Saturday, January 11, 2020

धूप की संगत की चाहना

 


सुबह दफ्तर जाते हुए लोगों को सड़क पर आरामफर्मा देखता हूँ तो मन करता है वहीं ठहर जाऊं। घंटा आध घण्टा धूप की संगत में बिताऊं। किलो दो किलो धूप पचा जाऊं।
लेकिन मनचाहा हमेशा हो कहाँ पाता है। सुबह से शाम दिन तमाम हो जाता है। शाम को लगता है कि दिन कल फिर निकलेगा। सूरज फिर निकलेगा। निकलता भी है लेकिन मुलाकात नहीं हो पाती। पहले किसी न किसी बहाने सामने आ जाते थे। मुस्कराते थे। बतियाते थे। चाय-चुस्कियाते थे। टिपियाते हुए तिड़ी-बिड़ी हो जाते थे।
शायद आजकल सूरज भाई को भी व्यस्त होने का शौक चर्राया हो। लेकिन व्यस्त होने का काम तो निठल्लों का है। उनको व्यस्त होने की क्या जरूरत। अनगिनत काम हैं उनके पास। यह भी हो सकता है कि दिल्ली निकल गए हों पुस्तक मेले में किसी विमोचन में। किताब सीने पर सटाकर फोटो खिंचाने का मन किया हो उनका भी।
हो तो यह भी सकता है कि सूरज भाई के मोहल्ले में भी चुनाव का डंका बजा हो और सूरज भाई भी इस बार चुनाव लड़ने का मूड बना रहे हों।
अच्छा मान लीजिये सूरज भाई के मोहल्ले में चुनाव होने को हों और उनको भाषण देना हो किसी चुनाव सभा मे तो क्या बोलेंगे वे? कल्पना कीजिये। क्या वे अपने यहाँ ताजी हीलियम की सप्लाई की बात करेंगे या फिर बहुत उजले जगह में काम भर के अंधेरे की। हो तो यह भी सकता है कि वे अपने यहां भ्रष्टाचार के खात्मे पर बतियाये। कहे हमारे केंद्र पर लाखों डिग्री का तापमान सतह तक पहुंचते हुए कुछ हजार डिग्री ही रह जाता है। यह अंतर कम करके रहेगें हम।
अभी हम सूरज भाई के भाषण का ड्राफ्ट तैयार कर ही रहे थे कि उन्होंने हल्ला मचाकर हमको बाहर बुला लिया।झल्लाते हुए बोले -'तुम लफ्फाजी कर रहे हो बिस्तर पर बैठे हुए, हम यहाँ सुबह से तुम्हारे यहां के कोहरे के झाड़-झंखाड़ उखाड़ रहे हैं।'
हम सूरज भाई की तारीफ करके अंदर आ गए। काम में लगे हुए इंसान को डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए। क्या पता वह अपना काम निपटाने के पहले डिस्टर्ब करने वाले को ही निपटा दे।
अंदर आने के पहले हमने सूरज भाई की एक फोटो खींच ली थी। तारीफ सुनकर वे झल्लाने की जगह मुस्कराने लगे थे। तारीफ इंसान को मुलायम बना देती है।
है कि नहीं?

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Monday, January 06, 2020

मोरा मन दर्पण कहलाये

 


सबेरे टहलने निकले। सामने ही रामलीला मैदान है। वर्षो से यहां रामलीला होती है। रामलीला के बाद कवि सम्मेलन और मुशायरा। आसपास के कई जिलों के लोग यहां मेला देखने आते हैं। अनगिनत किस्से जुड़े हैं उस मैदान से।

रामलीला मैदान के एक हिस्से में अम्बेडकर पार्क है। पार्क की बाउंड्री कई जगह से हिल गयी है। कहीं किसी ने मांगलिक कार्यक्रम में टेंट बांधा तो हिल गयी, किसी स्मैकिए ने लोहा चुराने की मंशा से धीरे-धीरे हिलाकर कमजोर कर दिया है। एक जगह तो कई मीटर तक दीवार हिल रही है। एक धक्का और , बस गयी दीवार। मरम्मत करानी होगी। नियमित टूटफूट की ज्यादा नियमित मरम्मत होती रहनी चाहिए।
सामने सूरज भाई पूरी शिद्दत से उगे हुए हैं। खूबसूरत लग रहे। चेहरे पर कोहरे और सर्दी को पछाड़ देने का विजय गर्व। मुस्कराते हुए गुडमार्निंग करते हुए बोले -'रोज निकला करो।'
रामलीला मंच पर कुछ बच्चे सिगरेट पी रहे हैं। क्या पता उनमें से कोई उस बिरादरी का हो जो बाउंड्री को हिलाकर तोड़ता हो। सुबह का समय , नागरिक बोध चैतन्य हुआ। छह सात बच्चे थे। हमने उनको टोंका -' यहां सिगरेट क्यों पी रहे?'
एकाध बच्चे तो चुपचाप उठकर चल दिये। एक ने सवाल किया -'यहां न पिएं तो कहां पियें? घर में तो पी नहीं सकते।'
हमने कहा -' तो जरूरी है सिगरेट पीना?'
बच्चा बोला -'तलब लग रही तो क्या करें? 22 साल के हो गए। हमारी मर्जी हम जो पियें। अपना पैसा कोई तुमसे थोड़ी मांग रहे।'
उनके ठोस तर्क से हमने डरते हुये उनसे वहां से चले जाने को कहा। बच्चे चले तो गए लेकिन उनमें से एक ने धमकाते हुए कहा -'देखते हैं अभी तुमको आकर।'

हमारे डर का कारण बच्चों की सिगरेट की तलब नहीं थी। हम यह सोचकर डर गए कि कल को इसी तर्ज पर कोई आकर हमको पीट जाएगा। पूछने पर कहेगा -'हमको तलब लगी है पीटने की इसलिए पीट रहे।' ये तलब का मामला बहुत भीषण है।
सामने सूरज भाई मुस्कराते हुए सब देख रहे हैं। देखते तो वो सब रहते हैं । कहीं किसी ने किसी को उड़ा दिया, कहीं किसी ने किसी को बचा लिया। कहीं कोई घुस गया, मारपीट करी और निकल गया। कोई घायल, कोई कराह रहा, कोई बयान दे रहा। सब चुपचाप देखते रहते हैं। लक्खों सालों से। लेकिन कुछ बोलते नहीं। भले आदमी की तरह अपने काम से काम।
सामने की सड़क से लोग फैक्ट्री आ रहे हैं। दूर सड़क पर सूरज की किरणें सड़क पर चमक रही हैं। मानो सड़क कोई शीशा हो जिसमें सूरज की किरणें अपना मुखड़ा देखकर चमकने के लिए निकल रहीं हों। काम पर निकलना है तो जरा बन-ठन कर निकलें। क्या पता गाना भी गाती जा रहीं हों -'मोरा मन दर्पण कहलाये।'
मंदिर के पास पुलिस जीप खड़ी है। कुछ सिपाही भी। दो महिला सिपाही भी हैं। सात बजे से आठ नौ तक रहते हैं यहां ये लोग। हमने रामलीला मंच की तरफ देखने की बात कही तो भाई जी ने कहा -'देख लेंगे जी उधर भी देख लेंगे। सब तरफ देखते हैं हम।' कई जगह के नाम गिना डाले उन्होंने।
पार्क के अलग-अलग कोनो पर अलग-अलग अधिकारियों के नामपट्ट लगे हैं। किसी के नाम कोई पेड़ लगाने का , किसी के नाम पार्क शुरू कराने में, किसी ने द्वार बनवाया। उनमें से कोई अब यहाँ नहीं है। कोई नौकरी से रिटायर हो गया, कोई दुनिया से। लेकिन उनके नाम चल रहे हैं। वह भी तब तक जब तक कोई बोर्ड नहीं बदलता। क्या पता कल को बोर्ड बदलकर बहुत पहले हुये काम का फिर से उदघाटन कर दिया जाए।
सूरज भाई को फिर से नमस्ते किया तो बोले -'जाओ अब काम-धाम करो।' कहते हुए वो और ऊंचे उचककर चमकने लगे।

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Sunday, January 05, 2020

ईंट के सिंहासन पर बैठा पीपल का पेड़

 


सुबह इस्टेट देखने निकले। बगल में ही बरगद का पेड़ दिखा। तमाम ईंटे बरगद की गोद मे छिपी थीं। जैसे सर्दी से छुपन-छुपाई खेल रहीं हों। शायद कभी गुमटी रही हो ईंट की। बढ़ते पेड़ के साथ उसी में दुबकती चलीं गई।
पास ही एक पीपल का पेड़ देखा। ईंटो के सिंहासन पर बैठकर धूप तापते। पेड़ की जगह पहले ईंट की पानी की टँकी रही होगी। होगी क्या थी। वहीं किसी चिड़िया की बीट से पीपल के बीज पड़े होगें। पहले छोटा पौधा रहा होगा। फिर बढ़ते हुए पेड़ बन गया होगा। समय के साथ पानी की टँकी कहीं और शिफ्ट हो गयी होगी। जिस जगह पानी की टँकी रही होगी उस पर पीपल के जवान होते पेड़ ने कब्जा कर लिया होगा।
आज तो कोई देखेगा तो यही कहेगा -' ये ईंट का चबूतरा तो पेड़ के लिए ही बना होगा। यह पेड़ का सिंहासन है।'
मामूली सी दिखने वाली खराबी और बुराई को अनदेखा करने पर वह कैसे बढ़कर पूरी माहौल में पसर जाती है इसका मुजाहिरा करते दिखा मुझे ईंट के चबूतरे पर सवार पीपल का पेड़। आपके अगल-बगल भी ऐसे तमाम मंजर दिखते होंगे। सब तरफ दिख जाते हैं आजकल। हम भी उनको नजरअंदाज करते हुए मजे कर रहे हैं।
इसके अलावा और कर भी क्या सकते हैं। आजकल माहौल में गर्मी बहुत है। जाड़ा भी भयंकर वाला पड़ रहा है। चुपचाप दुबक के बैठे हैं रजाई के भीतर जैसे बरगद की गोद में ईंटे दुबकी हैं।

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Wednesday, January 01, 2020

नये साल की शुभकामनाएं



नया साल आ ही गया। न पूछा न जांचा। मुंडी उठाकर घुस गया। उन्नीस की जगह बीस हो गया। नए साल में और कुछ हो या न हो उन्नीस की जगह बीस लिखने में स्याही बचेगी। काश कोई बैंक होता जिसमें यह बचा हुआ समय जमा किया जा सकता।
नया साल सफलता के मामले में पिछले से बीस हो। बीस के पहले 4 लगाने वालों से बचाव हो। बवाल कम हों। सवाल के सटीक जबाब मिलें। जिंदगी में नए खुशनुमा धमाल हों।
नये साल में संकल्प लेने की और बाकी साल भर उसको पालन न करने की परंपरा है। हम इस परंपरा को तोड़ते हुए बिना किसी तामझाम के नए साल का स्वागत कर रहे हैं। कोई संकल्प लिए बिना नये साल में धंस रहे हैं। आप भी बिना किसी संकल्प के नया साल शुरू करें। हल्के रहेंगे।
जाड़ा बहुत पड़ रहा है। पहन-ओढ़कर रहें। सर्दी से बचाव रखें। सुबह टहलने के शौकीन 'कल्पना विहार' करने की सोच सकते हैं।
नए साल की शुभकामनाएं आप तक पहुंचे। आपकी हम तक पहुंच गईं है। शुभकामनाएं बफे सिस्टम में होती हैं। खुल्ले में पूरी कायनात में धरी होती हैं। जित्ती मन आये ग्रहण कर लें, भेज दें। जिस मित्र-सहेली को जिस घराने की शुभकामनाएं चाहिए वो मुझसे मिली हुई समझें।
आने वाला दिन आज से बेहतर हो। आपकी जिंदगी में खुशियों के क्षण आएं। आप मुस्कराएं, खिलखिलाएं, नए साल की खुशियां मनाएं।
नए साल की बधाइयां। शुभकामनाएं।

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