Tuesday, May 12, 2015

सिंप्लिसिटी आफ द प्राब्लम व्हेन साल्व्ड इस अमेजिंग

आज टहलने गए तो रास्ते में तिवारी जी मिल गए। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट वाले तिवारी जी। पुलिया, साईकिल पर बैठकर योग करते हैं। इनके पास भी रेले साइकिल है। खो गई थी तो दुबारा फिर रेले ही कसवाये। ( https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10203751064150553&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=1 )
5200 की है उनकी साइकिल। हमारी 4800 की सुनी तो उसके दाम जस्टिफाई किये-'हमारी में चेन कवर है।'
कोई भी आदमी आसानी से ठगा जाना पसंद नहीं करता।
तिवारी जी बोले- 'लाइए जरा आपकी साइकिल चलाकर देखते हैं। आप हमारी चलाइये।' फैक्ट्री के गेट नंबर 3 के पास से पुलिया तक एक दूसरे की साइकिल चलाये। तिवारी जी हमको साइकिल की गद्दी ऊँची कराने का सुझाव दिए।

तिवारीजी मुंह में पान मसाला दबाये थे। हम उनको मसाला छोड़ने की सलाह दिए। बोले-'आदत छूट नहीं पाती।'
लोग टहलते दिखे। एक कनेर के पेड़ के पास एक 'सुबह टहलुआ' कनेर के फूलों को पेड़ से नोचकर पालीथीन की थैली में भरते जा रहे थे। हाथ में उनके कुत्ते से बचने के लिए बेंत था। पेड़ बेचारा असहाय अपने फूल, अपनी सुंदरता लूटते देख रहा था। उसके पास तो कोई बेंत था नहीं जो फ़ूल तोड़ने वाले को मारकर भगा देता। ये फूल ले जाकर किसी को भेंट करेंगे। पूजा में चढ़ाएंगे। देवताओं को फौरन आकाशवाणी करना चाहिए कि पेड़ों से तोड़े गए फूल हम स्वीकार नहीं करेंगे।


फूल अज्ञेय की कविता 'साम्राज्ञी का नैवेद्यदान' याद आई। इसमें फूलों के बारे में लिखा है कवि ने:
"जो कली खिलेगी जहाँ, खिली,
जो फूल जहाँ है,
जो भी सुख
जिस भी डाली पर
हुआ पल्लवित, पुलकित,
मैं उसे वहीं पर
अक्षत, अनाघ्रात,अस्पृष्ट, अनाविल,
हे महाबुद्ध !
अर्पित करती हूँ तुझे ।
वहीं-वहीं प्रत्येक भरे प्याला जीवन का,
वहीं-वहीं नैवेद्य चढ़ा
अपने सुन्दर आनन्द-निमिष का,
तेरा हो,
हे विगतागत के, वर्तमान के, पद्मकोश !
हे महाबुद्ध ! "
दीदी से इस कविता का जिक्र किया तो बोलीं यह कविता पढ़ने के बाद मैंने भगवान पर फूल चढ़ाना छोड़ दिया। सौंदर्य और अच्छाई जहां है वहीं उसका सानिध्य पाना तो अच्छा है लेकिन उसको अपने कब्जे में करने का भाव, नोचने की इच्छा ठीक नहीं है। फूल पेड़ों और डालियों पर ही सबसे खूबसूरत लगते हैं। है कि नहीं?

एटीएम पैसा निकालने गए। 5-7 बार कोशिश किये। लेकिन हर बार मशीन बोली -'कार्ड गड़बड़ है। दुबारा प्रयास किया जाए।' कई महीनों से कार्ड ऐसे ही चला रहे हैं। हर बार यही सोचते रहे अब कार्ड बदलवा ही लेंगे। आज अपने को फिर से हड़काया- "अब कार्ड बदलवा भी ले मर्दे।" फ़िर सोचा वापस लौटने के पहले आखिरी बार कोशिश कर लें। और ससुर आखिरी बार एटीएम ने झांसा दे दिया और पैसे दे दिये। हमको फिर से याद आई अपने मित्र ढौंढियाल जी से की सुनी बात- 'सिंप्लिसिटी आफ द प्राब्लम व्हेन साल्व्ड इस अमेजिंग।' कोई समस्या जब हल हो जाती है तो उसकी सरलता अद्भुत लगती है।

लौटकर आये तब हाईकोर्ट में हुए तमिलनाडु के मुख्यमन्त्री को बरी किये जाने के किस्से पर बात हुई। कानून का मखौल। मुख्यमन्त्री के अधीन कर्मचारी उसके खिलाफ कैसे केस लड़ेंगे? अब अगला मैच सुप्रीम कोर्ट की पिच पर खेला जाएगा।

नीचे का फोटो भेड़ाघाट का है। सौंदर्य की नदी नर्मदा संगमरमर की चट्टानों के बीच से बहती है यहां। अद्भुत,अनिर्वचनीय है यहां का सौंदर्य। न देखा हो तो आइये देखने इसे।

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