Saturday, March 30, 2019

नींद

 

चाहे सृजन की हो

चाहे भजन की हो
थकन की नींद एक है।
किसी को कुछ दोष क्या
किसी को कुछ होश क्या
अभी तो और थकना है।

-स्व रमानाथ अवस्थी





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Friday, March 29, 2019

एक का मलबा दूसरे के नींव



सुबह की बात ही कुछ और होती है। शहर अंगड़ाई लेते हुए उठ गया। बच्चे स्कूल की तरफ लपक लिए। बड़े दिहाडी कमाने निकल लिए।
एक बुजुर्ग रिक्शे वाला एक महिला को ले जा रहा है। महिला अकड़ के साथ बैठी है। रिक्शा वाला सर झुकाए रिक्शा खींच रहा है। दोनों की आर्थिक स्थिति एक जैसी है। लेकिन बैठने और खींचने की स्थिति ने दोनों की मुखमुद्रा अलग कर दी।
नुक्कड़ पर नाई अपने ग्राहक की दाढ़ी गीली कर रहा है।गाल सहलाते हुए पहले पानी से । फिर से साबुन से। इसके बाद छीलेगा। सहलाने, गीला करने के बाद छीलने में दर्द नहीं होता। बाजार की ताकतें ग्राहकों को इसी तरह छीलती हैं।
सड़क पार दो पिल्ले एक कपड़े के चिथड़े को मुंह में दबाए एक -दूसरे से छीनने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों के दांत शायद अभी दूध के हैं। इसलिए कपड़ा फटा नहीं है। दोनों पिल्ले कपड़ा अपनी-अपनी तरफ खींच रहे हैं। कुछ देर में एक पिल्ला कपड़ा छोड़कर फूट लिया। कपड़ा दूसरे के दांत में लत्ते की तरह लटक गया। वह भी उस लत्ते को वहीं छोड़ इधर-उधर लोटने लगा।

पिल्लों की हरकतें प्राइम टाइम के बहसवीरों जैसी लगीं। कुछ देर एक मुद्दे पर को अलग-अलग खींचना। बहस बाद मुद्दे को लत्ते की तरह छोड़कर नई बहस के लिए निकल लेना।
बगल में एक बच्चा ऊपर कमीज पहने और नीचे से दिगम्बर पिल्लों की कुश्ती कौतूहल से देख रहा था। अधनंगा बच्चा चुनाव के समय दो धुर विरोधी पार्टियों के गठबंधन सरीखा लग रहा था। जैसे एक कपड़े वाली पार्टी ने किसी दिगम्बर दल से गठबंधन करके अधनंगा गठबंधन कर लिया है।
कुछ बच्चे सीवर लाइन का ढक्कन खोले उसमें से गंदगी फावड़े से निकालकर सड़क पर जमा कर रहे थे। सीवर बजबजा रहा था। जाम सीवर को चालू करने की कोशिश कर रहे थे बच्चे। आगे देखा कई जगह ऐसे सीवर खुले पड़े थे।
बजबजाते सीवर के बगल की चाय की दुकान में एक आदमी चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहा था।भारत ने अंतरिक्ष में अपना उपग्रह मार गिराया।

सुरेश अपनी दुकान पर टहल रहे थे। कई रिक्शे खड़े थे। बताया कि रिक्शेवाले होली में घर गये हैं। छुट्टी बाद आएंगे तब रिक्शे चलेंगे।
गुप्ता जी सड़क पर बैठे ग्लास की चाय में डबल रोटी भिगोकर खा रहे थे। चश्मा बनवा लिया है। ढाई सौ का बना। तबियत के बारे में बताया -'जिंदा हैं। हर बीमारी से बच जाते हैं। लगता है अभी और जीना है।'
गुप्ता जी का बच्चा साइकिल की दुकान छोड़कर अभी ककड़ी-खीरा बेंच रहा है।
गंगा पुल से देखा सूरज भाई चमक रहे थे। देखते-देखते गंगा में कूद गए। नहाकर हर हर गंगे कहते हुए निकलेंगे।नदी में नावें सामान इधर-उधर कर रहीं थीं। नदी का पानी हिलते-डुलते नाव को टाटा कर रहा है। हैप्पी जर्नी बोल रहा है।
सामने एक खड़खड़े में किसी मकान का मलवा लेकर लड़का शुक्लागंज की तरफ जा रहा था। किसे गिरे हुए मकान का मलवा किसी दूसरे मकान की नींव में लगे। एक के मलवे से दूसरे के लिए नींव बनता है।
सुबह हो गयी।

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Thursday, March 28, 2019

तन पर नहीं लत्ता-पान खाएं अलबत्ता


रिक्शे वाले घर गए हैं। होली पर। त्योहार मनाने। अगले हफ्ते आएंगे। रिक्शा मालिक सुरेश ने जानकारी दी।

रिक्शे भी आराम फरमा हैं। तसल्ली से धूप सेंकते हुए। शरीफ बच्चों की तरह दीवार की तरफ मुंह कोई लाइन से खड़े हैं। जिन रिक्शों के पुर्जे ढीले हैं, जिनकी बियरिंग घिसी हुई है वे खुश टाइप दिख रहे हैं। कुछ तो आराम मिला खटर-पटर-खट से।
एक रिक्शे अलग दिखने की कोशिश में चलने की मुद्रा में खड़ा है। शायद नाटक कर रहा कि छुट्टी है लेकिन चलने को तैयार है। बदमाश है। रंगमंच दिवस था कल। लगता इस पर भी नाटक का नशा चर्राया है। अपने को बड़ा खलीफा समझ रहा। भले साल भर बाद पुर्जे-पुर्जे हो जाये। लेकिन अभी चरस बोए पड़े हैं।
कहावत है न -तन पर नहीं लत्ता, पान खाएं अलबत्ता।

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Wednesday, March 27, 2019

बगीचे में कबड्डी खेलती हुई, झूला झूलती सुबह की धूप

 बगीचे में कबड्डी खेलती हुई, झूला झूलती सुबह की धूप। शायद स्कूल बंद है आज धूप का।


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मार्गदर्शक मंडल में शामिल पत्तियां

 



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धूप-छाँह का गठबंधन

 


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Sunday, March 24, 2019

दिमाग में भूसा


 भूसे की बिक्री पता नहीं बढ़ी कि नहीं। लेकिन दुकान तो खुली है। आपको पता ही है कि खाने के काम आने के अलावा भरने के काम भी आता है भूसा। बचपन से बहुत लोगों से अपने लिए सुना है -'तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है।' कुछ लोगों ने प्रेमबस खाल में भूसा भरवाने का आश्वासन भी दिया लेकिन चुनावी वादों की तरह पूरा नहीं किया।

वैसे दिमाग में भरे भूसे और खाल में भरे जाने वाले में कोई मुकाबला नहीं होता। दिमाग वाला भूसा शरीर के साथ आता है। असली होता है। भरे जाने वाला भूसा तो हर गेंहू के खेत में मिलता है। दिमाग वाला भूसा शुद्घ होता है। देशी घी की तरह। खाल में भरा जाने वाला भूसा उतना असली नहीं होता। डालडा की तरह होता है। दिमाग वाला भूसा चौबीस कैरेट वाले सोने की तरह होता है। दूसरा वाला सोने की पॉलिश वाला नकली गहना होता है।
कुदरत जिनके दिमाग में भूसा भरकर भेजती है उनके प्रति उसके मन में अतिरिक्त वात्सल्य होता है। जब कभी अक्ल पर पत्थर पड़ते हैं तो दिमाग में भरा कुदरती भूसा अक्ल और पत्थर दोनों को टूट-फूट से बचाता है। इसलिए दिमाग में भरा कुदरती भूसा इंसान की सुरक्षा के लिए होता है।
भूसे के बढ़े दाम सुनकर मन किया कि दिमाग का भूसा निकालकर यहीं बेंच दें। कुछ आमदनी हो जाएगी। दिमाग की खाली जगह किसी दूसरे कूड़े को किराये पर उठा देंगे। लेकिन फिर ख्याल आया चुनाव के समय दाम और बढ़ेंगे तब निकालेंगे। और बढिया दाम मिलेंगे।
आज दुकान बंद दिखी। लगता है भूसे के दाम लुढ़क गए। उस दिन बेंच लिए होते। लेकिन लालच में मारे गए। साफ पता लगता है कि दिमाग में भरा भूसा असली और असरकारक है।

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अनूप शुक्ल बेबाकी से अपनी बात रखते हैं - प्रेम जनमेजय

प्रेम जनमेजय जी द्वारा पुस्तक मेले के मौके पर एक ’जबरियन टाइप’ करवाई गयी तारीफ़। सामने किताब और माइक , बगल में लेखक और पुस्तक मेले का सहज खुशनुमा माहौल ने मिलकर प्रेम जी में अतिरिक्त उद्दात्ता का संचार कर दिया और उन्होंने जो कहा वह यहां पेश है। ’बुरा न मानो होली है’ के बहाने।

🙂
पहले तो अनूप को बहुत बहुत बधाई। क्या है कि अक्सर इनकी सक्रियता सोशल मीडिया पर देखता हूं तो सोचता हूं कि इनकी सक्रियता किताबों पर उतरकर कब आयेगी? उसका कारण क्या है कि ये बेबाकी से अपनी बात कहते हैं। ये कभी अपनी रचनाओं में या कभी-कभी टिप्पणी में कभी सोचता नहीं है कि कोई व्यक्ति इससे नाराज तो नहीं हो जायेगा और व्यंग्य की सबसे बड़ी शर्त यही होती है कि जब आप यह सोचते हैं कि कोई व्यक्ति आपसे नाराज नहीं हो जायेगा वहीं आप अपने व्यंग्य को भोथरा करना शुरु कर देते हैं अन्यथा आप कबीर होकर व्यंग्य करते हैं , कह देते हैं उसके बाद प्रतिक्रिया जो आती है (आती रहे)।
अनूप की रचनाओं में मैंने यही देखा है। यह जो इनका व्यंग्य संकलन है – ’सूरज की मिस्ड कॉल’ इसका नाम ही एक अलग तरह का है। भाई सुभाष Subhash Chander ने जैसा कहा एक पठनीयता है। वह पठनीयता तभी आ पाती है जब आपकी सोच जो है रचना की हो। अन्यथा अगर आपकी सोच टिप्पणी की हो कि इस चीज पर टिप्पणी मुझे करनी है तो वह रचनात्मकता उसमें नहीं आयेगी। रचनात्मकता आने पर ही व्यंग्य भी उसमें आयेगा, हास्य भी आयेगा । रचना साहित्य की दृष्टि से पहले रचना होनी चाहिये उसके बाद ही वह व्यंग्य , कहानी कविता या कुछ बनती है। इसीलिये अनूप को पढना मुझे अच्छा लगता है कि मुझे लगता है कि मैं एक अच्छी रचना पढ रहा हूं। मैं बधाई देता हूं। विस्तार से इस दुल्हन के बारे में, जिसका घूंघट आज उधाड़ा गया है, विस्तार पढूंगा और कहूंगा क्योंकि कहना मुझे अच्छा लगता है।
इन्होंने अभी एक किताब और सम्पादित की थी Alok Puranik पर – ’आलोक पुराणिक-व्यंग्य का एटीएम’ वह बहुत महत्वपूर्ण काम है। मुझे अच्छा लगा कि इन्होंने मुझसे उसमें लिखवा भी लिया। लिखकर भी अच्छा लगा। हम लोगों का तो ऐसा है कि कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जो प्रतिबंधित हो। ये अगर किसी काम में जुट जाते हैं तो उसे खत्म करके ही छोड़ते हैं। इनकी खास बात है, अभी एक संकलन आया है चहलकदमियां, तो व्यंग्य में इनकी चहलकदमियां बहुत अच्छी लगती हैं। मैं बधाई देता हूं।
सूचना: आलोक पुराणिक जी के बारे में लिखी जिस किताब का जिक्र यहां हुआ वह आलोक पुराणिक जी के ५१ वें जन्मदिन के मौके पर तैयार की गयी। इसमें उनके घरवालों, मित्रों, प्रशंसकों, आलोचकों के लेख, आलोक पुराणिक जी को व्यंग्य यात्रा सम्मान मिलने की अविकल रिपोर्टिंग , आलोक पुराणिक जी के साक्षात्कार और आलोक जी की चुनिंदा रचनायें और शेरो शायरियां संकलित हैं। पन्द्रह-बीस दिन की मेहनत में तैयार की गई २९५ पेज की यह किताब आलोक पुराणिक के बारे में शोध करने वालों के लिये बहुत उपयोगी है। किताब रुझान प्रकाशन से आई है। लिंक यह रहा।
और जिस किताब का जिक्र करते हुए बात की प्रेम जी ने -' सूरज की मिस्ड कॉल' उसका लिंक नीचे दिया है। इस पुस्तक पर उप्र हिंदी संस्थान का वर्ष 2017 का सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ' अज्ञेय' सम्मान भी मिला। http://rujhaanpublications.com/product/suraj-ki-missed-call/

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Saturday, March 23, 2019

खाली हीरोगिरी से थोड़ी होता है काम


सुबह टहलने निकले। एक दुकान पर एक भाई पुराने कबाड़ को हिल्ले लगा रहे थे। कोल्ड ड्रिंक के खाली डब्बों को हथौड़ी से पिचकाकर पतला कर रहे थे। फ़ूले हुये डब्बे हथौड़ी के नीचे आकर बराबर हो जा रहे थे। एक तरह से डब्बों का अंतिम संस्कार हो रहा था। डब्बे कभी अपने अंदर कोल्ड ड्रिंक समेटे किसी दुकान की फ़्रिज में दरबारियों, मंत्रियों, संत्रियों की तरह अकड़े बैठे होंगे। अंदर की माल निकल जाने के बाद उनके हाल उन उम्रदराज सांसदों जैसे हो गये हैं जिनको लगातार जीतने के बाद भी अगले चुनाव का टिकट न मिले।

कभी फ़ूले-फ़ूले, फ़्रिजों के वातानुकूलित माहौल में रहने वाले डब्बे हथौड़े द्वारा पिचकाये जाने के बाद फ़र्श में इधर-उधर पड़े हुये हैं। इसीलिये कहा गया -समय होत बलवान। अपनी औकात पर किसी को ज्यादा गर्व नहीं करना चाहिये।

डब्बों को पचकाकर ठिकाने लगाने के बाद कबाड़ी ने तारों पर हथौड़ा चलाना शुरु किया। हथौड़े की चोट से तार को अधमरा किया। इससे उसके ऊपर की प्लास्टिक ने अन्दर के तांबे/अल्युमिनियम का साथ छोड़ दिया। प्लास्टिक के साथ छोड़ते ही उसने तांबा निकालकर अलग कर दिया। प्लास्टिक को अलग फ़ेंक दिया। महीनों साथ रहने वाली प्लास्टिक और ताबां अलग-अलग पड़े एक दूसरे को फ़टी आंखों से निहारते रहे। कबाड़ी उनके दुख से निस्संग बाकी बचे सामान पर हथौड़ा चलाता रहा।
बीच-बीच में अपने मुंह के मसाले को मिसाइल तरह फ़ेंकते हुये अपने सामने की जमीन को लाल करता रहा।
सड़क किनारे कुछ लड़के एक लकड़ी के तने पर कालीदास सरीखे बैठे उसको कटते देख रहे थे। कभी कालीदास जिस पेड़ पर बैठे थे उसे काटते पाये गये थे। आज के बच्चों ने यह काम दूसरों को आउटसोर्श कर दिया है। लकड़ी का तना पास से घसीटकर लाये हैं। होली जलाने के लिये। आरे से काटकर तने के टुकड़े कर रहे हैं। तना मोटा है। आरा अन्दर जाकर बहक जाता है। कट नहीं पाता तना।
कुछ देर बाद लौटकर देखते हैं तो लकड़ी के तने को अधकटा छोड़कर बच्चे चले गये हैं। पास बैठा मोची कहता है- ’कभी काम किया हो तो काटें। खाली हीरोगीरी से थोड़ी होता है काम।’
हमें लगा यह बात हमारे लिये भी लागू होती है। लिखना-विखना आता नहीं , खाली गिटर-पिटर करने से थोड़ी होता है कुछ !

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Monday, March 18, 2019

वाटिका में होली


होली की शुरुआत लफ़ड़े से हुई। बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे। अन्दर लैंडलाइन फ़ोन बजा। उठाने गये तब तक कट गया। शायद किसी ने ’हैप्पी होली’ बोलने के लिये फ़ोनियाया होगा। वापस लौटे तब तक बन्दरों की ’सर्जिकल स्ट्राइक’ हो गयी थी। चाय का कप, पानी का ग्लास, बिस्कुट का पैकेट उलट, पुलट और लुट गये। ताजे अखबार के हाल अमेरिकन बमबारी में छतविक्षत अफ़गानिस्तान सरीखे हो गये।

हमने एक बार फ़िर खुद को बरामदा खुला छोड़ने के लिये कोसा। बन्दरों की कड़ी निन्दा करने का निर्णय लिया। इसके बाद ’सर्जिकल बर्बादी’ का फ़ोटो लेने के लिये मोबाइल निकालने के लिये घुटन्ने की जेब में हाथ डाला। मोबाइल नदारद। दूसरी जेब टटोली। वहां से भी गोल। फ़िर पहले तो हमारे हाथों के तोते और उसके बाद होश भी उड़ गये। इसके बाद जल्दी-जल्दी , बारी-बारी अपनी दोनों जेबों में कई बार हाथ डाले। तेजी के चक्कर में हथेली गर्मा गयी लेकिन मोबाइल मिलकर न दिया।
इस बीच लगा शायद मोबाइल अन्दर ले गये हों। इस ख्याल से सुकून मिलने के पहले ही सामने पड़ा मोबाइल कवर दिख गया। लुटा-पिटा कवर मोबाइल के अपहरण की कहानी बयान कर रहा था। मासूम मोबाइल बन्दर के हाथ लग गया था। हमारे अलावा किसी पराये हाथ की छुअन का भी उसको अनुभव नहीं था। बेचारा मोबाइल न कहीं आया था, न कहीं गया था। हाथ से जेब, जेब से मेज, मेज से हाथ तक ही आना-जाना था। इसके अलावा चार्जिंग के लिये बिजली के स्विच तक जाने का ही अनुभव था बच्चे का। सर्विस सेन्टर तक का मुंह नहीं देखा था अब तक। ऐसे कुंआरे मोबाइल को बन्दर उठा ले गये। न जाने क्या बदसलूकी की हो बेचारे के साथ।
इस बीच अपन का उड़ा हुआ होश वापस आ गया। हमने अपहृत मोबाइल को वापस हासिल करने की कोशिश शुरु की। बन्दर छत पर से होते हुये दीवार फ़ांद कर बगल के मैदान में शायद हमारे मोबाइल का अपहरण सेलिब्रेट कर रहे थे। क्या पता अपने टीवी चैनलों पर दिखा भी रहे हों –’ये देखो, जिन्दा मोबाइल बन्दरों की सीमा में घुसपैठ करते पकड़ा गया।’
हम मैदान तक पहुंचने के लिये सड़क की ओर भागे। भागते समय सांसो ने उखड़ते हुये सीने से समर्थन वापसी की धमकी दी। हम धीमे हो गये। भागने की जगह लपकने लगे। रास्ते के कुत्ते भी हमारे साथ हो लिये। कुछ पीछे से भौंक-भौंककर हमारी गति बढाने की कोशिश कर रहे थे। कुछ हमारे आगे भौंकते हुये ’पायलट कुत्ते’ बन गये। एक बुजुर्ग कुत्ता दीवार के साथ सटा खड़ा सांसों को अन्दर-बाहर करते हुये कपालभाती जैसा कुछ कर रहा था। सामने से एक कुत्ता मुंह में मरा हुआ चूहा मुंह में दबाये किसी मध्यकाल के वीर सरीखा चला आ रहा था। उसके साथ के कुत्ते उसकी वीरता के गुणगान जैसे करते चले आ रहे थे। मन किया कुत्तों से पूछे , ’भाई साहब क्या आपने किसी बन्दर को हमारा मोबाइल ले जाते देखा?’ लेकिन भाषाई अड़चन के चलते पूछ नहीं पाये।
हम मैदान के गेट तक पहुंच गये। सोचा अन्दर ’बंदरबाटिका’ में मोबाइल खोजेंगे। लेकिन गेट पर बड़ा सा ताला लगा था। मैदान खुला नहीं था। हम उल्टेपांव वापस लौटे। दूसरे रास्ते मैदान जाने की सोची।
लौटते हुये जितनी तेजी से पैर चल रहे थे उससे कई गुना तेजी से दिमाग भाग रहा था। सोचने लगे कि जिस बन्दर के हाथ मोबाइल पड़ा वह मेरा मोबाइल देख रहा होगा। क्या पता किसी को फ़ोन मिलाकर खौखियाते हुये बतिया रहा हो और उधर से हमारा दोस्त/सहेली हमारा नाम लेकर हड़का रहा हो कि यह क्या बंदरों जैसी हरकतें कर रहे हो। इस पर वह और बन्दरपने पर उतर आया हो। और जोर से खौखियाने लगा हो। किसी को अपनी सेल्फ़ी भेज दी हो। मेरे सारे संदेशे पढ़ लिये हों। एक के संदेश दूसरे को फ़ार्वड कर दिये हो।
हमने मन को बहुत समझाने की कोशिश की। मोबाइल बन्दर ले गया है कोई आदमी थोड़ी ले गया जो इतना हलकान हो रहे हो। लेकिन मन माना नहीं। उसने दिल से गठबन्धन कर लिया। दोनों मिलकर तेज-तेज धड़कने लगे। देखा-देखी टांगे भी तेज चलने लगीं।
हम स्कूल की दीवार फ़ांदते हुये मैदान के पास पहुंचे। वहां बंदर आम सभा टाइप करते हुये धूप सेंक रहे थे। कुछ बंदरियां एक-दूसरे के जुंये बीन रहीं थीं। कुछ अपने सीने से बच्चों को सटाये दुलरा रहीं थीं। कुछ बंदर लोग आसपास से उठाकर लाई हुई चीजें कुतर-कुतरकर फ़ेंकते जा रहे थे। बंदर और बंदरिया बंदरजात दिगम्बर बैठे थे। लेकिन मजाल कोई किसी को छेड़ता दिखा हो। न ही कोई बन्दर किसी बंदरिया को घूरता दिखा। एक बारगी हम अपने मोबाइल के बारे में भूल कर सोचने लगे कि काश आदमी और औरत भी साथ में इतनी तसल्ली से रह पाते।
इस बीच अपन एक दूसरे मोबाइल से अपने मोबाइल पर घंटी बजाते जा रहे थे। यह सोचते हुये कि जैसे ही कोई बन्दर-’ हल्लो, हू इज स्पीकिंग ?’ बोलेगा हम उससे फ़ौरन कहेंगे – ’भाई साहब, हमारा मोबाइल वापस कर दो। एकलौता मोबाइल है मेरा। जो कहोगे फ़िरौती देने के लिये हम तैयार हैं।’
हमको यह भी लगा कि क्या पता मोबाइल बजने से हाथ झनझना जाये बन्दर का और वह मोबाइल छोड़ दे। लेकिन यह भी लगा छोड़ते समय किसी ऊंची जगह न हो जिससे नीचे आने तक मोबाइल की हड्डी-पसली बराबर हो जाये।
मैदान पहुंचकर हमने घास, झाड़ियां, नालियां सब देख डालीं। कहीं मोबाइल न दिखा। हमने सोचा अब अंतत: निराश होने का समय हो गया। तब तक सूरज भाई दिख गये। उन्होंने हमारे चेहरे की पसीने की बूंदों पर किरणें गुलाल की तरह पोत दीं। इसके बाद हम कुछ कहें तब तक बगल के नाली की तरफ़ किरणों की सर्चलाइट फ़ेंकी। देखा कि वहां हमारा मोबाइल किसी शराबी सरीखा कीचड़ में धुत्त पड़ा था। हमने लपककर अपने मोबाइल को उठाया। प्यार के अतिरेक में मोबाइल को चूमने के लिये मुंह आगे बढाया लेकिन स्क्रीन पर कीचड़ लिपटा देखकर ठिठक गये। पहले कीचड़ मैदान की घास में पोछा, फ़िर कागज से । इसके बाद बरमूडा की जेब से रगड़कर साफ़ किया। इस बीच मोबाइल चूमने का ख्याल हवा हो गया।
मोबाइल वापस लेकर विजयदर्प में चूर घर लौटे। लौटते हुये अपनी अकल की दाद देने की बेवकूफ़ी करते रहे। बन्दरों ने सुबह-सुबह हलकान कर दिया था। हमको उन पर बहुत तेज गुस्सा आ रहा था। उसी समय यह भी लगा कि क्या पता मोबाइल ले जाने वाला बन्दर न होकर कोई बंदरिया रही हो। सोचते ही हमारा गुस्सा कुछ कम हो गया। हम उनके खिलाफ़ एक्शन लेने की सोच ही रहे थे तब तक सामने टीन की छतपर धमाचौकड़ी करते हुये बन्दर दिखे। हमने मारे गुस्से के उन पर ढेले की मिसाइल फ़ेकने के लिये हाथ में ले ली। तब तक एक बन्दर ने दांत चियारते हुये हमको वापस घुड़क दिया। शायद कह रहा था- ’बुरा न मानो होली है।’
लाउडस्पीकर पर गाना बज रहा है-’रंग बरसे भीगे चुनर वाली
अनूप शुक्ल, कानपुर।

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Sunday, March 17, 2019

अबकी बार, कबाड़ की सरकार

 


फुटपाथ पर दीवार से सटा कबाड़ शायद चुनावी मूड में है। अलग-अलग तरह के कबाड़ मिलकर गठबंधन जैसा बनाते लगे। इस कबाड़ में खटारा स्कूटर है, पुरानी प्लास्टिक की कुर्सी है, सड़ा प्लाईबोर्ड है, पुरानी गद्दी है, पुराना कूलर का डब्बा है। पास की दीवार पर सूखता पैबन्द लगा, फटा-पुराना टाट इस कबाड़ गठबंधन को बाहर से समर्थन देता लग रहा है।

क्या पता कबाड़ की दुनिया में चुनाव होते हों। अगर ऐसा होता होगा तो यह 'कबाड़-गठबंधन' भी क्या पता इकट्ठा होकर नारा लगा रहा हो- 'अबकी बार, कबाड़ सरकार' , 'सबको परखा बार-बार, हमको परखो अबकी बार।'
दीवार पर मिट से गए इश्तहार में लिखा है- 'पुरानी से पुरानी बबासीर एक ही इंजेक्शन में झटके से गायब।' कबाड़ की भीड़ भी ने शायद इसीलिए विज्ञापन के बगल में फोटो सेशन किया है ताकि बिना कहे कह सके -'हमारी सरकार बनते ही सब लफड़े झटके से गायब हो जाएंगे।' झमेले बचे रहने पर यह कहने को बचा रहे -'वो तो दीवार में लिखा था। हम थोड़े ही ऐसा कह रहे थे।'

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पहिया विहीन कार

 


कारों की दुनिया में इस एक पहिया विहीन कार को क्या कहेंगे? 'तैमूर लंग कार' या फिर ' दिव्यांग कार' ? पिछली बत्ती भी गुल है कार की । मतलब कार 'दृष्टि बाधित' भी है। कोई इसे मार्गदर्शक कार भी कहना चाहेगा। कभी सड़क पर फर्राटा भरती कार को आज सड़क किनारे फुटपाथ पर अकेली खड़ी देखकर जो लगा वह हम बताएंगे लेकिन पहले आपको कैसा लगा, आप बताइए।

हमारे एक मित्र ने नाम बताने की शर्त के साथ अपनी राय जाहिर की है कि यह निकला हुआ पहिया किसी दूसरी कार की स्टेपनी बनकर उसकी सरकार बनवाने में सहयोग करने गया है। जैसे ही वह कार चलने लगेगी वैसे ही यह अपनी सहेली कील की सहायता से कार के किसी पहिये को पंक्चर करवा के उसकी जगह ले लगा। 🙂

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Friday, March 15, 2019

पेंदा नहीं है



कबाड़ी ठेले पर कबाड़ लादे जा रहा था। ऊपर प्लास्टिक की कुर्सियां और प्लास्टिक की बिन्स। गन्ने की दुकान वाले ने शायद कूड़ेदान के लिए प्लास्टिक की डलिया के दाम पूछे।
'पेंदा नहीं है उनमें' - कबाड़ी ने ठिलिया को धकियाते हुए बताया।
कूड़ेदान भी बिना पेंदे का बेकाम होता है। हम लोग इधर-उधर लुढ़कते-पुढकते बेपेंदी के जनप्रतिनिधियों से काम चला रहे हैं। खराब चीजों से काम चलाने की हमारी क्षमता जबरदस्त है। कूड़े से बिजली तो तमाम देश बना लेते हैं। हम कबाड़ हुए प्रतिनिधियों से भी अपना काम चला लेते हैं।
गन्ने की दुकान पर रस पीते हुए हमने मोटरसाइकल पर बगल में रस पीते नौजवान जोड़े को देखा। लड़की शायद गर्मी से बचने के लिए पूरा चेहरा ढंके थी। लड़का खुल्ला मुंह। गर्मी भी लिंग भेद करती है।
मोटरसाइकल की प्लेट पर UP70 लिखा था। पता चला इलाहाबाद का नम्बर है। कानपुर का नम्बर UP78 होता है। इसी बतकही को आगे बढ़ाते हुए पांच सात मिनट हो गए। गन्ने का रस 10 रुपये का पड़ा।
एक टेलर अपनी सिलाई मशीन सड़क किनारे धरे सिलाई में मशगूल था। एक लड़का नाप देने आया। शायद पायजामा बनवाना होगा। टेलर ने स्टूल पर बैठे-बैठे लड़के की कमर में फीता डालकर नाप ले ली। लंबाई के लिए फीता कमर से नीचे लटकाकर दिया। गुरुत्वाकर्षण के चलते फीता नीचे लटक गया। लंबाई नप गई। यही लंबाई अगर अंतरिक्ष में नापनी होती तो फीता नीचे नहीं लटकता। कोई और जुगाड़ लगाना होता नाप लेने के लिए। कैसे नाप होती कल्पना कीजिये।
वैसे कल्पना करने को एक कल्पना अपन करते हैं। पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन होते हैं। पानी की कमी दूर करने के लिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के पाउच मिलने लगेंगे कभी। जिसको पानी पीना होगा वह एक पाउच से आक्सीजन और दूसरे से हाइड्रोजन निकालेगा। सुर्ती और चूने की तरह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को रगड़ पानी बनाएगा और फांक लेगा।
इसके साथ ही मानो कहीं आक्सीजन की कमी हुई। वहां वह पानी के अणु को पटककर या छीलकर आक्सीजन और हाइड्रोजन अलग-अलग कर लेगा। आक्सीजन को सूंघकर सांस ले लेगा। हाइड्रोजन को अलग पुड़िया में धर लेगा।

बात यहीं तक नहीं है भाई। निकली है तो दूर तलक जाना बात की नियति है। जब आक्सीजन उपयोग होने के बाद बाहर निकलेगी तो कार्बन डाई आक्साइड में बदल चुकी होगी। उससे भी पटककर या छीलकर आक्सीजन निकाल ली जाएगा। जो कार्बन बचेगा उसको दबाकर कोयला बनाया जाएगा। उर्जा समस्या हल होगी।
आप को मेरी बातें अगर लंतरानी लगें तो कोई ताज्जुब नहीं है। हमको भी लगती हैं। लेकिन अपने लोकतंत्र और संविधान में लंतरानी हांकने में कोई रोक भी तो नहीं है।
दुनिया के तमाम अविष्कार सही सिद्ध होने के पहले लंतरानी ही माने गए हैं। अब यह अलग बात है ज्यादातर लंतरानी बिना पेंदे की होती हैं और उनकी हैसियत मात्र कबाड़ की होती है।

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Thursday, March 14, 2019

डोन्ट बि परेशान। लव यू मम्मा

 

साढे सात बज गये। फ़ैक्ट्री का हूटर बज रहा है। सारे शहर को बताता कि ड्यूटी का समय हो गया।
सूरज की किरणें अपनी ड्यूटी पर आ गयी हैं। सूरज भाई अभी मिलेंगे तो पूछूंगा कि क्या उनके यहां भी हूटर बजता है? हूटर बजते ही अलसाई किरणें आंख मलते उठने की सोचती होंगी। कुछ की मम्मी किरणें बच्ची किरणों को डांटती होंगे- "जल्दी उठ वर्ना सुबह की बस छूट जायेगी। जाना है न तेरे को धरती पर चमकने के लिये। कल जिस खूबसूरत कली पर रही दिन भर वह अब खिलने वाली होगी। "
किरण अलसाई सी बस मम्मी एक मिनट और एक मिनट और करती लेटी रहती होगी। डांट खाती होगी। रोज की तरह जैसे ही दूर चौराहे पर सूरज बस का हार्न सुनती होगी तो फ़टाक से बिस्तर से भागकर हाथ-मुंह धोकर फ़्राक पहनकर मम्मी किरण को टाटा, बाय बाय करती हुयी सूरज बस में बैठकर धरती की ओर चल देती होगी। बस में अपनी सीट पर ऊंघते बैठे मम्मी की बात याद आती होगी- अरे नाश्ता तो कर ले। रोज भूखे चली जाती है।
वह किरण अब धरती पर पहुंच गयी है। कल जिस कली पर दिन गुजारा उसने अब वह फ़ूल बन गया है। किरण को आते देखते ही और खिल गया। किरण उसकी पंखुडियों पर पसर कर धीरे से उसे हाय कहते हुये मुस्कराती है। अगली बात करने से पहले अपनी मम्मी को एस.एम.एस. करती है- "मैं यहां पहुंच गयी। आराम से हूं। नाश्ता कर लिया है। तुम भी कर लो। डोन्ड बि परेशान। लव यू मम्मा। "
मम्मी किरण, बच्ची किरण का मैसेज पाकर चैन से आ जाती होंगी। पलट के -"लव यू बेटा। टेक केयर " लिखकर सोचती होगी -कल से इसको टिफ़िन में नाश्ता दे दिया करूगी।
बरामदे में रोशनी का टुकड़ा पसरा हुआ। इसका शान्त स्वभाव देखकर लग रहा है इसई के घराने वालों के लिये पंत जी लिखे होंगे:
शान्त स्निग्ध ज्योत्सना उज्ज्वल।
स्निग्ध ज्योत्सना से याद आया कि किरणें इतनी चमकती कैसे रहती हैं? क्या इनके भी कोई ब्यूटी सैलून होते हैं? क्या ये भी फ़ेशियल, ब्लीचिंग कराती हैं? क्या पता इनके यहां भी गोरेपन की क्रीम का जलवा हो। आज सूरज भाई से पूछेंगे।
#सूरज भाई अब आ गये हैं। साथ चाय पीते हुये हम बतिया रहे हैं। चाय पीते हुये उन्होंने पूछा कि इसमें कौन चाय की पत्ती डाली है? हमने कहा -पता नही। लेकिन पत्ती के बारे में क्यों पूछ रहे? वे बोले कुछ नहीं बस ऐसे ही। सोच रहा था चुनाव के समय ’बाघ-बकरी ’ चाय चलनी चाहिये। इस समय बकरी जैसे जनता को यह लगने लगता है कि उसकी बाघ से दोस्ती है और बाघ चुनाव जीतते ही उसकी सब परेशानियां खतम हो जायेंगे।
हमने कहा- सूरज भाई आप तो राजनैतिक हो लिये आज।
#सूरज भाई मुस्कराते हुये चाय पीते रहे।उनकी मुस्कराहट से किरणें और चमकने लगीं। सबेरा हो गया है।

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Monday, March 11, 2019

गुनगुनी धूप में अलसाई सुबह

 


सुबह फिर सुबह हुई। रोज होती है। रात कित्ती भी अंधेरी हो, सुबह का उजाला होता ही है। इसीलिए तो कवि कह गया है:

'दुख की पिछली रजनी बीच
विलासता सुख का नवल प्रकाश।'
बरामदे में धूप पसरी है। जैसे बरामदे से की जाली से अखबार सरकाकर अंदर डाल दिया जाता है वैसे ही कोई धूप को सरकाकर बरामदे में डाल गया है। धूप अलसाई सी लेती है बरामदे में। गुनगुनी धूप में गनगना रही है धूप। सुबह भी अलसाई सी धूप के गले में हाथ डाले आंखे मूंदे सो रही है। दोनों का ढीला-ढाला गठबंधन टाइप हो गया है।
अरबों-खरबों फोटॉन होंगे इत्ती जगह में। सूरज के रजिस्टर में चढ़ाए गए होंगे। इत्ते अरब फोटॉन कानपुर में अनूप शुक्ल के बरामदे में भेजे गए। कभी कोई ऑडिटर मिलाए तो क्या पता हिसाब गड़बड़ मिले। खरबों फोटॉन उधर से चलें हो इधर न पहुंचें हो। उनकी रपट लिखाई जाएगी। थाने अलग होने पर बहस हो। धरती का थानेदार कहे यह मामला सूरज के थाने का है, वहां रपट लिखाओ। धरती वाला बोले -'मामला सूरज के इलाके का है। वहां जाओ।'
क्या पता फिर कोई सुप्रीम कोर्ट दखल दे। उसके आदेश पर रपट लिखी जाए। सुप्रीम कोर्ट भी पता नहीं किसी और आकाशगंगा में हो। हो सकता है सुप्रीम कोर्ट मामले की निगरानी के लिए ब्लैकहोल में बदल चुके किसी भूतपूर्व तारे को तैनात कर दे। पूरा तारामंडल मामले की गवाही देने के लिए ब्लैकहोल के पास जाए। लेकिन इसमें भी लफ़ड़ा है। कहीं ब्लैकहोल समूचे तारामंडल को निगल न जाये। फिर एक और जांच बैठाई जाए।

सूरज की किरणें बगीचे में कबड्डी खेल रहीं हैं। कुछ लुका-छिपी भी। बाकी किरणें झूला-झूल रही हैं। चुनाव की तारीखें घोषित होने से भी उनके व्यवहार में कोई फर्क नहीं आया है। वे पहले की तरह खिलंदड़े अंदाज में मजे कर रहीं हैं।
चुनाव की घोषणा होते ही सर्वे होने लगे हैं। अलग-अलग दावे हैं। आम आदमी इन सब चोंचलों से अलग जीने की लड़ाई में जुटा है। कल एक आदमी फूलबाग मोड़ पर चावल पकाते दिखा। दो लीटर के पेंट के डब्बे में चावल ऊपर तक भरे। ईंटों के चूल्हे पर इधर-उधर की लकड़ियां इकट्ठा करके सुलगती आग पर चावल पकाते आदमी को उसके सामने बैठा एक जवान देख रहा था। पके तो खाएं वाले अंदाज में। चावल पकाता आदमी लकड़ी से चावल चलाता जा रहा था।
बगल में एक पौशाला बनी थी। उसके उद्घाघाटन की तारीख लिखी थी। उद्घघाटन करने वालों के नाम लिखे थे। लेकिन पौशाला बंद थी। बन्द होने की तारीख और बन्द कराने वालों के नाम वहां से गायब थे। बन्द कराने वालों के नाम पता चलते तो उनके खिलाफ कार्यवाही की मांग होती। लेकिन जब पूरा समाज शामिल है इस साजिश में तो कार्यवाही कौन करेगा।

एक आदमी सड़क किनारे टुन्न सा बैठा। शायद काफी पी गया है। दारू पीने के बाद विटामिन डी पी रहा है। धूप की किरणें उसके चेहरे पर रोशनी के छींटे मारकर उसको जगाने की कोशिश कर रहीं हैं। लेकिन वह नशे की चपेट में हैं। आंखे मूंदे सो रहा है। सूरज की किरणों की बेइज्जती खराब कर रहा है। वह उसको जगा रहीं हैं यह नशे में सो रहा है।
नशे की बात से कैलाश बाजपेयी की कविता याद आती है:
तुम नशे में डूबना या न डूबना
लेकिन डूबे हुओं से मत ऊबना।
कुछ देर में वह बैठे से अधलेटा हो गया। देखते-देखते सड़क पर ही लंबलेट हो गया। नाली के समानांतर। चेहरा नीचे हो जाने के कारण किरणें अब उसके चेहरे पर नहीं पहुंच पा रहीं। ऊब कर दूसरी जगहों पर चलीं गईं। उनके पास भी पचास काम हैं।
काम तो अपन के पास भी बहुत हैं। हम चलते। आप मजे करिये। धूप का मजा लीजिये। अभी मुफ्त है। क्या पता कब इस पर भी कोई सेस लग जाये। कोई धूप पर कोई कर लगे इसके पहले जी भरकर नहा लीजिये धूप में। अच्छी तरह रगड़कर। हर हर गंगे कहते हुए।

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Sunday, March 10, 2019

अनूप शुक्ल मजे लेकर लिखते हैं- सुभाष चन्दर

 


[जनवरी महीने में पुस्तक मेले में वरिष्ठ व्यंग्यकार, आलोचक सुभाष चन्दर जी के हाथ में जबरियन अपनी किताबें थमा कर कैमरा आन करवा कर बगल में खड़े हो गये। सुभाष जी को मेरे लेखन पर अपनी उदार आशु टिप्पणी की। सुभाष जी से जबरियन कराई गयी तारीफ़ का जितना वीडियो मिला वह यहां पेश है। वीडियो रिकार्डिंग उपलब्ध कराने के लिये कुश का आभार 🙂 ] Subhash Chander , Kush Vaishnav
मेरे हाथ में ’बेवकूफ़ी का सौंदर्य’ है और ’झाड़े रहो कलट्टरगंज’ है। ’झाड़े रहो कलट्टरगंज’ और ’बेवकूफ़ी का सौंदर्य’ दोनों में क्वालिटी है कि दोनों में बेवकूफ़ी के अलावा भी एक सौंदर्य है, वह है शिल्प का सौंदर्य। अनूप शुक्ल अपने शिल्प के कारण व्यंग्य में जाने जाते हैं। व्यंग्य की एक मजेदार जो शैली है जिसमें आप थोड़े गहरे में जाकर मजा लेते हुये लिखते हैं, चुटकी लेते हुये लिखते हैं अनूप शुक्ल उस धारा के प्रवर्तक तो नहीं कहूंगा उस धारा को आगे बढाने का काम अनूप शुक्ल ने किया है। इनका मैं दो चीजों का फ़ैन हूं। पहली चीज कि मजे लेकर लिखते हैं , आनन्द लेकर लिखते हैं । जब भी आप आनन्द लेकर लिखेंगे तो पाठक को भी आनन्द दे सकेंगे। आप कहेंगे कि व्यंग्य तो प्रहार का काम है लेकिन जब पाठक व्यंग्य के नाम पर किताब उठाता है तो वह आनन्द भी लेना चाहता है , प्रहार का भी अपना एक अलग सुख होता है। जब आप देखते हैं कि अमिताभ बच्चन किसी गरीब की मदद करने के लिये किसी गरीब को पिटते देखकर उस( दूसरे) पर हाथ छोड़ता है , उसको मारता है तो इस पर आपके अन्दर कहीं न कहीं बैठा कमजोर इंसान है वह सोचता है कि मेरी जगह देखो ये आ गया। तो व्यंग्य का आनन्द इस तरीके से भी है।

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Tuesday, March 05, 2019

सूरज की मिस्ड कॉल' की समीक्षा

 



Samiksha Telang द्वारा 'सूरज की मिस्ड कॉल' की समीक्षा। आभार समीक्षा इतनी मेहनत से किताब पढ़ने और उसके अंश इकट्ठा करने के लिए । धन्यवाद Santram.जी इसे प्रकाशित करने के लिए। 💐💐
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अनूप शुक्ल जी की पुस्तक की समीक्षा जिसे इस वर्ष उप्र संस्थान से पुरस्कार भी मिला... आप भी पढिए, शायद पुस्तक पढ़ने का मन हो जाए...
आभार संपादक Santram Pandey जी
ईनाम की ख़ुशी
उस दिन दो मेल आए। १३ अक्टूबर तारीख़ थी। देखा, #अनूपकीडाक से मेल। ख़ुशी का ठिकाना नहीं। काफ़ी समय से मन था अनूप शुक्ल जी की पुस्तकें पढ़ने का। यहाँ ऑनलाईन पुस्तकें नहीं मिलती। इसलिए ख़रीदना दूर की बात है। “सूरज की मिस्डकॉल” और “पुलिया पर दुनिया” ये दो किताबें। उनके अनुसार उन्होंने अपनी पुस्तकें रिश्तेदारों तक में फ़्री नहीं बाँटी। और मुझे ये सौग़ात ईनाम के रूप में मिली।
ऐसे तो अनूप जी को रोज़ ही पढ़ते हैं। और हर बार उन्हें पढ़ना उतना ही सुखद होता है। जिस बानगी और रोचक अन्दाज़ में वे लिखते हैं शायद कोई प्रयत्न करके भी न लिख पाए। कोई नए विषय नहीं। सब कुछ हमारे आसपास की घटनाएँ। बस बताने का अन्दाज़ निराला। और यही निरालापन उन्हें औरों से अलग करता है।
आप लोगों को ध्यान हो फ़ेसबुक पर चल रही #व्यंग्यकीजुगलबंदी- १०७ में की मैंने १४ लोगों के लेखों की समीक्षा लिखी थी। बस उसी मेहनत का नतीजा कि अनूप शुक्ल जी ने ये पुरस्कार दिया।
इधर व्यस्तता ज़्यादा होने की वजह से पुस्तक अब जाकर पढ़ पायी हूँ। मैंने उनकी बहुचर्चित पुस्तक “सूरज की मिस्डकॉल” जब पढ़ी तो लगा कि क्या इस सोच के साथ भी कोई लिख सकता है।
पहला लेख जो कि अनूप जी का सबसे पसंदीदा लेख भी है। उसमें वे लिखते हैं-
“बूँद की आड़ में बूँद बाहर आयी तो देखा सूरज कि एक किरण एक बूँद में रोशनी का इंजेक्शन लगा रही थी। साथ की बूँदें खिलखिला रही थीं। तमाम बूँदों को खिलखिलाता देखकर एक दलाल ने उनको अपने साथ इकट्ठा करके एक फ़ोटो सेशन कर लिया और सारी दुनिया भर में खिलखिलाहट को इंद्रधानुष के नाम से पेटेंट करा लिया”।
ये तो बस नमूना है। सूरज जहाँ लड़कियों का पिता है वहीं किरणें उसकी बेटियाँ हैं। अपनी बेटियों को लेकर एक पिता कितना पजेसिव और जागरुक रहता है, आपको पढ़कर समझ आ जाएगा। जगह जगह सूरजभाई कहीं कोहरे की, तो कहीं ओस की या फिर बादलों की हड्डी तुड़ाई से भी बाज़ नहीं आए। अधिकतर लेखों में चाय की दुकान पर जो भी फ़िल्मी गानें बजते उसे उसी अन्दाज़ में बयां किया है। लिखने के लिए बैठूँ तो शायद किताब का एक एक शब्द लिखना पड़ जाए। मतलब हरेक शब्द में व्यंग्य, मानवीय संवेदनाओं और व्यवहार पर तिखा प्रहार है। आप भी पढ़ें कुछ अंश-
१- देखते देखते जहाज़ उड़ा और उचक कर शहर के बाहर हो लिया। ऊपर पहुँचते समय सूरज की रोशनी कम साफ़ दिखाई दी। हम पूछे- यार सूरजभाई, तुम हमको नीचे तो एकदम चमकदार रोशनी भेजते हो। लेकिन यहाँ मटमैली धूप कैसे? वो बोले- ऊपर उठने में सब जगह गंदगी होती है भाई!
२- इत्ती ज़ोर से बूँदों को हाथ रगड़ने पर पक्का सब बूँदों का दम घुट गया होगा।
३- आसमानी रंग का प्लास्टिक का पर्दा खिंच गया।
४- कलकत्ता से दिल्ली के लिए हवाई जहाज़ के उड़ते ही तमाम यात्री समाधि मुद्रा में आ गए। आँखें मूँदकर इतने ध्यान से साँस ले रहे थे मानों ये वाली साँस लेने के लिए १०हज़ार रुपया ख़र्च करके जहाज़ में बैठें हैं। बैठते ही पैसा वसूलना शुरू कर दिए।
५- ‘बच्ची डिबिया’ में चटनी।
६- दूर सूरजभाई पेड़ों की कुर्सी पर सेठ की तरह बैठे सब तरफ़ का मुआयना कर रहे हैं। उनको ख़याल था की कोई किरण छूट न जाए। ज़माना बड़ा ख़राब है न।
७- यूकेलिपटस के पेड़ों की पालकी पर सूरजभाई।
८- सब जगह क़ब्ज़ा कर लिया धूप ने। धूप मानो बाज़ार हो गई है।
९- लेखक की सूरजभाई को सलाह- एक ठो रेनकोट काहे नहीं लेते?
१०- पेट की गरमी सूरज की गरमी पर भारी है।
११- बगुले धर्मगुरुओं की तरह ‘निर्लिप्त घाघ’ लग रहे थे।
१२- कोई दिन रात कृत्रिम रोशनी में रहने वाला हो तो मारे चकाचौंध के उसका तो ‘उजाला फ़ेल’ हो जाए।
१३- क़ायदे और नियम में अंततः नियम जीत।
१४- अनूठी परिभाषा ब्लेक होल की-
सूरजभाई चाय पीते हुए बताते हैं- ब्लेक होल वैसा ही होगा जैसी वह दुनिया होगी जहाँ लड़कियाँ नहीं होंगी। सिर्फ़ और सिर्फ़ लड़के होंगे। दुनिया को ब्लेक होने से बचाना है तो लड़कियों को बचाए रखना होगा।
१५- दुकान चाहे चाय की हो या राजनीति की बिना नाटक चलती कहाँ है।
१६- समोसे को फुसलाते हुए कह रहे हो- खौलती कड़ाही में कूदने से लोगों के पेट में हलचल मचा देना पुण्य का काम है। इस नेक काम को करने से जन्नत नसीब होगी तुमको और अगले जन्म में पूड़ी पराँठा पैदा होगे।
१७- सूरजभाई शेर सुनकर बमक गए और बादलों का सुरक्षा कवच तोड़कर बाहर निकल आए।
१८- सूरजभाई चूँकि हमारे दोस्त हैं तो हमारे इलाक़े में थोड़ा धूप ज़्यादा भेज देते हैं तो कौन गुनाह करते हैं।
१९- पुलिया के पास के नए स्पीड ब्रेकर को कोई मोटर साइकल रौंद कर चला गया है। लगा किसी मासूम के साथ दुराचार हुआ है।
२०- मुँह खोला तो सिस्टम हिल जाएगा। यह बयान पढ़कर आरोपी के प्रति मन श्रद्धा से भर गया लबालब। बेचारा अंदर हो गया सिस्टम के चलते। लेकिन सिस्टम की रक्षा के लिए मुँह नहीं खोल रहा है। कित्ता प्यार है सिस्टम से।
२१- नमी को भागते देखकर घास की पत्तियाँ चहकते हुए खिलखिलाने लगीं।
२२- कई दिनों की रिमझिम और पटापट बरसात के बीच आज अचानक सूरज भाई दिख गए। कुछ ऐसे ही जैसे ३६५ अंग्रेज़ी दिवस के बीच अचानक हिंदी दिवस मुंडी उठाकर खड़ा हो जाए।
२३- दिनभर का थकाहारा सूरज अब मार्गदर्शक बनने लायक ही रह गया दिखता है।
२४- उनकी तो रोजै दिवाली मनती है। कोई दिवाली के मोहताज थोड़े हैं सूरजभाई।
२५- आसपास कोई पेड़ नहीं है न कोई चिड़ियों की डिस्पेंसरी कि चोट लगने पर फ़ौरन इलाज हो सके लेकिन चिड़िया उड़ रही है। पंख से ज़्यादा शायद अपने हौंसले से।
२६- आसमान भी एक दलबदल निर्दलीय विधायक सरीखा है। सूरज चाँद जिसकी भी सत्ता होती है उसके रंग में रंग जाता है।
२७- मामला लोकतंत्र में सरकार और कारपोरेट जैसा दिखा। जो ज़बर वही दूसरे को हांकता है।
२८- एक जगह कुछ महिलाएँ लकड़ियाँ बिन रही थीं। साथ में आदमी उनके सर पर लकड़ी लादने में सहायता कर रहे थे बस। अक्सर मैंने देखा है कि जहाँ आदमी और औरत दोनों काम करते हैं वहाँ आदमी अपना रोल अपेक्षाकृत निट्ठल्लेपन का ही चुनता है।
२९- रिश्ते रंगबिरंगी तितलियों की तरह होते हैं। कसकर पकड़ने से उनके परों का रंग छूट जाता है। धीरे पकड़ने पर वे उड़ जाती हैं।
३०- अनुलोम विलोम क्रिया साँसों पर सीबीआई कार्रवाहि की तरह है। पहले साँस अन्दर करती है। कुछ देर क़ब्ज़े में रखती है। फिर साँस को रिहा कर देती है। क्लीन चिट दे देती है।
३१- जित्ती बेवक़ूफ़ी की बातें वे राजनीति वाले पैसा ख़र्चा करके दूसरों से लिखवाकर करते हैं उत्ती तो तुम फ़्री फ़ंड में, मज़ाक़ मज़ाक़ में कर लेते हो।
३२- पानी पूरा चमकदार लग रहा था। तालाब के जीव जंतु भी शायद कहते हों कि अपना तालाब स्मार्ट तालाब बन गया है। किनारे के झाड़ झंझाड झुँझलाते हुए कहते हों- काहे का स्मार्ट तालाब, सारी गंदगी तो हमारे ऊपर डाल दी। एकदम शहर सा बना दिया है तालाब को।
३३- अरबों खरबों की फोटोन हर सेकंड दनादन धरती पर उड़ेले दे रहे थे।
किताब पढ़कर पता चला की-
*अनूप जी लिखने के अलावा क्षेत्रफल निकालने का भी ख़ूब शौक़ रखते हैं। इतना कि कहीं का भी क्षेत्रफल निकालने का मन ललचाता है। अब कहाँ का ये आपको पुस्तक पढ़कर ही पता चलेगा। हरेक चीज़ तो नहीं लिखी जा सकती न।
*उन्होंने ख़ुद को फ़ेसबुकिया भी कहा है।
*हाथ में अख़बार बुद्धिजीवी होने का आईडेंटिटी कार्ड है।
*मधु अरोरा जी के सौजन्य वाली चाय काफ़ी स्वादिष्ट लगी सूरजभाई को।
बहरहाल ये किताब पढ़ें और ज़रूर पढ़ें। रोज़ के बोलचाल के शब्दों को कैसे ढाला है वाक्यों में। बहुत ही ग़ज़ब अन्दाज़ है कहने का। ये अपने आप में इकलौती मात्र सी किताब है जो सूरजभाई और लेखक की आपसी बातचीत पर आधारित है। आप कर सकते हैं क्या सूरजभाई से बातचीत? नहीं न। लेकिन अनूप शुक्ल जी कर सकते हैं। और उन्होंने की हैं। चाहे कानपुर रहें, जबलपुर रहें या फिर कलकत्ता दिल्ली। उनके सूरजभाई हमसफ़र रहे। और पूरी शिद्दत से उन्होंने अपने विचारों को सूरजभाई के माध्यम से रखा है। ये एक अपने आप में अनूठा प्रयास है। बहुत बहुत शुभकामनाएँ और बहुत सारी बधाई अनूप जी को।

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