घुमक्कड़ी, यायावरी, आवारगी और सैर-सपाटा दुनिया को बदलने के सबसे बड़े कारक रहे हैं। दुनिया में जितने भी बदलाव आज तक हुए उनके पीछे घुमक्कड़ी का ही हाथ रहा है। किसी नई जगह की खोज में निकले यात्री रहे हों या किसी देश पर कब्जे के लिए निकले राजे-महाराजे-सुल्तान-नवाब, सबके अंदर नई जगह को जानने का, आवारगी का कीड़ा ज़रूर रहा होगा। आवारगी का जिंदगी और जवानी से नज़दीकी संबंध साबित करने के लिए सबसे ज्यादा प्रयोग किए जाने वाला शेर है :
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहाँ,
ज़िंदगानी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ?
इस शेर का आम मतलब तो यह है कि जवान रहते-रहते दुनिया घूम ली जाए। लेकिन ख़ास मकसद यह है कि जो घुमक्कड़ है वही नौजवान है। यायावरी मतलब ज़िंदगानी। आवारगी मतलब ज़िन्दगी।
वैज्ञानिक बताते हैं कि ब्रह्मांड में लाखों-करोड़ों आकाशगंगायें अपने में अरबों-खरबों तारें समेटे प्रकाश की गति से एक-दूसरे से दूर भागती चली जा रहीं हैं। मुझे लगता है कि दरअसल ये आकाशगंगायें भी मूलत: घुमक्कड़ ही हैं। नई-नई जगह देखने का मन लिए भागती चली जा रही हैं। सृष्टि का महाविस्फोट भी इन आकाशगंगाओं की अदम्य यायावरी कामना के कारण हुआ होगा।
नौकरी पेशा इंसान के लिए घूमना मुश्किल काम होता है। आज के समय में नौकरी वह खूँटा है जो इंसान को पेट पालने और सुरक्षित जीवन की गारंटी देता है लेकिन बदले में उससे घूमने-फिरने-आवारगी की आजादी रखा लेता है। मध्यमवर्गीय समाज के नौकरी पेशा लोगों के लिए दफ़्तर, छुट्टी और दूसरे तमाम व्यक्त-अव्यक्त कारण होते हैं जो उसको इस खूँटे से ज़्यादा दिन तक अधिक समय के लिए दूर नहीं जाने देते।
कमलेश पांडेय जी सरकारी सेवा में अधिकारी होने के साथ जिज्ञासु यायावर भी रहे हैं। नौकरी की सीमाओं में रहते हुए घूमने के मौक़े निकालते हुए यात्राएँ करते रहे। उनकी किन्नौर, लक्षद्वीप, अंडमान, चार धाम और अरुणाचल प्रदेश की यात्राएँ इसी घराने की यात्राएँ रहीं हैं।सरकारी सेवा से अवकाश पाने के बाद तो वे निर्द्वंद घुमक्कड़ हो गए। कनाडा गए तो अमेरिका भी टहल लिए। वहाँ से लौटे तो यूरोप पर धावा बोल दिया। उनके ये कारनामे और इरादे देखते हुए लगता है कि आने वाले समय में उनके पासपोर्ट पर कई देशों के ठप्पे लगेंगे।
अपनी यात्राओं के बारे में कमलेश पांडेय पत्र- पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं। किताब के रूप में यह उनका पहला 'यात्रा' वृत्तांत' हैं। तसल्ली से यात्रा करने वाले कमलेश जी के यात्रा वृत्तांत भी तसल्ली वाली भाषा में हैं। कोई हड़बड़ी नहीं है विवरण में। आराम से लिखी बात आराम से ही पढ़ी जाने वाली होती है। इस तसल्ली वाली भाषा में खूबसूरत गोलाइयाँ हैं और ' यूँ ही पहलू में बैठे रहो,आज जाने की ज़िद न करो' अलसाया, मनुहारी सौंदर्य। इन वृत्तांतों में घूमी गई जगहों अकादमिक विवरण नहीं बल्कि उन जगहों की हवा और सुगंध का एहसास होता है। मेरे लिए इस मामले में ख़ास है यह यात्रा वृत्तान्त क्योंकि इसमें अमेरिका के सैंनफ़्रांसिस्को के अलावा मैंने कोई जगह देखी नहीं। इसको पढ़कर दूसरी जगहों के बारे में जानने और घूमने का मन बनाने में सुविधा होगी।
कमलेश पांडेय जी के कई व्यंग्य संग्रहों के बाद इस यात्रा वृतांत को पढ़ना सुकूनदेह है। इसके लिए उनको बधाई। आने वाले समय में आशा है उनके और यात्रा वृत्तांत पढ़ने को मिलेंगे।
अनूप शुक्ल
14 सितंबर, 2025
नोयडा