आज स्विमिंग के लिए निकलते समय पानी बरसने लगा। पहले धीमा फिर तेज। लगा पूल बंद होगा। लेकिन बिजली नहीं चमक रही थी। इसलिए सोचा शायद चालू हो पूल। लेकिन कोई सूचना नहीं थी ग्रुप में। सोचा पूल बंद भी होगा तो बारिश में भीगने की तमन्ना पूरी होगी। हम निकल लिए। सात बजकर चालीस मिनट थे जब निकले।
फ़ुरसतिया
हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै
लेबल
Thursday, July 16, 2026
बारिश में भीगना
आज स्विमिंग के लिए निकलते समय पानी बरसने लगा। पहले धीमा फिर तेज। लगा पूल बंद होगा। लेकिन बिजली नहीं चमक रही थी। इसलिए सोचा शायद चालू हो पूल। लेकिन कोई सूचना नहीं थी ग्रुप में। सोचा पूल बंद भी होगा तो बारिश में भीगने की तमन्ना पूरी होगी। हम निकल लिए। सात बजकर चालीस मिनट थे जब निकले।
Monday, July 13, 2026
तैराकी के किस्से
आज सबेरे तैरने के लिए समय पर निकले। हमारे आगे दो महिलायें साइकिल पर जा रहीं थीं। शायद काम पर। हमने सोचा आगे बढ़कर उनके काम के बारे में बतियायें। लेकिन उनको आपस में बतियाता देखकर नहीं बढ़े। एक बच्ची सड़क पारकर रही थी। उसको देखकर केदारनाथ सिंह कविता याद आ गई :
"मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है
क्योंकि इस तरह एक उम्मीद -सी होती है
कि दुनिया जो इस तरफ है
शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ़।"
बच्ची दिन में कई बार सड़क पार करती होगी। उसके लिए दुनिया एक जैसी रहती है।
आगे एक बच्चे मोटरसाइकिल पर बैठा था। बाइक की चाबी मुँह में दबाये वह इधर-उधर ताक रहा था। उसके माँ-बाप जमीन पर बैठे बतिया रहे रहे। मुझे लगा ऐसे ही किसी मामले में चाबी मुँह में चली जाती है। फिर उसको निकलने की जद्दोजहद होती है। कभी -कभी फँस भी जाती है चीजें गले में । फिर ऑपरेशन होते हैं।
डिवाइडर पर बैठे मजदूर लोग सुबह के होने का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ लोग मोबाइल देख रहे थे। कुछ बतिया रहे थे। कुछ बीड़ी पी रहे थे। कुछ लोग आते-जाते लोगों को ताक रहे थे। सामने एक छुटकी गुमटी में महिला ठसक के साथ मजदूरों को सामान बेच रही थी। उसके पान खाये मुँह से आत्मविश्वास की छटा दर्शनीय थी।
पूल पर ठीक आठ बजे पहुँचे। उतर गए पानी में। अच्छा अभ्यास हुआ। हाथ-पाँव सब ठीक चले। मुंडी भी ऊपर उठी। पानी के बाहर सर ऊपर करके साँस भी ली। लेकिन शायद ठीक से काम बना नहीं। इसलिए पाँच-सात मीटर बाद फिर से शुरू करते रहे।
पानी के बाहर सर करने के बावजूद साँस नहीं ले पाने का कारण शायद यह रहा कि हमको एक ही साँस में काम चलाने का अभ्यास है अभी तक। साँस का कैप्सूल जब तक चला तब तक तैरे। जहाँ साँस का कोटा ख़त्म, खड़े हो गए। साँस की बचत करके तैरने के अभ्यास के चलते नई सांस लेने में परहेज करते रहे।
राहत इंदौरी का शेर याद आता रहा :
"उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो"
मतलब साँस पूरी छोड़ने के पहले नई साँस ले लेनी चाहिए। लेकिन सर पानी के ऊपर उठाने के बावजूद हवा से सांस लेने का अभ्यास पक्का नहीं हुआ है अभी। एकाध बार ले भी की साँस। हाथ और पाँव आज पूरे अनुशासन से ड्यूटी पर लगे रहे। पुल ठीक हुआ, किक बढ़िया हुई। बस अब बीच का मामला ठीक करना है। बीच का मामला ठीक हो जाये तब क़ायदे से तैरना हो।
घंटे भर में 210 किलोकैलोरी खर्च करके पूल से वापस लौटे। कल पूल की छुट्टी है। लेकिन हमको अभ्यास करना है। किसी दूसरे पूल में जायेंगे। तैराकी सीखने में मजा आ रहा है। यह तैराकी से प्रेम है या हमारा पागलपन कहना मुश्किल। लेकिन प्रेम और पागलपन से जुड़ा एक संवाद जेरी पिंटो लिखित किताब 'एम और हूम साहब' में इस तरह है :
"प्रेम कभी भी पर्याप्त नहीं होता। पागलपन ज़रूर पर्याप्त होता है, यह अपने आप में पूरा होता है।"
कैसा लगा यह संवाद? किताब अभी पढ़ रहे हैं। पूरी पढ़ लेंगे तब लिखेंगे इसके बारे में।
Sunday, July 12, 2026
तैराकी के बहाने
हमने मई महीना खत्म होने के दो दिन पहले से स्वीमिंग सीखना शुरू किया। पहले हफ़्ते के बाद हाथ और पांव पानी में चलाने लगे। शुरुआत मिक्स्ड स्ट्रोक से की। हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्री स्टाइल में। हाथ और पांव की समस्या के कारण यह 'गठबंधन स्ट्रोक' चुना। फ्री स्टाइल में कंधे उखड़ जाने का डर था। ब्रेस्ट स्ट्रोक में जांघ के जोड़ में दर्द था। तैराकी शुरू हो गई। लेकिन सर पानी के ऊपर नहीं आता था।
समय के साथ जांघ का दर्द खतम हो गया। शायद स्वीमिंग से फ़ायदा हुआ। वाटर थेरेपी जैसा कुछ। हम पाँव भी ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलाना शुरू कर दिए। लेकिन फ्री स्टाइल में पांव चलाना भूलने और ब्रेस्ट स्ट्रोक में सीखने में हफ्ता से ज़्यादा लग गया। अब हाथ और पांव ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलने लगे हैं। कभी ग़लत चलता है तो फ़ौरन अंदाज़ा हो जाता है। लगता है 'मिसस्ट्रोक' हो गया।
सीखने के दो हफ़्ते बाद एक कोच ने PC का सुझाव दिया। PC मतलब पर्सनल कोचिंग। सुझाया -'आप फलाने सर से PC ले लीजिए। जल्दी सीख जायेंगे।' हमने सुझाव सुन लिया लेकिन अमल में नहीं लाए। हमको कोई हड़बड़ी नहीं थी। जल्दी सीखकर क्या करेंगे? सोचा आराम से सीखेंगे। जल्दी सीखने में लफड़ा यह भी गलतियाँ कम होंगी। ग़लतियाँ नहीं होंगी तो मजा नहीं आयेगा। उन ग़लतियों से सीखने का मौक़ा गँवाना कोई समझदारी थोड़ी है।
PC से हमको अपनी कक्षा 11 के एक किस्से की याद आ गई। हम हिन्दी मीडियम से कक्षा 10 पास कर के अंग्रेजी मीडियम में कक्षा 11 में आए थे। बीएनएसडी के F1 सेक्शन में। उस समय हाई स्कूल के यूपीबोर्ड के 75% से ऊपर नंबर लाए बच्चे F1 में पढ़ते थे। शुरुआती दिनों में लेक्चर अंग्रेजी समेत बाउंसर जैसे निकलते रहे। जो बोर्ड में लिखते गुरुजी वही समझ में आता। बाक़ी हवा हवाई हो जाता। तिमाही इम्तहान हुआ। फिजिक्स में चालीस में नौ नम्बर थे। मतलब फेल। हाईस्कूल में अपने स्कूल का टॉपर रहा बच्चा तीन महींने बाद फेल हो गया। सिर्फ़ माध्यम बदलने से।
कॉपी दिखाई गई। पता चला एक चार नम्बर का सवाल जांचने से रह गया था। हमने सवाल सही भी किया था। चार नम्बर जोड़कर 13/40 नंबर हो गए। फेल होने से बच गए। बाद में पता चला गुरु जी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं। कई लड़कों ने उनसे पढ़ना शुरू कर दिया। हमसे भी कहा गया। लेकिन हमारे पास न गुजाईश थी न मन। हमने ट्यूशन ज्वाइन नहीं की। बस मेहनत करते रहे। उस समय की चलन में जितनी भी किताबें थीं सबके सवाल लगाकर अभ्यास करते रहे। उसका फ़ायदा हुआ कि बिना ट्यूशन पढ़े पास होते रहे। बाद में तो बाजपेयी सर के संपर्क में आने पर उत्साह भी बढ़ गया। मेहनत और उत्साह के संगम का फल यह हुआ कि इंटर में यूपीबोर्ड की मेरिट लिस्ट में भी नाम आया।
हमने तो PC नहीं ली। लेकिन कोच लोग कुछ लोगों को जिस तरह तल्लीनता से सिखाते हैं उससे लगता है कि उन लोगों ने PC ली है। कोच लोग उन कुछ लोगों को हाथ पकड़कर, सर और पैर के मूवमेंट सिखाते हैं उससे लगता है कि वे उन लोगों के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम कुछ पूछते हैं तो हाँ, ना में बताकर उनको सिखाने में लग जाते हैं। हमारे हिस्से पूल और पानी ही आता है। लेकिन हमको कोई शिकायत नहीं। हमने ख़ुद को अपना कोच नियुक्त कर रखा है। पर्सनल कोच। बिना फीस का कोच। हर स्टेप पर अपनी कॉपी जांचते हैं और कमियाँ पकड़कर सही करते हैं। कभी-कभी वहाँ मौजूद कोच से अपने मूवमेंट के बारे में पूछते हैं तो वो दूसरी तरफ़ या अनमने अंदाज़ में देखकर बताते हैं -' ठीक है। साँस लीजिए। सर थोड़ा और ऊपर उठाइये। सीख जायेंगे।'
हम सोचते हैं -' सीख तो जायेंगे ही। कोई नाम नहीं मुश्किल, जब किया इरादा पक्का।'
आज थोड़ा देर से पहुँचे पूल। दस मिनट देर। लेकिन आज सर पानी से बराबर ऊपर उठने लगा। साँस पानी के अंदर नाक से छोड़ते हुए सर उठाने लगे। थोड़ी साँस लेने भी लगे। लेकिन पूरी तरह साँस लेना अभी आया नहीं। असल में जिस समय सर ऊपर होता है उस समय पैर तमाशबीन की तरह ठहर जाते रहे। पैरों को लगता होगा कि पानी से सर बाहर आना कितनी ऐतिहासिक घटना है। इसको देखना जरूरी है। लिहाजा वे ठहरकर शायद नजारा देखने लगते। इसके चलते शरीर पानी में डूबने लगता। हम खड़े हो जाते।तैरना स्थगित हो जाता।
दूसरी समस्या यह महसूस की हमने हम जिस समय सर पानी के ऊपर उठाते हैं ठीक उसी समय पाँव पीछे की तरफ़ करते हैं। दोनों काम एक साथ होने से फ्लोटिंग को समय कम मिलता है। शरीर टेढ़ा होकर पानी में न्यूनकोण (45 डिग्री) बनाकर खड़ा हो जाता है।जबकि होना यह चाहिए कि सर ऊपर उठाकर साँस लेने के बाद पांव पीछे करने चाहिए ताकि पानी में संतुलन बना रहे। फ्लोटिंग होती रहे। इस पर मेहनत करना है। एकाध, दो-चार, पाँच-सात दिन में हो जाएगा।
हमारा तैराकी रोचनामचा पढ़कर हमारे कुछ मित्र भी पानी में उतर चुके हैं। तैरना सीखने लगे हैं। हमारे कानपुर के मित्र राजीव टंडन जी ने तो तैरने के साथ -साथ हर गतिविधि का विश्लेषण भी करना शुरू कर दिया है। तैरते हुए टिल्ट क्यों होता है, ये क्यों, वो कैसे। कल सुनीता सनाढ्य पांडेय जी ने भी बताया कि वे अपने जीवन-जोड़ीदार के साथ तैरना सीख रही हैं। इसके अलावा और कई मित्रों ने तैरना सीखने के बारे में सोचना शुरू कर दिया। शायद जल्दी ही वे भी स्वीमिंग पूल पहुंचे।
हमारी यह 'तैराकी कुंडली' हमारे मित्र Parveen Goyal ने बनाकर हमारी पिछली पोस्ट की टिप्पणी में लगाई थी। हम इसे अपने पोस्ट में लगा रहे हैं। इसमें तैराकी के टिप्स भी हैं और सीखने का सूत्र वाक्य भी - ' उम्र सिर्फ़ एक संख्या है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती।'
आप भी सोच रहे हैं तैरना सीखने के बारे में? सीखिये। मजेदार है।
Saturday, July 11, 2026
तैराकी सीखने का छठा हफ़्ता
स्वीमिंग पूल में घंटा पूरा होने के पाँच मिनट पहले सीटी बजने लगती है। चेंज करिए। बाहर निकलिए। आ जाइए। अंकल टाइम अप हो गया का हल्ला शुरू हो जाता है। अपन भो घड़ी देखकर निकलने का उपक्रम करते हुए एकाध बार और तैरने का मन बनाते हैं। देखते हैं घड़ी। कभी लगता है 57 मिनट हुए। तीन मिनट बाद निकलेंगे पूल से। कभी तैराकी में खर्च कैलोरी 200 से दो-चार-दस कम दिखती है । लगता है डबल सेंचुरी कर ही लें। कभी मन की कर लेते हैं। कभी पहले ही बाहर आना होता है।
तैराकी का हमारा बैच सबेरे आठ से नौ का है। इसके बाद सबेरे की शिफ्ट खतम हो जाती है। सारे कोच घर जाने के मूड में होते हैं। कपड़े पहनकर, झोला उठाकर चलने को तैयार। जाने के पहले सुनिश्चित करना होता है कि कोई पूल में रह न जाये। इसीलिए सबको बाहर निकालने के लिए बार-बार कहते हैं।
कल हम पूल से निकल रहे थे। कोच ने कहा -'अंकल घड़ी देखकर निकलते हैं। पूरा समय यूटिलाइज करते हैं।'
हमने कहा -' हाँ भाई, क्लास पूरी होनी चाहिए। बंक नहीं करना चाहिए।'
उसने कहा -' स्वीमिंग बैच एक घंटे का होता है। लेकिन टाइम पचपन मिनट का होता है। पाँच मिनट चेंज का होता है।'
हमारा तो घंटा हो चुका था। हम पूल से निकलकर शॉवर लेकर निकल आए। तय किया पाँच-दस मिनट पहले आया करेंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। पूल पहुंचते-पहुंचते आठ बज ही जाते हैं।
मंगलवार को पूल बंद रहता है। उस दिन पास के दूसरे पूल गए। वह पूल छोटा है। लगभग आधा। महीने की फ़ीस ढाई हज़ार (हमारे पूल की तीन हज़ार है)। एक दिन की फीस डबल। दो सौ रुपए देकर घंटा भर तैरे।
कोच ने हमारी बातचीत सुनकर कहा -'आप कानपुर के हैं? '
हमने पूछा -' कैसे पहचाना?'
उसने कहा -'आपके बातचीत करने के अंदाज़ से।'
हमने सोचा ये तो मजेदार है। हमारी बातचीत से कोई पहचान ले कि हम कानपुरिया हैं- 'झाड़े रहो कलट्टरगंज।'
बाद में पता चला बालक बलिया का है। बलिया से जुड़ा जुमला है -'बलिया जिला घर बा तो कौन बात का डर बा?'
हमने बालक से कहा -'आप सिखाओ तो आकर।'
बालक ने कहा -'चलिए हम आते हैं।'
पूल में उतरते ही बालक कूदकर पानी में आ गया। हाथ, पाँव चलाने के तरीक़े बताते रहा। पैर पकड़कर मेढक की तरह चलाये भी। इसके बाद हम तैरते रहे।
साथ में तैरने वाले बुजुर्ग ने बताया -'साढ़े पाँच महीने हो गए। अभी पूरा सीखे नहीं है।'
हमने सोचा -'अभी हमारा तो महीना ही हुआ सीखते। ये तो हमसे पहले से सीख रहे हैं।' अपना अभी तक तैरना सीख न पाने का अपराध बोध पानी में घुल गया।
साथ की महिला ब्रेस्ट स्ट्रोक, फ्री स्टाइल, बैक स्ट्रोक मतलब हर तरह से तैराकी कर रही थीं। उन्होंने हमें ब्रेस्ट स्ट्रोक के गुर बताये। तैरकर बताया। हमने सोचा -' ये साथ में सिखातीं तो हफ़्ते भर में ही सीख जाते।' लेकिन सोचने से क्या होता है?
इस बीच रोज ढेर सारे वीडियो देखे यूट्यूब पर। ब्रेस्टस्ट्रोक के। नोट्स लिए। कौन सी ग़लतियाँ न करें। सब नोट किया। याद भी किया कि ब्रेस्ट स्ट्रोक में एक्शन का क्रम Pull (हाथ) , breathe (साँस) , kick (पैर) , glide (शरीर) की गतिविधि होती है। कुछ और सूत्र ये हैं :
Saturday, June 27, 2026
तैराकी सीखने का पच्चीसवाँ दिन
आज सुबह स्वीमिंग के लिए घर से निकले। सोसाइटी के गेट के पास एक गिलहरी सड़क पार करती हुई दिखी। हमारी गाड़ी के आगे से निकली। मतलब गिलहरी रास्ता काट गई। लेकिन गिलहरी के रास्ता काटने से कोई अपशकुन जुड़ा नहीं है इसलिए आगे बढ़ गए। दरबान ने गाड़ी देखकर अलसाये, अनमने मन से गेट से खोला। दिन भर में सैकड़ों बार गेट खोलना पड़ता है दरबान को।
गेट के बाहर निकलते ही एक बालिका पूरे शरीर को ढँके स्कूटी पर आते दिखी। केवल आँखे दिख रहीं थीं। एकदम पुतलीबाई सरीखी। धूप से बचाव के लिए मुफ़ीद ड्रेस। लेकिन इस चक्कर में सुबह की विटामिन डी का नुक़सान हो रहा होगा। सूरज की किरणों की विटामिन डी की मिसाइल 'क्लॉथ डोम' टकराकर वापस लौट गईं होंगी।
रेलवे अंडरपास के आगे लाल पैथोलॉजी में काम करने वाली बच्ची सामने से आते दिखी। अक्सर दिखती है। सुबह पैथोलॉजी खोलने जाती है। वही टेस्टिंग के सैंपल भी लेती है। सर झुकाये मोबाइल में कुछ देखती चली आ रही थी। हमने हार्न बजाया। उसने सर उठाया। हाथ हिलाने पर उसने भी मुस्कराते हुए हाथ हिलाया। दाँत चमके। इसके बाद वह फिर चलते हुए मोबाइल देखने लगी।
चलते हुए मोबाइल देखने से कल की बात याद आई। चौराहे पर ट्रैफिक सिपाही एक हाथ से गाड़ियों को दिशा दे रहा था। दूसरे हाथ से मोबाइल थामे लगातार कहीं बतियाता जा रहा था। बतियाने से फुर्सत मिलती तो मोबाइल देखने लगता। उसकी मोबाइल निर्भरता देखकर लगा कि यह उसकी ड्यूटी का अपरिहार्य हिस्सा है। मोबाइल अलग कर दिया जाये तो शायद उसका ड्यूटी करने मुश्किल हो जाये।
स्वीमिंग सीखने में ब्रेस्ट स्ट्रोक (हाथ से) और फ्री स्टाइल (पैर से) के गठबंधन से शुरुआत की थी। कुछ दूर तक तैरने भी लगे थे। लेकिन फिर लगा कि तैराकी में गठबंधन सरकार चल नहीं पायेगी। इसके बाद पैर भी फ्री स्टाइल की जगह ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलाना सीखने लगे। सीखने से ज़्यादा मेहनत फ्री स्टाइल में पांव चलाना भूलने में लगी। दो दिन हुए हाथ और पांव ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलना सीख लिए। बस दोनों का गठबंधन कराना है। हाथ और पैर के मूवमेंट का गठबंधन होते ही हमारी तैराकी की गृहस्थी बस जाएगी।
आज अभ्यास करते हुए देखा कि हाथ और पैर दोनों फ्रीस्टाइल में चलने लगे। दोनों में गठबंधन सा हो गया है। करीब पाँच सात मीटर तैरे भी। अब बस कुछ दिन और अभ्यास की ज़रूरत है। इसके बाद स्टेमिना बनाना है। देर तक और दूर तक तैरना सीखना है। सीख जायेंगे। हमको कोई हड़बड़ी थोड़ी है। आराम-आराम से सीखेंगे। सीख रहे हैं।
आज हमारा तैराकी सीखने का पच्चीसवाँ दिन था।
Friday, June 26, 2026
संस्कारी युवा पीढ़ी
चारबाग रेलवे स्टेशन पर चाय पीते हुए अगल-बगल के नजारे भी देखते रहे। लोग आ-जा रहे थे। स्टेशन से गाड़ियों के आने-जाने की सूचनाएँ प्रसारित हो रहीं थीं। कोने के जीने से स्टेशन से बाहर की तरफ़ आने वाले यात्रियों की भीड़ देखकर लगा कि किसी ने आदमियों से भरा बोरा सीढ़ियों पर उलट दिया हो।
Thursday, June 25, 2026
मैराथन चाय बालक
कल चारबाग स्टेशन जाना हुआ। बेटे को लेने के लिए। दिल्ली से आने वाली लखनऊ मेल से। गाड़ी राइट टाइम थी। हम थोड़ा जल्दी पहुँच गए। चारबाग स्टेशन के सामने वाली दुकान पर चाय पी।
चाय की दुकान पर अकेला बच्चा था। वही चाय बना रहा था। बन मक्खन भी। बिस्कुट सामने कंटेशनर में रखे था। ज्यादातर लोग चाय पीने वाले थे। कुछ लोग बन मक्खन भी ले रहे थे। दुकान के सामने फुटपाथ पर कुछ लड़के-लड़कियां अपने सूटकेस पर बैठे थे। शायद कहीं बाहर से आए थे। शायद कोई इम्तहान देने आए होंगे। और किसी काम से भी आए हो सकते हैं। लेकिन स्टेशन पर कोई युवा सूटकेस, बैग लिए दिखता है तो यही लगता है कोई इम्तहान देने आया है या इंटरव्यू। यह भी क्या पता इसका इम्तहान भी निरस्त होने वाला है।
सामने ही एक रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर सो रहा था। शायद रात में रिक्शा चलाया हो। उसकी सुबह अभी हुई नहीं थी।
चाय पीते हुय बच्चे से बात से बात की। उसने बताया कि वह लगातार 48 घंटे से जगा हुआ है। नींद आ रही। बहुत तेज आ रही है । लेकिन क्या करें? पहले भी कई बार इस तरह लगातार काम कर चुका है। उसका रिलीवर नहीं आया तो मजबूरी में काम पर लगा हुआ है। रिलीवर आयेगा तब छुट्टी होगी। आँखों में नींद की झलक थी। लेकिन बच्चा मुस्कराते हुए बात कर रहा था।
और बात करने पर पता चला बच्चा सीतापुर का रहने वाला है। पिताजी की बीमारी के चलते इंटर के बाद काम में लग गया।करीब डेढ़ साल हो गए काम करते। अब पिताजी ठीक हैं। लेकिन बच्चे का काम जारी है।
48 घंटे जागकर लगातार चाय बेचने की बात सुनकर ताज्जुब व्यक्त किया। उसने बताया कि एक बार लगातार तीन दिन काम किया। तीन दिन मतलब 72 घंटे। मैराथन चाय वाला। बालक ने बताया कि आमतौर पर उसकी ड्यूटी 24 घंटे की होती है। 24 काम फिर आराम। यही 24 घंटे कभी 48 और कभी 72 में बदल जाते हैं।
लगातार काम करने का कारण बालक ने बताया -'दुकान जीजा की है। दीदी के घर रहता है। अपनी दुकान है। इसलिए देरी हो जाने के कारण भी करता रहता है।
बालक ने कहा -'जाड़े में चाय बेचने में मजा आता है। उस समय ग्राहक खूब आते हैं। जब ग्राहक आते हैं तो काम करने में मजा आता है।'
एक चाय 15 की और बिस्कुट 5 रुपए का था। हमने बात करने के लालच में एक चाय और पी। चाय बनी भी बढ़िया थी।
सोचा 'माननीय चाय वाले' से कठिन मेहनत तो यह बालक कर रहा है। अनगिनत लोग कर रहे होंगे। लेकिन उनकी चर्चा नहीं होती। आम लोगों की चर्चा नहीं होती। चर्चा ख़ास लोगों की होती है। चर्चा के लिए इंसान खास होना जरूरी होता है। आम लोगों के हिस्से 'चर्चा रस श्रवण' हो आता है।


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