जंतर-मंतर पर जेन Z का आंदोलन हुआ। दिल्ली पुलिस द्वारा आंदोलन में आपराधिक तत्वों के शामिल होने की बात कहीं गई। शुरुआत में बताया गया -' चेहरों के पहचान करने की तकनीक के द्वारा 2500 लोगों के चेहरों की पहचान की गई। अपराधी तत्वों की पहचान की जा रही है।'
फ़ुरसतिया
हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै
लेबल
Friday, September 04, 2026
जेन जी आंदोलन और संसद
जंतर-मंतर पर जेन Z का आंदोलन हुआ। दिल्ली पुलिस द्वारा आंदोलन में आपराधिक तत्वों के शामिल होने की बात कहीं गई। शुरुआत में बताया गया -' चेहरों के पहचान करने की तकनीक के द्वारा 2500 लोगों के चेहरों की पहचान की गई। अपराधी तत्वों की पहचान की जा रही है।'
Tuesday, July 21, 2026
तैराकी का रोजनामचा
आज मंगलवार है। हमारा पूल बंद रहता है। दूसरे पूल गए तैरने। पानी बरस रहा था। हल्का-हल्का। हौले-हौले। अपन साइकिल पर निकल लिए। तैराकी वाला चश्मा, कैप एक और साइकिल की चाबी एक मोमिया में धर ली। स्वीमिंग के बाद बदलने के लिए कपड़े नहीं रखे। बेकार भीगते लौटते समय। बैग भी इसीलिए छोड़ दिया। सोचा बारिश में भीगते हुए लौटेंगे। पैडल पर पैर धरने के पहले घड़ी में साइकिल मोड ऑन कर लिया था।
रास्ते में लोग रोज़ के अंदाज़ में आते -जाते दिखे। एक बालिका सामने से मोपेड पर मुस्कराती चली आ रही थी। हमने सोचा पता नहीं क्या सोच कर मुस्करा रही होगी। बाद में देखा कि वह कान में स्पीकर लगाए मोबाइल पर किसी से बतिया रही थी। उसकी बातचीत उसकी मुस्कान की जननी थी।
पूल पहुँचकर साइकिल में ताला में लगाया। घड़ी को साइकिलिंग मोड से हटकर स्वीमिंग मोड में किया। घड़ी में साइकिलिंग का हिसाब देखा। 2.09 किलोमीटर की दूरी 13.27 मिनट में तय की। 36 किलोकैलोरी ऊर्जा खर्च हुई। औसत हृदयगति 87 धड़कन प्रति मिनट।
पूल किनारे पूल मैनेजर कुर्सी पर बैठा था।पूल की एक दिन की फीस दो सौ रुपए है। हमने पाँच सौ रुपए जमा किए। डिटेल बताया दो हफ्ते पहले वाला ही है। उसने दुबारा फ़ार्म नहीं भरवाया। हम आठ बजने में दस मिनट पहले पूल में उतर गए। कुछ लोग तैर रहे थे पूल में। हम भी शुरू हो गए।
तैरते हुए हाथ और पैर के मूवमेंट देखें गए वीडियो के हिसाब से चलाने लगे। हाथ तो ठीक चले। आइसक्रीम निकालने की तरह हाथ घुमाने की कोशिश करते रहे। ध्यान हाथ में रखने में पैर आवारा हो गए। दूर-दूर। सर उठाकर साँस लेने की कोशिश की। कई बार सफल हुए। कभी असफल। देखें गए वीडियो से अपनी तैराकी की कॉपी भी जांचते रहे। हाथ घुमाकर नीचे करते हुए सर उठाना चाहिए। लेकिन अक्सर ऐसा होता रहा कि सर पहले उठ गया। जब तक हाथ पीछे होता, ऊपर की तरफ़ धक्का लगता तबतक सर पानी में डूब चुका होता। हर बार लगता तैराकी समय का खेल है। इतने दिन कि सीख का हासिल यह हुआ जब भी कोई मूवमेंट ग़लत होता, पता चल जाता। उसको निरस्त करके फिर तैरने लगते।
पूल में एक बालक था कोचिंग के लिए। शिवम नाम। उसने मेरे मूवमेंट देखकर कहा -' ठीक कर रहे हैं। लेकिन सर थोड़ा और ऊपर उठाइये। साँस लीजिए।' हमने कहा -'वही कोशिश कर रहे हैं।'
तैरते हुए हाथ से पानी पीछे करने के बाद हाथ आगे ले जाने होते हैं। हाथ इस तरह आगे ले जाने होते हैं मानो हथेली में रखी हुई कोई किताब पढ़ रहे होंगे। हमने हाथ आगे करते हुए हथेली में रखी हुई कई किताबें पढ़ीं। अभी पढ़ी/देखी जा रही तमाम किताबों के कवर पेज हथेली में रखे महसूस किए। मारखेज की लव एट द टाइम ऑफ़ कालरा, डायना नायड की Find a way, कृष्ण बलदेव वैद की बदचलन बीबियों का द्वीप, ब्रजेश क़ानूनगो की घर बैठे घुमक्कड़ी, जोसफ हेलर कि कैच 22, श्रीलाल शुक्ल की रागदरबारी, जेरी पिंटो की एम और हूम साहब, प्रभात गोस्वामी की लिखने छपने के टोटके, अतुल चतुर्वेदी की व्यंग्य आलोचना के विविध आयाम कविताओं का संग्रह घर लौटने का सपना। ये सब किताबें अभी बिस्तर के पास हैं। अक्सर उलटते-पलटते हैं। पढ़ते हैं। इसलिए इनके नाम लिख दिए। बाक़ी की ऊपर पढ़ने के कमरे हैं जहाँ जाना रोज़ स्थगित हो जाता है।
तैरते हुए कभी-कभी मूवमेंट एकदम वीडियो के हिसाब से हो जाता। सर पानी में अच्छे से ऊपर उठता।पानी शरीर को झुला सा झुलाते हुए ऊपर उठाता। पाँव के मूवमेंट भी मेढक की तरफ़ हो जाते। हाथ पूरे आगे फैलते। ग्लाइड अच्छा होता। शरीर का संतुलन बढ़िया हो जाता। लगता बस अब सीख गए। पानी के ऊपर सीधे लेटे हुए वे क्षण अनिर्वचनीय लगते। एहसास हुआ कि तमाम लोग क्यों घंटों पानी में तैरते रहते हैं।
कभी पानी में सांस छोड़ने पर नीचे से आने वाली बूँदें चेहरे से टकराती तो लगता पानी ने हमको हमारी साँस का रिटर्न गिफ्ट दिया है। बूँदे पानी के फूल हैं। हमको तैरते देखकर पानी हमारे ऊपर अपने फूलों की वर्षा कर रहा है। पानी की बूँदें ही उसके फूल हैं। जिसके पास जो होगा वही तो देगा। वही उसका उपहार होगा। अमेरिका के बारे में लिखते परसाई जी ने लिखा है -' अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं।बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है।'
इसी तर्ज पर अब देश में कहीं बुलडोजर चलता है तो भक्त लोग कहते हैं -'कानून का शासन स्थापित हो रहा है।' बुलडोजर का काम सड़क बनाना माना जाता था। निर्माण में सहयोग का था। अब इसका मुख्य काम अब निर्माण नहीं विध्वंस हो गया है। पार्टी बदल ली है उसने भी। उसका हृदयपरिवर्तन हो गया। क्या पता इसके लिए उसे भी किसी पद का लालच दिया गया होगा। कहीं प्रदर्शन करने वालों पर आँसू गैस और लाठी चार्ज लोकतंत्र की स्थापना बताई जाती है। कहीं हुआ बड़ा भ्रष्टाचार विकास का बढ़ता कदम हो गया। बहुत तेज गति है विकास की आजकल। झूठ बोलना कभी पाप माना जाता था। अब हर झूठ मास्टरस्ट्रोक की संज्ञा पा चुका है। इसे कोई अंध भक्तअमृतकाल बतायेगा। कोई भगवान भक्त माला फेरता हुआ कहता होगा -' हे प्रभो, कब लोगो अवतार।'
घंटे भर से ऊपर तैरने के बाद पूल से बाहर आए। घड़ी का तैराकी मोड बदलकर फिर साइकिलिंग वाला किया। इसे बीच पूल रिपोर्ट बता रही थी कि अपन सवा घंटा पानी में रहे। इस बीच 358 किलोकैलोरी ऊर्जा फूँक दी। 420 मीटर तैरे। दिल एक मिनट में 84 धड़कन के हिसाब धड़का। कोच ने कहा -' प्रैक्टिस करते रहे। जल्दी ही सीख जायेंगे।'
पाँच सौ रुपए के छुट्टे नहीं थे पूल वाले के पास। उसने मुझसे नम्बर पूछकर मेरे मोबाइल में भेज दिए। हम पैडलियाते हुए घर वापस आ गए। लौटते में दूरी वही रही लेकिन दिल की धड़कन 90 रही। ऊर्जा की खपत हुई 35 किलो कैलोरी।
स्वीमिंग पूल में तैरते हुए किताब पढ़ने के अभ्यास के बाद अब वास्तव में किताब पढ़ने जा रहे। शुरुआत 'लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा' से करेंगे। दोपहर बाद फ़िल्म देखेंगे- "आइस वाइड ओपन"। आधी देख चुके हैं कल। आप कौन सी किताब पढ़ रहे हैं? कौन सी फ़िल्म देख रहे हैं?
Sunday, July 19, 2026
इतवार की तैराकी
भीगा-भीगा है शमा, ऐसे में है तू कहाँ
मेरा दिल ये पुकारे आ जा।
पूल से निकलकर शॉवर लेने के बाद तौलिए से बदन पोछते हुए बालक गाना गा रहा था। दोस्तों से बात करते हुए बता रहा था -' पंद्रह दिन हो गए। अभी स्वीमिंग आई नहीं। हमने कहा -' आ जायेगी। स्वीमिंग भी आयेगी। जिसको पुकार रहे हो वह भी आयेगी।'
बालक हँसने लगा। हमने उसको यह नहीं बताया कि हमको डेढ़ महीना हो गए यहाँ सीखते। अभी तक तैरना नहीं आया। उसका तो कहीं सवाल ही नहीं।
स्वीमिंग पूल में आजकल समय शुरू होते ही खतम हो गया लगता है। घंटा कब पूरा हो गया पता ही नहीं चलता। कल थोड़ा जल्दी गए। जल्दी मतलब पाँच मिनट पहले। पूल में उतरने लगे तो पानी में मौजूद कोच ने रोक दिया। कहा -' पहले वालों को निकल जाने दीजिये।'
समय पर उतरे तो पता चला कि स्वीमिंग कैप और चश्मा बाहर बैग में ही भूल गए। वापस लेने गए। पाँच मिनट लेट हो गए।
बाद में स्वीमिंग पूल से समय पूरा होने पर बाहर निकले। एक दूसरे कोच ने कहा -'अंकल आज आप जल्दी बाहर निकल आए।' हमने कहा -' एक कोच ने समय से पहले घुसने नहीं दिया। दूसरा देर तक पूल में रहने के लिए टोके इससे पहले निकलना ही बेहतर।' उसने कहा -'अंकल, आपको एक दिन देर तक स्वीमिंग करायेंगे।'
हमने कहा -' हम अपने समय में ही करते रहें यही बहुत है।'
स्कूल खुल जाने के चलते बच्चे कम आने लगे हैं।स्वीमिंग पूल में लोगों की संख्या कम हो गई है। कुछ कोच भी कम कर दिए गए हैं। एक कोच ने दुखी मन से, पूल प्रबंधकों से थोड़ा नाराजगी व्यक्त करते हुए यह जानकारी दी। हमें लगा कि अपने कर्मचारियों को 'फ़ायर' करने के मामले में हम लोग अमेरिका की बड़ी कंपनियों से कम नहीं हैं। अगले महीने की शुरुआत से रात 9 से 10 का बैच खत्म कर दिया गया।
'फ़ायर' और स्वीमिंग कूल कोच से दो दिन पहले नेटफ्लिक्स पर देखी मूवी 'डिजायर' याद आ गई। इसमें उम्रदराज महिला के एक युवा स्वीमिंग कोच से संबंध हो जाते हैं। यौन संबंध बनते हैं। बाद में महिला इस संबंध को ग़लत मानते हुए इसको खतम करना चाहती है। लेकिन युवा कोच ऐसा नहीं चाहता। फिर कोच उस महिला की बच्ची को , जो कोच से आकृष्ट रहती है, डेटिंग पर ले जाता है। इसके बाद परिवार के सब लोग मिलकर कोच को निपटा देते हैं। फ़िल्म देखने के बाद लगा कि इस मामले में पहले महिला ने की थी। लेकिन निपटाया गया कोच। फ़िल्म वाले उसको मारे बिना भी अलग कर सकते थे। लेकिन उनकी समझ। उनके हिसाब से इसी तरह ठीक था।
कल और आज भी अपन ब्रेस्टस्ट्रोक को मास्टर करने में जुटे हैं। हाथ और पांव चलाना जानते हैं। लेकिन हर बार चल नहीं पाते। यह समझ में आया कि हम सर ग़लत समय पर उठाते हैं। जब हाथ से पानी पीछे खींचते हैं तब सर उठाना चाहिए। लेकिन हम सर तब उठाते रहे जब हाथ आगे जा रहे होते हैं। पाँव भी सही समय पर चलने से भटक। नतीजा यह होता है अक्सर सर ऊपर नहीं उठता। कभी-कभी उठ भी जाता है। जब उठता है तब लगता है ,हाँ यही है असल तरीका। लेकिन अगली बार फिर कुछ गड़बड़ हो जाती है। लेकिन यह पक्का लगता है एकाध दिन बाद सारे एक्शन में तालमेल बैठ जाएगा।
आज लौटते समय पानी बरस रहा था। पूल से निकलकर शॉवर लिया। गीले कपड़ों में ही भीगते हुए साइकिल चलाते हुए वापस आ गए।
Thursday, July 16, 2026
बारिश में भीगना
आज स्विमिंग के लिए निकलते समय पानी बरसने लगा। पहले धीमा फिर तेज। लगा पूल बंद होगा। लेकिन बिजली नहीं चमक रही थी। इसलिए सोचा शायद चालू हो पूल। लेकिन कोई सूचना नहीं थी ग्रुप में। सोचा पूल बंद भी होगा तो बारिश में भीगने की तमन्ना पूरी होगी। हम निकल लिए। सात बजकर चालीस मिनट थे जब निकले।
Monday, July 13, 2026
तैराकी के किस्से
आज सबेरे तैरने के लिए समय पर निकले। हमारे आगे दो महिलायें साइकिल पर जा रहीं थीं। शायद काम पर। हमने सोचा आगे बढ़कर उनके काम के बारे में बतियायें। लेकिन उनको आपस में बतियाता देखकर नहीं बढ़े। एक बच्ची सड़क पारकर रही थी। उसको देखकर केदारनाथ सिंह कविता याद आ गई :
"मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है
क्योंकि इस तरह एक उम्मीद -सी होती है
कि दुनिया जो इस तरफ है
शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ़।"
बच्ची दिन में कई बार सड़क पार करती होगी। उसके लिए दुनिया एक जैसी रहती है।
आगे एक बच्चे मोटरसाइकिल पर बैठा था। बाइक की चाबी मुँह में दबाये वह इधर-उधर ताक रहा था। उसके माँ-बाप जमीन पर बैठे बतिया रहे रहे। मुझे लगा ऐसे ही किसी मामले में चाबी मुँह में चली जाती है। फिर उसको निकलने की जद्दोजहद होती है। कभी -कभी फँस भी जाती है चीजें गले में । फिर ऑपरेशन होते हैं।
डिवाइडर पर बैठे मजदूर लोग सुबह के होने का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ लोग मोबाइल देख रहे थे। कुछ बतिया रहे थे। कुछ बीड़ी पी रहे थे। कुछ लोग आते-जाते लोगों को ताक रहे थे। सामने एक छुटकी गुमटी में महिला ठसक के साथ मजदूरों को सामान बेच रही थी। उसके पान खाये मुँह से आत्मविश्वास की छटा दर्शनीय थी।
पूल पर ठीक आठ बजे पहुँचे। उतर गए पानी में। अच्छा अभ्यास हुआ। हाथ-पाँव सब ठीक चले। मुंडी भी ऊपर उठी। पानी के बाहर सर ऊपर करके साँस भी ली। लेकिन शायद ठीक से काम बना नहीं। इसलिए पाँच-सात मीटर बाद फिर से शुरू करते रहे।
पानी के बाहर सर करने के बावजूद साँस नहीं ले पाने का कारण शायद यह रहा कि हमको एक ही साँस में काम चलाने का अभ्यास है अभी तक। साँस का कैप्सूल जब तक चला तब तक तैरे। जहाँ साँस का कोटा ख़त्म, खड़े हो गए। साँस की बचत करके तैरने के अभ्यास के चलते नई सांस लेने में परहेज करते रहे।
राहत इंदौरी का शेर याद आता रहा :
"उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो"
मतलब साँस पूरी छोड़ने के पहले नई साँस ले लेनी चाहिए। लेकिन सर पानी के ऊपर उठाने के बावजूद हवा से सांस लेने का अभ्यास पक्का नहीं हुआ है अभी। एकाध बार ले भी की साँस। हाथ और पाँव आज पूरे अनुशासन से ड्यूटी पर लगे रहे। पुल ठीक हुआ, किक बढ़िया हुई। बस अब बीच का मामला ठीक करना है। बीच का मामला ठीक हो जाये तब क़ायदे से तैरना हो।
घंटे भर में 210 किलोकैलोरी खर्च करके पूल से वापस लौटे। कल पूल की छुट्टी है। लेकिन हमको अभ्यास करना है। किसी दूसरे पूल में जायेंगे। तैराकी सीखने में मजा आ रहा है। यह तैराकी से प्रेम है या हमारा पागलपन कहना मुश्किल। लेकिन प्रेम और पागलपन से जुड़ा एक संवाद जेरी पिंटो लिखित किताब 'एम और हूम साहब' में इस तरह है :
"प्रेम कभी भी पर्याप्त नहीं होता। पागलपन ज़रूर पर्याप्त होता है, यह अपने आप में पूरा होता है।"
कैसा लगा यह संवाद? किताब अभी पढ़ रहे हैं। पूरी पढ़ लेंगे तब लिखेंगे इसके बारे में।
Sunday, July 12, 2026
तैराकी के बहाने
हमने मई महीना खत्म होने के दो दिन पहले से स्वीमिंग सीखना शुरू किया। पहले हफ़्ते के बाद हाथ और पांव पानी में चलाने लगे। शुरुआत मिक्स्ड स्ट्रोक से की। हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्री स्टाइल में। हाथ और पांव की समस्या के कारण यह 'गठबंधन स्ट्रोक' चुना। फ्री स्टाइल में कंधे उखड़ जाने का डर था। ब्रेस्ट स्ट्रोक में जांघ के जोड़ में दर्द था। तैराकी शुरू हो गई। लेकिन सर पानी के ऊपर नहीं आता था।
समय के साथ जांघ का दर्द खतम हो गया। शायद स्वीमिंग से फ़ायदा हुआ। वाटर थेरेपी जैसा कुछ। हम पाँव भी ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलाना शुरू कर दिए। लेकिन फ्री स्टाइल में पांव चलाना भूलने और ब्रेस्ट स्ट्रोक में सीखने में हफ्ता से ज़्यादा लग गया। अब हाथ और पांव ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलने लगे हैं। कभी ग़लत चलता है तो फ़ौरन अंदाज़ा हो जाता है। लगता है 'मिसस्ट्रोक' हो गया।
सीखने के दो हफ़्ते बाद एक कोच ने PC का सुझाव दिया। PC मतलब पर्सनल कोचिंग। सुझाया -'आप फलाने सर से PC ले लीजिए। जल्दी सीख जायेंगे।' हमने सुझाव सुन लिया लेकिन अमल में नहीं लाए। हमको कोई हड़बड़ी नहीं थी। जल्दी सीखकर क्या करेंगे? सोचा आराम से सीखेंगे। जल्दी सीखने में लफड़ा यह भी गलतियाँ कम होंगी। ग़लतियाँ नहीं होंगी तो मजा नहीं आयेगा। उन ग़लतियों से सीखने का मौक़ा गँवाना कोई समझदारी थोड़ी है।
PC से हमको अपनी कक्षा 11 के एक किस्से की याद आ गई। हम हिन्दी मीडियम से कक्षा 10 पास कर के अंग्रेजी मीडियम में कक्षा 11 में आए थे। बीएनएसडी के F1 सेक्शन में। उस समय हाई स्कूल के यूपीबोर्ड के 75% से ऊपर नंबर लाए बच्चे F1 में पढ़ते थे। शुरुआती दिनों में लेक्चर अंग्रेजी समेत बाउंसर जैसे निकलते रहे। जो बोर्ड में लिखते गुरुजी वही समझ में आता। बाक़ी हवा हवाई हो जाता। तिमाही इम्तहान हुआ। फिजिक्स में चालीस में नौ नम्बर थे। मतलब फेल। हाईस्कूल में अपने स्कूल का टॉपर रहा बच्चा तीन महींने बाद फेल हो गया। सिर्फ़ माध्यम बदलने से।
कॉपी दिखाई गई। पता चला एक चार नम्बर का सवाल जांचने से रह गया था। हमने सवाल सही भी किया था। चार नम्बर जोड़कर 13/40 नंबर हो गए। फेल होने से बच गए। बाद में पता चला गुरु जी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं। कई लड़कों ने उनसे पढ़ना शुरू कर दिया। हमसे भी कहा गया। लेकिन हमारे पास न गुजाईश थी न मन। हमने ट्यूशन ज्वाइन नहीं की। बस मेहनत करते रहे। उस समय की चलन में जितनी भी किताबें थीं सबके सवाल लगाकर अभ्यास करते रहे। उसका फ़ायदा हुआ कि बिना ट्यूशन पढ़े पास होते रहे। बाद में तो बाजपेयी सर के संपर्क में आने पर उत्साह भी बढ़ गया। मेहनत और उत्साह के संगम का फल यह हुआ कि इंटर में यूपीबोर्ड की मेरिट लिस्ट में भी नाम आया।
हमने तो PC नहीं ली। लेकिन कोच लोग कुछ लोगों को जिस तरह तल्लीनता से सिखाते हैं उससे लगता है कि उन लोगों ने PC ली है। कोच लोग उन कुछ लोगों को हाथ पकड़कर, सर और पैर के मूवमेंट सिखाते हैं उससे लगता है कि वे उन लोगों के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम कुछ पूछते हैं तो हाँ, ना में बताकर उनको सिखाने में लग जाते हैं। हमारे हिस्से पूल और पानी ही आता है। लेकिन हमको कोई शिकायत नहीं। हमने ख़ुद को अपना कोच नियुक्त कर रखा है। पर्सनल कोच। बिना फीस का कोच। हर स्टेप पर अपनी कॉपी जांचते हैं और कमियाँ पकड़कर सही करते हैं। कभी-कभी वहाँ मौजूद कोच से अपने मूवमेंट के बारे में पूछते हैं तो वो दूसरी तरफ़ या अनमने अंदाज़ में देखकर बताते हैं -' ठीक है। साँस लीजिए। सर थोड़ा और ऊपर उठाइये। सीख जायेंगे।'
हम सोचते हैं -' सीख तो जायेंगे ही। कोई नाम नहीं मुश्किल, जब किया इरादा पक्का।'
आज थोड़ा देर से पहुँचे पूल। दस मिनट देर। लेकिन आज सर पानी से बराबर ऊपर उठने लगा। साँस पानी के अंदर नाक से छोड़ते हुए सर उठाने लगे। थोड़ी साँस लेने भी लगे। लेकिन पूरी तरह साँस लेना अभी आया नहीं। असल में जिस समय सर ऊपर होता है उस समय पैर तमाशबीन की तरह ठहर जाते रहे। पैरों को लगता होगा कि पानी से सर बाहर आना कितनी ऐतिहासिक घटना है। इसको देखना जरूरी है। लिहाजा वे ठहरकर शायद नजारा देखने लगते। इसके चलते शरीर पानी में डूबने लगता। हम खड़े हो जाते।तैरना स्थगित हो जाता।
दूसरी समस्या यह महसूस की हमने हम जिस समय सर पानी के ऊपर उठाते हैं ठीक उसी समय पाँव पीछे की तरफ़ करते हैं। दोनों काम एक साथ होने से फ्लोटिंग को समय कम मिलता है। शरीर टेढ़ा होकर पानी में न्यूनकोण (45 डिग्री) बनाकर खड़ा हो जाता है।जबकि होना यह चाहिए कि सर ऊपर उठाकर साँस लेने के बाद पांव पीछे करने चाहिए ताकि पानी में संतुलन बना रहे। फ्लोटिंग होती रहे। इस पर मेहनत करना है। एकाध, दो-चार, पाँच-सात दिन में हो जाएगा।
हमारा तैराकी रोचनामचा पढ़कर हमारे कुछ मित्र भी पानी में उतर चुके हैं। तैरना सीखने लगे हैं। हमारे कानपुर के मित्र राजीव टंडन जी ने तो तैरने के साथ -साथ हर गतिविधि का विश्लेषण भी करना शुरू कर दिया है। तैरते हुए टिल्ट क्यों होता है, ये क्यों, वो कैसे। कल सुनीता सनाढ्य पांडेय जी ने भी बताया कि वे अपने जीवन-जोड़ीदार के साथ तैरना सीख रही हैं। इसके अलावा और कई मित्रों ने तैरना सीखने के बारे में सोचना शुरू कर दिया। शायद जल्दी ही वे भी स्वीमिंग पूल पहुंचे।
हमारी यह 'तैराकी कुंडली' हमारे मित्र Parveen Goyal ने बनाकर हमारी पिछली पोस्ट की टिप्पणी में लगाई थी। हम इसे अपने पोस्ट में लगा रहे हैं। इसमें तैराकी के टिप्स भी हैं और सीखने का सूत्र वाक्य भी - ' उम्र सिर्फ़ एक संख्या है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती।'
आप भी सोच रहे हैं तैरना सीखने के बारे में? सीखिये। मजेदार है।
Saturday, July 11, 2026
तैराकी सीखने का छठा हफ़्ता
स्वीमिंग पूल में घंटा पूरा होने के पाँच मिनट पहले सीटी बजने लगती है। चेंज करिए। बाहर निकलिए। आ जाइए। अंकल टाइम अप हो गया का हल्ला शुरू हो जाता है। अपन भो घड़ी देखकर निकलने का उपक्रम करते हुए एकाध बार और तैरने का मन बनाते हैं। देखते हैं घड़ी। कभी लगता है 57 मिनट हुए। तीन मिनट बाद निकलेंगे पूल से। कभी तैराकी में खर्च कैलोरी 200 से दो-चार-दस कम दिखती है । लगता है डबल सेंचुरी कर ही लें। कभी मन की कर लेते हैं। कभी पहले ही बाहर आना होता है।
तैराकी का हमारा बैच सबेरे आठ से नौ का है। इसके बाद सबेरे की शिफ्ट खतम हो जाती है। सारे कोच घर जाने के मूड में होते हैं। कपड़े पहनकर, झोला उठाकर चलने को तैयार। जाने के पहले सुनिश्चित करना होता है कि कोई पूल में रह न जाये। इसीलिए सबको बाहर निकालने के लिए बार-बार कहते हैं।
कल हम पूल से निकल रहे थे। कोच ने कहा -'अंकल घड़ी देखकर निकलते हैं। पूरा समय यूटिलाइज करते हैं।'
हमने कहा -' हाँ भाई, क्लास पूरी होनी चाहिए। बंक नहीं करना चाहिए।'
उसने कहा -' स्वीमिंग बैच एक घंटे का होता है। लेकिन टाइम पचपन मिनट का होता है। पाँच मिनट चेंज का होता है।'
हमारा तो घंटा हो चुका था। हम पूल से निकलकर शॉवर लेकर निकल आए। तय किया पाँच-दस मिनट पहले आया करेंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। पूल पहुंचते-पहुंचते आठ बज ही जाते हैं।
मंगलवार को पूल बंद रहता है। उस दिन पास के दूसरे पूल गए। वह पूल छोटा है। लगभग आधा। महीने की फ़ीस ढाई हज़ार (हमारे पूल की तीन हज़ार है)। एक दिन की फीस डबल। दो सौ रुपए देकर घंटा भर तैरे।
कोच ने हमारी बातचीत सुनकर कहा -'आप कानपुर के हैं? '
हमने पूछा -' कैसे पहचाना?'
उसने कहा -'आपके बातचीत करने के अंदाज़ से।'
हमने सोचा ये तो मजेदार है। हमारी बातचीत से कोई पहचान ले कि हम कानपुरिया हैं- 'झाड़े रहो कलट्टरगंज।'
बाद में पता चला बालक बलिया का है। बलिया से जुड़ा जुमला है -'बलिया जिला घर बा तो कौन बात का डर बा?'
हमने बालक से कहा -'आप सिखाओ तो आकर।'
बालक ने कहा -'चलिए हम आते हैं।'
पूल में उतरते ही बालक कूदकर पानी में आ गया। हाथ, पाँव चलाने के तरीक़े बताते रहा। पैर पकड़कर मेढक की तरह चलाये भी। इसके बाद हम तैरते रहे।
साथ में तैरने वाले बुजुर्ग ने बताया -'साढ़े पाँच महीने हो गए। अभी पूरा सीखे नहीं है।'
हमने सोचा -'अभी हमारा तो महीना ही हुआ सीखते। ये तो हमसे पहले से सीख रहे हैं।' अपना अभी तक तैरना सीख न पाने का अपराध बोध पानी में घुल गया।
साथ की महिला ब्रेस्ट स्ट्रोक, फ्री स्टाइल, बैक स्ट्रोक मतलब हर तरह से तैराकी कर रही थीं। उन्होंने हमें ब्रेस्ट स्ट्रोक के गुर बताये। तैरकर बताया। हमने सोचा -' ये साथ में सिखातीं तो हफ़्ते भर में ही सीख जाते।' लेकिन सोचने से क्या होता है?
इस बीच रोज ढेर सारे वीडियो देखे यूट्यूब पर। ब्रेस्टस्ट्रोक के। नोट्स लिए। कौन सी ग़लतियाँ न करें। सब नोट किया। याद भी किया कि ब्रेस्ट स्ट्रोक में एक्शन का क्रम Pull (हाथ) , breathe (साँस) , kick (पैर) , glide (शरीर) की गतिविधि होती है। कुछ और सूत्र ये हैं :




