Sunday, October 20, 2019

हिजली बंदी ग्रह एक बेहतरीन राष्ट्रीय स्मारक



खड़गपुर आईआईटी में सुबह डॉ. राजीव रावत के साथ टहलने निकले। उनके झोले में चाय का थरमस और कप थे। संगत के लिये बिस्कुट भी। खड़गपुर का विशाल परिसर कार में टहलते हुये देखा। फ़िर एक जगह उतर कर फ़ुटपाथ पर चाय की अड्डेबाजी हुई। सामने सूरज भाई चहकते हुये दिखे। उनको भी चाय आफ़र की गयी। वे खुश होकर और चमकने लगे।

रास्ते में वहां के सुरक्षा अधिकारी भी मिल गये। बताया उन्होंने कि लगभग 500 सुरक्षाकर्मी हैं यहां। उनके साथ एक चक्कर पैदल भी मारा गया। रास्ते में बादाम के पेड़ एक लाइन में अनुशासनबद्ध तरीके से खड़े थे। केले, चाय, काफ़ी, धान और न जाने किसकिस रकम के खेत दिखे। 2000 एकड़ जमीन में पसरा है आईआईटी खड़गपुर। यहां की आईआईटी में अकेली आईआईटी है जहां कृषि भी पढाई जाती है।
रास्ते में सड़क पर दो गिलहरियां आपस में मस्तियाती दिखीं। गले मिलकर हंसती, खिलखिलाती। एक दूसरे को गुदगुदाती। कबड्डी टाइप खेलतीं। एक न शायद दूसरी कोई कोई चुटकुला भी सुनाया हो क्योंकि वह कुछ देर तक सड़क पर लोटपोट होती रही।
वापस आते हुये हिजली बंदी गृह देखने गये। आजादी की लड़ाई के दौरान क्रांतिकारियों और सत्याग्रहियों को जेलों में भेजा गया। एक समय ऐसा आया कि जेलों में जगह नहीं बची। तब अंग्रेजों ने कैदियों को जेलों के अलावा दूसरे बंदीगृहों में रखा । पहला बंदी गृह बक्सा किले में बना। दूसरा बंदी गृह हिजली में सन् 1930 में बना। हिजली साम्राज्य का एक हिस्सा थी यह जगह।
1931 में हिजली में 16 सितम्बर, 1931 को एक महत्वपूर्ण घटना घटी। बंदीगृह में मौजूद दो निहत्थे बंदी संतोष कुमार मित्रा और तारकेश्वर सेन गुप्ता अंग्रेज पुलिस द्वारा गोली से उड़ा दिये गये। सुभाष चन्द्र बोस गोलीबारी में मारे गये बंदियों के शव लेने हिजली आये। तमाम नेताओं ने , जिनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर भी शामिल थे, ने इस घटना की निन्दा की। ’हिजली गोलीबारी’ जेल/बंदीगृह में पुलिस फ़ायरिंग की पहली घटना थी।
बंदीगृह 1937 में बंद कर दिया गया। 1940 में फ़िर खोला गया। 1942 में यह अंतिम रूप से बंद कर दिया गया। बंदी लोग दूसरी जगह भेज दिये गये। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहां पर अमेरिकी की २०वीं वायुसेना कमान का मुख्यालय भी रहा।हिजली में खड़ा एक जहाज शायद उसी समय का है।
सन 1946 में बने उच्च तकनीकी शिक्षा आयोग ने यह सिफारिश की कि अमेरिका के मेसाट्यूट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी की तर्ज पर भारत में भी तकनीकी संस्थान स्थापित किये जायें। उन दिनों भारत के अधिकांश उद्योग कलकत्ता में थे इसलिये पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अनुरोध किया कि पहले तकनीकी संस्थान की स्थापना कलकत्ता में ही की जाये। परिणाम स्वरूप मई,1950 में कलकत्ता में पूर्वी उच्च तकनीकी संस्थान की स्थापना हुई। बाद में जून, 1950 में इस तकनीकी संस्थान को कलकत्ता से 120 किमी दूर खड़गपुर के हिजली नामक एतिहासिक स्थान में स्थानान्तरित किया गया।
1951 में जब खड़गपुर आईआईटी की स्थापना हुई तो शुरुआत इसी कैंप से हुई। बंदीगृह के एक-एक कमरे में एक-एक विभाग चालू हुये। आज पूरे परिसर में पसरे हैं। 1990 में बंदीगृह के एक हिस्से को ’नेहरू विज्ञान एवं तकनीकी म्यूजियम’ में बदल दिया गया। हिजली बंदीगृह अब शहीद भवन के नाम से जाना जाता है।
सन 1956 में खड़गपुर तकनीकी संस्थान के संस्थान के दीक्षांत समारोह में अपने उद्गार व्यक्त करते हुये भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा:-
“ऐतिहासिक हिजली बंदी ग्रह जो भारत के बेहतरीन स्मारकों में से एक है अब भारत के नये भविष्य के रूप में बदल रहा है। यह चित्र मुझे उन परिवर्तनों का आभास कराता है जो कि भारत में हो रहे हैं।“
इस बंदीगृह के परिसर में 16 सन 1931 को सितम्बर को पुलिस की गोलीबारी में मारे गये शहीद संतोष कुमार मित्रा और तारकेश्वर सेन गुप्ता की स्मृति में कार्यक्रम होते हैं। उनके परिवारों , परिचितों के परिजन आते हैं। कम से कम यहां “शहीदों की चिताओं पर लगेगें हर बरस मेले” पर अमल होता है।
शहीद भवन के बाहर बैरकें बनी हैं जहां कभी बंदी रखे जाते होंगे। बड़ी सरिया में लगा हुआ ताला इतनी दूर कि किसी बंदी के हाथ बढाकर खोलने की संभावना शून्य।
वहीं एक रेलगाड़ी भी दिखी। बुजुर्गा रेलगाड़ी के आगे सिग्नल भी दिखा। लेकिन बूढा गाड़ी थककर वहीं खड़ी हैं। कोयला खत्म , पानी गोल, खत्म हो गया इंजन का खेल।
शहीद भवन से होते हुये मुख्य इमारत आये। वहां पहले मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय, जिनके आह्वान पर यह आई.आई.टी. बना है, की प्रतिमा लगी है।
लौटते हुये चयास लगी। एक जगह बैठकर चाय पी गयी। इसके बाद वापस आ गये गेस्ट हाउस। कार्यक्रम के लिये तैयार भी होना था।

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