Tuesday, July 21, 2026

तैराकी का रोजनामचा


 आज मंगलवार है। हमारा पूल बंद रहता है। दूसरे पूल गए तैरने। पानी बरस रहा था। हल्का-हल्का। हौले-हौले। अपन साइकिल पर निकल लिए।  तैराकी वाला चश्मा, कैप एक और साइकिल की चाबी एक मोमिया में धर ली। स्वीमिंग के बाद बदलने के लिए कपड़े नहीं रखे। बेकार भीगते लौटते समय। बैग भी इसीलिए छोड़ दिया। सोचा बारिश में भीगते हुए लौटेंगे। पैडल पर पैर धरने के पहले घड़ी में साइकिल मोड ऑन कर लिया था। 

रास्ते में लोग रोज़ के अंदाज़ में आते -जाते दिखे। एक बालिका  सामने से मोपेड पर मुस्कराती चली आ रही थी। हमने सोचा पता नहीं क्या सोच कर मुस्करा रही होगी। बाद में देखा कि वह कान में स्पीकर लगाए मोबाइल पर किसी से बतिया रही थी। उसकी बातचीत उसकी मुस्कान की जननी थी। 

पूल पहुँचकर साइकिल में ताला में लगाया। घड़ी को साइकिलिंग मोड से हटकर स्वीमिंग मोड में किया। घड़ी में साइकिलिंग का हिसाब देखा। 2.09 किलोमीटर की दूरी 13.27 मिनट में तय की। 36 किलोकैलोरी ऊर्जा खर्च हुई। औसत हृदयगति 87 धड़कन प्रति मिनट। 

पूल किनारे पूल मैनेजर कुर्सी पर बैठा था।पूल की एक दिन की फीस दो सौ रुपए है। हमने पाँच सौ रुपए जमा किए। डिटेल बताया दो हफ्ते पहले वाला ही है। उसने दुबारा फ़ार्म नहीं भरवाया। हम आठ बजने में दस मिनट पहले पूल में उतर गए। कुछ लोग तैर रहे थे पूल में। हम भी शुरू हो गए। 

तैरते हुए हाथ और पैर के मूवमेंट देखें गए वीडियो के हिसाब से चलाने लगे। हाथ तो ठीक चले। आइसक्रीम निकालने की तरह हाथ घुमाने की कोशिश करते रहे। ध्यान हाथ में रखने में पैर आवारा हो गए। दूर-दूर। सर उठाकर साँस लेने की कोशिश की। कई बार सफल हुए। कभी असफल। देखें गए वीडियो से अपनी तैराकी की कॉपी भी जांचते रहे। हाथ घुमाकर नीचे करते हुए सर उठाना चाहिए। लेकिन अक्सर ऐसा होता रहा कि सर पहले उठ गया। जब तक हाथ पीछे होता, ऊपर की तरफ़ धक्का लगता तबतक सर पानी में डूब चुका होता। हर बार लगता  तैराकी समय का खेल है। इतने दिन कि सीख का हासिल यह हुआ जब भी कोई मूवमेंट ग़लत होता, पता चल जाता। उसको निरस्त करके फिर तैरने लगते। 

पूल में एक बालक था कोचिंग के लिए। शिवम नाम। उसने मेरे मूवमेंट देखकर कहा -'  ठीक कर रहे हैं। लेकिन सर थोड़ा और ऊपर उठाइये। साँस लीजिए।' हमने कहा -'वही कोशिश कर रहे हैं।'

तैरते हुए हाथ से पानी पीछे करने के बाद हाथ आगे ले जाने होते हैं। हाथ इस तरह आगे ले जाने होते हैं मानो हथेली में रखी हुई कोई किताब पढ़ रहे होंगे। हमने हाथ आगे करते हुए हथेली में रखी हुई कई किताबें पढ़ीं। अभी पढ़ी/देखी  जा रही तमाम किताबों के कवर पेज हथेली में रखे महसूस किए। मारखेज की लव एट द टाइम ऑफ़ कालरा, डायना नायड की Find a way, कृष्ण बलदेव वैद की बदचलन बीबियों का द्वीप, ब्रजेश क़ानूनगो की घर बैठे घुमक्कड़ी, जोसफ हेलर कि कैच 22, श्रीलाल शुक्ल की रागदरबारी, जेरी पिंटो की एम और हूम साहब,  प्रभात गोस्वामी की लिखने छपने के टोटके, अतुल चतुर्वेदी की व्यंग्य आलोचना के विविध आयाम  कविताओं का संग्रह घर लौटने का सपना। ये सब किताबें अभी बिस्तर के पास हैं। अक्सर उलटते-पलटते हैं। पढ़ते हैं। इसलिए इनके नाम लिख दिए। बाक़ी की ऊपर पढ़ने के कमरे हैं जहाँ जाना रोज़ स्थगित हो जाता है।

तैरते हुए कभी-कभी मूवमेंट एकदम वीडियो के हिसाब से हो जाता।  सर पानी में अच्छे से ऊपर उठता।पानी शरीर को झुला सा झुलाते हुए ऊपर उठाता। पाँव के मूवमेंट भी मेढक की तरफ़ हो जाते। हाथ पूरे आगे फैलते। ग्लाइड अच्छा होता। शरीर का संतुलन बढ़िया हो जाता। लगता बस अब सीख गए। पानी के ऊपर सीधे लेटे हुए वे क्षण अनिर्वचनीय लगते। एहसास हुआ कि तमाम लोग क्यों घंटों पानी में तैरते रहते हैं। 

कभी पानी में सांस छोड़ने पर नीचे से आने वाली बूँदें चेहरे से टकराती तो लगता पानी ने हमको हमारी साँस का रिटर्न गिफ्ट दिया है। बूँदे पानी के फूल हैं। हमको तैरते देखकर पानी हमारे ऊपर अपने फूलों की वर्षा कर रहा है। पानी की बूँदें ही उसके फूल हैं। जिसके पास जो होगा वही तो देगा। वही उसका उपहार होगा। अमेरिका के बारे में लिखते परसाई जी  ने लिखा है -' अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं।बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है।'

इसी तर्ज पर अब देश में कहीं बुलडोजर चलता है तो भक्त लोग कहते हैं -'कानून का शासन स्थापित हो रहा है।' बुलडोजर का काम सड़क बनाना माना जाता था। निर्माण में सहयोग का था। अब इसका मुख्य काम अब निर्माण नहीं विध्वंस हो गया है। पार्टी बदल ली है उसने भी। उसका हृदयपरिवर्तन हो गया। क्या पता इसके लिए उसे भी किसी पद का लालच दिया गया होगा। कहीं प्रदर्शन करने वालों पर आँसू गैस और लाठी चार्ज लोकतंत्र की स्थापना बताई जाती है। कहीं हुआ बड़ा भ्रष्टाचार विकास का बढ़ता कदम हो गया। बहुत तेज गति है विकास की आजकल। झूठ बोलना कभी पाप माना जाता था। अब हर झूठ मास्टरस्ट्रोक की संज्ञा पा चुका है। इसे कोई अंध भक्तअमृतकाल बतायेगा। कोई भगवान भक्त माला फेरता हुआ कहता होगा -' हे प्रभो, कब लोगो अवतार।'

घंटे भर से ऊपर तैरने के बाद पूल से बाहर आए। घड़ी का तैराकी मोड बदलकर फिर साइकिलिंग वाला किया। इसे बीच पूल रिपोर्ट बता रही थी कि अपन सवा घंटा पानी में रहे। इस बीच 358 किलोकैलोरी ऊर्जा फूँक दी। 420 मीटर तैरे। दिल एक मिनट में 84 धड़कन के हिसाब धड़का। कोच ने कहा -' प्रैक्टिस करते रहे। जल्दी ही सीख जायेंगे।'

पाँच सौ रुपए के छुट्टे नहीं थे पूल वाले के पास। उसने मुझसे नम्बर पूछकर मेरे मोबाइल में भेज दिए। हम पैडलियाते हुए घर वापस आ गए। लौटते में दूरी वही रही लेकिन दिल की धड़कन 90 रही। ऊर्जा की खपत हुई 35 किलो कैलोरी।

स्वीमिंग पूल में तैरते हुए किताब पढ़ने के अभ्यास के बाद अब वास्तव में किताब पढ़ने जा रहे। शुरुआत 'लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा' से करेंगे। दोपहर बाद फ़िल्म देखेंगे- "आइस वाइड ओपन"। आधी देख चुके हैं कल। आप कौन सी किताब पढ़ रहे हैं? कौन सी फ़िल्म देख रहे हैं?







Sunday, July 19, 2026

इतवार की तैराकी

 


भीगा-भीगा है शमा, ऐसे में है तू कहाँ 

मेरा दिल ये पुकारे आ जा।

पूल से निकलकर शॉवर लेने के बाद तौलिए से बदन पोछते हुए बालक गाना गा रहा था। दोस्तों से बात करते हुए बता रहा था -' पंद्रह दिन हो गए। अभी स्वीमिंग आई नहीं। हमने कहा -' आ जायेगी। स्वीमिंग भी आयेगी। जिसको पुकार रहे हो वह भी आयेगी।' 

बालक हँसने लगा। हमने उसको यह नहीं बताया कि हमको डेढ़ महीना हो गए यहाँ सीखते। अभी तक  तैरना नहीं आया। उसका तो कहीं सवाल ही नहीं।

स्वीमिंग पूल में आजकल समय शुरू होते ही खतम हो गया लगता है। घंटा कब पूरा हो गया पता ही नहीं चलता। कल थोड़ा जल्दी गए। जल्दी मतलब पाँच मिनट पहले। पूल में उतरने लगे तो पानी में मौजूद कोच ने रोक दिया। कहा -' पहले वालों को निकल जाने दीजिये।' 

समय पर उतरे तो पता चला कि स्वीमिंग कैप और चश्मा बाहर बैग में ही भूल गए। वापस लेने गए। पाँच मिनट लेट हो गए।

बाद में  स्वीमिंग पूल से समय  पूरा होने पर बाहर निकले। एक दूसरे कोच ने कहा -'अंकल आज आप जल्दी बाहर निकल आए।' हमने कहा -' एक कोच ने समय से पहले घुसने नहीं दिया। दूसरा देर तक पूल में रहने के लिए टोके इससे पहले निकलना ही बेहतर।' उसने कहा -'अंकल, आपको एक दिन देर तक स्वीमिंग करायेंगे।' 

हमने कहा -' हम अपने समय में ही करते रहें यही बहुत है।' 

स्कूल खुल जाने के चलते बच्चे कम आने लगे हैं।स्वीमिंग पूल में लोगों की संख्या कम हो गई है। कुछ कोच भी कम कर दिए गए हैं। एक कोच ने दुखी मन से, पूल प्रबंधकों से थोड़ा नाराजगी व्यक्त करते हुए यह जानकारी दी। हमें लगा कि अपने कर्मचारियों को 'फ़ायर' करने के मामले में हम लोग अमेरिका की बड़ी कंपनियों से कम नहीं हैं। अगले महीने की शुरुआत से रात 9 से 10 का बैच खत्म कर दिया गया।

'फ़ायर' और स्वीमिंग कूल कोच से दो दिन पहले नेटफ्लिक्स पर देखी मूवी 'डिजायर' याद आ गई। इसमें उम्रदराज महिला के एक युवा स्वीमिंग कोच से संबंध हो जाते हैं। यौन संबंध बनते हैं। बाद में महिला इस संबंध को ग़लत मानते हुए इसको खतम करना चाहती है। लेकिन युवा कोच ऐसा नहीं चाहता। फिर कोच उस महिला की बच्ची को , जो कोच से आकृष्ट रहती है, डेटिंग पर ले जाता है। इसके बाद परिवार के सब लोग मिलकर कोच को निपटा देते हैं। फ़िल्म देखने के बाद लगा कि इस मामले में पहले महिला ने की थी। लेकिन निपटाया गया कोच। फ़िल्म  वाले उसको मारे बिना भी अलग कर सकते थे। लेकिन उनकी समझ। उनके हिसाब से इसी तरह ठीक था।

कल और आज भी अपन ब्रेस्टस्ट्रोक को मास्टर करने में जुटे हैं। हाथ और पांव चलाना जानते हैं। लेकिन हर बार चल नहीं पाते। यह समझ में आया कि हम सर ग़लत समय पर उठाते हैं। जब हाथ से पानी पीछे खींचते हैं तब सर उठाना चाहिए। लेकिन हम सर तब उठाते रहे जब हाथ आगे जा रहे होते हैं। पाँव भी सही समय पर चलने से  भटक। नतीजा यह होता है अक्सर सर ऊपर नहीं उठता। कभी-कभी उठ भी जाता है। जब उठता है तब लगता है ,हाँ यही है असल तरीका। लेकिन अगली बार फिर कुछ गड़बड़ हो जाती है। लेकिन यह पक्का लगता है  एकाध दिन बाद सारे एक्शन में तालमेल बैठ जाएगा। 

आज लौटते समय पानी बरस रहा था। पूल से निकलकर शॉवर लिया। गीले कपड़ों में ही भीगते हुए साइकिल चलाते हुए वापस आ गए। 



Thursday, July 16, 2026

बारिश में भीगना


 आज स्विमिंग के लिए निकलते समय पानी बरसने लगा। पहले धीमा फिर तेज। लगा पूल बंद होगा। लेकिन बिजली नहीं चमक रही थी। इसलिए सोचा शायद चालू हो पूल। लेकिन कोई सूचना नहीं थी ग्रुप में। सोचा पूल बंद भी होगा तो बारिश में भीगने की तमन्ना पूरी होगी। हम निकल लिए। सात बजकर चालीस मिनट थे जब निकले।
बारिश में बैग लेकर नहीं गए। बेकार भीग जाता। स्वीमिंग कास्ट्यूम (लोवर) और टी शर्ट पहनकर निकले। पूल पास, स्विमिंग कैप और तैराकी चश्मा मोमिया में धर लिया। मोबाइल घर छोड़ दिया। घड़ी को घर से तैराकी मोड में कर लिया। घर से ही साइकिल तैराकी शुरू कर दी।
रास्ते में कालोनी के साइकिल प्रेमी शुक्ला जी मिले। सुबह की साइकिलिंग करके लौट रहे थे। हमको देखा तो हाथ हिलाकर हेलो कहा। हमने भी किया। पूरे रास्ते कल और आज के देखे वीडियो याद करते हुए सारे स्टेप्स मन में दोहराते रहे।
पूल पर पहुंचे तो लोगों ने बताया 8-9 नौ बजे का बैच कैंसल हो गया। शाम को आयेंगे तैरने। अंदर पहुंचे तो कोच और स्टॉफ पूल में गिरते पानी को देखते बैठे थे। एक ने बताया कि ग्रुप में मेसेज डाला था 8-9 नौ बजे के बैच के कैंसलेशन का। हमने बताया -'जब हम निकले तब तक नहीं डाला होगा।'
बाद में देखा हमारे निकलने के छह मिनट बाद का था मेसेज।
पूल से लौटते हुए एक जगह बारिश से बचने के लिए बैठे चार लोग मिले। वे दिहाड़ी मजदूर थे। उनसे बतियाये। वे बारिश के मजे लेते हुए बतिया रहे थे। एक ने कहा -' पानी बरसने से अच्छा हुआ। तराई आराम से हो जायेगी। गर्मी नहीं होगी। मसाला में पानी मिलाने के झंझट नहीं होगा।'
उनमें से एक नेपाल का मूल निवासी था। बताया कि उसके पिता भी यहीं आए। कमाए। यहीं ख़त्म हो गए। बचपन से यहीं हैं। नेपाल कभी-कभी जाते हैं। पत्नी उड़ीसा की है। यहीं मुलाक़ात हुई। बचपन में साथ खेले-कूदे। बड़े हुए शादी हो गई। संवाद की भाषा हिंदी हो गई। नेपाली-उड़िया बिसर गई। उड़ीसा और नेपाल के लोगों का लखनऊ में मिलन की कहानी सुनकर हमको प्रमोद तिवारी का गीत याद आया :
'राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं,
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।'
(इस प्यारे गीत का लिंक यह रहा में। सुनिए। बहुत अच्छा लगेगा।)
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंदु शाह के बारे में बात हुई। उसने कहा -'बालेंदु अभी युवा है। नया है। काम कर रहा है। आगे पता चलेगा कैसा करता है।'
बाक़ी कामगारों में एक दो उन्नाव के थे। एक लखीमपुर का। हमने बताया -'लखीमपुर में हमारी ससुराल है।' उसने इसे सूचना की तरह ग्रहण किया। खास इज्जतआफ़ज़ोई नहीं की। हम आगे बढ़ गए।
आगे एक आदमी सड़क के डिवाइडर पर गद्दा, चादर बिछाए नंगे बदन चित्त, सीधा लेटा था। सर और हाथ ऊपर सरेंडरी मुद्रा में। ऐसे जैसे आसमान और बारिश के सामने समर्पण कर दिया हो।
बात की तो वह भी लखीमपुरिया निकला। बोला -'गर्मी लागि रही रहय यही लाने पानी में पहुड़े हन।' (गर्मी लग रही थी इसलिए बारिश के पानी में लेटे हुए हैं)।
आगे मोड़ पर एक कार ड्राइवर एक मोटरसाइकिल के पीछे बैठी सवारी से वाकयुद्ध में उलझा था। शायद बिना इंडीकेटर दिए मुड़ने का मामला था। कार ड्राइवर युवा था। बाइक सवारी बुजुर्ग। चालक युवा था। कार चालक ने बुजुर्ग को धमकाते हुए कहा -' उमर का लिहाज कर रहे हैं वरना बताते।' बुजुर्ग सवारी ने जबाब दिया -'हमने कोई गाली थोड़ी दी है।' कार चालक ने आवाज ऊँची करते हुए कहा -' गाली देते तो जबान नहीं खींच लेते।'
हम दोनों के लगभग बीच खड़े उनके मधुर वार्तालाप को देख-सुन रहे थे। हमने दोनों से शांति स्थापित करने की फ़िज़ूल अपील की। लेकिन उसको नजरअंदाज करते हुए दोनों बहस करते रहे। कुछ देर बाद, शायद वाकयुद्ध से बोर होकर, कार वाला कार स्टार्ट करके आगे बढ़ गया। आगे बढ़ने के पहले उसने अपने मुँह का पान मसाला बहसस्थल पर थूका। ताकि सनद रहे।
घर पहुँचकर हमने गेट के पास खड़े होकर अपना फ़ोटो खिंचवाया। बारिश में भीगने की याद के रूप में। देखिए आप भी। अब शाम को जाएँगे तैरने के लिए। तब तक वीडियो देखेंगे। ऑफ़ पूल अभ्यास करेंगे। ठीक है न?

Monday, July 13, 2026

तैराकी के किस्से

आज सबेरे तैरने के लिए समय पर निकले। हमारे आगे दो महिलायें साइकिल पर जा रहीं थीं। शायद काम पर। हमने सोचा आगे बढ़कर उनके काम के बारे में बतियायें। लेकिन उनको आपस में बतियाता देखकर नहीं बढ़े। एक बच्ची सड़क पारकर रही थी। उसको देखकर केदारनाथ सिंह कविता याद आ गई : 

"मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है

 क्योंकि इस तरह एक उम्मीद -सी होती है 

कि दुनिया जो इस तरफ है 

शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ़।" 

बच्ची दिन में कई बार सड़क पार करती होगी। उसके लिए दुनिया एक जैसी रहती है। 

आगे एक बच्चे मोटरसाइकिल पर बैठा था। बाइक की चाबी मुँह में दबाये वह इधर-उधर ताक रहा था। उसके माँ-बाप जमीन पर बैठे बतिया रहे रहे। मुझे लगा ऐसे ही किसी मामले में चाबी मुँह में चली जाती है। फिर उसको निकलने की जद्दोजहद होती है। कभी -कभी फँस भी जाती है चीजें गले में । फिर ऑपरेशन होते हैं। 

डिवाइडर पर बैठे मजदूर लोग सुबह के होने का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ लोग मोबाइल देख रहे थे। कुछ बतिया रहे थे। कुछ बीड़ी पी रहे थे। कुछ लोग आते-जाते लोगों को ताक रहे थे। सामने एक छुटकी गुमटी में  महिला ठसक के साथ मजदूरों को सामान बेच रही थी। उसके पान खाये मुँह से आत्मविश्वास की छटा दर्शनीय थी।

पूल पर ठीक आठ बजे पहुँचे। उतर गए पानी में। अच्छा अभ्यास हुआ। हाथ-पाँव सब ठीक चले। मुंडी भी ऊपर उठी। पानी के बाहर सर ऊपर करके साँस भी ली। लेकिन शायद ठीक से काम बना नहीं। इसलिए पाँच-सात मीटर बाद फिर से शुरू करते रहे।

पानी के बाहर सर करने के बावजूद साँस नहीं ले पाने का कारण शायद यह रहा कि हमको एक ही साँस में काम चलाने का अभ्यास है अभी तक। साँस का कैप्सूल जब तक चला तब तक तैरे। जहाँ साँस का कोटा ख़त्म, खड़े हो गए। साँस की बचत करके तैरने के अभ्यास के चलते नई सांस लेने में परहेज करते रहे। 

राहत इंदौरी का शेर याद आता रहा :

"उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो" 

मतलब साँस पूरी छोड़ने के पहले नई साँस ले लेनी चाहिए। लेकिन सर पानी के ऊपर उठाने के बावजूद हवा से सांस लेने का अभ्यास पक्का नहीं हुआ है अभी। एकाध बार ले भी की साँस। हाथ और पाँव आज पूरे अनुशासन से ड्यूटी पर लगे रहे। पुल ठीक हुआ, किक बढ़िया हुई। बस अब बीच का मामला ठीक करना है। बीच का मामला ठीक हो जाये तब क़ायदे से तैरना हो। 

घंटे भर में 210 किलोकैलोरी खर्च करके पूल से वापस लौटे। कल पूल की छुट्टी है। लेकिन हमको अभ्यास करना है। किसी दूसरे पूल में जायेंगे। तैराकी सीखने में मजा आ रहा है। यह तैराकी से प्रेम है या हमारा पागलपन कहना मुश्किल। लेकिन प्रेम और पागलपन से जुड़ा एक संवाद जेरी पिंटो लिखित किताब 'एम और हूम साहब' में इस तरह है :

"प्रेम कभी भी पर्याप्त नहीं होता। पागलपन ज़रूर पर्याप्त होता है, यह अपने आप में पूरा होता है।" 

कैसा लगा यह संवाद? किताब अभी पढ़ रहे हैं। पूरी पढ़ लेंगे तब लिखेंगे इसके बारे में। 



Sunday, July 12, 2026

तैराकी के बहाने


 हमने  मई महीना खत्म होने के दो दिन पहले से स्वीमिंग सीखना शुरू किया। पहले हफ़्ते के बाद हाथ और पांव पानी में चलाने लगे। शुरुआत मिक्स्ड स्ट्रोक से की। हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्री स्टाइल में। हाथ और पांव की समस्या के कारण यह 'गठबंधन स्ट्रोक' चुना। फ्री स्टाइल में कंधे उखड़ जाने का डर था। ब्रेस्ट स्ट्रोक में जांघ के जोड़ में दर्द था।  तैराकी शुरू हो गई। लेकिन सर पानी के ऊपर नहीं आता था। 

समय के साथ जांघ का दर्द खतम हो गया। शायद स्वीमिंग से  फ़ायदा हुआ। वाटर थेरेपी जैसा कुछ। हम पाँव भी ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलाना शुरू कर दिए। लेकिन फ्री स्टाइल में पांव चलाना भूलने और ब्रेस्ट स्ट्रोक में सीखने में हफ्ता से ज़्यादा लग गया। अब हाथ और पांव ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलने लगे हैं। कभी ग़लत चलता है तो फ़ौरन अंदाज़ा हो जाता है। लगता है 'मिसस्ट्रोक' हो गया। 

सीखने के दो हफ़्ते बाद एक कोच ने PC का सुझाव दिया। PC मतलब पर्सनल कोचिंग। सुझाया -'आप फलाने सर से PC ले लीजिए। जल्दी सीख जायेंगे।' हमने सुझाव सुन लिया लेकिन अमल में नहीं लाए। हमको कोई हड़बड़ी नहीं थी। जल्दी सीखकर क्या करेंगे? सोचा आराम से सीखेंगे। जल्दी सीखने में लफड़ा यह भी गलतियाँ कम होंगी। ग़लतियाँ नहीं होंगी तो मजा नहीं आयेगा। उन ग़लतियों से सीखने का मौक़ा गँवाना कोई समझदारी थोड़ी है।

PC से हमको अपनी कक्षा 11 के एक किस्से की याद आ गई। हम हिन्दी मीडियम से कक्षा 10 पास कर के अंग्रेजी मीडियम में कक्षा 11 में आए थे। बीएनएसडी के F1 सेक्शन में। उस समय हाई स्कूल के यूपीबोर्ड के 75% से ऊपर नंबर लाए बच्चे F1 में पढ़ते थे। शुरुआती दिनों में लेक्चर अंग्रेजी समेत बाउंसर जैसे निकलते रहे। जो बोर्ड में लिखते गुरुजी वही समझ में आता। बाक़ी हवा हवाई हो जाता। तिमाही  इम्तहान हुआ। फिजिक्स में चालीस में नौ नम्बर थे। मतलब फेल। हाईस्कूल में अपने स्कूल का टॉपर रहा बच्चा तीन महींने बाद फेल हो गया। सिर्फ़ माध्यम बदलने से। 

कॉपी दिखाई गई। पता चला एक चार नम्बर का सवाल जांचने से रह गया था। हमने सवाल सही भी किया था। चार नम्बर जोड़कर 13/40 नंबर हो गए। फेल होने से बच गए। बाद में पता चला गुरु जी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं। कई लड़कों ने उनसे पढ़ना शुरू कर दिया। हमसे भी कहा गया। लेकिन हमारे पास न गुजाईश थी न मन। हमने ट्यूशन ज्वाइन नहीं की। बस मेहनत करते रहे। उस समय की चलन में जितनी भी किताबें थीं सबके सवाल लगाकर अभ्यास करते रहे। उसका फ़ायदा हुआ कि बिना ट्यूशन पढ़े पास होते रहे। बाद में तो बाजपेयी सर के संपर्क में आने पर उत्साह भी बढ़ गया। मेहनत और उत्साह के संगम का फल यह हुआ कि इंटर में यूपीबोर्ड की मेरिट लिस्ट में भी नाम आया। 

 हमने तो PC नहीं ली। लेकिन   कोच लोग कुछ लोगों को जिस तरह तल्लीनता से सिखाते हैं उससे लगता है कि उन लोगों ने PC ली है। कोच लोग उन कुछ लोगों को हाथ पकड़कर, सर और पैर के मूवमेंट सिखाते हैं उससे लगता है कि वे उन लोगों के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम कुछ पूछते हैं तो हाँ, ना में बताकर उनको सिखाने में लग जाते हैं। हमारे हिस्से पूल और पानी ही आता है। लेकिन हमको कोई शिकायत नहीं। हमने ख़ुद को अपना कोच नियुक्त कर रखा है। पर्सनल कोच। बिना फीस का कोच। हर स्टेप पर अपनी कॉपी जांचते हैं और कमियाँ पकड़कर सही करते हैं। कभी-कभी वहाँ मौजूद कोच से अपने मूवमेंट के बारे में पूछते हैं तो वो दूसरी तरफ़ या अनमने अंदाज़ में देखकर बताते हैं -' ठीक है। साँस लीजिए। सर थोड़ा और ऊपर उठाइये। सीख जायेंगे।' 

हम सोचते हैं -' सीख तो जायेंगे ही। कोई नाम नहीं मुश्किल, जब किया इरादा पक्का।' 

आज थोड़ा देर से पहुँचे पूल। दस मिनट देर। लेकिन आज सर पानी से बराबर ऊपर उठने लगा। साँस पानी के अंदर  नाक से छोड़ते हुए सर उठाने लगे। थोड़ी साँस लेने भी लगे। लेकिन पूरी तरह साँस लेना अभी आया नहीं। असल में जिस समय सर ऊपर होता है उस समय पैर तमाशबीन की तरह ठहर जाते रहे। पैरों को लगता होगा कि पानी से सर बाहर आना कितनी ऐतिहासिक घटना है। इसको देखना जरूरी है। लिहाजा वे ठहरकर शायद नजारा देखने लगते। इसके चलते शरीर पानी में डूबने लगता। हम खड़े हो जाते।तैरना स्थगित हो जाता। 

दूसरी समस्या यह महसूस की हमने हम जिस समय सर पानी के ऊपर उठाते हैं ठीक उसी समय पाँव पीछे की तरफ़ करते हैं। दोनों काम एक साथ होने से फ्लोटिंग को समय कम मिलता है। शरीर टेढ़ा होकर पानी में न्यूनकोण (45 डिग्री) बनाकर खड़ा हो जाता है।जबकि होना यह चाहिए कि सर ऊपर उठाकर साँस लेने के बाद पांव पीछे करने चाहिए ताकि पानी में संतुलन बना रहे। फ्लोटिंग होती रहे। इस पर मेहनत करना है। एकाध, दो-चार, पाँच-सात दिन में हो जाएगा। 

हमारा तैराकी रोचनामचा पढ़कर हमारे कुछ मित्र भी पानी में उतर चुके हैं। तैरना सीखने लगे हैं। हमारे कानपुर के मित्र राजीव टंडन जी ने तो तैरने के साथ -साथ हर गतिविधि का विश्लेषण भी करना शुरू कर दिया है। तैरते हुए टिल्ट क्यों होता है, ये क्यों, वो कैसे। कल  सुनीता सनाढ्य पांडेय जी ने भी बताया कि वे अपने जीवन-जोड़ीदार  के साथ तैरना सीख रही हैं। इसके अलावा और कई मित्रों ने तैरना सीखने के बारे में सोचना शुरू कर दिया। शायद जल्दी ही वे भी स्वीमिंग पूल पहुंचे। 

हमारी यह 'तैराकी कुंडली'  हमारे मित्र Parveen Goyal ने बनाकर हमारी पिछली पोस्ट की टिप्पणी में लगाई थी। हम इसे अपने पोस्ट में लगा रहे हैं। इसमें तैराकी के टिप्स भी हैं और सीखने का सूत्र वाक्य भी - ' उम्र सिर्फ़ एक संख्या है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती।' 

आप भी सोच रहे हैं तैरना सीखने के बारे में? सीखिये। मजेदार है।

Saturday, July 11, 2026

तैराकी सीखने का छठा हफ़्ता



 स्वीमिंग पूल में घंटा पूरा होने के पाँच मिनट पहले सीटी बजने लगती है। चेंज करिए। बाहर निकलिए। आ जाइए। अंकल टाइम अप हो गया का हल्ला शुरू हो जाता है। अपन भो घड़ी देखकर निकलने का उपक्रम करते हुए एकाध बार और तैरने का मन बनाते हैं। देखते हैं घड़ी। कभी लगता है 57 मिनट हुए। तीन मिनट बाद निकलेंगे पूल से। कभी तैराकी में खर्च कैलोरी 200 से दो-चार-दस कम दिखती है । लगता है डबल सेंचुरी कर ही लें। कभी मन की कर लेते हैं। कभी पहले ही बाहर आना होता है।

तैराकी का हमारा बैच सबेरे आठ से नौ का है। इसके बाद सबेरे की शिफ्ट खतम हो जाती है। सारे कोच घर जाने के मूड में होते हैं। कपड़े पहनकर, झोला उठाकर चलने को तैयार। जाने के पहले सुनिश्चित करना होता है कि कोई पूल में रह न जाये। इसीलिए सबको बाहर निकालने के लिए बार-बार कहते हैं।

कल हम पूल से  निकल रहे थे। कोच ने कहा -'अंकल घड़ी देखकर निकलते हैं। पूरा समय यूटिलाइज करते हैं।' 

हमने कहा -' हाँ भाई, क्लास पूरी होनी चाहिए। बंक नहीं करना चाहिए।' 

उसने कहा -' स्वीमिंग बैच एक घंटे का होता है। लेकिन टाइम पचपन मिनट का होता है। पाँच मिनट चेंज का होता है।' 

हमारा तो घंटा हो चुका था। हम पूल से निकलकर शॉवर लेकर निकल आए। तय किया पाँच-दस मिनट पहले आया करेंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। पूल पहुंचते-पहुंचते आठ बज ही जाते हैं। 

मंगलवार को पूल बंद रहता है। उस दिन पास के दूसरे पूल गए। वह पूल छोटा है। लगभग आधा। महीने की फ़ीस ढाई हज़ार (हमारे पूल की तीन हज़ार है)। एक दिन की फीस डबल। दो सौ रुपए देकर घंटा भर तैरे। 

कोच ने हमारी बातचीत सुनकर कहा -'आप कानपुर के हैं? '

हमने पूछा -' कैसे पहचाना?'

उसने कहा -'आपके बातचीत करने के अंदाज़ से।' 

हमने सोचा ये तो मजेदार है। हमारी बातचीत से कोई पहचान ले कि हम कानपुरिया हैं- 'झाड़े रहो कलट्टरगंज।'

बाद में पता चला बालक बलिया का  है। बलिया से जुड़ा जुमला है -'बलिया जिला घर बा तो कौन बात का डर बा?' 

हमने बालक से कहा -'आप सिखाओ तो आकर।' 

बालक ने कहा -'चलिए हम आते हैं।' 

पूल में उतरते ही बालक कूदकर पानी में आ गया। हाथ, पाँव चलाने के तरीक़े बताते रहा। पैर पकड़कर मेढक की तरह चलाये भी। इसके बाद हम तैरते रहे। 

साथ में तैरने वाले बुजुर्ग ने बताया -'साढ़े पाँच महीने हो गए। अभी पूरा सीखे नहीं है।' 

हमने सोचा -'अभी हमारा तो महीना ही हुआ सीखते। ये तो हमसे पहले से सीख रहे हैं।' अपना अभी तक तैरना सीख न पाने का अपराध बोध पानी में घुल गया।

साथ की महिला ब्रेस्ट स्ट्रोक, फ्री स्टाइल,  बैक स्ट्रोक मतलब हर तरह से तैराकी कर रही थीं। उन्होंने हमें ब्रेस्ट स्ट्रोक के गुर बताये। तैरकर बताया। हमने सोचा -' ये साथ में सिखातीं तो हफ़्ते भर में ही सीख जाते।' लेकिन सोचने से क्या होता है?

इस बीच रोज ढेर सारे वीडियो देखे यूट्यूब पर। ब्रेस्टस्ट्रोक के। नोट्स लिए। कौन सी ग़लतियाँ न करें। सब नोट किया। याद भी किया कि ब्रेस्ट स्ट्रोक में एक्शन का क्रम Pull (हाथ) , breathe (साँस) , kick (पैर) , glide (शरीर) की गतिविधि होती है। कुछ और सूत्र ये हैं

1. किक में पैर ज़्यादा दूर तक नहीं फैलाने हैं। केवल कमर तक की दूरी तक ले जाने हैं।
2. घुटने मोड़ने के बाद 15 सेकेंड तक आराम करें (रुकें)। घुटने पास रखें (Keep your knees narrow)
3. साँस लेने के लिए सर को बहुत ऊपर नहीं उठाना चाहिए। इसमें ऊर्जा का क्षय होता है। जितनी बार सर ऊपर जाएगा, उतनी बार हिप्स नीचे आयेंगे।
4. सर को पानी 35 से 45 डिग्री तक ऊपर उठायें। टेनिस बॉल प्रैक्टिस ।

सब बातें पूल में याद करके प्रैक्टिस करते रहे। कभी-कभी समन्वय गड़बड़ा जाता। यह देखा कि जब-जब सारे एक्सन कॉपी बुक स्टाइल में किए, तैरने में सहज रहे, तब तब दूर तक तैरे।

अभी तक हाथ और पैर का मूवमेंट सीख गए। आज पानी से मुंडी ऊपर उठाना भी सीख गए। लेकिन सर ऊपर उठाते हुए साँस लेना अभी अच्छे से सीखना है। लगता है दो-चार दिन में आ जाएगा। इसके लिए पानी में ब्रीथिंग की एक्सरसाइज कई बार की। लेकिन उस अभ्यास को तैरते समय अमल में लाना है।

पूल से निकलते समय आज एक बालक पानी में सर नीचे किए खड़ा था। ऐसे लगा पानी में शीर्षासन कर रहा था। मजेदार। हमने ताज्जुब व्यक्त किया तो वह दुबारा पानी में सर के बल खड़ा हो गया।

रोज़ साथ तैरने वाले एक युवा ने कहा -'आप इस उम्र में सीख रहे हैं यह देखकर अच्छा लगता है।'

हमने कहा -'हमको मजा आ रहा है सीखने में। वो तो घंटे भर की लिमिट है यहाँ। अनुमति हो तो घंटों तैरते रहें।'

पूल अक्टूबर में बंद हो जाता है। अक्टूबर के बाद शहर में कोई दूसरा पूल खोजेंगे जहाँ जाड़े में भी तैरने का अभ्यास कर सकें।

हमारी तैराकी सीखने की पोस्ट पढ़कर हमारे कुछ मित्र भी पानी में उतरे हैं। कुछ मन बना रहे हैं। कुछ लोग अपने घर-परिवार के बुजुर्गों को ज़बरियन सीखने के लिए धकेल रहे हैं। यह अपने आप में मजेदार बात है।

यह हमारा तैराकी सीखने का छठा सप्ताह है।






Saturday, June 27, 2026

तैराकी सीखने का पच्चीसवाँ दिन


 आज सुबह स्वीमिंग के लिए घर से निकले। सोसाइटी के गेट के पास एक गिलहरी सड़क पार करती हुई दिखी। हमारी गाड़ी के आगे से निकली। मतलब गिलहरी रास्ता काट गई। लेकिन गिलहरी के रास्ता काटने से कोई अपशकुन जुड़ा नहीं है इसलिए आगे बढ़ गए। दरबान ने गाड़ी देखकर अलसाये, अनमने मन से गेट से खोला। दिन भर में सैकड़ों बार गेट खोलना पड़ता है दरबान को।

गेट के बाहर निकलते ही एक बालिका पूरे शरीर को ढँके स्कूटी पर आते दिखी। केवल आँखे दिख रहीं थीं। एकदम पुतलीबाई सरीखी। धूप से बचाव के लिए मुफ़ीद ड्रेस। लेकिन इस चक्कर में सुबह की विटामिन डी का नुक़सान हो रहा होगा। सूरज की किरणों की  विटामिन डी की मिसाइल  'क्लॉथ डोम' टकराकर वापस लौट गईं होंगी।

रेलवे अंडरपास के आगे लाल पैथोलॉजी में काम करने वाली बच्ची सामने से आते दिखी। अक्सर दिखती है। सुबह पैथोलॉजी खोलने जाती है। वही टेस्टिंग के सैंपल भी लेती है। सर झुकाये मोबाइल में कुछ देखती चली आ रही थी। हमने हार्न बजाया। उसने सर उठाया। हाथ हिलाने पर उसने भी मुस्कराते हुए हाथ हिलाया। दाँत चमके। इसके बाद वह फिर चलते हुए मोबाइल देखने लगी।

चलते हुए मोबाइल देखने से कल की बात याद आई। चौराहे पर ट्रैफिक सिपाही एक हाथ से गाड़ियों को दिशा दे रहा था। दूसरे हाथ से मोबाइल थामे लगातार कहीं बतियाता जा रहा था। बतियाने से फुर्सत मिलती तो मोबाइल देखने लगता। उसकी मोबाइल निर्भरता देखकर लगा कि यह उसकी ड्यूटी का अपरिहार्य हिस्सा है। मोबाइल अलग कर दिया जाये तो शायद उसका ड्यूटी करने मुश्किल हो जाये।

स्वीमिंग सीखने में ब्रेस्ट स्ट्रोक (हाथ से) और फ्री स्टाइल (पैर से) के गठबंधन से शुरुआत की थी। कुछ दूर तक तैरने भी लगे थे। लेकिन फिर लगा कि तैराकी में गठबंधन सरकार चल नहीं पायेगी। इसके बाद पैर भी फ्री स्टाइल की जगह ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलाना सीखने लगे। सीखने से ज़्यादा मेहनत फ्री स्टाइल में पांव चलाना भूलने में लगी। दो दिन हुए हाथ और पांव ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलना सीख लिए। बस दोनों का गठबंधन कराना है। हाथ और पैर के मूवमेंट का गठबंधन होते ही हमारी तैराकी की गृहस्थी बस जाएगी। 

आज अभ्यास करते हुए देखा कि हाथ और पैर दोनों फ्रीस्टाइल में चलने लगे। दोनों में गठबंधन सा हो गया है। करीब पाँच सात मीटर तैरे भी। अब बस कुछ दिन और अभ्यास की ज़रूरत है। इसके बाद स्टेमिना बनाना है। देर तक और दूर तक तैरना सीखना है। सीख जायेंगे। हमको कोई हड़बड़ी थोड़ी है। आराम-आराम से सीखेंगे। सीख रहे हैं।

आज हमारा तैराकी सीखने का पच्चीसवाँ दिन था। 

Friday, June 26, 2026

संस्कारी युवा पीढ़ी


 चारबाग रेलवे स्टेशन पर चाय पीते हुए अगल-बगल के नजारे भी देखते रहे। लोग आ-जा रहे थे। स्टेशन से गाड़ियों के आने-जाने की सूचनाएँ प्रसारित हो रहीं थीं। कोने के जीने से स्टेशन से बाहर की तरफ़ आने वाले यात्रियों की भीड़ देखकर लगा कि किसी ने आदमियों से भरा बोरा सीढ़ियों पर उलट दिया हो।

चाय जी दुकान के बगल में एक लड़का-लड़की अलग-अलग पोज में फ़ोटो खींच-खिंचा रहे थे। लड़के ने लड़की की कई पोज में फ़ोटो खींची। लड़की ने लड़के की। ढेर सारे अंदाज़ में साथ खड़े होकर सेल्फी भी ली दोनों ने। सेल्फी भी कभी लड़का लेता, कभी लड़की। कैमरे के सामने मुस्कराते हुए फ़ोटो ले रहे थे। लगातार मुस्कराने के चक्कर में जबड़े दर्द कर रहे होंगे। देर तक फ़ोटो यज्ञ चलता रहा।
लड़के के बाल खासे बड़े थे। गले में हेयर बैंड लटकाये था। लड़की के बाल सामान्य। दोनों ख़ुश मुद्रा ने थे। चहक़ योग कर रहे थे।
बात करने के लिहाज़ से मैंने मुफ़्त ऑफ़र दिया -‘ लाओ तुम्हारी साथ में फ़ोटो खींच दें।’ बालिका उत्साहित दिखी। लेकिन बालक ने सर झटक कर मना कर दिया। बालक ने बालिका को जिस अंदाज़ में देखा उसका कोई अनुवाद करता तो लगता वह कह रहा था -‘ अपन लखनऊ में किसी दूसरे से फ़ोटो नहीं खिंचवायेंगे।’
बालिका से बातचीत की। पता चला भोपाल से आए हैं लखनऊ। घूमने। बालिका ने अपना नाम बताया पल्लवी, बालक का राहुल। दोस्त हैं दोनों।सहज मिडिलची मानसिकता के प्रभाव में सोच लिया कि घर से बिना बताये आए हैं दोनों घूमने।
इसके बाद हाल की तमाम घटनाओं को बिना सिलसिले के याद किया। अपने-आप। पहले के दिनों के हिसाब से सोचते तो यही लगता कि बालक , बालिका को बहाने से लाया है साथ। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं ने इस सोच को ख़ारिज किया। आख़िर ने तय किया कि कोई किसी को बरगलाकर नहीं लाया है। उम्र साथ लाई है दोनों को।
लड़का चंचल लग रहा था। समझदार होने का पूरा दिखावा कर रहा था। हमने लड़की से और बातचीत करने का प्रयास किया। लेकिन बालक अपनी मित्र को समेट के दूर कोने में ले गया। नए अंदाज़ में सेल्फी लेने के लिए। हमने बालक को दुष्ट मान लिया। दूसरों के बारे में राय बनाने में हम सहज सिद्ध होते हैं।
कुछ देर बाद बालक ने जेब से सिगरेट निकाली। सुलगाई। कश लेकर धुंआ हवा में छोड़ दिया। हमें लगा उसको टोंके-‘ भोपाली बालक, तुम भोपाल से लखनऊ की हवा ख़राब करने आए हो?’ लेकिन बोले नहीं।
दो-चार सुट्टे लगाने के बाद बालक ने सिगरेट बालिका को पकड़ा दी। बालिका ने भी सहज अंदाज़ में सुट्टे लगाए। देखकर लगा सिगरेट सुट्टा अभ्यासी है बालिका।
सिगरेट के कश खाते हुए बालिका ने इधर-उधर भी देखा। हम भी उसकी निगाह में आए होंगे। उसने हमको अपनी तरफ़ देखते देखा शायद। देख तो रहे ही थे हम उन दोनों को। दोनों घूम गए। पीठ हमारी तरफ़ करके सुट्टा लगाने लगे। हमको लगा-‘ बालिका कितनी संस्कारी है। बुजुर्गों का कितना लिहाज करती है। उनकी निगाह बेचकर सिगरेट पीती है। लोग ‘ बे-फ़ालतू’ में युवा पीढ़ी पर संस्कारहीन होने का आरोप लगाते हैं।’
सोचते तो हम और भी बहुत कुछ। लेकिन तब तक हमारे बेटे की ट्रेन आ गई। बेटा बाहर आ गया। हम उन बालक-बालिका के बारे में सोचने का काम वहाँ मौजूद जनता की सौंप कर बेटे के साथ घर की तरफ़ चल दिए।

Thursday, June 25, 2026

मैराथन चाय बालक


 कल चारबाग स्टेशन जाना हुआ। बेटे को लेने के लिए। दिल्ली से आने वाली लखनऊ मेल से। गाड़ी राइट टाइम थी। हम थोड़ा जल्दी पहुँच गए। चारबाग स्टेशन के सामने वाली दुकान पर चाय पी।

चाय की दुकान पर अकेला बच्चा था। वही चाय बना रहा था। बन मक्खन भी। बिस्कुट सामने कंटेशनर में रखे था। ज्यादातर लोग चाय पीने वाले थे। कुछ लोग बन मक्खन भी ले रहे थे। दुकान के सामने फुटपाथ पर कुछ लड़के-लड़कियां अपने सूटकेस पर बैठे थे। शायद कहीं बाहर से आए थे। शायद कोई इम्तहान देने आए होंगे। और किसी काम से भी आए हो सकते हैं। लेकिन स्टेशन पर  कोई युवा सूटकेस, बैग लिए दिखता है तो यही लगता है कोई इम्तहान देने आया है या इंटरव्यू। यह भी क्या पता इसका इम्तहान भी निरस्त होने वाला है।

सामने ही एक रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर सो रहा था। शायद रात में रिक्शा चलाया हो। उसकी सुबह अभी हुई नहीं थी। 

चाय पीते हुय बच्चे से बात से बात की। उसने बताया कि वह लगातार 48 घंटे से जगा हुआ है। नींद आ रही। बहुत तेज आ रही है । लेकिन क्या करें? पहले भी कई बार इस तरह लगातार काम कर चुका है। उसका रिलीवर नहीं आया तो मजबूरी में काम पर लगा हुआ है। रिलीवर आयेगा तब छुट्टी होगी।  आँखों  में नींद की झलक थी। लेकिन बच्चा मुस्कराते हुए बात कर रहा था।

और बात करने पर पता चला बच्चा सीतापुर का रहने वाला है। पिताजी की बीमारी के चलते इंटर के बाद काम में लग गया।करीब डेढ़ साल हो गए काम करते।  अब पिताजी ठीक हैं। लेकिन बच्चे का काम जारी है। 

48 घंटे जागकर लगातार चाय बेचने की बात सुनकर ताज्जुब व्यक्त किया। उसने बताया कि एक बार लगातार तीन दिन काम किया। तीन दिन मतलब 72 घंटे। मैराथन चाय वाला। बालक ने बताया कि आमतौर पर उसकी ड्यूटी 24 घंटे की होती है। 24 काम फिर आराम। यही 24 घंटे कभी 48 और कभी 72 में बदल जाते हैं। 

लगातार काम करने का कारण बालक ने बताया -'दुकान जीजा की है। दीदी के घर रहता है। अपनी दुकान है। इसलिए देरी हो जाने के कारण भी करता रहता है। 

बालक ने कहा -'जाड़े में चाय बेचने में मजा आता है। उस समय  ग्राहक खूब आते हैं। जब ग्राहक आते हैं तो काम करने में मजा आता है।' 

एक चाय 15 की और बिस्कुट 5 रुपए का था। हमने बात करने के लालच में एक चाय और पी। चाय बनी भी बढ़िया थी। 

 सोचा 'माननीय चाय वाले' से कठिन मेहनत तो यह बालक कर रहा है। अनगिनत लोग कर रहे होंगे।  लेकिन उनकी चर्चा नहीं होती। आम लोगों की चर्चा नहीं होती। चर्चा ख़ास लोगों की होती है। चर्चा के लिए  इंसान  खास होना जरूरी होता है। आम लोगों के हिस्से 'चर्चा रस श्रवण' हो आता है। 

Friday, June 19, 2026

तैरना सीखने का अठाहरवाँ दिन


 आज सुबह तैराकी के लिए निकले। पराग डेयरी चौराहे के पहले एक बच्चा तेजी से सड़क पार करता दिखा। भागता, लड़खड़ाता, झुककर सीधे खड़ा होता। शायद सड़क किनारे के बने किसी घर में रहता होगा।   सूरदास जी कृष्ण जी के बालपन का वर्णन करते हुए लिखते हैं :

'किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।
मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबैं धावत ॥'

सड़क किनारे रहते घरों के बच्चों के लिए सड़क ही उनका आँगन होती हैं।वहीं वे  घुटनों के बल चलना, दौड़ना, भागना सीखते हैं। सड़क रूपी आँगन में मणियाँ नहीं लगी। बिम्ब नहीं बनते यहाँ।  बारिश के दिनों में अलबत्ता सड़क के गड्ढों में परछाइयाँ बनती होंगी। बच्चे उन परछाइयों को पकड़ने की कोशिश करते होंगे। लेकिन  कोई सूरदास इस पर कोई पद नहीं रचता। हर बच्चे का बचपन कृष्ण के बचपन सरीखा नहीं होता। 

बच्चे के गुजरने के इंतज़ार करते हुए कार रोकी। बच्चा डिवाइडर पारकर अपने घर में घुस गया। यहाँ तो सड़क है।हम अपने देश के बच्चे को बचाकर निकल रहे हैं।  ईरान, फ़िलिस्तीन में सड़क और घर में खेलते बच्चों का क्या हुआ होगा। खेलते-खेलते कोई मिसाइल उन पर गिरती होगी। वे 'शांत' हो जाते होंगे। युद्ध चलता रहता है। बाद में कभी समझौता होगा। जिन लड़ाई लोलुप, सत्ता लालची बुड्ढों ने युद्ध का बिगुल बजाया होगा वही लोग शांति का मसीहा बनकर पेश होते है। लड़ाई थमती है लेकिन अनगिनत बच्चों, युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों की क़ूबानी लेकर। 

आज शुक्रवार को ईरान-अमेरिका में शांति समझौता हुआ। देखना है कि यह सही में लागू हो पाता है क्या। ईरान-अमेरिका में शांति होते ही खबर आई कि यूक्रेन ने रूस की पाइप लाइन  पर ड्रोन  से हमला कर दिया। लगता है दुनिया हथियारों के सौदागर यह सुनिश्चित करते हैं कि दुनिया के किसी न किसी हिस्से में लड़ाई होती रहनी चाहिए। वे  दुष्यंत कुमार के शेर को अच्छे से याद करके अमल में लाते हैं:

'मेरे सीने (देश ) में न सही, तेरे सीने (देश) में सही, 

हो कहीं भी (युद्ध की) आग लेकिन आग जलनी चाहिए।'

कल डायना नायड की आत्मकथा  'Find a way ' के शुरुआती अंश पढ़े । डायना के पिता (सौतेले) ने बचपन से उनको जल्दी उठकर तैराकी का अभ्यास करने की आदत डाली। उनको ज़ेहन में बचपन से विश्वास दिलाया कि उनका नाम NYAD स्पेशल है। उनकी किसी और सहेली का नाम डिक्शनरी में नहीं होगा लेकिन नायड़ का नाम होगा। यह खास नाम है। डायना नायड ख़ास है।

डायना नायड  अपने सौतेले पिता  एरिस Aris को अपना असली पिता समझती रहीं। Aris का वर्णन करते हुए डायना नायड ने लिखा है -'वह जालसाज था। बहुभाषी था। 17 भाषाएँ जानता था। वाकपटु था। अपनी लच्छेदार बातों से लोगों को मुग्घ कर लेता था। डायना की सहेलियाँ उसने मिलने के बाद कहती थीं -'इतना शानदार व्यक्तित्व मैंने पहले कभी नहीं  देखा।' 

लेकिन एरिस Aris का दूसरा रूप भी था। वह असल में जालसाज था। क्रूर था। उसने डायना का 14 वर्ष की उम्र तक यौन शोषण किया। डायना घर में डरकर रहती थी। उनकी माँ जानने के बावजूद डायना को अपाए सौतेले पिता के यौन शोषण से बचा नहीं पायी। इसका उनके मन में अपराध बोध था। उनमें अपने बच्चों को बचाने के लिए, अपने पति के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत नहीं थी। इसका कारण शायद यह भी था कि वे बचपन में माँ-बाप के प्यार से वंचित रहीं। अपने पति के प्यार को खोने से डरती थी वे। बाद में हालांकि उन्होने अपने पति से तलाक लिया। यह शायद बच्चों की सुरक्षा के लिए बहुत देर से उठाया कदम था। 

डायना नायड की आत्मकथा इस मामले में अनूठी है। ख़ासकर इसलिए  कि उन्होंने अपने जीवन के निर्माण में शामिल लोगों के बारे में लिखते हुए आख़िर में उनकी अच्छाइयों के लिए उनको याद किया है। सौतेले पिता द्वारा अपने यौन शोषण के बावजूद उन्होंने दो बातों के लिए अपने पिता को धन्यवाद दिया :

"'विजेता' (चैंपियन) के रूप में मेरी खुद की छवि बनाना ।

नींद को छोड़कर तैराकी के अभ्यास को तरजीह देना।"

डायना नायड अपने मैराथन तैराक बनने के पीछे अपने सौतेले पिता द्वारा सिखाई इन बातों को सबसे प्रमुख मानती हैं।

डायना नायड की आत्मकथा अभी पढ़ रहे हैं। बाद में डायना नायड के समलैंगिक होने के पीछे भी कारण उनके सौतेले पिता द्वारा उनका बचपन में किया यौन शोषण कारण रहा? शायद इस बारे में डायना नायड ने आगे लिखा हो आत्मकथा में।

डायना नायड की यह आत्मकथा अंग्रेजी में हैं। किसी शब्द का मतलब डिक्शनरी में खोजने में समय लगता है। कल इसका उपाय मैंने यह निकाला कि गूगल के एआई वर्जन में जाकर किताब के पेज का फ़ोटो उसमें अपलोड करके निर्देश देते हैं -'हिंदी में अनुवाद करो (ट्रांसलेट इन हिंदी) । पूरे पेज का हिंदी अनुवाद फौरन सामने आ जाता है। उसको हम फटाक से पढ़ लेते हैं। कभी-कभी अंग्रेजी भी पढ़ते हैं जो कि हिन्दी के साथ पढ़ने में बेहतर समझ आती है।

आज पूल में अभ्यास किया। सर पानी में झुकाकर रखें रहे। पाँव चलाते रहे। सर उठाकर तैरते हुए साँस लेने में कुछ प्रगति हुई । लेकिन पूरी सफलता नहीं मिली। अलबत्ता अब हाथ चलाना सीख लिया है। यह पता चल गया कि कैसे हाथ चलाने से सर ऊपर उठेगा, साँस लेने के लिए। सबसे बड़ी बात कि सीखने में हड़बड़ी वाली भावना अब नहीं है। तसल्ली से तैरने का आनंद ले रहे हैं । तैरना मजेदार है। तैरते हुय साँस लेना सीखना है। सीख ही जाएँगे।

आज हमारा तैरना सीखने का अठाहरवाँ दिन था। 


Wednesday, June 17, 2026

तैराकी सीखने का सोहलवाँ दिन




 आज सुबह तैराकी के लिए सही समय पर पहुँच गए। ठीक आठ बजे। पढ़कर जो आए थे उसपर अमल शुरू किया। सबसे पहला सबक यह कि तैरते समय सर पर नीचे रखना है। जैसे हाई कमान के सामने मंत्री, संतरी, सांसद, विधायक रखते हैं। केवल साँस लेते समय सर उठाना है। बाक़ी समय सर नीचे ही रखना है। स्वीमिंग पूल के फर्श की तरह निगाह। कॉलेज के जमाने में रैगिंग के दिनों में जूनियर्स को अपने शर्ट की तीसरी बटन देखने को कहा जाता था। तीसरी बटन देखने का रिवाज तो लड़कों में था। लड़कियों में क्या रिवाज था यह पता नहीं। यह जरूर याद है कि उन दिनों में लड़कियों/लड़कों का अनुपात 1:50 से भी नीचे ही था। 

सर लगातार नीचा करके तैरने में लगा यह सही पोज है। पहले अक्सर सर बार-बार ऊपर करते थे। लड़खड़ा जाते थे। समर्पण मुद्रा में तैरने में तैरना सहज लगा। पहले बार-बार सर उठाकर ऊपर देखने में संतुलन गड़बड़ा जाता था। सर नीचे करके तैरने के साथ पांव लगातार चलाते रहना था। आज इसका अभ्यास किया। हमने तय किया कि रोज-रोज़ नई तरह से सीखने की बजाय मूल बात पर फ़ोकस करना जरूरी है। रोज़-रोज़ पोज बदलने में कोई फ़ायदा नहीं। पहले का अभ्यास छूट जाता है। तैराकी कोई राजनीति तो है नहीं जो दलबदल की तरह पोजबदल करके कुछ हासिल हो।

साथ सीखते बच्चे ने मुझे फिर से सिखाया। उसका एक दाँत टूटा हुआ है। उसने बताया स्कूल में खेलते समय टूट गया। दूध का दाँत है। इसकी जगह नया दांत आयेगा। क्या उसे चाय का दाँत कहाँ जाए। पूल किनारे बैठे पक्षी को देखते हुये उसने कहा -'वह ईगल हम लोगों की तरफ़ देख रहा है। कहीं काटेगा तो नहीं?' 

बगल में तैरती बच्ची ने सुनकर कहा -'वह ईगल नहीं कौआ है। काटेगा नहीं।' 

मेरे साथ तैरता बच्चा उसकी बात अनसुनी करते हुए पूल से निकलकर बाहर चला गया। इसके बाद पूल में डाइव करके फिर साथ में तैरने लगा। 

पूल में सिखाने वाली बच्ची एक बुजुर्ग महिला का हाथ पकड़कर उसको तैरना सिखा रही थी। हाथ पकड़कर पानी में उनको घसीटते हुए पैर चलाने को कह रही थी। महिला कुछ देर अभ्यास करने के बाद रुककर आराम करने लगी। हमने कोच बालिका से शिकायत की -'तुमने हमको तैरना नहीं सिखाया। अभी तक हम ठीक से तैर नहीं पाते।' 

बच्ची ने हमको शुरुआती दिनों में कई बार गाइड किया है। मेरी बात के जबाब में उसने कहा  -'आप तो सीख गए हैं अंकल। प्रैक्टिस करते रहिए। परफेक्ट हो जायेंगे।' 

साथ तैरते बच्चे के पिता बाहर से उसकी गतिविधि देख रहे थे। फोटो भी ले रहे थे। हमने उनसे अपना तैरने का वीडियो बनाने को कहा। उन्होंने कहा -'ठीक।'

वीडियो बनवाने के लिए हम पूल के अंदर थोड़ी दूर से (करीब छह -सात मीटर) तैरते हुए किनारे तक आए। वीडियो बना। मेरे मोबाइल पर भेज भी दिया उन्होंने। 

वीडियो देखते हुए अपनी कई कमियाँ पता लगी। एक तो पाँव सीधे की जगह थोड़े मुड़े हुए थे।  दूसरे पाँवों के आपस में तालमेल का अभाव था। दोनों पांव किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री और आलाकमान द्वारा थोपे उप मुख्यमंत्री की तरह अलग-अलग बयान बाजी जैसी करते दिखे। हाथ के मूवमेंट देखकर भी लगा कि इनको बहुत फैलाने की जरूरत नहीं। औक़ात में रहने से ज़्यादा कुशलता से तैर सकेंगे। यह भी लगा कि अगर रोज़ वीडियो बनायें तो बेहतर समझ सकेंगे अपने मूवमेंट।

तैरते हुए, अभ्यास करते हुए आज एक दो बार सर ऊपर करके साँस भी ले ली। ऐसा लगा मानो पूल के पानी को झांसा देकर हवा गटक ली हो। जल्दी ही तैरते हुए नियमित साँस लेना सीख जाएँगे।

आज हमारा तैरना सीखने का सोहलवाँ दिन था।






हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्रीस्ट्रोक


 शनिवार को शाम को गए स्वीमिंग के लिए। साथ में तैरते एक बच्चे ने कहा -'हम आपको सिखाते हैं स्वीमिंग।' हमने कहा -'सिखाओ।'

बच्चे ने हमको पहले, दूसरे दिन के सबक सिखाये। हमको वो आते थे। फिर भी हमने उसके कहने पर वो दोहराये। बच्चे ने कहा -'गुड, ऐसे ही करिए। सीख जायेंगे।'
बच्चा ख़ुद सीख रहा है। बाँह में फ़्लोटर जैसे बाँधे हुए था। उसके सिखाने का अनुभवि मजेदार रहा।
पूल में जितने कोच हैं उतनी सलाहें देते हैं। कोई कहता है ब्रेस्ट स्ट्रोक के साथ पांव भी उसी तरह चलाइये। हम अपने पैर और हाथ की तकलीफ़ के बारे में बताते हैं। वह कहता है -'ठीक है। ऐसे ही चलाइये।'
दूसरा कोच कहता है -'जिस तरह सहज हैं उस तरह करिए। तकलीफ़ वाले स्टेप्स मत लीजिए। प्रैक्टिस करिए। हो जाएगा।'
एक दिन हमने पैर ब्रेस्ट स्ट्रोक के हिसाब से चलाये। किनारे का पाइप पकड़कर प्रैक्टिस की। लेकिन जब तैरने लगे तो पाँव फ्री स्टाइल में ही चले। पाँव फ्री स्टाइल में, हाथ ब्रेस्ट स्ट्रोक के हिसाब से। विभिन्न विचारधारा वाली पार्टी का गठबंधन। तालमेल नहीं हुआ।
सीखा हुआ भुलाकर नए सिरे से करना तैराकी सीखने के लिए सयोनी घोष हो जाना हुआ। इरादा बदल दिया। जिस तरह सीख रहे थे वैसे ही सीखेंगे।
कल नेट पर जानकारी ली। हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्रीस्ट्रोक के साथ तैरना संभव है ? नेट बाबू बोले -'एकदम संभव है।'
इसके बाद तैरते हुए साँस लेने के तरीक़े, तरकीबें भी बताई नेट ने। हमने सीख ली। तैराकी के बारे में वीडियो देखते हुए बचपन में पढ़े हुए विज्ञान के सबक दुबारा सीखे। प्लवन (तैरने) और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत फिर से पढ़े। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत तो जैसे मुस्कराते हुए गाना गा रहा था -' जहाँ जाइएगा, हमें पाइयेगा।'
तैरने समय फेफड़े में भारी साँस तैरने में सहायता देती है। शरीर का वजन विरोध करता है। दोनों में संतुलन बनाना सबसे अहम मुद्दा है। साथ चुनाव लड़ती दो विभिन्न पार्टियों के बीच सीटों के तालमेल जैसा ही जटिल मुद्दा। जल्दी तय नहीं हो पाता। लेकिन हो तो जाता ही है।
आज अभी जा रहे हैं स्वीमिंग के लिए। कल जो थ्योरी पढ़ी है उसको अमल में लाने की कोशिश करने। देखते हैं कितना कर पाते हैं।
स्वीमिंग पूल में डायना नायड को भी जरूर याद करते हैं। उनकी सीख भी :
1. हमें कभी भी, किसी भी हाल में हार नहीं मानना चाहिए (Never Ever Give up)
2. अपने सपनों को पूरा करने के लिए आपकी उम्र कभी भी ज़्यादा नहीं होती (You are never too old to chase your dream)
3. यह देखने में भले ही एक व्यक्ति का खेल लगता है, लेकिन असल में यह एक टीम वर्क है (It looks like a solitary sport, but it's a team)
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Tuesday, June 16, 2026

राजनीतिक पार्टी में निवेश


 टीएमसी के बागी विधायकों/सांसदों के NCPI में विलय  समाचार सुने। NCPI को पिछले चुनाव में कुल 822   वोट मिले थे। जबकि बागी सांसदों को कुल एक करोड़ वोट मिले थे। मतलब NCPI के वोटों से 12000 गुना। अपने से बारह हज़ार गुना छोटी पार्टी में विलयातुर सांसदों को देखकर कृष्ण बिहारी नूर का यह शेर याद आता है :

"मैं एक कतरा (बूँद) हूँ, मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।" 

यह एक खुद्दार इंसान का बयान है। अपने स्वाभिमान को बचाकर रखने की ज़िद है। बूँद भले ही छोटी है लेकिन उसका अलग अस्तित्व है। सागर से मिलने पर उसका अस्तित्व मिट जाएगा। यहाँ तो सागर (बागी सांसद) बूँद (NCPI) में मिलने को छटपटा रहा है। 

लेकिन खबर यह भी है कि वे सागर में नहीं महासागर (NDA) में मिलेंगे। यह मिलन  द्वारा उचित माध्यम (NCPI) होगा। एकदम सरकारी अंदाज़ में। टीएमसी के सासंद  NCPI के कंटेनर  में जमा होंगे। NCPI का कंटेनर NDA के समन्दर में उलट दिया जाएगा। तर्पण होगा टीएमसी के बागी सांसदों का। 

लेकिन जिस तरह का उचक्कापन और अवसरवादिता टीएमसी के बागी सांसदों ने दिखाई है उसके खिलाफ बागी लोगों को एतराज होगा। बगावत का मतलब किसी स्थापित सत्ता, नियम, या अधिकार (Authority) के खिलाफ खुले तौर पर विरोध या विद्रोह करना है। यहाँ तो स्थापित सत्ता से जुड़ने का काम हो रहा है। भगोड़ेपन को बागी कहना ठीक नहीं। 

पानसिंह तोमर फ़िल्म का डायलग याद आता है -"बीहड़ में तो बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में।"   हो सकता है कोई भूतपूर्व बागी टीएमसी के भगोड़े लोगों द्वारा ख़ुद को बागी कहने के ख़िलाफ़ याचिका डाल दे। 

टीएमसी के चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बनना सहज बात हो सकती है। लेकिन जिस बेशर्म तरीके से उनसे जुड़े सासंद उनसे अलग होकर एकदम ख़िलाफ़ पार्टी से जुड़ने का उपक्रम कर रहे हैं वह शर्मनाक है। सत्ता में रहते विरोध करके अलग हो जाते तो बहादुरी समझ में आती। इस तरह के धोखेबाजी समाज के लिए धोखेधड़ी की एक और मिशाल कायम करना हुआ। लोग बेशर्मी से किसी को धोखा देंगे और नजीर में कहेंगे -'इन लोगों ने भी तो किया था। जब वे कर सकते हैं तो हम क्यों न करें।' अलग तरह की पार्टी कहलाने के नारा लगाने वाली पार्टी के लोग अपनी हर चिरकुटई को बेशर्मी से सही ठहराते हुए कहती है -' हमारे पहले वाली  पार्टी ने भी तो किया था ऐसा?' 

अरे जब पहले वाली की तरह आप भी गड़बड़ कर रहे हैं तो आपमें और उनमें अंतर क्या है? अन्तर शायद इस बात का है कि वो थोड़ा शर्माते हुए करती थी, अब सब धांधली, गड़बड़ी खुल्लमखुल्ला हो रही है। गड़बड़ियों में खुलापन आ गया है। पारदर्शिता आई है। 

अवसरवादिता , धोखाधड़ी आज की राजनीति का जरूरी तत्व हो गया है। जो धोखा देना नहीं जानता, मौके के हिसाब से पाला बदलना नहीं जानता वह शायद राजनीति के लिए मिसफ़िट है।

NCPI की स्थापना में एकाध लाख रुपए खर्च हुए थे। सांसदों और विधायकों द्वारा इस  पार्टी को ज्वाइन करने के बाद इसकी क़ीमत अरबों में हो जायेगी। इससे अच्छा रिटर्न आन इन्वेस्टमेंट और कहाँ होगा आज के दिन। NCPI को अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में लिखवाने के लिए अप्लाई कर दे देना चाहिए। निवेश पर सबसे तेज  लाभ का रिकार्ड। 

क्या पता कल को आपस की बातचीत में शेयर के बिजनेस करने वाले राजनीतिक पार्टी बनाने में पैसा लगाने लगें। आपस की बातचीत में कहने लगें -' सोचते हैं कुछ शेयर बेचकर दो-चार राजनीतिक पार्टी बना लें। आजकल इन पर अच्छा रिटर्न मिल रहा है।'

क्या आप भी कोई राजनीतिक पार्टी बनाने की सोच रहे हैं। 

Monday, June 15, 2026

कार का पंचर बनवाते हुए वीडियोग्राफी

 




शनिवार को स्वीमिंग पूल सुबह बारिश के कारण बंद हो गया था। शाम को गए। जाते समय कार के डैशबोर्ड में दायीं तरफ़ बल्ब जैसा जला। हमें लगा कोई वार्निंग है। हमने दायें-बायें देखा। समझ में नहीं आया। एक दिन पहले घर से सामने तिराहे पर जली कार का ध्यान आया। हमें लगा हमारे साथ भी कोई हादसा न हो जाये। हम शीशा खोलकर गाड़ी चलाते हुए गए स्वीमिंग पूल तक। कार का एसी ऑन, शीशा खुला। बेवक़ूफ़ी के सौन्दर्य का मुजाहिरा।

स्वीमिंग पूल से लौटकर सोचा कार दिखवा लें। वार्निंग सिग्नल अभी भी था। अब डैशबोर्ड में एक तरफ़ लिखा हुआ भी आ रहा था -' बायें पहिए की हवा कम है।' हमें लगा शायद बल्ब जैसा जलना भी उसी कारण होगा। धीरे-धीरे कार चलाते हुए हवा की दुकान पर पहुँचे। हमने कहा -'हवा भर दो।'
हवा भरने के लिए टायर देखा गया तो पाया गया टायर में एक कील घुसी हुई है। इसी कारण हवा कम है। उसने बताया पंचर है। हमने कहा -'बना दो।'
कार पंचर बनाने के लिए सौंपकर हमने डैशबोर्ड का फोटो लिए। AI को दिखाकर पूछा -'इसका मतलब क्या है?'
AI ने फौरन बता दिया -'कार के पहिए में हवा कम है।'
हवा का इलाज पंचर बनाकर हो ही रहा था। हम इधर-उधर के नज़ारे देखने लगे। एक लड़की अपने भाई -बहनों को साथ लिए रील जैसा कुछ बनाती जा रही थी। उसको देखकर हमने भी सड़क पर आते-जाते लोगों की रिकार्डिंग शुरू की। इस बीच अमेरिका से Atul Arora का फ़ोन भी आया। उन्होंने बताया कि जल्दी ही वो हमको वीडियो एडिटिंग सिखायेंगे।
कई मजेदार सीन दिखे इस बीच। एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ जाता दिखा। कई लोग हमको देखकर फुर्ती से निकले। पंचर वाले ने पूछा (बाद में) -'क्या आप वीडियो बनाते हैं?'
हमने कहा -'सीख रहे हैं।'
वीडियो बनाकर घर आ गए। सोचा कि एक और वीडियो बनाकर दोनों को जोड़कर एक वीडियो बनायेंगे। आज देखा तो यह काम किया गया। देखिए कुल क़रीब आठ मिनट की वीडियोबाज़ी। देखिए हमारे आसपास का नजारा। बताइए कैसा लगा ?

हमें कभी भी, किसी भी हाल में हार नहीं मानना चाहिए

स्वीमिंग पूल 

 कल डायना नायड की ऑटोबायोग्राफी (Find a way) पर आधारित फ़िल्म Nyad (नेटफ़्लिक्स पर) देखी। दो घंटे की इस फ़िल्म में डायना नायड द्वारा पाँचवे प्रयास में क्यूबा से फ्लोरिडा की 103 मील (165.76 किलोमीटर) दूरी तैरकर पार करने का विवरण है। इनमें पहला प्रयास डायना नायड 28 साल की उम्र में किया था। असफल रहीं। मैराथन तैराकी के कई रिकार्ड बनाने के बाद उन्होंने तैराकी छोड़ दी। 

60 साल की उम्र में, अपनी माँ की मृत्यु के बाद, उनको अपना बचपन का सपना फिर याद आया। उन्होंने फिर से तैराकी शुरू की। तीन बार फिर असफल रहीं। समुद्र में पायी जाने वाली भयंकर जहरीली जेली फिर के डंक से मरते-मरते बचीं। भयंकर समुद्री तूफ़ान में फँसकर मरते हुए बची। उनके साथियों ने मान लिया कि वे शायद इस उम्र में इस काम के लायक नहीं हैं। उनकी पक्की सहेली बोनी और  मुख्य नेविगेटर जॉन बार्टलेट ने उनके पाँचवे प्रयास में जुड़ने से मना कर दिया था (फ़िल्म के अनुसार)। लेकिन डायना नायड की जिद थी कि वे फिर प्रयास करेंगी। 

बोनी और जॉन बार्टलेट डायना की जिद के चलते उनसे फिर से जुड़े। डायना ने  103 मील की दूरी तैरकर पार की। क्यूबा से फ्लोरिडा की 103 मील की यह दूरी तय करने में डायना  को 110 मील 177 किलोमीटर तैरना पड़ा। यह दूरी उन्होंने करीब 53 घंटे में तय की। मतलब तैरने की गति लगभग 3.34 किलोमीटर प्रतिघंटा रही। 

फ्लोरिडा पहुँचने वहाँ जमा भीड़ को संबोधित करते हुए  डायना नायड ने तीन बाते कहीं :

1. हमें कभी भी, किसी भी हाल में हार नहीं मानना चाहिए (Never Ever Give up)

2. अपने सपनों को पूरा करने के लिए आपकी उम्र कभी भी ज़्यादा नहीं होती (You are never too old to chase your dream)

3. यह देखने में भले ही एक व्यक्ति का खेल लगता है, लेकिन असल में यह एक टीम वर्क है (It looks like a solitary sport, but it's a team) 

डायना नायड ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी कोच बोनी स्टोल और अपनी 35 लोगों की मेडिकल और नेविगेशन टीम को दिया, जिनके बिना यह मुमकिन नहीं था। 

डायना नायड के मुख्य नेविगेटर जॉन बार्टलेट इस अभियान के दौरान बीमार थे। इसके बावजूद वे इससे जुड़े। अभियान की इस ऐतिहासिक सफलता (2 सितंबर 2013) के कुछ ही महीनों बाद, 10 दिसंबर 2013 को 66 वर्ष की आयु में जॉन बार्टलेट का सोते समय अचानक निधन हो गया था।

अपने सपने पूरा करने की ज़िद, मेहनत, लगन और समर्पण के साथ टीम वर्क के कारण डायना नायड ने  अपना बचपन का सपना पूरा किया। उस समय उनकी उम्र 64 वर्ष थी। उनके पहले और बाद में भी अभी तक यह दूरी किसी ने तैरकर (बिना शार्क पिंजड़े के) किसी ने तय नहीं की है।

डायना नायड़ की कहानी बताती है -कोई काम नहीं है मुश्किल, जब किया इरादा पक्का।

आपका भी कोई सपना है जिसे आप पूरा करना चाहते हैं?  





Saturday, June 13, 2026

अख़बार की खबरें


 सुबह अखबार के पहले पेज पर खबर दिखी:

"युद्ध खत्म, करार जल्द होगा : ट्रंप ।"
ट्रम्प का कोई बयान पहले पेज पर छपता है तो उसके लगभग उलट ख़बर आख़िरी पेज पर पर होना लाजिमी होता है ।
दो दिन हुए पहले पेज पर छपा था :
"ईरान पर समझौते में एक-दो दिन का वक्त: ट्रंप।"
हमने पीछे का पन्ना देखा। खबर दिखी :
"ईरान ने अमेरिकी हैलोकॉप्टर मार गिराया, जबाब देंगे -ट्रंप।"
पहले पेज की उलट खबर देखकर लगा -"हमारे विश्वास की रक्षा हुई।"
आज आख़िरी पेज पर ख़बर थी :
"बात तो बनी पर समझौते की शर्तों पर संशय।"
एकदम उलट तो नहीं लेकिन पहले पेज की खबर जैसी भी नहीं।
कभी-कभो लगता है ट्रंप जी किसी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे हैं। उनकी टीचर में उनको विपरीत अर्थ वाले डायलॉग बोलने का काम दे रखा है। वे सुबह एक बयान देते हैं। शाम को उससे उलट दूसरा बयान। जैसे कोई बच्चा स्लेट पर लिखे -'समझौता।' फिर टीचर की बात याद आने पर डस्टर से स्लेट पोंछ कर लिखे -'हमला।'
अख़बार के आख़िरी पेज पर कई चिल्लर ख़बरों के बीच ख़बर दिखी :
"दक्षिण कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति को 30 वर्ष की सजा"
पूर्व राष्ट्रपति युन सुक यओल पर आरोप है कि उन्होंने मार्शल लॉ लागू करने की अपनी कोशिश से पहले संकट पैदा करने के लिए उत्तर कोरिया में ड्रोन भेजे थे।
पहले पेज पर विस्तार से छपने लायक़ आख़िरी पेज पर छपी देखकर ताज्जुब नहीं हुआ। आज दुनिया के तमाम शासक सत्ता पर बने रहने के लिए कृत्तिम संकट का हौवा दिखाते हैं। कोई अपने देश को महान बनाने के बहाने देश को बर्बाद करता है, कोई किसी बहुसंख्यक क़ौम को ख़तरे में बताते हुए सत्ता पर कब्जा बनाए रखता है। इजरायल के प्रधानमंत्री पर तमाम आरोप हैं। उनको दायें-बायें करने के लिए वे ईरान में लड़ाई लंबी खींचना चाहते हैं। लड़ाई होती रहे, वे बचे रहें, प्रधानमंत्री बने रहें ।
आज स्वीमिंग करने गए। बारिश के कारण हुई नहीं । पानी से ज़्यादा ख़तरा कड़कती बिजली का था। पिच गीली होने के कारण मैच में देरी की तर्ज पर तैराकी लेट होती गई। एक बार बारिश धीमी होने पर पूल पर जाने के लिए बोला गया। हमारे पानी में उतरते ही बारिश तेज हो गई। हमें वापस बुला लिया गया।
एक उम्रदराज महिला ने अपना तैराकी का अनुभव साझा करते हुए बताया -'आर्थराइटिस है। डॉक्टर ने तैराकी बताया है। तैरना तो नहीं सीखे लेकिन मजा आ रहा है। हमने उनको खड़े-खड़े डायना नायड़ का किस्सा सुना दिया। उनको ताज्जुब हुआ। अच्छा भी लगा।
साथ में पूल पर बच्चा उतरा था। उसका नाम त्रिजल है। पापा साथ में आते हैं । बताया -'ये स्वीमिंग सिखाने के पैसे माँगता है। इसलिए हम नहीं तैरते।'
आज शाम को जाएँगे तैरने ।