Tuesday, December 31, 2019

बी ग्राउंड अगेन एट द टॉप



 कल लखनऊ में अपनी किताब 'घुमक्कड़ी की दिहाड़ी' पर वर्ष 2018 का बाबू गुलाब राय सर्जना सम्मान मिला। Amit को बताया हुआ था। उनको आना था। कार्यक्रम 1100 बजे होना था। लेकिन अचानक साढ़े नौ हो गया। उनको न आने का पक्का बहाना मिल गया। समय न बदलता तो भी बहाना तो मिल ही जाता। सरकारी कामकाज में बहानों की कमी नहीं होती, एक ढूंढो हजार मिलते हैं।

सम्मानित होने के बाद वापस निकले तो अमित का संदेश आया कि 2 से 0 230 पर आएंगे। हम बोले -'अब क्या आना। सब खल्लास हो गया यहां।' इस पर कहा गया -'आइये फिर यहीं। दस मिनट का रास्ता है।'
गए हम। नया मिला इनाम भी दिखाना था। शक्ति भवन पर अमित का ड्रॉइवर नीचे ही चुस्टैद था । फौरन गाड़ी अंदर करवाई। अमित से मुलाकात हुई। पहुंचते ही काफी वाली चाय आई। गपियाते , बतियाते तमाम बातें साझा हुई।
इसके पहले कि भूल जाये यह कहना है कि अमित अपने रहन-सहन और पहनावे के चलते दिन पर दिन जवानी की तरफ ही टिके हुए हैं। कल भी क्यूट, स्मार्ट, हैंडसम टाइप लग रहे थे। उनकी लोकप्रियता में उनकी 'इततु सी' घराने की पोस्ट्स के अलावा उनकी इस स्मार्टनेस का भी योगदान है। कल ध्यान नहीं रहा कहने का। सोचा अब बता दें।
अमित के कमरे के ऊपर ही हमारे साझा सीनियर Ashok Srivastava जी का चैंबर है। बहुत बड़े अधिकारी हैं बिजली विभाग में। पता चला कि आज ही विदेश से लौटे हैं। हमने उनसे भी मुलाकात कर ली।
अशोक श्रीवास्तव जी , अमित और हम लोग कालेज में एक ही विंग में रहते थे। तिलक हॉस्टल के बी ब्लॉक के ग्राउंड फ्लोर में। गोरखपुर के होने के चलते अशोक श्रीवास्तव जी को उनके मित्रों ने नाम दिया 'फिराक'। मोतीलाल के उनके जितने भी दोस्त, जूनियर, सीनियर हैं सब उनको फिराक के ही नाम से जानते हैं। शायद ही कोई अशोक श्रीवास्तव कहता हो। ऐसे ही अमित अपने दोस्तों में 'बमबम' ही हैं। हम ' सुकुल'। बचपने के, कॉलेज के निकनेम बहुत दूर तक , देर तक चलते हैं।
फिराक साहब हम लोगों का हमेशा बड़े भाई की तरह ख्याल रखते थे। वे छोटे से ही बड़े भाई जैसे लगे हमको। हमारे बड़े भाई का नाम भी अशोक था। इसलिए भी ऐसा ही लगता रहा मुझे।
कल जब इनाम मिला तो अशोक जी के पास जाने का कारण एक और भी था। मुझे याद आया कि कॉलेज में क्लब सेकेट्री हुआ करते थे वो। मुझे तमाम इनाम मिले उनके क्लब सेकेट्री रहते। लेखन, कैरम, शतरंज, जैम आदि के सर्टिफिकेट में अशोक श्रीवास्तव के हस्ताक्षर हैं।
बी ग्राउंड में हनारे अलावा और भी लोग इनामी थे। स्व. त्रिनाथ धावला सर, विनय अवस्थी और खुद अशोक श्रीवास्तव जी। कई बार लगातार इनाम मिलते हमारी विंग के लोगों को तो हम नारा लगाते - 'बी ग्राउंड अगेन एट द टॉप।'
कल जब इनाम मिला तो फिर से यह याद आया तो हम लपककर फिराक साहब से मिलने गए। उन्होंने भी देखते ही दफ्तर के सब लोगों से तखलिया कह दिया। बी ग्राउंड के लोगों साथ बैठकर फिर चाय पी। तमाम यादें साझा हुई।
जल्दी के चक्कर में तमाम दोस्तों से मुलाकात रह गई। तिलक हास्टल के ही मनजीत सर Manjeet Arora से भी मिलना रह गया। आजकल वे मोनेरेको के लोगों को साथ रखने वाले सूत्रधार हैं। जल्दी ही मिलेंगे। फिर से सभी का शुक्रिया।
Note: टिप्पणी का जबाब देने से फेसबुक ने हमको रोक दिया है इसलिए किसी टिप्पणी का जबाब न दे पाए तो बुरा न माना जाए। 🙂

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धन्यवाद, शुक्रिया, आभार




कल लखनऊ में वर्ष 2018 के लिए मेरी किताब 'घुमक्कड़ी की दिहाड़ी' पर बाबू गुलाब राय सर्जना सम्मान मिला। मित्रों ने
बधाई
दी। शुभकामनाएं भी। सभी के प्रति मन से आभार। हृदय से धन्यवाद। दिल से शुक्रिया।
सभी को व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद देने की कोशिश की फेसबुक ने ब्लाक कर दिया। कहते हुए कि Sorry you have blocked due to excessive comments. मने हम कह रहे हैं -मुझे खुशी मिली इतनी कि दिल में न समाय। फेसबुक कह रहा - अति सर्वत्र वर्जयेत।
तो मित्रों-सहेलियों-आदरणीयों-प्रियजनों आपकी शुभकामनाएं हमारे लिए बहुत बड़ा सम्बल है। बहुमूल्य हैं। जिनको व्यक्तिगत जबाब न दे पाए वे माफ करते हुए इसे ही हमारा व्यक्तिगत आभार माने। 🙂
यहां भी जबाब नहीं दे पा रहे किसी कमेंट का इसलिए आपकी
बधाई
, शुभकामनाओं के लिए अग्रिम धन्यवाद। 🙂

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Monday, December 30, 2019

सैनफ्रांसिस्को के घाट मतलब पियर 39



गोल्डन गेट ब्रिज देखने के बाद बाकी का सैनफ्रांसिस्को देखने निकले। चौड़ी सड़क, चौड़े फुटपाथ। जितनीं चौड़ी सड़क , लगभग उतनी ही फुटपाथ।
टहलते हुए पियर 39 की तरफ गए। पियर मने समझिये घाट। समुद्र किनारे सड़क किनारे कतार में बने हैं घाट। हर घाट पर तरह-तरह की दुकानें, संस्थान और दीगर इमारतें होती हैं। सैनफ्रांसिस्को का पियर 39 बाजार, दुकानों , रेस्तरां, मछुआरा घाट और सील मछलियों के लिए प्रसिद्द है।
जगह-जगह बड़ी बड़ी दुकाने। एक तो चीज स्कूल ही खुला था। चीज की दुकान थी शायद वह। एक मशहूर ब्रेड की दुकान भी थी। बुडमैन ब्रेड। ब्रेड कैसे बनती है इसकी नुमाइश दुकान में हो रही थी। एक जगह फव्वारा भी दिख गया तो उसके किनारे फोटो हुई।
वहीं फुटपाथ पर एक नौजवान लकड़ी के तख्त के मंच पर ऊंचा स्टूल लगाए करतब दिखा रहा था। स्टूल के भी ऊपर एक लोहे के रोलर पर लकड़ी के पटरे पर चढ़कर करतब दिखा रहा था वह। पटरे पर इधर-उधर होते, संतुलन बनाते, एक हाथ से बोतल उछालकर दूसरे से कैच करते, दर्शकों से बतियाते , अपने करतब की कमेंट्री करते हुये उस युवक को देखने के लिए मजमा लगा था। हर करतब पर लगता , अब गया, तब गया। लेकिन वह संतुलन बनाते करतब दिखाता था। कुछ देर बाद उसने अपने हाथ की बोतल दर्शकों की तरफ फेंक दी। वापस मांगी। दर्शक ने उसकी तरफ फेंकी। उसने लपकी। लपकने की कोशिश में वह फिर गिरने को हुआ। लेकिन गिरा नहीं। गज्जब का संतुलन।
लोग इस करतब के लिए उसको पैसे भी दे रहे थे। हम लोग करतब अधूरा देखकर , बीच में ही रोमांचित होकर आगे बढ़ लिए।
आगे भी तरह-तरह के लोग अलग-अलग कलाओं के प्रदर्शन करते दिखे। एक गायक दल गाना गा रहा था। एक आदमी रँगबिरंगे कपड़े पहने साबुन के बुलबुले बना रहा था। एक आदमी फुटपाथ पर तरह-तरह के तारों से अलग-अलग आकृतियां बना रहा था। ये कलाकार चुपचाप अपनी कला का प्रदर्शन करते रहते हैं। आपको अगर कुछ देना हो तो दीजिए, वे मांगते नहीं। अधिकतर सैलानी कुछ न कुछ देते ही दिखे।
अलावा इसके कुछ लोग ऐसे भी दिखे जो होमलेस की तख्ती लगाए चुपचाप मांग रहे थे। अमेरिका में भीख मांगने वाले कई जगह दिखें। अधिकतर चुपचाप तख्ती लगाए हुए होमलेस की। व्हीलचेयर पर बैठे बिना फिल्टर की सिगरेट फूंकते निस्संग मांगने वाले भी दिखे।
चलते हुए शाम हुई। एक जगह नाश्ता किया। सड़क किनारे फुटपाथ पर ही रेस्तरां में में। जिस मेज पर बैठे थे वह फुटपाथ की तरफ ही थी। बैरे ने मुझे मोबाइल मेज के किनारे से हटाकर सुरक्षित रखने के लिए कहा। यह बताते हुए कि जिधर मैने रखा था उधर से उचक्के लोग लेकर फुट लेते हैं। आर्थिक असमानता होने के कारण सैनफ्रांसिस्को में इस तरह की घटनाएं ज्यादा होती हैं।
वहीं एक मछुआरा घाट भी दिखा। सड़क किनारे फुटपाथ पर मछली पकड़ने और नाव खेने के प्रतीक चिन्हों से बना ख़ूबसूरत चौराहा।
पियर 39 पर अंदर गए। दूर समुद्र में पड़े तख्तों पर सील मछलियां आराम से मस्तियाँ रहीं थीं। कोई अंगड़ाई लेते हुए पलट रही थी। कुछ आपस में अठखेलियाँ करते हुए हाउ डु यू डु कर रही थीं। सूरज भाई इनके करतब देख मुस्करा रहे थे। हम भी बहुत देर देखते हुए फोटो बाजी करते रहे। समुद्र के बीच में खड़ा अर्काट का किला हमको बुला सा रहा था -'हमको देखने कब आओगे?'
पियर 39 पर तमाम दुकानों, खूब बड़े झूलों के अलावा म्यूजियम भी था। हम देख नहीं पाए उसको। शाम हो गयी थी। वापस लौट लिए।
लौटते हुए तमाम लोग फुटपाथ किनारे साइकिल चलाते दिखे। कुछ बतियाये, कुछ गपियाते और कुछ भागते, पसीना बहाते हुए भी। मेट्रो से , बस से घर वापस जाते लोग भी नमूदार हुए।
गाड़ी पार्किंग से वापस लेने गए। 25 डॉलर किराया लग गया करीब 4 घण्टे गाड़ी खड़ी करने का। 25 डॉलर मतलब करीब 1750 रुपये। इतने में ही वहीँ से उसी दिन एक जैकेट खरीदी।
पता होता पहले कि इत्ती मंहगी पार्किंग है अमेरिका में तो अपना गैरेज साथ उठा ले जाते। पार्किंग के पैसे बचाते, उल्टा कमा के आते। लेकिन अब तो पैसे ठुका के वापस आ चुके हैं। सब कुछ लुटा के अक्ल जो आई तो क्या हुआ।
गोलडन गेट ब्रिज और पियर 39 देखने के बाद बाएं- दाएं का सैनफ्रांसिस्को निहारते हुए शाम हो गयी। सूरज भाई टाटा करके निकल लिए। हम भी बचा हुआ शहर अगले दिन देखने के लिए छोड़कर घर वापस आ गए।
नोट: करतब, गाना और सील मछली के वीडियो आखिर में हैं।

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Saturday, December 28, 2019

गोल्डेन गेट पुल – कोई काम नहीं है मुश्किल जब किया इरादा पक्का

 




अमेरिका के किस्से लिखते हुये काफ़ी मामला इधर-उधर हो गया। किसी बाद वाले किस्से को पहले सुना दिया गया। कोई पहले वाला बाद के लिये रख लिया गया। किसी घटना को आउट आफ़ टर्न प्रोमोशन दे दिया गया। किसी को टरका दिया गया- ’जाओ नहीं लिखते तुम्हारे बारे में क्या कल्लोगे? जहां-जिससे मन आये करो जाकर शिकायत।’
कुछ किस्से ऐसे भी हैं जिसको तसल्ली से लिखने की बात सोचकर स्थगित कर दिया गया। वीआईपी ट्रीटमेंट देने के चक्कर में इनका नम्बर टलता गया। ऐसे ही किस्सों में एक है –किस्सा-ए-गोल्डन-गेटब्रिज। गोल्डन गेट पुल सैनफ़्रांसिस्को और मैरीन काउंटी के बीच बना हुआ पुल है। गोल्डन गेट नाम पड़ने के पीछे का किस्सा यह कि सैनफ़्रासिस्को प्रायदीप और मैरीन काउंटी के प्रायदीप को जोड़ने वाला पानी का हिस्सा गोल्डेन गेट जलडमरूमध्य (गोल्डन गेट स्ट्रेट) कहलाता है। इसी गोल्डन गेट जलडमरूमध्य के ऊपर बने होने के कारण यह पुल गोल्डन गेट कहलाता है।
बहरहाल जब पहुंचे सैनफ़्रांसिस्को तो गोल्डन गेट ब्रिज देखना पहली प्राथमिकता में था। पहुंचने के अलगे ही दिन सुबह ही निकल लिये पुल देखने। बेटे के घर से कुछ ही मिनट का रास्ता था। यही कोई पच्चीस-तीस मिनट। पार्किंग भी आराम से मिल गयी। अमेरिका में सड़क पर फ़्री की पार्किंग मिल जाना भी एक बड़ा सुकूनदेह माना जाता है। पार्किंग मिलना मतलब जाड़े में बिस्तर में सुबह-सुबह चाय मिलना! कहने को तो कह सकते थे कि पार्किंग मिलना मतलब जन्नत मिलना लेकिन जाड़े में रजाई छोड़कर जन्नत जाने में वो मजा कहां जो रजाई में बैठे-बैठे चाय मिल जाने में है। पार्किंग से पैदल दूरी पर ही पुल था। पूरा पुल कोहरे में डूबा हुआ था। ऐसे लग रहा था मानो कोहरे की रजाई ओढकर पुल ठंड से मुकाबला कर रहा हो। मतलब कि पुल तक को पता है कि कोहरे में सर्दी कम लगती है। वाकई स्मार्ट है पुल।
पुल के आसपास लोग अलग-अलग मुद्रा में टहल रहे थे। कोई फ़ोटो खिंचा रहा था। कोई बतिया रहा था। बच्चे खेल रहे थे। एक महिला बहुत कम कपड़ों में सड़क पर भागती जाती दिखी। जॉगिग कर रही थी, आसपास गुजरते लोगों को जगा रही थी। उसके अलावा भी तमाम लोग सड़क पर बहुत मन लगाकर दौड़ते दिखे। सांस ऐसे ले रहे थे जैसे दुनिया की सारी आक्सीजन बस उनके लिये ही सुरक्षित है।


हम सड़क से गुजर रहे थे तो कुछ वालंटियर हमको किनारे करते मिले। पता चला कोई मैराथन रेस हो रही थी। रेस में शामिल लोगों को रास्ता दिखाने के लिये वे वालंटियर वहां खड़े थे। कुछ के हाथ में पानी भी था। कुछ बुजुर्ग वालंटियर भी थे।
पुल के पास तमाम लोग अपनी साइकिलों में भी आये थे। साइकिल चलाते हुये पसीना बहा रहे थे। खाया हुआ पचा रहे थे।
गोल्डन गेट पुल बहुत देर तक कोहरे में डूबा रहा। निकल के ही न दिया। नीचे समुद्र , ऊपर आसमान और दोनों के बीच छाया कोहरा। पानी, कोहरे, आसमान की तिकड़ी ने पुल को अपने बीच ऐसे छिपा लिया जैसे चम्बल के बीहड़ डकैतों को अपने में छिपा लेते हैं।
हमको लगा कि अब गोल्डन गेट पुल न देख पायेंगे। फ़िर से आना पड़ेगा। फ़िर से आने में कोई बुराई नहीं लेकिन यार पहली बार ही न दिखे तो मजा नहीं आता न ! पुल के पास आकर भी बिना कायदे से देखे वापस लौट जाना तो ऐसा ही हुआ जैसे चुनाव में जीता सबसे बड़ा दल सरकार बनाने से रह जाये।
हम कुछ समझ नहीं आया। हम बिना उदास हुये आसपास का नजारा देखते थे। हमारे अलावा भी तमाम लोग गोल्डन गेट पुल देखने आये थे। हम उनको भी देखते रहे। एक के साथ एक फ़्री वाले अन्दाज में। फ़ोटो लिये कई। पूरे परिवार के फ़ोटो लेने के लिये किसी से सहायता लेते गये।
घूमने जाने पर सबसे बड़ी कमी फ़ोटोग्राफ़र की खलती है। लगता है कि कोई फ़ोटोग्राफ़र भी साथ हो जो सबके फ़ोटो खींचता रहे। ऐसी फ़ोटो जिसमें सब आ जायें। कोई छूटे न। अब किसी से फ़ोटो खींचने के लिये तो कहने में संकोच भी होता है। कैसे कहें? इस झिझक का इलाज भी निकला। होता यह है कि ऐसी जगहों पर आपके अलावा भी और भी लोग होते हैं जिनकी तमन्ना होती है कि उनकी कोई फ़ोटो खींच दे। ऐसे लोग आपके अगल-बगल ही होते हैं। आप अपनी तरफ़ से उनकी फ़ोटो खींचने के लिये प्रस्ताव दे दीजिये। उनकी फ़ोटो खैंचकर धन्यवाद समेटते हुये अपनी भी फ़ोटो खींचने के लिये उनसे अनुरोध कर दीजिये। फ़ोटो खिंचाते हुये मुस्कराते हुये धन्यवाद बोलते हुये खुशी-खुशी आगे बढ जाइये। इसी फ़ार्मूले का उपयोग करते हुये हमने तमाम फ़ेमिली फ़ोटो खिंचवाये।
गोल्डन गेट ब्रिज बनने की कहानी भी रोचक है। पुल बनने के पहले लोग सैनफ़्रांसिस्को से मैरीन काउंटी फ़ेरी से आते-जाते थे। 20 मिनट करीब लगते थे पार होने में। सैंनफ़्रांसिस्को अकेला सबसे बड़ा शहर था जहां शहर पहुंचने के लिये फ़ेरी चलती थी। लोगों ने पुल बनाने की सोची। बहुत कठिन लगा। कारण यह कि एक तो सैनफ़्रांसिस्को और मैरीन काऊंटी के बीच पानी का बहाव बहुत था। पानी की गहराई भी कहीं-कहीं 100 मीटर से ऊपर थी। इसके अलावा बहुत तेज चलती हवायें और भयंकर कोहरे के कारण भी पुल बनना कठिन लगा।
लेकिन इंसान की फ़ितरत। कठिन काम को भी अंजाम करने के रास्ते खोजती है। 1916 में पुल बनाने का विचार बना। लोगों से आइडिये मांगे गये। 1917 में जोजेफ़ स्ट्रास (Joseph Strauss )ने पुल डिजाइन किया। कीमत अनुमानित हुयी 17 मिलियन डालर ! मतलब आज के 121 करोड़ रुपये। लोगों को पुल की डिजाइन बढिया नहीं लगी। कहा गया – ’जरा बढिया बनाओ। किसी एक्सपर्ट से सलाह लो।’
जोजेफ़ स्ट्रास ने एक्स्पर्ट से सलाह ली। कई एक्सपर्ट खासकर इर्विंग मारो (Irving Morrow) फ़िर से डिजाइन किया पुल। सस्पेंशन ब्रिज। इसको अंतिम रूप दिया Leon Moisseiff ने जो कि सस्पेंशन ब्रिज उस्ताद माने जाते थे। सस्पेंशन ब्रिज में लम्बे टावर होते हैं जिनमें रस्सियों (लोहे की) पर पुल लटकता है। पुल की अनुमानित कीमत बढकर हो गयी -215 करोड़ ! अब इत्ता पैसा कहां से आये। दोनों शहर के लोगों ने तय किया कि सरकारी बांड आम जनता को बेचकर पैसा जुटाया जाये। लेकिन इसे सुरक्षित नहीं माना गया। आखिर में सैनफ़्रांसिस्को की बैंक ऑफ़ अमेरिका ने सारे बांड खरीदकर पुल बनाने के लिये धन मुहैया कराया।
5 जनवरी 1933 में बनना शुरु हुआ पुल अप्रैल 1937 में बन गया। लोग आने-जाने लगे। सबसे पहले पचास सेंट लगते थे पुल पार करने के। अब 8.35 डालर ( करीब 600 रुपये ) लगते हैं अगर फ़ास्ट्रैक से भुगतान (जिसमें पैसे अपने आप कटते हैं) करते हैं तो 7.35 (करीब 454 रुपये)।
पुल जब बना था तो यह दुनिया का सबसे लम्बा और ऊंचा लटकौआ पुल था। 1280 मीटर लम्बा, 227 मीटर ऊंचा। अब इससे लम्बे पुल भी बन गये हैं लेकिन इस पुल अभी भी अपने में अनूठा है। पुल की एक खाहियत इसके दोनों तरफ़ झूले की तरह इधर-उधर हो जाना भी है। बहुत तेज हवायें चलती हैं यहां। ताकतवर हवाओं का मुकाबला करना पुल के लिये मुश्किल हो सकता है। इसलिये पुल इस तरह बना है कि यह तेज हवा में दोनों तरफ़ आठ मीटर तक झूला जैसा झूल सकता है।
कभी दुनिया का सबसे पुल चार साल में बना देखकर अपने शहर दो फ़्लाईओवर याद आ गये जो एक दशक से भी अधिक समय से अपने पूरे होने के इंतजार में हैं।
इतनी बीहड़ परिस्थितियों में पुल के निर्माण की कहानी पढकर फ़िर से यही लगा -’कोई काम नहीं है मुश्किल , जब किया इरादा पक्का।’
दुनिया की हर जगर-मगर के पीछे तमाम अंधेरी गाथायें भी जुड़ी होती हैं। ऊपर से दिखें भले ने लेकिन रोशनी के पार देखने में दिखती हैं। इस पुल को बनाने का पूरा श्रेय मिला जोजेफ़ स्ट्रास को। भौकाली रहे होंने जोजेफ़ साहब। जो हुआ उसका हल्ला मचाकर खुद का किया बता दिया। लेकिन बाद में पता चला कि उनके अलावा भी कई लोगों ने सबसे महत्वपूर्ण काम किये इस पुल के निर्माण में। ऐसे ही एक थे ग्रीक के गणितज्ञ विद्वान एलिस( Ellis)। एक समय वो युनिवर्सिटी में बिना डिग्री के प्रोफ़ेसर थे। बाद में सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। पुल डिजाइन के एक्सपर्ट हुये। खूब किताबें लिखीं।
प्रोफ़ेसर एलिस ने गोल्डन ग्रेट ब्रिज से जुड़ा बहुत सारा काम लिखाई-पढाई-डिजाइनिंग का काम किया। लेकिन उनके जीते जी उनको कोई श्रेय न मिला। बल्कि 1931 में जोजेफ़ स्ट्रास ने एलिस को यह कहते हुये निकाल दिया कि वो Leon Moisseiff को टेलीग्राम भेजने में बहुत पैसा खर्च करता है। प्रोफ़ेसर एलिस पुल से भावनात्मक रूप से इतना जुड़ गये थे कि निकाले जाने पर अवसाद में चले गये। कोई और काम भी नहीं मिला। वे मुफ़्त में पुल से जुड़ा काम करते रहे।
पुल बनने के बाद जोजेफ़ की वाहवाही हुई। सारा श्रेय उसने लूट लिया। लेकिन बाद में असलियत भी खुली कि अगले ने अपने साथियों का काम भी अपने नाम चढा लिया है। असलियत खुलने पर दोबारा रिपोर्ट बनाई गयी 2007 में। लोगों को उनके काम का श्रेय दिया गया उनमें प्रोफ़ेसर एलिस भी थे जिनको पुल डिजाइनिंग का श्रेय मिला। लेकिन जिन्दगी तो बेचारे की अवसाद और गुमनामी में निकल गई।
गोल्डन गेट ब्रिज बहुत खूबसूरत दिखता है। लेकिन इस खूबसूरत पुल से कूद कर तमाम लोग जीवन भी खत्म कर लेते हैं। अब तक करीब1600 लोग पुल से कूदकर जान दे चुके हैं। पता नहीं कैसे लोग भूल जाते हैं कि जीवन अपने आप में अमूल्य है।
गोल्डन गेट ब्रिज को देखने के बाद बाकी का सैनफ़्रांसिस्को देखने के लिये आगे बढे।

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Thursday, December 26, 2019

सूरज भाई आकस्मिक अवकाश पर

 


ठंड भयंकर वाली पड़ रही। कोहरा भी दांत किटकिटाते हुए फूट लिया। सारी दिशाएं ठंड से ठिठुर रहीं। हमने सूरज भाई को फोन लगाया तो बोले -'यार आधे दिन की कैजुअल पर हूँ।'
हमने पूछा -'क्या हुआ तबियत तो ठीक है न!'
बोले-'तबियत चकाचक है। घर में जरा सूर्यग्रहण सेरिमनी है। इसलिए हाफ डे की कैजुअल लगा दी। साल का आखिरी हफ्ता है। छुट्टी बरबाद करने से अच्छा घर वालों के साथ ही रह लें। सब शिकायत करते हैं कि काम के चक्कर में घर वालों को इग्नोर करते हो। सम्भाल लेना यार तुम आधे दिन का काम। आकर फिर चाय पिलायेंगे।'
दुनिया भर के काम काजी लोगों को आकस्मिक छुट्टी लैप्स होने की बड़ी चिंता रहती है।
अब सूरज भाई का काम कौन सम्भाल सकता है। वही आएंगे तो देखेंगे। वो कहते हैं न :
जिसे दिन बताए दुनिया वो तो आग का सफर है
चलता है सिर्फ सूरज कोई दूसरा नहीं है।
आप कैरी आन कीजिये। सूरज भाई दोपहर बाद आएंगे। 🙂

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Monday, December 23, 2019

विदेश यात्रा में खर्चकार्ड

 


अमेरिका यात्रा की पोस्ट्स पढ़ते हुए मित्रगण टिपियाते भी रहे। कई मित्रों ने कहा -'उनको मुफ्त में घुमा दिया अमेरिका।' कुछ ने लिखते रहने को कहा। किताब छापने के सुझाव भी आये। एक सुझाव यात्रा संस्मरण पर ऑडियो बुक बनाने का भी आया।

संस्मरण अभी बाकी हैं। आएंगे। इस बीच हमारे एक अजीज मित्र Vikram ने अनुरोध किया कि अमेरिका यात्रा में पैसे कैसे ले गए इसपर पोस्ट लिखी जाए।
बता दें कि हमारी अमेरिका यात्रा के पहले हमारे बड़े बेटे सौमित्र अमेरिका में ही पढ़ाई कर रहे थे। उनके लिए पैसे भेजते रहते थे। वही तरीका यहां भी अपनाया गया।
विदेश यात्रा में पैसे ले जाने के कई तरीके हो सकते हैं। जिस देश जा रहे हैं वहां की करेंसी एयरपोर्ट पर खरीद सकते हैं। पैसा किसी बैंक खाते में भेज सकते हैं। लेकिन यात्रा के लिहाज से आमतौर लोग फॉरेक्स कार्ड का प्रयोग करते हैं। क्रेडिट कार्ड भी धडल्ले से चलते हैं।
फॉरेक्स कार्ड लगभग हर बैंक में मिलते हैं। सरकारी बैंकों के कार्ड में पैसा डालने की प्रक्रिया भी सरकारी है। थोड़ा समय ज्यादा लगता है लेकिन थोड़ा सस्ता होता है। बैंकों से जुड़े लफड़े भी होते हैं अपनी तरह के।
बेटा जब गया था तो पैसे भेजने का तरीका पता किया। माल रोड पर एक जगह फॉरेक्स कार्ड का ठीहा है। उनको फोन करने पर वो बता देते हैं कि इतने पैसे में इतने डॉलर मिल जाएंगे। हम बैंक की चेक दे देते हैं वो हमारे कार्ड में पैसे भरकर दे देते हैं। जाओ , ख़र्च करो। जियो बिंदास।
फॉरेक्स कार्ड में पैसे भरने के लिए पासपोर्ट, वीजा और ट्रेवल टिकट आदि सबूत के तौर पर लगता है। यह इसलिए कि सनद रहे कि जिसके नाम पैसे दिए जा रहे हैं वह सही में विदेश जा रहा है । किसी दूसरे के लिए हवाला का काम तो नहीं कर रहा।
फॉरेक्स कार्ड बनवाने में अधिक से अधिक आधा घण्टा लगता है। दो कार्ड मिलते हैं। एक खो जाए तो दूसरे से काम चलाओ। एटीएम कार्ड की तरह प्रयोग किये जाते हैं ये कार्ड।
हम जब अमेरिका गए तो हमारे खाते में पैसे बचे नहीं थे। गृहलक्ष्मी ने चेक दिया फॉरेक्स कार्ड के लिए। 2000 डॉलर खरीदे। 1900 कार्ड में। 100 डालर का नोट। उस समय 72 रुपये करीब चल रहा था डॉलर । कार्ड मिलने के एक दिन बाद एक्टिव हो गया।
एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के लिए जाने से पहले एक और पैसा बदलने की दुकान दिखी। हमने पास के सारे रुपये डॉलर में बदलवा लिए। सारे रुपयों का डॉलर में दलबदल हो गया। जेब में जहां दो मिनट पहले रुपयों की सरकार थी अब वहां डॉलर का कब्जा हो गया। यहां भी पैसे घरैतिन के नाम ही मिले क्योंकि यहां पैनकार्ड भी चाहिए होता है। वह उनके ही पास था।
फॉरेक्स कार्ड में मोबाइल नम्बर भी सम्बद्ध होता है। इसमें खर्च और बचे हुए पैसों का विवरण आता रहता है। फॉरेक्स कार्ड में श्रीमती जी का जो फोन नंबर था उसको अमेरिका में काम करने के लिए एक्टिवेट नहीं कराया था। लिहाजा खर्च का संदेश आता नहीं था। पता ही नहीं चलता - कितने ख़र्चे, कितने बचे। कहीं किसी एटीएम में देखकर बचे हुए डॉलर की सूचना मिलती।
तमाम होशियारी के बावजूद कार्ड में बचे हुए डालर का हिसाब गड़बड़ा ही गया। दिन बीतने के साथ हम थोड़ा निश्चिन्त और बेपरवाह हो गए खर्च के मामले में। इसके पीछे बेटे का साथ भी कारण रहा। न्यूजर्सी पहुंचते ही उसने अपना क्रेडिट कार्ड हमको भेज दिया। कहा -'अमेरिका में इसी से खर्च करिये।' हम काफी दिन तक अपना ही कार्ड चलाते रहे। पर जब सैनफ्रांसिस्को आये, बेटे के पास तो कभी उसका कार्ड कभी हमारा चला। हिसाब ही न रहा कित्त्ता बैलेंस बचा कार्ड में। इसके चलते आखिर में बेइज्जती भी खराब होने को हुई।
हुआ यह कि चलते समय हमने कहा कि कल हम लोग जा रहे। आज का डिनर हमारी तरफ़ से। हम दोनों, बेटे और उसके दो साथियों के साथ गए खाने। हमारे हिसाब से कार्ड में करीब डेढ़ सौ डालर बचे थे। खाने का बिल आया करीब 125 डॉलर। हमने अपना कार्ड दे दिया भुगतान के लिए। वेटर तुरन्त लौटा लाया कार्ड। बोला -'कार्ड में पैसे ही नहीं।' हमने कहा -'ऐसा कैसे? पैसे तो होने चाहिए।'
लेकिन थे नहीं पैसे कार्ड में तो कहां से मिले? बेटे ने अपने कार्ड से भुगतान किया। बाद में देखा तो पता चला कि केवल 12 डॉलर बचे थे कार्ड में।
देने को को हम जिद करके अपने क्रेडिट कार्ड से दे सकते थे पैसे। लेकिन जब बेटे ने मुझसे मुस्कराते हुए मौज ले ही ली कार्ड में बैलेंस न होने पर तो हमने उसको रोका भी नहीं भुगतान करने से। मौज लेने की कीमत भी तो चुकानी पड़ती है। कीमत तो खैर हर चीज की चुकानी पड़ती है। मौज भी इससे मुक्त थोड़ी है।
फॉरेक्स कार्ड के बैंक से जुड़े लफड़े भी परेशान कर सकते हैं। मेरे बेटे के पंजाब नेशनल बैंक का फॉरेक्स कार्ड कुछ दिन काम नहीं किया। शायद पंजाब नेशनल बैंक में हुए घपले के चलते हुआ था ऐसा।
मेरा क्रेडिट कार्ड भी अमेरिका में बंद हो गया। हुआ यह कि हमने विदेश में चलने के लिए एक्टिवेट नहीं कराया था कार्ड। पहला भुगतान किया क्रेडिट कार्ड से तो स्टेट बैंक वालो को लगा -'लफड़ा है।' कार्ड ब्लाक कर दिया। ऐसा लगा कि आइडेंटिटी कार्ड के बिना खुद के घर में ही घुसने से रोके गए। ठीक भी लगा यह सोचकर कि सुरक्षा है। बाद में फोन करके कार्ड चालू करवाया।
अब तो वापस आ गए। फॉरेक्स कार्ड धर दिया गया तहा के। बाकी के कार्ड हंसते हैं उस पर तो वह ऐंठता हुआ कहता है -'बेट्टे हंसो मती। तुम सब जहां बेकार थे वहां इकलौता मैँ ही था जो काम आ रहा था।'
बाकी के कार्ड चुप हो गए। लेकिन एक कार्ड फुसफुसाते हुए बोला -'काम निकल जाने पर आदमी या तो पूजनीय हो जाता है या फिर मार्गदर्शक मंडल में शामिल हो जाता है।'
इस पर दूसरे कार्ड ने जोर से कहा -'अबे हम कार्ड हैं,कोई आदमी थोड़ी हैं ।'

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Friday, December 13, 2019

सुबह हो रही है भाई

 


सुबह अभी हुई ही थी। सड़क के दोनों तरफ पेड़ कोहरे को कम्बल की तरह ओढ़े ऊंघ रहे थे। गाड़ी पेड़ों को गुस्से से देखती हुई बड़बड़ाती जा रही थी -' इन आलसियों को सोने से ही फुर्सत नहीं। ये नहीं कि उठकर जरा हिलें-डुलें। हवा बहाएं। '

गाड़ी के नथुनों से गुस्से का धुंआ निकल रहा था। जिस तरह राजनीतिक पार्टिंयां जेल से छूटे किसी बाहुबली को लपक कर अपनी पार्टी में शामिल करके जनता की सेवा के लिए चुनाव का टिकट दे देतीं हैं उसी तरह आसपास की हवा ने गाड़ी से निकले धुंए को लपककर अपने में मिला लिया।धुंआ ठंडा हो गया। हवा गरम हो गयी। दोनों को सुकून मिला।
सड़क के किनारे के ढाबे बन्द थे। शायद देर से खुलेंगे। अमेरिका के ढाबों की तरह। केवल ढाबों के खुलने के समय की तुलना करके अमेरिका के बराबर हो जाना कित्त्ता आसान और कम खर्चीला है। कुछ ऐसा ही है यह जैसे बहुत लोग महापुरुषों की केवल खराब आदतों की फूहड़ नकल करके उन जैसा होने का एहसास पालते हैं।
चाय पीने की मंशा पूरी हुई सड़क किनारे एक खुले रेस्टोरेंट में। रेस्टोरेंट का नाम 3 K फेमिली रेस्टोरेंट। 3 K के बारे में जिज्ञासा हुई। यह क्या। पता चला कि 3 के का मतलब है - 'कूल कृपाल कार्नर।' हो सकता है कुल कृपालु कॉटेज हो। हमको ढाबे वाले न कूल कृपाल ही बताया। एक ट्रस्ट चलाता है यह रेस्टोरेंट। ट्रस्ट में गुरु जी हैं, ढेर जमीन है, 8 ब्लॉक वाले 1600 कमरों में ठहरने की व्यवस्था है। शायद स्कूल कालेज भी। मतलब जलवेदार ट्रस्ट है।
रेस्टोरेंट पर चाय बन रही थी। पूछकर तुलसी की पत्ती भी डाल दी बालक ने। चाय खौलने लगी। कुल्हड़ खत्म हो गए तो कागज में ग्लास में थमा दी चाय। ऊपर तक भरी ग्लास को पकड़ना मुश्किल। हमने पानी मांगा। कागज के बड़े ग्लास में पानी पीकर चाय उसी में उलट ली। ग्लास में काफी जगह बची थी अभी। उसमें और चाय डलवा ली। दस रुपए के ख़र्च में 18 रुपये की चाय हथिया ली। जुगाड़ बुध्दि से 8 रुपये का फायदा लूट लिया।
चाय पीते हुए ढाबे वाले से बातचीत में पता चला कि रेस्टोरेंट बहुत चलता था। लाइन लगती थी अंदर आने के लिए। गुरु जी के न रहने के बाद व्यवस्था चौपट हो गयी। अब अधिकार और नियंत्रण के झगड़े निपट गए हैं। व्यवस्था फिर सुधर रही है।
भट्टी के पास ही एक लड़का गीले आलू काट रहा है। छोटे-छोटे चौकोर टुकड़े। समोसे के लिए। हमने पूछा -'ये छिलके सहित क्यों काट रहे आलू?' हमको लगा कि शायद वह कहे कि छिलके में विटामिन होता है। लेकिन उसने हमको निराश किया। बोला -' समोसे के आलू ऐसे ही कटते हैं।' उसका आत्मविश्वास देखकर लगा कि अगर उससे कोई पूछता -'आजकल राजनीति में अपराधी क्यों आते हैं ?' तो उसका तुरंता जबाब होता -'राजनीति में ऐसे ही चलती हैं।'
राजनीति की बात से हमको रामेंद्र त्रिपाठी जी के गीत की पंक्तियां याद आ गईं:
'राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है
इस मंडी ने सारी मदिरा पी ली है।'
समय बिताने के लिए करना है कुछ काम की तर्ज पर हमने ढाबे वाले से पूछा -'संडीले के लड्डू किसलिए प्रसिद्ध हैं? '
'अलग तरह से बनते हैं लड्डू यहां। गोंद और तमाम चीजें डालकर। ' --ढाबे वाले ने अपनी पूरी जानकारी हमारे सामने उड़ेल दी।
उसकी दी हुई जानकारी गूंगे के गुड़ समान थी। हम उसी को समेटकर आगे बढ़ गए। नखलऊ पहुंचे। जहाज पकड़ा। कोलकता आ गए।
अभी कलकत्ता सुबह की नींद ले रहा है। कोई हलचल नहीं। कोई कुनमुनाहट नहीं। सड़क अलबत्ता जग गयी है। उस पर इक्का-दुक्का गाड़ियां आती-जाती दिख रही हैं। इमारतों के ऊपर से सूरज भाई झांक रहे हैं। लेकिन इमारतें उनसे बेखबर निठल्ली नींद में सोई हई हैं। सूरज भाई भी बेचारे बने उनके जगने का इंतजार कर रहे हैं।
अब उठ ही लिया जाए। सुबह हो रही है भाई।


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Wednesday, December 11, 2019

हिन्दुस्तान अमेरिका बन जाये तो क्या होगा



हाल में अमेरिका के किस्से लिखते हुये 12 साल पुरानी पोस्ट याद आई। तब बिना अमेरिका गये हमने अमेरिका के जीवन की कल्पना की थी। लिखा था - हिन्दुस्तान अमेरिका बन जाये तो क्या होगा! अमेरिका घूमने के बाद आज लिखते तो मामला कुछ अलग होता। क्या होता वह फ़िर कभी। फ़िलहाल तो बांचिये कि 12 साल पहले हम क्या सोचते थे इस मामले में।
1. जैसे ही भारत अमेरिका बना, अमेरिका में भब्भड़ मच जायेगा। तब न ग्रीन कार्ड होगा न फ़्रीन कार्ड। सारे भारत के लोग भाग-भाग के झोला-झंडा लिये अमेरिका पहुंच जायेंगे। सारे बिहारी बच्चे दिल्ली की लड़कियों के बजाय न्यूयार्क की लड़कियां देखते हुये आई.ए.एस. का इम्तहान देंगे। अमेरिका का अमेरिकापन तभी तक है जब तक हिंदमहासागर और अटलांटिक सागर के बीच की दूरी बरकरार है। दूरी मिटते ही वो बेचारा कौड़ी का तीन हो जायेगा। अभी तो वहां हमारे देश के लोग कम संख्या में हैं इसलिये थोड़ा अमेरिकी टाइप बनने की कोशिश करते हैं। जहां यहां से रेले के रेले पहुंचे वहां वैसे ही हर तरफ़ भारतीयों के मेले लगे दिखेंगे। सब तरफ़ आनंद की बयार बहेगी।
2. बाहर से आये लोग हमेशा से अंदर के लोगों के मुकाबले मेहनती होते हैं। जो भारतीय वहां जायेंगे वे अपना परिवार साथ लेकर नहीं जायेंगे। कोई और काम न होने की वजह से कुछ दिन में ही मार मेहनत करके वे अमेरिकियों के छक्के क्या अट्ठे छुड़ा देंगे। तमाम काम अपनी तरह से करेंगे। कोई अमेरिकी अंग्रेजी में पिनपिनायेगा – व्हाट आर यू डूइंग मैन इट्स अगेन्स्ट ला। आई एम गोइन्ग टु सू यू। जवाब शायद छोटे पहलवान वाली स्टाइल में दिया जाये- अबे चिमिरखी दास, ज्यादा सू-सू न करो नहीं तो पड़ेगा एक कन्टाप तो सारी फ़ंटूसी पिल्ल से निकल पड़ेगी। हम गंजहें हैं जहां रहते हैं वहां अपना कानून चलाते हैं। जब तक हम हैं यही चलेगा। तफ़रीह करने आये हैं कोई खूंटा गाड़ने नहीं। जितने दिन हैं अपना कानून धो-पोंछकर तहाकर रखो। जब चले जायें तब आराम से फ़हराना। और हां, ये सींकिया बदन लिये घूमते हो,मर्द के नाम पर कलंक है। शाम को अखाड़े आना सेहत सुधर जायेगी।
3. अमेरिका के जितने हाई वे हैं वे सब के सब साल भर में कई बार लो-वे में बदल जायेंगे। जहां बरसात खतम हुई सारे चौड़े रास्तों पर गड्डे खोदकर बल्ली गाड़कर रामलीला का तम्बू तन जायेगा। इधर से 150 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से आती गाड़ी सड़क पर अवरोध देखकर चीं-चीं करके ब्रेक मारेगी। खिड़की से सर बाहर निकालने पर उसे जनक विलाप सुनाई देगा- लिखा न विधि वैदेहि विवाहू/तजहु आस निज-निज ग्रह जाहू। वो हार्न दे-देकर हलकान हो जायेगा उसके पीछे गाड़ियों की मीलों लंबी कतार लग जायेगी और उसे परशुराम की आवाज सुनाई देगी -रे सठ सुनेसि सुभाव न मोरा। दूसरी तरफ़ लगी गाड़ियों की कतार वाला कोई मोबाइल वाला ट्रैफ़िक वाले को बुलायेगा। वह बेचारा आने से मना कर देगा क्योंकि उसने पहले ही लक्ष्मण का रोष वीडियो कैमरे पर देख सुन लिया है- जौ राउर अनुशासन पाऊं/कंदुक इव ब्रह्मांड उठाऊं/ कांचे घट जिमि डारौं फ़ोरी। वो बेचारा इसकी कल्पना मात्र से सिहर जायेगा । आने से साफ़ मना कर देगा। सारा जाम सियावर रामचंद्र के जय के साथ ही समाप्त होगा।
4. अब चूंकि भारत के सारे प्रांतों के लोग अमेरिका जायेंगे तो कुछ हाईवे माता के भक्त भी घेरेंगे। कुछ गणपति बप्पा मोरिया वाले भाई। तमाम जगह बात-बात पर ईंट बजा देने वाले आंदोलनकारी। बची-खुची जमीन पर बाबा लोग अपने तम्बू तानकर अमेरिकनों का परलोक सुधार देंगे। वैसे भी जब भारतीय वहां पहुंचेंगे बहुतायत में तो उनका परलोक ही सुधरने लायक बचेगा। उनके लोक का तो टोटल हो जायेगा। कुछ जगह हनुमान भक्तों और ढाबे वालों को तो चाहिये ही हो्गी।
5. जो लोग इस खामख्याली में हैं कि अमेरिका का कानून बहुत सख्त है सबको जेल में भर देगा। उनका ख्याल भारतीयों के वहां पहुंचते ही ट्विन टावर के तरह ढह जायेगा। अमेरिका का कानून चाहे जितना सख्त हो भारतीय उसे वहां पहुंचते ही या तो मुलायम और मानवीय बना देंगे या फिर छेनी-हथौड़ी से चकनाचूर कर देंगे। तब शायद नाजुक मिजाज अमेरिकी अनुरोध करें- हमारी सुरक्षा के लिये हमें जेल दो। हम इन भारतीयों का मुकाबला नहीं कर सकते।
6. जब देश के लोग जायेंगे तो देश की संस्कृति के रक्षक भी तो जायेंगे कि नहीं। सुना है वहां बहुत चूमा-चाटी है। खुले आम चिपका-चपकौवल चलती है। जहां यहां के मेरठ , हरियाणा के जाट वहां पहुंचे और उधर से सैनिक लोग उनकी सारी मस्ती हवा हो जायेगी। जगह-जगह गोरे लोगों को कान-पकड़वा कर मुर्गा बनवाते हुये बहादुर लोग दिखेंगे। फ़्रेंडशिप बैंड की जगह राखी बैंड बंधवा देंगे। तमाम अमेरिकन लोग आई लव यू माई डार्लिंग भूल-भाल के बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बांधा हैं। सारे अमेरिका में भारतीय संस्कृति की बयार बहने लगेगी।
7.तमाम अमेरिकी जमीन पर भारतीय भू माफ़िया कब्जा कर लेंगे। जब कोई अमेरिकन इस पर अपना एतराज जतायेगा कि यह उसकी जमीन है तो भारतीय बिल्डर उस जमीन पर बनी इमारत की तराई करते हुये परमहंस वाले अंदाज में प्रवचनियायेगा- अयं निज: परोवेति, गणना लघु चेत शाम/ उदार चरितांनाम वसुधैव च कुटुम्बकम।यह मेरा है वह पराया है यह छोटों का दर्शन है। उदार चरित वालों के लिये वसुधा ही कुटुम्ब के समान है। यह सब हमारा है। हमने मेहनत करके इधर नींव खोद ली ईंटे जमा लीं। तुम बगल में अपना तंबू लगा लो। कुछ ईंटे बचीं हैं हमसे ले लो, खरीद दाम पर दे देंगे।
इसकी वैचारिक व्याख्या करते हुये कोई समझदार मासूम अमेरिकी लोगों को समझायेगा। बन्धुओं वस्तुत: यह तुम्हारे ही विश्व को सुधारने के दर्शन का विस्तार है। तुम वियतनाम गये उसे नेस्तनाबूद करने, अफ़गानिस्तान गये दुश्मनों का संहार करने, ईराक गये उसको लोकतांत्रिक बनाने। हर जगह असफ़ल से रहे। मजा नहीं आया न तुमको न उन लोगों को। बहुत पैसा बरबाद कर दिया। तमाम जाने चलीं गयीं। इसीलिये हम तुम्हारा बौद्धिक करने आये हैं कि यह सारा क्रियाकर्म कम खर्चे में कैसे किया जा सकता है घर बैठे। जैसे ही सिखा देंगे वैसे ही चले जायेंगे जैसे तुम चले थे दूसरे देशों में अपना काम करके।
8.. भारतीय व्यक्ति स्वभाव से ही अतीतजीवी होता है। जब भारतीय जन वहां छा जायेंगे तो सारे अमेरिकियों का अतीत तलाशा जायेगा। यहां से कुछ मौलवी जी और पंडितजी लोग भी जायेंगे। वे अपने इलाके के सारे बिछड़े हुये लोगों को मिलायेंगे। इलाहाबाद और गया के पंडे राबर्ट और जूलिया को जमशेदपुर, दरभंगा के रामदयाल, बरसातीराम का वंसज साबित कर देंगे। वे अगली फ़्लाइट से भारत अपनी जड़ों की तलाश में सरपट भागते चले आयेंगे। इंडियन एअर लाइंस के बल्ले-बल्ले होंगे। जमशेदपुर, दरभंगा पहुंचते -पहुंचते उनकी इतनी जड़ खुद जायेगी कि वे जड़ीभूत होकर यहीं कहीं टिककर शायद हिंदी में ब्लाग लिखते हुये दो संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करने लगें।
9. पंडितजी लोग तीसरी पत्नी के चौथे पति के पांचवे बच्चों की परंपरा की ऐसी कम तैसी ज्यादा कर देंगे। ऐसे सारे कर्मों को कुकर्म बताकर धर्म की स्थापना में जुट जायेंगे। तलाक की मैगी नूडल टाइप दुईमिन्टिया अवधारणा की जगह तलाक का बीरबल की खिचड़ी वाला पैकेज चलाया जायेगा। मतलब कि अमेरिका के लोगों को दुनिया की सारी नेमतें मिल जायेंगी लेकिन तलाक नहीं मिल पायेगा। बिना शादी के साथ रहने वालों के कान गरम करने के लिये हमारे वीर बालक हैं ही। साल भर में सारे अमेरिका गायन्ति देवा किलकीत कानि वाले माहौल में सांस लेने लगेंगे। एक बीबी का एक पति।इस संस्कार की स्थापना होते ही अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या में महती गिरावट होगी। हर जाने वाला यही सोचेगा /गी जब एक ही के के साथ रहना है तो भारत ही क्या बुरा है।
10. अभी अमेरिकी बहुत डरपोंक हैं। एक ठो इमारत गिरी पूरी दुनिया में पटाखे बाजी करने लगे। जरा सा पाउडर मिला कुछ लिफ़ाफ़ों में सारे देश के आफ़िस बंद कर दिये। भारत से जो लोग जायेंगे वे उनको बहादुरी का पाठ पढ़ायेंगे। कैसे दंगों के बीच जिया जाता है, कैसे हजारों लोगों के मरने के बावजूद संयम से पेश आया जाता है। कैसे अपने दुश्मन को माफ़ किया जाता है। यह सारे पाठ पढ़ाये जायेंगे। हो सकता है कि इस पर झमाझम बहसें हों और वहां के लोग यह साबित करते हुये बताने की कोशिश करें अपने दु्श्मनों को माफ़ करना कमजोरी है। लेकिन जब बहस की बात हो और भारतीयों से कोई जीत जाये- असम्भव। इम्पासिबल। हमारा एक बच्चा तक उनको समझा देगा- देखो भाई अमेरिकाजी, अभी आप बच्चे हैं। कुल जमा पांच सौ साल की उमर है तुम्हारी। भारत के सामने लौंडे हो अभी। अभी हर जगह असफ़ल रहने के बावजूद तुम्हारे भेजे में यह बात नहीं घुसती कि ताकत से सब कुछ नहीं हासिल होता। हमारे देश में तमाम लोग तुमसे ज्यादा ताकतवर रहे लेकिन अंतत: विश्वबंधुत्व के दर्शन का पैकेज ही सबसे अच्छा साबित हुआ। अपने तर्क की पुष्टि के लिये वह सम्राट अशोक, चंद्र्गुप्त, चाणक्य ,हर्षवर्धन और न जाने किस-किस शासक के कौन-कौन से उदाहरण पटक देगा सामने। इस रहस्योद्घाटन से बेचारे अमेरिकी की आंखे ऐसी फ़टी की फ़टी रह जायेंगी कि दुबारा किसी भी तरह सिली न जा सकेंग। फिर शायद उनका इलाज डाक्टर टंडन के होम्योपैथिक इलाज से ही किया जा सके।
11. जो भी भारत को अमेरिका बनाने की सोच रहा है वह पछतायेगा जब यह देखेगा कि भारत तो अमेरिका नहीं बन पाया अलबत्ता अमेरिका जरूर भारत बन रहा है। देश और समाज के संबंध सरल रेखीय नहीं होते। वहां न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का संबंध भी लगता है तो शिवपालगंज के गंजहों के नियम भी। चुंबकत्व के नियम लगते हैं तो जड़त्व का सार्वभौमिक सिद्धांत भी।
भारत के अमेरिका बनते ही हो सकता है तमाम लोग किसी ट्रांसपोर्टर की तलाश मे निकल पड़ें कि यार ये दो सौ वर्ग गज का प्लाट ले जाना है। बताओ कै पैसे लोगो। लौटते समय अमेरिका से भारत की ढुलाई मिल जायेगी।
और भी न जाने कित्ते धांसू च फ़ांसू आइडिया दिमाग में हैं लेकिन समय के आगे सब बेकार। समय हमारे काबू में नहीं है। सच तो यह है कि वह किसी के काबू में नहीं है। न भारतीय के हाथ में न अमेरिकी के हाथ में कहा भी है -
पुरुष बली नहिं होत है समय होत बलवान
भीलन लूटी गोपिक वहि अर्जुन वहि बान।
लिखने को तो हम पोथा लिख मारें। पांच बातें कही बताने को हमने दस तो बिना सोचे गिना दीं। आगे कभी लिखेंगे सोचकर तो पचास क्या पचहत्तर ,सौ तक गिना देंगे। और लिखंगे भी आगे कभी। लेकिन मालिक हमको अमेरिका बनने में कौनो दिलचस्पी नहीं है। अपन तो यहीं इंडिया दैट इज भारत में ही चुर्रैट हैं।
और यह भी बता दें कि हम अकेले नहीं हैं। हमारे साथ तमाम लोग हैं, शायद आप भी। अच्छा सच्ची बताओ है कि नहीं।

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Tuesday, December 10, 2019

पहला हफ्ता शाहजहाँपुर में

 


शाहजहांपुर आने के बाद तमाम पुराने लोगों से मुलाकात हुई। इतवार को अख्तर साहब आये। अस्सी की उम्र में चुस्त, दुरुस्त। साइकिल चलाते हुए आये। वृंदावनलाल वर्मा जी की किताब साथ लाये। उसमें गढ़ कुंडार उपन्यास भी है। साथ में मिठाई का डब्बा भी।

अख्तर शाहजहापुरी इस बीच 11 किताबें निकाल चुके हैं। देश से ज्यादा विदेश में प्रसिद्ध। खूब किस्से सुनाए शायरों के। कैसे बड़े-बड़े शायरों को 100-100 रुपये में पढ़वाया। मेराज फैजाबादी केवल शाहजहापुर में संचालन करते थे -अख्तर शाहजहाँपुरी के चलते। इनके रिटायर होने के बाद उन्होंने यहां आना छोड़ दिया।
मेराज साहब के शेर याद आये:
मुझे थकने नहीं देता ये जरूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते।
यह भी :
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फिर जलते हुए शहरों में पानी बेंचना।
कृष्णआधार मिश्र जी तमाम पुरानी यादों के साथ मिले। यादों से जितना पीछा छुटाना चाहते हैं , उतनी ही तेजी से जकड़ती हैं। साथ में शर्मा जी भी थे।
शाहिद रजा , राजेश्वर पाठक, अब्दुल लतीफ , रजनीश और तमाम पुराने लोगों से मिलना हुआ। हफ्ते भर में ही लगता है कि कहीं और गए ही नहीं थे। इतवार को नबी साहब के यहां जाना हुआ। भरे-पूरे परिवार , लगभग पूरे खानदान से मुलाकात हुई। लगा अपने ही परिवार में बरसों बाद आये हैं।
सरोज मिश्र की दी हुई कलम का उपयोग कर सकूं तो अच्छा लगेगा।
कल मजहर मसूद जी से मुलाकात हुई। 14 साल बाद वो फैक्ट्री आये। बताया दस रुपये पड़ते हैं ई रिक्शे के। आज बीस मांगे। हमने कहा -चल यार।
बीस रुपये में शहर से फैक्ट्री आ जाना। मतलब शहर मंहगा नहीं हुआ। आगे और मुलाकातें होंगीं।
एक पुराने साथी सड़क पर मिले। बोले -'मिलना है।' हमने कहा -'मिल तो लिए। काम बताओ।'
बोले -'काम कोई नहीं। बस मिलना है।'
कल आये। बच्चे के साथ। मिठाई, नमकीन और न जाने क्या-क्या दे गए। खाने पर बुलाया है।
और भी तमाम लोगों से मिलना हुआ। घर छूट गया कानपुर में। लेकिन लगता है यहां भी अपनों के बीच आया हूँ।
इतवार को शहर निकले। शहर पूरी तरह तसल्ली में जी रहा है। उतनी ही कम चौड़ी सड़क। उतने ही खुले दिल। मोंगा की दुकान गए। 1992 में उनकी दुकान से खरीदे स्वेटर अभी उतने ही गर्म जितना उनका व्यवहार। बगल की मिठाई की दुकान चांदना जी की। बच्चे ने 20 साल बाद पहचान लिया। अच्छा लगा।
लौटते में गुड़ खरीदा। भेली का गुड़। 40 रुपये किलो। सलीम के दो लड़के हैं। पहले की उम्र 11 साल । दूसरे की दस महीने। इतना अंतर उम्र में? बोले -'जब बड़ा बड़ा हो गया तब दूसरा किया।' और बच्चे के सवाल पर बोले -' मंहगाई में बच्चे पालना मुश्किल। यही पल जाएं , बहुत हैं।'
कमाई की बात पर बोले -' गुजारा हो जाता है। अभी जाड़े में गुड़ बेंच रहे। फिर कुछ और बेचेंगे।'
काम बहुत है यहां। जिम्मेदारी और ज्यादा। देखते हैं कैसे पूरी करते हैं। होंगी । पक्का होंगी। करेंगे तो झक मार के होंगीं।

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Monday, December 09, 2019

क्रिस्टोफर कोलंबस के साथ कनपुरिया कोलम्बस

 


न्यूयार्क में अभिषेक के साथ टहलते हुये कई जगहें देखीं। हर इमारत की अलग कहानी। राकफ़ेलर सेंटर के पास ही सेंट पैट्रिक कैथेड्रल चर्च देखा। खूबसूरत, विशालकाय नई गोथिक शैली में निर्मित यह चर्च 1858 में बनना शुरु हुआ। निर्माण का काम सिविल वार के चलते रुक गया। 1865 में लड़ाई निपटने के बाद फ़िर शुरु हुआ। 1878 में बनकर तैयार हुआ यह चर्च 19 मई 1879 को शुरु हुआ।

डेढ सौ साल पहले इतना विशालकाय, खूबसूरत चर्च बनाने में कितनी मेहनत लगी होगी। कैसे इतनी खूबसूरत नक्कासी हुई होगी, देखकर ताज्जुब हुआ। चर्च में लगभग 3000 लोग एक साथ प्रार्थना कर सकते हैं। लोग वहां आ रहे थे। पूजा कर रहे थे। कुछ बैठे थे। हमारे जैसे लोग शायद बहुतायत में थे जो केवल चलते-फ़िरते देखने आये थे।
चर्च से निकलकर हम फ़िर सड़क पर आ गये। एप्पल फ़ोन के शापिंग सेंटर में गये। अपने तरह का अनूठा शापिंग सेंटर। सब कुछ खुले में। काउंटर पर तमाम तरह के गजेट, फ़ोन रखे थे। देखिये, पसंद कीजिये, भुगतान कीजिये ले जाइये। हमने एक नोटबुक पर अपना फ़ुरसतिया ब्लाग खोलकर देखा। फ़ोटो खिंचाया और कम्प्यूटर वहीं धर दिया। एप्पल के लोग वहां मौजूद लोगों को अपने उत्पाद के बारे में बता भी रहे थे।
एप्पल सेंटर के पास ही न्यूयार्क का सेंट्रल पार्क है। दुनिया के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले पार्कों में एक है सेंट्रल पार्क। साल भर में 4 करोड़ करीब लोग देखने आते हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्माया जाने वाला पार्क है सेंट्रल पार्क। बीच शहर में पार्क बचा हुआ है यह हिन्दुस्तानी लिहाज से अजूबा ही है। अपने यहां होता तो कोई पम्प हाउस बन गया होता यहां। शादी-बारात के लिये तम्बू-कनात लगने लगते। नेताओं की रैली के लिये तो पक्का प्रयोग होने लगता। बहुत ललचाती जगह है उपयोग के लिहाज से।
पार्क में घुसते ही घोड़ा गाडियां दिखीं। लम्बे-चौड़े , स्वस्थ, सुन्दर घोड़े। इतने आकर्षक, हैंडसम घोड़े कि देखते ही किसी भी घोड़ी के मन में घंटियां बचने लगें।
घोड़ा गाड़ी पर बैठकर सैर का किराया इतना ज्यादा था कि अपन उनको देखकर ही तृप्त हो गये। सफ़ाई के लिहाज से घोड़ों के पिछवाड़े कपड़ा इस तरह बंधा था कि अगर वो लीद करें तो सीधे पीछे लीददान में गिरे। एकदम फ़िसलपट्टी की तरह इंतजाम। लीद निकलते ही झूला झूलती हुई अपने गन्तव्य तक पहुंचे।
हमारे वहां टहलते हुये अभिषेक के कुछ हिन्दुस्तानी दोस्त मिले। एकाध कनपुरिया भी। कुछ देर उनसे बतियाये। फ़िर पार्क दर्शन करने लगे।
बेहद खूबसूरत पार्क में तरह-तरह के पेड़, तालाब, ब्यूटी प्वाइंट, लव प्वाइंट और अनेक फ़ोटुआने लायक जगहें थीं। लोग जगह-जगह खड़े होकर फ़ोटू खिंचा रहे थे। हमने भी बेदर्दी से कैमरे का उपयोग किया।
अब कैमरों का कोई ’कैमरा अधिकार आयोग’ तो होता नहीं जो वहां जाकर हमारी शिकायत करता –’देखिये ये नमूने जैसे शक्ल लिये बार-बार खूबसूरत जगहों पर खड़े होकर हमसे फ़ोटू खिंचा रहे हैं। जगहों की खूबसूरती बिगाड़ रहे हैं फ़ोटुओं में। हमारी बदनामी हो रही है।’
पार्क में घुसते ही बर्फ़ का स्केटिंग सेंटर भी दिखा। पता चला वह ट्रम्प का है। ट्रम्प साहब के अमेरिका में तमाम तरह के रोजगार हैं। इमारतें, होटल, कैसीनों, व्यापारिक सेंटर मतलब हर रोजगार में दखल। हालात यह कि लोग मजाक में कहते हैं कि ट्रम्प मूलत: तो व्यापारी ही हैं , अमेरिका के राष्ट्रपति का काम तो उनका साइड बिजनेस है। हाल ही में वासिंगटन डीसी में पुराने पोस्ट आफ़िस को खरीद कर ट्रम्प साहब ने होटल में बदल दिया। दुनिया भर के देशों के आये राष्ट्राध्यक्ष इसी होटल में ठहरते हैं।
पार्क में एक चौड़े रास्ते के दोनों के तरफ़ मशहूर साहित्यकारों की मूर्तियां हैं। परिचय के साथ आकर्षक मूर्तियां। इस रास्ते से गुजरकर फ़ोटो खिंचाते हुये अपन ने उनका सानिध्य महसूस किया।
वहां की खूबसूरती का उपयोग लोग अपने-अपने तरह से कर रहे थे। फ़ोटोग्राफ़ी तो हर मोबाइल धारी का सहज अधिकार है। इसके अतिरिक्त तमाम खूबसूरत लोग माडलिंग के अंदाज में फ़ोटो/वीडियो बाजी भी कर रहे थे। अंगड़ाईयां लेते हुये, अदायें दिखाते हुये। हाल यह कि यह सब देखने में ही लगे रहते अगर आगे का नजारे और आकर्षक न होते।
कछुआ तालाब और आर्नामेंटल पुल पर खड़े होकर तमाम लोग फ़ोटोबाजी कर रहे थे। ऑर्नामेंटल पुल अंगूठी के आकार का बना हुआ है।
एक जगह एक आदमी साबुन के बबल बनाते हुये उड़ा रहा था। हमारे बगल से , ऊपर से भी कुछ साबुन के बादल गुजरे। कुछ से हमने बचने की कोशिश की। बच भी गये। जिनसे नहीं बच पाये वो हमसे भिड़कर हवा में मिल गये। मन में – ’जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा’ वाले घराने के भाव आयें इसके पहले ही हम आगे बढ गये।
आगे कुछ लोग करतब दिखा रहे। तीन लोगों को सर झुकाकर खड़े करके एक आदमी दूर से दौड़ता आया और तीनों को ऊपर से फ़ांदता चला गया। तालियां बचाकर लोगों ने स्वागत किया। कुछ ने पैसे भी दिये। हमने तालियां बचाकर काम चलाया।
एक ड्रमर वहां ड्रम बजाते हुये रियाज कर रहा था। आगे बेथोडा टेरेस और फ़व्वारे पर तमाम लोग मौजूद थे। लोगों की चहल-पहल और चेहरे जगह को खूबसूरत बना रहे थे। पार्क से टहलकर बाहर आये। बाहर कोलम्बस की बड़ी मूर्ति बनी थी।
कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की। दुनिया के साहसी लोगों में शामिल इस नाविक ने यहां के मूल निवासियों को बेदखल करने किया, जनसंहार भी किया। इस अत्याचार को देखते हुये कुछ लोगों यह मांग भी कर रहे हैं कि कोलम्बस को महिमामंडित करने की बजाय उसकी मूर्तियां हटनी चाहिये। आगे क्या होता है यह समय बतायेगा। लेकिन फ़िलहाल तो कोलम्बस अकड़े हुये खड़े हैं तमाम जगह।
चूंकि यहां फोटो खिंचाने के पैसे नहीं पड़ने थे इसलिए हमने कोलम्बस की मूर्ति के पास खड़े होकर फोटो खिंचाया। फोटो का टाइटल - क्रिस्टोफर कोलम्बस के साथ कनपुरिया कोलम्बस।
सेंट्रल पार्क में घूमते हुये अभिषेक ने आसपास की इमारतों की जानकारी भी दी। एक इमारत ऐसी भी जो इतनी पतली थी कि उसका बनना असम्भव बताया गया था। लेकिन असम्भव को सम्भव बनाया उसके बनाने वालों ने।
घूमते-घूमते शाम हो गयी थी। इतना घूमे उस दिन कि पैर के अंगूठे में छाले पड़ गये। हम लौट चले। पास के ही अंडरग्राउंड मेट्रो से न्यूयार्क पेन स्टेशन आये। इसी बहाने न्यूयार्क की मेट्रो भी देख ली। बैठ भी लिये।
चलते समय अभिषेक ने जेब से निकालकर एक ठो शाल भेंट किया कहते हुये- ’लेखक के लिये यही सबसे ठीक लगा मुझे।’ हड़बड़ी में फ़ोटो भी नहीं खिंचा पाये। खिंचाते तो सालों तक लोगों को दिखाते हुये कहते –’यह शाल हमको न्यूयार्क में भेंट की गयी थी।’
लौटकर घर आये तो रात हो गयी थी। अंधेरा हो गया था। लेकिन न्यूयार्क की यादें जगमग कर रहीं थीं। अभी भी यही महसूस हो रहा है।
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