Saturday, May 29, 2021

इब्ने शफी, बी.ए के पंच

 "जब एक आदमी पागल हो जाता है तो उसे पागलखाने में बंद कर देते हैं और जब पूरी कौम पागल हो जाती है तो ताकतवर कहलाने लगती है।"

-इब्ने शफी, बी.ए.
उपन्यास 'अनोखी रक्कासा' से।

शहंशाहियत में तो सिर्फ एक नालायक से दो-चार होना पड़ता है, लेकिन जम्हूरियत में नालायकों की पूरी टीम बवाले जान बन जाती है।
-इब्ने शफी, बी.ए.
उपन्यास 'भयानक जजीरा'- 1953 से।

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Thursday, May 27, 2021

लव एट द टाइम ऑफ कोरोना

 बहुत दिन से लिखना स्थगित है। इस बीच कोरोना का हल्ला इतना रहा कि हर तरफ बस कोरोना ही कोरोना। कई मित्र, जान पहचान वाले और उनके परिवारी जन 'शांत' हो गए। कुछ इलाज शुरू होने में देरी से गये, कुछ गलत इलाज से, कुछ डर से। एक की पत्नी ने बताया कि ये तमाम तरह के वीडियो देखकर दहशत में आ गए। बीपी कम हो गया। नहीं रहे।

गब्बर सिंह की बात याद आई -'जो डर गया, समझो मर गया।'
बीमारी के नित नए इलाज बताये जा रहे हैं। इतनी तरकीबें कोरोना से बचाव कि अगर उनकी गिनती की जाए तो जनसँख्या के आकंड़ों पर भारी पड़ें। कई इलाज तो आपस में इतने विरोधी कि अगर एक साथ खड़े कर दिए जाएं तो उनमें आपस में मारपीट हो जाये। 'इलाज दंगा' हो जाये शहर में।
इलाज से बेहतर बचाव है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की बात हो रही। मास्क जरूरी है। पानी जरूरी है। सफाई जरूरी है। सांस रोकने का अभ्यास जरूरी। सब अपनाए जा रहे हैं। एक डॉक्टर के वीडियो में आया कि पच्चीस सेकेंड तक सांस रोक लिए तो समझिए फेफड़े मजबूत हैं। हम अभ्यास करके 40 सेकेंड तक रोक लिए। लगा कि घर में बाउंसर बैठा लिए हैं, कोरोना आएगा तो दौड़ा लेंगे।
जिनके यहां कई लोग नहीं रहे उनके हाल का अंदाज ही लगाया जा सकता है। हर नई फोन काल उठाते हुए जी दहलता - ' कोई अनहोनी की खबर न हो।' सबेरे किसी भी इंसान से मिलते हुए लगता -'कहीं यह किसी के न रहने की खबर न दे।'
कल एक मित्र से बात हुई। उन्होंने अपने कई परिवारी जन खोये कोरोना में। हाल पूछने पर जबाब आया -'जिंदा हूँ।' दो शब्द का यह जबाब कोरोना से जूझते लोगों की मन:स्थिति का एक्सरे है।
कोरोना हो जाने पर आइसोलेशन की बात होती है। अलग कमरा, अलग बाथरूम। सब कुछ अलग। ऐसे में मुझे हमेशा अपने देश की आधी से भी अधिक आबादी वाले वो लोग याद आये जिनमें कई-कई लोग एक कमरे/कोठरी में रहते हैं, कई-कई परिवार एक बाथरूम, एक शौचालय का इस्तेमाल करते हैं। वो कैसे आइसोलेशन में रहेंगे।
बहुत कठिन समय से गुजरना हो रहा है। इससे बचाव के लिए सावधानी, इलाज तो जरूरी है ही। साथ ही जरूरी है जिजीविषा। जीने की इच्छा। जीने की अदम्य इच्छा बहुत तगड़ी एंटीबायटिक है, बहुत असरदार स्टेरायड है कोरोना से मुकाबला करने के लिए।
हमारा एक दोस्त 10 दिन आईसीयू में रहा। होश नहीं रहा उसको। जब होश आया तो डॉक्टर ने कहा -'सरदार जी, दवाएं तो ठीक हैं। लेकिन जब तक आप नहीं चाहेंगे तब तक ठीक नहीं होंगे। आप को खुद अपने को ठीक करने के लिए मेहनत करनी होगी।' दोस्त आजकल घर आ गया है। कमजोरी दूर हो रही है। ठीक हो रहा है।
परसाई जी ने लिखा है -''हड्डी ही हड्डी, पता नहीं किस गोंद से जोड़कर आदमी के पुतले बनाकर खड़े कर दिए गए हैं। यह जीवित रहने की इच्छा ही गोंद है।"
इस बीच कई बार बहुत कुछ लिखने की सोची। लेकिन मन नहीं हुआ। बीच में एक पोस्ट लिखने की सोची थी। संकट के समय में अनजान लोगों ने जिस तरह अनेक लोगों की सहायता की , तन से, मन से, धन से उससे लगा कि जब सारे तंत्र फेल हो जाते हैं, सारे सिस्टम भू लुंठित हो जाते हैं। जब राजनेताओं के बस में सिवाय निर्लज्ज बहानेबाजी, बटोलेबाजी और बयानबाजी के कुछ नहीं बचता ऐसे कठिन समय में भी समाज में ऐसे लोग होते हैं जो इंसानियत के जज्बे से भरे होते हैं। ऐसे लोग चुपचाप अपनी सामर्थ्य भर लोगों की सेवा में लगे रहते हैं। कोई भी समाज इनके कारण ही बचा रहता है।
ऐसे तमाम लोगों को समाज में देखकर लगा कि उनके बारे में लिखते हुए मार्खेज के उपन्यास की तर्ज पर लिखें -'लव एट द टाइम आफ कोरोना।' कोरोना काल में प्रेम।
लिखाई तो जब होगी तब होगी। फिलहाल आप मजे में रहिये। डरिये मत। आक्सीमीटर से ज्यादा अपनी सांस पर भरोसा करिये। जब तक आप चाहेंगे तब तक आपकी सांस चलेगी।
खूब मस्त रहिये। जो होगा देखा जाएगा।

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Monday, May 24, 2021

जिजीविषा

 मरने में मरने वाला ही नहीं मरता

उसके साथ मरते हैं
बहुत सारे लोग
थोड़ा-थोड़ा!
जैसे रोशनी के साथ
मरता है थोड़ा अंधेरा।
जैसे बादल के साथ
मरता है थोड़ा आकाश।
जैसे जल के साथ
मरती है थोड़ी सी प्यास।
जैसे आंसुओं के साथ
मरती है थोड़ी से आग भी।
जैसे समुद्र के साथ
मरती है थोड़ी धरती।
जैसे शून्य के साथ
मरती है थोड़ी सी हवा।
उसी तरह
जीवन के साथ
थोड़ा-बहुत मृत्यु भी
मरती है।
इसीलिये मृत्यु
जिजीविषा से
बहुत डरती है।
-डा.कन्हैयालाल नंदन

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Sunday, May 16, 2021

कौन मुस्काया

 

कौन मुस्काया
शरद के चांद-सा
सिंधु जैसा मन हमारा हो गया।
एक ही छवि
तैरती है झील में
रूप के मेले न कुछ कर पाएंगे
एक ही लय
गूँजनी संसार में
दूसरे सुर-ताल किसको भाएंगे।
कौन लहराया
महकती याद-सा
फूल जैसा तन हमारा हो गया।
खिल गया आकाश
खुशबू ने कहा
दूर अब अवसाद का घेरा हुआ
जो भी भी पास तक आती न थी
उस समर्पित शाम ने
जी भरकर छुआ।
कौन गहराया
सलोनी रात-सा
रागमय जीवन हमारा हो गया।
पूर्व से आती
हवा फिर छू गई
फिर कमल मुख हो गयी सम्वेदना
जल तरंगों में नहाकर चांदनी
हो गयी है
इन्द्रधनु-सी चेतना
कौन शरमाया
सुनहरे गात-सा
धूप जैसा क्षण हमारा हो गया।
- गीतकार विनोद श्रीवास्तव, कानपुर

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Monday, May 10, 2021

फिर नए सपने होंगे

 

फिर घना कोहरा छंटेगा,
फिर नया सूरज उगेगा,
फिर नई कली खिलेगी,
फिर नई मंजिल मिलेगी।
फिर नए सपने होंगे,
गले लगाते कुछ अपने होंगे,
स्वप्न होंगे नए
दर्द भी कुछ नए होंगे।
हर जख्म के लिए
मरहम कुछ नए होंगे।
कोरोना काल की मनहूसियत को धता बताती हुई यह कविता सुनिए हमारे सुपुत्र Anany Shukla की आवाज में। कठिन समय में आशा की बात कहती हुई कविता सुनते हुए यही सोच रहे थे अपन -'काश हम भी ऐसे वीडियो बना पाते।' 🙂

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10222284893684708

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मुहब्बत

 *किसी शहर से परिचित होने के लिए शायद सबसे आसान तरीका यह है कि यह जानने की कोशिश की जाए कि उसमें रहने वाले लोग किस तरह काम करते हैं, किस तरह प्यार और मुहब्बत करते हैं और किस तरह मरते हैं।

*सच तो यह है कि यहां हर आदमी जिंदगी से ऊबा हुआ है और अच्छी आदतें डालने की कोशिश में लगा रहता है। हमारे नागरिक कठोर परिश्रम करते हैं, लेकिन इसमें उनका एकमात्र उद्देश्य धनवान बनना होता है।
* निश्चय ही आजकल सबसे साधारण बात जो हमें देखने को मिलती है वह यह कि लोग सुबह से लेकर शाम तक काम करते हैं और फिर जिंदा रहने के लिए उनके पास जो समय बच रहता है, उसको बर्बाद करने के लिए ताश खेलने की मेजों , जलपान-ग्रहों या गपशप करने की जगहों की ओर चल पड़ते हैं।
* जिसे 'प्रेम-क्रीड़ा' कहा जाता है, उसमें हमारे यहां के लोग या तो एक-दूसरे का बहुत तेजी से भक्षण कर लेते हैं या फिर दाम्पत्य-सम्बन्ध की हल्की-फुल्की आदत डालकर जिंदगी बसर करने लगते हैं। इन अतिवादों के बीच का जीवन हमें यहां अक्सर देखने को नहीं मिलता।
* और शहरों की तरह ओरान में भी, समय और चिंतन की कमी के कारण लोगों को एक-दूसरे से मुहब्बत करनी पड़ती है, बिना यह जाने हुए कि मुहब्बत क्या चीज होती है।
-अल्वेयर कामू के उपन्यास प्लेग के अंश।

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Sunday, May 09, 2021

कोरोना से लड़ना सबका फर्ज है

 

"अगर आदमी ध्यान से सोचे तो हर घटना का , चाहे वह कितनी ही अप्रिय क्यों न हो, आशापूर्ण पहलू भी होता है।
यह सुनकर रेम्बर्त ने गुस्ताखी से अपने कन्धे सिकोड़े और बाहर निकल आया।
दोनों शहर के केंद्र में पहुंच गए थे।
"यह निहायत अहमकाना बात है न डॉक्टर! दरअसल मैंने अखबारों के लिए लेख लिखने के लिए दुनिया में जन्म नहीं लिया था। मेरा ख्याल है किसी औरत के साथ जिंदगी बसर करने के लिए मैं पैदा हुआ हूँ। यह तर्क संगत बात है न ?"
रियो ने सतर्कता से उत्तर दिया कि सम्भव है रेम्बर्त की बात में सच्चाई हो।"
ऊपर उद्धरत बातचीत अल्वेयर कामू के प्रसिद्द उपन्यास प्लेग के दो पात्रों की है।
ओरान शहर में प्लेग फैल जाती है। रेम्बर्त संयोगवश ओरान में आया था। प्लेग महामारी से बचाव के लिए शहर के फाटक बंद कर दिए गए। लोगों का आना-जाना रुक गया।
रेमबर्त शहर से बाहर जाने के लिए छटपटाने लगा। उसकी प्रेमिका उसका इंतजार कर रही थी। लेकिन शहर के फाटक बंद थे। कोई बाहर नहीं जा सकता था।
रेम्बर्त ने हर सम्भव कोशिश की निकलने की। उच्चाधिकारियों से मिला। जोर-जुगाड़ लगाया। डॉ रियो से अनुरोध किया कि उसे प्लेग के कीटाणु न होने का प्रमाणपत्र दे ताकि वह उसे दिखाकर निकल सके। रियो ने मना कर यह कहते हुए:
"मैं तुम्हे सर्टिफिकेट नहीं दे सकता, क्योंकि मुझे यह नहीं मालूम कि तुम्हारे अंदर इस बीमारी के कीटाणु नहीं है। और अगर मुझे मालूम होता तो भी मैं इस बात की गारंटी कैसे दे सकता हूँ कि मेरे यहाँ से निकलकर प्रीफेक्ट के दफ्तर तक पहुँचने के बीच तुम्हें इस बीमारी की छूत नहीं लग जायेगी।"
रेम्बर्त हर तरह से अपने को सही ठहराने की कोशिश करते हुए निकलने की कोशिश करता है। असफल होता है। इस बीच वह डॉक्टर रियो के सम्पर्क में रहते हुए शहर से निकलने की कोशिशें करता रहता है।
डॉक्टर रियो आपदाग्रस्त लोगों के इलाज में लगा रहता है। रेम्बर्त शहर से निकलने की फिराक में। इस सिलसिले में वह गेट पर तैनात लोगों से जोड़-तोड़ कर निकलने की कोशिश में रहता है। उसको अपनी प्रेमिका से मिलने की उतावली है।
रेम्बर्त को पता चलता है कि डॉक्टर रियो की बीबी शहर से करीब 100 मील दूर एक सेनिटोरियम में है।
अगले दिन तड़के ही रेम्बर्त ने डॉक्टर को फोन किया। "जब तक मैं शहर से निकलने का कोई तरीका नहीं निकाल लेता , क्या तब तक तुम मुझे अपने साथ काम करने दोगे?"
कुछ देर की खामोशी के बाद जबाब सुनाई दिया , "जरूर, रेमबर्त! धन्यवाद।"
इसके बाद रेम्बर्त डॉक्टर रियो के साथ काम करने लगा। शहर से निकलने की कोशिश भी जारी रहीं।
एक दिन रेम्बर्त का शहर से बाहर निकलने का जुगाड़ बन गया। उसका शहर से जाना तय हो गया। वह रियो और तारो से विदा लेकर गया। रेम्बर्त की जगह नई टीम बन गई।
जिस रात रेम्बर्त को जाना है उसी शाम वह वापस आकर डॉक्टर रियो से मिलता है। आगे की बात :
"रेम्बर्त बोला , "डॉक्टर , मैं शहर छोड़कर नहीं जा रहा। मैं तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ।"
तारो बिना हिले-डुले कार चलाता रहा। लगता था कि रियो अपनी थकान से छुटकारा पाने में असमर्थ था।
"और ----'उसका' क्या होगा?" रियो की आवाज बड़ी मुश्किल से सुनाई दे रही थी।
रेम्बर्त ने जबाब दिया कि उसने सारे मामले पर बड़ी गम्भीरता से सोच-विचार किया है। उसके विचार तो नहीं बदले लेकिन अगर वह चला गया तो उसे अपने पर शरम आएगी, जिसकी वजह से अपनी प्रियतमा के साथ उसका सम्बन्ध और भी पेचीदा हो जायेगा।
इस बार और अधिक उत्साह दिखाते हुए रियो ने कहा कि यह निरी बकबास है। अगर कोई अपने सुख को ज्यादा पसन्द करता है तो इसमें उसे शरम नहीं महसूस करनी चाहिए।
" यह तो सही है," रेम्बर्त ने जबाब दिया, "लेकिन जब सब दुखी हों तो सिर्फ अपना सुख हासिल करने में शरम महसूस हो सकती है।"
तारो ने, जो अभी तक खामोश रहा था, पीछे मुड़कर देखे बगैर कहा कि अगर रेम्बर्त दूसरे लोगों के दुख में हिस्सा बटाने की इच्छा रखता है तो उसके पास फिर अपने सुख के लिए कोई समय नहीं बचेगा। इसलिए दोनों रास्ते में से उसे एक चुनना ही पड़ेगा।
"बात यह नहीं है," रेम्बर्त ने फिर कहा।" अब तक मैं हमेशा अपने को इस शहर में एक अजनबी- सा महसूस करता था। और मुझे ऐसा लगता था कि आप लोगों से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन अब मैंने अपनी आंखों से जो कुछ देखा है, इसके बाद मैं जान गया हूँ कि मैं चाहूं या न चाहूं मैं यहीं का हूँ। प्लेग से लड़ना सबका फर्ज है।""
इसके बाद रेम्बर्त शहर छोड़कर भागने के प्रयास छोड़ देता है। डॉक्टर रियो की टीम से जुड़कर प्लेग रोगियों की सेवा में जुट जाता है। एक दिन ऐसा भी आता है जब शहर में प्लेग खत्म हो जाती है और सड़कों पर मरते हुए चूहों की जगह बिल्लियां दिखने लगती हैं।
पिछली सदी में हुई प्लेग महामारी पर केंद्रित यह उपन्यास पढ़ते हुए आज कोरोना की विभीषिका के समाचार छाए हुए हैं। तमाम लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं। असमय विदा हो रहे हैं।
यह विवरण एक पराये शहर के पत्रकार की एक अजनबी शहर के लोगों की पीड़ा से जुड़कर वहां के लोगो की सेवा करने की भावना का है।
आज जब हमारा समाज इस विभीषिका से जूझ रहा है तब समय यह देखने का भी है कि हम अपने समाज से कितने जुड़े हैं। हमारे अंदर डॉक्टर रियो और पत्रकार रेम्बर्त के कितने अंश बचे हैं।
डॉक्टर रियो और रेम्बर्त प्लेग से लड़े थे। आज कोरोना फैला है। कोरोना से लड़ना हमारा फर्ज है।

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Friday, May 07, 2021

प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है

 *इंसान को मुसीबतजदा लोगों की तरफ से जरूर लड़ना चाहिए, लेकिन अगर वह लड़ाई के सिवा हर चीज में दिलचस्पी लेना बंद कर दे तो लड़ाई का क्या फायदा?

*प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है और हमेशा इंसान की जिंदगी में ऐसा वक्त आता है जब वह कैद से, अपने काम से, कर्तव्य परायणता से ऊब जाता है, और सिर्फ एक ही चीज की तमन्ना करने लगता है - किसी प्रिय चेहरे की, प्यार भरे किसी दिल की गरमी और जादू पाने की।
*इंसानों में घृणा करने योग्य बातों की अपेक्षा प्रशंसनीय गुण अधिक मात्रा में हैं।
अल्वेयर कामू के उपन्यास ' प्लेग' से।

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Thursday, May 06, 2021

लिखना खुद को अभिव्यक्त करना है - मनोहर श्याम जोशी

 मेरी तमाम ऐसी 'रचनाएं' भी हैं, जो मैं अपने मानस पटल पर ही लिखकर खुश हो गया, कागज पर उतारी नहीं। एक जमाना था कि इस तरह सोची हुई रचनाएं भी बोलकर सुना डालता था। खैर, अब तो आलम यह है कि बात करते-करते यह भी भूल जाता हूँ कि बात किस प्रसंग से शुरू की थी और उसे किस ओर ले जाना चाहता था। जो रचनाएं मैंने शुरू भी कीं, उनमें से भी ढेरों ऐसी हैं , जिन्हें मेरी अन्य व्यस्तताओं ने या मेरे भीतर बैठे आलोचक ने पूरा होने ही नहीं दिया।

मैंने अभी अन्य व्यस्तताओं का जिक्र किया, उनमें से अधिकतर व्यवसायिक लेखन से जुड़ी हुईं थीं और लुत्फ की
बात यह है कि इस तरह के लेखन में भी मैं काटता-जोड़ता रहा हूँ।
मैं जब सम्पादक था , मेरी इसी संसोधन वृत्ति से परेशान प्रेस फोरमैन मुझे अपने लिखे हुए का प्रूफ एक बार से ज्यादा पढ़ने नहीं देता था कि ये तो हर बार बदलते ही चले जायेंगे।
तो मेरे हिस्से सन्तोष नहीं,खाली संशय पड़ा है। तो मेरे पास गिनाने को मेरी एक भी उपलब्धि नहीं है। अलबत्ता अफसोस अनेक हैं, जिन्हें बहानों की संज्ञा भी दी जा सकती है। गनीमत इतनी ही है कि ये बहाने कुछ ठोस और महत्वपूर्ण न लिख पाने के हैं।
कहा जाता है कि रचनात्मक तेवर दो तरह के होते हैं -एक रूमानी दूसरा क्लासिकी। मुझे खुशफहमी रही है कि मैं अपने गुरु नागर जी की तरह क्लासिकी तेवर का धनी हूँ। और अपने दूसरे गुरु अज्ञेय जी की तरह रोमांटिक नहीं। लेकिन क्लासिकी तेवर साध लेने पर भी कोई रचनाकार अपनी रचना में अपने मन का उल्लंघन नहीं कर सकता। यह क्या है कि लेखन अंततः और मूलतः आत्माभिव्यक्ति ही है। जिसे आत्म या सेल्फ कहा जाता है वह आध्यात्म और विज्ञान , दोनों के पंडितों के लिए खासी रहस्यमयी चीज रही है।
आद्यात्म और मष्तिष्क विज्ञान दोनों का ही विद्यार्थी न होने के कारण मैं उस रहस्यवादी आयाम में जा सकने की योग्यता नहीं रखता। लेकिन मुझे इसमें संदेह नहीं कि लिखना खुद को अभिव्यक्त करना है और कि स्वयं से किसी भी लेखक के लिए मुक्ति सम्भव नहीं।
आप विश्वास कीजिये मैने किशोरावस्था से अब तक कुछ और हो जाने का यत्न किया है। जैसे स्कूल में, जब मैंने पाया कि हीरो का दर्जा मुझे ज्यादा पढ़ाकू लड़के नहीं , खिलाड़ी लड़के पाते हैं , तब मैंने किसी खेल की टीम में जगह पाकर अपनी जय बुलवाने की जी-तोड़ कोशिश की। और लड़कों की अपेक्षा काया में कमजोर तथा उम्र में छोटा होने के कारण मेरी खेल के मैदान में एक न चली।
यह कमी पूरी करने के लिए मैं हर खेल के बारे में अपना।किताबी ज्ञान बढ़ाता चला गया, ताकि खिलाड़ियों के बीच उठ बैठ सकूं। अपने को कुछ और बना सकने के क्रम में मैंने अपने को स्वयं अपने लिए हास्यास्पद बनाया। उच्चतर शिक्षा के दौरान चाहा कि बहुत बड़ा वैज्ञानिक बन सकूं। मुझे ' कल का वैज्ञानिक' की उपाधि भी मिली, लेकिन मैं वैज्ञानिक न बन सका। नियति ने मुझे इतना ही धैर्य और इतनी ही समझ दी थी कि विभिन्न विषयों की सतही जानकारी हासिल कर सकूं और उनपर पत्रकार की हैसियत से कलम चला सकूं।
तो मैं तमाम कोशिशों के बाद मैं ही रह गया - एक अदद कायर, कमजोर और रोंदू किस्म का इंसान, जो अपनी कातर भावुकता , हर नए उत्साह के 'पर' नोच डालने वाली अपनी उद्दत उदासी और संसार तथा स्वयं पर उठते नपुंसक आक्रोश की पर्दादारी करने के लिए व्यंग्य- विनोद, आत्म व्यंग्य और विडम्बना की शरण लेता रहा है।
- स्व. मनोहरश्याम जोशी
आज के अमर उजाला से साभार

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प्लेग की जगह कोरोना

 


महामारी मुझे इसके सिवा कोई नया सबक नहीं सिखा पाई कि मुझे तुम्हारे साथ मिलकर लड़ना चाहिए। हमसे से हरेक के भीतर प्लेग है, धरती का कोई आदमी इससे मुक्त नहीं है। और मैं यह भी जानता हूँ कि हमें अपने पर लगातार निगरानी रखनी होगी, ताकि लापरवाही के किसी क्षण में हम किसी चेहरे पर अपनी सांस डालकर उसे छूत न दे दें। दरअसल कुदरती चीज तो रोग का कीटाणु है। बाकी सब चीजें ईमानदारी, पवित्रता -इंसान की इच्छाशक्ति का फल हैं-ऐसी निगरानी जिसमें कभी ढील न हो। एक नेक आदमी जो इसमें कभी ढील नहीं देता , किसी को छूत नहीं देता।
-अल्वेयर कामू के उपन्यास 'प्लेग' से।
पिछली सदी में लिखे इस कालजयी उपन्यास को आज पढ़ते हुए लगा कि काफी कुछ वैसा ही घट रहा है, बड़े पैमाने पर, ज्यादा तेजी के साथ। सिर्फ प्लेग की जगह 'कोरोना' ने ले ली है।
नीचे हमारा परिवेश - रास्तों पर जिंदगी बाकायदा आबाद है।


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