Sunday, July 19, 2020

पूरी कायनात कोरोना ग्रस्त है

 सुबह हुई। गर्म पानी के बाद चाय पी गयी। ऑनलाइन अखबार पढा। फेसबुक 'वॉक' किया। 'व्हाट्सएप वर्क आउट' किया। 'व्हाट्सएप वर्क आउट' मल्लब , गुड मॉर्निंग, सुप्रभात, हाउ आर यू, 'दिन बढ़िया बीते' घराने की कसरतें । कुछ ही देर में 'डिजिटल पसीने' से लथपथ होकर बाहर आ गए।

अखबार में कोरोना कहर के किस्से पढ़े। शहर में कल 77 केस मिले। उनमें 9 हमारी निर्माणी में। 4 अस्पताल में। 5 फैक्ट्री में। ये सब रैंडम सैम्पलिंग के बाद निकले परिणाम हैं। कल अस्पताल सैनिटाइज हुआ। आज फैक्ट्री होगी।
जो लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए उनके साथ रहे लोगों में सहज चिंता है। अरे इसके साथ तो हम भी रहे। उनके खुद के टेस्ट निगेटिव आए हैं लेकिन टेस्ट सैम्पल लेने के दो दिन के भीतर वे उनके सम्पर्क में रहे। क्या पता इस बीच फिर फिर संक्रमित हो गए हों। उनमें डर व्याप्त है। सबमें व्याप्त है। बचाव के लिए कुछ डर भी जरूरी है।
कोरोना के केस तेजी से बढ़ रहे हैं। न जाने किसके सम्पर्क में आकर कोरोना हो जाये पता ही नहीं चलता। कोरोना टेस्टिंग का कोई फौरन वाला तरीका निकल आये तो बढ़िया। 'कोरोना चुम्बक' की तरह। आकर्षण-प्रतिकर्षण से फौरन पता चल जाए कोरोना मरीज। उनको अलग करके जरूरत हो तो इलाज किया जाए।
सब तरह के उपायों में कोरोना से बचाव के तरीको में मास्क का उपयोग, सुरक्षित दूरी , साफ़-सफ़ाई और इसके अलावा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना ही है। हर इंसान को कोरोना मरीज समझकर व्यवहार किया जाए तो ही बचाव है।
मास्क के प्रयोग की आदत पड़ने में बहुत देर हो रही है। लोग कुछ देर लगाते हैं फिर उतार देते हैं। मीटिंग में भी पढ़े-लिखे लोग तक बात करते समय मास्क मुंह से उतारकर गले मे, गर्दन में हैंगर की तरह लटका लेते हैं। चश्मे की तरह उतारकर मेज पर धर लेते हैं।
कामगारों की स्थिति तो और चुनौतीपूर्ण। कुछ मास्क लगाते हैं। बहुत नहीं लगाते। न लगाने वाले कामगार कहते हैं -'सांस नहीं लेते बनती, भाप बनती है, अभी उतारा, अब्बी पहन ही रहे थे, बस जरा उधरै गए थे।' एक मास्क , न पहनने के बहाने हजार। बरतने में समाज के लिए अच्छी होने के बावजूद ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता को लोग उतने मन से नहीं अमल में लाते। इसी तरह मास्क को जरूरी समझने के बावजूद अभ्यास में नहीं लाते। कोरोना से बचाव के लिए इसकी आदत सबको डालनी होगी।
हम जब राउंड पर जाते हैं तो लोग अपने-अपने मास्क जेब से निकालकर, डोरी से उतारकर , मेज से उठाकर मुंह पर चस्पा करने लगते हैं। जैसे गावों में ससुर, जेठ को आते देखकर बहुएं न चाहते हुए भी घूंघट कर लेती थीं वैसे ही कामगार लोग भी हमको देखकर मास्क धारण कर लेते हैं। खड़े होकर लोगों को इसकी जरूरत समझाते हैं तो उधर से भी इतनीं समझदारी की बातें आती हैं जिनको सुनकर लगता है ये तो बिना मास्क रह ही नहीं सकते। लेकिन सच हमारे लगने से उल्टा है।
सुबह फिर बाहर सड़क पर आकर खड़े हो गए। लोग मास्क, बिना मास्क, हेलमेट/बिना हेलमेट सड़क पर गुजर रहे थे।
एक आदमी साइकिल के हैंडल पर कुछ चादरें लिए 'चिंतन मगन' चला जा रहा था। उसके चेहरे पर कमाई की चिंता थी। दो साइकिल वाले बिना मास्क आपस मे बतियाते चले जा रहे थे। चौकोर झोले लटके हुए हैंडल पर। पीछे एक दूसरा साइकिल वाले मुंह में जकड़े मसाले को कुचल-कुचल कर निपटाते हुये जा रहा था।
एक महिला फोन पर बतियाते हुए चली जा रही थी। बिना मास्क। हमारी ही तरफ आ रही थी। हमने मन में ठान लिया कि बगल से गुजरेगी तो मास्क न पहनने के लिए टोकेंगे। हम ठने हुए पर अमल कर पाते इसके पहले महिला की बातचीत पूरी हो गयी। उसने मोबाइल झोले में रखा और झोले से मास्क नुमा कपड़ा निकालकर चेहरे पर धारण कर लिया। हम टोंकने से वंचित रह गए। आपदा को अवसर में न बदल पाए।
महिला को टोंकने से वंचित रह जाने की कसर हमने दो मोटरसाइकिल वालों को बिना हेलमेट गाड़ी चलाने के लिए टोंककर पूरी की। एक तो मुंह में भरे मसाले के चलते कुछ नहीं बोला, लेकिन दूसरे ने सिद्धान्तत: मेरी बात से बिना अपराधबोध के सहमत हुए बताया कि हेलमेट था उसके पास लेकिन उसका एक दोस्त ले गया है, जिसका तबादला कानपुर हो गया है। संयोग कि तबादले वाले उसके साथी को कानपुर के लिए रिलीज करने का आदेश हमने ही दिया था। मतलब हेलमेट धारण न करने के अपराध के अप्रत्यक्ष दोषी हम ही साबित हुए।
सड़क बारिश से धुली थी। पार्क में लोग नहीं थे। एक ऑटो को दस साल के करीब का बच्चा उघारे बदन चलाते हुए चला जा रहा था। बड़ा होने के पहले ही जिम्मेदार हो गया बच्चा। सब जगह स्कूल बंद हैं लेकिन जिंदगी का स्कूल चल रहा है।
ऊपर आसमान में सूरज भाई भी दिखे नहीं। उनका भी लगता है लाकडाउन में वर्क फ्रॉम होम चल रहा है। सूरज भाई की बात से याद आया कि पूरी कायनात के तारे, आकाश गंगाएं एक दूसरे से दूर भागती जा रही हैं। क्या कायनात को भी कोरोना हुआ रखा है? क्या आकाश पिंडो का एक दूसरे से दूर भागते चले जाना 'सामाजिक दूरी' बनाए रखने का उपक्रम है?
यह भी कि ये जो ग्रह,उपग्रह, नक्षत्र एक-दूसरे की परिक्रमा करते फिर रहे हैं सदियों से वे क्या क्वाराइनटैंन किये गए हैं। एक दूसरे से सुरक्षित दूरी पर रहते हुए टहलने के आदेश के साथ।
इसी क्रम में सोचते रहे कि क्या गुरुत्वाकर्षण भी आकाश पिंडो के मास्क की तरह है। जैसे मास्क इंसान के मुंह से निकली छींटों को बाहर जाने से रोकता है वैसे ही गुरुत्वाकर्षण के चलते इंसान और चीजों को अपने हलके से बाहर जाने से रोकते हैं।
इसी तरह की न जाने कितनी उलट-पुलट बातें सोचते हुए इतना समय बीत गया। समय किसी के लिए रुकता भी कहां है। सब कुछ बीतने के लिए होता है। कोरोना काल भी खत्म होगा। तब हम इसके समय को अलग तरह याद करेंगे। लेकिन वह समय आने तक हमको सुरक्षित रहना होगा। मास्क पहनना होगा, दूरी बनाना होगा, सफाई रखनी होगी और अपनी प्रतिरोधक क्षमाता बढ़ानी होगी।
इसके बिना गुजारा नहीं होना।

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Friday, July 17, 2020

सफलता के बनावटी मिथक

 पिछले दिनों कुछ बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट आये। बच्चों के 100% नम्बर तक आये। उनके फोटू छपे। इंटरव्यू आये। और भी लोगों ने अपने बच्चों के नम्बर बताए।

न्यूटन के क्रिया-प्रतिक्रिया नियम के अनुसार शाम होते होते कभी कम नम्बर वालों ने भी मोर्चा संभाल लिया। कभी कम नम्बर पाए जो लोग आज सफल हैं उन्होंने मीडिया को कब्जे में ले लिया। बताया कि किसी इम्तहान में कम नम्बर पाना मतलब सब कुछ खत्म हो जाना नहीं होता। एक राह बन्द होती है, हजार राहें खुलती हैं। जिन्दगी सिर्फ बोर्ड के नम्बर के हिसाब से नहीं हिलती-डुलती।
ये सफल हुए लोग सिविल सर्विसेज घराने के लोग थे। इतने आत्मविश्वास से इन्होंने अपने कम नम्बर के बावजूद सफल होने की कहानी बयान की कि अधिक नम्बर पाए बच्चों के माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के प्रति आशंकित न हो गए हों। यह न सोचने लगे हों कि -'हाय्य बच्चे के जो नम्बर ज्यादा आ गए। अब यह सिविल सेवा में कैसे जाएगा?'
क्या पता कुछ माता-पिता अपने बच्चों की कापियां दुबारा जँचवा कर उनके नम्बर कम करवाने की जुगत में लग गए हों।
मीडिया ने नम्बरों और सफलता के मिथक को तोड़ने के लिए सिविल सर्वेंट से बात कराई। एक नया मिथक पुख्ता किया -'सफलता का मतलब सिविल सेवा में सफल हो जाना होता है।'
इस सिविल सेवा के मिथक ने जितनो की जिंदगी बनाई होगी उससे कई गुना लोगों की जिंदगी बिगाड़ी होगी। अनगिनत नौजवान अपनी पूरी जवानी सिविल सेवा के युध्द में बर्बाद कर देते हैं। कुछ सफल होते हैं, ज्यादातर असफल । सफल लोगों के किस्से तो सुने-सुनाए जाते हैं। असफल लोग अपने तमाम साथियों से अक्सर बहुत पिछड़ जाते हैं।
सिविल सेवा के ताने-बाने ने देश के बड़े हिस्से को बर्बाद भी किया है। सिविल सेवाओं से जुड़ी ताकत, रुतबे जिसका उपयोग जन सेवा के लिए होना चाहिए उसको लोगों ने अपने अतृप्त सपने पूरे करने में किया। सिविल सेवक सर्वज्ञाता माना गया। जबकि ऐसा होता नहीं। देश का बेहरतीन दिमाग सिविल सेवा में चला गया। उत्पादन और अन्य सेवा सेक्टर बाकी लोगों के लिए छूट गए।
हिंदी पट्टी के पिछड़े रह जाने का एक कारण यहां के प्रतिभाशाली युवाओं में सिविल सेवाओं के प्रति बीहड़ ललक और उसके जाल में उलझकर खुद को ट्रांसफर/पोस्टिंग और लाबीईग तक सीमित रह जाना भी रहा। लोग व्यक्तिगत तौर पर सफल हुए लेकिन समाज को इससे बहुत भला नहीं हुआ मेरी समझ में।
वैसे यह भी एक मिथक ही है कि सिविल सेवा में जाने वाले सब लोग बेहतरीन दिमाग के होते हैं। असलियत यह है सिविल सेवा या अन्य किसी भी इम्तहान में सफल होने के लिए लोगों की लगन, मेहनत, समर्पण, आत्मविश्वास, लोगों का उत्साह वर्धन और काफी कुछ संयोग का योगदान भी होता है। ऐसे कई लोग असफल भी रहे जिनके सिखाये लोग सिविल सेवा में चयनित हुए। गुरु रह गए,चेले निकल गए।
कहने का मतलब कि मीडिया ने एक मिथक तोड़ने के लिए दूसरा मिथक पुख्ता किया। सिर्फ नम्बर ही जरूरी नहीं होते के मिथक को तोड़ने के लिए सफलता का मतलब सिविल सेवा में सफल होने के मिथक को पुख्ता किया। बेहतर होता कि अन्य सेवा क्षेत्रों के सफल लोगों से भी बात कराता जिनके बचपन में कम नम्बर आए। ये लोग उत्पादन, समाज सेवा, साहित्य और दीगर क्षेत्रों के लोग हो सकते थे।
बात नम्बरों की चली तो अपन भी बताते चलें किस्सा। अपन पढ़ने में ठीक-ठाक रहे। अच्छे नम्बर से पास होते रहे। लोग हमको होशियार समझते रहे। लेकिन हमको लगता है होशियारी से ज्यादा इसमें भूमिका मेहनत की होती है। अपने यहां शिक्षा मेहनत प्रधान है।
पांचवी में स्कूल से निकले। सबसे अच्छे नम्बर थे स्कूल में। शायद 147/150. भर्ती के लिए जीआईसी में इम्तहान दिया तो नीचे से 3-4 में नम्बर था। हाई स्कूल में जब निकले तो स्कूल में सबसे ज्यादा नम्बर थे। सबसे ज्यादा नम्बर संस्कृत में थे- 85/100 । हिंदी छोड़ सबमें डिस्टिंक्शन थी। आज हाल यह कि संस्कृत में -' अयम निज: परोवेति, गणना लघुचेतशाम....' वाले श्लोक को छोड़कर कुछ नहीं आता। बाकी डिस्टिंक्शन वाले विषयों ने भी समय के साथ समर्थन वापस ले लिया। अब थोड़ी बहुत जो आती है वह वही हिंदी है जिसमें सबसे कम नम्बर आये थे।
हाईस्कूल के बाद बीएनएसडी गए। एफ-1 सेक्शन। पढ़ाई का माध्यम बदल गया। हिंदी से अंग्रेजी। पहली तिमाही में फिजिक्स की कॉपी मिली। नम्बर आये 09/40 मतलब फेल। जीआईसी का टॉपर बीएनएसडी में फेल। वो तो कहो एक सवाल अनजंचा रह गया था। दिखाने पर गुरु जी ने भुनभुनाते हुए 4 नम्बर जोड़ दिए। नम्बर हुए 13/40 । मतलब पास।
बाद में पता चला गुरु जी ऐसे ही बच्चों को कठिन पर्चा देकर फेल करते हुए ट्यूशन के लिए घेरते थे। हमारी आर्थिक स्थिति में ट्यूशन सम्भव नहीं थी। लिहाजा हमने मेहनत की राह पकड़ी। ऐसी कोई किताब नहीं छोड़ी अभ्यास के लिए जो उस समय उपलब्ध थी। कोई भी किताब हो, उसके सब सवाल हमने आजमा डाले। नतीजा हम बाकी सब विषय में अच्छे नम्बर लाने लगे। लेकिन अंग्रेजी हौवा बनी रही।
अंग्रेजी ऐसा हौवा रही कि लगता था पास कैसे होंगे। संयोग कि हमको इसी समय बाजपेयी सर मिले। उन्होंने हमको पढ़ाया नहीं , अभ्यास कराया। लेकिन उसी अभ्यास के दौरान हममें यह विश्वास भर दिया कि दुनिया में कोई ऐसा काम नहीं जिसको अगर चाहो तो तुम नहीं कर सकते।
गुरु जी के बढ़ाये हुए हौसले से हमने भयंकर मेहनत की। अभ्यास की बदौलत जो इम्तहान दिए उसके चलते इंटर के जिस इम्तहान में हम पास होने के लिये चिंतित थे, उसमें मेरिट में उत्तर प्रदेश में 9 वां स्थान पाए।
आगे के भी ऐसे तमाम किस्से हैं जिंदगी के। जिनसे हमेशा यह लगता है मेहनत और सच्ची लगन से हर काम पूरा किया जा सकता है। सफलता/असफलता संयोग भी होती है लेकिन जब पूरे मन से मेहनत होती है तो सफलता झक मार कर आपके पास आती है।
जिंदगी बहुरंगी होती है । अनगिनत रंग वाली इस जिंदगी में एक असफलता मात्र एक रंग होती है। जिंदगी बहुत खूबसूरत होती है। एक असफलता इसको बेरंग कभी नहीं कर सकती।
किसी इम्तहान में किसी के नम्बर सिर्फ नम्बर होते हैं। सफलताओं के गढ़े मिथकों में नम्बर भी जुगाड़ से घुस गया है। इसको जितनी जल्दी पहचान लिया जाए उतना अच्छा।

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Thursday, July 16, 2020

बहुत दिन बाद आये

 

मिठाई की दुकान के पास सड़क पर पंकज बाजपेयी


कल पंकज बाजपेयी से मिलना हुआ। बहुत दिन के बाद। सुबह कहीं टहल न जाये अपने ठीहे से इसीलिए जल्दी निकल लिए। बीच सड़क पर डिवाइडर के पास दिखे। सड़क पार करते हुए।

हमको देखते ही तसल्ली की चाल लपककर चलने में बदल गयी। पास आते हुए बोले-'बहुत दिन बाद आये। कहां चले गए थे?' पास आकर सोशल डिस्टेंसिंग की इज्जत करते हुए हाथ 45 डिग्री झुकाकर दूर से ही पैर छुए। पंकज बाजपेयी यह 'दूर प्रणाम' का तरीका कोरोना प्रकोप के बहुत पहले अमल में लाते रहे हैं। क्या उनको कोरोना के आने का पूर्वाभास था ? क्या पता , पता हो। उनके आदमी सीआईडी में हैं। उनको सब पता रहता है।
बताया कि शाहजहांपुर चले गए हैं तो बताया -'शाहजहाँपुर, बरेली के पास।' मतलब उनको जगह का अंदाज है।
पास खड़े होकर पूछा -'माल किधर है?'
माल मतलब -जलेबी, दही।
हम बोले -'ला नहीं पाए आज।'
बोले -'कोई बात नहीं। तुम हमको नमकीन, मिठाई, बिस्कुट दिला देना। आज बहुत दिन बाद आये हो। खूब चीजें लेंगे।'
हम बोले -'दिलाएंगे। आओ पहले चाय पीते हैं।'
चाय की दुकान पर लोगों ने बताया -' पिछले दिनों दस-पन्द्रह दिन बीमार रहे। घर में रहे। फिर अपने आप ठीक हो गए। कमजोर हो गए। अबकी आप बहुत दिन बाद आये।'
कोरोना के चक्कर में दुनिया कितनी ही बदल गयी हो लेकिन पंकज बाजपेयी वैसे ही। खुला सीना, खुला चेहरा। ऐसी की तैसी कोरोना की।
वैसे 'ऐसी की तैसी कोरोना की' वाला जज्बा हर जगह देखने को मिला। जिधर देखो उधर लोग खुले मुंह आते-जाते बोलते,बतियाते दिखे। पहले जैसे लोग सर पर कफ़न बांध कर निकलते थे वैसे अब मुंह खोल कर घूमते हैं। कोरोना आएगा, चेहरे से टकराएगा। दुम दबाकर , घायल होकर भाग जाएगा। कानपुर के किसी आडियो में यह किस्सा चला भी -'कोरोना यहां आकर फंस गया है। पान मसाले के बीच सांस की नली में उसका दम घुट रहा है। बचेगा नहीं कानपुर में कोरोना।'
पंकज बाजपेयी से पूछा कि मास्क क्यों नही लगाते तो बोले -'गन्दगी हो जाती। नुकसान करता है। इसलिए नहीं लगते।'
कोहली के हाल पूछे। बच्चे पकड़वाने वाले कोहली। बोले -'वो कोहली पकड़ गया। अब केवल विराट कोहली बचा है। वह खेलता उससे कोई खतरा नहीं।'
मोबाइल बोले -'बढ़िया वाला लेव। हम तुमको दिला देंगे। गाड़ी बढ़िया है।'
काफी देर इधर-उधर की बातें हुई। फिर सामान की बात चली। जो बोले वो दिलाया। फिर बोले -'इससे कह दो हमको समोसे दे देगा जब बनेगें। और ये वाली मिठाई।' वह भी हो गया।
इसके बाद बोले कि इससे कह दो हमको रोज मिठाई, समोसे दे दिया करेगा। हमने कहा ठीक। दुकान वाले नीरज बोले -'हम इनको 15 रुपये का सामान रोज दे दिया करेंगे।'
पंकज बोले- ' पन्द्रह नहीं पच्चीस।'
बात आखिर में बीस पर टूटी। तय हुआ कि बीस रुपये का सामान नीरज पंकज को दे दिया करेंगे। देने के समय कभी-कभी बात भी कराएंगे।
पंकज और नीरज। दोनों का मतलब एक -कमल। नीरज पोस्ट ग्रेजुएट हैं। नौकरी की तलाश में कई जगह फार्म भर चुके। कहीं होता नहीं, कहीं इम्तहान कैंसल हो जाता। कोरोना ने दुकानदारी भी चौपट कर रखी है। देश की पूरी जनता के यही हाल। बेहाल है।युवाओं के लिए तो और कठिन काल।
चलते समय पंकज बोले -'हमको जलाने वाले नोट देकर जाओ। हम तुमको सर्टिफिकेट देंगें।'
हमने पूछा -कित्ते रुपये?
बोले -'पचास।'
हमने दस-दस के नोट गिने। चालीस हुए। पूछा -'हो गए पचास।'
पंकज बोले -'हां।'
हमको चलते देख पंकज ने 'दूर प्रणाम किया।'
हम चल दिये। दस रुपये मारकर पंकज के। पंकज लपककर सड़क पार करके दूसरी तरफ चल दिये।
वो तो कहो पंकज सहज विश्वासी हैं। हमारी इज्जत भी करते हैं। किसी चंट सोशल मित्र के साथ ऐसा किया होता तो वो अब तक स्क्रीन शॉट, वीडियो लगाकर हमारी जितनी भी इज्जत है उसको उतार के उस पर अपनी बहादुरी और सच्चाई का झंडा फहरा चुका होता।
पंकज बाजपेयी की बातें लगभग एक जैसी ही होती हैं। कोहली, खतरा, जासूस, नोट जलाना, सामान, मिठाई, नमकीन, मम्मी जी।लेकिन उनसे मिलना हर बार नया लगता है। कम से कम समझदारों की तरह चालाक तो नहीं। एजेंडा साफ है -'सामान दिलवाओ, पैसे देओ।' नहीं भी मिला तो यह नहीं कि नाराज होकर बात न करें। यह सब चोंचले चालाक जनप्रतिनियों के होते हैं जो जनता की सेवा का मौका कब्जियाने के लिए जनता की ऐसी-तैसी करते रहते हैं।
राजतंत्र में राजा लोग राज्यों पर कब्जे के लिए आक्रमण करते थे। तलवार, तोपखाने, सैनिक का प्रयोग होता था। लोकतंत्र में जनता की सेवा के मौके लूटने के लिए युध्द होते हैं। पैसा, मीडिया और माफिया इस युध्द के हथियार हैं।
हर बार कु तरह इस बार भी पंकज बाजपेयी ने सिर्फ बच्चों जैसी जिद की -'नहीं, दिलवाओ, हम लेंगे। लेकिन फिर हमने जो कहा उसको मान लिया।' आज के समय में ऐसा सहज व्यवहार भी कहां मिलता है लोगों में। जो ऐसे सहज रहते हैं उनको लोग खिसका हुआ कहते हैं। समाज का संतुलन बनाये रखने के लिए ऐसे खिसके हुए लोगों की बहुत जरूरत है।
हम वापस लौट आये।

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Saturday, July 11, 2020

सपने में रूस

 आज फिर रूस जाना हुआ। सपने में। इस हफ्ते में दो बार हो गया। पहली बार परसों। दूसरी बार आज। पता नहीं क्या कनेक्शन है।

सपने वैसे बहुत कम आते हैं हमको। आते भी हैं तो गाड़ी छूटने के, स्टेशन पहुचने में भटकने के, बस स्टेशन तक पहुचने में छटपटाने के, इम्तहान की तैयारी न होने के, पर्चा छूट जाने के। मतलब चीजें हाथ से छूटते हुए कोई काम पूरा न होने के एहसास के। लेकिन ये रूस मेरे सपनों में पहली बार दाखिल हुआ है। पता नहीं क्या वजह है।
रूस के बारे में बचपन से पढ़ते आये। वहां के लेखक, क्रांति और वहां का समाज। सौ साल पहले जिस देश में क्रांति हुई । बदलाव के विस्फोट हुए। दुनिया भर में बदलाव की हवाओं, लहरों का उद्गम रहा जो देश वह विखंडित हुआ। अब हाल यह कि वहां पुतिन जी को छोड़कर कोई नेता ही नहीं। खबर पढ़ी कि अगले ने सन 2036 तक खुद के लिए कुर्सी पक्की कर ली।
कैसा क्रांतिधर्मी समाज है कि कोई और नेता नहीं उधर। सिवाय एक के। वैसे ऐसा तो हर समय होता आया है। लगता है इसके बाद कौन ? लेकिन फिर कोई न कोई आ ही जाता जिसके लिए फिर कहा जाता है -'इसके बाद कौन?
हां तो हम दो बार हो आये रूस इस हफ्ते। बिना पैसे। बिना वीजा के। ज्यादा नहीं दस-दस मिनट रहे होंगे। पहली बार रूस के किसी बस स्टेशन पर पहुंचकर बस का इंतजार करते दिखे। दूसरी बार वहां पहुंचकर किसी गाड़ी में बैठकर कहीं जाते। इस बार पत्नी भी साथ में।
पिछले साल दो जगह गए थे घूमने। पहले लेह-लद्दाख फिर अमेरिका। लेह के कई किस्से अभी लिखने को बाकी हैं। अमेरिका के किस्सों की तो किताब भी बन गयी। बस हफ्ते भर में कभी भी मुक्कमल हो सकती है। लेकिन संकोच और आलस्य के रंगा-बिल्ला ने दबोच रखी है किताब फाइनल करने की मंशा को। देखिए कब मुक्त होती है और परवान चढ़ती है यह इच्छा। किताब का नाम भी सुन लीजिए -'कनपुरिया कोलम्बस।' हमारे 'किताब पुरोहित' Alok Puranik ने डेढ़ मिनट में फाइनल कर दिया था यह नाम जब हमने अमेरिका के किसी शहर में चाय पीते हुए उनसे नाम सुझाने की बात कही थी।
पिछले साल अमेरिका यात्रा के बाद दुनिया देखने का चस्का लग गया था। सोचा था इस बार यूरोप नहीं तो कम से कम लंदन तो घूम ही आएंगे। लेकिन मुये कोरोना ने सब चौपट कर दिया।
मजे की बात यह भी सोच रहे कि पिछले साल जहां-जहां गए वहां-वहां अपनी-अपनी तरह के लफड़े हुए। पहले लेह-लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश हुए फिर चीन के लफड़े। हम पैंगोंग झील तक गए थे जिसके आगे कहीं झड़प हुई अभी चीन से। हमारे ड्रॉइवर लखपा ने बताया कि उस जगह से आगे ही बवाल हुआ जहां तक हम गए थे।
लेह के बाद अमेरिका गए थे। वहां कोरोना ने जबर लफड़ा मचाया। नवम्बर में हम गए थे वहां। लौटते ही बवाल हुआ। न्यूयार्क में सबसे ज्यादा घूमे हम। वहीं सबसे ज्यादा लोग हताहत हुए। हमको लगा कहीं कोई हम पर इल्जाम न लगा दे कि इनके आने के बाद लफड़ा हुआ -'जँह- जँह चरण पड़े सन्तन के , तंह-तंह बंटाधार।'
देश-दुनिया घूमने का बहुत मन है। देखिये कब पूरा होगा। फिलहाल तो सपनों में ही घूमते हुए काम चल रहा है। आपको भी घुमक्कड़ी के सपने आते हैं क्या ?

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Wednesday, July 08, 2020

रात -बातें खुद की खुद से

 हमारे सुपुत्र Anany जो कविता लिखते हैं तो उसका पाठ भी करते हैं। पिछले दिनों उन्होंने जो कविता लिखी उसको (अनन्य के खाते से और एक पेज की मार्फ़त जिस पर कविता साझा हुई) लगभग एक लाख लोगों ने देखा। कविता इंस्टाग्राम पर साझा की है अनन्य ने।

हम इसको यहां साझा कर रहे हैं। सुनिए-पढ़िए। बताइए अपनी राय अगर मन करे। 🙂
रात -बातें खुद की खुद से
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रातों को अक्सर
कुछ सफ़र किया करता हूं मैं
अंधेरा बहुत होता है बाहर
उससे बचने के लिये
कभी-कभी खुद से बातें किया करता हूं मैं।
एक रात भटकते-भटकते
एक लड़के से मुलाकात हुई
वह अपनी छाती पर हाथ रखकर
कुछ गुनगुना रहा था
पूछने पर पता चला कि
वह तो केवल अपने सीने के दर्द को
किसी तरह सुला रहा था।
बैठ गया बगल में
बोला सुना अपनी कहानी।
कहानी सुनोगे मेरी !
कौन सी कहानी सुनाऊं?
कई कहानियां हैं
जिनकी किताब तो मेरे हाथ में है
पर पन्ने मैं नहीं पलट पाता
नींद नहीं आती यार रातों को
अजीब सी बेचैनी होती है
ख्वाब मेरे तकिये पर सोते हैं
देर रात वाली बातें केवल करवटों से होती है।
१२ घंटे काम करता हूं
अपनी सांस भी महसूस नहीं होती
रात को तीन बजे
मेरे हाथ उसकी तस्वीर क्यों होती है
मेरी बालकनी में अकेलेपन की
एक लहर आती है
नाकामियों की व्हिस्की
रोज शाम मेरा ग्लास भर जाती है
टप्प,टप्प
बारिश से ज्यादा यह आवाज
अब आंसुओं से आती है
मां तेरी गोद की रोज
बहुत याद आती है।
सताती हैं मेरी उलझने
छटपटाता भी हूं
कोई हाल पूछता है
मुस्कराता भी हूं
थक गया हूं मैं
अब मुस्कराया नहीं जाता
टूट चुका हूं
अब खुद को उठाया नहीं जाता
उदासी का कारण भी पूछता है कोई
तो मुझसे कारण बताया नहीं जाता
लड़ने को तैयार हूं मैं
पर दुश्मन कौन है समझ ही नहीं आता।
कमी पता नहीं किसमें है
पर खुद के अलावा
किसी को दोषी ठहराया ही नहीं जाता
हाथ बढाता हूं खुद की मदद के लिये
सुना है इन्सान खुद ही खुद को बचाता है
पर खुद से इतना दूर जा चुका हूं
कि वह हाथ नजर ही नहीं आता।
कहानी बीच में रोककर
देखा उसने मेरी आंखों में
बोला – ’तू खो गया है’
’सो जा, मिलूंगा कल रात
अब बाहर उजाला हो गया है ।’
अनन्य शुक्ल

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Wednesday, July 01, 2020

'बेवकूफी का सौंदर्य 'कुछ पंच वाक्य Abhishek की नजर में

 [जैसे लोग आमतौर पर नहाते समय कपड़े उतार देते हैं वैसे ही गुस्से में लोग अपने विवेक और तर्क बुद्धि को किनारे कर देते हैं।]

आज "पंच कलेक्शन अधिकारी" अनूप शुक्ल की 'बेवकूफी का सौंदर्य से- --
- किसी भी बात पर फट से सहमत हो जाना समझदार होने का साइन बोर्ड है ।
- नाटक श्रृंगार रस की जान है। वीर रस तक बिना दिखावे के नहीं जमता आजकल। वीर रस के कवि को भी अपने चेहरे पर क्रोध का श्रंगार करना पड़ता है।
- कवि लोग श्रृंगार वर्णन में हमेशा सुरक्षित मार्ग अपनाते हैं। कभी सुंदरता की सीधे तारीफ नहीं की। घुमा फिरा कर बात कही। पूरे शरीर को टुकड़ों में बांटकर ऐसा माफिक बना दिया जैसे कि चोरी की कार को खोलकर कबाड़ी मार्केट वाले बना देते हैं।
- कवि होने के लिए शर्म से निजात पाना पहली आवश्यकता होती है।
- आर्कमिडीज की खोज को उसके नंगेपन ने पछाड़ दिया। स्वाभाविक भी है। दुनिया नंगे से डरती है।
- रिसर्च और विकास जैसे तमाम फालतू के खर्चे एडजस्ट करने के बहाने की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं।
- सबसे पहला होने की दौड़ आदमी को बदहवास कर देती है। वह नंगई पर उतर आता है।
- जिस दिन बॉस नहीं डांटता उस दिन लगता है कि कोई अनहोनी होने वाली है। बॉस की डांट हमारे लिए ट्रकों के आगे लटका हुआ नींबू, मिर्ची है। जिस दिन नहीं पड़ती लगता है कोई दुर्घटना होने वाली है।
- बॉस भी भोले भंडारी हैं.....किसी व्यक्ति को निराश नहीं करते ,जो उनसे मिलने आता है उसे डांट देते हैं।
- होने को तो यह भी हो सकता है कि कल कुछ चियरबालाओं और चीयरबालकों का ही जलवा हो। यह जलवा इतना तक हो सकता है कि वह कहें इन खिलाड़ियों को रखो , इनको बाहर करो तभी हम चियर करेंगे। अगर यह कॉमिनेशन रखेंगे तभी हमारा चियर इफेक्ट काम करेगा।
- कभी खिलाड़ी सफेद पोशाक में सभ्य लोगों की तरह खेलते थे। आज खिलाड़ी सफेद पोशाक नहीं पहनते हैं। वे ऐसी कोई हरकत भी नहीं करते जिससे उन पर सभ्य होने का इल्जाम लगाया जा सके।
- आज फटाफट क्रिकेट का जमाना है। मैच में लगने वाले चौको-छक्कों की संख्या देश में घपले घोटालों की तरह बढ़ रही है। जैसे देश में किसी भी योजना में कोई भी घपला हो सकता है, वैसे ही बल्लेबाज किसी भी गेंद पर छक्का मार देता है।
- भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां मीटिंगों की खेती होती है।
- मीटिंग से लोगों में मतभेद पैदा होते हैं। कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले पंजा लड़ाने लगते हैं।
- मीटिंग के बिना जीवन का उसी तरह कोई पूछवैया नहीं है, जिस तरह बिना घपले के स्कोप की सरकारी योजना को कोई हाथ नहीं लगाता।
- चंचला मीटिंग नखरीली होती है। इनमें मीटिंग के विषय को छोड़कर दुनिया भर की बातें होती है।
- हर काम सोच समझकर आम सहमति से कार्य करने वाले बिना समझे बूझे रोज मीटिंग करते हैं।
- स्पीड से से हड़बड़ी और हड़बड़ी से चेहरे पर व्यस्तता और तनाव झलकता है। अक्सर लोग यह सोचकर तनावग्रस्त रहते हैं कि उनके चेहरे पर तनाव के कोई लक्षण नहीं दिखते। लोहे को लोहा काटता है। तनाव जरूरी है तनाव से बचने के लिए।
- थूक कर चाटना हमारा राष्ट्रीय चरित्र हो या ना हो, पर ऐसा होने की बात लिखना मेरी भावुक मजबूरी है। राष्ट्र से नीचे किसी अन्य चीज पर मैं कुछ लिख नहीं पाता।
- कुछ विद्वानों का मत है कि थूक कर चाटना वैज्ञानिक प्रगति का परिचायक है। नैतिकता और चरित्र जैसी संक्रामक बीमारियों के डर से लोग थूक कर चाटने से डरते थे। अब वैज्ञानिक प्रगति के कारण इन संक्रामक बीमारियों पर काबू पाना संभव हो गया है ।
- एक राष्ट्रपति दूसरे देश में लोकतंत्र बहाल करने के लिए इतना चिंतित होता है कि उस देश को तहस-नहस कर देता है। दुनिया भर में शांति बहाल करने के लिए इतना चिंतित रहता है कि हर जगह अपने हथियार तैनात कर देता है।
- दुनिया जटिल हो रही है। लोगों की चिंताएं भी जटिल हो रही है। हर समय अंग्रेजी पूर्ण माहौल में रहने वाला हिंदी की स्थिति के लिए दुखी है। बात-बात पर गाली निकालने वाले को समाज में घटते भाईचारे की भावना चिंतित करती है।
- यदि चिंता थेरेपी को मान्यता मिल जाए तो सरकार की तमाम कमियां भगवान की कमियों की तरह छुप सकती हैं। जैसे ही चिंता थेरेपी को मान्यता मिली सरकार हर मौत के लिए कह सकेगी कि यह भूख से नहीं अन्य की कमी की चिंता से मरा है।
- जितने महान लोग हुए हैं दुनिया में, सब अपना काम अधूरा छोड़ कर गए हैं। उनके जाने के बाद केस बंद हो जाते हैं, वरना सब लोग नप जाते अपने काम में लापरवाही के चार्ज में।
- आज भले कोई हमें जाहिल, कामचोर, हरामखोर, देशद्रोही और भी न जाने क्या-क्या बताए, लेकिन हमें पता है कि हमारे छोड़े हुए कामों को ही पूरा करके अगली पीढ़ी महान कहलाएगी । दुनिया आज नहीं, लेकिन कल हमारी योगदान को पहचानेगी।
- दुनिया मे तमाम दूसरी चीजों के कोटे की तरह ही महानता की भी राशनिंग होती है। वही महान लोग एक दूसरे को धकिया कर खुद महानता की कुर्सी कब्जियाना चाहते हैं। इसीलिए आप जैसे ही महान बन जाए वैसे ही आप दूसरों के महानता के रास्ते में रोड़े अटकाना शुरू कर दें। इससे आप काफी दिन महान बने रह सकते हैं ।
- थोड़ी बेवकूफी मिलाकर चेहरे पर उत्सुकता का लेप किया जाए तो चेहरा ऐसा चमकता है कि उसका वर्णन बड़े-बड़े कवि तक नहीं कर पाते।
- सच्चे वह लोग हर जगह बोर होने की वजह तलाशते हैं। काम करते हैं तो काम से बोर हो जाते हैं। आरामतलब है तो आराम से बोर हो जाते हैं। सुखी है तो सुख से बोर हो जाते हैं। दुखी है तो दुख से बोर हो गए। देश प्रेमी है तो देश की दशा देख कर बोर हो लिए। - चोर चोरी से बोर हो उठता है तो डाका डाले लगता है। डकैती से बोर होता तो माफिया बन जाता है। माफियारी से बोर होता है तो नेतागीरी करता है। नेतागीरी से बोर होकर मंत्री गिरी करने लगता है।
- आदमी आपस में प्यार से रहते रहते बोर हो जाता है तो लड़ने लगता है। लड़ने से बोर होता है तो दंगा करने लगता है। दंगे से होता है तो शांति अपना लेता है। शांति से बोर हुआ तो आतंकवाद अपना लेता है।
- लोग दूसरे का लिखा पढ़ते-पढ़ते बोर हो जाते हैं तो खुद लिखने लगते हैं। लिखते पढ़ते बोर हो गए तो आलोचना करने लगते हैं। आलोचना से बोर हो गए तो तारीफ करने लगते हैं। तारीफ करते करते बोर हुए तो बुराई करने लगते हैं। बुराई से बोर हुए तो लड़ाई करनी है।
- साहब गुस्से के लिए कभी किसी बात के मोहताज नहीं रहे। जब मन आया कर लिया। कभी-कभी तो बेमन से भी गुस्से के पाले में कबड्डी खेलने लगते हैं।
- गुस्से की गर्मी से अकल कपूर की तरह उड़ जाती है।
- अगर लोगों के गुस्से के दौरान निकलने वाली ऊर्जा को बिजली ने बदला जा सके तो तमाम घरों की बिजली की समस्याएं दूर हो जाए। जैसे ही कोई गुस्से में दिखा उसके मुंह में पोर्टेबल टरबाइन और जनरेटर सटा दिया। दनादन बिजली बनने लगी।
- जैसे लोग आमतौर पर नहाते समय कपड़े उतार देते हैं वैसे ही गुस्से में लोग अपने विवेक और तर्क बुद्धि को किनारे कर देते हैं। कुछ लोगों का तो गुस्सा ही तर्क की सील टूटने के बाद शुरू होता है।
- सड़क पर जाम सभ्य समाज की अपरिहार्य स्थिति है। वह समाज पिछड़ा हुआ माना जाता है , जहां ट्रैफिक जाम नहीं होता। बिनु जाम सब सून।
- इवेंट मैनेजमेंट की तरह ही विश्वविद्यालयों में जाम मैनेजमेंट की कक्षाएं शुरू होनी चाहिए।
- भाषण के शौकीन लोग जगह-जगह लगे जाम को संबोधित करके अपने शौक पूरे कर सकते हैं। जनप्रतिनिधि बिना पैसे के सिर्फ जाम की जगह पर माइक लगाकर अपने समर्थन की अपील कर सकता है।
- राजनीति में दूसरे क्षेत्रों के छठे हुए लोग आते हैं। तपे तपाए जनसेवक, कट्टर धर्माचार्य, छटा हुआ गुंडा, पका हुआ माफिया, व्यापारी, रिटायर्ड नौकरशाह राजनीति में इसलिए आता है कि सुकून से देश सेवा कर सके। अपनी इधर उधर की कमाई को हिल्ले लगा सके। राजनीति इनका अभयारण्य होती है सुरक्षा की गारंटी होती है।
- अरबों खरबों की योजनाओं की चक्की चलाते राजनेता के पास सौ पचास करोड़ जमा हो जाए तो उसका क्या दोष ? पानी ले जाने वाले लोहे के पाइप तक की सतह गीली हो जाती है। क्या पाइप का भ्रष्टाचार कहेंगे?
- आज की राजनीति को बाजार ही चलाता है। बाजार के दीगर सामानों की तरह राजनेताओं की भी कीमत होती है। खरीद-फरोख्त होती है। मोलभाव होते हैं इसलिए राजनेताओं को अपने भले के लिए अपनी संपत्ति में फैक्टर आफ सेफ्टी लगाना चाहिए।
- जनता जिनको बहुमत से चुन रही है, फिर उनको कैसे अपराधी घोषित कर सकते हैं? पागल , अपराधी और दिवालिया होना योग्यता नहीं है। घोषित होना योग्यता है।
- देश बेचारा देश सेवा का ठेका हासिल करने के लिए जूझ रहे ठेकेदारों को देख रहा है। वह जानता है बैनर और नाम भले अलग दिखे लेकिन असल में सब ठेकेदार एक सरीखे हैं।
- लैपटॉप तो चुनाव घोषणा पत्र में होना ही चाहिए। दूल्हा चाहे गधा, गोबर, गणेश हो लेकिन दहेज में उसको गाड़ी तो चाहिए ही चाहिए। बाकी तो ससुर कहते हैं कि दुल्हन भले ना मिले लेकिन शादी में गाड़ी जरूर मिले।
- चुनाव भावुकता से नहीं लड़ जाते। घोषणा पत्र में भावुकता दिखेगी तो जनता समझेगी यह राज नेता नहीं है। घोषणा पत्र लिखना कोई कविता लिखना नहीं है कि जो मनाया ठेल दिया।
- किताब छपते ही लेखक फल से लदे हुए वृक्ष की भांति विनम्र हो जाता है। भाषा मुलायम। उसकी भाषा में विनम्रता का सॉफ्टवेयर फिट हो जाता।
- किताब छपते ही आपको अपने दोस्त-दुश्मन पहचानने की अक्ल आ जाती है।
- किताबें छपवाने की प्रक्रिया बेटी के विवाह का पूर्वाभ्यास है। सब करम हो जाते हैं अपना लिखा हुआ छपवाने में। रचनाओं के लिए प्रकाशक खोजना बेटी के लिए वर ख़ोजना जैसा है।
- किताब छपने के बाद प्रकाशक और लेखक का झगड़ा भी आम बात है। कुछ सज्जन लेखक या प्रकाशक निज मन की व्यथा समझकर मन में छुपा लेते हैं। लेकिन स्वच्छंद की छीछालेदरी अभिव्यक्ति के हिमायती सारे लफड़े या झगड़े को सारी जनता के सामने छिछिया देते हैं।
- किताब का विमोचन करना करवाना भी एक कला है। कुछ लेखक तो इस मामले में आत्मनिर्भर होते हैं। किताब साथ लेकर चलते हैं। जहां भीड़ दिखी, किताब सीने से चिपका कर फोटो खींच ली और खबर छपा दी - खचाखच भीड़ में विमोचन।
- अगर आपकी किताब पर कोई इनाम मिल चुका है तो समाज की किसी भी समस्या के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करते हुए इनाम वापस करने की घोषणा कर सकते हैं।
- किताब छपने के बाद कौन साहायक रहा और कौन प्रेरणादायक, यह बताना किसी गठबंधन सरकार के मंत्रिमंडल के सदस्य चुनने सरीखा जटिल काम है। जिस को भूल जाओ वह नाराज। जिसको याद करो वह भी नाराजगी उसको श्रेय मिला लेकिन कम मिला। किसी को यह दुख कि उसके पहले किसी दूसरे को ज्यादा भाव दे दिया।
इति

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