Saturday, January 31, 2026

चेरापूंजी की ओर

   


27 जनवरी की सुबह चेरापूंजी देखने गए।

बचपन से सुनते आए थे कि चेरापूंजी में सबसे अधिक वर्षा होती है। शिलांग से करीब 53 किलोमीटर दूर है चेरापूंजी। शिलांग आये हैं तो चेरापूंजी तो देखना बनता ही है।
26 जनवरी को सुबह ही मेस में के सुरक्षा कर्मी विक्रम बिस्वा ने एक ड्राइवर से बात करा दी थी। चेरापूंजी आने-जाने और आसपास की जगहों को घुमाने के लिए 3500 रुपए कहे ड्राइवर ने। बाद में बात तैंतीस सौ रुपये (3300) पर तय हुई।
बाद में एक ड्राइवर ने कहा कि वह तीन हज़ार में घुमा लायेगा। लेकिन हमने सोचा जिससे तय किया उसी से जायेंगे। सुबह आठ बजे जाने का तय हुआ।
सुबह फ़ोन किया तो ड्राइवर ने उठाया नहीं। बाद में उठाया तो बोला -'आ नहीं पायेगा।'
हमने सोचा मेघालय देर हो गई है। चेरापूंजी अब अगले दिन जाएँगे। लेकिन फिर सोचा चले ही जाते हैं। ऐसे टालना ठीक नहीं।
नाश्ता करके निकले। पास में ही सिविल अस्पताल के पास दिखी पहली टैक्सी वाले से बात की। उसने कहा -' चलेगा। तीन हज़ार रुपये लगेंगे।'
हम फौरन गाड़ी में बैठे। चल दिए। तीन सौ रुपये की बचत से दिन की शुरुआत हो रही थी।
नाम पूछने पर ड्राइवर ने जो बोला उससे हमें लगा उसका नाम 'सनड्राप' है। हमें 'सनड्राप' खाने के तेल की याद आई। हमने उससे नाम की स्पेलिंग पूछी तो उसने बताई -Synrap. सिनरैप या साइनरैप को हम 'सनड्राप' समझ रहे थे। उच्चारण और उसकी समझ में अंतर के कारण इतना घपला तो चलता है।
Synrap की उमर 28 साल है। पाँच साल पहले उसकी शादी चेरापूंजी के पास के ही एक गांव की लड़की से हुई थी। एक दोस्त ने बताई थी लड़की। शादी के पहले तीन साल तक मिलना जुलना हुआ। मेघालय में शादी के पहले मिलना-जुलना आम चलन है। यह नहीं कि परिवार, ख़ानदान देखकर दिसंबर में शादी तय हुई और फ़रवरी में बाजा बज़ गया।
Synrap घर से नाश्ता करके नहीं आये थे। एक जगह रुककर उसने नाश्ता किया हमने चाय पी। जाते ही Synrap ने चावल, मछली आर्डर की और कोने में बैठकर खाने लगे। चाय के नाम पर रेड टी ही थी। रेड टी मतलब बिना दूध वाली चाय। हमने 'मिल्क टी' की फ़रमाइश की। दुकान पर मौजूद महिला ने गैस पर गरम होते दूध की तरफ़ इशारा करके बताया -'अभी दूध गरम हो रहा है। समय लगेगा।'
हमने कहा -' समय की परवाह नहीं। दूध वाली चाय ही पियेंगे।' उसने कहा -'ठीक। ठहरो। बनाते हैं।'
दुकान में दो महिलायें थीं। पान खाये थीं। पान खाने से उनके होंठ ऐसे लग रहे थे जैसे लाल लिपिस्टिक लगी हो। बसंती और मेरी नाम बताये उन लोगों ने अपने। चश्मा लगाए बंसती विवाहित हैं। तीन बच्चे हैं उनके। मेरी अविवाहित हैं। बातचीत में भाषा की बाधा इशारों और दायें-बायें के शब्दों से दूर हुई। Synrap ने भी दुभाषिये की तरह काम किया। बसंती सहज होकर बतिया रहीं थी। मेरी संकोच कर रहीं थी। फोटो के लिए पहले मेरी ने मना किया लेकिन बसंती के कहने पर कैमरा के सामने से हटी नहीं। फोटो दिखाया तो मुस्कराईं दोनों।
उस छुटकी चाय नाश्ते की दुकान में खाने-पीने के कुछ तैयार सामान रखें थे। गैस और कुछ बरतन थे। घर जैसी ही थी दुकान। दो महिलाएं चला रही थीं। बाहर कोई बोर्ड नहीं लेकिन पता था लोगों को यह दुकान है। यहाँ चाय-नाश्ता मिलता है।
हमने सोचा था कि Synrap के नाश्ते के पैसे भी हम ही दे देंगे लेकिन मेरे भुगतान करने के पहले ही वह अपना हिसाब चुका था। आगे भी चाय भले मेरे साथ पी लेकिन खाना के पैसे ख़ुद दिए। खाकर भुगतान करके चला आया।
नाश्ता करके निकले तो बगल की गुमटी से Synrap ने लाटरी का एक टिकट ख़रीदा। दस रुपए का टिकट ऐसे ख़रीदा जैसे खाने के बाद पान लगवाया जाता है। पूछने पर बताया -' नियमित खरीदते हैं टिकट। कभी-कभी लॉटरी निकल भी आती है।'
रास्ते में मावकडोक गांव पड़ा। मेघालय का यह गाँव लोहे के औजार बनाने वाले लोगों के गाँव के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ की बनाई चाकू Ka Wait के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ का Mawkdok presbyterian lp school इस नाम से गाँव बनने के पहले ही खुल गया था। स्कूल 1933 में खुला था। जबकि इस नाम से गाँव की स्थापना 23 मार्च, 1952 को हुई। यह बेटे के बाप से पैदा होने जैसी बात है। 1967 में यह गाँव उड़न तस्तरियाँ देखे जाने के लिए भी प्रसिद्ध हुआ।
यह जगह Dympep Valley (डिंपेप घाटी) कहलाती है। मेघालय के सबसे खूबसूरत, शानदार स्थानों में से एक है। लोग यहाँ फ़ोटोग्राफ़ी के लिए रुकते हैं। फोटो खींचते हैं। हम भी रुके। मावकडोक, डिंपेप घाटी के बोर्ड के पास खड़े होकर फ़ोटो खिंचाये ताकि सनद रहे। इसके बाद बीच सड़क पर भी खड़े हुए और फ़ोटो खिंचाये।
पास ही थोड़ी ऊँचाई पर Laits ohpliah Tymcamnasi view point है। सीढ़ियों से ऊपर जाने पर कई स्पॉट बने हैं जहाँ से घाटी की खूबसूरती को देखा जा सकता है। ऊँचाई पर स्थित व्यूप्वाइंट पर खड़े होकर देखने पर घाटी, नीचे सड़क, सड़क, सड़क के मोड़ और सड़क से गुजरती हुई गाड़ियाँ बहुत ख़ूबसूरत दिखती हैं। व्युपाइंट पर तेज हवा चल रही थी। धूप खिली हुई थी। चारो तरफ़ का नजारा बहुत बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था। वहाँ खड़े होकर हमने और ड्राइवर ने के दूसरे के फ़ोटो खींचे। आसपास के वीडियो बनाए।
व्यूप्वाइंट से लौटते समय एक युवा बंगाली जोड़ा वहाँ आया। उसने हमारे ड्राइवर से फ़ोटो खींच देने का अनुरोध किया। ड्राइवर से किए उनके अनुरोध को लपकते हुए हमने उनका कैमरा हथिया लिया। कहा -'लाओ हम खींच देते हैं फ़ोटो।'
वे लोग राष्ट्रगान गाने वाली मुद्रा में फोटो खिंचाने के लिए खड़े हो गए। सद्भावना समिति के प्रतिनिधियों की तरह। हमने उनको पास आकर युवा जोड़े की तरह फोटो खिचवाने के लिए कहा। वे आ गए। हमने उनकी इस बहादुरी पर शाबासी देते हुए उनको और नज़दीक आने के लिए। वे पास आते गए। हम उनकी फ़ोटो खींचते गए और पास आने के लिए कहते गए। एक समय ऐसा जब शरीर की हड्डियों के कारण और पास आने की गुंजाइश ख़त्म हो गई। और पास आने की कोशिश करते तो हड्डियों के डॉक्टर की सेवायें लेनी पड़ती। यह भी हो सकता है कि हमारे ऊपर उनको घायल होने के लिए उकसाने की FIR हो जाती।
और पास आकर आने की फ़ोटो खिंचवाने के संभावनायें ख़त्म होने के बाद हमने उनको एक दूसरे को चूमते हुए फ़ोटो खिंचवाने के लिए उकसाया। बालक ने शर्मा कर मना कर दिया। लेकिन बालिका ने कहा -'मैं करती हूँ इसको किस( आप लीजिए फ़ोटो)। ' बालिका ने लड़के को चूमते हुए फोट खिंचाई तो बालक की भी झिझक ख़त्म हो गई। उसने भी बालिका के गाल चूमते हुए फ़ोटो खिंचाये। उनके एक दूसरे के गाल चूमते हुए फ़ोटो लेने के बाद हमने उनको एक दूसरे के होंठ चूमते हुए फ़ोटो खिंचाने के लिए उकसाया। बालक झिझका लेंकिन बालिका फौरन तैयार हो गई। उन्होंने रोमांटिक अंदाज में एक दूसरे को चूमते हुए फ़ोटो खिंचाये। बाद में फ़ोटो देखते हुए बहुत खुश हुए। हमको इतने प्यारे फ़ोटो खींचने के लिए बार-बार धन्यवाद दिया।
हमारे उकसाने पर उस युवा जोड़े का फोटो खींचने के लिए तैयार होना देखकर मुझे लगा कि उकसाने पर लोग सिर्फ़ लड़ाई, दंगा , हत्या ही नहीं प्रेम भी कर सकते हैं।
बाद में नीचे उतरते हुए उनसे बात हुई। अपने बारे में बताते हुए उन्होंने दस साल के प्रेम संबंध के बाद उन्होंने शादी की। बालक मृगांक ( उम्र 38 साल) और बालिका राज श्री (28 साल) की शादी के अभी एक साल हुआ है। अपने माँ-पिता का इकलौते संतान मृगांक के पिता अब नहीं रहे। वो मेडिकल स्टोर से जुड़ा काम करता है। राजश्री पॉटरी पेंटिंग से जुड़े काम करती है।
दस साल का प्रेम बहुत धैर्य माँगता है। हमने राजश्री से पूछा कि मृगांक में ऐसा क्या खास लगा जो वह उससे शादी के लिए तैयार हुई। उसने कहा -'इसकी ईमानदारी और सहजता।' मृगांक ने भी कुछ ऐसा ही राजश्री के लिए कहा। नीचे सड़क पर उतरकर हमने उनके साथ सेल्फी ली। आगे बढ़ गए।
मृगांक ने मेरे द्वारा खींचे हुए फ़ोटो अपने फ़ोटो मुझे भेजने का वायदा किया था। अभी तक भेजे नहीं हैं। शायद बालक शरमा रहा हो अपने फोट भेजने में। यह भी सार्वजनिक रूप से प्रेम प्रदर्शन के मामले में हमारा समाज सहज संकोच करता है।
डिंपेप घाटी से थोड़ा आगे WAH KABA LATARA झरना देखने गए। मानसून में यह झरना पानी से भरपूर और ख़ूबसूरत दिखता है। अभी इसमें पानी की बहुत पतली रेखा बहती दिखी। झरना शायर होता तो शायद कहता :
"अब इतनी भी मयस्सर नहीं मैखाने में ,
जितनी कभी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में।"
झरने के बाद रास्ते के नजारे देखते हुए चेरापूंजी पहुंचे। पता लगा चेरापूंजी का स्थानीय नाम सोहरा है। जिस जगह को बचपन से हम चेरापूंजी के नाम से जानते आए हैं उसका असली नाम कुछ और (सोहरा ) है यह देखकर लगा कि अक्सर हम असलियत से कितने अनजान रहते हैं। घूमने नहीं आते यहाँ तो चेरापूंजी के नाम से ही सोहरा को जानते रहते। इससे एहसास हुआ कि किसी जगह, चीज, इंसान की असलियत जानने के लिए उसके पास जाना चाहिए।
यह एहसास यहाँ का प्रसिद्ध सात बहनों के झरने को देखने पर भी हुआ। Seven sistrets falls के नाम से प्रसिद्ध झरने का स्थानीय नाम nohsngithiang झरना है। झरना सूखा था। बिल्कुल पानी नहीं था। सामने घाटी में पत्थरों पर झड़ने के पानी बहने के निशान बने हुए थे। ऐसे जैसे किसी के गाल पर आँसू बहने के निशान बने रहते हैं। झरने के ख़ूबसूरत प्रवाह को आँख के आँसू से तुलना अटपटी लग सकती है गाल पर बहे सूख चुके आँसू को ख़ुशी के आँसू समझा जाये।
झरने को देखने के लिए वहीं दो दूरबीनें लटकी हुईं थीं। हमने उनमें से एक को अपनी आँख के सामने लगाया तो एक बच्चा लपकता हुआ आया और बोला -'फाइव रुपीस।' सूखे हुए झरने को देखने के लिए पाँच रुपये देना मुझे ठीक नहीं लगा। हमने दूरबीन वापस लटका दी। बच्चा भी वापस चला गया। अब लगता है मुझे देखना चाहिए था दूरबीन से नजारा। पाँच रुपए बचाने की जो बात वहाँ समझदारी लगी वह अब मुझे बेवक़ूफ़ी की लग रही है। इससे मुझे फिर से लगा कि समझदारी और बेवक़ूफ़ी स्थाई नहीं हैं। जो बात आज समझदारी की लगती है वह कल बेवक़ूफ़ी की बात साबित हो सकती है। समझदारी और बेवक़ूफ़ी की बातें समय के साथ चन्द्रमा की कलाओं की तरह अपना रूप बदलती हैं।
सूखा झरना देखने के बाद हमने वहाँ बने शौचालय की सुविधा का उपयोग किया। भुगतान पर आधारित इस सुविधा के उपयोग के लिए शुक्ल लेने के लिए किसी को न देखकर शुकुल जी खुश हुए। सोचा दस रुपये बच गए। लेकिन जैसे ही ऊपर पहुँचे एक महिला नेपथ्य से निकल कर आई और हाथ बढ़ाते हुए बोली -'टेन रूपीश ।' दस रुपए देते हुए हमने थोड़ी देर पहले दस रुपये बचने की ख़ुशी को ख़ारिज करना चाहा लेकिन वह ख़ुशी ' बिका हुआ माल वापस नहीं होगा' की तर्ज पर खारिज नहीं हुई। बनी रही यह कहते हुए कि कम से कम इतनी देर तो बचे रहे पैसे।
ऊपर आकर एक दुकान पर चाय पी। बिस्कुट खाये। काउंटर पर खड़ी खूबसूरत बच्ची के सहयोग के लिए प्यारे बच्चे मोबाइल पर कोई खेल रहे थे।
चाय पीकर हम वापस लौट लिए। लौटने के पहले चेरापूंजी की खूबसूरती को जी भर कर निहारा। चेरापूंजी मतलब सोहरा की खूबसूरती को थोड़ा समेटकर मोबाइल में भी धर लिया। बाक़ी बची हुई ख़ूबसूरती को वहाँ आने वालों को छोड़कर वापस चल दिये।

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