Friday, June 12, 2026

तैराकी सीखने का बाहरवाँ दिन


कल रात सोते समय डायना नायड की आटोबायोग्राफी का यह अंश पढ़ा :

My (swim) suit is hanging on a hook next to the robe. The surreal feeling is coming on. i am ultra-aware of the milecules of oxygen traveling with each long sip of air to the bottom of the solar plexes , then the corban dioxide inching back up towards my lips.

मेरा (स्विम) सूट कपड़ों के बगल में हुक पर टंगा है। एक अजीब सा एहसास हो रहा है। मुझे हवा के हर लंबे घूंट के साथ ऑक्सीजन के मॉलिक्यूल्स के सोलर प्लेक्सस (पेट के ऊपरी हिस्से) तक जाने और फिर कार्बन डाइऑक्साइड के धीरे-धीरे वापस मेरे होंठों तक आने का पूरा एहसास हो रहा है।

यह मन:स्थिति डायना नायड की क्यूबा से फ्लोरिडा तैराकी के अभियान में तीसरी बार तैरने के लिए जाते समय की है। इसके पहले दो बार वे असफल हो चुकी थीं। तीसरी बार की तैराकी में उनके साथ असफलता का अनुभव और सफल होने का जज्बा था।

अपन भी रोज तैरते हुए सोचते हैं कि आज पक्का पानी में साँस लेना सीख जाएँगे। अभी आधी अधूरी सफलता मिली है। सारे स्टेप्स याद हो गए हैं लेकिन अमल में लाते समय भूल जाते हैं।

वैसे डायना नायड का जिक्र करने के पीछे की मंशा यह समझना और जताना भी है हमारा अभी तक पानी में सांस लेने में असफल होना और डायना नायड का क्यूबा से फ्लोरिडा तैरने में दो बार असफल होना एक जैसा है। लेकिन यह बात उसी तरह की है जिसमें राजनीतिक पार्टी अपने भ्रष्टाचार, अपराध और कमीनगियाँ पहले की पार्टी के भ्रष्टाचार, अपराध और चिरकुटैयों का जिक्र करके जस्टिफ़ाई करती हैं। पानी में जरा सा हाथ पांव मारने लेने से कोई डायना नायड नहीं हो जाता।

तुलना संपूर्णता में ही ठीक लगती है। आधी-अधूरी तुलना भुलावे के सिवा और कुछ नहीं।

ब्रेस्ट स्ट्रोक में तैरते हुए साँस लेने का फ़ंडा बताते हुए कोच ने सिखाया -'पानी को नीचे धकियाओ। पानी बदले में आपको ऊपर धकेलेगा। ऊपर आते से पहलें नाक से सांस छोड़िए। उससे भी ऊपर आने का पुश मिलेगा। साँस पूरी मत छोड़िये। 60-70 % छोड़िए। ऊपर आते समय मुँह खोलकर साँस ले लीजिए। फिर इसी को दोहराइये।

तैरना भी एक प्रोजेक्ट है। साँस चोरी का अभियान। चोरी करने वाला तो एक होता है लेकिन उसके सहयोगी कई होते हैं। कोई इशारा करता है -'शिकार आ रहा है।' कोई बताता है -'नज़दीक आ गया शिकार।' कोई झपट्टा मारने का इशारा करता है। झपट्टा मारने के बाद कोई बाइक स्टार्ट किए हुए तैयार रहता है। उस पर बैठकर चोर लोग माल पार करके फूट लेते हैं। लूटा हुआ ग्राहक लिखाता रहे FIR.

अपन भी तैरते हुए डायना नायड की तरह आने वाली साँस, जाने वाली साँस का हिसाब रखकर तैरते रहे। हाथ से पानी नीचे करके ऊपर आते लेकिन जैसे ही मुँह ऊपर करते, पाँव छपछपाना छोड़कर हमारा साँस लेना देखने लगे। हाथ का भी ध्यान साँस लेने की तरफ़ हो जाता। हाथ और पैर के जिम्मे पानी में संतुलन बनाने का काम है। लेकिन साँस तैरते समय सांस लेने के समय दोनों अपना काम छोड़कर तमाशबीन बन जाते हैं। संतुलन गड़बड़ा जाता। हम बाक़ी की साँस भी पानी में छोड़कर वहीं खड़े हो जाते।

पानी में तैरते हुए लगा कि काश हम भो मछली की तरह गाल से साँस लेना जानते होते तो आराम से तैरते। लेकिन फिर हमको लगता कि अगर ऐसा होता तो न जाने कब कोई बड़ी मछली हमको खा गई होती। हम किसी जाल में फँसकर किसी फ्राई पैन में तले जा चुके होते। बुद्धिनाथ मिश्र जी का गीत है न :

'एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।'

गीत सुनने में भले मोहक है लेकिन किसी मछली में ख़ुद बंधन में फँसने की चाह नहीं होती। चारे के लालच में भले वे जाल में फँस जाएँ लेकिन अगर उनको पता होता कि इसमें बंधन है तो वे शायद चारा न खाती।

मछलियों और इंसानों में यही फ़र्क़ होता है। मछलियाँ अनजाने में फँसती हैं। इंसान जानबूझकर लालच में फँसता है। उसको बंधन में मजा आता है। दुनिया भर के लोग नौकरी करते हुए जिंदगी गुजारते हैं, मन के ख़िलाफ़ समझौता करते हुए जीते हैं। राजनीति में नेता अपने विरोधी दल में शामिल होने में बेशर्म होकर शामिल हो जाते हैं।

आज तैरते हुए यह भी एहसास हुआ कि साँस जल्दी फूल जाती है। स्टैमिना बढ़ाना है। साइकिलिंग और वाकिंग का अभ्यास करना है। दौड़ने की बात लिखने में खतरा है कि Satish Saxena जी अपनी पार्टी ज्वाइन करा लेंगे।

लौटते हुए तिराहे पर देखा। कल जली हुई कार आज उठ गई थी। जहाँ कार जली हुई थी वहाँ सड़क भी सुलगी हुई थी। कार के टायर का कुछ हिस्सा अभी भी सड़क पर चिपका हुआ था। टायर और कार की तारीफ़ करते लोग कहते हैं -'गाड़ी चपक के चलती है।' लगता है जली हुई कार के टायर ने यह बात दिल पर ले ली। उसका निचला हिस्सा अभी भी सड़क से चिपका हुआ है। कार चली गई लेकिन टायर अभी सड़क से चिपका हुआ है।

आज हमारा तैराकी सीखने का बाहरवाँ दिन था। 

Thursday, June 11, 2026

तिराहे पर कार

तिराहे पर जली खड़ी कार 

 आज सुबह तैराकी के लिए जाते हुए तिराहे पर एक कार दिखी। पूरी जली हुई। गाड़ी क्या, गाड़ी का कंकाल था। कोई पास नहीं था उसके। एकदम सन्नाटे में खड़ी थी कार। ऐसे जैसे किसी से गुस्सा होकर कार ने अपने सारे कपड़े उतार दिए हों। हर खिड़की टूटी। हर अंग खुला। 

सुबह स्वीमिंग के लिए जल्दी थी इसलिए चले गए। सोचा लौटकर देखेंगे। 

लौटकर कार के पास गए। एकदम तिराहे पर खड़ी थी कार। आसपास के लोगों से पूछा। एक ने बताया -'पता नहीं, लोग बता रहे हैं रात में जली।' दूसरे ने बताया -'रात बारह बजे आग लग गई कार में। पता नहीं कैसे? एक आदमी तीन महिलायें थीं। सब बाहर आ गए थे। बच गए।' 

कार के अंदर झांककर देखा सारे अंजर-पंजर जले हुए थे। टायर के जले धागे दिख रहे थे। पीछे से देखा मारुति सुजुकी थी कार। सिलेंडर रखा था डिक्की में। हमें लगा शायद सीएनजी सिलेंडर से आग लगी हो। हमने यह अनुमान लगाया। लेकिन हमारे अनुमान को बगल में खड़े आदमी ने ख़ारिज कर दिया। कहते हुए -'सिलिंडर से आग लगी होती तो ब्लास्ट हो जाता सिलेंडर। सिलिंडर एकदम सुरक्षित है। आग इंजन में लगी । उसी से जली है कार। गनीमत है लोग बच गए।' 

जली कार के अंदर जले/अधजले आम 

एक और न कन्फ़र्म किया -' एक आदमी कार चला रहा था। आधा बुजुर्ग था। 40-45 की उमर का। दो औरतें थी। एक बच्ची। अचानक कार में आग लग गई। सब लोग नीचे उतर गए। बच गए। पुलिस आई थी। पूछताछ कर रही थी। 2013 की कार है। शायद इंश्योरेंस नहीं था। रहा होगा तो काग़ज़ नहीं थे।' 

अंदाजा लगाया लोगों ने कि इंजन गर्म हो गया होगा। कूलेंट/लुब्रिकेंट नहीं रहा होगा। हीट हो गई कार। सुलग गई। जिस जगह जली थी कार उस जगह सड़क भी धंस गई थी।

कार के पीछे का हिस्सा। सीएनजी का सिलिंडर दिख रहा है। 

कार के फर्श पर खूब सारे आम बिखरे थे। कम से कम दो बोरी रहे होंगे। छोटे-बड़े आम। कुछ जले हुए, कुछ अधजले। उनकी ख़ुशबू फ़िज़ा में  जरूर पसरी होगी। जले हुए बेचारे कार में असहाय पड़े हुए थे। कार जली न होती तो किसी के घर काट कर खाये जाते। शाम तक कार ऐसे ही खड़ी रही तिराहे पर। अभी भी खड़ी है। उधर से गुजरने वाले आते-जाते कार के बारे में ज़रूर पूछते दिखते हैं। 

कार के जलने का कारण पक्का पता नहीं लेकिन अंदाज़ यही है कि उसकी ठंडा करने की व्यवस्था गड़बड़ा गई होगी। ऑटोमैटिक कारों में तो अलार्म बजते हैं, गाड़ी बताती है कि ये गड़बड़, वो गड़बड़। लेकिन पुराने जमाने की कारें बिना बताये खड़ी हो जाती हैं। जल जाती हैं। उनकी सेहत के बारे में जानकारी के लिए समय-समय पर कार-डॉक्टर से चेकअप कराते रहना चाहिए। पता नहीं कब कार सुलग जाये। 

गर्मी भयंकर पड़ रही है। इंसान भी कार की तरह ही है। गर्मी से बचाकर रहना चाहिए। अपना कूलेंट/लुब्रीकेंट चेक करते रहना। 

तैराकी सीखने का ग्यारहवां दिन

 



आज सुबह समय पर पहुँचे स्वीमिंग पूल। ठीक आठ बजे। पानी में उतरकर तैरना शुरू किया। तैराकी EV वाहन की तरह हो रही है। इलेक्ट्रिक गाड़ियां उतनी ही चलती हैं जितनी चार्ज होती हैं। चार्ज होने के बाद खड़ी हो जाती हैं। जहाँ तक साँस रहती, वहाँ तक तैरते। इसके बाद सांस छोड़कर ऊपर आ जाते। दुबारा साँस भरते। तैरते। ऐसा कई बार किया।

कोच से पूछा तो उसने बताया -'ऐसे ही करिए। हो जाएगा।'

 उसके समझाने के तरीके से मुझे गोरख पांडेय की कविता याद आ गई :

"समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई"

मतलब हड़बड़ाना नहीं है। तैराकी आई बबुआ, धीरे-धीरे आई। 

कोच ने समझाया -'आपका पीछे का वजन ज्यादा है। पैर जल्दी-जल्दी चलाइये। बैक स्ट्रोक लेते समय पानी को नीचे धकेलिये। ऊपर आते समय सांस ले लीजिए। मतलब न्यूटन बाबा का क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम स्वीमिंग पूल में भी लागू है। कोच ने जब पीछे का वजन ज़्यादा होने वाली बात कहीं तो लगा वहीं छाँट देते थोड़ा वजन। लिखने वाली कलम की तरह छील देते चाकू दे नीचे का भारीपन। लेकिन ऐसा होता कहाँ है?

सबेरे कई वीडियो देखकर गए थे। थ्योरी एकदम पक्की करके गए थे। लेकिन प्रैक्टिकल में हुआ नहीं। कई बार की कोशिश के बाद सर ऊपर आना शुरू हुआ। लेकिन मुँह से साँस लेते ही फिर गड़बड़ा जाते। फिर कोशिश करते । फिर लड़खड़ाते। हमारे हाल उस गाड़ी जैसे हो गए जैसे जीपीएस में गाड़ी लोकेशन के आसपास टहलती रहती है लेकिन मंजिल पर पहुँच नहीं पाती। 

वीडियो में यह भी बताया गया था कि बैक स्ट्रोक में सांस लेने टाइमिंग का मसला है। एकदम सर्जिकल स्ट्राइक टाइप। पानी को नीचे धकियाओ। बदले में पानी ऊपर को धकियाये , सर ऊपर आए, उसी समय साँस ले लो। चुके तो फिर मुंडी पानी के अंदर। कई बार कोशिश करने पर सर तो ऊपर आ गया लेकिन साँस लेने से पहले फिर पानी के अंदर।

साँस लेने के पहले सर पानी के अंदर हो जाने का कारण ऊपर आते समय पैर ठहर जाना लगा। जैसे कोई घटना होने पर सड़क पर खड़े लोग सहायता करने की बजाय वीडियो बनाने  लगते हैं। फोट खींचने लगते हैं। उसी तरह सर ऊपर आते समय पाँव ठहरकर सर का मूवमेंट देखने लगते। सर और पांव का तालमेल इंडिया गंठबंधन के चुनाव के समय एक्शन की तरह हो जाता। तालमेल के अभाव में पानी पूल का पानी शरीर के साथ खेल कर जाता। 

देखते-देखते आज भी घंटा पूरा हो गया। सीटी बज गई। पूल के बाहर आने का संकेत हो गया। हम भी पूल के बाहर आ गए। बाहर आकर गाड़ी स्टार्ट करके घर आ गए। 

घर आकर DIANA NYAD की ऑटोबायोग्राफी Find a Way निकालकर पढ़ना शुरू किया। करीब 300 पेज की किताब है। ऐसा लगता है कि किताब पूरी होने तक तैरना सीख जायेंगे। सोचने में क्या हर्ज है। 

सोचने को बड़े लोग देश को अगले 20 साल में ठेल-ठाल कर विकसित बनाने हल्ला मचाए हुए हैं। भले ही देश की अर्थव्यवस्था दिन पर दिन गड़बड़ा रही है, रुपया डब रहा है, देश के स्मार्ट शहरों में पीने का पानी नहीं है, सीवर लाइन, पानी के लाइन के साथ बचपन की सहेलियों की तरह गलबहियाँ करते हुए साथ बह रही हैं।

आज हमारी तैराकी सीखने का ग्याहरवाँ दिन था। 



Monday, June 08, 2026

तैराकी का नवाँ दिन



आज सुबह स्वीमिंग पूल के निकलते समय कूड़ा गाड़ी आ गई। गाना  बज रहा था :

सुन लो भैया, सुन लो भाभी, सुन लो अम्मा जी,

कचरे वाली गाड़ी में सब कचरा  डालो जी।

यहाँ न फेंको, वहाँ न फेको, पास न डालो जी, 

कचरे वाली गाड़ी में सब कचरा  डालो जी।

कचरे वाला डब्बा हम सुबह ही बाहर ही रख चुके थे। चाय बनाते समय। कूड़ा गाड़ी का ड्राइवर आसाम का है। कुछ दिन पहले वोट देने गया था आसाम। उन दिनों कोई दूसरा लड़का आता था गाड़ी के साथ। पता ही नहीं चलता कभी-कभी। असमिया बालक भूल जाने पर घंटी बजाकर कूड़ा ले जाता है। मिलने पर हाल-चाल हो जाते हैं।

निकलते हुए आठ बजने में एक मिनट बाकी था। स्पीड से गाड़ी भगाई। आगे दो कूड़ा गाड़ियाँ आ गईं। पीछे वाली गाड़ी शायद ख़राब थी। आगे वाली उसको घसीट रही थी।  देखकर लगा -'कूड़ा, कूड़े को खींचता है। दोनों गाड़ियों में गीला कूड़ा, सूखा कूड़ा लिखे डब्बे थे। हमने कूड़ा गाड़ियों को ओवरटेक करते हुए आगे निकलना चाहा। सामने से ऑटो आ गया। हम औकात में आ गए। फिर से कूड़ा गाड़ी के पीछे चलने। तब तक चलते रहे जब तक कूड़ा गाड़ी और हमारे रास्ते अलग नहीं हो गए। कूड़ा गाड़ियां सीधे चली गईं। हम बायें मुड़ गए।

स्वीमिंग पूल पाँच मिनट लेट पहुँचे। शॉवर लेकर पूल में उतरे। पहले रॉड पकड़ कर फ्लोटिंग का अभ्यास किया। फिर किनारे ही सर पानी में डालकर और ऊपर करके साँस लेने का अभ्यास किया। दस बार। इसके बाद पानी में तैरने का अभ्यास। अब नम्बर तैरते हुए साँस लेने का अभ्यास करना था। कई बार कोशिश की। हर बार संतुलन गड़बड़ा जाता। जैसे ही साँस छोड़कर मुँह ऊपर करने को कोशिश करते, हाथ और पांव इधर-उधर हो जाते। हाथ चलते तो पैर ठहर जाते। पाँव चलते तो हाथ थम जाते। एकाध बार लगता अब हो जाएगा। लेकिन फिर गड़बड़ा जाता। 

साथ में चलते कोच से पूछा। उसने बताया कि आप हाथ बैक स्ट्रोक की तरह चला रहे हैं, पाँव सीधे-सीधे। ऊपर -नीचे। दोनों में तालमेल का अभाव है। पाँव भी बैक स्ट्रोक की तरह चलाइये, मेढक की तरह। पानी को नीचे धकेलते हुए। जब सांस छोड़ें तब पानी नीचे धकेलें। सर ऊपर आयेगा। उस समय साँस ले लजिये। हो जाएगा।  

उसकी बातचीत से लगा कि हम मिश्रित अर्थव्यवस्था की तरह तैरना सीख रहे हैं । हाथ और पांव में तकलीफ़ के कारण  यह तय हुआ था। ऊपर से दूसरे कोच ने बताया -'सर के  पांव में तकलीफ़ हैं। इसलिए मिक्स तरीके से सीख रहे हैं।' 

साथ वाले ने कहा -'फिर वैसे ही करिए।' 

हम वैसे ही करने लगे। जितने कोच उतने सिखाने के तरीक़े। हर कोच अपने तरीके से बताता है। हम उसकी तरह सीखने की कोशिश करते हैं। 

कोच के बताने के बाद थोड़ी देर अभ्यास किया। लगा आज ही सीख जायेंगे पानी में साँस लेना। दो-तीन बार कोशिश की। हो नहीं पाया। और कोशिश करते तब तक सीटी बज गई । पूल से निकलने का समय हो गया। हम थोड़ी देर और तैरते रहे। इसके बाद बाहर निकल आए। कोच से बात की तो उसने कहा -'सीख जायेंगे। बच्चे जल्दी सीख जाते हैं। आपकी एज भी है।' 

हमने सोचा -'सीख तो जायेंगे ही। समय भले लगे।'  

पूल में तैरते समय लगा कि तैरने में साँस संरक्षण का नियम चलता है। जितनी साँस बचाकर रखेंगे उतना अच्छा तैरेंगे। साँस कंजूसी बहुत अहम है तैराकी में। 

कल स्वीमिंग पूल बंद है। अब अगली तैराकी परसों होगी। वुधवार को सीखेंगे। 

आज तैराकी सीखने का नवां दिन था। 


गहनू नेता से मुलाकात

 

गहनू नेता 



एक दिन स्वीमिंग पूल से लौटते हुए गहनू मिले। गहनू नहीं, गहनू नेता। दूर से साइकिल पर झंडा और बोर्ड दिखा। पास आने पर झंडे पर कांग्रेस का चुनाव चिह्न दिखा। बोर्ड पर ऊपर अखिलेश यादव, राहुल गांधी की फ़ोटो। नीचे दायें कोने पर बाराबंकी के सांसद तनुज पुनिया के साथ गहनू नेता की फोटो। 

गहनू नेता को रोककर उनसे बातचीत की। पता चला कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी के समर्थक हैं। कांग्रेस का झंडा लगाए रहते हैं। बाराबंकी के सांसद तनुज पुनिया के संपर्क में हैं। किसानों की क़र्ज़ा माफ़ी, बिजली खाद की उपलब्धता उनकी माँग है। 

गहनू ने अपने नाम के आगे ख़ुद 'नेता' लिख रखा है। कोई  माने इससे पहले ख़ुद को बताना होगा 'नेता'। दुनिया माने न माने ख़ुद को 'विश्व गुरु' कहलाने का हल्ला मचवाना होगा। 

गहने ने बताया कि वे  हलवाई हैं। गड़ौरा (लखनऊ) की एक मिठाई की दुकान में काम करते हैं। दुकान का नाम बताया -'ब्रजभान लड्डू'। बर्फी, पेड़ा, लड्डू बनाने का काम करते हैं। किराए के कमरे में रहते हैं। 5000/- रुपए किराया। पत्नी भी काम करती हैं। लोगों के घर में साफ़ सफाई का काम। काम चल जाता है। 

हमने पूछा -'पुनिया जी , राहुल जी या अखिलेश जी तुमको कुछ पैसा भी देते हैं उनके प्रचार के लिए?' 

इस पर गहनू नेता ने बताया कि पैसा तो नहीं लेकिन कोई काम पड़ता है तो सहयोग कर देते हैं। एक पुलिस मामले में का उल्लेख करते हुए बताया कि तरुण पुनिया जी ने उनका सहयोग किया। उनकी बातचीत सुनते हुए लगा -'अपने यहाँ पुलिस मामले में निपटाने में नेताओं की सक्रिय भूमिका रहती है।'

गहनू नेता को अपनी दुकान जाना था। हमको घर। गहनू नेता ने हमको अपनी दुकान पर आने का निमंत्रण दिया है। मिठाई खिलाने का वादा किया। जाएँगे कभी।  गड़ौरा में 'ब्रजभान लड्डू' मिठाई की दुकान। 

गहनू नेता से मुलाक़ात एक  नागरिक चेतना संपन्न व्यक्ति से मुलाकात थी। 


Sunday, June 07, 2026

तैराकी का आठवाँ दिन

 

डायना नायड 

कल रात तैरना सीखने के कई वीडियो देखे। ऐसे पानी में उतरें। ऐसे हाथ चलायें। ऐसे पांव चलायें।  ब्रेस्ट स्ट्रोक ऐसे करें। पानी में साँस ऐसे लें। बिस्तर में बैठे-बैठे कुछ देर हाथ भी चलाये। पाँव भी। लेकिन बिस्तर में पानी तो था नहीं। हवा थी। हवा में अभ्यास हवा-हवाई ही होता है।

सुबह कार स्टार्ट करके निकले। मोड़ पर एक कार तेज़ी से हमारी तरफ़ आई। हम आहिस्ते से चला रहा थे। ब्रेक मारकर रुक गए। सामने वाला भी किनारे आ गया। हम भी तेज होते तो मामला नजदीकी हो जाता। 

पूल में पहुँचकर शॉवर लिया। हम समझते थे कि शॉवर लेने का कारण गंदगी, पसीना अलग करना होता है। कल एक यू ट्यूबर ने बताया -'शॉवर लेने से शरीर पूल के तापमान के बराबर हो जाता है। न लेने पर तबीयत बिगड़ जाती है।'   

आज तैरते हुए साँस लेने का अभ्यास किया। हुआ नहीं ठीक से। जब पास की साँस ख़त्म करके मुँह ऊपर करते, लड़खड़ा जाते। हाथ अलग, पाँव अलग। हाथ और पैर में तालमेल खत्म हो जाता। गनीमत हर बार यह रही कि घबड़ाये नहीं। जहाँ साँस उखड़ती वहीं साँस छोड़कर खड़े हो जाते। पानी के अंदर सांस लेने की कोशिश नहीं की। करते तो पानी नाक और फेफड़े में घुस जाता। खांसते अलग। 

कोच को बताया तो उसने कहा -'आप अच्छा तैर रहे हैं। छोटी -छोटी साँस लीजिए। सर  ऊपर करने के लिए पानी को नीचे धकेलिये। सर ऊपर आयेगा तब मुँह से साँस ले लीजिए। तैरिए। 

हमने पूल किनारे की रेलिंग पकड़कर पाँव चलाए। सर अंदर करके पाँव चलाते हुए साँस छोड़ते हुए सर ऊपर किया। साँस ली। फिर सर अंदर किया। फिर साँस छोड़ी। फिर ली। कई बार अभ्यास किया। लेकिन जब तैरने लगे तो सर ऊपर करते समय फिर लड़खड़ा गए। 

 तैरते हुए साँस लेना सीखना सबसे जरूरी है तैराकी के लिए। लंबी दूरी के जहाज में हवा में ही ईंधन भरने की व्यवस्था होती है। उसी तरह पानी में  तैरते हुए साँस लेना सीखना है। कई बार कोशिश के बावजूद आज सीख नहीं पाये। कोच ने कहा -'सीख जायेंगे।' हमने कहा -'सीखना तो है ही। सीख तो जायेंगे ही। समय लगेगा बस।'

पूल में तैरते लोगों में बच्चे, बुजुर्ग, महिलायें, पुरुष सब शामिल थे। अधिकतर लोग कम गहराई वाले जोन में तैर रहे थे। एक-दूसरे से भिड़ते-टकराते, आगे-पीछे होते। पूल का माहौल किसी बाजार सरीखा था। कोई इधर से आ रहा है, कोई उधर से। कोई बगल से कूद रहा है कोई सामान से मिसाइल की तरह तैरता आ रहा है। उसी में सब सीख रहे हैं।

कोच ने कहा -'कल आपको डीप में ले चलेंगे।' हमने कहा -'हम जब तक सीख नहीं जाएँगे तब तक कहीं नहीं जाएँगे।' डीप में तब जाएँगे तब किनारे एकदम परफेक्ट हो जायेंगे। तुम्हारे साथ नहीं जाएँगे। अपने साथ तुमको ले जाएँगे।'

एक बच्चा सीखने आया था। माँ -बाप साथ में। घर जाते समय पिनपिना रहा था -'यहाँ न कोल्ड ड्रिंक है , न कोई पॉप कार्न।' शायद उसको इन चीजों की आदत हो गई है। 

तैरते हुए कब घंटा बीट गया पता ही नहीं चला। सीटी बज गई। बाहर निकाल दिए गए। हम पूल से निकलकर बाहर आए। शॉवर लिया। कपड़े पहने। अपना कार्ड समेटकर  बाहर आ गए। 

देखते हैं कल सीख पाते हैं तैरते हुए साँस लेना या एक दिन और लगेगा। 

फोटो प्रख्यात तैराक डायना नायड की। डायना नायड ने  क्यूबा से फ्लोरिडा  की  110 मील की दूरी (प्रख्यात इंग्लिश चैनल से पाँच गुनी दूरी)  को तैर कर पार करने के  अपने बचपन के सपने  पूरा करने के लिए साठ साल की उम्र में दुबारा तैराकी शुरू की। चार बार असफल रहीं । आख़िर में 64 साल की उम्र में डायना नायड ने यह दूरी तैरकर पार की। ऐसा करने वाली वे दुनिया की अकेली शख़्सियत हैं। पिछले साल 76  वर्ष की उम्र में वाशिंगटन पोस्ट अख़बार को दिए एक साक्षात्कार में कहा -"मैं बस इतना जानती हूं कि हर मिनट, चाहे आपकी उम्र कुछ भी हो, वह कीमती है। मैं बस इसके हर पल को थाम लेना चाहती हूँ।"






108 एंबुलेंस के बहाने


 कल घर लौटते समय एक जगह भीड़ देखी। तमाम नौजवान हाथ में कागज लिए दिखे। कुछ लिखते हुए भी। हमें लगा कि किसी शायद कोई इम्तहान होगा। बच्चे  शायद इम्तहानी हैं। रुककर पूछा तो पता चला क़िस्सा अलग है। मालूम पड़ा ये उत्तर प्रदेश की 108 एंबुलेंस सेवा के ड्राइवर हैं। पिछले ठेके में काम करते थे। नया ठेका हुआ तो सबको निकाल दिया गया। फिर  कर्मचारियों की कमी के कारण (जैसा ड्राइवरों ने बताया) पुराने लोगों  को बहाल किया जा रहा है। उसी बहाली के लिए ड्राइवर लोग जमा थे। 

करीब दो सौ मीटर की दूरी पर सड़क किनारे ड्राइवर ही ड्राइवर थे। उनके हाथ में सेवा में HR महोदय, EMRI ग्रीन हेल्थ सर्विसेज लिखे फार्म थे। लोग ख़ुद को सेवा में बहाली के लिए, तबादले के लिए प्रार्थनापत्र लिख रहे थे। कोई कासगंज से आया था, कोई मुरादाबाद से, कोई फतेहगढ़ से। कोई रात में आया तो कोई एक दिन पहले। कुछ कल ही आए थे। कोई स्टेशन पर रुका, कोई फुटपाथ पर, कोई कहीं और।

एंबुलेंस सेवा में कंपनिया पीपीपी मॉडल पर कम करती हैं। ठेका बदलने पर पुराने लोगों को निकाल देना आम बात है। इसमें सरकार का कानूनन प्रत्यक्षत: कोई हस्तक्षेप नहीं होता।  हल्ला होने पर कुछ लोगों को ले लिया जाता है। निकाले जानेका मुख्य कारण पैसे लेकर नए लोगों को भर्ती कर लेना होता है। कुछ में कम पैसे पर भी रखा जाता है।

 ड्राइवर को लिखा-पढ़ी में सरकार द्वारा नियत न्यूनतम वेतन ही दिया जाता है। लेकिन असल में ऐसा होता  नहीं है। ड्राइवरों को उनकी उपस्थिति के अनुसार 12000 से 17000 प्रतिमाह भुगतान होता है। उनके खाते में 17000 हज़ार रुपये भुगतान होते हैं। लेकिन तरह-तरह से उनसे 4000 -5000 हज़ार वापस ले लिए जाते हैं। ठेकेदार इसके लिए अलग-अलग तरकीबें अपनाते हैं। जो ड्राइवर पैसा देने से मना करते हैं उनको निकाल दिया जाता है। इसमें कोई कुछ नहीं कर पाता। नियोक्ता किसी-किसी मामले कुछ हस्तक्षेप करते हैं लेकिन अधिकतर मामलों ऐसा ही होता। चार-पाँच हज़ार मजदूरों से वापस ले ही लिया जाता है।

श्रमिक सेवाओं में ठेकेदारों द्वारा यह शोषण  पूरे देश भर में आम है।अमूमन  सभी संस्थानों में ऐसा होता है। जानकारी के बावजूद कोई कुछ नहीं कर पाता। कानूनन सेवा प्रदाता कंपनी को अपने कामगार रखने, निकालने का अधिकार होता है। 

EMRI ग्रीन हेल्थ सर्विसेज   भारत की सबसे बड़ी ग़ैर -लाभकारी पेशेवर आपातकालीन सेवा प्रदाता संस्था हैयह एक गैर-लाभकारी संगठन (ट्रस्ट/सोसाइटी) है। डॉ. जी.वी.के. रेड्डी (Dr. GVK Reddy) इस संस्था के चेयरमैन हैं। वह प्रसिद्ध व्यापारिक समूह 'जीवीके' (GVK) के भी संस्थापक और अध्यक्ष हैं, जिसने वर्ष 2009 में इस संस्था का अधिग्रहण किया था। 

ग़ैरलाभ संस्था होने के बावजूद इसके संचालन में ड्राइवरों से वसूली और उनका  शोषण आम बात है। कई बार 12 घंटे की जगह 24 घंटे की ड्यूटी हो जाती है। ड्राइवरों छुट्टी नहीं मिलती। अचानक निकाल दिया जाता है। निकाले गए ड्राइवर की जगह दूसरे ड्राईअवर कम पैसे में, ज्यादा शुरुआती पैसा लेकर ड्राइवर रख लिए जाते हैं। एक निकालो हज़ार मिलते है । कागजों पर पैसा पूरा मिलता है लेकिन वास्तव में कहानी अलग होती है। 

कल एक ड्राइवर ने बताया कि नई भर्ती में एक ड्राइवर से 50 हज़ार रुपये मांगे जा रहे हैं। पचास हज़ार रुपये मतलब तीन महीने की तनख्वाह। मतलब 25% उगाही। हो सकता है सबके साथ ऐसा न हो लेकिन सर्विस सेक्टर में ऐसा होना आम बात है। 

सर्विस सेक्टर में कंपनियां  न्यूनतम सेवा शुल्क (3.85%) लेती हैं। यह  3% लाभ (Profit) और 0.85% GeM पोर्टल ट्रांजैक्शन शुल्क (Transaction Charges) को मिलाकर बनता है। आज के समय में जब बैंकों में बिना कुछ किए पैसा जमा रहने पर ब्याज दर 2.5% है। ऐसे में तमाम खर्चे और स्टाफ़ रखकर, व्यवस्था बनाए रखने का खर्च लगाकर कोई भी कंपनी 3.85% लाभ में काम कर ही नहीं सकती। इससे कहीं अधिक लाभ तो वे ब्याज पर पैसा उठाकर कमा सकती हैं। 

सेवा प्रदाता कंपनियों में तमाम लोगों का पैसा होता है। एक ग्राम प्रधान ने बताया कि उनके पास काफ़ी पैसा जमा हो गया है। अब वे कोई सेवा प्रदाता कंपनी खोलने की सोच रहे हैं। अपने यहाँ सर्विस सेक्टर काले धन को गोरा करने का भी एक जरिया हैं। 

आज के समय में  देश की अधिकांश सेवायें आउटसोर्सिंग करते हुए चल रही हैं। ऐसे में इनके संचालन में यह देखा जाना जरूरी है कि नियम ऐसे बनें ताकि उनका अनुपालन सही में  हो सके और कामगारों का शोषण रुक सके। 





Saturday, June 06, 2026

तैराकी का सातंवा दिन



 आज पूल पर आठ बजकर तीन मिनट पर पहुंचे। गाड़ी खड़ी करके पूल की तरफ़ जाते हुए साथ तैरने वाली बच्ची मिली। उसने बताया -'आज उसका लास्ट डे है।' हमने कारण पूछा तो उसने बाते -'नानी के घर जाना है।' नानी के अनगिन किस्से याद आ गए।

पूल के बाहर खड़ा एक पिता फ़ोन पर किसी को हड़का रहा था। शायद पूल के किसी जिम्मेदार व्यक्ति को। उसको शिकायत थी कि स्वीमिंग कोच  उसके बच्चे से ठीक से बात नहीं करता। पूल में कोच बच्चों कभी-कभी डाँटते हुए कुछ करने को कहते हैं। कोई बुरा मान जाता है। कोई इसे अपनी ट्रेनिंग का हिस्सा मानता है। कल एक बच्ची सहमी से दिखी थी। उसके पिता ने बताया -'कोच ने तीसरे दिन ही उसे डीप में कुदा दिया। बच्ची डर गई। इसीलिए सहमी हुई है।' 

हमको आज तैरने का अभ्यास करना था। किया। पानी में सांस रोकने और तैरने का अभ्यास किया। पानी में साँस पॉकेट मनी की तरह होती है। (साँस) कम खर्च करते हुए अधिक से अधिक देर तक पानी में रहना है। अच्छी बात यह कि अब साँस फूलने पर आधी-आधी साँस छोड़ी पानी में। साँस को किफ़ायत से ख़र्च करना सीखना जरूरी है तैरने के लिए।

साँस के साथ पेट की गैस भी पानी में निकली। उससे भी शरीर पानी में ऊपर उठा। पेट से गैस निकलते समय लगा कि गैस की बीमारी तैराकी सीखने में सहायक हो सकती है। बशर्ते गैस स्वीमिंग पूल में निकलती रहे। आपदा में अवसर सरीखा मामला है।

कोच से पूछा कि पानी में तैरते हुए साँस कैसे ले सकते हैं? उसने बताया कि पानी में सर डुबाकर चलते हुए साँस रोकने और फिर मुँह ऊपर करके छोड़ने का अभ्यास करिए। चलते हुए तो हमने कर लिया। लेकिन तैरते हुए ऐसा कर पाते तब तक सीटी बज गई। 

साँस रोककर पानी में तैरना पास की पूंजी को खर्च करने जैसा है। पैसे खत्म होने पर मामला ठनठन गोपाल हो जाता है। ऐसे ही  ली हुई साँस की पूंजी ख़त्म होने के बाद रुकना होता है, नई साँस लेनी होती है। तैरने के लिए पानी में तैरते हुए साँस लेना सीखना जरूरी है। पानी में सांस लेना मतलब सांस की कमाई करना। हमको राहत इंदौरी के शेर याद आए :

उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो, 

खर्च करने से पहले कमाया करो। 

पानी में तैरते हुए पिछली सांस की पूँजी ख़त्म होने के पहले अगली सांस कमा लेना जरूरी है। पानी में सांस लेना सीखना है तैरने के लिए। 

सीटी बजने के बाद हमने पूल की चौड़ाई पार की। कल   स्वीमिंग पूल की चौड़ाई हमने छह बार में पार की थी।  आज वह साढ़े चार बार में पार की। मतलब एक बार की साँस में साढ़े पाँच मीटर तैरना हुआ। कल के मुकाबले 37% कम सांस ली आज। 

एक बार तैरते हुए देर तक पानी में रहे। सोचा काफ़ी दूर तक तैरे होंगे। लेकिन सर ऊपर उठाया तो पता चला कि तिरछा तैरे थे। सीधी दूरी कम तय हुई। 

पूल का बाहर आकर नहाए। आते समय ही पूल बालिका ने बता दिया था कि आपका कार्ड बन गया है। ले लीजिएगा। हमने कहा ले लेंगे। आज नाम लिख को। उसने बताया लिख लेंगे। आपका नाम याद है मुझे- अनूप। हमको पंकज बाजपेयी की याद आ गई। वो नाम पूछने पर बताते -अनूप। बहुत दिन से मिले नहीं। पंकज बाजपेयी से। 

कार्ड लेकर हम बाहर आ गए। रास्ते में फल लिए। फल बालक ने बताया -'कल पुड़िया नहीं खाये थे। सुपाड़ी खाई थी। आज सुबह से एक पुड़िया खाये हैं। झूठ नहीं बोलेंगे आपसे।' फल में तरबूज और केला लिए। तरबूज कटवा कर देखा। सुर्ख़ लाल था। मीठा भी हो शायद। 

आज स्वीमिंग सीखने का हमारा सातवां दिन था। 


Friday, June 05, 2026

तैराकी सीखने का छठा दिन



 

आज सुबह स्वीमिंग पूल के लिए निकले। निकले तो आठ बजने में एक मिनट बाकी थे। स्वीमिंग पूल पहुँचने में सात मिनट लगते हैं। मतलब छह मिनट लेट थे घर से ही। देरी के बावजूद आराम-आराम से गाड़ी हांकते हुए निकले। दायें -बायें और सामने देखते हुए। पीछे देखने और चलने का भूतों का होता है। हमने यह काम रियरव्यू मिरर के लिए छोड़ दिया। 

मोड़ पर एक बालिका स्कूटी पर आती दिखी। हमने रुककर उसे मुड़ने दिया। उसके मुड़ने के बाद मुड़े। बालिका कनखियों से इधर-उधर देखती हुई आगे बढ़ी। हम भी मुड़कर आगे बढ़े। आगे  एक महिला अपनी दुकान के बाहर खड़े-खड़े अपने हाथ धो रही थी। धोने के बाद पानी सड़क पर गिराती जा रही थी। हाथ साफ़ करती हुई वह सड़क को गंदा करती जा रही थी। उसकी दुकान के पल्ले बाहर की तरफ़  खुले  हुए थे। पल्ले  सड़क के दसवें हिस्से पर  अघोषित कब्जा किए हुए थे। 

आगे सड़क पर एक महिला एक हाथ में झोला  दूसरे में मोबाइल थामे  सरपट चली जा रही थी। मोबाइल पर चलते-चलते  बतियाती जा रही थी। उसके आगे एक मियाँ-बीबी अपने बच्चे के साथ चले जा रहे थे। हम सबको देखते हुए स्वीमिंग पूल की तरफ़ बढ़ते गए। 

स्वीमिंग पूल पहुंचकर नाम लिखाने के लिए खड़े हुए। वहाँ मौजूद बालिका हमसे बाद में आए लोगों के नाम लिखने लगी। हमने उतावली दिखाई तो बोली -'हमें आपका नाम याद है। लिख रहे हैं।' हम खुश हो गए कि उसको हमारा नाम याद है। उसने मेरा नाम लिखा -anup. हम और खुश हो गए। आज के जमाने में किसी को नाम याद रहे इससे बड़ी ख़ुशी की क्या बात है। बालिका ने  बताया -'आपका  पूल पास अभी बना नहीं था। एक दिन और लगेगा बनने में।' हमने कहा -'कोई बात नहीं।' इसके बाद अपन शॉवर लेकर पानी में उतर गए। 

पानी  में उतरने पर  कोच ने अभ्यास करने को कहा। छोटी कक्षाओं में 'नंबर चहेतू' बच्चे टीचर के आसपास मंडराते हुए उनकी निगाह में रहने की कोशिश करते हैं। उसी तरह अपन कोच से बार-बार अपनी प्रगति के बारे में पूछते रहे। कोच की तारीफ़ करनी होगी कि बिना झल्लाये वह बताते रहे। 

पूल में उतरककर साँस लेकर तैरना शुरू किया। अब हाथ से पानी काटते हुए पांव चलाने का अभ्यास करना था । हाथ और पांव एक साथ चलना था। चलाते रहे। मुंडी पानी में घुसाकर हाथ चलाते तो शरीर अपने आप ऊपर उठ जाता। इसके बाद पानी में पांव चलाते हुए आगे बढ़ते। 

तैरने के लिए मुंडी पानी में घुसाते हुए लगा कि यह सीखने के लिए विनम्रता का प्रतीक है। बाइबिल की पहली सीख याद आई -'सबमिट टु अथॉरिटी।'  सत्ता (अधिकारी)  के सामने समर्पण करें। दुनिया में लोग किसी भी धर्म को मानने वाले हैं लेकिन बाइबिल की यह उक्ति लागू है। जहाँ समर्पण नहीं वहाँ सत्ता हमला कर देती है। 

पानी में मुँह किए तैरने के बाद साँस फूल जाती तो साँस पानी में छोड़कर सीधे हो जाते। तसल्ली से खड़े होकर  साँस लेकर फिर तैरने लगते। कई बार ऐसा हुआ कि पानी के अंदर साँस फूलने को हुई। ऐसे में हमने तसल्ली से पानी में सांस छोड़ी लेकिन पानी में सांस ली नहीं पानी के अंदर। इसके बाद तसल्ली से ऊपर आए। फिर साँस लेकर अभ्यास शुरू किया। 

पानी में साँस फूलने पर पूरी साँस पानी में छोड़कर अगली साँस लिए बिना ऊपर आने की प्रक्रिया देखकर ऐसा लगा जैसे कोई ओवरलोडेड ट्रक नाके पर पकड़ा जाने पर पास का सारा सामान सिपाही को सौंपकर छूट जाये। हड़बड़ाए या बहस की तो धरे गए पानी में। पानी में कोई भी समस्या आने पर  जरूरी है , बिना सांस लिए तसल्ली से ऊपर आने का इंतज़ार करना। बिना हाथ-पाँव मारे साँस छोड़ना और ऊपर आ जाना। इधर-उधर हाथ-पाँव मारने से परेशानी बढ़ती है। 

पानी में तैरना सीखते हुए लगा कि अपने यहाँ की सरकारें भी इसी तरह काम करती हैं। बड़ी से बड़ी समस्या आने पर साँस लिए बिना चुपचाप, बिना कोई प्रतिक्रिया दिए शान्त हो जाती हैं। कोई कुछ भी ऊलजलूल कहता रहे, करता रहे कुछ बोलना नहीं है। कोई आरोप लगाए,  देश पर कोई  समस्या आए, मौनी बाबा बनकर उसके गुजरने का इंतज़ार करना है। बिना कुछ किए -धरे। इस  मामले में हमारी तैराकी और सरकार का तरीका एक ही है। हमें खुशी हुई कि कम से कम किसी मामले में तो अपन सरकार के तरीके से काम काम करते हैं। 

जिस पूल को  हमने दो दिन पहले टहलते हुए पार किया था। उसी को आज हमने तैरते-तैरते पार किया। पहली बार में पूरे पूल की चौड़ाई को सात-आठ बार में पार किया। दूसरी बार छह-सात बार में पार किया। आख़िरी बार पूरे पूल को छह बार में तैरकर पार किया। पूल की चौड़ाई 25 मीटर है। इस तरह एक बार में  औसतन चार मीटर तैरे। एक दिन पहले औसतन पाँच  फुट  तैरे थे। आज का औसत करीब बारह फुट रहा। मतलब कल के मुकाबले आज दोगुनी  से कुछ अधिक प्रगति हुई। एक दिन में सौ प्रतिशत से अधिक। काफ़ी है न ! 

कोच ने कहा -'आप अच्छा सीख रहे हैं।' उसकी बात सुनकर 'कौन बनेगा करोड़पति' में अमिताभ का कहना याद आया -'आप बहुत अच्छा खेल रहे हैं।' हमने बताया कि आज छह बार में पूल पार किया। उसने कहा -'कल पाँच बारे में करेंगे, परसों चार, फिर तीन बार में। सीख जायेंगे।' 

आज कोच ने यह भी बताया कि बीच-बीच में सर उठाकर सांस लेते हुए तैरिए। हमने सोचा यह तो पहले बताया नहीं अगले ने। उसने बताया कि मुँह बाहर करके साँस लेते हुए तैरना सीखना है अब आपको। हमने सोचा -'अब कल सीखेंगे।' 

पूल से बाहर निकलकर वहीं नहाए। कपड़े साथ ले गए थे। चेंज करके  स्विमिंग पूल से राजा बेटा बनकर घर वापस लौटे। 

घर आते हुए सोच रहे था कि पूल में   पानी का डर खत्म हो गया है ।बस  अब कायदे से तैरना सीखना है।

आज तैराकी सीखने का छठा दिन था।   




Thursday, June 04, 2026

तैराकी का पांचवा दिन

अनूप शुक्ल पानी में तैरते हुए । फोटो AI के सहयोग से। 

 आज सबेरे तैरना सीखने के लिए समय पर चले। पुल के नीचे तीन महिलाएं जाते हुए दिखी। शायद मार्निंग वॉक करके घर लौट रहीं थीं। तीनों महिलाएं हाथ आगे-पीछे करते जा रही थीं। हमें लगा वे सड़क पर खड़े-खड़े तैर रहीं हैं। हाथ चप्पू की तरह चलते हुए हवा को पीछे फेंकती हुई। हाथ और पांव के संतुलन से हवा के पूल में तैरती हुई आगे जा रहीं हैं। 

जबसे तैरना सीखना शुरू किया है, तबसे हर इंसान को तैरने के नजरिये से ही देखने की आदत सी हो गई है। पूल में हाथ और पैर का  संतुलन   गड़बड़  देखकर  लगता शरीर-पार्टी के  हाईकमान और कार्यकर्ताओं में तालमेल का अभाव है। मुँह से डेंचर निकलता तो   लगता, कि यह पट्ठा अपनी अलग पार्टी बनाने के जुगाड़ में है। हम उसको पकड़कर अंदर कर लेते। 

पूल पर पहुंचकर स्टॉफ़ बालिका ने कहा -'आप अपना कार्ड ले लीजिए।' इसके बाद खोजने पर कार्ड मिला नहीं । बोली -'बन गया है। कल ले लीजिएगा।' हम ठीक है कहकर शॉवर लेने चले गए। 

शॉवर  लेने के बाद पूल में उतरे। साँस रोककर मुण्डी पानी में डाली। हाथ से पानी काटने का अभ्यास किया । इसके बाद पांव चलाने की प्रैक्टिस। मुँह में सांस भरकर पानी में सर झुकाते तो शरीर अपने अप ऊपर उठता। इसके बाद हाथ-पाँव चलाने के अभ्यास करते। हाथ या पांव में से कोई एक साथ देने से इनकार कर देता। इतने में साँस फूल जाती और हम ऊपर आ जाते। कभी आहिस्ते से, कभी संतुलन बिगड़ने के कारण लड़खड़ाते हुए।

 गनीमत यह रही कि पानी में लड़खड़ाते हुए भी याद रहता कि पानी के अंदर सांस नहीं लेनी है। नतीजतन मुँह या नाक में पानी नहीं गया। अलबत्ता एक बार झटके से ऊपर आने और पानी बाहर निकलने में डेंचर मुँह से निकलकर पानी में बहने लगा। डूबा नहीं। गोया डेंचर हमको बता रहा हो ऐसे तैरा जाता है पानी में।

कुछ देर के अभ्यास के बाद हमने पानी में मौजूद कोच से पूछा -'अब  क्या करें?' उसने हाथ से पानी काटने और पाँव मेढक की तरह चलाते हुए तैरने का अभ्यास बताया । हमने बताया पांव उस तरह चलाने में तकलीफ़ होती है। इस पर उसने ऊपर-नीचे छप्प-छैंया वाले अंदाज में पैर चलाने को कहा। हमने उसके सामान अभ्यास किया। उसने दूसरी तरफ़ देखते हुए कहा -'हाँ ऐसे ही करिए।' 

हमने फिर कहा -' फिर से देखो। ठीक कर रहे हैं?' 

इस बार उनमे अनमने मन से हमारी पाँव की एक्सरसाइज देखी। कहा  -' ठीक  कर रहे हैं। बस घुटने को मोड़ें नहीं। सीधे पांव  सीधे रखकर ऊपर-नीचे करिए।'

हमने करके फिर अपनी तैराकी की कॉपी जँचवाई। इस बार उसने बिना किसी सलाह के हमारे एक्शन को अप्रूव कर दिया। इसके बाद अभ्यास करने को कहा।

अब हमने कई बार पानी में अभ्यास किया। पहले सर नीचे किया, हाथ चलाये, पाँव चलाये। कभी हाथ चलना रुक जाता, कभी पाँव ठहर जाते। लेकिन गनीमत यही रही कि साँस उखड़ने के पहले हम आराम से मुँह पानी के बाहर निकाल ले रहे थे। घबराहट ख़त्म हो गई। पानी में रहने का डर खत्म हो गया। पानी दोस्त लगने लगा। नई दोस्ती का रोमांच महसूस हुआ। 

एक बार डर खत्म हुआ तो याद आया -'डर के आगे जीत है।' 

यह याद आते ही कई बार अभ्यास किया। हर बार करीब तीन-चार फुट पानी में तैरने का अभ्यास किया। कोच को दिखाया। कोच ने इशारे से कहा ठीक हो रहा है। बाद में मुँह से भी कहा -'बहुत अच्छा कर रहे हैं। ऐसे ही अभ्यास करिए। सीख जायेंगे।' 

इसके बाद पूल से बाहर निकलने की सीटी बज गई। हमने आज का आख़िरी अभ्यास करने की सोचते हुए दुबकी लगाई। पानी मुँह में भर गया। फौरन ऊपर आ गए। इसके बाद गहरी सांस लेकर मुंडी नीचे करके हाथ और पांव एक साथ चलाये। पानी में तैरते हुय  आगे बढ़े।  सर ऊपर किया और पीछे देखा तो लगा क़रीब पाँच फुट तैर लिए (नाप के नहीं देखा, अंदाज़ लगाया)। पूल के बाहर निकल आए। 

पूल के बाहर निकलकर याद आया आज हमारा तैरना सीखने का पांचवा दिन था। पाँचवें दिन पाँच फ़ुट तैर लेना काम भर की उपलब्धि है। 

जिंदगी में पहली बार  बिना किसी सपोर्ट के पानी में तैरने की ख़ुशी हुई। बच्चा जब लड़खड़ाते हुए पहला कदम और फिर कुछ और कदम चलता है तो उसे देखकर उसके माँ-बाप को  खुशी होती है। उसी घराने की ख़ुशी हमको अपने लिए हुई। यहाँ हमीं आपने माँ-बाप थे। 

पूल से बाहर आकर घर आते हुए रास्ते में दिहाड़ी मजदूर दिखे। सुबह के सवा नौ बजे तक करीब दस साइकिलों पर राज मिस्त्री के औजार लदे थे। इसके अलावा कई लेबर भी थे। उनको  काम नहीं मिला था। अपनी तरफ़ आती हर गाड़ी, हर इंसान  को वे आशा की नजर से देखते। गाड़ी , इंसान  के पास से गुज़र जाने के बाद वे अगले आने वालों को देखने लगते। 

नुक्कड़ पर फल वाले से फल लिए। उसने बताया -'मसाला छोड़ दिया है। बस एक पुड़िया खाई कल। बहुत तलब लगी थी। रोक नहीं पाये। लेकिन छूट जायेगी आदत।' हमने मन में आमीन कहा। काश ऐसा हो सके।

पराग डेयरी चौराहे पर एक आदमी हर गाड़ी को हाथ देते हुए लिफ्ट माँग रहा था। मिली नहीं। हमसे लिफ्ट माँगी नहीं। कल  घर में बातचीत के दौरान हमारी अजनबी इंसानों को लिफ्ट देने  की आदत की आलोचना और कड़ी निंदा हुई थी। हमको याद आया तो हमने उसको बिना मांगे लिफ्ट दे दी। गाड़ी में बैठाकर पूछा -'कहाँ जाना है?' 

उसने हमारे हमारे सेक्टर के बिजलीघर का पता बताया।    अमित का आदमी है सोचकर हम  निश्चिंत हो गए। रास्ते में बतियाते हुए पता चला कि संविदा में काम करता है। बिजली मरम्मत के लिए सीढ़ी ले जाने का काम करता है। घर हरदोई में हैं। परिवार छुट्टियों में घर गया। 

इतनी बातचीत के बाद उसको घर के पास तिराहे पर उतारा। उसने कहा -'आपको बिजली का कोई काम हो तो बताइयेगा। जलवायु विहार में बहुत काम किया है। अक्सर जाते रहते हैं। हमारा नाम शिब्बू कश्यप है। ' 

तिराहे में उसको उतारने में लगी देर के कारण पीछे खड़ी गाड़ी वाले ने हार्न बजाया। गाड़ी वाले की इस हिमाकत को शिब्बू ने नाराजगी से देखा । उसको कुछ हड़का सा भी दिया। जिस गाड़ी ने उसको बिना मांगे लिफ्ट दी उसकी शान में गुस्ताखी शिब्बू को नागवार लगी। 

हम शिब्बू और  गाड़ियों तिराहे पर छोड़कर घर आ गए। 

हम शिब्बू और गाड़ियों तिराहे पर छोड़कर घर आ गए।
आज हमारा तैरना सीखने का पांचवा दिन था। पाँचवे दिन पाँच फ़ुट तैरे। कोच ने कहा -' प्रैक्टिस करिए। कुछ दिन में आप पूरे पूल की लंबाई तैरकर पार करेंगे।'
हमने उससे बताया नहीं कि हमारे दोस्त Udan Tashtari और Amit तो इंग्लिश चैनल पार करने को कह रहे हैं। बताते तो पता नहीं क्या सोचता?