Tuesday, April 21, 2026

गौरी शंकर मंदिर से ग़ालिब की हवेली तक


इस इतवार (19 अप्रैल, 2026) को दिल्ली वॉक में शामिल हुए। वॉक होनी तो थी एक हफ़्ते पहले लेकिन दिल्ली वॉक के प्रमुख सूत्रधार मनुकौशल जी को कुत्ते ने काट लिया। उनके चलने-फिरने में बाधा के कारण वॉक एक हफ्ते बाद सम्पन्न हुई। इस घटना से हमारे जीवन व्यापार में कुत्तों की घुसपैठ का अंदाज़ लगाया जा सकता है।

इस बार की वॉक चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर से बल्लीमारान में ग़ालिब की हवेली तक थी। रास्ते में भारतीय इतिहास में दर्ज मुख्य इमारतों बेगम समरू की हवेली, शीशगंज गुरुद्वारा, सुनहरी मस्जिद, उस्ताद दाग़ के नाम पर बने बाजार, फतेहपुरी मस्जिद होते हुए ग़ालिब की हवेली को देखते हुए बीते तीन-चार सौ साल के इतिहास में चहल-क़दमी करनी थी। करीब दो घंटे की वॉक में तीन-चार सौ साल के इतिहास से रूबरू हो लिया।

वॉक साढ़े सात बजे शुरू होनी थी। अपन पौने आठ बजे लालकिला मेट्रो स्टेशन पर उतरे। गौरी शंकर मंदिर के सबसे पास यही मेट्रो है। स्टेशन से बाहर निकलकर क़रीब दस लोगों रास्ता पूछते हुए दो सौ मीटर की दूरी पर स्थित गौरी शंकर मंदिर पहुँचे। करीब आठ बजे। वॉक शुरू हो चुकी थी। शुरुआती आपसी परिचय के बाद आलोक पुराणिक अपना शुरुआती व्याख्यान शुरू कर चुके थे।सामने सड़क के पास गौरी शंकर मंदिर था। मंदिर की दूसरी तरफ़ फ़ुटपाथ पर खड़े होकर आलोक पुराणिक ने गौरीशंकर मंदिर और मंदिर बनने के समय दिल्ली की स्थिति की जानकारी दी।

गौरीशंकर मंदिर शैव धर्म का प्रमुख केंद्र है। बताया जाता है कि यहाँ स्थित भूरे रंग का शिवलिंग 800 साल पुराना है। भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित यह मंदिर मराठा सैनिक आपा गंगाधर द्वारा 1761 में पुनर्निर्मित किया गया था। उस समय दिल्ली के हाल बेहाल थे। दिल्ली एक ऐसे दौर से गुजर रही थी जहाँ मुगलों की सत्ता खत्म हो रही थी, मराठों का वर्चस्व टूट गया था और दिल्ली विदेशी लुटेरों के साये में थी। अहमद शाह अब्दाली ने 1756-57 में दिल्ली में भयंकर कत्लेआम और लूटपाट की थी, जिससे शहर उबर नहीं पाया था। 1761 के युद्ध की पृष्ठभूमि में भी अब्दाली का डर व्याप्त था।

अहमद शाह अब्दाली के ख़ौफ़ का अंदाज़ उस समय पंजाब में प्रचलित इस कहावत से लगाया जा सकता है :

खादा पीत्ता लाहे दा,
रहंदा अहमद शाहे दा
अर्थात् जो खा लिया पी लिया और तन को लग गया वो ही अपना है, बाकी तो अहमद शाह लूट कर ले जाएगा।
ऐसे समय में भगवान का ही सहारा होता है। हारे को हरिनाम। मराठा सैनिक द्वारा पुनर्निर्मित गौरीशंकर मंदिर देश के प्रमुख शिवमंदिरों में है।

गौरीशंकर शिवमंदिर के बाहर से ही दर्शन करके हम चाँदनी चौक की गलियों में घूमते हुए बेगम समरू की हवेली देखने पहुँचे।

बेगम समरू की हवेली के रास्ते में भारतीय स्टेट बैंक की इमारत दिखी। 200 साल से अधिक पुरानी (1806 में निर्मित) पुरानी यह इमारत मूल रूप से 'बैंक ऑफ दिल्ली' था और 1857 की क्रांति के दौरान क्षतिग्रस्त होने के बाद, अब यह भारतीय स्टेट बैंक की सबसे पुरानी और प्रमुख शाखाओं में से एक है। इतवार होने के चलते बैंक बंद था वरना अंदर के भी कुछ हाल-चल ले लेते।

बेगम समरू की हवेली की तरफ़ जाते हुए गलियों में लोग ऊँघते दिखे। गली में कूड़ा उठना शुरू हो गया था। शायद लोगों को अंदाज़ हो गया था कि दिल्ली वॉक वाली टीम चाँदनी चौक के दौरे पर निकल चुकी है।

बेगम समरू की हवेली एक ऐतिहासिक इमारत है। इसे अब भगीरथ पैलेस के नाम से जाना जाता है। यह एशिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक मार्केट के रूप में जानी जाती है।

इमारत के ऊपर LLOYDS BANK LIMITED और बायें कोने में सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया लिखा है। इधर-उधर फैले तारों के मकड़जाल से गिरी यह इमारत कभी दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण इमारतों में रही होगी। ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण आज भी लेकिन पूरी तरह उपेक्षित है।

बेगम समरू की दास्तान बड़ी रोचक है। बेगम समरू का मूल नाम फरज़ाना ज़ेब उन-निसा था। बचपन में माता-पिता के न रहने पर अनाथ हो जाने पर उनको बेगम गुलबदन ने अपने कोठे पर पनाह दी। वहाँ उन्होंने 18वीं सदी के भारत में एक नर्तकी के रूप में अपना करियर शुरू किया। नर्तकी के रूप में काम करते हुए फरज़ाना ज़ेब उन-निसा की मुलाक़ात फ़्रांसीसी मूल के भाड़े के सैनिक वाल्टर रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे से हुई। सोम्ब्रे की पत्नी होने के बाद उनका नाम जोआना नोबिलिस सोम्ब्रे हुआ। जो बाद में बिगड़कर सहज रूप में बेगम समरू के नाम से प्रचलित हुआ।

रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे के हरम में जूनियर पत्नी के रूप में दाखिल होने के समय बेगम समरू की उमर महज़ 14 वर्ष थी। सोम्ब्रे 45 साल के थे। आज के हिसाब से देखा जाये तो सोम्ब्रे बेगम समरू के साथ बाल विवाह के दोषी पाए जाते। सोम्ब्रे से विवाह के बाद कश्मीरी मूल की फरज़ाना ज़ेब उन-निसा सुन्नी से धर्मांतरित कैथोलिक ईसाई हो गईं।

रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे को 'सोम्ब्रे' (Sombre) या 'सोमरू' (Sumroo) के नाम से जाना जाता था, जो उनके द्वारा पहने जाने वाले उदास/गंभीर चेहरे के हाव-भाव के कारण पड़ा।

1763 में पटना में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के दौरान, इसने 82 यूरोपीय अधिकारियों और लगभग 4000 सैनिकों का बेरहमी से कत्ल किया था, जिसके कारण इसे 'बुचर ऑफ पटना' या 'पटना का कसाई' उपनाम मिला।

रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे की अपनी सेना थी जो भाड़े में भारतीय रियासतों की तरफ़ से लड़ती थी। दिल्ली के उस समय के बादशाह शाह आलम द्वितीय ने मेरठ के पास सरधना की जागीर उनको दे दी। बेगम समरू अपने पति के साथ जागीर का काम देखती थीं।रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे के निधन के बाद बेगम समरू सीधे जागीर का काम देखती थीं।

तात्कालिक समय में बेगम समरू के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे मुग़ल बादशाह की सलाहकार बनाई गईं थी क्योंकि उनको युद्ध लड़ना आता था।

बेगम समरू की सेना में 3000 सिपाही थे जिसमें 100 गोरे सैनिक थे जो बेगम समरू के एक इशारे पर जान देने को तैयार रहते थे। सरधना पर करीब छह दशक तक राज करने वाली बेगम समरू 47.6 बिलियन डॉलर ( 44.30 ख़रब रुपये) से ज्यादा की संपत्ति की मालकिन थीं। वे 1836 में अपनी मृत्यु के समय उत्तर भारत की सबसे धनी महिलाओं में से एक थीं, और उनकी विशाल विरासत का एक बड़ा हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के पास गया।

बेगम समरू की हवेली में प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी को भी याद किया गया। मनु कौशल जी ने अपने मिजाज के मुताबिक़ अकबर इलाहाबादी का शेर पढ़ा :

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

इसके बाद उन्होंने अकबर इलाहाबादी द्वारा लिखित दिल्ली दरबार के किस्से 'जल्वा-ए-दरबार-ए-देहली' सुनाई। 1903 में लॉर्ड कर्जन द्वारा आयोजित इस दिल्ली दरबार के अपने अनुभव बताते हुए लिखा :

"सर में शौक़ का सौदा देखा

देहली को हम ने भी जा देखा

जो कुछ देखा अच्छा देखा

क्या बतलाएँ क्या क्या देखा।"

दिल्ली दरबार में लेडी कर्जन के डांस को देखकर बाक़ी लोगों के हाल बयान करते हुए अकबर इलाहाबादी लिखते हैं :

है मशहूर-ए-कूचा-ओ-बर्ज़न

बॉल में नाचें लेडी-कर्ज़न

ताइर-ए-होश थे सब के लरज़न

रश्क से देख रही थी हर ज़न

(इस शेर में अकबर इलाहाबादी दिल्ली दरबार के दृश्य का वर्णन करते हुए तंज (व्यंग्य) कस रहे हैं कि जब 'लेडी कर्ज़न' बॉल (डांस पार्टी) में नाच रही थीं, तो वहां मौजूद सभी लोगों के होश उड़ गए थे (होश के पंछी कांप रहे थे) और अन्य महिलाएं रश्क (ईर्ष्या/जलन) से उन्हें देख रही थीं। यह औपनिवेशिक दौर की संस्कृति पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी है। )

अफ़ग़ान, फ्रेंच, ब्रिटिश लुटेरे आकर यहाँ लूटपाट करते रहे। इस बात को फ़राज़ के शेर के ज़रिए याद किया :

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें

दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें।

अकबर इलाहाबादी के सियासी अंदाज में लिखे शेर के बहाने नीतीश कुमार जी को याद करते आलोक पुराणिक ने यह शेर पढ़ा :

"ईमान की तुम मेरे क्या पूछती हो मुन्नी,
शिया के साथ शिया, सुन्नी के साथ सुन्नी।"

बेगम समरू की हवेली में लगी छत की ईंटे देखकर लगा कि वे वहाँ टंगे-टंगे थक गईं और बाहर निकलने को बेताब हैं।

बेगम समरू की हवेली के बाद हम शीश गंज गुरुद्वारे की तरफ़ बढ़े। गुरुद्वारे के पहले फुटपाथ पर बैठे कई सेवादार दिखे। उनमें से कुछ अपना मेडिकल बॉक्स लिए लोगों की मरहम पट्टी कर रहे थे।

शीशगंज गुरुद्वार साहिब दिल्ली के नौ ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। यह पहली बार 1783 में बघेल सिंह द्वारा नौवें सिख गुरु तेग बहादुर की शहादत स्थल की याद में बनाया गया था। सिक्खों के नवें गुरु गुरु तेगबहादुर जी को इस स्थान पर 11 नवंबर 1675 को मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के आदेश पर नौवें सिख गुरु का सिर काटा गया था। इससे पहले कि उनके शरीर को सार्वजनिक दृश्य के सामने लाया जा सके, उसे उनके एक शिष्य लखी शाह वंजारा द्वारा अंधेरे की आड़ में चुरा लिया गया, जिन्होंने गुरु के शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए अपने घर को जला दिया; आज इसी स्थान पर गुरुद्वारा रकाब गंज स्थित है। लखी शाह बंजारा रकाब (घोड़े की काठी) बनाने का काम करते थे इसलिए उनके घर की जगह पर बने गुरुद्वारे को गुरुद्वारा रकाबगंज नाम दिया गया।

गुरु तेग बहादुर का सीस काटे जाने के पहले उनके तीन प्रमुख सिख साथियों (भाई) को शहीद किया गया था, जिनके नाम हैं:
भाई मति दास (Bhai Mati Das): इन्हें आरी से चीरकर शहीद किया गया था।
भाई सती दास (Bhai Sati Das): इन्हें रुई में लपेटकर जिंदा जला दिया गया था।
भाई दयाला (Bhai Dayala): इन्हें उबलते पानी की कड़ाही में डालकर शहीद किया गया था।
इन सभी को 1675 में दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी के साथ उनके सामने शहीद किया गया था, क्योंकि उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

गुरुद्वारा सीस गंज साहिब में शहीदी स्थल और वह पेड़ है जहाँ गुरु तेग बहादुर का सिर काटा गया था।

भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट 1979 से भारत के राष्ट्रपति को सलामी देने के बाद सीस गंज गुरुद्वारे को सलामी देती है। इस प्रकार सिख रेजिमेंट भारतीय सेना की इकलौती रेजिमेंट है जो गणतंत्र दिवस परेड में दो बार सलामी देती है।

गुरु तेग बहादुर के मारे जाने के बाद सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने सम्राट औरंगज़ेब को कड़ा पत्र लिखा। पत्र के मजनून का हिंदी अनुवाद आलोक पुराणिक जी ने करते हुए सुनाया :

"सारी कोशिश के बावजूद इंसाफ़ नज़र नहीं आता जब
तलवार उठाकर जंग ही सही रास्ता रह जाता तब।"

गुरु तेग बहादुर जी के बारे में कवि रूप की भी जानकारी दी मनु कौशल जी ने। उन्होंने उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब में 15 रागों में 59 शब्द (पद) और 57 श्लोक रचे। उनका एक दोहा यहाँ पेश है :

धन दारा संपत्ति सकल, जिनि अपनी करि मानि।
इन में कुछ संगी नहीं, नानक साची जानि॥

गुरुद्वारा सीस गंज साहिब से कुछ ही दूर पर वह सुनहरी मस्जिद है जहाँ से उस समय के ईरानी लुटेरे नादिरशाह ने कत्लेआम का ऐलान किया था। लूट के इरादे से भारत आए नादिरशाह के मार्च 1739 में दिल्ली पहुँचने पर यह अफ़वाह फैली कि नादिर शाह मारा गया। इससे दिल्ली में भगदड़ मच गई और फारसी सेना का कत्ल शुरू हो गया। उसने इसका बदला लेने के लिए दिल्ली में भयानक खूनखराबा किया और एक दिन में कोई 20-22 हजार लोग मार दिए गए । इसके अलावा उसने शाह से विपुल धनराशि भी ली। मोहम्मद शाह ने भारत की जनता से जजिया कर आदि के रूप में लूटी गये धन के अलावा सिंधु नदी के पश्चिम की सारी भूमि भी नादिर शाह को दान में दे दी। हीरे जवाहरात का एक ज़खीरा भी उसे भेंट किया गया जिसमें कोहनूर तख़्तेताउस शामिल थे । नादिर को जो सम्पदा मिली वो करीब 85 करोड़ रुपयों की थी। 85 करोड़ रुपए की कीमत को आज सोने के भाव से जोड़ें, तो यह रकम आज की जीडीपी से भी अधिक हो सकती है।

नादिर शाह के पास भारत से लूट की दौलत इतनी ज़्यादा हो गई थी कि लौटने पर उसने अपने राज्य में तीन साल तक कोई कर नहीं लगाया।

उस समय दिल्ली लूटमार का खुला मैदान जैसी थी। लोगों के हाल बयान करते हुए शायर मीर तकी मीर ने लिखा था :

दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का।

दिल्ली के हाल देखकर लोग दिल्ली छोड़कर दूसरी जगहों की तरफ़ पलायन कर रहे थे। मीर तकी मीर ने इसे बयान करते हुए लिखा :

"ग़ुस्से से उठ चले हो तो दामन को झाड़ कर
जाते रहेंगे हम भी गरेबान फाड़ कर।

दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर।"

सुनहरी मस्जिद के बाद हम लोगों का कारवां चाँदनी चौक स्थित दाग बाजार की तरफ़ बढ़ा। दाग बाज़ार उर्दू के बेहतरीन शायर दाग देहलवी के नाम पर बना बाजार है। नाम है -कूँचा उस्ताद दाग़ व्यापार मंडल ( होलसेल क्लॉथ मार्केट)।

दाग़ देहलवी (1831–1905) उर्दू शायरी के एक अत्यंत लोकप्रिय और रूमानी शायर थे, जिन्हें 'बुलबुल-ए-हिंद' और 'दबीर-उद-दौला' जैसी उपाधियों से नवाजा गया था। नवाब मिर्ज़ा ख़ान उनका असली नाम था और उन्होंने अपनी सादी लेकिन प्रभावशाली उर्दू में शायरी की। दाग़ की शायरी में प्रेम, रूमानियत और दिल्ली की तहजीब की झलक मिलती है।

उस्ताद दाग़ का शुमार आज सबसे ज्यादा गाये जाने वाले शायरों में है। दाग देहलवी की माँ वजीर ख़ानम उस समय की प्रतिष्ठित महिला थीं। उन्होंने मुगल युवराज मिर्जा मुहम्मद फ़ख़रू, जो अंतिम मुगल बहादुर शाह ज़फ़र के उत्तराधिकारी थे, से प्रेम निवेदन किया और उनसे पुनर्विवाह किया। इस कारण उन्होंने दिल्ली के लाल किले में विशेषाधिकार प्राप्त शिक्षा प्राप्त हुई । वहाँ उन्होंने सर्वोत्तम शिक्षा प्राप्त की और बाद में उस्ताद जौक के मार्गदर्शन में रहे। बाद में, उन्होंने उर्दू साहित्य और कविता की बारीकियों पर ग़ालिब से भी सलाह ली । उन्हें सुलेख और घुड़सवारी का भी भी प्रशिक्षण दिया गया था ।

दाग दहलवी हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मशहूर शायर इक़बाल के उस्ताद थे। दिल्ली, रामपुर के बाद वे हैदराबाद में रहे। हैदराबाद में रहते हुए वे दरबारी कवि और मार्गदर्शक नियुक्त हुए। वहीं उनका 74 की उम्र में इंतक़ाल हुआ।

आलोक पुराणिक जी ने दाग़ देहलवी में मिजाज का परिचय कराने के लिए उनका यह शेर पढ़ा :

"वंदे वायस सुनते-सुनते कान अपने भर गए
क्या इबादत को हमीं हैं, सब फ़रिश्ते मर गए?"

दाग साहब अपने परिचय में ख़ुद की तारीफ़ करने से परहेज नहीं करते थे। उन्होंने अपने बारे में लिखा :

"दाग़ इक आदमी है गर्मा-गर्म
ख़ुश बहुत होंगे जब मिलेंगे आप।"

दाग देहलवी के तमाम शेर एक के बाद एक सुनाये गए। उनमें से कुछ यहाँ पेश हैं :

- "हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़',
जो लोग कुछ नहीं करते, कमाल करते हैं।"

-"वो क़त्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये काम किसने किया है ये काम किसका था।"

-"तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता,
वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता।"

- "मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है।"

उर्दू की तारीफ़ करते हुए भी दाग ने लिखा :

-"उर्दू है जिसका नाम, हमीं जानते हैं 'दाग़',
सारे जहाँ में धूम, हमारी ज़बान की है।

नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो,
कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते।"

मनु कौशल जी ने उस्ताद दाग़ की शायरी में पॉज के कमाल का जिक्र करते हुए कुछ शेर सुनाये। शेर में पॉज के अनुसार शेर के मानी कैसे बदल जाते हैं इसका जिक्र किया। एक शेर पढ़कर उन्होंने पॉज के साथ शेर के मतलब बदलने उदाहरण पेश किया।

-"सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं।

मैं 'दाग़' हूँ मरता हूँ इधर देखिए मुझ को
मुँह फेर के ये आप किधर देख रहे हैं।

-तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

ग़ालिब के इस शेर में भी पॉज के चलते शेर का मतलब बदलने के बारे में बताया मनु जी ने :

दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए।

मनु कौशल के की दाग के बारे में बातचीत को हमारे साथ वहीं फुटपाथ पर बैठा एक कुत्ता भी सुन रहा था। कुछ दाग साहब की शायरी तो उसने तसल्ली से सुनी लेकिन ग़ालिब का जिक्र आते ही वह उठकर चला गया। इससे यह बात साबित होती है कि दाग़ साहब आसानी से समझ में आने वाले शायर हैं। ग़ालिब को समझना थोड़ा मुश्किल है।

दाग देहलवी रोमानी शायर हैं। संसार के सौन्दर्य के मुक़ाबले जन्नत की हूरों की ख़ारिज करते हुए उन्होंने शेर लिखा । इस शेर को मनु जी अपनी आवाज में पढ़ा :

" आरज़ू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई

जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई।"

जिसमें लाखों बरस की हूरें हों,
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई।"

'कई चाँद थे सरे-आसमाँ' शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास है, जो 18वीं-19वीं सदी की दिल्ली, शायरी, तहज़ीब और संस्कृति का जीवंत चित्रण करता है। दाग देहलवी की माँ जीनत ख़ानम पर केंद्रित इस उपन्यास में दाग देहलवी के बचपन और उनकी शायरी के शुरुआती दिनों का जिक्र है।

दाग बाजार के पास ही स्थित फतेहपुरी मस्जिद है। इसका निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की पत्नी फतेहपुरी बेगम ने 1650 में करवाया था। उन्हीं के नाम पर इसका नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। ये बेगम फतेहपुर से थीं। इसीलिए उनक नाम फतेहपुरी बेगम पड़ा।

अंग्रेज़ों ने इस मस्जिद को 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद के बाद, नीलाम कर दिया था। शायद स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिमों की भागेदारी से नाराज होकर अंग्रेजों ने ऐसा किया होगा। जिसे राय लाला चुन्नामल ने मात्र 19000 /- रुपए में खरीद लिया था। जिनके वंशज आज भी चाँदनी चौक में चुन्नामल हवेली में रहते हैं। जिन्होंने इस मस्जिद को संभाले रखा था। बाद में 1877 में सरकार ने इसे चार गांवों के बदले में वापस अधिकृत कर मुसलमानों को दे दिया, जब उन्हें दिल्ली में रहने का दोबारा अधिकार दिया गया था। ऐसी ही एक दूसरी मस्जिद, अकबराबादी बेगम द्वारा बनवाई गई थी, जिसे अंग्रेज़ों ने बर्बाद करवा दिया था। माना जाता है कि यह वर्तमान नेताजी सुभाष पार्क (दिल्ली) क्षेत्र में स्थित थी।

इसी तरह औरंगज़ेब की बेटी ज़ीनत-उन-निसा बेगम द्वारा निर्मित ज़ीनत-उल-मस्जिद को भी अंग्रेजों ने ज़ब्त कर लिया था और इसे ब्रिटिश सैनिकों के लिए एक बेकरी में बदल दिया था।

जीनत-उल-मस्जिद के बेकरी में बदल देने की सीख शायद जाटों से मिली होगी। 1761 में भरतपुर के जाट महाराजा सूरजमल की सेना ने आगरा विजय के दौरान ताजमहल में भूसा भरवाया था। जाट सेना ने ताजमहल के कीमती सामान, जैसे चांदी के दरवाजे, झूमर और कालीन लूट लिए थे और इसे एक अस्थाई अस्तबल या गोदाम के रूप में इस्तेमाल किया था।

फतेहपुरी मस्जिद देखने के बाद हम लोग बल्लीमारान स्थित ग़ालिब की हवेली की देखने गए। अपन पहले भी एक बार यहाँ आए थे लेकिन उस समय यह रखरखाव के लिए बंद थी। उस समय आलोक जी ने कहा था कि उनको साथ लिए बिना ग़ालिब से मिलना संभव नहीं है। इस बार आलोक जी और मनु कौशल जी दोनों साथ थे।

ग़ालिब की हवेली में ग़ालिब से जुड़ी तमाम तस्वीरें, किताबें, डाक टिकट और उनसे जुड़ी चींजे थीं। एक चौसर भी रखी थी जिस पर कुछ पांसे भी रखें थे। शायद ग़ालिब उनसे खेलते होंगे। ग़ालिब की हवेली में एक तरफ़ दीवार पर ग़ालिब की बड़ी फ़ोटू और उतने ही बड़ी जगह पर ग़ालिब का प्रसिद्ध शेर लिखा था :

उग रहा है दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा 'ग़ालिब'
हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आई है

(इसका मतलब है घर इतने लंबे समय से खाली पड़ा है कि उसकी दीवारों पर घास (सब्ज़ा) उग आई है, और शायर अब बयाबान (जंगल/वीरान जगह) में भटक रहा है, जबकि उसके अपने घर में (जो अब जंगल बन गया है) बहार आ गई है।)

ग़ालिब के बारे में प्रसिद्ध लेखक मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी ने लिखा है -"ग़ालिब दुनिया में वाहिद (अकेला) शाइ'र है जो समझ में ना आए तो दुगना मज़ा देता है।"

इस परिभाषा के अनुसार हम ग़ालिब का दोगुना मजा लेने की फ़िराक़ में थे। लेकिन हमारी मंशा पर आलोक पुराणिक जी और मनुकौशल जी ने पानी फेर दिया। ग़ालिब के कई शेर सुनाकर हमको समझाये भी। ग़ालिब के जीवन से जुड़ी कई बातें, उनके ख़त और दोस्तों से गुफ़्तगू के किस्से सुनाए। मनु कौशल ने ग़ालिब का कलाम सुनाया :

"उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है



देखिये, पाते हैं उश्शाक़ (प्रेमियों ) बुतों से क्या फ़ैज़,
इक बरहमन ने कहा है, कि ये साल अच्छा है।

(ग़ालिब कह रहे हैं कि प्रेमियों (उश्शाक़) को महबूब (बुतों) से क्या हासिल होता है, यह तो देखने वाली बात है; लेकिन एक पंडित (बरहमन) ने भविष्यवाणी की है कि यह साल अच्छा रहेगा) ये शेर ग़ालिब की मन:स्थितियों का बयान करता है। फ़ाकामस्ती के दिनों में भी उनको प्रेमियों के सामीप्य का ललक है।

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है।"




ग़ालिब लंबे समय तक कर्जदार रहे। लेकिन उनकी खुराक देखकर ऐसा नहीं लगा कि किसी कर्ज में डूबे इंसान की खुराक है। ग़ालिब की मनपसंद खुराक इस तरह थी :

"तले कबाब,दाल मुरब्बा, भुना गोस्त, शाम्मी कबाब, बेसन की कढ़ी और पकौड़ियाँ, चने की दाल, चटनी, अचार, सिरका, सोहन हलवा, आम, मिश्री (भोजन के बाद), पिसे हुए बादाम (मिश्री के साथ) हुक्का।"

आलोक जी ने कहा -'ग़ालिब में उस समय दुनियावी लिहाज़ से तमाम ऐब थे। लेकिन आज हम ग़ालिब को उन खराबियों के कारण नहीं बल्कि उनके काम की वजह से याद करते हैं।'

मनु जी ने ग़ालिब की प्रसिद्ध ग़ज़ल सुनाते हुए उस पर विस्तार से चर्चा की :

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

तिरे वा'दे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता

ग़ालिब के शेरो-शायरी के अलावा दोस्तों को लिखे खत भी कमाल के हैं। मनु कौशल जी ने ग़ालिब के कुछ ख़तों का ज़िक्र किया। एक पत्र में अपने दोस्त को खाते-पीते रहने ऐश करते रहने की सलाह देते हुए लिखते हैं -' मिश्री की मक्खी बनो, शहद की मक्खी नहीं।'

आलोक जी ने ग़ालिब के इस शेर को सुनाते हुए बताया कि शायद ग़ालिब के समय भी कोरोना महामारी हुई थी तभी ग़ालिब ने यह लिखा था :

हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता

(मरने के बाद जो बदनामी (रुसवाई) झेलनी पड़ी, उससे बेहतर था कि मैं दरिया में डूब कर मर जाता। अगर ऐसा होता, तो न मेरा जनाज़ा निकलता और न ही कोई मज़ार (कब्र) बनती, जिससे मेरी रुसवाई से बचा जा सकता था।

एक पत्र में अपने दोस्त को ग़ालिब लिखते हैं -'पंद्रह दिन तक रोटी के साथ शराब मिलती थी। अब केवल रोटी मिलती है शराब नहीं ।'

आलोक पुराणिक ने ग़ालिब की शराब के प्रति अशक्ति का जिक्र करते हुए कहा -'ग़ालिब साहब आज होते तो पक्का किसी शराब कंपनी के ब्रांड एंबेसडर होते।'

ग़ालिब के प्रसिद्ध शेर :

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं,
रोइए जार-जार क्या, कीजिए हाए-हाए क्यों।

(जिसमें उन्होंने जीवन की नश्वरता और दुनिया की बेरुखी पर कटाक्ष किया है। उनका कहना है कि इंसान के जाने के बाद दुनिया रुकती नहीं, सब कुछ चलता रहता है, इसलिए किसी के लिए भी बहुत ज़्यादा मातम (रोने) की ज़रूरत नहीं है। यह शेर आत्माभिमानी और यथार्थवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है। )

इस शेर की पैरोडी कैफ़ अहमद सिद्धिकी की पैरोडी Ira Puranik ने सुनाई:

हो गए नाकाम तो पछताएँ क्या
दोस्तों के सामने शरमाएँ क्या

हो रहे हैं फ़ेल हम दो साल से
घर में जा कर अपना मुँह दिखलाएँ क्या

(पूरी पैरोडी पोस्ट के साथ के वीडियो में सुने)


गौरी शंकर मंदिर के शिव मंदिर से शुरू हुई वॉक को ग़ालिब की हवेली पर ख़त्म करते हुए आलोक पौराणिक जी ने ग़ालिब का शिव की नगरी बनारस की तारीफ़ में लिखा शेर सुनाया और उसका मतलब भी बताया।

शिव मंदिर से शुरू हुई दिल्ली वॉक शिव की नगरी की तारीफ़ में पूरी हुई। इसके बाद सबका ग्रुप फ़ोटो हुआ।

वॉक पूरी होने के बाद हम लोग नाश्ते का लिए जिस दुकान पर पर पहुँचे उसका भी शंकर जी से सीधा कनेक्शन था। दुकान का नाम था - 'शिव शंकर मिष्ठान भंडार।' कचौड़ी, सब्जी के साथ स्वादिष्ठ लस्सी ने इस वॉक को 'गौरी शंकर मंदिर से ग़ालिब अकादमी' की पहले की वॉक से अधिक स्वादिष्ठ बनाया।

नाश्ता करने के बाद लोग अपने-अपने घर की तरफ़ प्रस्थान कर गए। इस तरह दिल्ली वॉक पूरी हुई।

 



     














    Thursday, April 02, 2026

    रुपये की कुल ऊर्जा संरक्षित है

     


    डॉलर के मुकाबले रुपए के गिरने की बात पर लोग हलकान हुए जा रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा है। लोगों का ऐसा सोचना उनमें वैज्ञानिक चेतना के अभाव का प्रमाण है।
    डॉलर के मुक़ाबले रुपये का गिरना यह सिद्ध करता है कि रुपया डॉलर से ऊंचाई पर है। डॉलर के मुकाबले रुपये का गिरना ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत के अनुरूप है। लगातार गिरता वही है जो ऊँचाई पर होता है। रुपए की कुल ऊर्जा संरक्षित है।
    ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत (Law of Conservation of Energy) मुख्य रूप से जर्मन भौतिक विज्ञानी जूलियस रॉबर्ट वॉन मेयर (Julius Robert von Mayer) द्वारा 1842 में दिया गया था। इस सिद्धांत के अनुसार, ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है।
    इस बात को प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट 'फ़ुरसतिया' के इस कार्टून के माध्यम से समझा जा सकता है। आपको AI से बनाया यह कार्टून कैसा लगा?

    Tuesday, March 31, 2026

    विकसित देशों की लूटपाट


    दो दिन पहले गाड़ी में पेट्रोल भरवाने गए। पेट्रोल की किल्लत के समाचार से आशंकित थे। पेट्रोल मिलेगा कि नहीं। पता नहीं कितनी देर लगे।
    गाड़ी में पढाई सौ किलोमीटर तक के लिए पेट्रोल था। लखनऊ में इतने पेट्रोल में हफ़्ता आराम से गुज़र जाता। लेकिन हमको लखनऊ से नोयडा आना था। कार से। करीब साढ़े पाँच सौ किलोमीटर चलने भर का पेट्रोल चाहिए था। मतलब क़रीब तीन सौ किलोमीटर चलने का पेट्रोल कम था गाड़ी में।
    पेट्रोल पंप में भीड़ थी। लेकिन इतनी नहीं कि 'कई किलोमीटर लंबी लाइन' कहा जा सके। हड़बड़ी में जिस लाइन में लगे वह सीएनजी लेने वालों की लाइन थी। हमारे आगे टेम्पो लगे थे। दो मिनट बाद पीछे भी टेम्पो लग गए। 'गाड़ी के आगे कुछ टेम्पो, गाड़ी के कुछ पीछे टेम्पो' वाला सीन हो गए। आगे बढ़ने का कोई फ़ायदा नहीं था। पीछे हटने का रास्ता नहीं।
    कुछ देर बाद हमारी समस्या समझकर एक ऑटो वाले ने लाइन से बाहर आने में हमारी सहायता की। हम पेट्रोल वाली लाइन में लग गए। हमारे आगे करीब सात-आठ गाड़ियाँ थीं। हम अपनी बारी का इंतजार करने लगे।
    हमारे आगे वाली गाड़ी में एक बुजुर्ग हड़बड़ाते हुए गाड़ी से निकलते ही बोले -'गाड़ी फुल कर दो।' उसने बताया -'बीस लीटर से अधिक नहीं मिल पाएगा।' बुजुर्गवार ने भुनभुनाते हुए कहा -'भर दो बीस लीटर ही।'
    बुजुर्गवार के जाने के बाद हमारा नम्बर आया। हमने कहा -'बीस लीटर हमें भी दे दो।'
    हमारे गाड़ी की टंकी में नोजल घुसाते हुए पंप आपरेटर ने कहा -'पेट्रोल की कोई कमी नहीं। बिल्कुल चिंता न करें। मिलता रहेगा।'
    आपरेटर की तसल्ली बक्श आवाज़ सुनकर हमें लगा -' माननीय प्रधानमंत्री की आपदा के लिए तैयार रहने वाली थकी आवाज के बजाय इस पंप आपरेटर का वीडियो चलाया जाता तो ज़्यादा भरोसेमंद लगता। फिर लगा कि ऐसा होता तो कुछ दिन बाद यह भी भाइयों-बहनों करने लगता। फिर पेट्रोल कौन भरता?
    दूसरे दिन बाक़ी बचा पेट्रोल भराने गए। दूसरे पेट्रोल पंप। वहाँ एकदम सन्नाटा था। लगा शायद पेट्रोल के न होने की वजह से पम्प बंद है। लेकिन ऐसा नहीं। हम अकेले थे पेट्रोल भराने वाले। उसने कहा -'दो दिन पहले यहां सांस लेने की फुर्सत नहीं थी। आज सन्नाटा है।' पेट्रोल डालते हुए उसने भी आश्वस्त किया कि पेट्रोल की कोई कमी नहीं है।
    करीब पंद्रह लीटर पेट्रोल भराने के बाद ऑटो कट हो गया। पेट्रोल भरना बंद हो गया। हम भुगतान करके चले आए। ढाई सौ किलोमीटर चलने भर के पेट्रोल के बाद 35 लीटर भरवाने के बाद गाड़ी में कम से कम छह सौ किलोमीटर चलने भर का पेट्रोल होना चाहिए। लेकिन गाड़ी का फ़्यूलमीटर साढ़े चार सौ किलोमीटर यात्रा तक का ही पेट्रोल बता रहा था। हम चकराये कि डेढ़ सौ किलोमीटर का पेट्रोल कहाँ गया? क्या पेट्रोल टंकी भी भ्रष्टाचार में लिप्त होकर कमीशन खोरी करती है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि पेट्रोल पंप वाले ने पेट्रोल डाला ही न हो। गड़बड़ कर दिया हो।
    नेट पर चेक किया तो पता चला कि टंकी की क्षमता साठ लीटर है। सोचा अभी पूरा नहीं भरा होगा टैंक। भरवा लेते हैं। दूसरे पेट्रोल पंप गए। वहाँ भी हम अकेले भरवाने वाले थे। हमने फुल करने को कहा। नोजल से पेट्रोल अंदर जाते ही हमारी गाड़ी ने पेट्रोल की उल्टी करनी शुरू कर दी। मतलब पहले वाले पेट्रोल पंप पर हमारा शक फ़िज़ूल था। टंकी पूरी भरी थी।
    टंकी पूरी भरी होने के बावजूद गाड़ी साढ़े चार सौ किलोमीटर का पैट्रोल ही बता रही थी। हमने सोचा जो होगा देखा जाएगा।
    कल नोयडा आए तो आधे रास्ते में एहतियान दस लीटर पेट्रोल और भरवा लिए। नोयडा पहुंचकर देखा कि पेट्रोल की टंकी 60% फुल है।लखनऊ से नोयडा तक की 515 किलोमीटर की यात्रा के बाद अभी देखा कि गाड़ी में 361 किलोमीटर चलने का तेल है। मतलब कुल 575+361 = 876 किलोमीटर चलने लायक तेल होने के बावजूद गाड़ी ने 450 किलोमीटर के ऊपर चलने की गारंटी नहीं ली।
    यह देखकर लगा कि आधुनिक कहलाने वाली गाड़ियाँ भी लोकतांत्रिक देशों की तरह झूठ बोलने लगी हैं। ट्रम्प कहते हैं -'दस दिन हमला नहीं करेंगे लेकिन ईरान पर बम बरसाने लगते हैं। इजरायल से खबरें आतीं हैं कि सेना थकने लगी है लेकिन वहाँ का प्रधानमंत्री कहता -हम दुनिया के किसी भी देश पर आक्रमण कर सकते हैं।
    अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है ईरान से बातचीत अच्छी चल रही है लेकिन ईरान कहता है उससे बात ही नहीं चल रही तो अच्छी क्या होगी?' अपने कर्णधार के बारे में कुछ न हो कहा जाये तो बेहतर। उनके मन की बात वही समझ सकते हैं।
    आज दुनिया के आधुनिक कहे जाने वाले देशों के कर्णधारों ने दुनिया की ऐसे हाल बना दिए हैं कि क्या ही कहा जाये? अपने-अपने देश को महान बनाने के नाम पर देश और दुनिया को बर्बाद कराने पर आमादा हैं। कई विकसित देशों के अंदरखाने की कहानियाँ बाहर आने पर लगता है कि उनके विकास के मूल में कार्यकुशलता, वैज्ञानिक उन्नति से ज़्यादा बड़ा योगदान उनकी लूटमार का है। पिंडारियों की तरह दुनिया को लूटना और पिछड़ा बनाए रखना ताकि वे विकसित कहला सकें।

    गाड़ी में पेट्रोल भरवाने की बात से बात शुरू करके अपन विकसित देशों की लूटपाट तक पहुंच गए। पूरी दुनिया में यही चल रहा है। अपन दुनिया से कोई अलग थोड़ी हैं। 

    दो कौड़ी की चाय

    काउंटर पर चाय बनाती दिव्यांशी

    दो दिन पहले कटिंग सैलून में चाय की दुकान का नाम सुना -'दो कौड़ी की चाय।' दुकान का नाम ध्यान खींचने वाला था। तय किया था जाएँगे देखने दुकान। पीने चाय।

    आज शाम को गए 'दो कौड़ी की चाय' पीने। घर से करीब चार किलोमीटर दूर है दुकान। LDA कॉलोनी में बंगला बाजार के पास।
    दुकान के बारे में मेरे मन इमेज़ किसी रेस्टोरेंट की थी। किसी बिल्डिंग में बैठने का इंतजाम होगा। लेकिन पहुँचने पर देखा कि फुटपाथ पर एक गोल गुमटी पर बन रही थी 'दो कौड़ी की चाय।' चाय के साथ बन मक्खन, कटलेट और दूसरे कई नाश्तों का इंतज़ाम था। गुमटी के सामने, फुटपाथ पर प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठने का इंतज़ाम था। पूरा फुटपाथ चाय पीने वालों से भरा था। ज्यादातर युवा लोग थे। चौड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग तसल्ली से गपियाते हुए चाय पी थे। दुकान एक तरह से हाउस फुल थी।
    ‘दो कौड़ी की चाय’ की दुकान पर दिव्यांशी, प्रभात (काउंटर के आगे) और रंजीत और आकाश ( काउंटर के पीछे)


    दुकान पर कोई कुर्सी खाली न देखकर अपन गुमटी के सामने ही खड़े होकर चाय बनना देखते रहे। काउंटर के अंदर खड़े दो लोग नाश्ते का सामान और चाय बना रहे थे। काउंटर के बाहर खड़ी एक प्यारी बच्ची चाय के भगौने में चम्मच हिलाते हुए चाय बना रही थी।
    मैंने ध्यान से चाय बनाती बच्ची का वीडियो बनाने के बाद पूछा -' ये दुकान का नाम बड़ा मजेदार है। कैसे रखा? किसने सजेस्ट किया? '
    इस पर उसने कहा -'इस बारे में दुकान के ओनर से पूछिए। वो बतायेंगे।' यह कहते हुए उसने वहाँ कुर्सियां समेटकर इधर -उधर रखते हुए एक खूबसूरत बालक की तरफ़ इशारा किया। बालक का नाम प्रभात है।
    प्रभात से बातचीत की तो पता चला कि उसके तार कानपुर से जुड़े हुए हैं। वहाँ कुछ साल रहे हैं। वैसे पैदाइश और शुरुआती पढ़ाई लिखाई तो कालापानी वाले प्रदेश अंडमान निकोबार में हुई। लेकिन बाद में बीबीए और एमबीए की पढ़ाई बनारस हिदू विश्वविद्यालय से हुई। 2018 में एम बी ए करने के बाद कुछ साल ओम लाजिस्टिक में काम किया इसके बाद शायद एम बी ए के सीखे गुरु और कानपुर और बनारस वालों के चाय वालों से प्रेरणा लेकर लगा होगा कि चाय की दुकान खोली जाये। तो खोल ली।

    काउंटर के भीतर काम करते हुए रंजीत और आकाश।


    दुकान का नाम 'दो कौड़ी की चाय' रखने के पीछे ध्यान खींचने वाली बात मुख्य रही होगी। कानपुर के 'ठग्गू के लड्डू' तो इस मामले में तमाम अटपटे नाम रखने वालों के पितामह हैं। वैसे भी पहले दुकानों, प्रतिष्ठानों के नाम शरीफ टाइप रखने के चलन था। लेकिन अब शराफ़त का जमाना नहीं रहा। ख़ुराफ़ाती नामों को लोग ज़्यादा भाव देते हैं। रचनात्मक ख़ुराफ़ात का उदाहरण है दुकान का नाम।
    बातचीत करते हुए पता चला कि प्रभात को दुकान का मालिक बताने वाली बालिका दुकान की साझा मालकिन दिव्यांशी भी कानपुर की हैं। गुमटी नंबर पाँच में घर है दिव्यांशी का। पिता नये गंज में जनरल मर्चेंट की दुकान है। बीएड की पढ़ाई कर रही हैं। कानपुर में ही प्रभात और दिव्यांशी की मुलाक़ात हुई और दोनों ने लखनऊ में 'दो कौड़ी की चाय' की दुकान खोल ली।
    दुकान की शुरुआत 14 फ़रवरी , 2022 को हुई। वेलेंटाइन डे को शुरू हुई दुकान में शायद इसीलिए युवा लोगों का ज़्यादा जमावड़ा रहता है।
    कुल चार लोग मिलकर चलाते हैं दुकान। प्रभात, दिव्यांशी के अलावा सीतापुर महोली के आकाश और रंजीत दुकान में चाय और नाश्ते बनाने का काम करते हैं। आकाश और रंजीत दोनों सीतापुर में बीएससी की पढ़ाई भी कर रहे हैं। पास ही किराए पर रहते हैं।
    चाय बनाते हुए दिव्यांशी से बात करते हुए पता चला कि प्रभात के पिता पुलिस विभाग से जुड़े रहे। मूलत: आज़मगढ़ के रहने वाले हैं। नौकरी के सिलसिले में अंडमान गए। वहीं प्रभात का बचपन बीता। इसके बाद राहुल सांकृत्यायन की तर्ज़ पर कानपुर, बनारस घूमते हुए लखनऊ में अड्डा जमाया।
    काउंटर के सामने खड़े प्रभात। दिव्यांशी अंदर कुछ सामान बनाने गई है।


    Anita Misra को पता भी नहीं चला और उनके मोहल्ले (गुमटी नंबर पाँच) की बच्ची ने लखनऊ में चाय की दुकान खोल ली। देश-दुनिया के स्तर पर दो कौड़ी के लोगों की हरकतें देखते-देखते आजिज हो गई होंगी। कभी आ 'दो कौड़ी की चाय' भी पीकर देखें लखनऊ आकर ।
    प्रभात ने यह भी बताया कि दुकान की मालकिन दिव्यांशी उनकी मंगेतर है। शायद अगले साल तक उनकी शादी हो। मतलब शादी के पहले दोनों साथ काम करने का अभ्यास कर रहे हैं।
    हम तो निठल्ले थे। खड़े होकर बतिया रहे थे। लेकिन दिव्यांशी और प्रभात को चाय और दूसरे सामान बनाने के साथ ग्राहकों को सर्व भी करना था। हमारे अनुरोध करने पर सबने साथ खड़े होकर फ़ोटो भी खिंचवाया। काउंटर के पीछे खड़े सीतापुरी बालकों में से एक (रंजीत) ने बाहर निकलकर हमसे बतियाते हुए हमारा परिचय पूछा। अपना इंस्टाग्राम का खाता दिखाया। हमारा फेसबुक पता नोट किया। और कुछ बातचीत होती तब तक काउंटर से आवाज आई -' रंजीत, जल्दी आकर चाय बनाओ।'
    प्रभात ने बताया कि उनकी 'दो कौड़ी की चाय' की कानपुर में भी कई दुकानें (शायद चार) और आजमगढ़ में भी एक दुकान है। लखनऊ की दुकान दोपहर दो बजे से रात ग्यारह बजे तक खुलती है। दिन में किसी को चाय पीना हो तो बताये हम 'दो कौड़ी की चाय' के अड्डे पर पहुँचकर चाय पिलायेंगे।
    हमने वहीं बैठकर अदरख की चाय पी। 25 रुपए की एक चाय। छोटा ग्लास ऊपर तक भरा था। थोड़ा ठहरकर पीना पड़ा वरना हाथ जलते। ग्लास थोड़ा बड़े हों या कुल्हड़ में चाय हो तो बेहतर है। चाय बढ़िया लगी। इस बढ़िया लगने के पीछे चाय के स्वाद से ज़्यादा युवा बच्चों का उद्यमशीलता, व्यवहार और प्यारा अंदाज़ था।
    प्रभात और दिव्यांशी को सफल होने के लिए शुभकामनाएँ।

    Saturday, March 28, 2026

    गुम्मा हेयर कटिंग सैलून से लुक्स हेयर ड्रेसर तक

    अरमापुर की नाई की दुकान 


    कल शाम को कटिंग करवाने गए। जाने से पहले सोचा बाल काटने वाले से कन्फ़र्म कर लें। दुकान खुली है कि नहीं। वह दुकान पर है या नहीं।
    मोबाइल में जिस नाम के आगे 'हेयरकट' लिखा था उसको फ़ोन किया। पूछने पर जबाब आया -'अभी आते आपके यहाँ। घर पर ही करवायेंगे न कटिंग?' फ़ोन गलती से कानपुर में बाल काटने वाले के पास लग गया था। वो घर में आकर बाल काटते हैं। अरमापुर इस्टेट में कई अधिकारी इनसे बाल कटवाते हैं। कटिंग के साथ तमाम ख़बरें भी मिल जाती हैं लोगों को। जातीं भी होंगी। खबरची का काम दोतरफ़ा होता है। संयोग ऐसा कि हमने कभी इनके सेवायें भी नहीं लीं थीं।
    फ़ोन गलती से लगा था। लेकिन बात हो गई इसी बहाने। तमाम बातें इसी तरह हो जाती हैं।
    बाद में फ़ोन करके कटिंग सैलून गए। पता चला जिस जगह उसका सैलून था वह बंद हो गया था। बगल में चालू था सैलून। कारण पूछने पर बताया कि दुकान मालिक ने ज़्यादा किराया बढ़ा दिया था। खाली करना पड़ा।
    कटिंग कराने के बाद डाई कराई। डाई धुलने के बीच के आधे घंटे का समय उपयोग करने के लिए कुछ फ़ोन किए। एक इलेक्ट्रॉनिक सामान लेने के लिए दुकान का नाम देखकर फ़ोन किया। फ़ोन में असामिया में पूछा गया -'क्या चाहिए?' आसाम में भी उसी नाम से दुकान रही होगी। हमने -'कुछ न ' कहते हुए फ़ोन काट दिया।
    दुकान पर मौजूद लोग तमाम तरह की बातें कर रहे थे। धुरंधर फ़िल्म की बात हुई। कटिंग कराने आए ग्राहक ने बताया -' मैं देखने गया हाल में। थोड़ी देर बाद सो गया। घर आकर फिर OTT पर देखी। तीन चार बारे में।' वह धुरंधर -1 के बारे में बता रहा था।
    दुकान का काम-काज देखने वाली महिला ने कहा -'पहले मैं रोमांटिक फ़िल्में देखती थी। खूब सारी। लेकिन अब मुझे मार-धाड़ वाली फ़िल्में पसंद हैं। मैंने तो धुरंधर की बुकिंग फरवरी में ही करा ली थी।'
    मुझसे किसी ने पूछा नहीं। कोई पूछता तो कहता -'मुझे हर तरह की फ़िल्में पसंद हैं।' जबकि सचाई यह है कि मार-धाड़ वाली फिल्मों से अपन परहेज करते हैं। यही कारण है धुरंधर जैसी धुँआधार फ़िल्म देखने से बचे हुए हैं आजकल। अभी तक फ़िल्में बहुत कम देखी हैं। जो दोस्त लोग बताते हैं उनको देख लेते हैं। इसके अलावा मुझे रोमांटिक फ़िल्में पसंद हैं। पिछले दिनों कई फ़िल्में देखीं। एक दिन में एक के हिसाब से। आपने कौन सी फ़िल्म देखी पिछले दिनों?
    दो कौड़ी की चाय 

    सैलून में आशियाना की एक चाय की दुकान की भी चर्चा हुई। दुकान का नाम है -'दो कौड़ी की चाय।' आजकल ध्यान खींचने के लिए लोग अजब-अजब तरह के नाम रखने लगे हैं। जाएँगे कभी 'दो कौड़ी की चाय' पीने।
    कटिंग और डाई के 550/- रुपए पड़े। नोयडा में इसके दोगुने पड़ते हैं। लखनऊ नोयडा से सस्ता है कटिंग के मामले में। कानपुर में भी 500/- में काम हो जाता था।
    मुझे याद है कि छुटपन में हमारे पिताजी घर के पास लेनिन पार्क के सामने की फुटपाथ पर दाढ़ी- बाल बनवाने जाते थे। हम लोगों को भी ले जाते कटिंग कटवाने के लिये। वहां धूप में जमीन पर बिछी चादर पर बैठा कर नाई कटिंग करते। बैठाने के लिये चादर के नीचे या ऊपर ही एकाध ईंट रख लेते ताकि बैठने में आसानी रहे। कम पैसे में बाल कट जाते। उन दिनों हमारे घर के सामने स्थित ‘रंगीला हेयर ड्रेसर’ के मुकाबले ये फुटपाथिया कटिंग सैलून आधे पैसे लेता। खाली कुर्सी पर बैठकर बाल कटवाने के लिये दुगुने पैसे देने के मुकाबले जमीन से जुड़कर बाल कटवाना पिताजी को समझदारी लगती । इसमें कोई हीन भावना नहीं थी बस अनावश्यक फिजूलखर्ची से बचने की बात थी। अपने फुटपाथिया नाई की दुकान का नाम पिताजी बताते थे- गुम्मा हेयर कटिंग सैलून। गुम्मा ईंट को कहते हैं। ईंट पर बैठकर बाल बनवाने के कारण गुम्मा हेयर कटिंग सैलून कहते। कुछ लोग ईटैलियन कटिंग सैलून भी कहते।
    'गुम्मा हेयर कटिंग' से शुरू करके 'लुक्स सैलून' तक की यात्रा में अनगिनत यादें जमा हैं। समय-समय पर उचकते हुए निकल आती हैं।


    Friday, March 27, 2026

    शहीदों की प्रतिमाओं का पुनर्स्थापन

     

    शहीदों की प्रतिमाओं का पुनर्स्थापन 

    शहीदों की नगरी शाहजहांपुर में शहीद दिवस के दिन शाहजहांपुर के  शहीदों की प्रतिमाएं ढहा दी गईं थीं। प्रतिमाओं को बुलडोजर से ढहा देने के बाद डम्पिंग ग्राउंड में फेंक दिया गया था।  घटना की जिम्मेदारी लेने वाला कोई मिला नहीं। महापौर , नगर निगम आयुक्त किसी को पता नहीं चला। बुलडोजर चल गया। लगता है बुलडोजर बाबा के जमाने में बुलडोजर भी मनचले हो गए हैं। अपने आप चलने लगे हैं। 


    इस घटना का शहर में व्यापक विरोध हुआ। शहर के विकास पुरुष का कोई बयान नहीं आया। बुलडोजर बाबा के आदेश पर नगर निगम के दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। ठेकेदार ब्लैक लिस्ट हो गया। परसाई जी की बात याद आ गई :


    "शासन का घूँसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है, पर न जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूँसा पड़ जाता है।"


    शहर के लोगों के व्यापक विरोध के बाद आनन-फानन में मूर्तियां जोड़-जाड़ कर फिर से स्थापित की गईं। जिन लोगों ने मूर्तियां गिराये जाने पर कुछ नहीं कहा था वे भी लपकते हुए मूर्तियों को माला पहनाते दिखे। सीमेंट के खंभों पर बिना उद्घाटन नामपट्ट के शहीदों की प्रतिमाएं फिर से स्थापित हो गईं। 


    मूर्तियों पर उद्घाटन कर्ताओं के नाम दर्ज करवाना जनप्रतिनिधियों का बड़ा लालच होता है। जिसके नाम जितने ज़्यादा नामपट्ट लगते हैं वह अपने को उतना अमर समझता है। एक बोरी सीमेंट और सौ ईंटों से बने निर्माण पर भी नाम पट्ट लगाने के लिए लालायित रहते हैं लोग। कई बार निर्माण से ज़्यादा खर्च नामपट्ट में होता है। 


    किसी इमारत के उद्घाटन में लोकार्पण की परम्परा फौरन बंद होनी चाहिए। नाम लिखे जाना बंद हो जाना चाहिए। अधिक से अधिक इमारत के बनने का समय लिखा जाना चाहिए। लेकिन  ऐसा होने लगे तो फिर जनप्रतिनिधि बेचारे किस मुँह देश सेवा का कर सकेंगे। उनका उत्साह मारा जाएगा।


    सैफ का बनाया रेखाचित्र 

    इस पूरे घटनाक्रम पर  Sudhir Vidyarthi जी की पोस्ट यहाँ पेश है। सुधीर विद्यार्थी जी ने देश के क्रांतिकारियों पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। शहीदों के सम्मान में उनके जन्मस्थल, कारावास जहाँ क्रांतिकारी बंदी रहे और विभिन्न स्थलों पर प्रतिमाएं स्थापित करवाने में भी सक्रिय भूमिका अदा की। शाहजहांपुर में भी शहीदों की प्रतिमाएं गिराये जाने पर लोगों को इस घटना की सूचना देने के बाद उनका सक्रिय,तीखा विरोध किया। शहीदों की मूर्तियां फिर से लगाए जाने में उनके तीखे विरोध की भी बड़ी भूमिका रही। सुधीर विद्यार्थी जी की पोस्ट : 


    काकोरी शहीदों के बुत फिर आ खड़े हुए! ************************************

                 कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

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    सत्ता की बेशर्म राजनीति और सरकार के चालू कल-पुर्जों का ’करिश्मा’ देखिए कि शाहजहांपुर की सरजमीं पर बुत बने खड़े काकोरी के अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खां और रोशन सिंह, जिन्हें 19 दिसम्बर, 1927 को फांसी पर चढ़ाकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने चैन की नींद सोने का सपना देखा था जो अंततः 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी के सवेरे के साथ ध्वस्त हो गया। हम आज़ाद हो गए।

     

                और फिर स्वतंत्रता के रजत जयंती वर्ष 1972 में इस शहर की ज़मीन पर खड़ी की गई उनकी बेजान मूर्तियों को 23 मार्च, 2026 की रात्रि में चोरी-चुपके प्रशासन की बेरहम, अंधी और असंवेदनशील बुलडोजरी ताकत ने अपने नुकीले पंजों से फिर ज़मींदोज़ करने जो षड्यंत्र रचा, उसका नाकामयाब ’ड्रामा’ सिर्फ चंद (चार) दिनों में ही नेस्तनाबूद हो गया और उन्हें शहीदों को अपनी धरती पर पुनर्स्थापित करने पर मजबूर कर दिया। 


    जब काकोरी शहीदों के भग्नावशेष बोल उठे

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               दरअसल, जब काकोरी के इन शहीदों की प्रतिमाएं बुलडोजर से गिराकर मिट्टी में मिला कर उनके भग्नावशेष (प्रशासन की भाषा में मलवा) शहर से बाहर डंपिंग ग्राउंड में डलवा दिया गया, तब लोगों को सवेरे उनके इस ’क्रांतिकारी कारनामे' का पता चला। गनीमत यह कि हमारी भी नींद समय से खुल गई। 


               लोग शहरों-शहरों बोल उठे। शाहजहांपुर ही नहीं, इलाहाबाद, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, संगरूर, जालंधर, बरेली, रुद्रपुर, मेरठ, मुरादाबाद, उदयपुर और देश के अनेक  दूरस्थ इलाकों से एक साथ आवाजें उठीं---’काकोरी शहीद ज़िंदाबाद’, ’उत्तर प्रदेश सरकार मुर्दाबाद’, ’ज़िला प्रशासन और नगर निगम अधिकारी हाय-हाय’। 

               ये आवाजें सत्ता के पिछलगुओं के अलावा हर कंठ से उठीं। विदेशों में कनाडा, कैलिफोर्निया, जर्मनी, लाहौर तक यह स्वर गुंजायमान हुआ।


    बे-लगाम व्यवस्था की छाती पर शहीद प्रहार करते रहेंगे

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             प्रशासन की मुंदी आँखें जैसे भौचक्की रह गईं। स्वनामधन्य जिलाधिकारी बौखलाहट में ज़िले के काकोरी शहीदों की गिनती तीन से बढ़ाकर चार बता रहे थे, मेयर महोदया कह रही थीं कि उन्हें कोई जानकारी नहीं बल्कि वे नवरात्रि के व्रत में डूबी थीं, नगर आयुक्त भी हड़बड़ी में खुद की जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ रहे थे, और सूबाई सरकार में इस शहर के प्रतिनिधि और कैबिनेट मंत्री के मुंह पर तो जैसे मजबूत वाला टेप चिपका दिया हो। 


              गौरतलब यह कि अधिकारीगण ठेकेदार पर दोषारोपण कर रहे थे और ठेकेदार मजदूरों को मुजरिम मान रहे थे। मैंने कहा कि शायद इस प्रकरण में अपराधी कोई और नहीं, सिर्फ बुलडोजर है जो रात्रि के अंधेरे में खुद चलकर गया और उसने शहीद प्रतिमाओं को ध्वस्त कर दिया।


    शहीदों का विस्थापन ना-मुमकिन है

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               25 मार्च को दोपहर शहर में हमारी प्रेस कांफ्रेंस से पहले नगर आयुक्त महोदय ने फोन कर मुझसे कहा कि वे मिलकर कुछ बात करना चाहते हैं। मैंने दो घंटे बाद का समय निर्धारित किया। वे होटल में मिलने आए, लेकिन यह भी सही है कि बढ़ते जनाक्रोश के बीच प्रशासन ने तीन दिन के भीतर गुपचुप ढंग से फैसला ले चुके थे कि शहीद प्रतिमाओं के खंडित अवशेषों को जोड़-गांठ कर और रंग-रोगन पोत कर उन्हें पुनर्स्थापित कर दिया जाए। वही उन्होंने मुझे बताया। यह भी कहा कि वे शर्मिंदा है कि अपने कार्यकाल में उन पर यह कलंक लगा। उन्होंने यह भी बताया कि दोषियों के विरुद्ध FIR करा दी गई है, कुछ सस्पेंशन हुए हैं, और किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। रात भर में मूर्तियों के नए ’बेस’ तैयार करा लिए गए और 26 मार्च को बहुत सबेरे शहीदों के ज़ख्मों और टूटे बुतों के टुकड़ों पर पॉलिश पोत कर फिर बेहयाई के साथ उन्हें खड़ा कर दिया गया।


              इसके बाद नगर आयुक्त महोदय ने पुनः स्थापित किए गए बुतों की तस्वीरें मुझे व्हाट्सएप पर भेजीं। शहीद अशफ़ाकउल्ला के पौत्र को मैंने अब वहां होने वाले उस ’जश्न’ में जाने से रोक दिया जिसे थोड़ी देर में वह बेशर्म सत्ता आयोजित करने वाली थी जिसमें फिर महापौर महोदया को न जाने किस मुंह से काकोरी शहीदों और भारतमाता की जय का नकली उदघोष करना पड़ा। अद्भुत नज़ारा और अनोखी निर्लज्जता! इस अवसर पर वहां न जाने ऐसे कितने लोग अपनी हाजिरी देकर अपनी फोटोएं उतरवा रहे थे जो चार दिन पहले शहीदों के लिए गए इस ’वध’ में शामिल थे।


     शहीद फिर सीना तान कर खड़े हो गए

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              देश और मनुष्यता के लिए शहीद होने वाले क्रांतिकारी रक्त-बीज हैं। उन्हें ज़मीन में दफ़नाओगे तो वे फिर अपने छाती फुलाकर उठ खड़े होंगे। 

                        साम्राज्यवादी सरकारें मुर्दाबाद! 

                            अमर शहीद ज़िंदाबाद!!


    सुधीर विद्यार्थी जी की पोस्ट का लिंक : https://www.facebook.com/share/p/1CnYGdAnuK/?mibextid=wwXIfr

    Thursday, March 26, 2026

    फेसबुक और ब्लॉगर


    पिछले कुछ दिनों में अपनी फेसबुक की पोस्ट अपने ब्लॉग (फ़ुरसतिया) पर चढ़ाई। पहले भी कई बार ऐसा कर चुके थे। पिछले कुछ साल की फेसबुक ऐसी थीं जो ब्लॉग में सेव नहीं की थीं। फेसबुक की पोस्ट्स ब्लॉग में रखने का कारण फेसबुक के तमाम नखरे रहे। कई मित्रों का खाता फेसबुक ने हटा दिया। वर्षों के लेख हज़म कर गया फेसबुक। 

    फेसबुक की पोस्ट ब्लॉगर पर रखना अपना कीमती सामान बैंक के लॉकर में रखने जैसा है। खराब या अच्छा जैसा भी है लेखन तो है। कम से कम ऐसा तो है जो हमें लेखक होने का भरम दिलाये रहता है। 

    फेसबुक पर लिखने की शुरुआत 16 साल पहले हुई थी। 15 फ़रवरी, 2010 को। इसके पहले अपने ब्लॉग पर ही लिखते थे। ब्लॉगिंग पर लिखने की शुरूआत 20 अगस्त, 2004 को हुई थी। मतलब क़रीब साढ़े  21 साल पहले। इस दौरान कुल मिलाकर लगभग 3284 लिखी। मतलब औसतन लगभग 150 प्रति वर्ष। ब्लॉगिंग के समय पोस्ट लिखने का औसत लगभग 85 पोस्ट प्रति वर्ष था। फेसबुक में आने का बाद यह औसत 180 ( ब्लॉग के मुकाबले लगभग दोगुना) हो गया। इसका कारण शायद फेसबुक पर पोस्ट लिखने में आसानी रही। ब्लॉग पर लिखने के पहले थोड़ा सोचते थे कि क्या लिखें? फेसबुक में लिखने के बाद भी नहीं सोचते -क्या लिख गए। 

    ब्लॉगिंग के दिनों में इससे कमाई के किस्से सुनते थे। यह कि कई ब्लॉगरों ने नौकरी छोड़कर ब्लॉगिंग से कमाई शुरू की और लखपति हो गए। हमारे ब्लॉग पर आजकल तक एक चवन्नी की कमाई नहीं हुई। उसमें विज्ञापन ही नहीं लगे हैं। फेसबुक पर अलबत्ता आज देखा तो 52 डॉलर की कमाई हुई है। मतलब आज के 4876.31 रुपए। फेसबुक से कमाई के जो तमाम फ़ंडे  बताये हैं लोगों ने लेकिन उनको अपनाने का धीरज और मन बन नहीं पाया। 

    अभी तक अपन फेसबुक पर ही पोस्ट लिखते थे । लेकिन अब ब्लॉग पर भी पोस्ट किया करेंगे। ब्लॉग पर कैटेगरी के हिसाब से पुरानी पोस्ट पढ़ना और खोजना ज़्यादा आसान है। लिंक लगाना भी ब्लॉग पर ज़्यादा सुगम है। फेसबुक पर आप किसी दूसरे प्लेटफार्म का लिंक लगाओ, फेसबुक नखरा करेगा। जबकि ब्लॉगर इस मामले में उदार है।  आप यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी भी साइट का कोई भी लिंक लगाओ ब्लॉग कभी नखरा नहीं करता। अलबत्ता फेसबुक पर मोबाइल से फोटो लगाना आसान है।ब्लॉग पर मोबाइल की फ़ोटो लगाने में अभी मसक्कत करनी होती है। कोई तरीका होगा जरूर। सीखेंगे। लगायेंगे। 

    ब्लॉगिंग के दिनों से अभी तक पाठक, प्रसंशक, पसंदीदा लेखक लगातार बदलते रहे हैं। कई लोग हैं जिनकी हर पोस्ट पढ़ने का मन करता है। उनमें से कुछ आलटाइम फ़ेवरिट हैं। कुछ लोगों का लिखा टाइप्ड लगने लगता है। मेरे लिखे पर भी लोगों की ऐसी ही कुछ धारणा होगी। मेरे पाठक भी बदलते रहे। कभी हर पोस्ट पर लाइक, टिप्पणी करने वाले कई, कई बार महीनों तक नहीं दिखते। 

    2004 में ब्लॉगिंग से शुरू करके अब तक मेरी दस किताबें आ गईं हैं। ब्लॉगिंग जब शुरू की थी तो ऐसा कोई इरादा नहीं था। लेकिन मजाक-मजाक में किताबें आती गईं। आने वाले समय में भी अगर आलस्य पर नियंत्रण रहा तो इस साल भी दो-तीन किताबें शायद आ जायें। 

    इस बीच कई बार पॉडकास्टिंग करने के भी विचार आया। अपना यूट्यूब चैनल नियमित करने की सोची। लेकिन एक तो अपनी आवाज और दूसरे तकनीकी लफड़े और तामझाम के चलते ऐसा हो नहीं सका। अच्छा ही हुआ शायद। 

     मेरे पाठक मित्रों की प्रतिक्रियाएं, रचनात्मक टिप्पणियां और सुझाव मेरे लेखन का प्राणतत्त्व हैं। इसके लिए मैं अपने पाठक मित्रों का शुक्रिया अदा करता हूँ। 

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    Tuesday, March 24, 2026

    शहीदों की प्रतिमाओं का अनादर


     आज सुबह पता चला कि कल शाहजहांपुर में शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान और ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमाओं को बुलडोजर से गिराकर कहीं डंपिंग ग्राउंड पर फेंक दिया गया।

    बिस्मिल, अशफ़ाक़ और रोशनसिंह को काकोरी कांड ( 09 अगस्त, 1925) में शामिल होने के कारण फाँसी हुई थी। तीनों शहीदों के शाहजहांपुर से जुड़े होने के कारण इस शहर को बलिदानी शहर कहा जाता है। शाहजहांपुर के वीर रस के कवि किसी भी मंच पर हों ये मुक्तक अवश्य पढ़ते थे :
    विश्व के संताप सब बोये गए है।
    धूल के कण रक्त से धोए गए हैं।
    पांव के बल मत चलो अपमान होगा।
    सर शहीदों के यहां बोये गए हैं।
    बिस्मिल और अशफ़ाक़ का अटूट और अनूठा रिश्ता सांप्रदायिक सद्भाव का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह सांप्रदायिक सद्भाव शाहजहांपुर की खासियत रही है। 1992 में बाबरी मस्जिद कांड के बाद लगभग पूरा उत्तर भारत दंगों की चपेट में था। ऐसे समय में शाहजहापुर उन कुछ शहरों में था जहाँ कोई दंगा नहीं हुआ था। यह शायद बिस्मिल-अशफ़ाक़ की साझी सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत के कारण संभव हुआ।
    शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान के बीच का सांप्रदायिक सद्भाव का अटूट भी उन लोगों को अखरता था जिनकी राजनीति की दुकान ही सांप्रदायिक वैमनस्य की जमीन पर चलती है।
    शहर के लगभग केंद्रीय स्थल पर स्थित शहीदों की ये प्रतिमाएं शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल थीं। बाहर से आने वाला कोई भी शहर आता तो इन प्रतिमाओं को जरूर देखने आता। माल्यार्पण करता। इन प्रतिमाओं से कुछ दूरी पर ही खिरनी बाग में बिस्मिल का घर है। थोड़ी दूर पर स्टेशन के पास अशफाक उल्ला की मजार है। देश के लिए क़ुर्बान हो जाने वाले शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से गिराकर मलवे में फेंक देना वाला समाज कृतघ्न, मानसिक रूप से दिवालिया और अपराधी मनोवृत्ति का ही कहा जाएगा।
    कल भगतसिंह के जन्मदिन मौके पर रात के अंधेरे में चोरों की तरह शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से ढहाकर मलवे में फेंक दिए जाने के बाद जिम्मेदारी के नाम पर लीपापोती हो रही है।
    महापौर अर्चना वर्मा ने कहा कि जिन शहीदों ने देश को आजादी दिलाई, उनके साथ इस तरह का व्यवहार बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने इसे ‘माफी के लायक नहीं’ बताया। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें पहले जानकारी दी जाती, तो वे पूरी टीम के साथ मौके पर मौजूद रहतीं और प्रतिमाओं को सम्मानपूर्वक हटवाया जाता। शाहजहांपुर को शहीदों की नगरी बताते हुए उन्होंने इस घटना को ‘हृदय विदारक’ बताया।
    जानकारी हुई कि ये प्रतिमाएँ शहर के किसी सुंदरीकरण अभियान के प्रोजक्ट के तहत गिराईं गईं। इन मूर्तियों के कारण जाम लगता था इसलिए इनको पीछे हटाना प्रस्तावित था। नई मूर्तियाँ लगनी थीं। शहीदों की मूर्तियां शहर की सुंदरता बाधक थीं। शहीदों की मूर्तियां अतिक्रमण की तरह हटा दिन गईं। महापौर को पता नहीं चला। पता नहीं कौन गिरा गया ये मूर्तियां। एफआईआर होने की बात हो रही है। जांच होगी। जांच के बाद शायद ठेकेदार के यहां दिहाड़ी पर काम करने वाला कोई बुलडोजर ड्राइवर बर्खास्त कर दिया जाए।
    जहाँ इन शहीदों की मूर्तियां लगीं थीं उससे डेढ़-दो सौ मीटर दूर सदर थाना है। उनको भी पता नहीं चला और बुलडोजर चल गया। स्थानीय लोगों ने नगर निगम पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने अब तक माफियाओं के घरों पर बुलडोजर चलते देखा था, लेकिन शाहजहांपुर में शहीदों की प्रतिमाओं पर बुलडोजर चला दिया गया।
    काकोरी कांड से जुड़े इन शहीदों का दुनिया भर के शहीदों में प्रमुख स्थान हैं। यहाँ लगी प्रतिमाएं इन शहीदों की सबसे प्रमुख प्रतिमाएं थीं। ऐसा कैसे हुआ कि इन पर बुलडोजर चल गया और किसी को पता भी नहीं चला।
    उत्तर प्रदेश की सरकार के वरिष्ठ मंत्री शाहजहांपुर के विकास पुरुष के रूप में जाने जाने वाले माननीय महोदय को भी इस बारे में पता नहीं चला, ताज्जुब है। शहर के हर गली, मोहल्ले, सड़क, पुलिया, सेल्फी प्वाइंट, सार्वजनिक शौचालय के उद्घाटन, लोकार्पण, पुनर्निर्माण पर पत्थर पर माननीय का नाम है। हाल के वर्षों में शायद ऐसी कोई ट्रेन नहीं चली जिसको प्रधानमंत्री जी ने झंडी न दी हो। इसी तर्ज पिछले कुछ वर्षों में शाहजहांपुर में ऐसा कोई निर्माण नहीं हुआ जिस पर माननीय मंत्री जी का नाम न हो।
    हो सकता है कि इन मूर्तियों को भी इस लिए ढहा दिया गया हो ताकि बाद में उनके उद्घाटन पर वर्तमान सरकार के लोगों के नाम होंगे। शहीदों से इस तरह नजदीकी जुड़ाव हो सकेगा।
    शहीद पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल के चरित्र से प्रभावित होकर तुर्की के तत्कालीन शासक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की के एक शहर का नाम बिस्मिल के नाम पर रखा है। जिन बिस्मिल के नाम पर करीब सवा लाख की आबादी वाला बसा है उस शहर का क्षेत्रफल 1679 वर्ग किलोमीटर है। तुर्की में जिन बिस्मिल के नाम पर 1679 वर्ग किलोमीटर जमीन है उन्हीं बिस्मिल की मूर्ति को उनके अपने शहर में कुछ वर्ग फिट की ज़मीन मयस्सर नहीं। उनकी मूर्तियां अतिक्रमण की तरह बुलडोजर से ढहा दी जाती हैं।
    नगर आयुक्त के बयान के अनुसार मूर्तियो के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या होती थी इसलिए मूर्तियाँ हटाई जानी थीं। शाहजहांपुर शहर की दो प्रमुख सड़कें संकरी हैं। उनके दोनों तरफ़ आबादी और दुकान के कारण लगभग रोज जाम लगता है। मूर्तियों के हटाने से जाम की समस्या खत्म नहीं होगी। यह एक बहुत लचर बहाना है।
    आज के समय दुनिया में बड़ी-बड़ी बहुमंजिला इमारतें पूरी की पूरी स्थानांतरित करने की तकनीक मौजूद हैं। ऐसे समय में देश के शहीदों की प्रतिमाएं सौंदर्यीकरण के नाम पर ढहा देना शर्मनाक है।
    जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' की पंक्तियां हैं :
    शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले।
    वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा॥
    सौंदर्यीकरण के बाद शायद प्रतिमाओं की जगह कोई सुंदर बाज़ार बने, दुकाने खुलें तब हितैषी जी की पंक्तियां नए रूप में चरितार्थ होंगी। बाजार में रोज़ रौनक होगी। रोज़ लोगों के रेले-मेले लगेंगे।
    पिछले वर्ष काकोरी एक्शन के सौ वर्ष पूरे होने पर देश भर में तमाम आयोजन हुए। शहीदों के बलिदान को याद करते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया गया। शहीदों को उनके क्रांतिकारी कृत्यों के लिए अंग्रेज़ सरकार ने फाँसी की सजा दी थी। अग्रेजों ने तो मुकदमा चलाया था, बहस का मौक़ा दिया था क्रान्तिकारियों को। लेकिन क्रान्तिकारियों की मूर्तियो को बिना कोई मौक़ा दिये, बिना किसी बहस के, बिना कोई बचाव का मौक़ा दिए , बिना नगर निगम की महापौर के , बिना माननीय मंत्री, महापौर की जानकारी ढहा दिया गया।
    बीते सौ साल में समाज कितना क्रूर हो गया है।
    बिस्मिल , अशफ़ाक़ और रोशनसिंह को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनकी मूर्तियां के साथ उनके जाहिल वंशजों ने क्या सलूक किया। वे अपनी मूर्तियों की स्थापना के लिए फाँसी पर नहीं चढ़े थे। फ़र्क़ जिन लोगों को पड़ता है वे जरूर सोचेंगे कि कोई समाज अपने देश के बलिदानी शहीदों के सम्मान के प्रति इतना ग़ैरजिम्मेदार , बेपरवाह, उदासीन कैसे हो सकता है कि उनकी प्रतिमाएँ अतिक्रमण की तरह रात के अंधेरे में ढहा दी जाएँ और ज़िम्मेदार लोग बयान दें कि उनकी जानकारी के बिना यह काम हो गया।https://www.facebook.com/share/p/1GQBggVbdh/

    शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाक उल्ला ख़ान और ठाकुर रोशन सिंह की मूर्तियां जो अब ढहा दी गई हैं। 👇 शहीदों की टूटी, विखंडित मूर्तियां, जमींदोज मूर्तियों की फोटुएँ नेट पर मौजूद हैं। उनको लगाने की हिम्मत नहीं है मेरी। मेरी यादों में यही मूर्तियां रहेंगी।