Wednesday, August 03, 2011

भेरू दादा और पान की दुकान

http://web.archive.org/web/20140419214400/http://hindini.com/fursatiya/archives/2150

भेरू दादा और पान की दुकान

यह पोस्ट इंदौर के सुनील पाटीदार की है। उन्होंने पिछली पोस्ट पर टिपियाया और मेल से अपना यह लेख भेजा। छापने के लिये। सुनील परसाई जी और शरद जोशी जी के प्रशंसक हैं। यह माह परसाई जी का जन्म माह है। इसलिये माह की शुरुआत परसाई प्रशंसक के ही लिखे से होने से बेहतर और क्या हो सकता है। :)

भेरू दादा और पान की दुकान

पान की दुकान
“मंहगाई, भष्टाचार,लूट, डकैती, अपहरण, रिश्वत, कालाबाजारी इन सभी घटिया शब्दों के उचित प्रयोग से भारत बनता है। ”
ये शब्द चौराहे की पान की दुकान पर उधार की बीडी के अंतिम कश लगाते हुए भेरू दादा ने कहा। वहां खड़े भेरू दादा के अत्यंत निजी एवं सीमित समझ के ग्रामीण मित्रों ने दादा के हाव भाव देख कर उनकी प्रशंसा की, हालांकि वे बेचारे दादा की बात नहीं समझ सके थे।
भारत देश में पान की दुकान का बड़ा महत्त्व है। एक बार मुंह में बीडी या बीड़ा जाने के बाद एक -एक शब्द मानो मोती जैसे झरने लगते हैं |
मंहगाई, भष्टाचार,लूट, डकैती, अपहरण, रिश्वत, कालाबाजारी इन सभी घटिया शब्दों के उचित प्रयोग से भारत बनता है
हम भारतवासी इतने रसिक है कि चिंतन चाहे आद्यात्मिक हो या सांस्कृतिक उसका सही अवलोकन तो पान की दुकान पर ही करते हैं। ये एक ज्ञान का मंदिर है जहां ज्ञान मुफ्त मिलता है,यहां हर तबके, हर सम्प्रदाय के लोग आते है, ज्ञान देते है और चले जाते है। कुछ लोग ज्ञान लेने भी आते है और उसको जीवन में उतारने का भरसक प्रयास भी करते है। यह वो पावन स्थल है जहां युवाओ के लिए अश्लील शिक्षा का कच्चा माल भरपूर मात्रा में सहज रूप से उपलब्ध है। पान की दुकान पर ही तय होता है की कब किसे छेड़ना है और कब किसे भगाना है।
भारत में प्रेम विवाह यही की देन है। कई लोग घर से झगड़कर भी यहां आश्रय पाते है। कुछ छिप छिप कर भी आते है, कुछ रसिक होते है और कुछ रंगीन मिज़ाज। बाकी बचे कुछ आदतन कुछ गैर आदतन और कुछ फोकटिये। हर मौसम में ये प्राणी पान की दुकान के आसपास पाए जाते है। ऐसा कहा जा सकता है कि सच्चे भारतीय यहीं बनते है।
अब हम बात करते है, एक अद्वितीय प्रतिभा की जिसे भेरू दादा कहा जाता है।
………….भेरू दादा अत्यंत ज्ञानी, विद्वान, महापुरुष, और हर विषय पर अपना स्वतंत्र मत रखने वाले सच्चे राष्ट्रभक्त है।
23 साल के सुनील पाटीदार नीमच, मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। इंदौर के टूर्बा कालेज से एम.बी.ए. कर रहे हैं। शौकिया तौर पर रेडियो जाकी हैं। हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के प्रशंसक हैं। फ़ोन – 9827043149
ऐसा सिर्फ वे स्वयं सोचते है। दादा न केवल राजनीति बल्कि विज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य और खेल जैसे गंभीर विषयों पर भी पकड रखते है और इतना सब उन्होंने पान दुकान पर ही सीखा है। दादा ने अपनी तमाम उम्र सर्वजनहिताय पान की दुकान पर ही व्यतीत की है। दादा करने से ज्यादा कहने में विश्वास रखते है अतः रोज़ शाम पान की दुकान पर ये अपने वक्तव्य देते है और मित्र ताली बजाते है। देश की गंभीर समस्याओं पर चिंतन और मनन के बाद हालात को दोषी ठहराने और गलती देश के माथे मढ़कर स्वयं को दोष मुक्त करने की कला भेरू दादा में कूट कूट कर भरी हुई है इसीलिए दादा सीमित क्षेत्र में, श्रेष्ठ वक्ता और बोलचाल में अधिवक्ता भी कहलाते है।
दादा की इस स्वतंत्र अभिव्यक्ति की खुली बाटली पर सिर्फ उनकी महिष नयन पत्नी ही ढक्कन लगा सकती है जो उन्हें दहेज के साथ मुफ्त मिली है। दादा मुख्य रूप से दहेज में विश्वास रखते है सो मज़बूरी वश उन्हें पत्नी को भी साथ लाना पड़ा क्यों की भारत में दहेज के साथ पत्नी देने की भी परम्परा है।
इसीलिए दादा दकियानूसी मान्यताओं के खिलाफ है ।
दादा मुख्य रूप से दहेज में विश्वास रखते है सो मज़बूरी वश उन्हें पत्नी को भी साथ लाना पड़ा क्यों की भारत में दहेज के साथ पत्नी देने की भी परम्परा है।
दादा भाषण देने के अलावा वक्त का सही उपयोग करने के लिए प्रेम भी करते है। यदि इनकी पत्नी को छोड़ दिया जाए तो मोहल्ले की सभी औरतों के साथ दादा ने स्वप्नलोक में धारावाहिक प्रेम किया है और ये सब पान की दुकान की ही देन है। अंतिम प्राप्त सूचना तक दादा की जीवन भर की उपलब्धि उनका बेटा है जहां दादा ने संघर्षमय पौरुष के दम पर अपने होने का एहसास दिलाया और इस देश को एक भेरू दादा और दिया जिसके लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष सदियों तक उनका ऋणी रहेगा।
देश में आज़ादी से पहले धडल्ले से कई लोग महापुरुष बने परन्तु आज़ादी के बाद पूंजीवाद और बाजारवाद के चक्रव्यूह में फसकर समाज दो हिस्सों में बट गया। एक उच्चवर्ग और दूसरा निम्नवर्ग। उच्च वर्ग ने तो कई मिनी महापुरुष दिए पर साधन विहीन निम्नवर्ग उचित मार्केटिंग ,पैकेजिंग और एडवरटाइजिंग के अभाव में केवल भेरू दादा ही दे पाया॥
जब देश में सहस्त्रों वर्षों की आद्यात्मिक और सांस्कृतिक परम्परा में श्रद्धा और विश्वास रखने वाले लोगो ने सोचा की राष्ट्र संकट में है । राष्ट्र की अंतरात्मा की रक्षा के लिए फ़िलहाल एक महापुरुष की सख्त आवश्यकता है तब उन्होंने गीता सार ” काम करते रहो ” को अपनाया। सब लोग काम ….काम करते गए तो महापुरुष तो नहीं आया बदले में करोडों दर्जन मिनी महापुरुष और भेरू दादा आगये। इसीलिए देश आज तक विकासशील ही है। कभी विकसित नहीं बन पाया।
उच्च वर्ग ने तो कई मिनी महापुरुष दिए पर साधन विहीन निम्नवर्ग उचित मार्केटिंग ,पैकेजिंग और एडवरटाइजिंग के अभाव में केवल भेरू दादा ही दे पाया ।
बहरहाल, दोस्तों भेरू दादा कोई शक्स नहीं बल्कि सोच है जो इन्सान के अंदर पनपती है। जो समस्याओं से घिरकर खुद को शिथिल मान लेता है। हालातों के भंवर में निर्णय नहीं ले पाता है। जो दूसरों को दोष देता है और अपनी गलती नज़रंदाज़ करता है। जो काम करने की बजाए भाषण देकर स्वयं को मुक्त कर लेता है वही इन्सान भेरू दादा बन जाता है । यह सोच राष्ट्र विरोधी है और एक आसुरी शक्ति है जो पान की दुकान पर मिलती है।
इस सोच को बदलने से ही हम भारतीय बनेंगे क्यों की बदलाव की अपेक्षा नहीं बल्कि चेष्टा करनी पड़ती है। कहना ही नहीं बल्कि करना भी पड़ता है क्यों की स्वर्ग पाने के लिए मरना भी पड़ता है।
खैर…….. बहुत हुआ चिन्तन चौराहे की पान की दुकान पर कोई मेरा इंतजार कर रहा है , मै चलता हूं |
नमस्कार
सुनील कुमार पाटीदार
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49 responses to “भेरू दादा और पान की दुकान”

  1. arvind mishra
    सुनील परसाई जी के सच्चे उत्तराधिकारी लगते हैं -वही पञ्च है यहाँ भी! महिष नयना पत्नी और वह भी दहेज़ के साथ मुफ्त -दहेज़ की मात्रा का अनुमान सहज है! बाकी बहुत कुछ है जो बरबस हंसा गया मगर जरा दुश्मनों की तबीयत थोडा नासाज होने से भारी भरकम प्रतिक्रिया नहीं हो पा रही है -मगर सुनील जी को साधुवाद तो देना ही पड़ेगा !
  2. प्रवीण पाण्डेय
    इन निम्न समझे जाने वाले शब्दों के सतत प्रयोग से राजनीति में गति बनी रहती है। सब लिप्त हैं और सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि निर्लिप्तता जैसा कोई शब्द ही नहीं हो सकता है सामाजिक व राजनैतिक जीवन में।
  3. satish saxena
    ब्लॉग जगत से भेरू दादा को लिंक नहीं किया ….??
    आज आप काफी गंभीर हैं अनूप भाई ! दुश्मनों की तबियत, कहीं नासाज़ तो नहीं हुज़ूर ??
    शुभकामनायें !
  4. sanjay jha
    कहना ही नहीं बल्कि करना भी पड़ता है क्यों की स्वर्ग पाने के लिए मरना भी पड़ता …………
    प्रणाम.
  5. आशीष श्रीवास्तव
    तेवर अच्छे है सुनील के , उन्हें बहुत बधाई ………
    परसाई जी के जन्म माह के उपलक्ष्य में उनके लेख लगातार छापिये,
    हम भी कुछ निबंध टाइप करने तैयार है :)
    वैसे गंभीरता के लक्षण तो हमें भी दिख रहे है , मौज लेने वाले फुरसतिया / शुकुल कहाँ है आजकल ???
    आशीष
  6. व्न्दना अवस्थी दुबे
    जो दूसरों को दोष देता है और अपनी गलती नज़रंदाज़ करता है। जो काम करने की बजाए भाषण देकर स्वयं को मुक्त कर लेता है वही इन्सान भेरू दादा बन जाता है । यह सोच राष्ट्र विरोधी है और एक आसुरी शक्ति है जो पान की दुकान पर मिलती है।
    बढ़िया है. सुनील जी को बधाई और आपको धन्यवाद.
    उम्मीद है, परसाई जी के जन्म-माह का लाभ हमें आपकी पोस्ट के रूप में मिलेगा :)
    ( सोचती हूँ, कुछ लिख के आपके पास भेज ही दूं, परसाई प्रशंसक तो मैं भी हूँ न! )
    व्न्दना अवस्थी दुबे की हालिया प्रविष्टी..ठंडा मीठा बरियफ़…….
  7. GGShaikh
    सुनील जी,
    सही में मस्त आलेख…दमदार.
    आशाएँ जगाने वाला लेखन कर्मी, तुम में दिखे है.
    विषय पर पकड़ भी बनी रही और कलम भी चलती रही…
    अब के पान खाने जाएंगे तो वहां भेरू दादा को अवश्य ढूँढेंगे…
    पान की दुकान में ऍफ़.एम. रेडियो पर पुराने गाने सुनते हुए…
    और ज़र्दा-चटनी-किमाम की महक लेते हुए.
    देश की और देश की राजनीति की चिंताएं भी बिलकुल नए सिरे
    उजागर की आलेख में…जो चिंताएं हम सभी की है…
    अनूप जी को भी धन्यवाद…
  8. Dr.ManojMishra
    —-@@@ भारतवासी इतने रसिक है कि चिंतन चाहे आद्यात्मिक हो या सांस्कृतिक उसका सही अवलोकन तो पान की दुकान पर ही करते हैं। ये एक ज्ञान का मंदिर है जहां ज्ञान मुफ्त मिलता है,यहां हर तबके, हर सम्प्रदाय के लोग आते है, ज्ञान देते है और चले जाते है। कुछ लोग ज्ञान लेने भी आते है और उसको जीवन में उतारने का भरसक प्रयास भी करते है। यह वो पावन स्थल है जहां युवाओ के लिए अश्लील शिक्षा का कच्चा माल भरपूर मात्रा में सहज रूप से उपलब्ध है। पान की दुकान पर ही तय होता है की कब किसे छेड़ना है और कब किसे भगाना है।……………
    ——इस चिंतन को प्रणाम,बढ़िया पोस्ट,आभार.
  9. देवेन्द्र पाण्डेय
    अंत का उपदेश छोड़ बाकी सब धारदार…जोरदार…असरदार है.
  10. सलिल वर्मा
    व्यंग्य में धार है..
    सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..सेलेब्रिटी
    1. sunil patidar
      धन्यवाद बंधू मुझे ख़ुशी है की आपने इसे पढ़ा |
  11. ज्ञान दत्त पाण्डेय
    ………….भेरू दादा अत्यंत ज्ञानी, विद्वान, महापुरुष, और हर विषय पर अपना स्वतंत्र मत रखने वाले सच्चे राष्ट्रभक्त है।
    ——————————————–
    वाह, भेरू दादा सच्चे ब्लॉगर लगते हैं!
  12. आशीष 'झालिया नरेश' विज्ञान विश्व वाले
    कालेज के जमाने में हम भेरू दादा जैसे लोगों को “ज्ञानबीड़ी” कहा करते थे!
    आशीष ‘झालिया नरेश’ विज्ञान विश्व वाले की हालिया प्रविष्टी..ब्रह्माण्ड मे पृथ्वी की स्थिति
  13. kunal pimpalkar
    वाह सुनील जी आपका लेखन तो कमाल का है पढ़कर बहुत मज़ा आया आपको ढेरो साधुवाद और फुरसतिया जी को धन्यवाद की आपने ये बीड़ा उठाया है और साहित्य सेवा की है आप जैसे लोग सच्चे देश भक्त है …….एक बार पुनः धन्यवाद …कुनाल पिम्पलकर
  14. prabhat sharma
    “भेरू दादा और पान की दूकान ” एक स्वस्थ चिंतन है जिसका जुडाव हम सब लोगो से है और आम आदमी की बात एक आम आदमी की तरह करना ही एक अलग दर्शन है सुनील जी की जितनी तारीफ की जाए कम है लेखनी में पकड है और फुरसतिया जी के बाकी लेख पढ़े मज्जा आ गया क्या हम सुनील की और रचनाए पढ़ सकते है ?
  15. रोहित निगम
    “भेरू दादा” क्या बात है आप की सोच तो कमाल है एन्जॉय करना वो भी इस तरह पहली बार देखा सुनील जी धन्यवाद ………………..रोहित निगम
  16. दीपक पाटीदार
    भेरू दादा और पान की दुकान ” एक सच्चा और अच्छा लेख है वाकई लोग इसी तरह के होते है और इतने गहरी तरीके से व्यंग्य उठाने के लिए सुनील जी को साधुवाद ……..
  17. देवेंद्र पाटीदार
    फुरसतिया जी को सबसे पहले धन्यवाद की उन्होंने सुनील जी को अपने ब्लॉग पर जगह दी और सुनील जी ने उनका मान रखा क्यों की बहुत ही सुन्दर तरीके से ये व्यंग उन्होंने प्रस्तुत किया ……उनकी कलम में जान है
  18. swati desai
    बहुत खूब लिखा है सुनील जी …………………………….शुक्रिया
  19. pritiy gang
    ये वास्तव में बेहद खुबसूरत लिखा है इसके लिए सुनील जी को दन्यवाद
  20. mohit soni
    सुनील जी हमारे पुराने मित्र है और हम उनकी प्रतिभा का लोहा जानते है |
  21. sonu
    क्या बात है भेरू दादा की …………………..मस्त है
  22. ram prakash
    ये है सही अवलोकन और दिशा …………….युवाओं को चाहीये की इसी दिशा में प्रयास करे .
  23. amit sharma
    भुत आच्च्चा है ……….
  24. prashant agrawal
    हम जानते थे की सुनील कुछ बेहतर ही लिखेंगे मज़ा आगया | ये लेख पढ़कर उनको साधू वाद |
  25. : …कुछ बेसिर-पैर की बातें
    [...] सुनील पाटीदार के लेख को लोगों ने बहुत पसंद किया। उन्होंने अपना ब्लाग बनाया है। आप उनके लेख यहां पढ़ सकते हैं। आशा है सुनील नियमित लिखते रहेंगे। ये भी देखें: आशा ही जीवन है देख लूं तो चलूं: उपन्यासिका आफ़ द ब्लागर, बाई द ब्लागर एंड फ़ार द ब्लागर जबरियन छपाई के हसीन साइड इफ़ेक्ट पुष्प की गंध से कुछ खटक सी गई अब तो कुछ कर गुजरने को दिल मचलता हैHello there! If you are new here, you might want to subscribe to the RSS feed for updates on this topic.Powered by WP Greet Box WordPress Plugin [...]
  26. sonu joshi
    वाकई मजेदार लिखा है पढ़कर एसा लगा जैसे की मै पान की दूकान पर ही खडा हु ..और इस ब्लॉग पर सारे लेख बहुत ही अछे है .
  27. pramod bansod
    ये लेख दमदार है हमने एसा पहले भी पढ़ा है पर ये एक अलग सोच न होते हुए भी अलग है बहुत बधाई | और शुभकामनाओं सहीत ( प्रमोद बनसोड)
  28. Dr. Zakir Ali Rajnish
    भेरूदादा रूपी से हर कोई बचा रहे, यही कामना है।
    हिन्‍दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
    ——
    जै हिन्‍दी, जै ब्‍लॉगिंग।

    घर जाने को सूर्पनखा जी, माँग रहा हूँ भिक्षा।
  29. Rakesh Kumar
    सुनीता जी की हलचल से यहाँ चले आये.
    भेरू दादा के बारे में पढकर अच्छा लगा.
    प्रस्तुति के लिए सुनील जी को और आपको बधाई
    और शुभकामनाएँ.
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