Saturday, January 31, 2026

चेरापूंजी की ओर

   


27 जनवरी की सुबह चेरापूंजी देखने गए।

बचपन से सुनते आए थे कि चेरापूंजी में सबसे अधिक वर्षा होती है। शिलांग से करीब 53 किलोमीटर दूर है चेरापूंजी। शिलांग आये हैं तो चेरापूंजी तो देखना बनता ही है।
26 जनवरी को सुबह ही मेस में के सुरक्षा कर्मी विक्रम बिस्वा ने एक ड्राइवर से बात करा दी थी। चेरापूंजी आने-जाने और आसपास की जगहों को घुमाने के लिए 3500 रुपए कहे ड्राइवर ने। बाद में बात तैंतीस सौ रुपये (3300) पर तय हुई।
बाद में एक ड्राइवर ने कहा कि वह तीन हज़ार में घुमा लायेगा। लेकिन हमने सोचा जिससे तय किया उसी से जायेंगे। सुबह आठ बजे जाने का तय हुआ।
सुबह फ़ोन किया तो ड्राइवर ने उठाया नहीं। बाद में उठाया तो बोला -'आ नहीं पायेगा।'
हमने सोचा मेघालय देर हो गई है। चेरापूंजी अब अगले दिन जाएँगे। लेकिन फिर सोचा चले ही जाते हैं। ऐसे टालना ठीक नहीं।
नाश्ता करके निकले। पास में ही सिविल अस्पताल के पास दिखी पहली टैक्सी वाले से बात की। उसने कहा -' चलेगा। तीन हज़ार रुपये लगेंगे।'
हम फौरन गाड़ी में बैठे। चल दिए। तीन सौ रुपये की बचत से दिन की शुरुआत हो रही थी।
नाम पूछने पर ड्राइवर ने जो बोला उससे हमें लगा उसका नाम 'सनड्राप' है। हमें 'सनड्राप' खाने के तेल की याद आई। हमने उससे नाम की स्पेलिंग पूछी तो उसने बताई -Synrap. सिनरैप या साइनरैप को हम 'सनड्राप' समझ रहे थे। उच्चारण और उसकी समझ में अंतर के कारण इतना घपला तो चलता है।
Synrap की उमर 28 साल है। पाँच साल पहले उसकी शादी चेरापूंजी के पास के ही एक गांव की लड़की से हुई थी। एक दोस्त ने बताई थी लड़की। शादी के पहले तीन साल तक मिलना जुलना हुआ। मेघालय में शादी के पहले मिलना-जुलना आम चलन है। यह नहीं कि परिवार, ख़ानदान देखकर दिसंबर में शादी तय हुई और फ़रवरी में बाजा बज़ गया।
Synrap घर से नाश्ता करके नहीं आये थे। एक जगह रुककर उसने नाश्ता किया हमने चाय पी। जाते ही Synrap ने चावल, मछली आर्डर की और कोने में बैठकर खाने लगे। चाय के नाम पर रेड टी ही थी। रेड टी मतलब बिना दूध वाली चाय। हमने 'मिल्क टी' की फ़रमाइश की। दुकान पर मौजूद महिला ने गैस पर गरम होते दूध की तरफ़ इशारा करके बताया -'अभी दूध गरम हो रहा है। समय लगेगा।'
हमने कहा -' समय की परवाह नहीं। दूध वाली चाय ही पियेंगे।' उसने कहा -'ठीक। ठहरो। बनाते हैं।'
दुकान में दो महिलायें थीं। पान खाये थीं। पान खाने से उनके होंठ ऐसे लग रहे थे जैसे लाल लिपिस्टिक लगी हो। बसंती और मेरी नाम बताये उन लोगों ने अपने। चश्मा लगाए बंसती विवाहित हैं। तीन बच्चे हैं उनके। मेरी अविवाहित हैं। बातचीत में भाषा की बाधा इशारों और दायें-बायें के शब्दों से दूर हुई। Synrap ने भी दुभाषिये की तरह काम किया। बसंती सहज होकर बतिया रहीं थी। मेरी संकोच कर रहीं थी। फोटो के लिए पहले मेरी ने मना किया लेकिन बसंती के कहने पर कैमरा के सामने से हटी नहीं। फोटो दिखाया तो मुस्कराईं दोनों।
उस छुटकी चाय नाश्ते की दुकान में खाने-पीने के कुछ तैयार सामान रखें थे। गैस और कुछ बरतन थे। घर जैसी ही थी दुकान। दो महिलाएं चला रही थीं। बाहर कोई बोर्ड नहीं लेकिन पता था लोगों को यह दुकान है। यहाँ चाय-नाश्ता मिलता है।
हमने सोचा था कि Synrap के नाश्ते के पैसे भी हम ही दे देंगे लेकिन मेरे भुगतान करने के पहले ही वह अपना हिसाब चुका था। आगे भी चाय भले मेरे साथ पी लेकिन खाना के पैसे ख़ुद दिए। खाकर भुगतान करके चला आया।
नाश्ता करके निकले तो बगल की गुमटी से Synrap ने लाटरी का एक टिकट ख़रीदा। दस रुपए का टिकट ऐसे ख़रीदा जैसे खाने के बाद पान लगवाया जाता है। पूछने पर बताया -' नियमित खरीदते हैं टिकट। कभी-कभी लॉटरी निकल भी आती है।'
रास्ते में मावकडोक गांव पड़ा। मेघालय का यह गाँव लोहे के औजार बनाने वाले लोगों के गाँव के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ की बनाई चाकू Ka Wait के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ का Mawkdok presbyterian lp school इस नाम से गाँव बनने के पहले ही खुल गया था। स्कूल 1933 में खुला था। जबकि इस नाम से गाँव की स्थापना 23 मार्च, 1952 को हुई। यह बेटे के बाप से पैदा होने जैसी बात है। 1967 में यह गाँव उड़न तस्तरियाँ देखे जाने के लिए भी प्रसिद्ध हुआ।
यह जगह Dympep Valley (डिंपेप घाटी) कहलाती है। मेघालय के सबसे खूबसूरत, शानदार स्थानों में से एक है। लोग यहाँ फ़ोटोग्राफ़ी के लिए रुकते हैं। फोटो खींचते हैं। हम भी रुके। मावकडोक, डिंपेप घाटी के बोर्ड के पास खड़े होकर फ़ोटो खिंचाये ताकि सनद रहे। इसके बाद बीच सड़क पर भी खड़े हुए और फ़ोटो खिंचाये।
पास ही थोड़ी ऊँचाई पर Laits ohpliah Tymcamnasi view point है। सीढ़ियों से ऊपर जाने पर कई स्पॉट बने हैं जहाँ से घाटी की खूबसूरती को देखा जा सकता है। ऊँचाई पर स्थित व्यूप्वाइंट पर खड़े होकर देखने पर घाटी, नीचे सड़क, सड़क, सड़क के मोड़ और सड़क से गुजरती हुई गाड़ियाँ बहुत ख़ूबसूरत दिखती हैं। व्युपाइंट पर तेज हवा चल रही थी। धूप खिली हुई थी। चारो तरफ़ का नजारा बहुत बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था। वहाँ खड़े होकर हमने और ड्राइवर ने के दूसरे के फ़ोटो खींचे। आसपास के वीडियो बनाए।
व्यूप्वाइंट से लौटते समय एक युवा बंगाली जोड़ा वहाँ आया। उसने हमारे ड्राइवर से फ़ोटो खींच देने का अनुरोध किया। ड्राइवर से किए उनके अनुरोध को लपकते हुए हमने उनका कैमरा हथिया लिया। कहा -'लाओ हम खींच देते हैं फ़ोटो।'
वे लोग राष्ट्रगान गाने वाली मुद्रा में फोटो खिंचाने के लिए खड़े हो गए। सद्भावना समिति के प्रतिनिधियों की तरह। हमने उनको पास आकर युवा जोड़े की तरह फोटो खिचवाने के लिए कहा। वे आ गए। हमने उनकी इस बहादुरी पर शाबासी देते हुए उनको और नज़दीक आने के लिए। वे पास आते गए। हम उनकी फ़ोटो खींचते गए और पास आने के लिए कहते गए। एक समय ऐसा जब शरीर की हड्डियों के कारण और पास आने की गुंजाइश ख़त्म हो गई। और पास आने की कोशिश करते तो हड्डियों के डॉक्टर की सेवायें लेनी पड़ती। यह भी हो सकता है कि हमारे ऊपर उनको घायल होने के लिए उकसाने की FIR हो जाती।
और पास आकर आने की फ़ोटो खिंचवाने के संभावनायें ख़त्म होने के बाद हमने उनको एक दूसरे को चूमते हुए फ़ोटो खिंचवाने के लिए उकसाया। बालक ने शर्मा कर मना कर दिया। लेकिन बालिका ने कहा -'मैं करती हूँ इसको किस( आप लीजिए फ़ोटो)। ' बालिका ने लड़के को चूमते हुए फोट खिंचाई तो बालक की भी झिझक ख़त्म हो गई। उसने भी बालिका के गाल चूमते हुए फ़ोटो खिंचाये। उनके एक दूसरे के गाल चूमते हुए फ़ोटो लेने के बाद हमने उनको एक दूसरे के होंठ चूमते हुए फ़ोटो खिंचाने के लिए उकसाया। बालक झिझका लेंकिन बालिका फौरन तैयार हो गई। उन्होंने रोमांटिक अंदाज में एक दूसरे को चूमते हुए फ़ोटो खिंचाये। बाद में फ़ोटो देखते हुए बहुत खुश हुए। हमको इतने प्यारे फ़ोटो खींचने के लिए बार-बार धन्यवाद दिया।
हमारे उकसाने पर उस युवा जोड़े का फोटो खींचने के लिए तैयार होना देखकर मुझे लगा कि उकसाने पर लोग सिर्फ़ लड़ाई, दंगा , हत्या ही नहीं प्रेम भी कर सकते हैं।
बाद में नीचे उतरते हुए उनसे बात हुई। अपने बारे में बताते हुए उन्होंने दस साल के प्रेम संबंध के बाद उन्होंने शादी की। बालक मृगांक ( उम्र 38 साल) और बालिका राज श्री (28 साल) की शादी के अभी एक साल हुआ है। अपने माँ-पिता का इकलौते संतान मृगांक के पिता अब नहीं रहे। वो मेडिकल स्टोर से जुड़ा काम करता है। राजश्री पॉटरी पेंटिंग से जुड़े काम करती है।
दस साल का प्रेम बहुत धैर्य माँगता है। हमने राजश्री से पूछा कि मृगांक में ऐसा क्या खास लगा जो वह उससे शादी के लिए तैयार हुई। उसने कहा -'इसकी ईमानदारी और सहजता।' मृगांक ने भी कुछ ऐसा ही राजश्री के लिए कहा। नीचे सड़क पर उतरकर हमने उनके साथ सेल्फी ली। आगे बढ़ गए।
मृगांक ने मेरे द्वारा खींचे हुए फ़ोटो अपने फ़ोटो मुझे भेजने का वायदा किया था। अभी तक भेजे नहीं हैं। शायद बालक शरमा रहा हो अपने फोट भेजने में। यह भी सार्वजनिक रूप से प्रेम प्रदर्शन के मामले में हमारा समाज सहज संकोच करता है।
डिंपेप घाटी से थोड़ा आगे WAH KABA LATARA झरना देखने गए। मानसून में यह झरना पानी से भरपूर और ख़ूबसूरत दिखता है। अभी इसमें पानी की बहुत पतली रेखा बहती दिखी। झरना शायर होता तो शायद कहता :
"अब इतनी भी मयस्सर नहीं मैखाने में ,
जितनी कभी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में।"
झरने के बाद रास्ते के नजारे देखते हुए चेरापूंजी पहुंचे। पता लगा चेरापूंजी का स्थानीय नाम सोहरा है। जिस जगह को बचपन से हम चेरापूंजी के नाम से जानते आए हैं उसका असली नाम कुछ और (सोहरा ) है यह देखकर लगा कि अक्सर हम असलियत से कितने अनजान रहते हैं। घूमने नहीं आते यहाँ तो चेरापूंजी के नाम से ही सोहरा को जानते रहते। इससे एहसास हुआ कि किसी जगह, चीज, इंसान की असलियत जानने के लिए उसके पास जाना चाहिए।
यह एहसास यहाँ का प्रसिद्ध सात बहनों के झरने को देखने पर भी हुआ। Seven sistrets falls के नाम से प्रसिद्ध झरने का स्थानीय नाम nohsngithiang झरना है। झरना सूखा था। बिल्कुल पानी नहीं था। सामने घाटी में पत्थरों पर झड़ने के पानी बहने के निशान बने हुए थे। ऐसे जैसे किसी के गाल पर आँसू बहने के निशान बने रहते हैं। झरने के ख़ूबसूरत प्रवाह को आँख के आँसू से तुलना अटपटी लग सकती है गाल पर बहे सूख चुके आँसू को ख़ुशी के आँसू समझा जाये।
झरने को देखने के लिए वहीं दो दूरबीनें लटकी हुईं थीं। हमने उनमें से एक को अपनी आँख के सामने लगाया तो एक बच्चा लपकता हुआ आया और बोला -'फाइव रुपीस।' सूखे हुए झरने को देखने के लिए पाँच रुपये देना मुझे ठीक नहीं लगा। हमने दूरबीन वापस लटका दी। बच्चा भी वापस चला गया। अब लगता है मुझे देखना चाहिए था दूरबीन से नजारा। पाँच रुपए बचाने की जो बात वहाँ समझदारी लगी वह अब मुझे बेवक़ूफ़ी की लग रही है। इससे मुझे फिर से लगा कि समझदारी और बेवक़ूफ़ी स्थाई नहीं हैं। जो बात आज समझदारी की लगती है वह कल बेवक़ूफ़ी की बात साबित हो सकती है। समझदारी और बेवक़ूफ़ी की बातें समय के साथ चन्द्रमा की कलाओं की तरह अपना रूप बदलती हैं।
सूखा झरना देखने के बाद हमने वहाँ बने शौचालय की सुविधा का उपयोग किया। भुगतान पर आधारित इस सुविधा के उपयोग के लिए शुक्ल लेने के लिए किसी को न देखकर शुकुल जी खुश हुए। सोचा दस रुपये बच गए। लेकिन जैसे ही ऊपर पहुँचे एक महिला नेपथ्य से निकल कर आई और हाथ बढ़ाते हुए बोली -'टेन रूपीश ।' दस रुपए देते हुए हमने थोड़ी देर पहले दस रुपये बचने की ख़ुशी को ख़ारिज करना चाहा लेकिन वह ख़ुशी ' बिका हुआ माल वापस नहीं होगा' की तर्ज पर खारिज नहीं हुई। बनी रही यह कहते हुए कि कम से कम इतनी देर तो बचे रहे पैसे।
ऊपर आकर एक दुकान पर चाय पी। बिस्कुट खाये। काउंटर पर खड़ी खूबसूरत बच्ची के सहयोग के लिए प्यारे बच्चे मोबाइल पर कोई खेल रहे थे।
चाय पीकर हम वापस लौट लिए। लौटने के पहले चेरापूंजी की खूबसूरती को जी भर कर निहारा। चेरापूंजी मतलब सोहरा की खूबसूरती को थोड़ा समेटकर मोबाइल में भी धर लिया। बाक़ी बची हुई ख़ूबसूरती को वहाँ आने वालों को छोड़कर वापस चल दिये।

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Friday, January 30, 2026

शिलांग की शाम




 पुलिस बाजार पहुंचकर कुछ देर चौराहे पर खड़े होकर इधर- उधर देखते रहे। सभी दुकानों के शटर बंद थे। बंद दुकानों के सामने तमाम लोग तरह तरह के फुटकर सामान बेच रहे थे।

सड़क के दोनों तरफ टैक्सियों की लाइन लगी थी। ज्यादातर टैक्सी वाले गुवाहाटी की सवारियों के लिए आवाज लगा रहे थे। इनमें साझे की टैक्सी भी थीं और अकेले ले जाने वाली भी। कुछ टैक्सियां स्थानीय जगहों के लिए भी सवारी खोज रहीं थीं।
एक टैक्सी वाले ने मुझे इधर उधर ताकते देखा तो लोकल टूर का प्रस्ताव पेश कर दिया। पांच- छह जगहें गिना डालीं जहां वह अगले चार पांच घंटे में मुझे ले जाने वाला था। यह टूर उसने पंद्रह सौ रुपए में ऑफर किया। हमने सोचा चला जाए। बैठ गए टैक्सी में। चल दिए।
हमारी पहली मंजिल शिलांग पीक प्वाइंट थी। ऊंचाई पर स्थित इस जगह से शिलांग शहर का नजारा दिखता है।
रास्ते में ' शिलांग में देखने लायक जगहों में से एक' लेडी हैदरी पार्क पड़ा। टैक्सी रोककर हम उसे देखने के लिए उतरे। पता चला सोमवार होने के कारण पार्क बंद था। सोमवार को पार्क की साप्ताहिक बंदी होती है। हम लौट पड़े।
लौटने से पहले हमने पार्क के गेट से उचक कर पार्क के अंदर का नजारा देख लिया। अंदर पार्क था, बैठने की जगह थी, झूले थे और थोड़ा पानी का इंतजाम। 'बच्चा प्रधान पार्क'। हमने सोचा कि अच्छा ही हुआ पार्क बंद मिला। खुला होता तो इसे देखने में कम से कम आधा घंटा लगता। सामान्य से दिखने वाले पार्क को देखने में लगने वाले आधा घंटा और पार्क की फीस के रुपए खर्च करने से बचाकर अच्छा ही लगा।
पार्क के बाहर ही एक महिला गुब्बारे बेच रही थी। हमने सोचा एक खरीद ले। लेकिन सोच पर अमल किए बिना लौट लिए। लौटने के पहले गुब्बारा बेचने वाली महिला की फोटो जरूर खींच ली। उसने भी हमको फोकटिया समझकर कोई एतराज नहीं किया।
शिलांग पीक जाते हुए एलिफेंट झरने के पास से गुजरते हुए एक दिन पहले वहां की सड़क पर स्कूटी से गिरने की याद ताजा हो गई। अनायास हाथ घुटने की तरफ़ चला गया। हमने चोट को सहलाया। दर्द का आभास अभी भी बचा हुआ था। पिछले दिन के मुकाबले सड़क और रपटीली हो गई थी। लोग सरकते हुए आगे बढ़ रहे थे। हमने तसल्ली की सांस ली कि हम दुपहिया गाड़ी की बजाय चौपहिया गाड़ी में बैठे थे।
शिलांग पीक व्यू प्वाइंट पर पहुंचने पर पता चला कि गणतंत्र दिवस होने के कारण व्यू प्वाइंट बंद है। हमने सोचा व्यू प्वाइंट भी कोई बंद होने की जगह है। लेकिन हमारे सोचने से क्या होता है? वह बन्द ही था।।
हमको वहां खड़ा देखकर वहां टहलते हुए फुटकर सामान बेचने वाली बच्चियां और महिलाएं आ गई। एक महिला ने चेरी का पैकेट हमारे सामने हिलाते हुए दाम बताए- 'सौ रुपए के तीन।' हमने एक पैकेट ले लिया। उस महिला को पैसे दिए। उससे पूछा कि वहां चाय कहां मिलती है? उसने कुछ जवाब नहीं दिया। हमने दुबारा पूछा। वह बोली नहीं। फिर वहां खड़ी एक बच्ची ने बताया कि वह ऊंचा सुनती है।
हमने ऊंची आवाज में पूछा। उसने बताया कि चाय की कोई दुकान नहीं है वहां। हमने चेरी का पैकेट खोलकर एक चेरी उसको खाने को दी। उसने मना किया। ड्राइवर ने उससे लोकल भाषा में ले लेने को कहा। उसने ले लिया। खाने भी लगी। हमने और ड्राइवर ने और वहां मौजूद एक बच्ची ने भी चेरी खाई।
ड्राइवर ने हमारे कहने पर चिल्ला कर महिला का नाम पूछा। ड्राइवर ने उससे पूछकर बताया कि उसका नाम ' ना ' है। हो सकता है कि ड्राइवर ने कुछ और कहा हो लेकिन हमको ' ना ' ही समझ आया।
हम लौट पड़े। महिला ने 'लला फिर अइयो खेलन होरी' वाले अंदाज में अगले दिन फिर आकर शिलांग व्यू प्वाइंट देखने का निमंत्रण दिया।।हम मुंडी हिलाते हुए गाड़ी में बैठ गए।
हमारी अगली मंजिल वार्ड झील (Wards Lake) थी। ड्राइवर हमको वहां ले गया। सड़क पर गाड़ियों की भीड़ थी। ड्राइवर ने झील से करीब दो सौ मीटर पहले गाड़ी एक नुक्कड़ पर खड़ी कर दी। आगे जाना मुनासिब नहीं था। उसने हमसे कहा - ' आप घूम कर आओ। मैं यहीं इंतजार करता हूं।' हम झील की तरफ चल दिए।
झील के प्रवेश द्वार पर लोगों की लंबी लाइन लगी थी। सौ -डेढ़ सौ मीटर । लोग अनुशासन बद्ध होकर प्रवेश द्वार की तरह बढ़ रहे थे। झील के बाहर की सड़क और अंदर पार्क पूरा भरा था। लड़के, लड़कियां अपने दोस्तों - सहेलियों और परिवार के साथ घूमने आए थे। तमाम लोग झील में बोटिंग भी कर रहे थे।
अंदर पार्क में खाने-पीने के स्टॉल लगे थे। एक जगह स्टेज पर कुछ लोग गाना गा रहे थे। वहीं पर टाट के पर्दे लगे कई चबूतरे से बने थे। लोग इन टाट के पर्दों को स्क्रीन की तरह इस्तेमाल करते हुए फोटो खींच रहे थे। सेल्फी ले रहे थे।
वहीं एक महिला माइक पर कोई गाना गा रही थी-'जान भी मेरी तू है।' कुछ बच्चे उसके सामने डांस कर रहे थे। सामने एक डब्बा रखा था। लोग डब्बे में कुछ पैसे डालते जा रहे थे।
लौटते हुए एक लड़का और एक लड़की दिखे। गले में Young Leaders Dialogue का बिल्ला लटकाये हुए थे। पूछने पर पता चला कि वे राजभवन में गणतंत्र दिवस के प्रोग्राम में भागेदारी करके आए हैं। कुछ दिन पहले दिल्ली भी गए थे। मेघालय का प्रतिनिधित्व करने। दिल्ली में हुए कार्यक्रम में उन्होंने एक प्रस्तुति दी थी। प्रस्तुति का विषय ' भारत वर्षोंन्नति।कैसे हो सकती है 'जैसा था।
बच्चों से बात करने पर पता चला कि वे बीकॉम के छात्र हैं। शिलांग से करीब साठ किलोमीटर दूर एक गांव से राजभवन में सम्पन्न गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में भाग लेने आए थे। एक ही गांव के रहने वाले बच्चे राजभवन में होने वाले समारोह में भाग लेने के बाद घर लौटने से पहले घूमने आए थे। उन बच्चों से बाद में भी बात हुई और उनके बारे में जानकारी हुई।
झील से लौटते हुए एक बार फिर स्टेज की तरफ गए। गायक गाना गा रहा था । स्टेज पर बोर्ड लगा था -'मेघालय ग्रास रूट म्यूजिक प्रोग्राम।' लोग बैठकर, खड़े होकर गाने सुन रहे थे।गाना चल रहा था -'तू दे दे मेरा साथ थामे ले मेरा हाथ।'
हमने गाने का वीडियो बनाया। वीडियो बनाते हुए कैमरा श्रोताओं की तरफ भी घुमाया। मेरे पीछे खड़ी कुछ लड़कियां भी गाना सुन रही थीं। साथ में गा भी रहीं थीं। वीडियो बनाते हुए मोबाइल का कैमरा उनकी तरफ घुमा तो इनमें से एक ने असहज होते हुए मुंह बिचकाया। जबकि उसके साथ की दूसरी लड़की मुस्काती हुई कैमरे की तरह देखती रही। गाना पूरा होने तक हमने एक राउंड फिर श्रोताओं की तरफ घुमाया। लड़कियों की प्रतिक्रिया पहले जैसी ही थी। गाना पूरा होने पर हमने रिकॉर्डिंग बंद की। चलते समय उन बच्चियों की तरह देखा तो मुस्कराते हुए रिकॉर्डिंग देखने वाली बच्ची फिर से मुस्कराई। हमको एक बार फिर से लगा -' मुस्कराते हुए लोग कितने खूबसूरत लगते हैं।'
पार्क के बाहर आकर हम सेट मेरी कैथड्रल चर्च देखने गए। वहां सीढ़ियों पर तीन बच्चियां दो- दो करके फोटो ले रहीं थी। हमने उनका कैमरा लेकर तीनों का एक साथ फोटो खींच दिया। फोटो देखकर वे खुश हो गई। खूबसूरत बच्चियों का फोटो खूबसूरत आया था। फिर हमने उनसे पूछकर अपने मोबाइल से भी उनका फोटो खींचा । वह फोटो और खूबसूरत आया था । उसे देखकर वे और भी खुश हो गई। हमने उनको फोटो भेज दिया । वे फोटो बार बार देखकर खुश हो रही थी। हमने उनसे पूछा कि उनका फोटो अपने फेसबुक पर पोस्ट करने में उनको एतराज तो नहीं है ?
मेरे इस सवाल पर दो बच्चियों को तो कोई एतराज नहीं था। लेकिन तीसरी बच्ची को हिचक थी। उसने बताया -' उसके घर वालों को एतराज हो सकता है।' उसकी हिचक को देखकर मैने कहा -' ठीक है नहीं पोस्ट करेंगे।'
चर्च के अहाते में ईसा मसीह और मेरी की मूर्तियां थी। प्रार्थना घर में बेचें लगीं थीं। एक महिला खड़े-खड़े वहां रखे रजिस्टर में कुछ लिख रही थी। देर तक लिखती रही। उसके जाने के बाद मैने कौतूहल वश रजिस्टर देखा। उसने जो लिखा था उसका लब्बोलुआब था -' हे ईश्वर, आप ही मेरी बात समझ सकते हो। मुझे और मेरे बच्चों को सही रास्ता दिखाते रहना।'
उसकी प्रार्थना पढ़ने के बाद मुझे लगा कि शायद किसी दूसरे की प्रार्थना को पढ़ना नहीं चाहिए। ईश्वर और भक्त के बीच संवाद और संपर्क व्हाट्सएप के संदेश की तरह होते हैं। दोनों के अलावा किसी और को सुनाई दिखाई नहीं देना चाहिए। उनको किसी तीसरे द्वारा पढ़ना पाप हुआ। लेकिन अब क्या कर सकते हैं। हम ईश्वर से इस कृत्य के लिए माफी मांगते हैं। ईश्वर महान है वह जरूर हमें माफ करेगा।
चर्च के बाद हम लोग शिलांग का गोल्फ कोर्स (गोल्फ लिंक्स) देखने गए । शिलांग गोल्फ कोर्स, जिसे "पूर्व का ग्लेनीगल्स" (Glenn Eagle of the East) कहा जाता है, मेघालय की राजधानी शिलांग में स्थित एक ऐतिहासिक और सुरम्य 18-होल गोल्फ कोर्स है। 1886 में स्थापित, यह भारत के सबसे पुराने और सबसे खूबसूरत गोल्फ कोर्सों में से एक है, जो चारों ओर देवदार के पेड़ों और पहाड़ियों से घिरा है।
कुछ देर वहां रहने के बाद हम वहां से लौट पड़े। लौटने से पहले वहां का फोटो और वीडियो अपने मित्र अजय सिंह को भेजा और गोल्फ कोर्स के बारे में बताया। उन्होंने इसे अपनी विश लिस्ट में जोड़ लिया है। देखते हैं इच्छा सूची पर पूरी होने का टिक कब लगता है। जीवन में हम अपनी इच्छा सूची में अनगिनत इच्छायें जोड़ते जाते हैं। उनमें से कुछ पूरी होती हैं, बहुत कुछ अधूरी रह जाती हैं। अधिकतर के बाद में तो याद भी नहीं होता कि कभी यह हमारी इच्छा सूची में था भी।
गोल्फ कोर्स से लौटते हुए कुछ लोगों ने गाड़ी ने बैठने के लिए लिफ्ट मांगी। ड्राइवर ने लिफ्ट नहीं दी। हमने उससे कहा - 'एक दो सवारी बैठा लो। कुछ और कमाई कर लो।'
उसने कुछेक लोगों को लिफ्ट दी। कुछ कमाई की। आगे एक जगह एक साथ चार लोगों ने लिफ्ट मांगी। ड्राइवर ने दरवाजा खोल दिया। एक आदमी आगे बैठा। तीन पीछे। हमको लेकर पीछे कुल चार लोग हो गए। पीछे बैठी एक सवारी ने हमको धकिया कर सरकने के लिए कहा। हमने सोचा - ' अपनी ही गाड़ी में हम धकिया दिए गए। जब बेइज्जती है।'
कुछ देर बाद हम वापस पुलिस बाजार पहुंचे। ड्राइवर को पैसे दिए। ड्राइवर ने अपना नंबर दिया। हमने उसको सेव कर लिया। बाद में फोन मिलाने पर -' यह नम्बर मौजूद नहीं है की आवाज आती रही।' फर्जी नंबर रहा होगा।
पुलिस बाजार चौराहे पर सुंदर रोशनी हो रही थीं। चौराहे पर रोशनी में चमकते ' आई लव शिलांग ' के सामने खड़े होकर फोटो खिंचा रहे थे। मैंने चौराहे की फोटो खींचकर सुरक्षित रख की।
वापस लौटते हुए एक बड़ी इमारत के सामने दो लड़कियां और एक लड़का फोटो खींच रहे थे। लड़का लंबा था। लड़कियों की तुलना में काफी लंबा। फोटो खींचने के चक्कर में लड़कियों के बराबर दिखने की कोशिश में टेढ़ा हो रहा था। सड़क पर लंबलेट जैसा हो रहा था। पास से गुजरने पर हमने लड़के को सीधा किया और उसका कैमरा लेकर उनका फोटो खींच दिया। फोटो अच्छी आई। वे खुश हो गए।
पता लगा कि वे दिल्ली , चंडीगढ़ और बंगलौर की कम्पनियों में काम करते हैं। देश के तीन प्रदेशों की राजधानी के तीन लोग वर्क फ्रॉम होम सुविधा का फायदा उठाकर चौथी जगह ( शिलांग) महीनों से एक जगह टिके हुए हैं। दो कमरे के एक एयरविंग में तीनों लोग रह रहे हैं, काम कर रहे हैं। मेरे लिए यह कौतूहल का विषय है कि तीन अलग अलग जगहों में रहने में वाले लड़के-लड़कियां किसी चौथी जगह पर किराए पर रहते हुए काम करें। लेकिन मेरे ताज्जुब करने से क्या होता है? उसकी क्या औक़ात?
रास्ते में शिलांग का राजभवन दिखा। गणतंत्र दिवस के मौके पर जनता के देखने के लिए खुला था। लोग उसे देखने आए थे। राजभवन की शुरुआत में ही पानी का फ़व्वारा चल रहा था। लोग उसके पास खड़े होकर फ़ोटो खिंचवा रहे थे। पानी के फ़व्वारे मुझे हमेशा से अच्छे लगते रहे हैं। पानी बहता देखकर लगता है जीवन प्रवाह हो रहा है।
राजभवन देखने के बाद बाहर आए। टहलते हुए थकान महसूस हुई। एक दुकान के बाहर बैठकर चाय पी। दुकान पर एक बच्ची काम कर रही थी। साथ में बैठा बच्चे से बात करने पर पता चला कि वो ऐसे ही सहायता के लिए बैठा है। मध्यमवर्गीय सोच के हिसाब से मैंने कल्पना की उन बच्चों के बीच प्रेम संबंध के बीज पड़ रहे हैं।
चाय पीकर हम वापस लौट आये। लौटकर मेस में ड्राइवर से हुई बातचीत के बारे में सोचा। बंगाली ड्राइवर शिलांग में पैदा हुआ, पला ,बढ़ा है। 38 साल उमर। अभी तक शादी नहीं हुई। पिछले तीन-चार साल से 25 साल की एक स्थानीय लड़की से प्रेम संबंध हैं। यौन संबंध भी। छोटी बहन की शादी के बाद ख़ुद की शादी करेगा। अपने प्रेम संबंध के बारे में बहादुरी से बताया उसने कि उसने कैसे लड़की पटाई।
हमने उससे पूछा कि तुम्हारी बहन भी यहीं पली-बढ़ी है। उसके भी कोई प्रेम संबंध होंगे। उससे कर लेगी वह शादी। तुम इतने बूढ़े हो गए। शादी में देरी करना समझ में नहीं आता। तुमको कर लेनी चाहिए।
उसने कहा -'मेरी बहन का कोई प्रेम संबंध नहीं है। वह घर में ही रहती है। उसकी शादी के बाद ही दो-तीन साल में शादी कर लूँगा।'
दो दिन में एक नेपाली मूल के और एक बंगाली मूल के ड्राइवरों के प्रेम संबंध के वीरता पूर्ण आख्यान सुनकर लगा कि बाहर से आकर बसे लोगों ने स्थानीय रीति-रिवाजों और खुलेपन का फायदा उठाते हुए स्थानीय लड़कियों से संबंध बनाए। इसे अपनी उपलब्धि के रूप में विस्तार से बयान किया। मुझे खोया पानी का यह प्रसंग याद आया :
"बहुत तीर मारा तो ब्रिटिश नागरिकता हासिल करके वो रही-सही इज्जत भी गवां दी, जो टूरिस्ट या मेहमान होने के कारण उपलब्ध थी। ब्रिटिश पासपोर्ट और देशवासियों की बेबसी का प्रतिरोध लेने के लिए किसी अंग्रेज औरत से शादी कर ली और अपनी तरफ़ से सारे अंग्रेजों को नाड़े के रिश्ते में बाँधकर डाल दिया।'
लेकिन दो दिन के पर्यटन के आधार पर किसी समाज के बारे में कुछ धारणा बनाना उचित नहीं है। लेकिन इंसानी फ़ितरत के अनुसार जिसके बारे में कुछ नहीं जानते उसके बारे में धारणायें फौरन बनती हैं-'अज्ञानी का आत्मविश्वास तगड़ा होता है।'
पहले की पोस्ट यहाँ पहुँचकर पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/p/1aREqtcvsx/


Thursday, January 29, 2026

शिलांग की सड़क पर


 डॉन बास्को म्यूजियम के पास महिलाओं से मिलने के बाद टैक्सी से बड़ा बाजार आए। बीस रुपए भाड़ा पड़ा। उतर लिए।

बड़ा बाजार में मुख्य दुकानें गणतंत्र दिवस होने के कारण बंद थी। सड़क पर फुटपाथ पर सामान रखकर बेचने वाले दिख रहे थे। चौराहे पर स्कूटी, मोटरसाइकिल लिए कई युवा चालक सवारियों के इंतजार में खड़े थे। ज्यादातर यहाँ स्कूटी ही चलती दिखी।
चौराहे पर एक महिला हाथ, पैर, बदन रगड़कर सफ़ाई करने वाला सामान बेच रही थी।सूखी तरोई से बनने वाले इस स्पंज से नहाते समय त्वचा साफ़ करने की जाती है। प्राकृतिक स्पंज प्लास्टिक की तरह दिख रहा था। घर में फ़ोटो दिखाकर, परमिशन ली। दो ठो ले लिए। स्पंज की फ़ोटो लेते समय सामान बेचने वाली महिला सामने से हट गई। उसको अपनी फ़ोटो खिचवाना पसंद नहीं।
चौराहे पर संतरा और उसके सामने खुले में मीट बिक रहा था। मीट हर तरह का था। यहँ चिकन, सुअर और गाय का भी मांस बिकता है। संतरा बिकते देखकर देखकर लगा नागपुर की याद आ गई। उत्तर भारत में ऐसा संभव नहीं। मीट की दुकानों में कोई गंदगी नहीं थी।
नुक्कड़ पर एक आदमी सिगरेट में भरकर पीने वाला तम्बाकू बेच रहा था। लच्छेदार तंबाकू देखकर मैनपुरी तंबाकू की याद आ गई। हमको दिखाकर दुकान वाले ने तंबाकू बेचने वाले ने मेरे सामने सिगरेट भरी और सुट्टा मारकर दिखाया। उसके साथ बैठा छुटका लड़का हमको देखकर हँसता रहा। उसको लग रहा होगा -कैसा नमूना है।
नुक्कड़ पर सड़क नीचे की तरफ़ जाते दिखी। ढलान बनी दुकानें बंद थीं। उनके सामने सड़क पर सामान लगाकर लोग बेच रहे थे।
वहीं आगे एक जगह लोग सड़क पर लॉटरी खेलते दिखे। तीन महिलायें बाल्टियों में टिकट लिए बैठीं थी। लोग उसमें से नम्बर लेकर दाँव लगा रहे थे। हमारे हाथ में मोबाइल देखकर किनारे बैठी महिला ने इशारे से मुझे आगे बढ़ने के लिए कहा। उसको मतलब था -फोटो मत खींचो।
हम थोड़ा आगे बढ़ गए। लेकिन लौटते समय हम फिर वहाँ खड़े होकर लॉटरी का खेल देखते रहे। मन किया हम भी कुछ पैसा लगाकर लॉटरी का टिकट ख़रीद लें। लेकिन फिर 'मन की बात' मानी नहीं। 'मन की बात' आजकल मजबूरी में लोग सुन भले लें लेकिन मानता कौन है? इस बार महिलाएं टिकट बेचने में मशगूल थीं। हमने चलते-चलते उनका फ़ोटो ले ही लिया।
वहीं चौराहे पर एक छुटकी दुकान पर खाने की दुकान दिखी। महिलायें दुकान चला रहीं थी। लोग दुकान पर बनीं बेचों में बैठकर खाना खा रहे थे। खाना देखकर हमें भी भूख लग आई लेकिन वहाँ केवल नॉन वेज खाना मिल रहा था। नहीं खाये।
चौराहे पर एक जगह दो महिलायें एक जगह 'नो इंट्री' का बोर्ड लगा था। उसके पास दो महिलायें कुछ सामान बेच रहीं थीं। हमें लगा चाय बेंच रहीं होंगी। लेकिन पास जाने पर देखा वहाँ अंडा, पानी की बोतल और चिप्स वगैरह बिक रहे थे। एक महिला कच्ची सुपारी के फल को चाकू से छील-छील कर सुपारी निकाल रही थी। सुपारी निकाल कर उसे काटकर एक बक्से में बिक्री के लिए रखती जा रही थी।
हमने सुपारी छीलती महिला का फोटो लिए और वीडियो बनाया तो उसने मुँह फेर लिया । अलबत्ता उसके साथ वाली महिला हमको वीडियो बनाते देखती रही। बाद में फ़ोटो दिखाने पर सुपारी छीलती महिला भी मुस्कराते हुए अगली सुपारी छीलने लगी।
हमने चाय की दुकान के बारे में पूछा तो मुस्कराते हुए वीडियो बनाते देखने वाली महिला ने नुक्कड़ की तरफ़ इशारा करते हुए बताया -'वहाँ मिल जायेगी चाय।'
हम नुक्कड़ की दुकान की तरफ़ बढ़े तो उसके सामने सड़क किनारे दो महिलायें सुपाड़ी छीलती दिखीं। 'सुपाड़ी छीलने की जुगलबंदी ' करती महिलायें हमो फ़ोटो लेते, वीडियो बनाते , मुस्कराते देखती रहीं। वे मुँह में रखा पान चबाती जा रहीं थीं। पान का रंग उनके होंठों पर लिपिस्टिक की रचा हुआ था।
जिस तरह उत्तर भारत में पानी के साथ मिठाई, पानी चाय पिलाते हैं उसी तरह मेघालय में घर आए मेहमान का स्वागत पान में रखी कच्ची सुपारी और लाल चाय (बिन दूध की चाय) के साथ करते हैं।
वहीं चाय की दुकान में बैठकर चाय पीने के लिए बैठे। भूख लगी थी। दुकान में कचौड़ी, जलेबी भी बिक रही थी। एक कचौड़ी, एक जलेबी और एक चाय आर्डर की। वहाँ बिकने वाले सामान की रेट लिस्ट लगी थी। जलेबी पाँच रुपए की एक, कचौरी दस रुपए की और दूध की सामान्य चाय दस रुपए की। कुल सत्ताईस रुपये खर्च किए दुकान पर।
दुकान पर बैठे बुजुर्ग से नाम पूछा तो बताया -मौजी लाल महतो। वैशाली , बिहार के रहने वाले हैं।यहाँ दुकान पर काम करते हैं। काम यहाँ करते हैं लेकिन बिहार आते -जाते रहते हैं।
मेघालय में ज्यादातर दुकानों पर उत्तर प्रदेश, बिहार, कोलकता के लोग काम करते हैं। दुकान चलाते हैं। लेकिन दुकानों पर मालिकाना हक मेघालय के लोगों का है। मेघालय के बाहर के लोग यहाँ किराए पर ही दुकान, मकान चला सकते हैं। किरायेदार की हैसियत से ही रह सकते हैं। मालिकाना हक नहीं होता उनका।
इस व्यवस्था में मेघालय से बाहर के लोगों की हैसियत दूसरे दर्जे के नागरिकों की सी ही रहती है। कभी भी कोई लफड़ा होने पर मकान मालिक घर, दुकान खाली करवा सकता है। मेघालय से बाहर के लोगों के लिए यहाँ किराए पर रहना अमेरिका में वीजा पर रहते प्रवासियों जैसा ही है। अमेरिका में तो कुछ सालों बाद लोग वहाँ के नागरिक बन सकते हैं लेकिन मेघालय में शायद ऐसा संभव नहीं।
मेघालय टूरिस्टों के लिए सुंदर, खूबसूरत और प्यारा प्रदेश है। मेघालय से बाहर के लोगों को यहाँ घूमने की आजादी है लेकिन बसने की नहीं।
चाय की दुकान से बाहर निकलकर हमने बाहर सुपाड़ी छीलती, कतरती महिलाओं को चाय का ऑफ़र दिया। लेकिन उन्होंने ताजा-ताजा पान खाया था। उन्होंने मना कर दिया। कुछ उसी तरह जैसे पान मसाला खाने वालों के लिए चुटकुला प्रसिद्ध है कि उनको भगवान ने अमृत ऑफ़र किया तो पान मसाला खाने वाले ने यह कह कर मना कर दिया -' अभी मसाला खाये हैं प्रभु।'
हमने मौजी लाल महतो जी को उन महिलाओं के लिए दो लाल चाय का भुगतान करके उनको बता दिया कि जब मन करे पी लेना। महिलाएं मुस्कराती हुई सुपारी छीलती रहीं।
आगे सड़क पर तरह-तरह के सामान बेचने की दुकानें लगीं थीं। एक महिला अपने बच्चों को पानी के बतासे खिला रही थी। बतासे वाला सड़क पर था। बच्चे सड़क पर लगे रेलिंग के पार फुटपाथ पर। हमको फ़ोटो खींचते देखकर गंभीर, जिम्मेदार मुद्रा में खड़े हो गए।
आगे सड़क पर एक लड़की जैकेट, जींस, ट्राउसर्स बेच रही थी। हर सामान सौ रुपए का। बात की बच्ची तो उसने बताया कि पढ़ती है। इतवार और छुट्टियों के दिन दुकान लगाती है। फिला रिभा नाम बताया बच्ची ने अपना। स्पेलिंग समझ में नहीं आई तो उसने मेरे मोबाइल में लिखकर बताया -Phila Ribha. मेघालय पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा की तैयारी कर रही है।
थोड़ा आगे चलकर एक गली में घुसे तो एक दुकान के अंदर से एक महिला ने सड़क से गुजरते केतली में चाय बेचने वाले को चाय का आर्डर दिया। दुकान में मौजूद लोगों की गिनती करते हुए महिला ने आर्डर दिया -वन, टू, थ्री, फॉर, फाइव टी। फाइव रेड टी। चाय वाले ने केतली से चाय निकालकर उनको दी।
वहीं आगे एक बंद दुकान के सामने प्लास्टिक के स्टूल पर बैठे दो लोग जैकेट पहने धूप सेंक रहे थे। बात करने पर पता चला कि वे लोग कोलकता और राजस्थान के हैं। सुकांत सेन (कोलकता) की म्यूज़िक की शॉप है। राज सिंहानिया (चूरू) की यूनिफ़ार्म की दुकान है। सामने ही दुकान है लेकिन गणतंत्र दिवस होने के कारण दुकान बंद करके धूप खा रहे हैं।
मेघालय के लोगों के बारे में बात चली तो हमने अपनी राय जाहिर की कि यहाँ के लोग बहुत सीधे हैं। इस पर मुस्कराते हुए उनमें से एक ने कहा -'हाँ, जलेबी की तरह सीधे हैं।' हमने पूछा ऐसा क्यों तो उन्होंने कहा -'ऐसे ही कहा, मजाक में।'
लेकिन बाद में लोगों से बात करने पर पता चला कि मेघालय के बाहर के लोगों को यहाँ व्यापार करने में तमाम अड़चने आती हैं। मेघालय के लोग तो सीधे हैं लेकिन प्रशासन के स्तर पर अक्सर मेघालय के बाहर लोगों को काफ़ी समस्याएँ होती हैं। नए काम के परमिट के पाने में तमाम झमेले हैं।
आगे एक पानी की गुमटी पर गाना सुनते पान लगाते दिनेश मिले। दिनेश बिहार के छपरा जिला के रहने वाले हैं। दुकान पिता चलाते हैं। अभी महीने भर के लिए पिता छपरा गए हैं तो दिनेश दुकान देख रहे हैं। पान लगा रहे हैं। हमने पान के लगाने के अंदाज़ की तारीफ़ की तो दिनेश बोले -'जैसा सिखाया है पिता जी ने वैसा बनाते हैं।'
दिनेश में मेघालय के बारे में अपनी राय बताते हुए कहा -'और सब ठीक लेकिन छठ में यहाँ मजा नहीं आता।'
थोड़ा आगे बढ़ने पर कांग्रेस पार्टी का बंद दफ्तर दिखा। कांग्रेस भवन लिखे दफ़्तर की छत पर राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहा था। कोई इंसान नहीं दिखा वहाँ।
चलते-चलते पेट में दबाब महसूस हुआ। हम आसपास कोई सार्वजनिक शौचालय खोजने लगे। कोई दिखा नहीं। थोड़ा आगे रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर दिखा। हम उसी में घुस गए। कोई दिखा नहीं वहाँ भी। दायें-बायें देखने पर एक जगह शौचालय दिखा। बाहर लिखा था -'केवल मिशन के सदस्यों के प्रयोग के लिए।' हमने सोचा मेंबरशिप बाद में ले लेंगे पहले इस सुविधा का उपयोग किया जाये।
शौचालय से बाहर आने पर भी कोई दिखा नहीं। हम बिना रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर की सदस्यता लिए आगे बढ़ गए।
आगे एक जगह मटका टी स्टॉल दिखा। दरभंगा के मोहम्मद जाफ़िर मटका सेंवई, खीर और चाय बेच रहे थे। मटका बोल रहे थे लेकिन लिखा Mdaka था। कुल्हड़ की चाय बीस रुपये में थी। पहले हमने सोचा कि कुल्हड़ में बिकने वाली को ही यहाँ मटका चाय कहते हैं। लेकिन बाद में देखा कि मोहम्मद जाफ़िर वहाँ सुलगती अँगीठी में रखे मिट्टी के घड़े (मटके) से चाय निकाल कर दे रहे हैं। तब समझ में आया कि घड़े में रखे होने के कारण इसे मटका चाय कहते हैं।
वहीं एक युवा जोड़ा भी चाय पी रहा था। वे गुवाहाटी से आए थे शिलांग घूमने। 24 जनवरी को उनकी शादी की पहली वर्षगांठ थी। शादी की वर्षगाँठ मनाने के लिए ही वे लोग यहाँ आये थे। मोटर साइकिल से। मोटर साइकिल में कोई समस्या न हो इसलिए किसी मैकेनिक को दिखाकर नट-बोल्ट कसवाने के लिए पूछताछ कर रहे थे।
लड़के (नाम बप्पा) ने बताया कि उसके घर में लोग चाय बहुत पीते हैं। चार लोगों में एक किलो दूध की कम से कम खपत हो जाती है। लड़की (सुषमा) ने चाय पीते हुए कहा -'चाय थोड़ा ठंडी थी।'
इस पर मोहम्मद जाफ़िर ने उनको एक-एक चाय और दी। कहा-' मैडम यह हमारी तरफ़ से मुफ़्त चाय। यह गर्म है।'
हमने शिकायत दर्ज की -' मैडम को मुफ्त चाय दे रहे। हम अकेले आए इसलिए हमारे साथ भेदभाव कर रहे?'
इस पर मोहम्मद जाफ़िर ने हमें भी एक और चाय मुफ्त पिलाई कहते हुए -'लीजिये आप भी पी लीजिए ( 'आप भी क्या याद रखेंगे' नहीं कहा)। सुषमा ने बताया कि उसने एमबीए किया है। फ़िलहाल बप्पा को उनके काम में सहयोग कर रही हैं।
अपनी शादी का किस्सा बताते हुए बप्पा ने बताया कि कई साल की दोस्ती और जान पहचान के बाद शादी बनाया।
कई सालों की दोस्ती के बाद शादी का एक साल कैसा रहा पूछने पर बप्पा ने कहा -' चलता है नरम-गरम। लेकिन अच्छा है। मैनेजमेंट मैडम के ही हाथ में रहता है। मानना पड़ता है मैडम का बात उनको ख़ुश रखने के लिए।'
हमने कहा -'मैडम ने एमबीए किया तो मैनेजमेंट तो उनके हाथ में रहना ही है। अच्छी बात है।'
चलते समय हमने चाय की दुकान और उनका भी फ़ोटो लिया। इस पर सुषमा ने -'आपके साथ भी एक फ़ोटो ले लेते' कहते हुए अपने और हमारे मोबाइल में भी तीनों की सेल्फी ली।
हमने उनको शादी की सालगिरह की बधाई दी और आगे बढ़ गए। हमारी अगली मंजिल पुलिस बाजार थी जिसे लोग संक्षेप में यहाँ पीवी (PV) कहते हैं (दिल्ली के कनाट प्लेस को सीपी कहने की तर्ज पर) ।
सुपाड़ी छीलती महिलाओं का वीडियो देखने के लिए इधर आयें : https://www.facebook.com/share/r/1Ac2WhSuVy/
पहले का किस्सा पढ़ने के लिए इधर आयें :https://www.facebook.com/share/p/1G28tQZQJV/

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Wednesday, January 28, 2026

महिला हंसते हुए बोली -'दूऊऊऊऊर।'


 शिलांग में घूमने की शुरुआत सुंदर और घटनापूर्ण रही। पिछले दिन लगी घुटने की चोट सुबह तक रात की घटना की याद दिलाती रही। स्कूटी ड्राइवर से सुने हुए उसके प्रेम प्रसंग एहसास दिलाते रहे कि जीवन कितना बहुरंगी है।

सुबह 26 जनवरी थी। घूमने के लिए निकले तो सबसे पहले डॉन बास्को म्यूजियम जाने की सोची। गणतंत्र दिवस के कारण उसके खुलने पर संदेह था लेकिन फिर भी निकल ही लिए।
मेस के बाहर आकर उबर से गाड़ी बुक कराने के लिए देखने पर दुपहिया वाहन 65 रुपए और कार ढाई सौ रुपए से ज्यादा बता रहा था। पाँच किलोमीटर की दूरी के लिए ढाई सौ रुपए ज़्यादा लगे। बाइक बुक कर ली।
पाँच मिनट में बाइक बालक अपनी स्कूटी सहित आ गया। उचक कर पीछे बैठे तो लगा कोई हड्डी शरीर के किसी हिस्से से समर्थन न वापस ले ले। स्कूटी स्टार्ट होते ही न्यूटन बाबा के नियम के चलते हम पीछे हुए। लगा गिर जाएँगे। लेकिन गिरे नहीं। इसके बाद हम आगे ड्राइवर से सट के सीट को कस के पकड़कर बैठ गए।
सड़कें खाली थीं। बाजार बंद था। शिलांग की लहरिया दार सड़कों पर आगे बढ़ते हुए हर मोड़ पर लगता कि कहीं गाड़ी फिसल न जाये। कहीं अचानक ज़मीन से जुड़ना न हो जाये। इधर-उधर देखते हुए हम अपने इस डर को कम करते रहे। बालक ड्राइवर धैर्यवान था। हर स्पीड ब्रेकर पर गाड़ी आहिस्ते-आहिस्ते निकलता। झटके से बचाव करते हुए आगे बढ़ता रहा।
एक जगह टीले पर कब्रिस्तान दिखा। मेघालय ईसाई बहुल प्रदेश है। जगह-जगह ईसा मसीह की मूर्ति और ईसाई धर्मोपदेश लगे दिखे। सड़कों पर लोग बहुत कम दिखे। घरों में भी लोग लगता है अंदर ही बैठे हुए गणतंत्र दिवस मना रहे थे। तमाम घर छुट्टी के दिन के स्कूल की तरह लग रहे थे।
रास्ते में एक आदमी बहंगी पर कनस्तर में पानी लादे ले जा रहा था। चढ़ाईदार सड़कों पर बाल्टी में पानी ले जाना मुश्किल होता होगा।
म्यूजियम पहुँचे तो उसके बंद होने की सूचना लगी दिखी। हमने स्कूटी पहले ही छोड़ दी थी। कुछ देर वहीं म्यूजियम के अहाते में टहलते रहे। अपने बाद में आने वाले लोगों को म्यूजियम बंद होने की सूचना देते रहे। एक जोड़ा महाराष्ट्र से आया था। म्यूजियम बंद होने की सूचना से भन्नाया हुआ अकेले-अकेले फ़ोटो खींच रहा था। हमने उसको साथ खड़ा करके फ़ोटो खींच दिया। उसके भन्नाहट कुछ कम हुई। महिला तो मुस्करा भी दी। मराठी मानुष अलबत्ता अपने मुँह का दरवाज़ा बंद किए रहा। मजाल जो मुस्कान को बाहर निकलने दे।
एक युवा बंगाली जोड़ा मोटर साइकिल पर गुवाहाटी से घूमने आया था। म्यूजियम बंद होने से निराश था। गाड़ी में बैठे-बैठे उसने काफ़ी देर तक मुझसे बात की। फिर किक मारकर खुले हुए संस्थान देखने चला गया।
म्यूजियम पर कुछ देर बेमतलब घूमने के बाद बाहर सड़क पर आ गए। 'कहीं का भी जनजीवन वहाँ की सड़कों, दुकानों, बाजारों में होता है' यह याद करते हुए सड़क पर टहलने लगे। सुंदर धूप थी। इफ़रात समय। पैर मजबूत। लादने के लिए कोई वजन नहीं। निश्चिंत आगे बढ़ गए।
म्यूजियम के पास के ही एक घर में एक महिला अपने पति के साथ अपने बरामदे में खड़ी थी। हमने उससे बात करने के लिए म्यूजियम के बारे में जानकारी लेनी शुरू कर दी। उसने बताया गणतंत्र दिवस होने के कारण म्यूजियम बंद है। हमको यह बात तो पहले से ही पता थी। लेकिन हमने उसके मुँह से ऐसे सुना जैसे पहली बार सुना हो।
महिला पान खाये हुए थी। पान की पीक उसके होंठ की खिड़की से बाहर झांकते हुए उसके मुँह में पान के कुचले जाने की चुगली कर रही थी। आदमी अलबता साफ़ मुँह का था। बाद में कई जगह महिलायें पान बड़े शौक से और खूब खाती दिखी। बातचीत करते हुए महिला के साथ खड़ा आदमी किसी अभिभावक के साथ खड़े बच्चे की तरह चुप खड़ा रहा। महिला बतियाती रही। हमें लगा या कहीं हमने आशा की कि महिला कहेगी -'आइए आपको चाय पिलाते हैं।' लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं।
महिला को शायद एहसास हो गया कि अगला ज़बरियन गले पड़ने की कोशिश कर कर रहा है। यह भान होते ही उसने अपने आदमी का हाथ किसी छोटे बच्चे के हाथ की तरह पकड़ा और उसको अंदर ले जाते हुए मुझसे बोली -'ओके देन हैव ए नाइस डे।'
दो मिनट की उस महिला के साथ बातचीत से मुझे एहसास हो गया कि मेघालय मातृ सत्तात्मक समाज है।
सड़क किनारे बने छोटे-छोटे घर बड़े प्यारे लग रहे। हाहा हूती , बहूमंजिला मकानों को देखने की आदी आँखों को एक मंज़िला , छुटके घर देखकर बड़ा सुकून हुआ। सड़कें साफ़ सुथरी। कहीं कोई कूड़ा नहीं। हर घर के बाहर एक कूड़ादान लगा दिखा जिसमें लिखा था -USE ME.जगह-जगह सड़क पर कूड़ा न फेंकने के बोर्ड लगे थे।
घरों के बीच जाती सड़क की शुरुआत में उसकी लंबाई भी लिखी थी। एक सड़क की लंबाई 120 मीटर की सूचना सड़क शुरू होने पर लगे बोर्ड में लगी थी।
कुछ घरों के बाहर बनीं दुकानों में आम जरूरत का सामान मिल रहा था। अलबत्ता चाय की कोई दुकान नहीं दिखी। एक जगह कुछ बच्चे आपस में खड़े बात करते दिखे।
तसल्ली से टहलते हुए सड़क के ऊपर से नीचे की सड़क और नीचे पहुँचकर पीछे की ऊपर की सड़क देखते हुए उसको ख़ूबसूरती का प्रमाणपत्र देते हुए आगे बढ़ते रहे। पीछे खड़े मकान किसी बालकनी में खड़ी हुए महिला की तरह हमें देखते हुए लगे। मोड़ पर धीरे-धीरे मुड़ती छुटकी गाड़ियाँ सड़क पर इठलाती जाती किसी सुन्दरी सरीखी ख़ूबसूरत लग रहीं थी।
एक जगह फुटपाथ पर दो महिलायें धूप में खड़ी, तसल्ली से पान चबाती हुई, बतिया रही थीं। उनसे बतियाने के लिहाज़ से हमने पुलिस बाजार का रास्ता पूछा। उन्होंने बताया। हमने पीछे के घर की तरफ़ इशारा करके पूछा -'आप लोग यहीं रहतीं हैं क्या?' उनमें से एक ने कहा -'हाँ।' एक कमरे के दो मंजिला बने घर को देखते हुए हमने कहा -' सुंदर है।'
महिला ने घर के लिए कही बात को अपने लिये कहा माना। जो कि मेरी धारणा -'हर इंसान अपने में ख़ूबसूरत होता है ' के अनुसार सही ही था। उसने मेरी बात की प्रतिक्रिया में कहा -' अरे बुड्ढी हो गई मैं। कहाँ से सुंदर?'
मकान के लिए कही बात को अपने पर लेते हुए महिला ने जब अपने को बुड्ढी कहा तो मैंने कहा -' बुड्ढी कहाँ। ज़्यादा उमर तो लगती नहीं आपकी।चालीस -पैंतालीस साल होगी।'
मेरी बात पर ख़ुश होने और शर्माने की बजाय महिला ने अपने से सर का शॉल झटके से हटाया और अपना सफेद बालों से भरपूर सर मेरे सामने करते हुए कहा -'सब बाल सफेद हो गया। सिक्स्टी एट (68 ) ईयर है मेरी उमर।' उसके साल वाली महिला
हमने उनके सफेद बॉल और उनकी बुड्ढे होने की घोषणा को नकारते हुए कहा -'उमर और बाल से क्या होता है। चेहरे से तो आप बुजुर्ग नहीं लगती।'
इस पर महिला हंसते हुए बोली -'दूऊऊऊऊर।'
बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो उन्होंने बताया कि उनके चार लड़के, एक लड़की हैं। सबकी शादी हो गई। हमारे बारे में पूछा। हमने बताया दो बेटे हैं। वह बोली -'बहुत अच्छा है।' अकेले घूमने आने की बात पर फिर बोली -'दूऊऊऊऊर'। फैमिली को नहीं लाया। अकेला चला आया घूमने। 'दूऊऊऊऊर' उनका तकिया कलाम था। हर तीसरी बात पर बोलती -'दूऊऊऊऊर।'
परिवार की बात चलने पर हमने अपने मोबाइल में अपने परिवार और पत्नी का फ़ोटो दिखाया। इस बार उन्होंने अपने तकियाकलाम 'दूऊऊऊऊर' का त्याग करके कहा 'वेरी ब्यूटीफुल वाइफ।'
हमने चलने के लिए उनसे विदा माँगी तो वो बोली -'पैदल दूर है। थक जाओगे। टैक्सी से चले जाओ।बीस रुपया लगेगा।'
हमने कहा -'बीस रुपए में टैक्सी कहाँ मिलेगी?' कहते हुए मैं आगे बढ़ने को हुआ तो उन्होंने मुझे रोक लिया। बोली -'रुको अभी मिलेगा टैक्सी।'
थोड़ी देर में ही सामने से आती एक टैक्सी को हाथ से रोककर उसको बोला -'इसको बड़ा बाजार छोड़ देना।'
हमने टैक्सी में बैठते हुए उनको धन्यवाद देते हुए बॉय मुद्रा में हाथ हिलाया। टैक्सी बड़ा बाजार की तरफ़ बढ़ गई। शिलांग के एक मोहल्ले की फुटपाथ पर धूप में खड़ी , पान चबाती , हाथ हिलाती हुई उस महिला की ख़ूबसूरत मुस्कराहट का अनुवाद अगर संभव होता तो शायद लगता कि वो कह रही हैं -'दूऊऊऊऊर।'
शिलांग के पहले दिन की घुमाई और स्कूटी से फिसलने का किस्सा इस पोस्ट में पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/p/1Sf71cmfmY/
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