बर्तन कहाँ है?'
'वहाँ रखें हैं।' -गोपाल ने सड़क पार एक जगह की तरफ़ इशारा करते हुए बताया।
'पानी बरसने पर कहाँ सोते हो?' हमारे इस सवाल के जबाब में गोपाल ने पीछे कई शेड दिखाते हुए बताया -'वहाँ चले जाते हैं।बारिश बंद होने पर फिर आ जाते हैं।'
'यहाँ खाना बनाते हो इसका मतलब खाना बना लेते हो। घर में जाते हो तब भी खाना बनाते हो?'- हमने पूछा।
'नहीं, घर में बीबी खाना बनाती है। हम नहीं बनाते। उसी से बात कर रहे हैं। सुन रही है वह हमारी बातचीत।'- गोपाल ने अपना कीपैड वाला नोकिया का मोबाइल दिखाते हुए कहा।
हमने मोबाइल लेकर उसकी पत्नी कंचन (नाम गोपाल ने बताया) से बात की। पूछा -' गोपाल जब घर आते हैं तो उनसे खाना क्यों नहीं बनवाती हो?'
इस पर कंचन ने कहा -'ये घर में खाना -वाना नहीं बनाते हैं।'
सीतापुर के लहरपुर कस्बे में रहते हैं गोपाल। लहरपुर में हमारी श्रीमती जी ने कुछ दिन सर्विस भी की है। वहाँ और सीतापुर की कुछ बातें हुईं। इस बीच गोपाल के बगल में लेटा हुआ उनका भतीजा भी उठकर बैठ गया। पता चला वह भी चाचा के साथ काम करने आया है लखनऊ। आठवाँ पास है। हमने पूछा -' आगे नहीं पढ़ा? हाईस्कूल क्यों नहीं किया?'
इस पर गोपाल ने हँसते हुए कहा -'क्या होगा हाईस्कूल करने से? कोई नौकरी-सौकरी तो मिलनी नहीं है। इससे अच्छा कुछ काम-धाम सीखेंगे। खाने-पीने का जुगाड़ होगा।'
नौकरी-सौकरी तो मिलनी नहीं ऐसा सच है आजकल के जमाने में जिसके बारे में कुछ कहना मुश्किल। हम आगे बढ़ गए।
| डिवाइडर पर रोटी बनाते हुए दिहाड़ी मजदूर |
आगे एक जगह ईंटों का चूल्हा जलाये एक आदमी खाना बना रहा था। उसके चारो तरफ़ बैठे हुए कुछ लोग आपस में बतियाते हुए रोटी सिकते हुए देख रहे थे। रोटी सेंकर वह आदमी वहीं फुटपाथ पर रखता जा रहा था। एक के ऊपर रखी रोटियाँ खड़ी अपने खाये जाने का इंतज़ार कर रहीं। रोटियों को फुटपाथ पर रखा देखकर लगा मानो फुटपाथ रोटियाँ रखने का कैशरोल हो।
ये लोग लखीमपुर के थे। हमने बताया कि वहाँ तो हमारी ससुराल है। फिर लखीमपुर के गली मोहल्लों के चर्चे करते हुए उन्होंने हमारा इम्तहान लिया कि सही में हमारी ससुराल है वहाँ। बाद में मान लिया।
हमने पूछा कि जो लोग रोटी नहीं बेल पाते वे खाना कैसे बनाते होंगे?
इस पर रोटी बेलते आदमी ने बताया कि वो अपना सामान, आटा वगैरह ले आते हैं। हम उनकी रोटी सेंक देते हैं। दस-बीस रुपया रोटी सिंकाई दे देते हैं। किसी-किसी से नहीं भी लेते हैं। भाई बंदी में सब ऐसे ही चलता है।
हमने रोटी बनाने का वीडियो बनाने की कोशिश की लेकिन अँधेरे होने के चलते बना नहीं। हमने उनके फ़ोटो लिए और आगे बढ़ गए।
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