Tuesday, April 22, 2014

सपनों की बम्पर सेल



वैसे तो अपन को सपने बहुत कम आते हैं। सोते हैं तो घोड़े, गधे, कुत्ते, बिल्ली, खरगोश सब मतलब कि मन पूरा का पूरा चिडियाघर बेंच-बांच कर। सोने में ही इत्ता बिजी रहते हैं कि सपने को लिफ़्ट ही नहीं दे पाते। पता नहीं कोई सपना आता भी होगा तो बोर होकर फ़ूट लेता होगा! ये तो सो रहा है इसके पास क्या बरबाद करना।

लेकिन साल-छह महीने में कभी-कभी सपना आ भी जाता है। अपने चुनाव क्षेत्र में जनप्रतिनधि की तरह। जबरियन घुस आता है दिमाग में। बिना “मे आई कम इन सर” कहे!
ये सपना भी बडा मजेदार है। जब भी आता है तीस साल पीछे ले जाता है घसीटकर। जैसे आजकल के नेतागण चुनाव सभा में भाषण देते हुये देश को वैदिक काल, महाभारत काल, मुगलकाल, सिकंदर काल, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम काल , आजादी काल के समय लिये-लिये टहलते रहते हैं। हमें बड़ा खराब लगता है। बुजुर्ग देश को जहां मन आये वहां घसीट के धर देते हैं। अपने अटेंडेंट की तरह दौड़ाते हैं। अब देश बेचारा तो शराफ़त के मारे चला जाता है साथ में। लेकिन वहां ले जाकर नेता लोग उसका अपने हिसाब से मेक अप करते हैं। कोई कुछ नोच लेता है, कोई कुछ थोप देता है। देश उस समय ऐसा था बताने के लिये। देश बेचारा चुपचाप “मैनीक्वीन” बना खड़ा रहता है।
बहरहाल देश की छोड़िये उस पर तो आजकल जनप्रतिनिधियों ने कब्जा कर रखा है। हम बता रहे थे अपने सपने के बारे में। हमें एक ही सपना सालों से आता है। हम सपने के मामले में “एक सपना व्रती” हैं।
हमारे सपने में हमें दिखता है कि हमारे इम्तहान का समय हो गया है। टाइम बहुत कम बचा है। हमें कोर्स तक का नहीं पता। किताबें कौन सी पढनी हैं यह भी नहीं पता। अटेंडेंस भी गोल है। पता नहीं इम्तहान में बैठने की परमिशन मिलेगी कि नहीं यह भी नहीं पता। सपना देखते ही हम जग जाते हैं। पसीने-पसीने भले न हों लेकिन असहज बोले तो ’अनइजी’ से हो जाते हैं। जगकर फ़िर याद आता है कि अपन तो पास हो चुके हैं। सपने को गरियाते हैं। बेवकूफ़ बनाता है मुझे। जनता समझकर नेता की तरह डराता है।
सपने का मतलब शायद तमाम अधूरे कामों से हो। ये करना है वो करना है। शायद एक मतलब यह भी हो कि चुनाव आ गये हैं और हमें किसे चुनना है हम इसके बारे में तय ही नहीं कर पाये अभी तक।
हमारे एक मित्र को सपना आता है जिसमें एक बन्दर उनकी चप्पलें ले जाता है। उनके सामने ही उनकी ही छत पर ठाठ से बैठकर उनकी ही चप्पल चबाता है। बीच-बीच में उनकी तरफ़ देखकर गुर्राता है।
मित्र को लगता है वो बंदर देश का आम जनप्रतिनिधि है। वह जनता की चीजें जनता से लूटकर ले जाता है। जनता के सामने बैठकर आराम से खाता है। जब जनता उसकी तरफ़ देखती है तो वो गुर्राता है मानों कह रहा हो – “देशसेवा के काम में डिस्टर्ब मत करो।“
आजकल चुनाव का मौसम है। नेता लोग तरह-तरह के सपने बेंच रहे हैं। बिना पैसे के सपनों की बम्पर सेल लगी हुई है। एक के साथ एक क्या, पचास फ़्री हैं। हरेक का सपना दूसरे से ज्यादा चटक, रंगीन है। ज्यादा कलर फ़ुल है। हर नेता दूसरे के सपने को नकली और अपने वाले को असली बताता है। बेचारे सपनों को यह भी नहीं पता कि उनको केवल चुनाव तक के लिये किराये पर लिया गया है। सपनों में भी मारकाट मची हुई है। चुनाव के समय एक ही घर के लोग अलग-अलग पार्टी के समर्थन में गला फ़ाड़ने में लगे रहते हैं वैसे ही एक ही कंपनी के बने सपने अलग-अलग पार्टी के पास जाकर अलग-अलग दिखने में लगे हुये हैं।
जनता बेचारी सपनों की चकाचौंध में फ़ंसी समझ नहीं पा रही है कि कौन सा सपना असली है कौन सा नकली। उसके हाल देखकर नंदन जी की ये पंक्तियां याद आती हैं:
आंखों में रंगीन नजारे सपने बड़े-बड़े
भरी धार लगता है जैसे बालू बीच खड़े।
खैर जनता की छोड़िये। आप अपनी सुनाइये -क्या आपको भी कोई सपना आता है?

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