Saturday, July 11, 2026

तैराकी सीखने का छठा हफ़्ता



 स्वीमिंग पूल में घंटा पूरा होने के पाँच मिनट पहले सीटी बजने लगती है। चेंज करिए। बाहर निकलिए। आ जाइए। अंकल टाइम अप हो गया का हल्ला शुरू हो जाता है। अपन भो घड़ी देखकर निकलने का उपक्रम करते हुए एकाध बार और तैरने का मन बनाते हैं। देखते हैं घड़ी। कभी लगता है 57 मिनट हुए। तीन मिनट बाद निकलेंगे पूल से। कभी तैराकी में खर्च कैलोरी 200 से दो-चार-दस कम दिखती है । लगता है डबल सेंचुरी कर ही लें। कभी मन की कर लेते हैं। कभी पहले ही बाहर आना होता है।

तैराकी का हमारा बैच सबेरे आठ से नौ का है। इसके बाद सबेरे की शिफ्ट खतम हो जाती है। सारे कोच घर जाने के मूड में होते हैं। कपड़े पहनकर, झोला उठाकर चलने को तैयार। जाने के पहले सुनिश्चित करना होता है कि कोई पूल में रह न जाये। इसीलिए सबको बाहर निकालने के लिए बार-बार कहते हैं।

कल हम पूल से  निकल रहे थे। कोच ने कहा -'अंकल घड़ी देखकर निकलते हैं। पूरा समय यूटिलाइज करते हैं।' 

हमने कहा -' हाँ भाई, क्लास पूरी होनी चाहिए। बंक नहीं करना चाहिए।' 

उसने कहा -' स्वीमिंग बैच एक घंटे का होता है। लेकिन टाइम पचपन मिनट का होता है। पाँच मिनट चेंज का होता है।' 

हमारा तो घंटा हो चुका था। हम पूल से निकलकर शॉवर लेकर निकल आए। तय किया पाँच-दस मिनट पहले आया करेंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। पूल पहुंचते-पहुंचते आठ बज ही जाते हैं। 

मंगलवार को पूल बंद रहता है। उस दिन पास के दूसरे पूल गए। वह पूल छोटा है। लगभग आधा। महीने की फ़ीस ढाई हज़ार (हमारे पूल की तीन हज़ार है)। एक दिन की फीस डबल। दो सौ रुपए देकर घंटा भर तैरे। 

कोच ने हमारी बातचीत सुनकर कहा -'आप कानपुर के हैं? '

हमने पूछा -' कैसे पहचाना?'

उसने कहा -'आपके बातचीत करने के अंदाज़ से।' 

हमने सोचा ये तो मजेदार है। हमारी बातचीत से कोई पहचान ले कि हम कानपुरिया हैं- 'झाड़े रहो कलट्टरगंज।'

बाद में पता चला बालक बलिया का  है। बलिया से जुड़ा जुमला है -'बलिया जिला घर बा तो कौन बात का डर बा?' 

हमने बालक से कहा -'आप सिखाओ तो आकर।' 

बालक ने कहा -'चलिए हम आते हैं।' 

पूल में उतरते ही बालक कूदकर पानी में आ गया। हाथ, पाँव चलाने के तरीक़े बताते रहा। पैर पकड़कर मेढक की तरह चलाये भी। इसके बाद हम तैरते रहे। 

साथ में तैरने वाले बुजुर्ग ने बताया -'साढ़े पाँच महीने हो गए। अभी पूरा सीखे नहीं है।' 

हमने सोचा -'अभी हमारा तो महीना ही हुआ सीखते। ये तो हमसे पहले से सीख रहे हैं।' अपना अभी तक तैरना सीख न पाने का अपराध बोध पानी में घुल गया।

साथ की महिला ब्रेस्ट स्ट्रोक, फ्री स्टाइल,  बैक स्ट्रोक मतलब हर तरह से तैराकी कर रही थीं। उन्होंने हमें ब्रेस्ट स्ट्रोक के गुर बताये। तैरकर बताया। हमने सोचा -' ये साथ में सिखातीं तो हफ़्ते भर में ही सीख जाते।' लेकिन सोचने से क्या होता है?

इस बीच रोज ढेर सारे वीडियो देखे यूट्यूब पर। ब्रेस्टस्ट्रोक के। नोट्स लिए। कौन सी ग़लतियाँ न करें। सब नोट किया। याद भी किया कि ब्रेस्ट स्ट्रोक में एक्शन का क्रम Pull (हाथ) , breathe (साँस) , kick (पैर) , glide (शरीर) की गतिविधि होती है। कुछ और सूत्र ये हैं

1. किक में पैर ज़्यादा दूर तक नहीं फैलाने हैं। केवल कमर तक की दूरी तक ले जाने हैं।
2. घुटने मोड़ने के बाद 15 सेकेंड तक आराम करें (रुकें)। घुटने पास रखें (Keep your knees narrow)
3. साँस लेने के लिए सर को बहुत ऊपर नहीं उठाना चाहिए। इसमें ऊर्जा का क्षय होता है। जितनी बार सर ऊपर जाएगा, उतनी बार हिप्स नीचे आयेंगे।
4. सर को पानी 35 से 45 डिग्री तक ऊपर उठायें। टेनिस बॉल प्रैक्टिस ।

सब बातें पूल में याद करके प्रैक्टिस करते रहे। कभी-कभी समन्वय गड़बड़ा जाता। यह देखा कि जब-जब सारे एक्सन कॉपी बुक स्टाइल में किए, तैरने में सहज रहे, तब तब दूर तक तैरे।

अभी तक हाथ और पैर का मूवमेंट सीख गए। आज पानी से मुंडी ऊपर उठाना भी सीख गए। लेकिन सर ऊपर उठाते हुए साँस लेना अभी अच्छे से सीखना है। लगता है दो-चार दिन में आ जाएगा। इसके लिए पानी में ब्रीथिंग की एक्सरसाइज कई बार की। लेकिन उस अभ्यास को तैरते समय अमल में लाना है।

पूल से निकलते समय आज एक बालक पानी में सर नीचे किए खड़ा था। ऐसे लगा पानी में शीर्षासन कर रहा था। मजेदार। हमने ताज्जुब व्यक्त किया तो वह दुबारा पानी में सर के बल खड़ा हो गया।

रोज़ साथ तैरने वाले एक युवा ने कहा -'आप इस उम्र में सीख रहे हैं यह देखकर अच्छा लगता है।'

हमने कहा -'हमको मजा आ रहा है सीखने में। वो तो घंटे भर की लिमिट है यहाँ। अनुमति हो तो घंटों तैरते रहें।'

पूल अक्टूबर में बंद हो जाता है। अक्टूबर के बाद शहर में कोई दूसरा पूल खोजेंगे जहाँ जाड़े में भी तैरने का अभ्यास कर सकें।

हमारी तैराकी सीखने की पोस्ट पढ़कर हमारे कुछ मित्र भी पानी में उतरे हैं। कुछ मन बना रहे हैं। कुछ लोग अपने घर-परिवार के बुजुर्गों को ज़बरियन सीखने के लिए धकेल रहे हैं। यह अपने आप में मजेदार बात है।

यह हमारा तैराकी सीखने का छठा सप्ताह है।






Saturday, June 27, 2026

तैराकी सीखने का पच्चीसवाँ दिन


 आज सुबह स्वीमिंग के लिए घर से निकले। सोसाइटी के गेट के पास एक गिलहरी सड़क पार करती हुई दिखी। हमारी गाड़ी के आगे से निकली। मतलब गिलहरी रास्ता काट गई। लेकिन गिलहरी के रास्ता काटने से कोई अपशकुन जुड़ा नहीं है इसलिए आगे बढ़ गए। दरबान ने गाड़ी देखकर अलसाये, अनमने मन से गेट से खोला। दिन भर में सैकड़ों बार गेट खोलना पड़ता है दरबान को।

गेट के बाहर निकलते ही एक बालिका पूरे शरीर को ढँके स्कूटी पर आते दिखी। केवल आँखे दिख रहीं थीं। एकदम पुतलीबाई सरीखी। धूप से बचाव के लिए मुफ़ीद ड्रेस। लेकिन इस चक्कर में सुबह की विटामिन डी का नुक़सान हो रहा होगा। सूरज की किरणों की  विटामिन डी की मिसाइल  'क्लॉथ डोम' टकराकर वापस लौट गईं होंगी।

रेलवे अंडरपास के आगे लाल पैथोलॉजी में काम करने वाली बच्ची सामने से आते दिखी। अक्सर दिखती है। सुबह पैथोलॉजी खोलने जाती है। वही टेस्टिंग के सैंपल भी लेती है। सर झुकाये मोबाइल में कुछ देखती चली आ रही थी। हमने हार्न बजाया। उसने सर उठाया। हाथ हिलाने पर उसने भी मुस्कराते हुए हाथ हिलाया। दाँत चमके। इसके बाद वह फिर चलते हुए मोबाइल देखने लगी।

चलते हुए मोबाइल देखने से कल की बात याद आई। चौराहे पर ट्रैफिक सिपाही एक हाथ से गाड़ियों को दिशा दे रहा था। दूसरे हाथ से मोबाइल थामे लगातार कहीं बतियाता जा रहा था। बतियाने से फुर्सत मिलती तो मोबाइल देखने लगता। उसकी मोबाइल निर्भरता देखकर लगा कि यह उसकी ड्यूटी का अपरिहार्य हिस्सा है। मोबाइल अलग कर दिया जाये तो शायद उसका ड्यूटी करने मुश्किल हो जाये।

स्वीमिंग सीखने में ब्रेस्ट स्ट्रोक (हाथ से) और फ्री स्टाइल (पैर से) के गठबंधन से शुरुआत की थी। कुछ दूर तक तैरने भी लगे थे। लेकिन फिर लगा कि तैराकी में गठबंधन सरकार चल नहीं पायेगी। इसके बाद पैर भी फ्री स्टाइल की जगह ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलाना सीखने लगे। सीखने से ज़्यादा मेहनत फ्री स्टाइल में पांव चलाना भूलने में लगी। दो दिन हुए हाथ और पांव ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलना सीख लिए। बस दोनों का गठबंधन कराना है। हाथ और पैर के मूवमेंट का गठबंधन होते ही हमारी तैराकी की गृहस्थी बस जाएगी। 

आज अभ्यास करते हुए देखा कि हाथ और पैर दोनों फ्रीस्टाइल में चलने लगे। दोनों में गठबंधन सा हो गया है। करीब पाँच सात मीटर तैरे भी। अब बस कुछ दिन और अभ्यास की ज़रूरत है। इसके बाद स्टेमिना बनाना है। देर तक और दूर तक तैरना सीखना है। सीख जायेंगे। हमको कोई हड़बड़ी थोड़ी है। आराम-आराम से सीखेंगे। सीख रहे हैं।

आज हमारा तैराकी सीखने का पच्चीसवाँ दिन था। 

Friday, June 26, 2026

संस्कारी युवा पीढ़ी


 चारबाग रेलवे स्टेशन पर चाय पीते हुए अगल-बगल के नजारे भी देखते रहे। लोग आ-जा रहे थे। स्टेशन से गाड़ियों के आने-जाने की सूचनाएँ प्रसारित हो रहीं थीं। कोने के जीने से स्टेशन से बाहर की तरफ़ आने वाले यात्रियों की भीड़ देखकर लगा कि किसी ने आदमियों से भरा बोरा सीढ़ियों पर उलट दिया हो।

चाय जी दुकान के बगल में एक लड़का-लड़की अलग-अलग पोज में फ़ोटो खींच-खिंचा रहे थे। लड़के ने लड़की की कई पोज में फ़ोटो खींची। लड़की ने लड़के की। ढेर सारे अंदाज़ में साथ खड़े होकर सेल्फी भी ली दोनों ने। सेल्फी भी कभी लड़का लेता, कभी लड़की। कैमरे के सामने मुस्कराते हुए फ़ोटो ले रहे थे। लगातार मुस्कराने के चक्कर में जबड़े दर्द कर रहे होंगे। देर तक फ़ोटो यज्ञ चलता रहा।
लड़के के बाल खासे बड़े थे। गले में हेयर बैंड लटकाये था। लड़की के बाल सामान्य। दोनों ख़ुश मुद्रा ने थे। चहक़ योग कर रहे थे।
बात करने के लिहाज़ से मैंने मुफ़्त ऑफ़र दिया -‘ लाओ तुम्हारी साथ में फ़ोटो खींच दें।’ बालिका उत्साहित दिखी। लेकिन बालक ने सर झटक कर मना कर दिया। बालक ने बालिका को जिस अंदाज़ में देखा उसका कोई अनुवाद करता तो लगता वह कह रहा था -‘ अपन लखनऊ में किसी दूसरे से फ़ोटो नहीं खिंचवायेंगे।’
बालिका से बातचीत की। पता चला भोपाल से आए हैं लखनऊ। घूमने। बालिका ने अपना नाम बताया पल्लवी, बालक का राहुल। दोस्त हैं दोनों।सहज मिडिलची मानसिकता के प्रभाव में सोच लिया कि घर से बिना बताये आए हैं दोनों घूमने।
इसके बाद हाल की तमाम घटनाओं को बिना सिलसिले के याद किया। अपने-आप। पहले के दिनों के हिसाब से सोचते तो यही लगता कि बालक , बालिका को बहाने से लाया है साथ। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं ने इस सोच को ख़ारिज किया। आख़िर ने तय किया कि कोई किसी को बरगलाकर नहीं लाया है। उम्र साथ लाई है दोनों को।
लड़का चंचल लग रहा था। समझदार होने का पूरा दिखावा कर रहा था। हमने लड़की से और बातचीत करने का प्रयास किया। लेकिन बालक अपनी मित्र को समेट के दूर कोने में ले गया। नए अंदाज़ में सेल्फी लेने के लिए। हमने बालक को दुष्ट मान लिया। दूसरों के बारे में राय बनाने में हम सहज सिद्ध होते हैं।
कुछ देर बाद बालक ने जेब से सिगरेट निकाली। सुलगाई। कश लेकर धुंआ हवा में छोड़ दिया। हमें लगा उसको टोंके-‘ भोपाली बालक, तुम भोपाल से लखनऊ की हवा ख़राब करने आए हो?’ लेकिन बोले नहीं।
दो-चार सुट्टे लगाने के बाद बालक ने सिगरेट बालिका को पकड़ा दी। बालिका ने भी सहज अंदाज़ में सुट्टे लगाए। देखकर लगा सिगरेट सुट्टा अभ्यासी है बालिका।
सिगरेट के कश खाते हुए बालिका ने इधर-उधर भी देखा। हम भी उसकी निगाह में आए होंगे। उसने हमको अपनी तरफ़ देखते देखा शायद। देख तो रहे ही थे हम उन दोनों को। दोनों घूम गए। पीठ हमारी तरफ़ करके सुट्टा लगाने लगे। हमको लगा-‘ बालिका कितनी संस्कारी है। बुजुर्गों का कितना लिहाज करती है। उनकी निगाह बेचकर सिगरेट पीती है। लोग ‘ बे-फ़ालतू’ में युवा पीढ़ी पर संस्कारहीन होने का आरोप लगाते हैं।’
सोचते तो हम और भी बहुत कुछ। लेकिन तब तक हमारे बेटे की ट्रेन आ गई। बेटा बाहर आ गया। हम उन बालक-बालिका के बारे में सोचने का काम वहाँ मौजूद जनता की सौंप कर बेटे के साथ घर की तरफ़ चल दिए।

Thursday, June 25, 2026

मैराथन चाय बालक


 कल चारबाग स्टेशन जाना हुआ। बेटे को लेने के लिए। दिल्ली से आने वाली लखनऊ मेल से। गाड़ी राइट टाइम थी। हम थोड़ा जल्दी पहुँच गए। चारबाग स्टेशन के सामने वाली दुकान पर चाय पी।

चाय की दुकान पर अकेला बच्चा था। वही चाय बना रहा था। बन मक्खन भी। बिस्कुट सामने कंटेशनर में रखे था। ज्यादातर लोग चाय पीने वाले थे। कुछ लोग बन मक्खन भी ले रहे थे। दुकान के सामने फुटपाथ पर कुछ लड़के-लड़कियां अपने सूटकेस पर बैठे थे। शायद कहीं बाहर से आए थे। शायद कोई इम्तहान देने आए होंगे। और किसी काम से भी आए हो सकते हैं। लेकिन स्टेशन पर  कोई युवा सूटकेस, बैग लिए दिखता है तो यही लगता है कोई इम्तहान देने आया है या इंटरव्यू। यह भी क्या पता इसका इम्तहान भी निरस्त होने वाला है।

सामने ही एक रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर सो रहा था। शायद रात में रिक्शा चलाया हो। उसकी सुबह अभी हुई नहीं थी। 

चाय पीते हुय बच्चे से बात से बात की। उसने बताया कि वह लगातार 48 घंटे से जगा हुआ है। नींद आ रही। बहुत तेज आ रही है । लेकिन क्या करें? पहले भी कई बार इस तरह लगातार काम कर चुका है। उसका रिलीवर नहीं आया तो मजबूरी में काम पर लगा हुआ है। रिलीवर आयेगा तब छुट्टी होगी।  आँखों  में नींद की झलक थी। लेकिन बच्चा मुस्कराते हुए बात कर रहा था।

और बात करने पर पता चला बच्चा सीतापुर का रहने वाला है। पिताजी की बीमारी के चलते इंटर के बाद काम में लग गया।करीब डेढ़ साल हो गए काम करते।  अब पिताजी ठीक हैं। लेकिन बच्चे का काम जारी है। 

48 घंटे जागकर लगातार चाय बेचने की बात सुनकर ताज्जुब व्यक्त किया। उसने बताया कि एक बार लगातार तीन दिन काम किया। तीन दिन मतलब 72 घंटे। मैराथन चाय वाला। बालक ने बताया कि आमतौर पर उसकी ड्यूटी 24 घंटे की होती है। 24 काम फिर आराम। यही 24 घंटे कभी 48 और कभी 72 में बदल जाते हैं। 

लगातार काम करने का कारण बालक ने बताया -'दुकान जीजा की है। दीदी के घर रहता है। अपनी दुकान है। इसलिए देरी हो जाने के कारण भी करता रहता है। 

बालक ने कहा -'जाड़े में चाय बेचने में मजा आता है। उस समय  ग्राहक खूब आते हैं। जब ग्राहक आते हैं तो काम करने में मजा आता है।' 

एक चाय 15 की और बिस्कुट 5 रुपए का था। हमने बात करने के लालच में एक चाय और पी। चाय बनी भी बढ़िया थी। 

 सोचा 'माननीय चाय वाले' से कठिन मेहनत तो यह बालक कर रहा है। अनगिनत लोग कर रहे होंगे।  लेकिन उनकी चर्चा नहीं होती। आम लोगों की चर्चा नहीं होती। चर्चा ख़ास लोगों की होती है। चर्चा के लिए  इंसान  खास होना जरूरी होता है। आम लोगों के हिस्से 'चर्चा रस श्रवण' हो आता है। 

Friday, June 19, 2026

तैरना सीखने का अठाहरवाँ दिन


 आज सुबह तैराकी के लिए निकले। पराग डेयरी चौराहे के पहले एक बच्चा तेजी से सड़क पार करता दिखा। भागता, लड़खड़ाता, झुककर सीधे खड़ा होता। शायद सड़क किनारे के बने किसी घर में रहता होगा।   सूरदास जी कृष्ण जी के बालपन का वर्णन करते हुए लिखते हैं :

'किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।
मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबैं धावत ॥'

सड़क किनारे रहते घरों के बच्चों के लिए सड़क ही उनका आँगन होती हैं।वहीं वे  घुटनों के बल चलना, दौड़ना, भागना सीखते हैं। सड़क रूपी आँगन में मणियाँ नहीं लगी। बिम्ब नहीं बनते यहाँ।  बारिश के दिनों में अलबत्ता सड़क के गड्ढों में परछाइयाँ बनती होंगी। बच्चे उन परछाइयों को पकड़ने की कोशिश करते होंगे। लेकिन  कोई सूरदास इस पर कोई पद नहीं रचता। हर बच्चे का बचपन कृष्ण के बचपन सरीखा नहीं होता। 

बच्चे के गुजरने के इंतज़ार करते हुए कार रोकी। बच्चा डिवाइडर पारकर अपने घर में घुस गया। यहाँ तो सड़क है।हम अपने देश के बच्चे को बचाकर निकल रहे हैं।  ईरान, फ़िलिस्तीन में सड़क और घर में खेलते बच्चों का क्या हुआ होगा। खेलते-खेलते कोई मिसाइल उन पर गिरती होगी। वे 'शांत' हो जाते होंगे। युद्ध चलता रहता है। बाद में कभी समझौता होगा। जिन लड़ाई लोलुप, सत्ता लालची बुड्ढों ने युद्ध का बिगुल बजाया होगा वही लोग शांति का मसीहा बनकर पेश होते है। लड़ाई थमती है लेकिन अनगिनत बच्चों, युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों की क़ूबानी लेकर। 

आज शुक्रवार को ईरान-अमेरिका में शांति समझौता हुआ। देखना है कि यह सही में लागू हो पाता है क्या। ईरान-अमेरिका में शांति होते ही खबर आई कि यूक्रेन ने रूस की पाइप लाइन  पर ड्रोन  से हमला कर दिया। लगता है दुनिया हथियारों के सौदागर यह सुनिश्चित करते हैं कि दुनिया के किसी न किसी हिस्से में लड़ाई होती रहनी चाहिए। वे  दुष्यंत कुमार के शेर को अच्छे से याद करके अमल में लाते हैं:

'मेरे सीने (देश ) में न सही, तेरे सीने (देश) में सही, 

हो कहीं भी (युद्ध की) आग लेकिन आग जलनी चाहिए।'

कल डायना नायड की आत्मकथा  'Find a way ' के शुरुआती अंश पढ़े । डायना के पिता (सौतेले) ने बचपन से उनको जल्दी उठकर तैराकी का अभ्यास करने की आदत डाली। उनको ज़ेहन में बचपन से विश्वास दिलाया कि उनका नाम NYAD स्पेशल है। उनकी किसी और सहेली का नाम डिक्शनरी में नहीं होगा लेकिन नायड़ का नाम होगा। यह खास नाम है। डायना नायड ख़ास है।

डायना नायड  अपने सौतेले पिता  एरिस Aris को अपना असली पिता समझती रहीं। Aris का वर्णन करते हुए डायना नायड ने लिखा है -'वह जालसाज था। बहुभाषी था। 17 भाषाएँ जानता था। वाकपटु था। अपनी लच्छेदार बातों से लोगों को मुग्घ कर लेता था। डायना की सहेलियाँ उसने मिलने के बाद कहती थीं -'इतना शानदार व्यक्तित्व मैंने पहले कभी नहीं  देखा।' 

लेकिन एरिस Aris का दूसरा रूप भी था। वह असल में जालसाज था। क्रूर था। उसने डायना का 14 वर्ष की उम्र तक यौन शोषण किया। डायना घर में डरकर रहती थी। उनकी माँ जानने के बावजूद डायना को अपाए सौतेले पिता के यौन शोषण से बचा नहीं पायी। इसका उनके मन में अपराध बोध था। उनमें अपने बच्चों को बचाने के लिए, अपने पति के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत नहीं थी। इसका कारण शायद यह भी था कि वे बचपन में माँ-बाप के प्यार से वंचित रहीं। अपने पति के प्यार को खोने से डरती थी वे। बाद में हालांकि उन्होने अपने पति से तलाक लिया। यह शायद बच्चों की सुरक्षा के लिए बहुत देर से उठाया कदम था। 

डायना नायड की आत्मकथा इस मामले में अनूठी है। ख़ासकर इसलिए  कि उन्होंने अपने जीवन के निर्माण में शामिल लोगों के बारे में लिखते हुए आख़िर में उनकी अच्छाइयों के लिए उनको याद किया है। सौतेले पिता द्वारा अपने यौन शोषण के बावजूद उन्होंने दो बातों के लिए अपने पिता को धन्यवाद दिया :

"'विजेता' (चैंपियन) के रूप में मेरी खुद की छवि बनाना ।

नींद को छोड़कर तैराकी के अभ्यास को तरजीह देना।"

डायना नायड अपने मैराथन तैराक बनने के पीछे अपने सौतेले पिता द्वारा सिखाई इन बातों को सबसे प्रमुख मानती हैं।

डायना नायड की आत्मकथा अभी पढ़ रहे हैं। बाद में डायना नायड के समलैंगिक होने के पीछे भी कारण उनके सौतेले पिता द्वारा उनका बचपन में किया यौन शोषण कारण रहा? शायद इस बारे में डायना नायड ने आगे लिखा हो आत्मकथा में।

डायना नायड की यह आत्मकथा अंग्रेजी में हैं। किसी शब्द का मतलब डिक्शनरी में खोजने में समय लगता है। कल इसका उपाय मैंने यह निकाला कि गूगल के एआई वर्जन में जाकर किताब के पेज का फ़ोटो उसमें अपलोड करके निर्देश देते हैं -'हिंदी में अनुवाद करो (ट्रांसलेट इन हिंदी) । पूरे पेज का हिंदी अनुवाद फौरन सामने आ जाता है। उसको हम फटाक से पढ़ लेते हैं। कभी-कभी अंग्रेजी भी पढ़ते हैं जो कि हिन्दी के साथ पढ़ने में बेहतर समझ आती है।

आज पूल में अभ्यास किया। सर पानी में झुकाकर रखें रहे। पाँव चलाते रहे। सर उठाकर तैरते हुए साँस लेने में कुछ प्रगति हुई । लेकिन पूरी सफलता नहीं मिली। अलबत्ता अब हाथ चलाना सीख लिया है। यह पता चल गया कि कैसे हाथ चलाने से सर ऊपर उठेगा, साँस लेने के लिए। सबसे बड़ी बात कि सीखने में हड़बड़ी वाली भावना अब नहीं है। तसल्ली से तैरने का आनंद ले रहे हैं । तैरना मजेदार है। तैरते हुय साँस लेना सीखना है। सीख ही जाएँगे।

आज हमारा तैरना सीखने का अठाहरवाँ दिन था। 


Wednesday, June 17, 2026

तैराकी सीखने का सोहलवाँ दिन




 आज सुबह तैराकी के लिए सही समय पर पहुँच गए। ठीक आठ बजे। पढ़कर जो आए थे उसपर अमल शुरू किया। सबसे पहला सबक यह कि तैरते समय सर पर नीचे रखना है। जैसे हाई कमान के सामने मंत्री, संतरी, सांसद, विधायक रखते हैं। केवल साँस लेते समय सर उठाना है। बाक़ी समय सर नीचे ही रखना है। स्वीमिंग पूल के फर्श की तरह निगाह। कॉलेज के जमाने में रैगिंग के दिनों में जूनियर्स को अपने शर्ट की तीसरी बटन देखने को कहा जाता था। तीसरी बटन देखने का रिवाज तो लड़कों में था। लड़कियों में क्या रिवाज था यह पता नहीं। यह जरूर याद है कि उन दिनों में लड़कियों/लड़कों का अनुपात 1:50 से भी नीचे ही था। 

सर लगातार नीचा करके तैरने में लगा यह सही पोज है। पहले अक्सर सर बार-बार ऊपर करते थे। लड़खड़ा जाते थे। समर्पण मुद्रा में तैरने में तैरना सहज लगा। पहले बार-बार सर उठाकर ऊपर देखने में संतुलन गड़बड़ा जाता था। सर नीचे करके तैरने के साथ पांव लगातार चलाते रहना था। आज इसका अभ्यास किया। हमने तय किया कि रोज-रोज़ नई तरह से सीखने की बजाय मूल बात पर फ़ोकस करना जरूरी है। रोज़-रोज़ पोज बदलने में कोई फ़ायदा नहीं। पहले का अभ्यास छूट जाता है। तैराकी कोई राजनीति तो है नहीं जो दलबदल की तरह पोजबदल करके कुछ हासिल हो।

साथ सीखते बच्चे ने मुझे फिर से सिखाया। उसका एक दाँत टूटा हुआ है। उसने बताया स्कूल में खेलते समय टूट गया। दूध का दाँत है। इसकी जगह नया दांत आयेगा। क्या उसे चाय का दाँत कहाँ जाए। पूल किनारे बैठे पक्षी को देखते हुये उसने कहा -'वह ईगल हम लोगों की तरफ़ देख रहा है। कहीं काटेगा तो नहीं?' 

बगल में तैरती बच्ची ने सुनकर कहा -'वह ईगल नहीं कौआ है। काटेगा नहीं।' 

मेरे साथ तैरता बच्चा उसकी बात अनसुनी करते हुए पूल से निकलकर बाहर चला गया। इसके बाद पूल में डाइव करके फिर साथ में तैरने लगा। 

पूल में सिखाने वाली बच्ची एक बुजुर्ग महिला का हाथ पकड़कर उसको तैरना सिखा रही थी। हाथ पकड़कर पानी में उनको घसीटते हुए पैर चलाने को कह रही थी। महिला कुछ देर अभ्यास करने के बाद रुककर आराम करने लगी। हमने कोच बालिका से शिकायत की -'तुमने हमको तैरना नहीं सिखाया। अभी तक हम ठीक से तैर नहीं पाते।' 

बच्ची ने हमको शुरुआती दिनों में कई बार गाइड किया है। मेरी बात के जबाब में उसने कहा  -'आप तो सीख गए हैं अंकल। प्रैक्टिस करते रहिए। परफेक्ट हो जायेंगे।' 

साथ तैरते बच्चे के पिता बाहर से उसकी गतिविधि देख रहे थे। फोटो भी ले रहे थे। हमने उनसे अपना तैरने का वीडियो बनाने को कहा। उन्होंने कहा -'ठीक।'

वीडियो बनवाने के लिए हम पूल के अंदर थोड़ी दूर से (करीब छह -सात मीटर) तैरते हुए किनारे तक आए। वीडियो बना। मेरे मोबाइल पर भेज भी दिया उन्होंने। 

वीडियो देखते हुए अपनी कई कमियाँ पता लगी। एक तो पाँव सीधे की जगह थोड़े मुड़े हुए थे।  दूसरे पाँवों के आपस में तालमेल का अभाव था। दोनों पांव किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री और आलाकमान द्वारा थोपे उप मुख्यमंत्री की तरह अलग-अलग बयान बाजी जैसी करते दिखे। हाथ के मूवमेंट देखकर भी लगा कि इनको बहुत फैलाने की जरूरत नहीं। औक़ात में रहने से ज़्यादा कुशलता से तैर सकेंगे। यह भी लगा कि अगर रोज़ वीडियो बनायें तो बेहतर समझ सकेंगे अपने मूवमेंट।

तैरते हुए, अभ्यास करते हुए आज एक दो बार सर ऊपर करके साँस भी ले ली। ऐसा लगा मानो पूल के पानी को झांसा देकर हवा गटक ली हो। जल्दी ही तैरते हुए नियमित साँस लेना सीख जाएँगे।

आज हमारा तैरना सीखने का सोहलवाँ दिन था।






हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्रीस्ट्रोक


 शनिवार को शाम को गए स्वीमिंग के लिए। साथ में तैरते एक बच्चे ने कहा -'हम आपको सिखाते हैं स्वीमिंग।' हमने कहा -'सिखाओ।'

बच्चे ने हमको पहले, दूसरे दिन के सबक सिखाये। हमको वो आते थे। फिर भी हमने उसके कहने पर वो दोहराये। बच्चे ने कहा -'गुड, ऐसे ही करिए। सीख जायेंगे।'
बच्चा ख़ुद सीख रहा है। बाँह में फ़्लोटर जैसे बाँधे हुए था। उसके सिखाने का अनुभवि मजेदार रहा।
पूल में जितने कोच हैं उतनी सलाहें देते हैं। कोई कहता है ब्रेस्ट स्ट्रोक के साथ पांव भी उसी तरह चलाइये। हम अपने पैर और हाथ की तकलीफ़ के बारे में बताते हैं। वह कहता है -'ठीक है। ऐसे ही चलाइये।'
दूसरा कोच कहता है -'जिस तरह सहज हैं उस तरह करिए। तकलीफ़ वाले स्टेप्स मत लीजिए। प्रैक्टिस करिए। हो जाएगा।'
एक दिन हमने पैर ब्रेस्ट स्ट्रोक के हिसाब से चलाये। किनारे का पाइप पकड़कर प्रैक्टिस की। लेकिन जब तैरने लगे तो पाँव फ्री स्टाइल में ही चले। पाँव फ्री स्टाइल में, हाथ ब्रेस्ट स्ट्रोक के हिसाब से। विभिन्न विचारधारा वाली पार्टी का गठबंधन। तालमेल नहीं हुआ।
सीखा हुआ भुलाकर नए सिरे से करना तैराकी सीखने के लिए सयोनी घोष हो जाना हुआ। इरादा बदल दिया। जिस तरह सीख रहे थे वैसे ही सीखेंगे।
कल नेट पर जानकारी ली। हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्रीस्ट्रोक के साथ तैरना संभव है ? नेट बाबू बोले -'एकदम संभव है।'
इसके बाद तैरते हुए साँस लेने के तरीक़े, तरकीबें भी बताई नेट ने। हमने सीख ली। तैराकी के बारे में वीडियो देखते हुए बचपन में पढ़े हुए विज्ञान के सबक दुबारा सीखे। प्लवन (तैरने) और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत फिर से पढ़े। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत तो जैसे मुस्कराते हुए गाना गा रहा था -' जहाँ जाइएगा, हमें पाइयेगा।'
तैरने समय फेफड़े में भारी साँस तैरने में सहायता देती है। शरीर का वजन विरोध करता है। दोनों में संतुलन बनाना सबसे अहम मुद्दा है। साथ चुनाव लड़ती दो विभिन्न पार्टियों के बीच सीटों के तालमेल जैसा ही जटिल मुद्दा। जल्दी तय नहीं हो पाता। लेकिन हो तो जाता ही है।
आज अभी जा रहे हैं स्वीमिंग के लिए। कल जो थ्योरी पढ़ी है उसको अमल में लाने की कोशिश करने। देखते हैं कितना कर पाते हैं।
स्वीमिंग पूल में डायना नायड को भी जरूर याद करते हैं। उनकी सीख भी :
1. हमें कभी भी, किसी भी हाल में हार नहीं मानना चाहिए (Never Ever Give up)
2. अपने सपनों को पूरा करने के लिए आपकी उम्र कभी भी ज़्यादा नहीं होती (You are never too old to chase your dream)
3. यह देखने में भले ही एक व्यक्ति का खेल लगता है, लेकिन असल में यह एक टीम वर्क है (It looks like a solitary sport, but it's a team)
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Tuesday, June 16, 2026

राजनीतिक पार्टी में निवेश


 टीएमसी के बागी विधायकों/सांसदों के NCPI में विलय  समाचार सुने। NCPI को पिछले चुनाव में कुल 822   वोट मिले थे। जबकि बागी सांसदों को कुल एक करोड़ वोट मिले थे। मतलब NCPI के वोटों से 12000 गुना। अपने से बारह हज़ार गुना छोटी पार्टी में विलयातुर सांसदों को देखकर कृष्ण बिहारी नूर का यह शेर याद आता है :

"मैं एक कतरा (बूँद) हूँ, मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।" 

यह एक खुद्दार इंसान का बयान है। अपने स्वाभिमान को बचाकर रखने की ज़िद है। बूँद भले ही छोटी है लेकिन उसका अलग अस्तित्व है। सागर से मिलने पर उसका अस्तित्व मिट जाएगा। यहाँ तो सागर (बागी सांसद) बूँद (NCPI) में मिलने को छटपटा रहा है। 

लेकिन खबर यह भी है कि वे सागर में नहीं महासागर (NDA) में मिलेंगे। यह मिलन  द्वारा उचित माध्यम (NCPI) होगा। एकदम सरकारी अंदाज़ में। टीएमसी के सासंद  NCPI के कंटेनर  में जमा होंगे। NCPI का कंटेनर NDA के समन्दर में उलट दिया जाएगा। तर्पण होगा टीएमसी के बागी सांसदों का। 

लेकिन जिस तरह का उचक्कापन और अवसरवादिता टीएमसी के बागी सांसदों ने दिखाई है उसके खिलाफ बागी लोगों को एतराज होगा। बगावत का मतलब किसी स्थापित सत्ता, नियम, या अधिकार (Authority) के खिलाफ खुले तौर पर विरोध या विद्रोह करना है। यहाँ तो स्थापित सत्ता से जुड़ने का काम हो रहा है। भगोड़ेपन को बागी कहना ठीक नहीं। 

पानसिंह तोमर फ़िल्म का डायलग याद आता है -"बीहड़ में तो बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में।"   हो सकता है कोई भूतपूर्व बागी टीएमसी के भगोड़े लोगों द्वारा ख़ुद को बागी कहने के ख़िलाफ़ याचिका डाल दे। 

टीएमसी के चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बनना सहज बात हो सकती है। लेकिन जिस बेशर्म तरीके से उनसे जुड़े सासंद उनसे अलग होकर एकदम ख़िलाफ़ पार्टी से जुड़ने का उपक्रम कर रहे हैं वह शर्मनाक है। सत्ता में रहते विरोध करके अलग हो जाते तो बहादुरी समझ में आती। इस तरह के धोखेबाजी समाज के लिए धोखेधड़ी की एक और मिशाल कायम करना हुआ। लोग बेशर्मी से किसी को धोखा देंगे और नजीर में कहेंगे -'इन लोगों ने भी तो किया था। जब वे कर सकते हैं तो हम क्यों न करें।' अलग तरह की पार्टी कहलाने के नारा लगाने वाली पार्टी के लोग अपनी हर चिरकुटई को बेशर्मी से सही ठहराते हुए कहती है -' हमारे पहले वाली  पार्टी ने भी तो किया था ऐसा?' 

अरे जब पहले वाली की तरह आप भी गड़बड़ कर रहे हैं तो आपमें और उनमें अंतर क्या है? अन्तर शायद इस बात का है कि वो थोड़ा शर्माते हुए करती थी, अब सब धांधली, गड़बड़ी खुल्लमखुल्ला हो रही है। गड़बड़ियों में खुलापन आ गया है। पारदर्शिता आई है। 

अवसरवादिता , धोखाधड़ी आज की राजनीति का जरूरी तत्व हो गया है। जो धोखा देना नहीं जानता, मौके के हिसाब से पाला बदलना नहीं जानता वह शायद राजनीति के लिए मिसफ़िट है।

NCPI की स्थापना में एकाध लाख रुपए खर्च हुए थे। सांसदों और विधायकों द्वारा इस  पार्टी को ज्वाइन करने के बाद इसकी क़ीमत अरबों में हो जायेगी। इससे अच्छा रिटर्न आन इन्वेस्टमेंट और कहाँ होगा आज के दिन। NCPI को अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में लिखवाने के लिए अप्लाई कर दे देना चाहिए। निवेश पर सबसे तेज  लाभ का रिकार्ड। 

क्या पता कल को आपस की बातचीत में शेयर के बिजनेस करने वाले राजनीतिक पार्टी बनाने में पैसा लगाने लगें। आपस की बातचीत में कहने लगें -' सोचते हैं कुछ शेयर बेचकर दो-चार राजनीतिक पार्टी बना लें। आजकल इन पर अच्छा रिटर्न मिल रहा है।'

क्या आप भी कोई राजनीतिक पार्टी बनाने की सोच रहे हैं।