Tuesday, March 31, 2026

विकसित देशों की लूटपाट


दो दिन पहले गाड़ी में पेट्रोल भरवाने गए। पेट्रोल की किल्लत के समाचार से आशंकित थे। पेट्रोल मिलेगा कि नहीं। पता नहीं कितनी देर लगे।
गाड़ी में पढाई सौ किलोमीटर तक के लिए पेट्रोल था। लखनऊ में इतने पेट्रोल में हफ़्ता आराम से गुज़र जाता। लेकिन हमको लखनऊ से नोयडा आना था। कार से। करीब साढ़े पाँच सौ किलोमीटर चलने भर का पेट्रोल चाहिए था। मतलब क़रीब तीन सौ किलोमीटर चलने का पेट्रोल कम था गाड़ी में।
पेट्रोल पंप में भीड़ थी। लेकिन इतनी नहीं कि 'कई किलोमीटर लंबी लाइन' कहा जा सके। हड़बड़ी में जिस लाइन में लगे वह सीएनजी लेने वालों की लाइन थी। हमारे आगे टेम्पो लगे थे। दो मिनट बाद पीछे भी टेम्पो लग गए। 'गाड़ी के आगे कुछ टेम्पो, गाड़ी के कुछ पीछे टेम्पो' वाला सीन हो गए। आगे बढ़ने का कोई फ़ायदा नहीं था। पीछे हटने का रास्ता नहीं।
कुछ देर बाद हमारी समस्या समझकर एक ऑटो वाले ने लाइन से बाहर आने में हमारी सहायता की। हम पेट्रोल वाली लाइन में लग गए। हमारे आगे करीब सात-आठ गाड़ियाँ थीं। हम अपनी बारी का इंतजार करने लगे।
हमारे आगे वाली गाड़ी में एक बुजुर्ग हड़बड़ाते हुए गाड़ी से निकलते ही बोले -'गाड़ी फुल कर दो।' उसने बताया -'बीस लीटर से अधिक नहीं मिल पाएगा।' बुजुर्गवार ने भुनभुनाते हुए कहा -'भर दो बीस लीटर ही।'
बुजुर्गवार के जाने के बाद हमारा नम्बर आया। हमने कहा -'बीस लीटर हमें भी दे दो।'
हमारे गाड़ी की टंकी में नोजल घुसाते हुए पंप आपरेटर ने कहा -'पेट्रोल की कोई कमी नहीं। बिल्कुल चिंता न करें। मिलता रहेगा।'
आपरेटर की तसल्ली बक्श आवाज़ सुनकर हमें लगा -' माननीय प्रधानमंत्री की आपदा के लिए तैयार रहने वाली थकी आवाज के बजाय इस पंप आपरेटर का वीडियो चलाया जाता तो ज़्यादा भरोसेमंद लगता। फिर लगा कि ऐसा होता तो कुछ दिन बाद यह भी भाइयों-बहनों करने लगता। फिर पेट्रोल कौन भरता?
दूसरे दिन बाक़ी बचा पेट्रोल भराने गए। दूसरे पेट्रोल पंप। वहाँ एकदम सन्नाटा था। लगा शायद पेट्रोल के न होने की वजह से पम्प बंद है। लेकिन ऐसा नहीं। हम अकेले थे पेट्रोल भराने वाले। उसने कहा -'दो दिन पहले यहां सांस लेने की फुर्सत नहीं थी। आज सन्नाटा है।' पेट्रोल डालते हुए उसने भी आश्वस्त किया कि पेट्रोल की कोई कमी नहीं है।
करीब पंद्रह लीटर पेट्रोल भराने के बाद ऑटो कट हो गया। पेट्रोल भरना बंद हो गया। हम भुगतान करके चले आए। ढाई सौ किलोमीटर चलने भर के पेट्रोल के बाद 35 लीटर भरवाने के बाद गाड़ी में कम से कम छह सौ किलोमीटर चलने भर का पेट्रोल होना चाहिए। लेकिन गाड़ी का फ़्यूलमीटर साढ़े चार सौ किलोमीटर यात्रा तक का ही पेट्रोल बता रहा था। हम चकराये कि डेढ़ सौ किलोमीटर का पेट्रोल कहाँ गया? क्या पेट्रोल टंकी भी भ्रष्टाचार में लिप्त होकर कमीशन खोरी करती है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि पेट्रोल पंप वाले ने पेट्रोल डाला ही न हो। गड़बड़ कर दिया हो।
नेट पर चेक किया तो पता चला कि टंकी की क्षमता साठ लीटर है। सोचा अभी पूरा नहीं भरा होगा टैंक। भरवा लेते हैं। दूसरे पेट्रोल पंप गए। वहाँ भी हम अकेले भरवाने वाले थे। हमने फुल करने को कहा। नोजल से पेट्रोल अंदर जाते ही हमारी गाड़ी ने पेट्रोल की उल्टी करनी शुरू कर दी। मतलब पहले वाले पेट्रोल पंप पर हमारा शक फ़िज़ूल था। टंकी पूरी भरी थी।
टंकी पूरी भरी होने के बावजूद गाड़ी साढ़े चार सौ किलोमीटर का पैट्रोल ही बता रही थी। हमने सोचा जो होगा देखा जाएगा।
कल नोयडा आए तो आधे रास्ते में एहतियान दस लीटर पेट्रोल और भरवा लिए। नोयडा पहुंचकर देखा कि पेट्रोल की टंकी 60% फुल है।लखनऊ से नोयडा तक की 515 किलोमीटर की यात्रा के बाद अभी देखा कि गाड़ी में 361 किलोमीटर चलने का तेल है। मतलब कुल 575+361 = 876 किलोमीटर चलने लायक तेल होने के बावजूद गाड़ी ने 450 किलोमीटर के ऊपर चलने की गारंटी नहीं ली।
यह देखकर लगा कि आधुनिक कहलाने वाली गाड़ियाँ भी लोकतांत्रिक देशों की तरह झूठ बोलने लगी हैं। ट्रम्प कहते हैं -'दस दिन हमला नहीं करेंगे लेकिन ईरान पर बम बरसाने लगते हैं। इजरायल से खबरें आतीं हैं कि सेना थकने लगी है लेकिन वहाँ का प्रधानमंत्री कहता -हम दुनिया के किसी भी देश पर आक्रमण कर सकते हैं।
अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है ईरान से बातचीत अच्छी चल रही है लेकिन ईरान कहता है उससे बात ही नहीं चल रही तो अच्छी क्या होगी?' अपने कर्णधार के बारे में कुछ न हो कहा जाये तो बेहतर। उनके मन की बात वही समझ सकते हैं।
आज दुनिया के आधुनिक कहे जाने वाले देशों के कर्णधारों ने दुनिया की ऐसे हाल बना दिए हैं कि क्या ही कहा जाये? अपने-अपने देश को महान बनाने के नाम पर देश और दुनिया को बर्बाद कराने पर आमादा हैं। कई विकसित देशों के अंदरखाने की कहानियाँ बाहर आने पर लगता है कि उनके विकास के मूल में कार्यकुशलता, वैज्ञानिक उन्नति से ज़्यादा बड़ा योगदान उनकी लूटमार का है। पिंडारियों की तरह दुनिया को लूटना और पिछड़ा बनाए रखना ताकि वे विकसित कहला सकें।

गाड़ी में पेट्रोल भरवाने की बात से बात शुरू करके अपन विकसित देशों की लूटपाट तक पहुंच गए। पूरी दुनिया में यही चल रहा है। अपन दुनिया से कोई अलग थोड़ी हैं। 

दो कौड़ी की चाय

काउंटर पर चाय बनाती दिव्यांशी

दो दिन पहले कटिंग सैलून में चाय की दुकान का नाम सुना -'दो कौड़ी की चाय।' दुकान का नाम ध्यान खींचने वाला था। तय किया था जाएँगे देखने दुकान। पीने चाय।

आज शाम को गए 'दो कौड़ी की चाय' पीने। घर से करीब चार किलोमीटर दूर है दुकान। LDA कॉलोनी में बंगला बाजार के पास।
दुकान के बारे में मेरे मन इमेज़ किसी रेस्टोरेंट की थी। किसी बिल्डिंग में बैठने का इंतजाम होगा। लेकिन पहुँचने पर देखा कि फुटपाथ पर एक गोल गुमटी पर बन रही थी 'दो कौड़ी की चाय।' चाय के साथ बन मक्खन, कटलेट और दूसरे कई नाश्तों का इंतज़ाम था। गुमटी के सामने, फुटपाथ पर प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठने का इंतज़ाम था। पूरा फुटपाथ चाय पीने वालों से भरा था। ज्यादातर युवा लोग थे। चौड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग तसल्ली से गपियाते हुए चाय पी थे। दुकान एक तरह से हाउस फुल थी।
‘दो कौड़ी की चाय’ की दुकान पर दिव्यांशी, प्रभात (काउंटर के आगे) और रंजीत और आकाश ( काउंटर के पीछे)


दुकान पर कोई कुर्सी खाली न देखकर अपन गुमटी के सामने ही खड़े होकर चाय बनना देखते रहे। काउंटर के अंदर खड़े दो लोग नाश्ते का सामान और चाय बना रहे थे। काउंटर के बाहर खड़ी एक प्यारी बच्ची चाय के भगौने में चम्मच हिलाते हुए चाय बना रही थी।
मैंने ध्यान से चाय बनाती बच्ची का वीडियो बनाने के बाद पूछा -' ये दुकान का नाम बड़ा मजेदार है। कैसे रखा? किसने सजेस्ट किया? '
इस पर उसने कहा -'इस बारे में दुकान के ओनर से पूछिए। वो बतायेंगे।' यह कहते हुए उसने वहाँ कुर्सियां समेटकर इधर -उधर रखते हुए एक खूबसूरत बालक की तरफ़ इशारा किया। बालक का नाम प्रभात है।
प्रभात से बातचीत की तो पता चला कि उसके तार कानपुर से जुड़े हुए हैं। वहाँ कुछ साल रहे हैं। वैसे पैदाइश और शुरुआती पढ़ाई लिखाई तो कालापानी वाले प्रदेश अंडमान निकोबार में हुई। लेकिन बाद में बीबीए और एमबीए की पढ़ाई बनारस हिदू विश्वविद्यालय से हुई। 2018 में एम बी ए करने के बाद कुछ साल ओम लाजिस्टिक में काम किया इसके बाद शायद एम बी ए के सीखे गुरु और कानपुर और बनारस वालों के चाय वालों से प्रेरणा लेकर लगा होगा कि चाय की दुकान खोली जाये। तो खोल ली।

काउंटर के भीतर काम करते हुए रंजीत और आकाश।


दुकान का नाम 'दो कौड़ी की चाय' रखने के पीछे ध्यान खींचने वाली बात मुख्य रही होगी। कानपुर के 'ठग्गू के लड्डू' तो इस मामले में तमाम अटपटे नाम रखने वालों के पितामह हैं। वैसे भी पहले दुकानों, प्रतिष्ठानों के नाम शरीफ टाइप रखने के चलन था। लेकिन अब शराफ़त का जमाना नहीं रहा। ख़ुराफ़ाती नामों को लोग ज़्यादा भाव देते हैं। रचनात्मक ख़ुराफ़ात का उदाहरण है दुकान का नाम।
बातचीत करते हुए पता चला कि प्रभात को दुकान का मालिक बताने वाली बालिका दुकान की साझा मालकिन दिव्यांशी भी कानपुर की हैं। गुमटी नंबर पाँच में घर है दिव्यांशी का। पिता नये गंज में जनरल मर्चेंट की दुकान है। बीएड की पढ़ाई कर रही हैं। कानपुर में ही प्रभात और दिव्यांशी की मुलाक़ात हुई और दोनों ने लखनऊ में 'दो कौड़ी की चाय' की दुकान खोल ली।
दुकान की शुरुआत 14 फ़रवरी , 2022 को हुई। वेलेंटाइन डे को शुरू हुई दुकान में शायद इसीलिए युवा लोगों का ज़्यादा जमावड़ा रहता है।
कुल चार लोग मिलकर चलाते हैं दुकान। प्रभात, दिव्यांशी के अलावा सीतापुर महोली के आकाश और रंजीत दुकान में चाय और नाश्ते बनाने का काम करते हैं। आकाश और रंजीत दोनों सीतापुर में बीएससी की पढ़ाई भी कर रहे हैं। पास ही किराए पर रहते हैं।
चाय बनाते हुए दिव्यांशी से बात करते हुए पता चला कि प्रभात के पिता पुलिस विभाग से जुड़े रहे। मूलत: आज़मगढ़ के रहने वाले हैं। नौकरी के सिलसिले में अंडमान गए। वहीं प्रभात का बचपन बीता। इसके बाद राहुल सांकृत्यायन की तर्ज़ पर कानपुर, बनारस घूमते हुए लखनऊ में अड्डा जमाया।
काउंटर के सामने खड़े प्रभात। दिव्यांशी अंदर कुछ सामान बनाने गई है।


Anita Misra को पता भी नहीं चला और उनके मोहल्ले (गुमटी नंबर पाँच) की बच्ची ने लखनऊ में चाय की दुकान खोल ली। देश-दुनिया के स्तर पर दो कौड़ी के लोगों की हरकतें देखते-देखते आजिज हो गई होंगी। कभी आ 'दो कौड़ी की चाय' भी पीकर देखें लखनऊ आकर ।
प्रभात ने यह भी बताया कि दुकान की मालकिन दिव्यांशी उनकी मंगेतर है। शायद अगले साल तक उनकी शादी हो। मतलब शादी के पहले दोनों साथ काम करने का अभ्यास कर रहे हैं।
हम तो निठल्ले थे। खड़े होकर बतिया रहे थे। लेकिन दिव्यांशी और प्रभात को चाय और दूसरे सामान बनाने के साथ ग्राहकों को सर्व भी करना था। हमारे अनुरोध करने पर सबने साथ खड़े होकर फ़ोटो भी खिंचवाया। काउंटर के पीछे खड़े सीतापुरी बालकों में से एक (रंजीत) ने बाहर निकलकर हमसे बतियाते हुए हमारा परिचय पूछा। अपना इंस्टाग्राम का खाता दिखाया। हमारा फेसबुक पता नोट किया। और कुछ बातचीत होती तब तक काउंटर से आवाज आई -' रंजीत, जल्दी आकर चाय बनाओ।'
प्रभात ने बताया कि उनकी 'दो कौड़ी की चाय' की कानपुर में भी कई दुकानें (शायद चार) और आजमगढ़ में भी एक दुकान है। लखनऊ की दुकान दोपहर दो बजे से रात ग्यारह बजे तक खुलती है। दिन में किसी को चाय पीना हो तो बताये हम 'दो कौड़ी की चाय' के अड्डे पर पहुँचकर चाय पिलायेंगे।
हमने वहीं बैठकर अदरख की चाय पी। 25 रुपए की एक चाय। छोटा ग्लास ऊपर तक भरा था। थोड़ा ठहरकर पीना पड़ा वरना हाथ जलते। ग्लास थोड़ा बड़े हों या कुल्हड़ में चाय हो तो बेहतर है। चाय बढ़िया लगी। इस बढ़िया लगने के पीछे चाय के स्वाद से ज़्यादा युवा बच्चों का उद्यमशीलता, व्यवहार और प्यारा अंदाज़ था।
प्रभात और दिव्यांशी को सफल होने के लिए शुभकामनाएँ।

Saturday, March 28, 2026

गुम्मा हेयर कटिंग सैलून से लुक्स हेयर ड्रेसर तक

अरमापुर की नाई की दुकान 


कल शाम को कटिंग करवाने गए। जाने से पहले सोचा बाल काटने वाले से कन्फ़र्म कर लें। दुकान खुली है कि नहीं। वह दुकान पर है या नहीं।
मोबाइल में जिस नाम के आगे 'हेयरकट' लिखा था उसको फ़ोन किया। पूछने पर जबाब आया -'अभी आते आपके यहाँ। घर पर ही करवायेंगे न कटिंग?' फ़ोन गलती से कानपुर में बाल काटने वाले के पास लग गया था। वो घर में आकर बाल काटते हैं। अरमापुर इस्टेट में कई अधिकारी इनसे बाल कटवाते हैं। कटिंग के साथ तमाम ख़बरें भी मिल जाती हैं लोगों को। जातीं भी होंगी। खबरची का काम दोतरफ़ा होता है। संयोग ऐसा कि हमने कभी इनके सेवायें भी नहीं लीं थीं।
फ़ोन गलती से लगा था। लेकिन बात हो गई इसी बहाने। तमाम बातें इसी तरह हो जाती हैं।
बाद में फ़ोन करके कटिंग सैलून गए। पता चला जिस जगह उसका सैलून था वह बंद हो गया था। बगल में चालू था सैलून। कारण पूछने पर बताया कि दुकान मालिक ने ज़्यादा किराया बढ़ा दिया था। खाली करना पड़ा।
कटिंग कराने के बाद डाई कराई। डाई धुलने के बीच के आधे घंटे का समय उपयोग करने के लिए कुछ फ़ोन किए। एक इलेक्ट्रॉनिक सामान लेने के लिए दुकान का नाम देखकर फ़ोन किया। फ़ोन में असामिया में पूछा गया -'क्या चाहिए?' आसाम में भी उसी नाम से दुकान रही होगी। हमने -'कुछ न ' कहते हुए फ़ोन काट दिया।
दुकान पर मौजूद लोग तमाम तरह की बातें कर रहे थे। धुरंधर फ़िल्म की बात हुई। कटिंग कराने आए ग्राहक ने बताया -' मैं देखने गया हाल में। थोड़ी देर बाद सो गया। घर आकर फिर OTT पर देखी। तीन चार बारे में।' वह धुरंधर -1 के बारे में बता रहा था।
दुकान का काम-काज देखने वाली महिला ने कहा -'पहले मैं रोमांटिक फ़िल्में देखती थी। खूब सारी। लेकिन अब मुझे मार-धाड़ वाली फ़िल्में पसंद हैं। मैंने तो धुरंधर की बुकिंग फरवरी में ही करा ली थी।'
मुझसे किसी ने पूछा नहीं। कोई पूछता तो कहता -'मुझे हर तरह की फ़िल्में पसंद हैं।' जबकि सचाई यह है कि मार-धाड़ वाली फिल्मों से अपन परहेज करते हैं। यही कारण है धुरंधर जैसी धुँआधार फ़िल्म देखने से बचे हुए हैं आजकल। अभी तक फ़िल्में बहुत कम देखी हैं। जो दोस्त लोग बताते हैं उनको देख लेते हैं। इसके अलावा मुझे रोमांटिक फ़िल्में पसंद हैं। पिछले दिनों कई फ़िल्में देखीं। एक दिन में एक के हिसाब से। आपने कौन सी फ़िल्म देखी पिछले दिनों?
दो कौड़ी की चाय 

सैलून में आशियाना की एक चाय की दुकान की भी चर्चा हुई। दुकान का नाम है -'दो कौड़ी की चाय।' आजकल ध्यान खींचने के लिए लोग अजब-अजब तरह के नाम रखने लगे हैं। जाएँगे कभी 'दो कौड़ी की चाय' पीने।
कटिंग और डाई के 550/- रुपए पड़े। नोयडा में इसके दोगुने पड़ते हैं। लखनऊ नोयडा से सस्ता है कटिंग के मामले में। कानपुर में भी 500/- में काम हो जाता था।
मुझे याद है कि छुटपन में हमारे पिताजी घर के पास लेनिन पार्क के सामने की फुटपाथ पर दाढ़ी- बाल बनवाने जाते थे। हम लोगों को भी ले जाते कटिंग कटवाने के लिये। वहां धूप में जमीन पर बिछी चादर पर बैठा कर नाई कटिंग करते। बैठाने के लिये चादर के नीचे या ऊपर ही एकाध ईंट रख लेते ताकि बैठने में आसानी रहे। कम पैसे में बाल कट जाते। उन दिनों हमारे घर के सामने स्थित ‘रंगीला हेयर ड्रेसर’ के मुकाबले ये फुटपाथिया कटिंग सैलून आधे पैसे लेता। खाली कुर्सी पर बैठकर बाल कटवाने के लिये दुगुने पैसे देने के मुकाबले जमीन से जुड़कर बाल कटवाना पिताजी को समझदारी लगती । इसमें कोई हीन भावना नहीं थी बस अनावश्यक फिजूलखर्ची से बचने की बात थी। अपने फुटपाथिया नाई की दुकान का नाम पिताजी बताते थे- गुम्मा हेयर कटिंग सैलून। गुम्मा ईंट को कहते हैं। ईंट पर बैठकर बाल बनवाने के कारण गुम्मा हेयर कटिंग सैलून कहते। कुछ लोग ईटैलियन कटिंग सैलून भी कहते।
'गुम्मा हेयर कटिंग' से शुरू करके 'लुक्स सैलून' तक की यात्रा में अनगिनत यादें जमा हैं। समय-समय पर उचकते हुए निकल आती हैं।


Friday, March 27, 2026

शहीदों की प्रतिमाओं का पुनर्स्थापन

 

शहीदों की प्रतिमाओं का पुनर्स्थापन 

शहीदों की नगरी शाहजहांपुर में शहीद दिवस के दिन शाहजहांपुर के  शहीदों की प्रतिमाएं ढहा दी गईं थीं। प्रतिमाओं को बुलडोजर से ढहा देने के बाद डम्पिंग ग्राउंड में फेंक दिया गया था।  घटना की जिम्मेदारी लेने वाला कोई मिला नहीं। महापौर , नगर निगम आयुक्त किसी को पता नहीं चला। बुलडोजर चल गया। लगता है बुलडोजर बाबा के जमाने में बुलडोजर भी मनचले हो गए हैं। अपने आप चलने लगे हैं। 


इस घटना का शहर में व्यापक विरोध हुआ। शहर के विकास पुरुष का कोई बयान नहीं आया। बुलडोजर बाबा के आदेश पर नगर निगम के दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। ठेकेदार ब्लैक लिस्ट हो गया। परसाई जी की बात याद आ गई :


"शासन का घूँसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है, पर न जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूँसा पड़ जाता है।"


शहर के लोगों के व्यापक विरोध के बाद आनन-फानन में मूर्तियां जोड़-जाड़ कर फिर से स्थापित की गईं। जिन लोगों ने मूर्तियां गिराये जाने पर कुछ नहीं कहा था वे भी लपकते हुए मूर्तियों को माला पहनाते दिखे। सीमेंट के खंभों पर बिना उद्घाटन नामपट्ट के शहीदों की प्रतिमाएं फिर से स्थापित हो गईं। 


मूर्तियों पर उद्घाटन कर्ताओं के नाम दर्ज करवाना जनप्रतिनिधियों का बड़ा लालच होता है। जिसके नाम जितने ज़्यादा नामपट्ट लगते हैं वह अपने को उतना अमर समझता है। एक बोरी सीमेंट और सौ ईंटों से बने निर्माण पर भी नाम पट्ट लगाने के लिए लालायित रहते हैं लोग। कई बार निर्माण से ज़्यादा खर्च नामपट्ट में होता है। 


किसी इमारत के उद्घाटन में लोकार्पण की परम्परा फौरन बंद होनी चाहिए। नाम लिखे जाना बंद हो जाना चाहिए। अधिक से अधिक इमारत के बनने का समय लिखा जाना चाहिए। लेकिन  ऐसा होने लगे तो फिर जनप्रतिनिधि बेचारे किस मुँह देश सेवा का कर सकेंगे। उनका उत्साह मारा जाएगा।


सैफ का बनाया रेखाचित्र 

इस पूरे घटनाक्रम पर  Sudhir Vidyarthi जी की पोस्ट यहाँ पेश है। सुधीर विद्यार्थी जी ने देश के क्रांतिकारियों पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। शहीदों के सम्मान में उनके जन्मस्थल, कारावास जहाँ क्रांतिकारी बंदी रहे और विभिन्न स्थलों पर प्रतिमाएं स्थापित करवाने में भी सक्रिय भूमिका अदा की। शाहजहांपुर में भी शहीदों की प्रतिमाएं गिराये जाने पर लोगों को इस घटना की सूचना देने के बाद उनका सक्रिय,तीखा विरोध किया। शहीदों की मूर्तियां फिर से लगाए जाने में उनके तीखे विरोध की भी बड़ी भूमिका रही। सुधीर विद्यार्थी जी की पोस्ट : 


काकोरी शहीदों के बुत फिर आ खड़े हुए! ************************************

             कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

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सत्ता की बेशर्म राजनीति और सरकार के चालू कल-पुर्जों का ’करिश्मा’ देखिए कि शाहजहांपुर की सरजमीं पर बुत बने खड़े काकोरी के अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खां और रोशन सिंह, जिन्हें 19 दिसम्बर, 1927 को फांसी पर चढ़ाकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने चैन की नींद सोने का सपना देखा था जो अंततः 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी के सवेरे के साथ ध्वस्त हो गया। हम आज़ाद हो गए।

 

            और फिर स्वतंत्रता के रजत जयंती वर्ष 1972 में इस शहर की ज़मीन पर खड़ी की गई उनकी बेजान मूर्तियों को 23 मार्च, 2026 की रात्रि में चोरी-चुपके प्रशासन की बेरहम, अंधी और असंवेदनशील बुलडोजरी ताकत ने अपने नुकीले पंजों से फिर ज़मींदोज़ करने जो षड्यंत्र रचा, उसका नाकामयाब ’ड्रामा’ सिर्फ चंद (चार) दिनों में ही नेस्तनाबूद हो गया और उन्हें शहीदों को अपनी धरती पर पुनर्स्थापित करने पर मजबूर कर दिया। 


जब काकोरी शहीदों के भग्नावशेष बोल उठे

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           दरअसल, जब काकोरी के इन शहीदों की प्रतिमाएं बुलडोजर से गिराकर मिट्टी में मिला कर उनके भग्नावशेष (प्रशासन की भाषा में मलवा) शहर से बाहर डंपिंग ग्राउंड में डलवा दिया गया, तब लोगों को सवेरे उनके इस ’क्रांतिकारी कारनामे' का पता चला। गनीमत यह कि हमारी भी नींद समय से खुल गई। 


           लोग शहरों-शहरों बोल उठे। शाहजहांपुर ही नहीं, इलाहाबाद, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, संगरूर, जालंधर, बरेली, रुद्रपुर, मेरठ, मुरादाबाद, उदयपुर और देश के अनेक  दूरस्थ इलाकों से एक साथ आवाजें उठीं---’काकोरी शहीद ज़िंदाबाद’, ’उत्तर प्रदेश सरकार मुर्दाबाद’, ’ज़िला प्रशासन और नगर निगम अधिकारी हाय-हाय’। 

           ये आवाजें सत्ता के पिछलगुओं के अलावा हर कंठ से उठीं। विदेशों में कनाडा, कैलिफोर्निया, जर्मनी, लाहौर तक यह स्वर गुंजायमान हुआ।


बे-लगाम व्यवस्था की छाती पर शहीद प्रहार करते रहेंगे

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         प्रशासन की मुंदी आँखें जैसे भौचक्की रह गईं। स्वनामधन्य जिलाधिकारी बौखलाहट में ज़िले के काकोरी शहीदों की गिनती तीन से बढ़ाकर चार बता रहे थे, मेयर महोदया कह रही थीं कि उन्हें कोई जानकारी नहीं बल्कि वे नवरात्रि के व्रत में डूबी थीं, नगर आयुक्त भी हड़बड़ी में खुद की जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ रहे थे, और सूबाई सरकार में इस शहर के प्रतिनिधि और कैबिनेट मंत्री के मुंह पर तो जैसे मजबूत वाला टेप चिपका दिया हो। 


          गौरतलब यह कि अधिकारीगण ठेकेदार पर दोषारोपण कर रहे थे और ठेकेदार मजदूरों को मुजरिम मान रहे थे। मैंने कहा कि शायद इस प्रकरण में अपराधी कोई और नहीं, सिर्फ बुलडोजर है जो रात्रि के अंधेरे में खुद चलकर गया और उसने शहीद प्रतिमाओं को ध्वस्त कर दिया।


शहीदों का विस्थापन ना-मुमकिन है

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           25 मार्च को दोपहर शहर में हमारी प्रेस कांफ्रेंस से पहले नगर आयुक्त महोदय ने फोन कर मुझसे कहा कि वे मिलकर कुछ बात करना चाहते हैं। मैंने दो घंटे बाद का समय निर्धारित किया। वे होटल में मिलने आए, लेकिन यह भी सही है कि बढ़ते जनाक्रोश के बीच प्रशासन ने तीन दिन के भीतर गुपचुप ढंग से फैसला ले चुके थे कि शहीद प्रतिमाओं के खंडित अवशेषों को जोड़-गांठ कर और रंग-रोगन पोत कर उन्हें पुनर्स्थापित कर दिया जाए। वही उन्होंने मुझे बताया। यह भी कहा कि वे शर्मिंदा है कि अपने कार्यकाल में उन पर यह कलंक लगा। उन्होंने यह भी बताया कि दोषियों के विरुद्ध FIR करा दी गई है, कुछ सस्पेंशन हुए हैं, और किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। रात भर में मूर्तियों के नए ’बेस’ तैयार करा लिए गए और 26 मार्च को बहुत सबेरे शहीदों के ज़ख्मों और टूटे बुतों के टुकड़ों पर पॉलिश पोत कर फिर बेहयाई के साथ उन्हें खड़ा कर दिया गया।


          इसके बाद नगर आयुक्त महोदय ने पुनः स्थापित किए गए बुतों की तस्वीरें मुझे व्हाट्सएप पर भेजीं। शहीद अशफ़ाकउल्ला के पौत्र को मैंने अब वहां होने वाले उस ’जश्न’ में जाने से रोक दिया जिसे थोड़ी देर में वह बेशर्म सत्ता आयोजित करने वाली थी जिसमें फिर महापौर महोदया को न जाने किस मुंह से काकोरी शहीदों और भारतमाता की जय का नकली उदघोष करना पड़ा। अद्भुत नज़ारा और अनोखी निर्लज्जता! इस अवसर पर वहां न जाने ऐसे कितने लोग अपनी हाजिरी देकर अपनी फोटोएं उतरवा रहे थे जो चार दिन पहले शहीदों के लिए गए इस ’वध’ में शामिल थे।


 शहीद फिर सीना तान कर खड़े हो गए

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          देश और मनुष्यता के लिए शहीद होने वाले क्रांतिकारी रक्त-बीज हैं। उन्हें ज़मीन में दफ़नाओगे तो वे फिर अपने छाती फुलाकर उठ खड़े होंगे। 

                    साम्राज्यवादी सरकारें मुर्दाबाद! 

                        अमर शहीद ज़िंदाबाद!!


सुधीर विद्यार्थी जी की पोस्ट का लिंक : https://www.facebook.com/share/p/1CnYGdAnuK/?mibextid=wwXIfr

Thursday, March 26, 2026

फेसबुक और ब्लॉगर


पिछले कुछ दिनों में अपनी फेसबुक की पोस्ट अपने ब्लॉग (फ़ुरसतिया) पर चढ़ाई। पहले भी कई बार ऐसा कर चुके थे। पिछले कुछ साल की फेसबुक ऐसी थीं जो ब्लॉग में सेव नहीं की थीं। फेसबुक की पोस्ट्स ब्लॉग में रखने का कारण फेसबुक के तमाम नखरे रहे। कई मित्रों का खाता फेसबुक ने हटा दिया। वर्षों के लेख हज़म कर गया फेसबुक। 

फेसबुक की पोस्ट ब्लॉगर पर रखना अपना कीमती सामान बैंक के लॉकर में रखने जैसा है। खराब या अच्छा जैसा भी है लेखन तो है। कम से कम ऐसा तो है जो हमें लेखक होने का भरम दिलाये रहता है। 

फेसबुक पर लिखने की शुरुआत 16 साल पहले हुई थी। 15 फ़रवरी, 2010 को। इसके पहले अपने ब्लॉग पर ही लिखते थे। ब्लॉगिंग पर लिखने की शुरूआत 20 अगस्त, 2004 को हुई थी। मतलब क़रीब साढ़े  21 साल पहले। इस दौरान कुल मिलाकर लगभग 3284 लिखी। मतलब औसतन लगभग 150 प्रति वर्ष। ब्लॉगिंग के समय पोस्ट लिखने का औसत लगभग 85 पोस्ट प्रति वर्ष था। फेसबुक में आने का बाद यह औसत 180 ( ब्लॉग के मुकाबले लगभग दोगुना) हो गया। इसका कारण शायद फेसबुक पर पोस्ट लिखने में आसानी रही। ब्लॉग पर लिखने के पहले थोड़ा सोचते थे कि क्या लिखें? फेसबुक में लिखने के बाद भी नहीं सोचते -क्या लिख गए। 

ब्लॉगिंग के दिनों में इससे कमाई के किस्से सुनते थे। यह कि कई ब्लॉगरों ने नौकरी छोड़कर ब्लॉगिंग से कमाई शुरू की और लखपति हो गए। हमारे ब्लॉग पर आजकल तक एक चवन्नी की कमाई नहीं हुई। उसमें विज्ञापन ही नहीं लगे हैं। फेसबुक पर अलबत्ता आज देखा तो 52 डॉलर की कमाई हुई है। मतलब आज के 4876.31 रुपए। फेसबुक से कमाई के जो तमाम फ़ंडे  बताये हैं लोगों ने लेकिन उनको अपनाने का धीरज और मन बन नहीं पाया। 

अभी तक अपन फेसबुक पर ही पोस्ट लिखते थे । लेकिन अब ब्लॉग पर भी पोस्ट किया करेंगे। ब्लॉग पर कैटेगरी के हिसाब से पुरानी पोस्ट पढ़ना और खोजना ज़्यादा आसान है। लिंक लगाना भी ब्लॉग पर ज़्यादा सुगम है। फेसबुक पर आप किसी दूसरे प्लेटफार्म का लिंक लगाओ, फेसबुक नखरा करेगा। जबकि ब्लॉगर इस मामले में उदार है।  आप यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी भी साइट का कोई भी लिंक लगाओ ब्लॉग कभी नखरा नहीं करता। अलबत्ता फेसबुक पर मोबाइल से फोटो लगाना आसान है।ब्लॉग पर मोबाइल की फ़ोटो लगाने में अभी मसक्कत करनी होती है। कोई तरीका होगा जरूर। सीखेंगे। लगायेंगे। 

ब्लॉगिंग के दिनों से अभी तक पाठक, प्रसंशक, पसंदीदा लेखक लगातार बदलते रहे हैं। कई लोग हैं जिनकी हर पोस्ट पढ़ने का मन करता है। उनमें से कुछ आलटाइम फ़ेवरिट हैं। कुछ लोगों का लिखा टाइप्ड लगने लगता है। मेरे लिखे पर भी लोगों की ऐसी ही कुछ धारणा होगी। मेरे पाठक भी बदलते रहे। कभी हर पोस्ट पर लाइक, टिप्पणी करने वाले कई, कई बार महीनों तक नहीं दिखते। 

2004 में ब्लॉगिंग से शुरू करके अब तक मेरी दस किताबें आ गईं हैं। ब्लॉगिंग जब शुरू की थी तो ऐसा कोई इरादा नहीं था। लेकिन मजाक-मजाक में किताबें आती गईं। आने वाले समय में भी अगर आलस्य पर नियंत्रण रहा तो इस साल भी दो-तीन किताबें शायद आ जायें। 

इस बीच कई बार पॉडकास्टिंग करने के भी विचार आया। अपना यूट्यूब चैनल नियमित करने की सोची। लेकिन एक तो अपनी आवाज और दूसरे तकनीकी लफड़े और तामझाम के चलते ऐसा हो नहीं सका। अच्छा ही हुआ शायद। 

 मेरे पाठक मित्रों की प्रतिक्रियाएं, रचनात्मक टिप्पणियां और सुझाव मेरे लेखन का प्राणतत्त्व हैं। इसके लिए मैं अपने पाठक मित्रों का शुक्रिया अदा करता हूँ। 

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Tuesday, March 24, 2026

शहीदों की प्रतिमाओं का अनादर


 आज सुबह पता चला कि कल शाहजहांपुर में शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान और ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमाओं को बुलडोजर से गिराकर कहीं डंपिंग ग्राउंड पर फेंक दिया गया।

बिस्मिल, अशफ़ाक़ और रोशनसिंह को काकोरी कांड ( 09 अगस्त, 1925) में शामिल होने के कारण फाँसी हुई थी। तीनों शहीदों के शाहजहांपुर से जुड़े होने के कारण इस शहर को बलिदानी शहर कहा जाता है। शाहजहांपुर के वीर रस के कवि किसी भी मंच पर हों ये मुक्तक अवश्य पढ़ते थे :
विश्व के संताप सब बोये गए है।
धूल के कण रक्त से धोए गए हैं।
पांव के बल मत चलो अपमान होगा।
सर शहीदों के यहां बोये गए हैं।
बिस्मिल और अशफ़ाक़ का अटूट और अनूठा रिश्ता सांप्रदायिक सद्भाव का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह सांप्रदायिक सद्भाव शाहजहांपुर की खासियत रही है। 1992 में बाबरी मस्जिद कांड के बाद लगभग पूरा उत्तर भारत दंगों की चपेट में था। ऐसे समय में शाहजहापुर उन कुछ शहरों में था जहाँ कोई दंगा नहीं हुआ था। यह शायद बिस्मिल-अशफ़ाक़ की साझी सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत के कारण संभव हुआ।
शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान के बीच का सांप्रदायिक सद्भाव का अटूट भी उन लोगों को अखरता था जिनकी राजनीति की दुकान ही सांप्रदायिक वैमनस्य की जमीन पर चलती है।
शहर के लगभग केंद्रीय स्थल पर स्थित शहीदों की ये प्रतिमाएं शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल थीं। बाहर से आने वाला कोई भी शहर आता तो इन प्रतिमाओं को जरूर देखने आता। माल्यार्पण करता। इन प्रतिमाओं से कुछ दूरी पर ही खिरनी बाग में बिस्मिल का घर है। थोड़ी दूर पर स्टेशन के पास अशफाक उल्ला की मजार है। देश के लिए क़ुर्बान हो जाने वाले शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से गिराकर मलवे में फेंक देना वाला समाज कृतघ्न, मानसिक रूप से दिवालिया और अपराधी मनोवृत्ति का ही कहा जाएगा।
कल भगतसिंह के जन्मदिन मौके पर रात के अंधेरे में चोरों की तरह शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से ढहाकर मलवे में फेंक दिए जाने के बाद जिम्मेदारी के नाम पर लीपापोती हो रही है।
महापौर अर्चना वर्मा ने कहा कि जिन शहीदों ने देश को आजादी दिलाई, उनके साथ इस तरह का व्यवहार बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने इसे ‘माफी के लायक नहीं’ बताया। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें पहले जानकारी दी जाती, तो वे पूरी टीम के साथ मौके पर मौजूद रहतीं और प्रतिमाओं को सम्मानपूर्वक हटवाया जाता। शाहजहांपुर को शहीदों की नगरी बताते हुए उन्होंने इस घटना को ‘हृदय विदारक’ बताया।
जानकारी हुई कि ये प्रतिमाएँ शहर के किसी सुंदरीकरण अभियान के प्रोजक्ट के तहत गिराईं गईं। इन मूर्तियों के कारण जाम लगता था इसलिए इनको पीछे हटाना प्रस्तावित था। नई मूर्तियाँ लगनी थीं। शहीदों की मूर्तियां शहर की सुंदरता बाधक थीं। शहीदों की मूर्तियां अतिक्रमण की तरह हटा दिन गईं। महापौर को पता नहीं चला। पता नहीं कौन गिरा गया ये मूर्तियां। एफआईआर होने की बात हो रही है। जांच होगी। जांच के बाद शायद ठेकेदार के यहां दिहाड़ी पर काम करने वाला कोई बुलडोजर ड्राइवर बर्खास्त कर दिया जाए।
जहाँ इन शहीदों की मूर्तियां लगीं थीं उससे डेढ़-दो सौ मीटर दूर सदर थाना है। उनको भी पता नहीं चला और बुलडोजर चल गया। स्थानीय लोगों ने नगर निगम पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने अब तक माफियाओं के घरों पर बुलडोजर चलते देखा था, लेकिन शाहजहांपुर में शहीदों की प्रतिमाओं पर बुलडोजर चला दिया गया।
काकोरी कांड से जुड़े इन शहीदों का दुनिया भर के शहीदों में प्रमुख स्थान हैं। यहाँ लगी प्रतिमाएं इन शहीदों की सबसे प्रमुख प्रतिमाएं थीं। ऐसा कैसे हुआ कि इन पर बुलडोजर चल गया और किसी को पता भी नहीं चला।
उत्तर प्रदेश की सरकार के वरिष्ठ मंत्री शाहजहांपुर के विकास पुरुष के रूप में जाने जाने वाले माननीय महोदय को भी इस बारे में पता नहीं चला, ताज्जुब है। शहर के हर गली, मोहल्ले, सड़क, पुलिया, सेल्फी प्वाइंट, सार्वजनिक शौचालय के उद्घाटन, लोकार्पण, पुनर्निर्माण पर पत्थर पर माननीय का नाम है। हाल के वर्षों में शायद ऐसी कोई ट्रेन नहीं चली जिसको प्रधानमंत्री जी ने झंडी न दी हो। इसी तर्ज पिछले कुछ वर्षों में शाहजहांपुर में ऐसा कोई निर्माण नहीं हुआ जिस पर माननीय मंत्री जी का नाम न हो।
हो सकता है कि इन मूर्तियों को भी इस लिए ढहा दिया गया हो ताकि बाद में उनके उद्घाटन पर वर्तमान सरकार के लोगों के नाम होंगे। शहीदों से इस तरह नजदीकी जुड़ाव हो सकेगा।
शहीद पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल के चरित्र से प्रभावित होकर तुर्की के तत्कालीन शासक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की के एक शहर का नाम बिस्मिल के नाम पर रखा है। जिन बिस्मिल के नाम पर करीब सवा लाख की आबादी वाला बसा है उस शहर का क्षेत्रफल 1679 वर्ग किलोमीटर है। तुर्की में जिन बिस्मिल के नाम पर 1679 वर्ग किलोमीटर जमीन है उन्हीं बिस्मिल की मूर्ति को उनके अपने शहर में कुछ वर्ग फिट की ज़मीन मयस्सर नहीं। उनकी मूर्तियां अतिक्रमण की तरह बुलडोजर से ढहा दी जाती हैं।
नगर आयुक्त के बयान के अनुसार मूर्तियो के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या होती थी इसलिए मूर्तियाँ हटाई जानी थीं। शाहजहांपुर शहर की दो प्रमुख सड़कें संकरी हैं। उनके दोनों तरफ़ आबादी और दुकान के कारण लगभग रोज जाम लगता है। मूर्तियों के हटाने से जाम की समस्या खत्म नहीं होगी। यह एक बहुत लचर बहाना है।
आज के समय दुनिया में बड़ी-बड़ी बहुमंजिला इमारतें पूरी की पूरी स्थानांतरित करने की तकनीक मौजूद हैं। ऐसे समय में देश के शहीदों की प्रतिमाएं सौंदर्यीकरण के नाम पर ढहा देना शर्मनाक है।
जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' की पंक्तियां हैं :
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा॥
सौंदर्यीकरण के बाद शायद प्रतिमाओं की जगह कोई सुंदर बाज़ार बने, दुकाने खुलें तब हितैषी जी की पंक्तियां नए रूप में चरितार्थ होंगी। बाजार में रोज़ रौनक होगी। रोज़ लोगों के रेले-मेले लगेंगे।
पिछले वर्ष काकोरी एक्शन के सौ वर्ष पूरे होने पर देश भर में तमाम आयोजन हुए। शहीदों के बलिदान को याद करते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया गया। शहीदों को उनके क्रांतिकारी कृत्यों के लिए अंग्रेज़ सरकार ने फाँसी की सजा दी थी। अग्रेजों ने तो मुकदमा चलाया था, बहस का मौक़ा दिया था क्रान्तिकारियों को। लेकिन क्रान्तिकारियों की मूर्तियो को बिना कोई मौक़ा दिये, बिना किसी बहस के, बिना कोई बचाव का मौक़ा दिए , बिना नगर निगम की महापौर के , बिना माननीय मंत्री, महापौर की जानकारी ढहा दिया गया।
बीते सौ साल में समाज कितना क्रूर हो गया है।
बिस्मिल , अशफ़ाक़ और रोशनसिंह को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनकी मूर्तियां के साथ उनके जाहिल वंशजों ने क्या सलूक किया। वे अपनी मूर्तियों की स्थापना के लिए फाँसी पर नहीं चढ़े थे। फ़र्क़ जिन लोगों को पड़ता है वे जरूर सोचेंगे कि कोई समाज अपने देश के बलिदानी शहीदों के सम्मान के प्रति इतना ग़ैरजिम्मेदार , बेपरवाह, उदासीन कैसे हो सकता है कि उनकी प्रतिमाएँ अतिक्रमण की तरह रात के अंधेरे में ढहा दी जाएँ और ज़िम्मेदार लोग बयान दें कि उनकी जानकारी के बिना यह काम हो गया।https://www.facebook.com/share/p/1GQBggVbdh/

शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाक उल्ला ख़ान और ठाकुर रोशन सिंह की मूर्तियां जो अब ढहा दी गई हैं। 👇 शहीदों की टूटी, विखंडित मूर्तियां, जमींदोज मूर्तियों की फोटुएँ नेट पर मौजूद हैं। उनको लगाने की हिम्मत नहीं है मेरी। मेरी यादों में यही मूर्तियां रहेंगी।

Thursday, March 19, 2026

खबरों में गैस की किल्लत के समाचार


 आजकल अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्ध के चलते गैस की किल्लत की खबरें आ रहीं हैं। कुछ लोग इसे बकवास भी बता रहे हैं। दैनिक हिन्दुस्तान के लखनऊ संस्करण के दिनांक 19 मार्च, 2026 के पेज 6 से संकलित गैस समाचार इस प्रकार दिखे :

-माँ की अंतिम रस्मों में भी गैस के लिए जूझा बेटा।
-सिलेंडर मिला तो गैस कम निकली, झेली परेशानी।
-मैन्युअल बुकिंग न होने से परेशानी।
-धैर्य के लिए धन्यवाद मेसेज बढ़ा रहा दर्द।
-1600 का कामर्शियल सिलेंडर 2600 में मिल रहा।
-45 दिन की गई ग्रामीण इलाकों की समय सीमा।
-अरे ! बुक हो जाती तो यहाँ क्यों आते?
-रिक्शा हो या साइकिल, सबकी एक ही दौड़।
-एजेंसी का दफ्तर खुलने से पहले ही लगी लंबी कतार।
-उज्ज्वला कनेक्शन धारक भी हलकान।
-कब बदलेंगे हालात।
-मोबाइल टूट गया तो कहाँ से लायें ओटीपी?
-बढ़ी माँग के लिहाज़ से नहीं आ रहे सिलेंडर, गैस एजेंसियों का कोटा भी कम होने से मांग के अनुसार आपूर्ति नहीं की जा रही।
- रोजाना 7500 सिलेण्डरों की कमी, बढ़ते बैकलॉग ने बधाई परेशानी।
-15 हज़ार से अधिक ख़ान-पान दुकानें घरेलू सिलेंडरों पर चल रहीं।
-एजेंसी की लगाते रहे दौड़ और अब लटका मिला ताला।
-रसीद निकलवाने को एजेंसी दौड़ाया।
-आठवें दिन भी लोग ख़ाली हाथ लौटे।
-शेल्टर होम में लकड़ी के चूल्हे पर बना रहे खाना।
कानपुर और पटना के संस्करण में गैस की किल्लत के समाचार बहुत कम हैं। अलबत्ता आगरा संस्करण में ये समाचार दिखे :
-सभी की जेब पर भारी पड़ रही एलपीजी की कालाबाजारी।
-बुकिंग के सापेक्ष अब 94 प्रतिशत हुई गैस आपूर्ति।
-पूर्ति विभाग की टीम ने छापा मारकर 47 सिलेंडर जब्त किए।
-घर पर आनलाइन खाना मंगवाने पर लग सकता है ब्रेक।
-चूल्हा और लकड़ी लेकर कलेक्ट्रेट पर बैठी महिलायें।
दिल्ली संस्करण में गैस समाचार :
-भंडारों पर नहीं दिखेगा रसोई गैस की कमी का असर।
-करोड़ों का कारोबार प्रभावित ।
-अवैध गैस रिफ़िलिंग का भंडाफोड़।
बाक़ी संस्करणों में भी गैस की समस्या का जिक्र एकाध हेडिंग में है। लेकिन उसमें आमलोगों के बयान और आम लोगों की परेशानियों का जिक्र नहीं है। एक ही अखबार के अलग संस्करणों में एक ही समस्या का कवरेज अलग-अलग तरह हुआ है।
अलबत्ता सभी संस्करणों के मुखपृष्ठ पर मोटे शब्दों में योगी सरकार के नौ साल पूरे होने की खबर एक ही हेडिंग में है :
"यूपी में कोई भय नहीं -योगी।"
शायद मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश गए होंगे -खबर की हेडिंग यही होनी चाहिए। इसी रूप में छपनी चाहिए।
क्या पता लखनऊ के संपादक को कहीं से कोई फ़ोन आए -'तुमको बहुत गैस की समस्या हो रही है। किसी गैस के डॉक्टर से इलाज कराओ।'

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Wednesday, March 18, 2026

ऑटोमैटिक गाड़ियों का लफड़ा

 सुबह चाय बनाने के लिए गैस चूल्हा ऑन किया। स्पार्क हुआ लेकिन चूल्हा जला नहीं। पता चला गैस सप्लाई बाधित है। सोसाइटी के व्हॉट्सएप ग्रुप में देखा । घंटे भर पहले का मेसेज था -'गैस पाइप लाइन रिपेयर का काम चल रहा है। चार-पाँच घंटे गैस सप्लाई बाधित रहेगी।'

सुबह की चाय के बनाने के विकल्प सोचे। बिजली की केतली में पानी और दूध गर्म किया। थोड़ी देर में दूध उबलने लगा। फौरन स्विच बंद किया। लेकिन तब तक प्लेटफार्म गीला हो गया था। बाद में आहिस्ते-आहिस्ते चाय बनाई। गैस सप्लाई शुरू होने का इंतजार करते हुए ब्रेड,बटर का नाश्ता किया। फल खाये। दोपहर तक गैस सप्लाई बहाल हो गई। इस बीच गैस सप्लाई न होने पर कई विकल्प सोच डाले।
अखबार में एक पूरा पन्ने पर गैस की किल्लत के समाचार दिखते हैं। कई नामी रेस्तरां बंद होने के भी समाचार हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर कई लोग इस किल्लत को फर्जी बताते हुए पोस्ट लिख रहे हैं। पता नहीं सच क्या है?
अमेरिका-ईरान-इजरायल की लड़ाई पता नहीं कितने दिन चलती है। इसका दुनिया पर क्या असर पड़ेगा यह आने वाला समय बताएगा। अमेरिका के राष्ट्रपति मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) का हल्ला मचाते हुए अमेरिका को पीछे धकेलते हुए पता नहीं किस समय में ले जाना चाहते हैं। कम से कम उस समय तक ले ही जाना चाहता होंगे जब खाना बनाने के लिए गैस का चलन शुरू नहीं हुआ होगा।
दोपहर को कुछ सामान लेने गए। गाड़ी से। गाड़ी रोककर सामान लिया। लौटने के लिए गाड़ी स्टार्ट करने की कोशिश की। गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई। मेसेज आ रहा था -' गाड़ी की चाबी नहीं है।' जबकि चाबी हमारे हाथ में गाड़ी में ही थी। लेकिन डैशबोर्ड पर मेसेज के हिसाब से गाड़ी में चाबी नहीं थी। अजब बवाल।
सोचा कि साथ के बालक को घर भेजकर दूसरी चाबी मंगाई जाए। लेकिन फिर लगा कि शायद इसकी बैटरी खलास हो गई हो। संयोग की बात जिस दुकान के बाहर गाड़ी खड़ी थी वह बिजली की दुकान थी। पूछने पर उसके पास चाबी का बैटरी सेल मिल गया। नया सेल लगते ही गाड़ी स्टार्ट हो गई। चल दी। घर आ गए।
ऑटोमैटिक गाड़ियों का ये लफड़ा बड़ा अजीब है। गाड़ी कहीं भी खड़ी हो जाये और कह दे -'चाबी नहीं है।'
सेल खत्म होने के बाद गाड़ी एकदम मुक्त अर्थव्यवस्था की तरह हो जाती है। हर दरवाजा बिना ताला चाबी का हो जाता है। सुविधा की चीज कैसे असुविधा का कारण बन जाती है इसका कल एक बार फिर एहसास हुआ। सेल भी दो महीने पहले ही डलवाये हैं।
लोगों ने सुझाव दिया एकाध सेल स्पेयर में रख के चलिए। सेल ज्यादातर चीनी हैं। उनका भी कोई भरोसा नहीं। कब गोली दे जायें।
आटोमैटिक गाड़ी (समान) के साथ यह समस्या है। आटोमैटिक चलती है तो अपने आप खड़ी भी जाती है। गाड़ी में बैठी हुई सवारी बाहर नहीं निकल सकती अगर चाबी गाड़ी से दूर हो। मैनुअल मोड वाली गाड़ी में यह समस्या नहीं होती। इसी सिलसिले में आज ही एक खबर पढ़ी अखबार में जिसमें घर के लोग आग में जल गए। दरवाजा खुल नहीं पाया क्योंकि उसमें डिजिटल लॉक लगा था। आधुनिक होते सामानों के साइड इफ़ेक्ट हैं ये।
ऐसे में हमने एक बार फिर से सैंट्रो सुंदरी की याद आई। कहीं रुकी तो धक्का देने पर चल देती थी। गाड़ी की चाबी अंदर बंद हो गई तो बड़े स्केल से खिड़की खोल ली। और भी तमाम यादें। लेकिन अब तो वह यादों में ही रहेगी।
सैंट्रो सुंदरी के शीशे पर जली धूल पर Suman की लिखाई -'Anup You are always late' 👇