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| अनूप शुक्ल पानी में तैरते हुए । फोटो AI के सहयोग से। |
आज सबेरे तैरना सीखने के लिए समय पर चले। पुल के नीचे तीन महिलाएं जाते हुए दिखी। शायद मार्निंग वॉक करके घर लौट रहीं थीं। तीनों महिलाएं हाथ आगे-पीछे करते जा रही थीं। हमें लगा वे सड़क पर खड़े-खड़े तैर रहीं हैं। हाथ चप्पू की तरह चलते हुए हवा को पीछे फेंकती हुई। हाथ और पांव के संतुलन से हवा के पूल में तैरती हुई आगे जा रहीं हैं।
जबसे तैरना सीखना शुरू किया है, तबसे हर इंसान को तैरने के नजरिये से ही देखने की आदत सी हो गई है। पूल में हाथ और पैर का संतुलन गड़बड़ देखकर लगता शरीर-पार्टी के हाईकमान और कार्यकर्ताओं में तालमेल का अभाव है। मुँह से डेंचर निकलता तो लगता, कि यह पट्ठा अपनी अलग पार्टी बनाने के जुगाड़ में है। हम उसको पकड़कर अंदर कर लेते।
पूल पर पहुंचकर स्टॉफ़ बालिका ने कहा -'आप अपना कार्ड ले लीजिए।' इसके बाद खोजने पर कार्ड मिला नहीं । बोली -'बन गया है। कल ले लीजिएगा।' हम ठीक है कहकर शॉवर लेने चले गए।
शॉवर लेने के बाद पूल में उतरे। साँस रोककर मुण्डी पानी में डाली। हाथ से पानी काटने का अभ्यास किया । इसके बाद पांव चलाने की प्रैक्टिस। मुँह में सांस भरकर पानी में सर झुकाते तो शरीर अपने अप ऊपर उठता। इसके बाद हाथ-पाँव चलाने के अभ्यास करते। हाथ या पांव में से कोई एक साथ देने से इनकार कर देता। इतने में साँस फूल जाती और हम ऊपर आ जाते। कभी आहिस्ते से, कभी संतुलन बिगड़ने के कारण लड़खड़ाते हुए।
गनीमत यह रही कि पानी में लड़खड़ाते हुए भी याद रहता कि पानी के अंदर सांस नहीं लेनी है। नतीजतन मुँह या नाक में पानी नहीं गया। अलबत्ता एक बार झटके से ऊपर आने और पानी बाहर निकलने में डेंचर मुँह से निकलकर पानी में बहने लगा। डूबा नहीं। गोया डेंचर हमको बता रहा हो ऐसे तैरा जाता है पानी में।
कुछ देर के अभ्यास के बाद हमने पानी में मौजूद कोच से पूछा -'अब क्या करें?' उसने हाथ से पानी काटने और पाँव मेढक की तरह चलाते हुए तैरने का अभ्यास बताया । हमने बताया पांव उस तरह चलाने में तकलीफ़ होती है। इस पर उसने ऊपर-नीचे छप्प-छैंया वाले अंदाज में पैर चलाने को कहा। हमने उसके सामान अभ्यास किया। उसने दूसरी तरफ़ देखते हुए कहा -'हाँ ऐसे ही करिए।'
हमने फिर कहा -' फिर से देखो। ठीक कर रहे हैं?'
इस बार उनमे अनमने मन से हमारी पाँव की एक्सरसाइज देखी। कहा -' ठीक कर रहे हैं। बस घुटने को मोड़ें नहीं। सीधे पांव सीधे रखकर ऊपर-नीचे करिए।'
हमने करके फिर अपनी तैराकी की कॉपी जँचवाई। इस बार उसने बिना किसी सलाह के हमारे एक्शन को अप्रूव कर दिया। इसके बाद अभ्यास करने को कहा।
अब हमने कई बार पानी में अभ्यास किया। पहले सर नीचे किया, हाथ चलाये, पाँव चलाये। कभी हाथ चलना रुक जाता, कभी पाँव ठहर जाते। लेकिन गनीमत यही रही कि साँस उखड़ने के पहले हम आराम से मुँह पानी के बाहर निकाल ले रहे थे। घबराहट ख़त्म हो गई। पानी में रहने का डर खत्म हो गया। पानी दोस्त लगने लगा। नई दोस्ती का रोमांच महसूस हुआ।
एक बार डर खत्म हुआ तो याद आया -'डर के आगे जीत है।'
यह याद आते ही कई बार अभ्यास किया। हर बार करीब तीन-चार फुट पानी में तैरने का अभ्यास किया। कोच को दिखाया। कोच ने इशारे से कहा ठीक हो रहा है। बाद में मुँह से भी कहा -'बहुत अच्छा कर रहे हैं। ऐसे ही अभ्यास करिए। सीख जायेंगे।'
इसके बाद पूल से बाहर निकलने की सीटी बज गई। हमने आज का आख़िरी अभ्यास करने की सोचते हुए दुबकी लगाई। पानी मुँह में भर गया। फौरन ऊपर आ गए। इसके बाद गहरी सांस लेकर मुंडी नीचे करके हाथ और पांव एक साथ चलाये। पानी में तैरते हुय आगे बढ़े। सर ऊपर किया और पीछे देखा तो लगा क़रीब पाँच फुट तैर लिए (नाप के नहीं देखा, अंदाज़ लगाया)। पूल के बाहर निकल आए।
पूल के बाहर निकलकर याद आया आज हमारा तैरना सीखने का पांचवा दिन था। पाँचवें दिन पाँच फ़ुट तैर लेना काम भर की उपलब्धि है।
जिंदगी में पहली बार बिना किसी सपोर्ट के पानी में तैरने की ख़ुशी हुई। बच्चा जब लड़खड़ाते हुए पहला कदम और फिर कुछ और कदम चलता है तो उसे देखकर उसके माँ-बाप को खुशी होती है। उसी घराने की ख़ुशी हमको अपने लिए हुई। यहाँ हमीं आपने माँ-बाप थे।
पूल से बाहर आकर घर आते हुए रास्ते में दिहाड़ी मजदूर दिखे। सुबह के सवा नौ बजे तक करीब दस साइकिलों पर राज मिस्त्री के औजार लदे थे। इसके अलावा कई लेबर भी थे। उनको काम नहीं मिला था। अपनी तरफ़ आती हर गाड़ी, हर इंसान को वे आशा की नजर से देखते। गाड़ी , इंसान के पास से गुज़र जाने के बाद वे अगले आने वालों को देखने लगते।
नुक्कड़ पर फल वाले से फल लिए। उसने बताया -'मसाला छोड़ दिया है। बस एक पुड़िया खाई कल। बहुत तलब लगी थी। रोक नहीं पाये। लेकिन छूट जायेगी आदत।' हमने मन में आमीन कहा। काश ऐसा हो सके।
पराग डेयरी चौराहे पर एक आदमी हर गाड़ी को हाथ देते हुए लिफ्ट माँग रहा था। मिली नहीं। हमसे लिफ्ट माँगी नहीं। कल घर में बातचीत के दौरान हमारी अजनबी इंसानों को लिफ्ट देने की आदत की आलोचना और कड़ी निंदा हुई थी। हमको याद आया तो हमने उसको बिना मांगे लिफ्ट दे दी। गाड़ी में बैठाकर पूछा -'कहाँ जाना है?'
उसने हमारे हमारे सेक्टर के बिजलीघर का पता बताया। अमित का आदमी है सोचकर हम निश्चिंत हो गए। रास्ते में बतियाते हुए पता चला कि संविदा में काम करता है। बिजली मरम्मत के लिए सीढ़ी ले जाने का काम करता है। घर हरदोई में हैं। परिवार छुट्टियों में घर गया।
इतनी बातचीत के बाद उसको घर के पास तिराहे पर उतारा। उसने कहा -'आपको बिजली का कोई काम हो तो बताइयेगा। जलवायु विहार में बहुत काम किया है। अक्सर जाते रहते हैं। हमारा नाम शिब्बू कश्यप है। '
तिराहे में उसको उतारने में लगी देर के कारण पीछे खड़ी गाड़ी वाले ने हार्न बजाया। गाड़ी वाले की इस हिमाकत को शिब्बू ने नाराजगी से देखा । उसको कुछ हड़का सा भी दिया। जिस गाड़ी ने उसको बिना मांगे लिफ्ट दी उसकी शान में गुस्ताखी शिब्बू को नागवार लगी।
हम शिब्बू और गाड़ियों तिराहे पर छोड़कर घर आ गए।

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