आज सुबह तैराकी के लिए सही समय पर पहुँच गए। ठीक आठ बजे। पढ़कर जो आए थे उसपर अमल शुरू किया। सबसे पहला सबक यह कि तैरते समय सर पर नीचे रखना है। जैसे हाई कमान के सामने मंत्री, संतरी, सांसद, विधायक रखते हैं। केवल साँस लेते समय सर उठाना है। बाक़ी समय सर नीचे ही रखना है। स्वीमिंग पूल के फर्श की तरह निगाह। कॉलेज के जमाने में रैगिंग के दिनों में जूनियर्स को अपने शर्ट की तीसरी बटन देखने को कहा जाता था। तीसरी बटन देखने का रिवाज तो लड़कों में था। लड़कियों में क्या रिवाज था यह पता नहीं। यह जरूर याद है कि उन दिनों में लड़कियों/लड़कों का अनुपात 1:50 से भी नीचे ही था।
सर लगातार नीचा करके तैरने में लगा यह सही पोज है। पहले अक्सर सर बार-बार ऊपर करते थे। लड़खड़ा जाते थे। समर्पण मुद्रा में तैरने में तैरना सहज लगा। पहले बार-बार सर उठाकर ऊपर देखने में संतुलन गड़बड़ा जाता था। सर नीचे करके तैरने के साथ पांव लगातार चलाते रहना था। आज इसका अभ्यास किया। हमने तय किया कि रोज-रोज़ नई तरह से सीखने की बजाय मूल बात पर फ़ोकस करना जरूरी है। रोज़-रोज़ पोज बदलने में कोई फ़ायदा नहीं। पहले का अभ्यास छूट जाता है। तैराकी कोई राजनीति तो है नहीं जो दलबदल की तरह पोजबदल करके कुछ हासिल हो।
साथ सीखते बच्चे ने मुझे फिर से सिखाया। उसका एक दाँत टूटा हुआ है। उसने बताया स्कूल में खेलते समय टूट गया। दूध का दाँत है। इसकी जगह नया दांत आयेगा। क्या उसे चाय का दाँत कहाँ जाए। पूल किनारे बैठे पक्षी को देखते हुये उसने कहा -'वह ईगल हम लोगों की तरफ़ देख रहा है। कहीं काटेगा तो नहीं?'
बगल में तैरती बच्ची ने सुनकर कहा -'वह ईगल नहीं कौआ है। काटेगा नहीं।'
मेरे साथ तैरता बच्चा उसकी बात अनसुनी करते हुए पूल से निकलकर बाहर चला गया। इसके बाद पूल में डाइव करके फिर साथ में तैरने लगा।
पूल में सिखाने वाली बच्ची एक बुजुर्ग महिला का हाथ पकड़कर उसको तैरना सिखा रही थी। हाथ पकड़कर पानी में उनको घसीटते हुए पैर चलाने को कह रही थी। महिला कुछ देर अभ्यास करने के बाद रुककर आराम करने लगी। हमने कोच बालिका से शिकायत की -'तुमने हमको तैरना नहीं सिखाया। अभी तक हम ठीक से तैर नहीं पाते।'
बच्ची ने हमको शुरुआती दिनों में कई बार गाइड किया है। मेरी बात के जबाब में उसने कहा -'आप तो सीख गए हैं अंकल। प्रैक्टिस करते रहिए। परफेक्ट हो जायेंगे।'
साथ तैरते बच्चे के पिता बाहर से उसकी गतिविधि देख रहे थे। फोटो भी ले रहे थे। हमने उनसे अपना तैरने का वीडियो बनाने को कहा। उन्होंने कहा -'ठीक।'
वीडियो बनवाने के लिए हम पूल के अंदर थोड़ी दूर से (करीब छह -सात मीटर) तैरते हुए किनारे तक आए। वीडियो बना। मेरे मोबाइल पर भेज भी दिया उन्होंने।
वीडियो देखते हुए अपनी कई कमियाँ पता लगी। एक तो पाँव सीधे की जगह थोड़े मुड़े हुए थे। दूसरे पाँवों के आपस में तालमेल का अभाव था। दोनों पांव किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री और आलाकमान द्वारा थोपे उप मुख्यमंत्री की तरह अलग-अलग बयान बाजी जैसी करते दिखे। हाथ के मूवमेंट देखकर भी लगा कि इनको बहुत फैलाने की जरूरत नहीं। औक़ात में रहने से ज़्यादा कुशलता से तैर सकेंगे। यह भी लगा कि अगर रोज़ वीडियो बनायें तो बेहतर समझ सकेंगे अपने मूवमेंट।
तैरते हुए, अभ्यास करते हुए आज एक दो बार सर ऊपर करके साँस भी ले ली। ऐसा लगा मानो पूल के पानी को झांसा देकर हवा गटक ली हो। जल्दी ही तैरते हुए नियमित साँस लेना सीख जाएँगे।
आज हमारा तैरना सीखने का सोहलवाँ दिन था।






