Tuesday, September 29, 2020

किताब पर कीड़ा

 किताब पर कीड़ा

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कल रात की बात ! कोई कहेगा कि सुबह-सुबह रात की बात भाई ! क्या कोई सपना देखा ? सुनाओ फ़टाफ़ट !
रात की बात सपने से ही जुड़ जाती है। कुछ गाने का भी दोष – ’कल रात मैंने सपना देखा, तेरी झील सी गहरी आंखों में।’
अब बात यहां यह भी आ गयी कि सपने रात में ही क्यों देखे जाते हैं? शायद इसलिये इंसान रात को सोता है। नींद में निठल्ला रहता है। सपने में भी कुछ करना नहीं पड़ता है, सिर्फ़ देखना होता है। इसीलिये सपनों की खेप रात में ही सप्लाई होती है।
बाद बाकी, हम सपने की बात नहीं कर रहे। रात हम लेटे-लेटे सोने के पहले की दवाई की खुराक ले रहे थे मल्लब किताब पढ रहे थे।सोते समय पढने से बेहतर कोई दवाई नहीं होती। किताबें तमाम अलाय-बलाय से बचाती हैं। समय के चलते अब पढना भले कुछ कम हो गया है लेकिन हसरत जरूर होती है। किताब दिखते ही जिगरी यार की तरह चिपटा लेने का मन करता है –इस कोरोना काल में भी।
और हमीं कोई अनोखे पुस्तक प्रेमी न हुये। एक से एक खुर्राट पढैया हुये हैं दुनिया में। हमारे विकट पढाकू और बेहतरीन लिख्खाड़ दोस्त अशोक पांडे Ashok Pande ने एक वजीर का किस्सा बयान किया है जो पढने का इतना शौकीन था कि सफ़र में भी चार सौ ऊंट भर किताबें साथ लेकर चलता था। पढकर हमारे तो होश बेहोश होने को हुये। कहां तो हम लैपटॉप वाले बस्ते में दो ही किताबों पर अपने पढने के शौक पर इतराते वाले हुये और कहां ये बन्दा चार सौ ऊंट किताबें साथ लिये चलता था।
बहरहाल बात किताब की हो रही थी। पढते हुये नींद आने लगी तो किताब बगलिया कर करवट लेते हुये पढने लगे। देखते क्या हैं कि एक छोटा कीड़ा , भुनगा कहना ज्यादा मुफ़ीद होगा उसे किताब के पन्ने पर टहल रहा था। वो कोई भी हो अब नाम तो हमें मालूम नहीं था उसका , पता होता तो नाम के आगे ’जी’ लगाकर गरियाते उसे। आजकल यही चलन है। जिसको खूब हमारी और खराब टाइप बताना होता है उसके आगे ’जी’ लगाकर बात शुरु करते हैं। हमें इसीलिये सरेआम इज्जत करने वालों से बहुत डर लगता है। जैसे ही कोई कहता है –’हमारे लिये आपके मन में बहुत इज्जत है’ सच्ची बता रहे हैं आसन्न बेइज्जती के डर से मन दहल जाता है।
लेकिन खैर बात कीड़े जी की हो रही थी। भाईसाहब बिना मास्क लगाये टहल रहे थे किताब के पन्ने के बीचोबीच। बिना मास्क के उनकी सूंड़ मूंछ की तरह लहरा रही थी। हमने सोचा कि टोंक से मास्क के लिये लेकिन उनके चेहरे पर तो –’कोरोना-फ़ोरोना कुछ नहीं होता’ का भयंकर आत्मविश्वास साइनबोर्ड की तरह चमक रहा था। हम चुप हो गये। चुपचाप देखते रहे –कीड़ा लीला।
देखा कि अगला अपने आगे के दो पांव उठाकर वर्जिश टाइप कर रहा था। तेजी से जवान होते लड़के जैसे गलियों में मोटरसाइकिल का अगला पहिया उठाने की कोशिश करते हुये बाइक दौड़ाते हैं वैसे ही वह भुनगा पूरी किताब पर टहल रहा था। एक बार तो उसने अपने आधे शरीर को हवा में उठा भी लिया। बैलगाड़ी की तरह अगला हिस्सा ’उलार’ हो गया उसका। एकदम दिगंबर भुनगा इतना तल्लीन होकर अलग-अलग पोज में टेढा-मेढा हो रहा था कि एकबारगी मुझे लगा कि कहीं यह कीडों को योग तो नहीं सिखा रहा। जिस तरह आधे शरीर को ऊपर उठाया उसको वह अपने टीवी चैनल पर बता रहा हो- ’यह उत्तानपादासन है। इसको करने से खाया-पीया सब हजम हो जाता है।’
वह भुनगा ऐसे टहल रहा था किताब के पन्ने में जैसे कोई तानशाह अपने महल में अकेले टहलते हुये अपनी रियाया को हलाकान करने की तरकीब सोचते हुये टहल रहा हो। इस कल्पना से हमकों हंसी आ गयी। ये भुनगा तानाशाह कैसे हो सकता है। साइज में आंख से कभी-कभी बरामद होने वाले कीचड़ से भी कम दिखने वाला कीड़ा था वह। एक इन्सान से साइज से तुलना करें तो पलक झपकते तमाम कारपोरेटियों के राइट ऑफ़ किये जाने वाले कर्जों के मुकाबले बड़ी मशक्कत और माकूल घूस के बाद हासिल किये गये ' मुद्रा लोन' से भी कम आकार का होगा वह कीड़ा। लेकिन टहल ऐसे रहा था मानो शेषनाग का बाप हो जिसके जरा सा हिलने-डुलने से धरती में हाय-हाय मच जाती है। भुनगे टाइप के लोगों की सोच शायद ऐसी ही होती हो।
इस समूची कायनात में बड़े से बड़े तीसमार खाँ की औकात एक भुनगे से बहुत बहुत कम होती है। शायद इतनीं कम कि उसकी एंट्री ही न होती हो कायनात के रजिस्टर में। चिल्लर को कौन गिनता है कुबेर के खजाने में।
अकेला टहल रहा था पट्ठा। शायद अपने साथ के लोगों को निपटा के आया हो। किताब के पन्ने पर चढना उसको एवरेस्ट पर चढने जैसा लगा हो। उसकी ऐंठ देखकर मुझे गुस्सा आया। मन किया किताब बन्द कर दें। इतने में ही कीड़े का टेटुआ क्या वह पूरा का पूरा दब जायेगा। दो मिनट में राम नाम सत्य हो जायेगा। लेकिन गुस्सा जल्द ही विदा हो गया। गुस्से के विदा होते ही प्यार ने ड्यूटी ज्वाइन कर ली। हमें लगा कि क्या पता कीड़ा इत्ता खतरनाक और बौढम न हो जित्ता हम समझ रहे। क्या पता वह भी हमारी तरह पुस्तक प्रेमी हो और हमारी ही तरह सोने के पहले किताब पढता हो। हम सीने में धरकर किताब पढते हैं। वह किताब के सीने पर चढकर पढता हो।
यह सोचते ही कीड़े के प्रति हमारे सारे भाव बदल गये। हम उसकी हर हरकत पर फ़िदा होते हुये कब सो गये पता ही नहीं चला। सुबह उठकर अभी जब सूरज भाई से यह बात बताई तो सूरज भाई मुस्कराते हुये बोले -’ तुम भी बौढम हो यार। बिना जाने ही किसी के बारे में कुछ धारणा बनाना ठीक नहीं होता।’
अब हम क्या कहते? चुपचाप सुनते रहे। सूरज भाई भी हमारे लॉन में रोशनी की चित्रकारी करते हुये चाय चुस्कियाते हुये मुस्कियाते रहे।

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Monday, September 28, 2020

परसाई के पंच-52

 1. जिन मनीषियों ने संसार को दुखमय कहा है, उन्होंने यह तब कहा होगा, जब उनके घर आटा नहीं रहा होगा !

2. सरकार कहती है कि हमने चूहे पकड़ने के लिये चूहेदानियां रखी हैं। एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की है। उसमें घुसने के छेद से भी बड़ा छेद पीछे से निकलने के लिये है। चूहा इधर फ़ंसता है और उधर से निकल जाता है। पिंजड़े बनाने वाले और चूहे पकड़ने वाले चूहों से मिले हुये हैं। वे इधर हमें पिंजड़ा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं। हमारे माथे पर सिर्फ़ चूहेदानी का खर्च बढ रहा है।
3. हजारों मील दूर से अमरीका से पराया गेंहू तो आ सकता है, पर 150 मील दूर से अपना गेंहू नहीं आ सकता। अपनी हर चीज की रफ़्तार कम हो गयी है। विदेशी पैसा कैसे दौड़कर आता है, अपना पैसा रेंगता है।
4. कुसंस्कारों की जड़ें बड़ी गहरी होती हैं।
5. लोग जिस चीज से सबसे ज्यादा चिढते हैं वह है, अच्छा उदाहरण ! अच्छा उदाहरण एक बार बन जाने पर आदमी अच्छाई का गुलाम बन जाता है।
6. तारीफ़ करके आदमी से कोई भी बेवकूफ़ी करायी जा सकती है।
7. कई दूकानदारों की मीठी बातें जो व्यापारिक चतुरता है, मानवीयता के नाम से बाजार में चलती हैं। मेरा आलस्य भलमनसाहत के रूप में चलता है।
8. मैं भला हूं, क्योंकि आलसी आदमी हूं। बुरा होने के लिये हाथ,पांव और मन को हिलाना पड़ता है।
9. हम ’भला’ उसी को कहेंगे जो ’बेचारा’ हो । जब तक हम किसी को बेचारा न बना दें, तब तक उसे भला नहीं कहेंगे।
10. किसी को ’भला’ कहना उसकी प्रशंसा नहीं है। उसे ’बेचारा’ करके दया प्रकट करना है। जो हर काम के लिये चन्दा दे देता है, वह ’बेचारा’ भला आदमी है। जो रिक्शावाला कम पैसे लेता है, वह बेचारा भला आदमी है। जो लेखक बिना पैसे लिये अखबार के लिये लिख देता है, उसे सम्पादक बेचारा भला आदमी कहते हैं। टिकट कलेक्टर बेचारा भला आदमी है, क्योंकि वह बिना टिकट निकल जाने देता है।
11. मुझे इस ’बेचारा भला आदमी’ से डर लगता है। अगर देखता हूं कि मेरे बगल में ऐसा आदमी बैठा है, जो मुझे ’बेचारा भला आदमी’ कहता है, तो जेब संभाल लेता हूं। क्या पता वह जेब काट ले।

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सुनने की कला

 आजकल कोरोना का हल्ला मचा हुआ है। आना-जाना सीमित। लोगों से मिलना-जुलना स्थगित। कभी अजनबियों से भी बतियाने का हिसाब बनता रहता था। आज हाल यह है रोजमर्रा के काम से जुड़े लोगों से भी बातचीत फोन तक सिमट गई है। मीटिंग भी वीडियो कांफ्रेंस में बदल गई हैं।

इंसान से मिलना-जुलना, बोलना-बतियाना मानव जीवन की नियामतों में से एक है। जहाँ मिलन-जुलना , बोलना-बतियाना कम हो रहा है, वहां लोगों के दिमाग की वायरिंग गड़बड़ाने लगी है। तनाव और अवसाद बढ़ रहे हैं। इंसान को इंसान बने रहने के लिए मिलना-जुलना, बोलना-बतियाना जारी रखना चाहिए।
लोगों से बातचीत के अपने अनुभव से मैंने पाया इंसान खुलने के लिए बेताब रहता है बशर्ते उसको कोई सुनने वाला मिले। दो मिनट की बातचीत के बाद ही कुछ लोग अपना मन स्वेटर की ऊन की तरह उधेड़ने लगते हैं। अपनी सब परेशानी कह डालते हैं।
ऐसे ही एक दिन पुलिया पर एक सज्जन मिले। 50 के आसपास उम्र। जुखाम हो रखा था। नाक सुड़कते, बीड़ी पीते, धूप सेंकते पुलिया पर बैठे थे। पता लगा मिस्त्रीगिरी करते हैं। काम कभी मिलता है, कभी नहीं भी मिलता है।
परिवार के नाम पर अम्मा हैं। कुंवारे हैं अब तक। लड़कियों का तो समझ में आता है कि दहेज के चलते शादी नहीं होती। लेकिन लड़के तो निखट्टू भी सेहरा बंधवा लेते हैं। यहां 50 होने तक शादी नहीं हुई।
कुंवारे रहने का कारण पूछने पर पता चला कि रहने के लिए अलग ठिकाना नहीं है। जब हो जाएगा तब कर लेंगे।
'इतनीं उम्र हुई शादी नहीं हई अब तक। किसी से बातचीत , बोल-बतियाव , देखा-दिखौव्वल , छुवा-छुववलतो हुई होगी?' पूछने पर बोले बताया भाई जी ने -'बातचीत होती थी। और कुछ नहीं। अब तो उसकी भी शादी हो गयी। रहने का ठिकाना होता तो अब तक हमारी भी शादी हो जाती।'
'शादी भी पास ही हुई है। इसलिए अभी भी कभी-कभी बातचीत हो जाती है। कभी-कभी वो चाय भी पिला देती है।' -आगे बताया भाई जी ने।
दिहाड़ी के बारे में बताया -'कभी काम मिल जाता है। कभी नहीं। अभी तबियत खराब है इसलिए कई दिन से काम नहीं मिला।' कहते हुए खासने लगे भाई जी।
बातचीत का समय कोरोना काल शुरु होने के पहले का था। उस समय खांसी इतना आतंककारी नहीं हुई थी।
ऐसे अनगिनत लोग हमारे आसपास होते हैं जिनके किस्से होते हैं। हम उनसे जुड़े नहीं होते इसलिए हमको एहसास नहीं होता उनकी कहानियों का। हर इंसान अपने में एक महाआख्यान होता है। हमको पढ़ना नहीं आता या फिर हमको सुनने का समय नहीं होता।
हम अपनी कहकर मुक्त हो जाते हैं। हमको सुनना भी आना चाहिए। सुनना भी एक कला है।
हम सुनना सीखना चाहते हैं। ककहरा सीख रहे हैं। आप भी सीखो, मजा आएगा।

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परसाई के पंच-51

 1. अनाज की दुकानों के सामने थैला हाथ में लिये कतार में खड़ा आदमी सूख रहा है। जब तक उसका नम्बर आता है, दाम बढ जाते हैं और घर से लाये पैसे कम पड़ जाते हैं।

2. भुखमरी से हममें अन्तर्राष्टीय चेतना आ गयी। अगर अकाल पड़ जाय, तो हर भारतीय अपने को विश्व-मानव समझने लगेगा।
3. कोई ऋषि मोटा नहीं हुआ। वे सब सूखे और क्रोधी होते थे। कोई उनके चरण न छुये तो उसे शाप देकर बन्दर बना देते थे।
4. एक और तरह की सर्जरी है, जिसमें बिना चाकू के पेट काटा जा सकता है। वर्तमान सभ्यता में इस रक्तहीन सर्जरी ने काफ़ी उन्नति की है। जो दस-पांच के पेट काट सके उसका पेट बड़ा हो जाता है। वे सारे पेट उनके पेट से चिपक जाते हैं।
5. जिनकी तोंदे इन 17 सालों में बढी हैं, जिनके चेहरे सुर्ख हुये हैं, जिनके शरीर पर मांस आया है, जिनकी चर्बी बढी है, उनके भोजन का एक प्रयोगशाला में विष्लेषण करने पर पता चलता है कि वे अनाज नहीं खाते थे; चन्दा, घूस, काला पैसा, दूसरे की मेहनत का पैसा या पराया धन खाते थे। इसलिये जब कोई मोटा होता दिखता है तो सवाल उठते हैं। कोई विश्वास नहीं करता कि आदमी अपनी मेहनत से ईमान का पैसा कमाकर भी मोटा हो सकता है।
6. पापड़ का जिसने भी आविष्कार किया है, कमाल किया है। यह भोजन में शामिल है भी और नहीं भी। इसे चुगते हुये बड़े-से- बड़े पेटू का साथ दिया जा सकता है। खाने के सिवा यह मुहावरे बनाने के काम भी आता है, जैसे पापड़ बेलना और पापड़ तोड़ना। एम.एल.ए. बनने के लिये बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं।
7. किसी भी दफ़्तर में ’लंच’ के बाद ऊंघनेवाली पलटन देखी जा सकती है। साहब के कमरे में तो आराम-कुर्सी खाकर सोने के लिये ही होती है। 1 बजे से 3 बजे तक तो सारा राष्ट्र ऊंघता है।
8. पीड़ा के गवाह न हों तो वह बेमजा हो जाती है। बहुत तरह की पीड़ायें गवाह देखकर पैदा हो जाती हैं। जैसे कुछ स्त्रियों के पति के घर आते ही सिर दर्द होने लगता है।
9. खूबसूरत चिकने पत्थर बड़े खतरनाक होते हैं। इस पर पहले तो सिर्फ़ फ़िसलने का डर था। मेरे देखते ही बहुत लोग चिकने पत्थरों को कुचलने का हौसला लेकर गये और फ़िसलकर ऐसे गिरे कि अभी तक उनका सिर पत्थर से चिपका है। अब तो वे इसे नियति मानते हैं और उठने की कोशिश को बेवकूफ़ी समझते हैं।
10. अच्छे घाव से बड़े काम होते हैं। उससे रूठी हुई प्रेमिका लौट आती है। प्रेम की परीक्षा भी हो जाती है। कहते हैं, कृष्ण की अंगुली कट गयी थी, तो राधा ने फ़ौरन साड़ी फ़ाड़कर पट्टी बांध दी। दूसरी गोपियां साड़ी के मोह में हार गयीं।
11. घाव सर पर हो और पगड़ी की तरह पट्टी बंधी हो, तो लोग आधा घण्टा हाल पूछता हैं। हाथ में चोट हो और हाथ ’स्लिंग’ से लटका हो तो आदमी कितना अच्छा लगता है। ये इज्जतदार घाव हैं। घाव को दुकान के साइनबोर्ड की तरह होना चाहिये। सामने टंगा हो और रंग-बिरंगे बल्ब लगे हों। जो अपना साइनबोर्ड अलमारी में रखता है, उसकी दुकान बरबाद न होगी?

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Sunday, September 27, 2020

परसाई के पंच-50

 1. सारे मूल्यों में क्रांति हो गयी। पहले समारोहों में फ़ूलमाला पहनते खुशी होती थी। अब वह गर्दन में लटका फ़ालतू बोझ मालूम होती है। सांस्कृतिक क्रांति ने फ़ूलों की सुगन्ध छीन ली है और मैं माला पहनते हुये हिसाब लगाता रहता हूं कि अगर फ़ूल की जगह नोट होता तो इस वक्त कितने रुपये मेरे गले में लिपटे होते।

2. आदमी एक पार्टी के टिकट पर विधायक बनता है और फ़िर जिस पार्टी की सरकार बनने वाली होती है, उसी में चला जाता है।
3. भक्त मन्दिर निर्माण के लिये चन्दा करता है और उसमें से अपना गुसलखाना भी बनवा लेता है।
4. लड़का प्रेम करके लड़की से ’आदर्श विवाह’ कर लेता है और अपने बाप को उसके बाप के पास दहेज मांगने भेज देता है।
5. आबकारी अफ़सर साहित्य-प्रेमी हो, तो साहित्य का भी विकास होता है और आबकारी का भी।
6. जैसे दिल्ली की अपनी अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डालर , पौण्ड ,रुपया, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं।
7. अंग्रेज बहुत चालाक थे। भरी बरसात में स्वतन्त्र करके चले गये। उस कपटी प्रेमी की तरह भागे , जो प्रेमिका का छाता भी लेता जाये। वह बेचारी भीगती बस-स्टैण्ड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है।
8. गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलती है, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपड़ा नहीं है।
9. दंगे से अच्छा गृह उद्योग तो इस देश में कोई दूसरा नहीं है।
10. इसे देश में जो जिसके लिये प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है। लेखकीय स्वतंत्रता के लिये प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं। सहकारिता के लिये प्रतिबद्ध इस आन्दोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं। सहकारिता तो एक स्पिरिट है। सब मिलकर सहकारिता पूर्वक खाने लगते हैं और आन्दोलन को नष्ट कर देते हैं। समाजवाद को समाजवादी ही रोके हुये हैं।
11. शरीर जब तक दूसरों पर लदा है, तब तक मुटाता है। जब अपने ही ऊपर चढ जाता है, तब दुबलाने लगता है। जिन्हें मोटे रहना है, वे दूसरों पर लदे रहने का सुभीता कर लेते हैं –नेता जनता पर लदता है, साधु भक्तों पर, आचार्य महत्वाकांक्षी छात्रों पर और बड़ा साहब जूनियरों पर।

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परसाई के पंच-49

 1. जो दिशा पा लेता है, वह घटिया लेखक होता है। सही लेखक दिशाहीन होता है। ऊंचा लेखक वह जो नहीं जानता कि कहां जाना है, पर चला जा रहा है।

2. दिशा आज सिर्फ़ अन्धा बता सकता है। अन्धे दिशा बता भी रहे हैं। सबेरे युवकों को दिशा बतायेंगे , शाम को वृद्धों को। कल डाक्टरों को दिशा बतायेंगे , तो परसों पाकेटमारों को। अन्धा दिशा-भेद नहीं कर सकता, इसलिये सही दिशा दिखा सकता है।
3. बड़ी अजब स्थिति है। दुखी होना चाहता हूं, पर दुखी होने का मुझे अधिकार ही नहीं है। मुझे लगता है, समाजवाद इसी को कहते हैं कि बड़े की हार पर बड़ा दुखी हो और छोटे की हार पर छोटा। हार के मामले में वर्ग-संघर्ष खत्म हो गया है।
4. कुछ लोग मातमपुर्सी करके खुश होते हैं। लगता है भगवान ने उन्हें मातमपुर्सी ड्यूटी करने के लिये ही संसार में भेजा है। किसी की मौत की खबर सुनते ही वे खुश हो जाते हैं। दुख का मेकअप करके फ़ौरन उस परिवार में पहुंच जाते हैं।
5. जनतन्त्र झूठा है या सच्चा यह इस बात से तय होता है कि हम हारे या जीते? व्यक्तियों का ही नहीं पार्टियों का भी यही सोचना है कि जनतन्त्र उनकी हार-जीत पर निर्भर है। जो भी पार्टी हारती है, चिल्लाती है- अब जनतन्त्र खतरे में पड़ गया। अगर वह जीत जाती तो जनतन्त्र सुरक्षित था।
6. लाउडस्पीकर का नेता-जाति की वृद्धि में क्या स्थान है, यह शोध का विषय है। नेतागीरी आवाज के फ़ैलाव का नाम है।
7. जनता भी अजीब है। वह आवाज देती है, पर वोट नहीं देती।
8. लोग जनता की आवाज कैसे सुन लेते हैं। किस ’वेव लेंग्थ’ पर आती है यह? मैं भी जनता में रहता हूं, बहरा भी नहीं हूं, पर जनता की आवाज मुझे कभी सुनायी नहीं पड़ती।
9. ’कान्फ़्रेन्स’ शब्द ’ सम्मेलन’ से लगभग 10 गुना गरिमावाला होता है, क्योंकि ’सम्मेलन’ छोटे पढानेवालों का होता है और ’सेमिनार’ तथा”कान्फ़्रेन्स’ बड़े पढानेवालों का।
10. ज्ञान आदमी को हमेशा इसी बेवकूफ़ी से बचाता है कि वह अपने को ज्ञानी न समझे।
11. इस देश में सामान्य आदमी के खून का उपयोग फ़ूलों को रंग और खुशबू देने के काम आ रहा है। कुछ और काम उस खून से नहीं हो रहा है।

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Saturday, September 26, 2020

परसाई के पंच-48

 1. बीमारी बरदाश्त करना अलग बात है, उसे उपलब्धि मानना दूसरी बात। जो बीमारी को उपलब्धि मानने लगते हैं, उनकी बीमारी उनको कभी नहीं छोड़ती। सदियों से अपना यह समाज बीमारियों को उपलब्धि मानता आया है और नतीजा यह हुआ है कि यह भीतर से जर्जर हो गया है, मगर बाहर से स्वस्थ होने का अहंकार बताता है।

2. लोग तो बीमारी से लोकप्रिय होते हैं, प्रतिष्ठा बढाते हैं। एक साहब 15 दिन अस्पताल में भरती रहे, जो सार्वजनिक जीवन में मर चुके थे, तो जिन्दा हो गये। बीमारी कभी-कभी प्राणदान कर जाती है। उनकी बीमारी की खबर अखबार में छपी , लोग देखने आने लगे और वे चर्चा का विषय बन गये। अब चुनाव लड़ने का इरादा रखते हैं।
3. इस जमाने में दिमाग तो सिर्फ़ सुअर का शान्त रहता है। यहां-वहां का मैला खा लिया और दिमाग शान्त रखा। जो ऐसा नहीं करता और जो सचेत प्राणी है, उसका दिमाग बिना मुर्दा हुये कैसे शान्त रहेगा?
4. जो नहीं है उसे खोज लेना खोजकर्ता का काम है। काम जिस तरह होना चाहिये , उस तरह न होने देना विशेषज्ञ का काम है। जिस बीमारी से आदमी मर रहा है, उससे उसे न मरने देकर दूसरी बीमारी से मार डालना डॉक्टर का काम है। अगर जनता सही रास्ते पर जा रही है तो उसे गलत रास्ते पर ले जाना नेता का काम है। ऐसा पढाना कि छात्र बाजार में सबसे अच्छे नोट्स खोजने में समर्थ हो जाये, प्रोफ़ेसर का काम है।
5. मेरे आसपास ’प्रजातन्त्र बचाओ’ के नारे लग रहे हैं। इतने ज्यादा बचाने वाले खड़े हो गये हैं कि अब प्रजातन्त्र का बचना मुश्किल दिखता है।
6. जो कई सालों से जनतन्त्र की सब्जी खा रहे हैं, कहते हैं बड़ी स्वादिष्ट होती है। ’जनतन्त्र’ की सब्जी में जो ’जन’ का छिलका चिपका रहता है उसे छील दो और खालिस ’तन्त्र’ को पका लो।आदर्शों का मसाला और कागजी कार्यक्रमों का नमक डालो और नौकरशाही की चम्मच से खाओ ! बड़ा मजा आता है –कहते हैं खानेवाले।
7. सफ़ाई सप्ताह कचरे का ढेर दे जाता है और नया साल बैरंग शुभकामना लेकर आता है।
8. कई गर्दनें मैंने ऐसी देखी हैं जैसे वे माला पहनने के लिये ही बनी हों। गर्दन और माला बिल्कुल ’मेड फ़ार ईच अदर’ रहती हैं। माला लपककर गले में फ़िट हो जाती है।
9. फ़ूल की मार विकट होती है। कई गर्दनें, जो संघर्ष में कटने के लिये पुष्ट की गयीं थीं, माला पहनकर लचीली हो गयी हैं। एक क्रांतिकारी इधर रहते हैं जिनकी कभी तनी हुई गर्दन थी। मगर उन्हें माला पहनने की लत गयी। अब उनकी गर्दन छूने से लगता है, भीतर पानी भरा है। पहले जन-आन्दोलन में मुख्य अतिथि होते थे, अब मीना बाजार में मुख्य अतिथि होते हैं।
10. फ़ूल की मार बुरी होती है। शेर को अगर किसी तरह एक फ़ूलमाला पहना दो तो गोली चलाने की जरूरत नहीं है। वह फ़ौरन हाथ जोड़कर कहेगा – मेरे योग्य कोई सेवा !
11. किसी को दिशा नहीं मालूम। दिशा पाने के लिये यहां की राजनैतिक पार्टियां एक अधिवेशन उत्तर में श्रीनगर में करती हैं, दूसरा दक्षिण में त्रिवेन्द्रम में, तीसरा पूर्व में पटना में और चौथा पश्चिम में जोधपुर में –मगर चारों तरफ़ घूमकर भी जहां की तहां रहती हैं। बायें जाते-जाते लौटकर दायें चलने लगती हैं।

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परसाई के पंच-47

 1. मूर्खता के सिवाय कोई भी मान्यता शाश्वत नहीं है। मूर्खता अमर है। वह बार-बार मरकर फ़िर जीवित हो जाती है।

2. अनुभव से ज्यादा इसका महत्व है कि किसी ने अनुभव से क्या सीखा। अगर किसी ने 50-60 साल के अनुभव से सिर्फ़ यह सीखा हो कि सबसे दबना चाहिये तो अनुभव के इस निष्कर्ष की कीमत में शक हो सकता है। किसी दूसरे ने इतने ही सालों में शायद यह सीखा हो कि किसी से नहीं डरना चाहिये।

3. केचुये ने लाखों सालों के अनुभव से कुल यह सीखा है कि रीढ की हड्डी नहीं होनी चाहिये।

4. बाजार बढ रहा है। इस सड़क पर किताबों की एक नयी दुकान खुली है और दवाओं की दो। ज्ञान और बीमारी का यही अनुपात है अपने शहर में। ज्ञान की चाह जितनी बढी है उससे दुगुनी दवा की चाह बढी है। यों ज्ञान खुद एक बीमारी है।

5. बेकार आदमी हैजा रोकते हैं, क्योंकि वे शहर की मक्खियां मार डालते हैं।

6. यह बीमारी प्रेमी देश है। तू अगर खुजली का मलहम ही बेचता तो ज्यादा कमा लेता। इस देश को खुजली बहुत होती है। जब खुजली का दौर आता है, तो दंगा कर बैठता है या हरिजनों को जला देता है। तब कुछ सयानों को खुजली उठती है और वे प्रस्ताव का मलहम लगाकर सो जाते हैं। खुजली सबको उठती है – कोई खुजाकर खुजास मिटाता है, कोई शब्दों का मलहम लगाकर।

7. सामने के हिस्से में जहां परिवार रहते थे वहां दुकानें खुलती जा रही हैं। परिवार इमारत में पीछे चले गये हैं। दुकान लगातार आदमी को पीछे ढकेलती चली जा रही है। दुकान आदमी को ढांपती जा रही है।

8. मैंने बहुत से क्राण्तिवीरों को बाद में भ्रांतिवीर होते देखा है। अच्छे-अच्छे स्वातन्त्र्य शूरों को दूकानों के पीछे छिपते देखा है।

9. दवायें सस्ती हो जायें, तो हर किसी की हिम्मत बीमार पड़ने की हो जायेगी। जो दवा में मुनाफ़ाखोरी करते हैं वे देशवासियों को स्वस्थ रहना सिखा रहे हैं। मगर यह कृतघ्न समाज उनकी निन्दा करता है।

10. बीमार पड़े , इसका मतलब है, स्वास्थ्य अच्छा है। स्वस्थ आदमी ही बीमार पड़ता है। बीमार क्या बीमार होगा। जो कभी बीमार नहीं पड़ते, वे अस्वस्थ हैं।

11. पूरा समाज बीमारी को स्वास्थ्य मान लेता है। जाति-भेद एक बीमारी ही है। मगर हमारे यहां कितने लोग हैं जो इसे समाज के स्वास्थ्य की निशानी समझते हैं। गोरों का रंग-दम्भ एक बीमारी है। मगर अफ़्रीका के गोरे इसे स्वास्थ्य का लक्षण मानते हैं। गोरों का रंग-दम्भ एक बीमारी है। मगर अफ़्रीका के गोरे इसे स्वास्थ्य का लक्षण मानते हैं और बीमारी को गर्व से ढो रहे हैं। ऐसे में बीमारी से प्यार हो जाता है। बीमारी गौरव के साथ भोगी जाती है।

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अपने अपने चैलेंज

 


बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे। सुबह-सुबह। मन किया सेल्फ़िया के फेसबुकिया दें -'टी चैलेंज।' राजभाषा महीने का ख्याल आया तो 'टी चैलेंज' को 'चाय चुनौती' कर दिया। 'चाय चुनौती' में विदेशी भाषा के शब्दों का देशीकरण भी हो गया। 'राजभाषा' माह के साथ-साथ 'आत्मनिर्भर भारत' का भी निर्वाह हो गया।
'चाय-चुनौती' में अनुप्रास की छटा भी दर्शनीय बन पड़ी है। 'बन पड़ी है' आलोचना घराने की जुमलेबाजी है।' बन पड़ी है' मतलब बन के पड़ी है। पड़ी ही रहेगी। कोई उठाने न आएगा इसको। इसी तरह पड़े-पड़े सड़ जाएगी। कुकुरमुत्ते उगेंगे इस पर। वे भी सड़ जाएंगे। अब कोई उनके समर्थन में न कहने वाला -'अबे सुन बे गुलाब...।'
हां तो बात हो रही थी चैलेंज वाली। आजकल सोशल मीडिया पर चैलेंजों की भरमार हो रखी हैं। 'कपल चैलेंज', 'सिंगल चैलेंज' , 'पर्सनालिटी चैलेंज' , 'नो मेकअप चैलेंज' , 'साड़ी चैलेंज' और भी न जाने कैसे-कैसे चैलेंज। लोग चैलेंज स्वीकार कर रहे हैं। बहादुर भी बन रहे हैं। बिना किसी खतरे के किये जाने वाले काम का चैलेंज को स्वीकार करने का रोमांच ही अलग होता है।
ई फोटोबाजी वाले चैलेंज की कड़ी में क्या पता कल को 'दिगम्बर चैलेंज' चला दे। कोई किसी कचहरी का बाबू या आरटीओ दफ्तर का सेवा प्रदाता 'सुविधा शुल्क चैलेंज' की शुरुआत कर दे। कोई मतदाता चुनाव के समय वोट के लिए 'वोटर दारू चैलेंज' की शुरआत कर दे।
ये अब चैलेंज तो जब होंगे तब देखेंगे अभी सामने के चैलेंज देखे जाएं। बरामदे में कुछ चिड़ियां फुदक रही हैं। फुदक-फुदककर फर्श से कुछ उठाकर चोंच में रखती जा रही हैं। फुदकते हुए खाने से लगता है कि जितना खा रही हैं उतना वर्कआउट करते हुए पचाती भी जा रही हैं।
सामने चिड़ियों का एक जोड़ा बिना मास्क लगाए , बिना सोशल डिस्टेनसिंग की परवाह किये सटा हुआ है। उसकी हरकतों से लग रहा है कि यह भी' कपल चैलेंज ' के लिए फ़ोटोबाजी कर रहा है। फोटो खिंचाकर फेसबुक पर डालेगा।
चिड़ियों का जोड़ा तरह-तरह के पोज बना रहा है। अपनी चोंच से पीठ खुजाते-खुजाते दोनों एक-दूसरे की पीठ खुजाने लगे। कुछ देर में एक चिड़िया छिटककर दूर खड़ी हो गयी। क्या पता उसने दूसरी से कहा भी हो -'क्या करते हो, हटो कोई देख लेगा।'
इसके बाद दूसरे चिड़िया ने , शायद वह चिड़ा रहा हो, अपने पंख फुला लिए। चिड़े के पंख फुलाने का अन्दाज शोहदों के मसल्स फुलाने वाले अंदाज की बेहतर नकल थी। चिड़िया ने फूले हुए पंख के अंदर अपने सर छिपा लिया जैसे सिनेमाओं में नायिकाएं, नायकों के सीने में सर छिपा लेती हैं। लगता है 'चिड़िया जोड़ा' हिंदी फिल्मों का प्रेमी है और सिनेमा हालों की झिर्रियों से मुफ्त फिल्मों देखता होगा। मुफ्त की चीजें ज्यादा मजा देती हैं।
इस चिड़िया के जोड़े से कुछ दूरी पर एक और चिड़िया खड़ी इनको ताक रही थी। शायद वह 'सिंगल चैलेंज' के लिए पोज दे रही हो। यह भी हो सकता है यह चिड़िया उस चिड़िया में से किसी एक की प्रेमी/प्रेमिका रही हो। मामला आगे बढ़ न पाया हो तो अलग हो गए हों। आज उनको 'कपल चलेंज' के लिए पोज देते देख सोच रहा हो। अब क्या सोच रहा हो यह आप अच्छे से समझ सकते हैं। हम क्या बताएं।
आज जब दुनिया में जिंदा रहना ही सबसे बड़ा चैलेंज है तो इस तरह के चैलेंज मन बदलाव के चोंचले हैं। ये वाले चैलेंज तो खूबसूरत भी लगते हैं। लेकिन अनगिनत ऐसे चैलेंज हैं तो फुल बेशर्मी से चल रहे हैं और हम उनको देखते हुए भी देख नहीं पा रहे। उन बेशर्म और बेहया और दिन पर दिन ताकतवर होते चैलजों के चलते आम आदमी के लिए अगली सांस लेना भी एक बड़ा चैलेंज है।
हर इंसान के अपने-अपने चैलेंज हैं। लोग अपने हिसाब से अपने चैलेंज चुन लेते हैं। जो नहीं चुन पाते उनपर बचे हुए चैलेंज थोप दिए जाते हैं। आम इंसान के पल्ले जिंदा रहने का पड़ा है।

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Friday, September 25, 2020

परसाई के पंच-46

 1. संस्कृति की हड्डी को अब कुत्ते चबाते घूम रहे हैं। संस्कृति की हड्डी कुत्ते का जबड़ा फ़ोडकर उसके खून को उसी को स्वाद से चटवा रही है। हां, हम विश्वबन्धुत्व भी मानते हैं, यानी अपने भाई के सिवा बाकी दुनिया-भर को भाई मानते हैं।

2. इस देश का आदमी लगातार अच्छी बातों से मारा गया है।
3. मैं अगर अपने मुख कमल से कोरी अच्छी बातें करूं तो सामने बैठे लोग मुझे फ़ौरन जूता मार दें। मगर बहुतों के पैर में जूते नहीं हैं, ये क्या मारेंगे? संविधान में जूते मारने का बुनियादी अधिकार तो होना चाहिये।
4. सफ़लता के महल का प्रवेश द्वार बन्द है। इसमें पीछे के नाबदान से ही घुसा जा सकता है। जिन्हें घुसना है, नाक पर रुमाल रखकर घुस जाते हैं। पास ही इत्र-सने रूमालों के ठेले खड़े हैं। रूमाल खरीदो, नाक पर रखो और नबदान मे से घुस जाओ, सफ़लता और सुख के महल में।
5. संकट में तो शत्रु भी मदद कर देते हैं। मित्रता की सच्ची परीक्षा संकट में नहीं, उत्कर्ष में होती है। जो मित्र के उत्कर्ष को बर्दाश्त कर सके, वही सच्चा मित्र होता है।
6. ग्रीटिंग कार्डों के ढेर लगे हैं, मगर राशन कार्ड छोटा होता जाता है।
7. सरकार को ठगना सबसे आसान है। नाबालिग है। मैंने नये बने हुये मकान मालिक से पूछा – कितना किराया है एक खण्ड का? उसने कहा – ये तो हमने सरकार के लिये बनवाये हैं। तुम लोग ज्यादा से ज्यादा 125 रुपये दोगे एक खण्ड का। सरकार हर खण्ड का 250 रुपये दे रही है। बेचारी सरकार की तरफ़ से कोई मोल-भाव करने वाला नहीं है। कोई भी ठग लेता है।
8. पवित्रता का मुंह दूसरों की अपवित्रता के गन्दे पानी से धुलने पर ही उजला होता है।
9. भोजन के बाद कलंक-चर्चा का चूर्ण फ़ांकना जरूरी होता है। हाजमा अच्छा होता है।
10. भगवान अगर औरत भगाये तो यह बात भजन में आ जाती है। साधारण आदमी ऐसा करे तो यह काम अनैतिक हो जाता है।
11. झूठे विश्वास का भी बड़ा बल होता है। उसके टूटने का भी सुख नहीं, दुख होता है।

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झूठ बोलने का मन

 आज थोड़ा झूठ लिखने का मन हुआ। एक से बढ़कर एक झूठ हल्ला मचाने लगे- 'हम पर लिखो, हम पर कहो।'

हमने सब झूठ को हड़काते हुए कहा -'अनुशासन में रहो। लाइन लगाकर आओ। सबका नम्बर आएगा। हल्ला मत मचाओ।'
सारे झूठ बमकने लगे। हमको सच समझ लिया है क्या ?
एक झूठ हल्ला मचाते हुए बोला-'हम लाइन लगाकर आएंगे तो हमारा तो वजूद ही निपट जाएगा। हम तो एक के ऊपर एक लदफद कर आते हैं। इसीलिए जब तक पहचाने जाते हैं, तब तक अपना काम करके निकल जाते हैं।'
हम जब तक उसकों कुछ कहें तब तक वह पलटकर फूट लिया। भागते हुए दिखा उसकी शर्ट पर 'सत्यमेव जयते लिखा' था।
हमको झूठ की कमीज पर लिखे लिखे 'सत्यमेव जयते' से आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि आजकल झूठ बोलने का यही फैशन चलन में है। बड़े झूठ सच के लिबास में ही बोले जाते हैं। देश सेवा के नाम पर स्वयंसेवा का चलन है। हमको अचरज उसकी स्पीड पर था। जितनी तेज वह भागा उतनी तेज ओलंपिक में भागता तो गोल्ड मेडल मिल जाता ।
हमने उसकी स्पीड पर ताज्जुब किया तो उसकी जगह ले चुके झूठ ने बताया -'उसकी 'सत्यमेव जयते' वाली ड्रेस किराए की है। घण्टे भर के लिए लाया था। देर करता तो अगले घण्टे का किराया भी ठुक जाता। बहुत मंहगा होता जा रहा है झूठ बोलना भी आजकल। आप समझते हो सिर्फ पेट्रोल ही ऊपर जा रहा है।'
हम कुछ और कहें तब कुछ और झूठ हल्ला मचाने लगे। हल्ला मचाने वाले 'मूक विरोध' की कमीज पहने थे। हमें लगा कि कुछ देर और ठहरे यहां तो सब मिलकर हमको पीट देंगे। हमारे शक की वजह उनकी कमीजों पर लिखा नारा था। सबकी छाती पर लिखा था -'अहिंसा परमों धर्म:। '
हम फूट लिए कहकर कि अभी आते हैं। सारे झूठ हमारी बात सुनकर खुश हो गए। वे आपस में धौल धप्पा करते हुए बोले -'ये तो अपना ही आदमी निकला। हमारी ही तरह झूठ बोलता है। इसको अब लौटकर आना नहीं। चलो फालतू टाइम क्या खोटी करना।'
हमको लगा कि समय सही में कीमती है। झूठ बोलने वाले तक इसको बर्बाद नहीं करते। बिना समय बर्बाद किये झूठ बोलते रहते हैं।

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Thursday, September 24, 2020

परसाई के पंच-45

 1. विनय के रेशमी पर्दे के पीछे अहं की क्रूरता छिपी नहीं रह सकती। अहं की प्रकृति ही प्रदर्शन की है, वह नकटे की तरह आईना देखने को उत्सुक रहता है।

2. कुछ नकटों को आईना देखकर भी यह समझ में नहीं आता कि नकटापन कुरूपता है। वे समझते हैं कि कट जाने से नाक सुडौल हो गयी।
3. अफ़सर-कवि एक खास प्रकार का प्राणी होता है। अफ़सरी रोब और कवि की कोमलता में निरन्तर संघर्ष चलता रहता है।
4. मनुष्य का जीवन यों बहुत दुखमय है, पर इसमें कभी-कभी सुख के क्षण आते रहते हैं। एक क्षण सुख का वह होता है, जब हमारी खोटी चवन्नी चल जाती है या हम बगैर टिकट बाबू से बचकर निकल जाते हैं। एक सुख का क्षण वह होता है, जब मुहल्ले की लड़की किसी के साथ भाग जाती है और एक सुख का क्षण वह भी होता है , जब बॉस के घर छठवीं लड़की होती है।
5. ब्रह्मानन्द तब प्राप्त होता है, जब साधक परमात्मा को ठग लेता है। कई तपस्वी ब्रह्मानन्द की प्राप्ति के लिये पूरी जिन्दगी साधना में बरबाद कर देते हैं। वे अगर स्थानीय पानवाले के पास एक खोटी चवन्नी चला देते हैं, तो उन्हें सहज ही ब्रह्मानन्द प्राप्त हो जाता।
6. ठगते देवता भी हैं। विष्णु ने तो एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण करके अपने साथी और मित्र शंकर को ही ठग लिया था – जैसे कोई प्रोफ़ेसर दूसरे प्रोफ़ेसर का पेपर आउट कर दे।
7. इन्द्र ने तो तपस्वियों को ठगने के लिये अप्सराओं की एक पलटन ही रखी थी और कई मुनि इस आशा से तपस्या करते थे कि तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र कोई अप्सरा भेजेगा। पर कोई-कोई इसमें भी ठगा जाते थे – वे जिन्दगी भर तपस्या करते और कोई अप्सरा नहीं आती थी। आत्मा पुकारती – देवराज, अप्सरा भेजो ! हम तपस्या कर रहे हैं और इन्द्र जबाब देता –अभी कोई ’स्पेयर’ (खाली) नहीं है।
8. प्रेम में ठगना जरूरी है। जब प्रेम बहुत गहरा हो जाता है, तब प्रेमिका प्रेमी को छलिया, कपटी और ठग कहने लगती है। जो जितना बड़ा ठग होगा, वह उतना ही बड़ा प्रेमी होगा।
9. कोई ’मरा-मरा’ चिल्ला रहा था तो राम ने उसे सीधा स्वर्ग भेज दिया। बड़े आदमी छोटा एहसान करके ’प्रोपेगण्डा स्टण्ट’ साधते हैं। वैष्णव इस स्टण्ट को समझे ही नहीं और स्तुति गाने लगे।
10. आजकल देख रहा हूं कि अच्छी बाते कहने वाले ज्यादा पिट रहे हैं। अब अच्छी बातें कहने का हक किसी को लोग देना नहीं चाहते। जिस देश में अच्छी बातें कहने से आदमी पिट जाये, उसमें अच्छी बात कहने वालों ने क्या गजब न किया होगा?
11. इस देश में यह बड़ी अजब बात है कि जो आदमी जितना पिटता है, वह उतना अच्छा मुस्कराता है।

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Tuesday, September 22, 2020

परसाई के पंच-44

 1. दो-चार निन्दकों को एक जगह बैठकर निन्दा में निमग्न देखिये और तुलना कीजिये दो-चार ईश्वर भक्तों से, जो रामधुन लगा रहे हैं। निन्दकों की सी एकाग्रता , परस्पर आत्मीयता , निमग्नता भक्तों में दुर्लभ है।

2. कुछ मिशनरी’ निन्दक मैंने देखे हैं। उनका किसी से बैर नहीं, द्वेष नहीं। वे किसी का बुरा नहीं सोचते। पर चौबीसों घण्टे वे निन्दा-कर्म में बहुत पवित्र भाव से लगे रहते हैं। उनकी नितान्त निर्लिप्तता, निष्पक्षता इसी से मालूम होती है कि वे प्रसंग आने पर अपने बाप की पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं , जिस आनन्द से अन्य लोग दुश्मन की। निन्दा इनके लिये ’टॉनिक’ होती हैं।
3. ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा भी होती है। लेकिन इसमें वह मजा नहीं जो मिशनरी भाव से निन्दा करने में आता है। इस प्रकार का निन्दक बड़ा दुखी होता है, ईर्ष्या-द्वेष से चौबीसों घण्टे जलता है और निन्दा का जल छिड़ककर कुछ शान्ति का अनुभव करता है।
4. ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा करने वाले को कोई दण्ड देने की जरूरत नहीं है। वह निन्दक बेचारा स्वयं दण्डित होता है। आप चैन से सोइये और वह जलन के कारण सो नहीं पाता।
5. निन्दा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है।
6. निन्दा कुछ लोगों की पूंजी होती है। बड़ा लम्बा-चौड़ा व्यापार फ़ैलाते हैं वे इस पूंजी से। कई लोगों की ’रेस्पेक्टिबिलिटी’ (प्रतिष्ठा) ही दूसरों की कलंक कथाओं के पारायण पर आधारित होती है।
7. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हममें जो करने की क्षमता नहीं होती है, वह यदि कोई करता है तो हमारे पिलपिले अहं को धक्का लगता है, हममें हीनता और ग्लानि आती है। तब हम उसकी निन्दा करके अपने को अच्छा समझकर तुष्ट होते हैं।
8. लोग तो इत्र चुपड़कर फ़ोटो खिंचाते हैं जिससे फ़ोटो में खुशबू आ जाये। गन्दे से गन्दे आदमी को फ़ोटो भी खूशबू देती है।
9. दम्भ हर हालत में बुरा ही होता है , पर जब यह विनय के माध्यम से प्रकट हो, तब तो बहुत कटु हो जाता है।
10. विनय के रेशमी पर्दे में छिपा अहं का कांटा बड़ा घृणित होता है, खतरनाक भी।
11. विनय की मखमली म्यान के भीतर हम दम्भ की प्रखर तलवार रखे रहते हैं।

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