Tuesday, March 24, 2026

शहीदों की प्रतिमाओं का अनादर


 आज सुबह पता चला कि कल शाहजहांपुर में शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान और ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमाओं को बुलडोजर से गिराकर कहीं डंपिंग ग्राउंड पर फेंक दिया गया।

बिस्मिल, अशफ़ाक़ और रोशनसिंह को काकोरी कांड ( 09 अगस्त, 1925) में शामिल होने के कारण फाँसी हुई थी। तीनों शहीदों के शाहजहांपुर से जुड़े होने के कारण इस शहर को बलिदानी शहर कहा जाता है। शाहजहांपुर के वीर रस के कवि किसी भी मंच पर हों ये मुक्तक अवश्य पढ़ते थे :
विश्व के संताप सब बोये गए है।
धूल के कण रक्त से धोए गए हैं।
पांव के बल मत चलो अपमान होगा।
सर शहीदों के यहां बोये गए हैं।
बिस्मिल और अशफ़ाक़ का अटूट और अनूठा रिश्ता सांप्रदायिक सद्भाव का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह सांप्रदायिक सद्भाव शाहजहांपुर की खासियत रही है। 1992 में बाबरी मस्जिद कांड के बाद लगभग पूरा उत्तर भारत दंगों की चपेट में था। ऐसे समय में शाहजहापुर उन कुछ शहरों में था जहाँ कोई दंगा नहीं हुआ था। यह शायद बिस्मिल-अशफ़ाक़ की साझी सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत के कारण संभव हुआ।
शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान के बीच का सांप्रदायिक सद्भाव का अटूट भी उन लोगों को अखरता था जिनकी राजनीति की दुकान ही सांप्रदायिक वैमनस्य की जमीन पर चलती है।
शहर के लगभग केंद्रीय स्थल पर स्थित शहीदों की ये प्रतिमाएं शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल थीं। बाहर से आने वाला कोई भी शहर आता तो इन प्रतिमाओं को जरूर देखने आता। माल्यार्पण करता। इन प्रतिमाओं से कुछ दूरी पर ही खिरनी बाग में बिस्मिल का घर है। थोड़ी दूर पर स्टेशन के पास अशफाक उल्ला की मजार है। देश के लिए क़ुर्बान हो जाने वाले शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से गिराकर मलवे में फेंक देना वाला समाज कृतघ्न, मानसिक रूप से दिवालिया और अपराधी मनोवृत्ति का ही कहा जाएगा।
कल भगतसिंह के जन्मदिन मौके पर रात के अंधेरे में चोरों की तरह शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से ढहाकर मलवे में फेंक दिए जाने के बाद जिम्मेदारी के नाम पर लीपापोती हो रही है।
महापौर अर्चना वर्मा ने कहा कि जिन शहीदों ने देश को आजादी दिलाई, उनके साथ इस तरह का व्यवहार बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने इसे ‘माफी के लायक नहीं’ बताया। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें पहले जानकारी दी जाती, तो वे पूरी टीम के साथ मौके पर मौजूद रहतीं और प्रतिमाओं को सम्मानपूर्वक हटवाया जाता। शाहजहांपुर को शहीदों की नगरी बताते हुए उन्होंने इस घटना को ‘हृदय विदारक’ बताया।
जानकारी हुई कि ये प्रतिमाएँ शहर के किसी सुंदरीकरण अभियान के प्रोजक्ट के तहत गिराईं गईं। इन मूर्तियों के कारण जाम लगता था इसलिए इनको पीछे हटाना प्रस्तावित था। नई मूर्तियाँ लगनी थीं। शहीदों की मूर्तियां शहर की सुंदरता बाधक थीं। शहीदों की मूर्तियां अतिक्रमण की तरह हटा दिन गईं। महापौर को पता नहीं चला। पता नहीं कौन गिरा गया ये मूर्तियां। एफआईआर होने की बात हो रही है। जांच होगी। जांच के बाद शायद ठेकेदार के यहां दिहाड़ी पर काम करने वाला कोई बुलडोजर ड्राइवर बर्खास्त कर दिया जाए।
जहाँ इन शहीदों की मूर्तियां लगीं थीं उससे डेढ़-दो सौ मीटर दूर सदर थाना है। उनको भी पता नहीं चला और बुलडोजर चल गया। स्थानीय लोगों ने नगर निगम पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने अब तक माफियाओं के घरों पर बुलडोजर चलते देखा था, लेकिन शाहजहांपुर में शहीदों की प्रतिमाओं पर बुलडोजर चला दिया गया।
काकोरी कांड से जुड़े इन शहीदों का दुनिया भर के शहीदों में प्रमुख स्थान हैं। यहाँ लगी प्रतिमाएं इन शहीदों की सबसे प्रमुख प्रतिमाएं थीं। ऐसा कैसे हुआ कि इन पर बुलडोजर चल गया और किसी को पता भी नहीं चला।
उत्तर प्रदेश की सरकार के वरिष्ठ मंत्री शाहजहांपुर के विकास पुरुष के रूप में जाने जाने वाले माननीय महोदय को भी इस बारे में पता नहीं चला, ताज्जुब है। शहर के हर गली, मोहल्ले, सड़क, पुलिया, सेल्फी प्वाइंट, सार्वजनिक शौचालय के उद्घाटन, लोकार्पण, पुनर्निर्माण पर पत्थर पर माननीय का नाम है। हाल के वर्षों में शायद ऐसी कोई ट्रेन नहीं चली जिसको प्रधानमंत्री जी ने झंडी न दी हो। इसी तर्ज पिछले कुछ वर्षों में शाहजहांपुर में ऐसा कोई निर्माण नहीं हुआ जिस पर माननीय मंत्री जी का नाम न हो।
हो सकता है कि इन मूर्तियों को भी इस लिए ढहा दिया गया हो ताकि बाद में उनके उद्घाटन पर वर्तमान सरकार के लोगों के नाम होंगे। शहीदों से इस तरह नजदीकी जुड़ाव हो सकेगा।
शहीद पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल के चरित्र से प्रभावित होकर तुर्की के तत्कालीन शासक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की के एक शहर का नाम बिस्मिल के नाम पर रखा है। जिन बिस्मिल के नाम पर करीब सवा लाख की आबादी वाला बसा है उस शहर का क्षेत्रफल 1679 वर्ग किलोमीटर है। तुर्की में जिन बिस्मिल के नाम पर 1679 वर्ग किलोमीटर जमीन है उन्हीं बिस्मिल की मूर्ति को उनके अपने शहर में कुछ वर्ग फिट की ज़मीन मयस्सर नहीं। उनकी मूर्तियां अतिक्रमण की तरह बुलडोजर से ढहा दी जाती हैं।
नगर आयुक्त के बयान के अनुसार मूर्तियो के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या होती थी इसलिए मूर्तियाँ हटाई जानी थीं। शाहजहांपुर शहर की दो प्रमुख सड़कें संकरी हैं। उनके दोनों तरफ़ आबादी और दुकान के कारण लगभग रोज जाम लगता है। मूर्तियों के हटाने से जाम की समस्या खत्म नहीं होगी। यह एक बहुत लचर बहाना है।
आज के समय दुनिया में बड़ी-बड़ी बहुमंजिला इमारतें पूरी की पूरी स्थानांतरित करने की तकनीक मौजूद हैं। ऐसे समय में देश के शहीदों की प्रतिमाएं सौंदर्यीकरण के नाम पर ढहा देना शर्मनाक है।
जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' की पंक्तियां हैं :
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा॥
सौंदर्यीकरण के बाद शायद प्रतिमाओं की जगह कोई सुंदर बाज़ार बने, दुकाने खुलें तब हितैषी जी की पंक्तियां नए रूप में चरितार्थ होंगी। बाजार में रोज़ रौनक होगी। रोज़ लोगों के रेले-मेले लगेंगे।
पिछले वर्ष काकोरी एक्शन के सौ वर्ष पूरे होने पर देश भर में तमाम आयोजन हुए। शहीदों के बलिदान को याद करते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया गया। शहीदों को उनके क्रांतिकारी कृत्यों के लिए अंग्रेज़ सरकार ने फाँसी की सजा दी थी। अग्रेजों ने तो मुकदमा चलाया था, बहस का मौक़ा दिया था क्रान्तिकारियों को। लेकिन क्रान्तिकारियों की मूर्तियो को बिना कोई मौक़ा दिये, बिना किसी बहस के, बिना कोई बचाव का मौक़ा दिए , बिना नगर निगम की महापौर के , बिना माननीय मंत्री, महापौर की जानकारी ढहा दिया गया।
बीते सौ साल में समाज कितना क्रूर हो गया है।
बिस्मिल , अशफ़ाक़ और रोशनसिंह को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनकी मूर्तियां के साथ उनके जाहिल वंशजों ने क्या सलूक किया। वे अपनी मूर्तियों की स्थापना के लिए फाँसी पर नहीं चढ़े थे। फ़र्क़ जिन लोगों को पड़ता है वे जरूर सोचेंगे कि कोई समाज अपने देश के बलिदानी शहीदों के सम्मान के प्रति इतना ग़ैरजिम्मेदार , बेपरवाह, उदासीन कैसे हो सकता है कि उनकी प्रतिमाएँ अतिक्रमण की तरह रात के अंधेरे में ढहा दी जाएँ और ज़िम्मेदार लोग बयान दें कि उनकी जानकारी के बिना यह काम हो गया।https://www.facebook.com/share/p/1GQBggVbdh/

शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाक उल्ला ख़ान और ठाकुर रोशन सिंह की मूर्तियां जो अब ढहा दी गई हैं। 👇 शहीदों की टूटी, विखंडित मूर्तियां, जमींदोज मूर्तियों की फोटुएँ नेट पर मौजूद हैं। उनको लगाने की हिम्मत नहीं है मेरी। मेरी यादों में यही मूर्तियां रहेंगी।

Thursday, March 19, 2026

खबरों में गैस की किल्लत के समाचार


 आजकल अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्ध के चलते गैस की किल्लत की खबरें आ रहीं हैं। कुछ लोग इसे बकवास भी बता रहे हैं। दैनिक हिन्दुस्तान के लखनऊ संस्करण के दिनांक 19 मार्च, 2026 के पेज 6 से संकलित गैस समाचार इस प्रकार दिखे :

-माँ की अंतिम रस्मों में भी गैस के लिए जूझा बेटा।
-सिलेंडर मिला तो गैस कम निकली, झेली परेशानी।
-मैन्युअल बुकिंग न होने से परेशानी।
-धैर्य के लिए धन्यवाद मेसेज बढ़ा रहा दर्द।
-1600 का कामर्शियल सिलेंडर 2600 में मिल रहा।
-45 दिन की गई ग्रामीण इलाकों की समय सीमा।
-अरे ! बुक हो जाती तो यहाँ क्यों आते?
-रिक्शा हो या साइकिल, सबकी एक ही दौड़।
-एजेंसी का दफ्तर खुलने से पहले ही लगी लंबी कतार।
-उज्ज्वला कनेक्शन धारक भी हलकान।
-कब बदलेंगे हालात।
-मोबाइल टूट गया तो कहाँ से लायें ओटीपी?
-बढ़ी माँग के लिहाज़ से नहीं आ रहे सिलेंडर, गैस एजेंसियों का कोटा भी कम होने से मांग के अनुसार आपूर्ति नहीं की जा रही।
- रोजाना 7500 सिलेण्डरों की कमी, बढ़ते बैकलॉग ने बधाई परेशानी।
-15 हज़ार से अधिक ख़ान-पान दुकानें घरेलू सिलेंडरों पर चल रहीं।
-एजेंसी की लगाते रहे दौड़ और अब लटका मिला ताला।
-रसीद निकलवाने को एजेंसी दौड़ाया।
-आठवें दिन भी लोग ख़ाली हाथ लौटे।
-शेल्टर होम में लकड़ी के चूल्हे पर बना रहे खाना।
कानपुर और पटना के संस्करण में गैस की किल्लत के समाचार बहुत कम हैं। अलबत्ता आगरा संस्करण में ये समाचार दिखे :
-सभी की जेब पर भारी पड़ रही एलपीजी की कालाबाजारी।
-बुकिंग के सापेक्ष अब 94 प्रतिशत हुई गैस आपूर्ति।
-पूर्ति विभाग की टीम ने छापा मारकर 47 सिलेंडर जब्त किए।
-घर पर आनलाइन खाना मंगवाने पर लग सकता है ब्रेक।
-चूल्हा और लकड़ी लेकर कलेक्ट्रेट पर बैठी महिलायें।
दिल्ली संस्करण में गैस समाचार :
-भंडारों पर नहीं दिखेगा रसोई गैस की कमी का असर।
-करोड़ों का कारोबार प्रभावित ।
-अवैध गैस रिफ़िलिंग का भंडाफोड़।
बाक़ी संस्करणों में भी गैस की समस्या का जिक्र एकाध हेडिंग में है। लेकिन उसमें आमलोगों के बयान और आम लोगों की परेशानियों का जिक्र नहीं है। एक ही अखबार के अलग संस्करणों में एक ही समस्या का कवरेज अलग-अलग तरह हुआ है।
अलबत्ता सभी संस्करणों के मुखपृष्ठ पर मोटे शब्दों में योगी सरकार के नौ साल पूरे होने की खबर एक ही हेडिंग में है :
"यूपी में कोई भय नहीं -योगी।"
शायद मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश गए होंगे -खबर की हेडिंग यही होनी चाहिए। इसी रूप में छपनी चाहिए।
क्या पता लखनऊ के संपादक को कहीं से कोई फ़ोन आए -'तुमको बहुत गैस की समस्या हो रही है। किसी गैस के डॉक्टर से इलाज कराओ।'

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Wednesday, March 18, 2026

ऑटोमैटिक गाड़ियों का लफड़ा

 सुबह चाय बनाने के लिए गैस चूल्हा ऑन किया। स्पार्क हुआ लेकिन चूल्हा जला नहीं। पता चला गैस सप्लाई बाधित है। सोसाइटी के व्हॉट्सएप ग्रुप में देखा । घंटे भर पहले का मेसेज था -'गैस पाइप लाइन रिपेयर का काम चल रहा है। चार-पाँच घंटे गैस सप्लाई बाधित रहेगी।'

सुबह की चाय के बनाने के विकल्प सोचे। बिजली की केतली में पानी और दूध गर्म किया। थोड़ी देर में दूध उबलने लगा। फौरन स्विच बंद किया। लेकिन तब तक प्लेटफार्म गीला हो गया था। बाद में आहिस्ते-आहिस्ते चाय बनाई। गैस सप्लाई शुरू होने का इंतजार करते हुए ब्रेड,बटर का नाश्ता किया। फल खाये। दोपहर तक गैस सप्लाई बहाल हो गई। इस बीच गैस सप्लाई न होने पर कई विकल्प सोच डाले।
अखबार में एक पूरा पन्ने पर गैस की किल्लत के समाचार दिखते हैं। कई नामी रेस्तरां बंद होने के भी समाचार हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर कई लोग इस किल्लत को फर्जी बताते हुए पोस्ट लिख रहे हैं। पता नहीं सच क्या है?
अमेरिका-ईरान-इजरायल की लड़ाई पता नहीं कितने दिन चलती है। इसका दुनिया पर क्या असर पड़ेगा यह आने वाला समय बताएगा। अमेरिका के राष्ट्रपति मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) का हल्ला मचाते हुए अमेरिका को पीछे धकेलते हुए पता नहीं किस समय में ले जाना चाहते हैं। कम से कम उस समय तक ले ही जाना चाहता होंगे जब खाना बनाने के लिए गैस का चलन शुरू नहीं हुआ होगा।
दोपहर को कुछ सामान लेने गए। गाड़ी से। गाड़ी रोककर सामान लिया। लौटने के लिए गाड़ी स्टार्ट करने की कोशिश की। गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई। मेसेज आ रहा था -' गाड़ी की चाबी नहीं है।' जबकि चाबी हमारे हाथ में गाड़ी में ही थी। लेकिन डैशबोर्ड पर मेसेज के हिसाब से गाड़ी में चाबी नहीं थी। अजब बवाल।
सोचा कि साथ के बालक को घर भेजकर दूसरी चाबी मंगाई जाए। लेकिन फिर लगा कि शायद इसकी बैटरी खलास हो गई हो। संयोग की बात जिस दुकान के बाहर गाड़ी खड़ी थी वह बिजली की दुकान थी। पूछने पर उसके पास चाबी का बैटरी सेल मिल गया। नया सेल लगते ही गाड़ी स्टार्ट हो गई। चल दी। घर आ गए।
ऑटोमैटिक गाड़ियों का ये लफड़ा बड़ा अजीब है। गाड़ी कहीं भी खड़ी हो जाये और कह दे -'चाबी नहीं है।'
सेल खत्म होने के बाद गाड़ी एकदम मुक्त अर्थव्यवस्था की तरह हो जाती है। हर दरवाजा बिना ताला चाबी का हो जाता है। सुविधा की चीज कैसे असुविधा का कारण बन जाती है इसका कल एक बार फिर एहसास हुआ। सेल भी दो महीने पहले ही डलवाये हैं।
लोगों ने सुझाव दिया एकाध सेल स्पेयर में रख के चलिए। सेल ज्यादातर चीनी हैं। उनका भी कोई भरोसा नहीं। कब गोली दे जायें।
आटोमैटिक गाड़ी (समान) के साथ यह समस्या है। आटोमैटिक चलती है तो अपने आप खड़ी भी जाती है। गाड़ी में बैठी हुई सवारी बाहर नहीं निकल सकती अगर चाबी गाड़ी से दूर हो। मैनुअल मोड वाली गाड़ी में यह समस्या नहीं होती। इसी सिलसिले में आज ही एक खबर पढ़ी अखबार में जिसमें घर के लोग आग में जल गए। दरवाजा खुल नहीं पाया क्योंकि उसमें डिजिटल लॉक लगा था। आधुनिक होते सामानों के साइड इफ़ेक्ट हैं ये।
ऐसे में हमने एक बार फिर से सैंट्रो सुंदरी की याद आई। कहीं रुकी तो धक्का देने पर चल देती थी। गाड़ी की चाबी अंदर बंद हो गई तो बड़े स्केल से खिड़की खोल ली। और भी तमाम यादें। लेकिन अब तो वह यादों में ही रहेगी।
सैंट्रो सुंदरी के शीशे पर जली धूल पर Suman की लिखाई -'Anup You are always late' 👇

Monday, March 16, 2026

लखनऊ पुस्तक मेला


 कल हम लखनऊ के रवीन्द्रालय में लगे पुस्तक मेला देखने गए। रास्ते में ऑटो ड्राइवर विकास ने कहा -'कोई दवा की दुकान रास्ते में दिखे तो बताइयेगा। दवा लेनी है। बुखार है।

हमने कहा -'पहले बताया होता तो घर से लेकर दे देते।'
पता चला दो दिन से बुखार है विकास को। दवा लेकर काम चला रहे हैं। आज कुछ ज़्यादा लग रहा बुखार। हमने कहा -' ऐसा है तो घर में आराम करते।'
इस पर विकास ने कहा -'काश जिंदगी इतनी ही आसान होती।'
इस बात का हमारे पास कोई जबाब नहीं था। आगे चलकर एक दवा की दुकान से दवा ली विकास ने। तुरंत खाई नहीं। बोले -'आपको छोड़कर तब खाएँगे दवा। आधा घंटा कहीं रुककर आराम भी करेंगे।'
पुस्तक मेले में 57 दुकानें थीं। अधिकतर दुकानों पर चर्चित हो चुकी किताबें दिखीं। ज्यादातर बुक सेलर थे। दिनकर पुस्तकालय भी गए। पहले से सोच रखा था कि कोई किताब लेंगे नहीं। पहले ही इतनी रखीं हैं अनपढ़ी। लेकिन फिर जब गए तो तीन किताबें ले ही लीं:
-लखनऊ के नबाब लेखक अमृतलाल नागर
-नॉर्वेजियन वुड -लेखक मुराकामी अनुवादक मदन सोनी
-आशा टिफ़िन्स -सर्वेन्द्र विक्रम सिंह
आशा टिफ़िन्स पहले भी ऑनलाइन खरीदने की कोशिश की थी। लेकिन पैसा गया नहीं था। आर्डर हुआ नहीं। यह किताब ख़रीदने का कारण सर्वेन्द्र विक्रम सिंह जी से मित्रता और पुरानी जान पहचान होना रहा। शिक्षा विभाग से रिटायर होते ही उनका उपन्यास आना देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। पढ़कर देखेंगे।
इसके बाद एक दुकान से बानू मुस्ताक की Heart लैंप खरीदी। 2025 में बुकर पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद इसकी काफ़ी चर्चा है। कुछ पन्ने पढ़कर इसे ख़रीद किया। अमर्त्य सेन की आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन भी कुछ पन्ने पढ़कर वापस रख दी यह सोचकर कि पता नहीं कब पढ़ पायेंगे। पढ़ेंगे तब मंगा लेंगे।
इसी दुकान पर किताब देखते हुए एक युवा महिला अपनी किताब लेकर आईं। किताब के बारे में बताया और ख़रीदने का आग्रह किया। हमने कहा -'आपके स्टॉल पर आयेंगे। वहीं से लेंगे। दुकान का नंबर 57 बताया उन्होंने। आमतौर पर नंबर और नाम भूल जाते हैं। लेकिन इलाहाबाद में हॉस्टल का हमारा कमरा नम्बर 57 ही था इसलिये शॉप नम्बर भूलने की संभावना खत्म हो गई।
बाक़ी दुकानें देखते हुए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के स्टॉल पर गए। वहाँ कई किताबें सस्ते दाम पर मौजूद थी। नजीर अकबराबादी की रचनाओं का 680 पेज का संकलन (हार्ड बाउंड) 210 रुपए प्रिंट दाम में, फ़िराक़ गोरखपुरी की उर्दू भाषा और साहित्य पर लिखी 370 पेज की किताब 57 रुपए में मिल रही थी। नजीर साहब की किताब के कुछ पन्नों कीड़ों ने भी पढ़ा था शायद। जगह-जगह छेद थे उसमें। हमने खरीद लीं दोनों किताबें। अलावा इसके कन्नौज का इतिहास और गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही' पर लिखी किताब भी ख़रीदी।
इसके बाद अपन दुकान नम्बर 57 की तरफ़ गए। सबसे आख़िर में इस दुकान पर कई नए लेखकों की किताबें थीं। लेख़क भी मौजूद थे वहाँ। अपनी-अपनी किताब के बारे में जानकारी दे रहे थे। हमने पूछा -'वो लेखिका किधर हैं जो अभी अपनी किताब के बारे में बताते हुए मुझे मिलीं थीं।'
संयोग से लेखिका के साथ मिले लेखक दुकान पर मौजूद थे। उन्होंने किताब दिखाई। किताब का नाम है -When the Light Finds Her. लेखिका का नाम है -डॉक्टर शिवांगिनी श्रीवास्तव। किताब उलटते-पलटते देखते हुए डॉक्टर शिवांगिनी भी आ गईं। उनसे बात करते हुए पता चला कि वे कानपुर की ही रहने वाली हैं। कानपुर मेडिकल कॉलेज से MBBS करने के बाद अब रायबरेली मेडिकल कॉलेज से MD की पढ़ाई कर रहीं। पुस्तक मेले में शिरकत करने के लिए बड़ी मुश्किल से मिली छुट्टी लेकर लखनऊ आईं हैं। सुबह से शाम तक बीस से ऊपर किताबें बिक चुकी थीं शिवांगिनी की।
हमने सोचा ये बढ़िया तरीका किताब बेंचने का। कोई नहीं भी जानता हो लेखक और किताब के बारे में फिर भी ख़ुद बताने पर ख़रीद ही लेंगे कुछ लोग। परसाई जी ने अपना पहला व्यंग्य संकलन भी छपा कर ख़ुद भी बेचा था। लेखक को अपना प्रचार भी करना पड़ता है लोगों तक पहुँचने के लिए। लोग करते भी हैं। कई लेखकों जिनका चर्चा संसार उनकी किताबों तक ही सिमटा रहता है। लोगों तक अपना लेखन पहुँचाने के लिए प्रचार में आत्मनिर्भर होना पड़ता है। विषय कोई भी हो उनकी चर्चा का केंद्र उनका लेखन ही रहता है। हमने ये ऐसे लिखा, इसकी उन्होंने ऐसे तारीफ़ की, इसको लोगों ने समझा नहीं लेकिन इस पर ये इनाम मिला।
इसके विपरीत कुछ लेखक ऐसे भी होते हैं जो अपने लिखे पर ख़ुद चर्चा करना पसंद नहीं करते। मुराकामी ने अपने उपन्यास नॉर्वेजियम वुड की भूमिका के आख़िर में लिखा है :
" सच कहूँ तो इस उपन्यास के छपने के बाद मैंने इसे कभी पढ़ा नहीं (मुझे ऐसा करने में शर्म आती है) , और मुझे यह भी अच्छी तरह याद नहीं है कि यह पुस्तक किस बारे में है ...."
पता नहीं सच क्या है लेकिन जब मुराकामी जी कह रहे हैं तो मानना ही होगा। यह भी एक अंदाज़ है ख़ुद के लेखन के बारे में बात करने का।
शिवांगिनी ने उनकी किताब का मेरे साथ वीडियो बनवाया, फोटो लिया। वो इंस्टाग्राम पर सक्रिय हैं। फेसबुक पर नहीं। वीडियो बीस सेकेंड का बना। शायद वे इसे रील के रूप में शेयर करें। वीडियो बनाते हुए अपनी किताब पर हस्ताक्षर करते समय जूम करके फ़ोटो लिए गए। वीडियो बनाने के अंदाज से लगा कि पहले भी इस तरह के वीडियो बन चुके होंगे। किताब पर अपने ऑटोग्राफ देते हुए शिवांगी ने लिखा -Happy reading Anoop Sir 🙂 . देखते हैं कब पढ़ पाते हैं किताब।
विदा होने से पहले हमने शिवांगी के डॉक्टर होने का फ़ायदा उठाते हुए हमने कई मेडिकल सलाहें भी ले लीं। मुफ्त में।
शिवांगी से उनके प्रकाशन के अनुभव के बारे में भी बातचीत हुई। इसके पहले उनका एक कविता संकलन भी आ चुका है -Broken yet beautiful. हमने शिवांगी का परिचय दिनकर पुस्तकालय वालों से भी करा दिया। डॉक्टर प्रवीण झा के बारे में बताया। इससे शायद उनको अपने आगे के लेखन और उसकी बिक्री के बारे में सहायता मिले।
शिवांगी की किताब लेने के बाद वहीं मौजूद अमत्य अज्ञेय 'आदित्य' ने आपकी किताब 'प्रश्न से उत्तर तक ' के बारे में बताया। इस किताब में रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी बातों के बारे में बताया गया है -'धूप में कपड़े जल्दी क्यों सूखते हैं, चाय जल्दी क्यों ठंडी होती है, मिठाई फ्रिज में सख्त क्यों हो जाती है' जैसे तमाम सवालों के सरल जबाबों का संकलन है इस किताब में। MCA की पढ़ाई किए अमत्य के नाम में अनुप्रास अलंकार की छटा का करना हम नहीं पूछा पाये।
वहीं पर मौजूद कवियत्री स्वर्ण रश्मि जी की कविता पुस्तक 'सूफी इश्क़' भी खरीदी। स्वर्ण रश्मि गाजियाबाद से अपनी किताब के प्रमोशन के लिए आईं हैं। उन्होंने अपने लेखन और कवि सम्मेलन से जुड़े अपने अनुभव सुनाये। स्टॉल पर ही उनकी फ़ोटो और परिचय भी लगा था। स्वर्ण रश्मि जी ने अपने बारे में जानकारी देते हुए बताया कि उनके बोर्ड परीक्षा में उनके संस्कृत में 100 में 99 नम्बर आए थे।
चलते -चलते अभिनंदन मौर्य से भी मुलाक़ात हुई। उनकी दो किताबें मौजूद थीं। हमने एक किताब Dominating Lady Boss खरीदी। महिला बॉस के बारे में चर्चा है शायद किताब में।
बातचीत करते हुए पता चला कि पुस्तक मेले में यह स्टॉल Authors Adda के नाम से अलॉट है। किसी प्रकाशक ये बुक सेलर की बजाय लेखकों का स्टॉल है यह। लेखक अपनी-अपनी किताबें रखते हैं। पुस्तक मेले में ख़ुद आकर स्टॉल पर खड़े होकर या मेले में घूमकर मेले में आए पाठकों से संपर्क करके अपनी किताब के बारे में बताते हैं। शायद ज्यादातर लोग टाल देते होंगे। कुछ लोग ख़रीदते भी हैं। जैसे मैंने शिवांगी के बताने पर उनकी किताब के साथ चार किताबें खरीदीं।
'लेखकों का अड्डा' में आकर हमें भी अपनी किताबों के बारे में प्रचार करने की प्रेरणा मिली। लिखने की भी। क्या पता अगले किसी पुस्तक मेले में अनूप शुक्ल Authors Adda में अपनी बेचते मिलें -पुलिया पर दुनिया, बेवक़ूफ़ी का सफ़र, पुलिया पर जिन्दगी, अंधेरे का बड़प्पन और दूसरी किताबें। अपनी ऑनलाइन किताबों का लिंक तो अभी साझा कर दे रहे हैं टिप्पणी में। इस पोस्ट को पढ़कर अगर एक भी किताब की ख़रीद हुई तो लगेगा कि हमारी किताबें भी बिक सकती हैं।
आपका क्या विचार है इस बारे में?

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Saturday, March 14, 2026

अधिसंख्य अमेरिकी ईरान के साथ लड़ाई खत्म करने का पक्ष में


 युद्ध हमारा ध्येय होना चाहिए (War should be our Motto)

करीब पच्चीस साल पहले यह बात हमारे फाइनेंस के सलाहकार ने खरीदारी का निर्णय लेने वाली मीटिंग में कहीं थे। रक्षा उत्पादन से जुड़े संस्थान से संबद्ध होने के चलते आम धारणा थी कि युद्ध होता रहेगा उससे जुड़ी चीजों की माँग बनी रहेगी। काम मिलता रहेगा। स्थिति अच्छी रहेगी।
हालांकि युद्ध से हमारा कोई व्यक्तिगत फ़ायदा नहीं जुड़ा था। फिर भी यह लगता था कि लड़ाई से जुड़े सामान का बनाने का आर्डर मिलता रहेगा तो अच्छा रहेगा। उनसे बना हुआ सामान किसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल होगा यह सोचने की जहमत कौन उठाता है।
लेकिन दुनिया तमाम हथियार बनाने वाली तमाम कंपनियों का तो अस्तित्व ही इस बात पर टिका होता है कि उनके बनाए हथियार बिकते रहें। इसके लिए लॉबीइंग करते हैं। चुने हुए राष्ट्राध्यक्ष को पटाते हैं। अपने हिसाब से राष्ट्राध्यक्ष चुनते हैं। चुनाव में चंदा देते हैं। जीत जाने के बाद अपने हिसाब से नीतियां बनवाते हैं। अपने हथियार बिकवाने के लिए लड़ाई करवाते हैं। लड़ाई रुकवाते हैं। शांतिकाल में अगली लड़ाई की तैयारी के लिए फिर हथियार बेचते हैं। फिर लड़ाई करवाते हैं ताकि उनका धंधा चलता रहे।
लाखों-करोड़ों लोगों से जुड़े जीवन का फ़ैसला दो-चार लोग अपने फायदे नुकसान के हिसाब से लेते हैं। उनको देश के लोगों की भावनाओं से कोई मतलब नहीं होता। अपने हिसाब से नैरेटिव बनाते हैं वे लोग। ट्रम्प का 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नैरेटिव भी इसी तरह का एक झांसा है। महान बनकर अमेरिका कैसा होगा यह किसी को नहीं पता है, बस हमला किए जा रहे हैं ताकि उन लोगों को फ़ायदा हो जिन्होंने उनको चंदा दिया होगा, राष्ट्रपति बनवाया होगा। नमक का कर्ज उतारना है।
अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया। हमले का निर्णय अमेरिका के राष्ट्रपति ने लिए। अमेरिकी अखबार वासिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक सर्वे के अनुसार अधिकांश अमेरिकी लोग चाहते हैं कि ईरान के साथ युद्ध खत्म किया जाए। सर्वे के कुछ निष्कर्ष इस तरह से हैं :
-आपके अनुसार अमेरिका को ईरान के ख़िलाफ़ हवाई हमले जारी रखने चाहिए या बंद कर देंने चाहिए?
इस सवाल के जबाब में 1 मार्च को 25% लोग हमले जारी रखने के पक्ष में थे, 47% लोग चाहते थे कि हमले बंद कर देने चाहिए। 28% लोगों का कोई मत नहीं था।
हफ़्ते भर बाद 6-9 मार्च को यह प्रतिशत बदलकर क्रमश: 34% , 42% और 24% हो गया। मतलब सर्वे में शामिल अधिसंख्यक अमेरिकी अभी भी चाहते हैं कि ईरान के ख़िलाफ़ हवाई हमले बंद होने चाहिए।
- आपको क्या लगता है कि ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के ख़िलाफ़ हमले के उद्देश्य के बारे में स्पष्ट रूप से समझाया है कि वो क्या करना चाहता है?
इस सवाल के जबाब में 65% लोगों को लगता है कि ट्रम्प प्रशासन ने हमलों के उद्देश्य के बारे में ठीक से नहीं बताया है। 35% लोग मानते हैं कि ऐसा किया गया था।
-युद्ध के लक्ष्य को देखते हुए लड़ाई में हुआ खर्च और नुकसान ( मौतें) उम्मीद से कम हैं या ज़्यादा?
इस सवाल के जवाब में 63% लोग मानते हैं कि खर्च और नुकसान उम्मीद से ज़्यादा हुआ है। 37% लोग मानते हैं कि खर्च और नुकसान उम्मीद के मुताबिक ही है।
- ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई से अमेरिका की दीर्घकालिक सुरक्षा में योगदान क्यों नहीं मिलेगा?
इस सवाल के जवाब में 19 % लोगों का मानना है ईरान के ख़िलाफ़ लड़ाई फालतू की है, ईरान (अमेरिकी) सुरक्षा के लिए कभी खतरा था ही नहीं। 14 % लोग मानते हैं कि युद्ध बेकार है (ये लोग युद्ध के ख़िलाफ़ हैं), 9% लोग मानते हैं हमला इजरायल के उकसावे पर, पैसे और ध्यान बंटाने के लिए हुआ, 6% लोग मानते हैं इससे अमेरिका और उसके साथियों को नुक़सान होगा, 6% लोगों का मानना है कि इससे तनाव बढ़ेगा, 5% लोग कोई कारण नहीं बता पाये।
यह सर्वे 1005 आनलाइन और फ़ोन से कराया गया। सर्वे में शामिल अधिकांश लोग ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी हमले को ग़ैर ज़रूरी बताते हैं। 1005 लोगों के सर्वे से पूरे देश के लोगों के मिजाज को भाँपना मुश्किल है। लेकिन फिर भी एक सैंपल तो ऐसा कहता कि लोग इस लड़ाई को ग़ैरज़रूरी मानते हैं।
लड़ाई में तमाम संसाधन लगते हैं। अमेरिका में ही गैस के दाम 17% बढ़ गए हैं। महंगाई बढ़ने के साथ लोगों की नाराज़गी भी बढ़ेगी। लोग लड़ाई के ख़िलाफ़ होते जाएँगे।
एक तरफ़ अमेरिका लड़ाई में कूदा हुआ है। दूसरी तरफ़ अख़बार में छपी एक रपट के अनुसार अमेरिका के एक तिहाई लोग आपने इलाज के अपने खाने में कटौती करते हैं। पेट काटकर इलाज करवाने वाले अमेरिकी अपने ज्यादातर बड़े खर्चे मकान खरीदना आदि टालते रहते हैं।
जिस देश की एक तिहाई आबादी अपना पेट काटकर इलाज का इंतजाम करती हो उस देश का राष्ट्रपति द्वारा बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला की तरह अपने देश के संसाधन लड़ाई में फूंकते देखकर कहावत याद आती है -'घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने।'

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Friday, March 13, 2026

सैंट्रो सुंदरी की विदाई


और सैंट्रो सुन्दरी विदा हो गई।
1999 के दिसम्बर महीने में आई थी सैंट्रो सुंदरी हमारे घर। शाहजहांपुर में रहते थे उन दिनों। लखनऊ के शो रूम से खरीदी गई थी। तीन लाख बीस हज़ार में। फैक्ट्री से लोन लेकर खरीदी गई थी गाड़ी। वर्षों लोन के पैसे कटते रहे। ब्याज मिलाकर पाँच लाख क़रीब रुपये खर्च हुए होंगे खरीद में।
ब्याज का खेल ऐसा ही होता है।
शाहजहांपुर में क़रीब एक साल चली सैंट्रो। 2001 में कानपुर आ गए। सबसे ज़्यादा कानपुर की सड़कों पर ही चली सैंट्रो। इधर-उधर चोट-खरोंच लगती रही। लेकिन आमने-सामने से कभी कोई भिड़ंत नहीं हुई सैंट्रो से।
कोई एक्सीडेंट तो नहीं हुआ लेकिन एक बार शाहजहांपुर में छोटे बेटे अनन्य ने ड्राइविंग सीट पर बैठकर गाड़ी स्टार्ट कर दी थी। वो अकेला था उस समय गाड़ी में। घर में ही थी गाड़ी। गियर में थी गाड़ी। चाबी घुमा दी अनन्य ने। गाड़ी उछलकर चल दी। कुछ मीटर आगे चलकर गैरज से टकराई। गैराज का दरवाजा भड़ाम से ज़मीन पर आ गया। बेटा सन्न।चुपचाप गाड़ी में बैठा रहा। उस समय श्रीमती जी के दफ़्तर से आए शमसुद्दीन ने दरवाजा खोलकर उसको गाड़ी से निकाला। बेटा थोड़ी देर में सामान्य हुआ। इसके अलावा सैंट्रो सुंदरी किसी से नहीं भिड़ी आज तक।
इसके साथ आई तमाम गाड़ियाँ विदा हो गईं लेकिन सैंट्रो सुन्दरी बनी रही। कानपुर में लोग पूछते थे कि इतनी पुरानी गाड़ी क्यों चलाते हैं। इतनी कंजूसी भी ठीक नहीं। पंकज बाजपेयी भी जब मिलते तब गाड़ी के बारे में कोई न कोई बयान जारी करते। लेकिन हमको कोई ऐसी कमी नजर नहीं आती थी इसमें जिसके कारण इसको बदलने की सोची जाये। चलती रही गाड़ी।
कानपुर में खन्ना हुंडई में इसकी सर्विसिंग होती रही। शुरुआती दौर में खन्ना हुंडई के अखिलेश इसकी मरम्मत का काम देखते थे। बाद में कभी भी कोई समस्या होती तो हम उनको ही फ़ोन करके समाधान पूछते।
हमारे घर के सब लोगों ने इसे चलाया है। अनगिनत यादें जुड़ी हैं इसके साथ। एक बार घर में देर आने पर इसके पिछले शीशे की धूल पर लिखा मिला -anup you are always late.
पुरानी होते जाने के बाद इस पर मरम्मत का खर्च बढ़ गया था। एक सर्विसिंग में आठ-दस हज़ार रुपये खर्च होते। लेकिन स्टार्ट होने में एकदम युवा गाड़ी की तरह आधी चाबी घुमाने पर स्टार्ट हो जाती। चलती भी आराम से थी। कई अंजर-पंजर (स्प्रिंग) अलबत्ता ढीले हो गए थे। किसी स्पीड ब्रेकर पर लगता इसकी पसलियाँ कमजोर हो गईं हैं।
समय के साथ आगे-पीछे, दायें-बायें तमाम खरोंच लगी सैंट्रो सुंदरी के। बाद के दिनों में कहीं कोई खरोच लगती तो हम फौरन पलटकर देखने की भी जहमत नहीं उठाते। बाद में कभी देखते तो याद आता ये स्क्रैच लगा था इसमें।
सैंट्रो को सैंट्रो सुन्दरी का नाम मिला था कानपुर में। 2017 में कानपुर में उसका किसी गाड़ी की टक्कर से बम्पर पूरा निकलकर बाहर निकल गया। गाडी का पिछवाड़ा दिखने लगा। ऐसा लगा मानो 'सड़क के रैंप पर' चलते-चलते गाड़ी की चड्ढी भारी होने के कारण सरक गयी हो। बम्पर गाड़ी के अंतर्वस्त्र जैसे ही तो होते हैं।
गाड़ियों की दुनिया के अख़बार होते तो खबर छपती-'बम्पर के मैलफंकन के कारण 18 वर्षीया सैंट्रो सुंदरी उफ्स मूवमेंट की शिकार।' तमाम लोग गाडी की उतरी हुई चड्ढी की फोटो देखने के लिए फड़क उठते।
किसी अखबार में खबर छपती - ’सड़कों पर गाडियांं तक महफ़ूज नहीं। शाम को बीच सड़क आवारा बुलेरो बुजुर्ग सैंट्रो का बम्पर नोचकर फ़रार।’
कानपुर से लखनऊ आकर गाड़ी महीनों खड़ी रही। बिना चले। लगता है इससे वह नाराज हो गई। एक दिन चलाने के लिए निकाली तो स्टार्ट तो हो गई लेकिन आगे बढ़ने से मना कर दिया। क्लच प्लेट ख़राब हो गई थी। 26 साल के दरमियान पाँच-छह बार तो बदली गई होगी क्लच प्लेट। गाड़ी सर्विस सेंटर भेजी गई। उसके कई पार्ट मिले नहीं। महीने भर से ऊपर जमा रही गाड़ी। ठीक होकर वापस आई तो लगा अब चलेगी आराम से।
लेकिन एक दिन अचानक फिर खड़ी हो गई चलते-चलते। शायद उसका अल्टरनेटर 'ख़त्तम' हो गया था। फिर क़रीब हफ़्ते भर इलाज हुआ उसका हुंडई सर्विस सेंटर में। अल्टरनेटर बदलने के बाद टनाटन चलने लगी। चलती रही। इसके बाद कोई नखरे नहीं दिखाये उसने।
इन छब्बीस सालों में गाड़ी कुल सवा लाख किलोमीटर से ऊपर ही चली। मतलब पाँच हज़ार किलोमीटर /साल । बाकी सफ़र साइकिल, मोटरसाइकिल, किराए की सवारी या और सरकारी गाड़ी में हुआ।
गाड़ी में जब पेट्रोल भराने के लिए जब भी ढक्कन खुलता तो पेट्रोल पंप वाला कहा -'इसमें ढक्कन तो डीजल का लगा है।' पता नहीं कब, कैसे ईंधन भराने का ढक्कन बदल गया था।
सैंट्रो सुंदरी टनाटन चल रही थी। रजिस्ट्रेशन भी अगले चार साल तक था। इस बीच घर में एक और गाड़ी आ गई थी। दो गाड़ियाँ घर के सामने खड़ा मुश्किल काम था। जगह नहीं थी। घर के अंदर पोर्टिको में खड़ा करने में आने-जाने में परेशानी होती। बाहर कहीं और खड़ा करना सैंट्रो सुन्दरी के लिए ठीक नहीं था। आते-जाते अकेली देखकर कोई छेड़ जाता सैंट्रो सुंदरी को। ख़राब लगता। इसलिए उसको विदा करना जरूरी हो गया था।
सैंट्रो सुंदरी भले ही 26 साल पुरानी हो गई थी। लेकिन उसके चाहने वाले अनेक थे। कानपुर, लखनऊ में कई लोगों ने कह रखा था कि इसे हमको बेंच दें। लेकिन अपनी प्यारी सैंट्रो सुन्दरी को बेचने का हमारा कोई इरादा नहीं था। हमने आजतक अपना घर का कोई पुराना सामान आज तक बेचा नहीं है। किसी जान पहचान वाले को ही दिया है। सैंट्रो सुंदरी के साथ भी यही हुआ। शाहजहांपुर में रहने वाले भांजे से पूछा तो उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी इसे लेना स्वीकार कर लिया।
26 साल पुरानी गाड़ी किसी को देने में संकोच भी हुआ। हमने देने के पहले बता दिया कि गाड़ी पुरानी है। कहीं भी खड़ी हो सकती है। लेकिन भांजे का इरादा पक्का रहा। इसके बाद हमने गाड़ी उनके नाम रजिस्टर करा दी। शाहजहांपुर के निवासी होने के कारण ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। परिवहन विभाग में मित्र मोहित के सहयोग से गाड़ी का रजिस्ट्रेशन भांजे के नाम हो गया। शाहजहांपुर की गाड़ी शाहजहाँपुर वाले के नाम हो गई।
रजिस्ट्रेशन के बाद गाड़ी देने शाहजहांपुर गए। चलते हुए फ़ोटो ली। मन में सोचते -'ख़ुशी -ख़ुशी कर दो विदा, सैंट्रो सुंदरी राज करे।'
हाई वे पर चलते हुए गाड़ी कई बार 80 किमी प्रति घंटे के ऊपर चली। उसको चलाते हुए कहीं से नहीं लगा कि इतनी उम्रदराज हो गई है सैंट्रो सुन्दरी। लगा कि अपने रजिस्ट्रेशन की उम्र तक अगले चार साल तो आराम से चलेगी सैंट्रो सुन्दरी।

सैंट्रो सुंदरी को शाहजहाँपुर में भांजे को सौंप कर वापस चले आए। वह विदा हो गई लेकिन उसके साथ जुड़ी यादें सो साथ ही हैं। हमेशा रहेंगी। यादें कहाँ कहीं विदा होती हैं।


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Thursday, March 12, 2026

अमेरिका ईरान इजरायल युद्ध


 अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध में परस्पर विरोधी ख़बरें पढ़ने को मिल रहीं हैं। सभी पक्ष अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। इजरायल-अमेरिका समर्थक के अनुसार तेहरान धुंआ-धुंआ हो रहा है। ईरान के साथ खड़े लोगों ने अनुसार इजरायल और अमेरिका की हवा ख़राब है। दुनिया में तेल की किल्लत शुरू हो गई है। पाकिस्तान में वर्क फ़्राम होम शुरू हो गया है। स्कूल बंद हो गए हैं। हिंदुस्तान में कुछ शहरों में होटल बंद हो गए हैं। कमर्शियल सिलेंडर की क़िल्लत है। रसोई गैस के लिए लाइन। नोटबंदी के समय की लाइनों की याद दिला रही हैं। लड़ाई चलती रही तो आने वाले समय में परेशानियाँ बढ़ेंगी।

अमेरिका के राष्ट्रपति परस्पर विरोधी बयान दे रहे हैं। कभी कहते हैं कि युद्ध लंबा चलेगा कभी कहते हैं लड़ाई जब मन आए ख़त्म कर दूँगा। ईरान के लोग कह रहे हैं लड़ाई ईरान ख़त्म करेगा। इज़रायल और ईरान दोनों देशों में लड़ाई की खबरें देने पर पाबंदी है। दुनिया में लोग अपने-अपने स्रोतों से खबरें बता रहे हैं।
खबरों से पता चलता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ठीक-ठीक बता नहीं पा रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों किया। कोई कहता है अमेरिका दुनिया के ऊर्जा स्रोतों पर कब्जा करना चाहता है। कुछ लोगों का कहना है कि इपस्टीन फाइलों से ध्यान हटाने के लिए हमला करने के आदेश दिए राष्ट्रपति ट्रम्प ने। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति की लड़कियों के साथ अश्लील फोटो तैर रहे हैं। पीड़ित लड़कियों ने उनके बोले डायलॉग भी बताए हैं।
आज अमेरिका अख़बार वासिंगटन पोस्ट में छपे एक लेख के अनुसार ट्रम्प की अश्लील मुद्रा में वायरल तस्वीर फर्जी है और ईरान के इशारे पर सर्कुलेट हो रही है ताकि ट्रम्प को बुरा बताया जा सके।
एक कहानी यह भी चल रही है कि ट्रम्प को उनके यहूदी दामाद ने ईरान पर हमला करने के लिए सलाह दी। ट्रम्प का दामाद इजरायल का मोहरा है। एक तरह से ट्रम्प इजरायल की कठपुतली है। वह इजरायल के इशारों पर नाच रहे हैं। इजरायल के नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमा चल रहा है। लेकिन वह देश के शासक बने हुए हैं और लड़ाई कर रहे हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने चुनाव प्रचार करते हुए वायदा किया था कि वो दुनिया में लड़ाई बंद करवा देंगे। रूस-यूक्रेन लड़ाई ख़त्म हो जायेगी। गाजा में शांति स्थापित हो जायेगी। रूस-यूक्रेन अभी चल ही रहा है। गाजा में अभी भी कभी भी बमबारी की खबरें आती रहती हैं। अब वह ख़ुद लड़ाई में कूद पड़े हैं। 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नारा देने वाला राष्ट्रपति दुनिया को बर्बाद करने में जुट गया है।
एक खबर के अनुसार अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने पिछले कुछ वर्षों में कई मुस्लिम देशों के लोगों को आतंकवादी होने का नैरेटिव गढ़कर लाखों मुस्लिम लोगों को मरवा दिया। बमबारी में निरीह लोगों की हत्याएं की। उनके समर्थन में बेशर्म और बयान बयान दिए। परसाई जी कहते थे -" अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं।बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है।"
अमेरिका की करतूतों के अनगिनत पढ़ने को मिलते हैं। लोकतंत्र की हिमायत करने वाला देश दुनिया में अराजकता फैलाने में जुटा है। ये अजीब विकसित देश है जिसके विकास की नीव दूसरे देशों के संसाधनों की लूट और मनमानी पर आधारित है।
ईरान-इजरायल-अमेरिका की लड़ाई का क्या हस्र होगा कहना मुश्किल है लेकिन यह साफ़ है कि दुनिया में चंद लोग अपनी सनक में दुनिया को बर्बाद करने पर तुले हुये हैं। ताक़त के केंद्रीकरण कितना ख़तरनाक हो सकता है दुनिया के लिए यह साफ़ देखने में आ रहा है।
इस बारे में अपने देश की भूमिका के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं। अंतर्राष्ट्रीय फ़ोरम पर इतनी बेइज्जती पहले कभी हुई हो याद नहीं आता। कोई इसे अपना साहब का मास्टरस्ट्रोक बताता है। कोई कहता है वे भी कंप्रोमाइज्ड हैं। उनकी भी कोई फाइल्स दबी हैं। लोग यह भी कहते हैं कि अपने कॉर्पोरेट साथियों के हित साधन के कारण साहब चुप हैं।
एक आम नागरिक के रूप में हमारी जानकारी के स्तर की सीमायें हैं लेकिन जो सुनते हैं उनसे लगता है कि क्या कारण है जिन फाइल्स में नाम आने पर दुनिया के लोगों के अपने पद छोड़ दिए उसी इपस्तीन फ़ाइल में नाम आने पर मंत्री ने अपना पद छोड़ा न उनको निकाला गया। लगता है अपने राजनीतिक गुरु से भी कुछ नहीं सीखा साहब ने जिन्होंने जैन हवाला कांड में नाम आने पर लालकृष्ण आडवाणी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और घोषणा की थी कि जब तक अदालत से बेदाग साबित नहीं हो जाते, तब तक चुनाव नहीं लड़ेंगे। तीस साल में पार्टी की नैतिकता की परिभाषाएँ इतनी बदल गईं।
लड़ाई कितने दिन चलेगी, कहना मुश्किल है। जितनी देर चलेगी उतनी बर्बादी होगी। लोग मारे जाएँगे। उजड़ेंगे। किसी भी देश के हों युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं होता। जितनी जल्दी यह बंद हो उतना दुनिया के लिए अच्छा होगा।
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