Monday, September 23, 2013

वर्धा राष्ट्रीय संगोष्ठी -कुछ यादें

http://web.archive.org/web/20140417064241/http://hindini.com/fursatiya/archives/4772

वर्धा राष्ट्रीय संगोष्ठी -कुछ यादें

फ़ुरसतियाऔर ये तीसरा ब्लॉगिंग सेमिनार, कार्यशाला, गोष्टीं संपन्न हुयी। पहला 2009 में इलाहाबाद में – न भूतो न भविष्यतनुमा। दूसरा 2010 में वर्धा में जहां हमने आलोकधन्वा, जो ब्लॉगिंग को सबसे कम पाखण्ड वाली विधा मानते हैं, की कविता सुनी:
हर भले आदमी की एक रेल होती है
जो माँ के घर की ओर जाती है
सीटी बजाती हुई
धुआँ उड़ाती हुई”
और अब तीन साल के अन्तराल के बाद 20-21 को जमें वर्धा में जहां कवि/कहानीकार विनोद कुमार शुक्ल जी के दर्शन हुये जिन्होंने अपने उपन्यासों के बारे में बात कहते हुये कहा- फ़ंतासी यथार्थ से मुठभेड़ की ताकत और हौसला प्रदान करती है।
केरल एक्सप्रेस से वर्धा पहुंचे। संतोष त्रिवेदी और अविनाश वाचस्पति इटारसी में मिल गये। संतोष त्रिवेदी ने फ़ौरन कैमरा चमकाया और लिखा -इटारसी में अचानक फुरसतिया साथ हो लिए। ई-स्वामी की लिखी बात एक बार फ़िर याद आई- चीजें अपनी उपयोग करवाती हैं। संतोष जो भी देखते हैं, जिससे भी मिलते हैं उसको यथासम्भव अपने कैमरे में कैद करके सबसे तेज चैनल की तरह फ़ौरन फ़ेसबुक पर पेश करते हैं। केरल एक्सप्रेस में कार्तिकेय मिश्र और संजीव सिन्हा भी मिले सेवाग्राम स्टेशन पर।
वर्धा विश्वविद्यालय पहुंचने पर पता चला कि हम लोगों के ठहरने का इंतजाम बाबा नागर्जुन सराय में था। तीन साल पहले जब आये थे तब फ़ादर कामिल बुल्के अतिथि गृह में ठहरे थे। तब बाबा नागार्जुन सराय बनी नहीं थी। हमारे ठहरने की व्यवस्था डा. अरविन्द मिश्र के साथ थी। वे प्रात:भ्रमण के लिये निकले थे। हमने उनके कमरे के बाहर अपना सामान अड़ा दिया। संतोष त्रिवेदी और अविनाश वाचस्पति के कमरे में पहुंचकर वहां मौजूद व्यवस्था से चाय पी। अविनाश वाचस्पति कोल्ड टी पीना चाहते थे सो बर्फ़ मांगने लगे। लेकिन सुबह-सुबह मिली न!
fफ़ुरसतियाकुछ देर में डा.अरविन्द मिश्र टहलकर वापस आये। पहले से किंचित और विस्तृत दिखे। पता चला कि उन्होंने वरिष्ठ ब्लॉगर का हवाला देते हुये हमारे लिये अलग करने का इंतजाम किया। वरिष्ठ ब्लॉगर/कनिष्ठ ब्लॉगर की बात वे इलाहाबाद में हुये सम्मेलन से (2009) करते आये हैं। अपनी बात को अमली जामा पहनाया उन्होंने चार साल बाद। वैसे तो सब ब्लॉगर बराबर होते हैं लेकिन कुछ ब्लॉगर ज्यादा बराबर होते हैं। कभी मंच पर टाट के कपड़े तक पहनकर कविता पढ़ने वाले बाबा नागार्जुन सराय में व्यवस्था दिव्यनुमा थी। कमरे में एसी, टीवी, सोफ़ा, फ़्रिज ,सिटिंग रूम सब मौजूद। लगभग वीराने में बसे इस विश्वविद्यालय में सुविधायें सब उच्चस्तर की जुटाने का प्रयास किया गया है। यह अलग बात कि बाथरूम में नहाने के बाद पानी काफ़ी देर तक जमा रहता है। यह हमारे देश के सिविल इंजीनियरों की गुणता का परिचायक है।
कमरे में सामान जमाने के बाद हाल में काठमांडू में हुये अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन की भी चर्चा हुई। सुनी-सुनाई बातों से पता चला कि वहां ठहरने की व्यवस्था इतनी दिव्य थी कि सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से लोगों को पानी और निपटान के लिये भी बहुत मेहनत करने पड़ी।
नाश्ते के बाद पहला सत्र हबीब तनवीर सभागार में शुरु हुआ। वही हाल जिसमें तीन साल पहले जमे थे। शुरुआत वर्धा विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुयी जिसे आप यहां सुन सकते हैं। विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने गायन और अभिनय के जरिये इसे पेश किया। मंच पर मौजूद सिद्धार्थ त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय की बात करते हुये इसे रेगिस्तान में नखलिस्तान की उपमा दी।
कार्यक्रम की शुरुआत में रवि रतलामी और युनुसखान की जुगलबंदी पेश की गयी। ब्लॉग, फ़ेसबुक और ट्विटर के बारे मेँ आडियो-विजुअल प्रस्तुति देखकर/सुनकर मजा आ गया। युनुस की आवाज फ़ंटास्टिक है। प्रस्तुतिकरण झकास। :)
पहले सत्र की शुरुआत में विषय प्रवर्तन किया कार्तिकेय मिश्र ” ने। लोगों को ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया से जुड़ी जानकारी देते हुये कार्यक्रम की शुरुआत की। सधी आवाज में अपनी बात कहते हुये कार्तिकेय ने विश्वविद्यालय के तमाम लोगों के मन हिला दिये। प्रवीण पांडेय भारतीय रेल की तरह हल्का सा देर से आये। उनके लिये कुर्सी सुरक्षित रखी गयी। कार्यक्रम के बारे में अपने ब्लॉग में लिखते हुये विश्वविद्यालय की छात्रा सुनीता भाष्कर ने लिखा:
विवि के कुलगीत से आरंभ हुई संगोष्ठी की शुरूआत ब्लागिंग के दस साला वीडियोनुमा सफरनामे से हुई। विवि के कुलपति विभूति नारायण राय ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए ब्लागरों का स्वागत करते हुए विवि दवारा सोशल मीडिया पर पूर्व में आयोजित संगोष्ठियों का हवाला दिया। साथ ही हिंदी ब्लागिंग को लेकर विवि द्वारा हुई पहलों व परियोजनाओं से सभी को अवगत कराया। जिसमें हिंदी समय डाट काम व हिंदी शब्दकोश जैसे योगदान शामिल हैं. उन्होंने कहा कि राज्य को खुद पर नियंत्रण रखने की जरूरत है बजाय इसके कि वह हर न्यूनतम अभिव्यिक्त पर अकुंश लगाने की कारर्ववाही करे।
इसके अलावा कुलपति जी ने विश्वविद्यालय के द्वारा हिन्दी ब्लॉगिंग के लिये संकलक के इंतजाम का आश्वासन दिया। चिट्ठाजगत के डॉ विपुल जैन ने आवश्यक तकनीकी जानकारी विश्वविद्यालय को सौंप दिया है। अब विश्वविद्यालय को इसकी कोडिंग वगैरह करके शुरुआत करनी है। 15 अक्टूबर तक इसके शुरु हो जाने की बात कही गयी। चिट्ठाजगत और वर्धा विश्वविद्यालय की साइट हि्दीसमय को मिलाकर इसका नाम तय हुआ है -चिट्ठासमय। आशा है कि धड़ाधड़ महाराज अपने नये रूप में समय पर अवतरित हों सकेंगे।
कार्यक्रम के दौरान हर्षवर्धन त्रिपाठी ने पत्रकारों को मिलने वाली सुविधाओं की तर्ज पर ब्लॉगरों के लिये सुविधाओं और उनके पंजीकरण की भी बात कही। इस पर अपनी बात हुये मंच से बताया गया कि इसके निहित खतरे भी हैं । फ़िर सभी ब्लॉगरों को पंजीकरण कराना होगा। आदि-इत्यादि।
प्रथम सत्र के अंत से पहले आदि चिट्ठाकार आलोक कुमार को मंच पर बुलाकर सबसे रूबरू करवाया गया। यह बात जब सूझी तब तक सब गुलदस्ते खतम हो गये थे इसलिये आलोक को वैसे ही सबसे मुखातिब कराया गया जैसे कभी उन्होंने बिना किसी औपचारिकता के अपनी पहली पोस्ट लिखी होगी।
पहले सत्र की शुरुआत के फ़ौरन बाद दूसरा सत्र शुरु हुआ। सत्र के बीच में चाय-साय के आदी हो चुकी अपन चाय के लिये बाहर को लपके। लेकिन पता चला कि ऐसा कोई इंतजाम न था। यह भी पता चला कि किसी सेमिनार में चाय पीकर तितर-बितर कप इधर-उधर फ़ेंककर चल देने की सहज प्रवृत्ति के चलते सत्रों के बीच चायपान की व्यवस्था बंद कर दी गयी है। हमने यादों के खजाने से जु्मला निकाल उच्चारा- लमहों ने खता की है, सदिंयों ने सजा पायी है।
फ़िलहाल अभी के लिये इतना ही। आगे किस्से जारी रहेंगे….. ।
सूचना: सबसे ऊपर का चित्र सेवाग्राम आश्रम में उस समय तक मौजूद ब्लॉगरों का है।

मेरी पसन्द

मेरी पसन्द में वर्धा में ही तीन साल पहले सुनी आलोक धन्वा की दो कवितायें।

37 responses to “वर्धा राष्ट्रीय संगोष्ठी -कुछ यादें”

  1. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    इस पोस्ट ने सेमिनार के वातावरण का चित्र बना दिया है जो बहुत रोचक है। सेमिनार में जो चर्चा हुई उसका विवरण अगली किश्त में आना चाहिए। आपको इसे अत्यन्त सफल बनाने में दिये योगदान के लिए तहेदिल से शुक्रिया।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..वर्धा परिसर में अद्‌भुत बदलाव…
  2. संतोष त्रिवेदी
    …..बहुत अच्छा अनुभव रहा !
    आप लिख रहे हैं,हम फ़िलहाल बांच रहे हैं…..इससे बढ़िया क्या लिखा जायेगा ?
    जल्द ही अपने अनुभव साझा करूँगा,फुरसत से !
  3. हर्षवर्धन
    इलाहाबाद में जो हुआ न भूतो न भविष्यतनुमा। पूरी तरह से सहमत। लेकिन अच्छी बात ये कि इलाहाबाद के बाद वर्धा में हुए दोनों ही चर्चा मिलन सुखद रहे। अभी-अभी प्रधानमंत्री ने एक कार्यक्रम में सोशल मीडिया की चर्चा की है जाहिर है थोड़ा पाबंदी के इरादे से। बोले सोशल मीडिया का भारत में दुरुपयोग हो रहा है- संदर्भ मुजफ्फरनगर
    हर्षवर्धन की हालिया प्रविष्टी..भारतीय राजनीति को बदल रहा है सोशल मीडिया
  4. sanjay jha
    सजीव चित्रण. जारी रहें.
    प्रणाम.
  5. ajit gupta
    संगोष्‍ठी की रपट पढ़कर अच्‍छा लग रहा है, स्‍वयं को वहीं पा रहे हैं। जारी रखिए।
    ajit gupta की हालिया प्रविष्टी..कविता – बचपन के पन्ने मेरे हाथों में
  6. काजल कुमार
    बड़े ब्‍लॉगर छोटे ब्‍लॉगर
    जे बात जम गई :)
    काजल कुमार की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- पहले ही कहा था ना, कि‍ अवार्ड-सम्‍मेलन न कराओ
  7. Rekha Srivastava
    हाँ भाई बड़े ब्लॉगर और छोटे ब्लॉगर में फर्क तो होना ही चाहिए ( ये मेरी सोच नहीं है ) वैसे हमें लगता है की बड़े को फिर से परिभाषित किया जाना चाहिए. बड़े किस तरह के बड़े ( कद काठी में , ओहदे में , या फिर लोकप्रियता में या फिर पुरस्कृत किये जाने में ) सुधी ब्लॉगर बंधू इसको परिभाषित कर ही सकते हैं क्योंकि न हम इसा श्रेणी में कहीं भी नहीं आते हैं .
    आपके इस लेख से सारी जानकारियाँ मिली और आगे के लिए इन्तजार है . गए नहीं तो क्या सचित्र वर्णन काफी शामिल होने जैसी अनुभूति देने के लिए.
    Rekha Srivastava की हालिया प्रविष्टी..पांच वर्ष ब्लोगिंग के !
  8. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    ये अंत में चाय में बेईमानी करके पूरा मामला बिगाड़ दिया…
  9. Dr. Kavita Vachaknavee
    वर्धा विश्वविद्यालय – १ पर केन्द्रित ‘एक्टिव इंडिया चैनल’ के ये दो वीडियो संभवतः अधिकांश मित्रों ने न देखे हों -
    1- http://activeindiatv.com/videos/viewvideo/26/news-a-politics/exclusive-interview-with-international-blogger-kavita-vachaknavee
    2- http://activeindiatv.com/videos/viewvideo/25/news-a-politics/seminar
    Dr. Kavita Vachaknavee की हालिया प्रविष्टी..ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े
  10. sonia
    Vivran ati uttam hai guruji. Civil engineeron par bhi aapki kripa ho hi gai aakhir aapne apni sahyogi biradri ko bhi chhoda. Bahut achha. Badhai.
  11. प्रवीण पाण्डेय
    आप पहले पहुँच गये जबलपुर, पहली एफआईआर आपकी ही मानी जायेगी। ५० के ऊपर तो वैसे भी वानप्रस्थी गौरव के उजले पक्ष हैं आप। सुन्दर रपट।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..साइकिल, टेण्ट और सूखे मेवे
  12. कार्तिकेय मिश्र
    पहले आपकी सभी कड़ियाँ बाँच लें.. अगर कुछ बच जाता है (जिसकी संभावना कम ही है) तो हम लिख मारेंगे..
  13. arvind mishra
    लाख सामान अडाईए टिकायिये -अपुन के कमरे में इंट्री नई रे बाबा!
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..ब्लॉगर सम्मेलनों की बहार में वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की रिमझिम!
  14. Sanjeet Tripathi
    “या…..” हम न हुए ;)
    शुरुआत तो आपने निखालिस अपने इश्टाइल में की है। आगे का इंतजार है अब।
    वाकई इस बार न पहुंच पाने का अफसोस रहेगा।
  15. : ब्लॉगिंग, फ़ेसबुक और ट्विटर तिकड़ी- विकल्प या पूरक ?
    [...] « Previous फुरसतिया हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै? [...]
  16. प्राइमरी का मास्टर
    आप और मिशिर जी में कौनो समझौता हुआ का? बड़ी आसानी से निबट लिए …….का ख़ाक सफल माने ई संगोष्ठी को ……जब एक्को विवाद ना हुए ?
    हा हा …….आगे की बातों का इन्तजार रहेगा :)
    प्राइमरी का मास्टर की हालिया प्रविष्टी..अपने सीने में ‘शिक्षक होने का तमगा’ लिए घुमते हैं?
    1. sanjay @ mo sam kaun
      :)
      sanjay @ mo sam kaun की हालिया प्रविष्टी..कभी सोचता हूँ…
  17. Dr. Kavita Vachaknavee
    आयोजकों, विश्वविद्यालय और पढ़ने वालों के पास सनद हो गई कि ब्लॉगर मूलतः कितने बचकाने जीव होते हैं, जैसे जीवन में कभी सिंगल एसी रूम न देखा हो, ऐसी हड़प और चातुरी में जुटे रहे। फिर उस चातुरी पर लेखमाला भी लिखी जा रही हैं…. जिसे पढ़कर मुझे कई बारातों के उन बच्चों की याद आई जो घोड़ी या विदाई की कार पर से वार कर फेंके जाते पैसों के लिए परस्पर हाथापाई करते हैं। उन बच्चों को याद कर उनके जीवन के अभावों पर दया भी आई । पर वह काम कोई अपने को सभ्य कहने वाला पढ़ा लिखा इंसान करे तो दया नहीं आती। ऊपर से इसे अपनी निपुणता भी समझे कि वाह मैंने तो झपट्टा मार कर हथिया ली अमुक वस्तु।
    भले दिखाने वाला इसे अपनी निपुणता समझ कर दिखा रहा हो परंतु पढ़ने वाले के सामने अपनी तुच्छता दिखाने जैसा है।
    Dr. Kavita Vachaknavee की हालिया प्रविष्टी..ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े
  18. shakuntala sharma
    आपकी प्रस्तुति पढते हुए ऐसा लग रहा है जैसे हम अभी ” नागार्जुन सराय ” में ही हैं और हिन्दी विश्वविद्यालय-परिसर में चहल-क़दमी कर रहे हैं । सुन्दर ,सुरुचि-पूर्ण, सम्यक संरचना ।
  19. संतोष त्रिवेदी
    कविता वाचकनवी जी ने उसी पश्चिमी मानसिकता का परिचय दिया है जिसमें एक अंग्रेजी लेखक हिन्दी लेखक को देखता है।आखिर चिरकुटिया लेखन और चिरकुट और दलिद्दर लेखक हिन्दी में ही होते हैं।दुर्भाग्य से हिन्दी ब्लागर तो और दयनीय होता है।
    लेखिका स्वयं हिन्दी की लेखिका हैं और वे अपने लिखे का मानदेय भी नहीं लेती होंगी,हम ऐसा मान लेते हैं।
    यही एक आम ब्लागर सहज रूप से अपनी बात कहता है,आतिथ्य को सम्मान देता है,जैसा हिन्दी सम्मेलनों में विदेश के अलावा यहाँ नहीं होता तो इस पर उन्हें ब्लागर निपट दरिद्र और भूखा लगता है।
    कविता जी,आपको हिन्दी ब्लागिंग की रत्ती भर समझ नहीं है।आप इस बहाने पता नहीं किससे बदला लेना चाहती हैं?
  20. Dr. Kavita Vachaknavee
    “कविता जी,आपको हिन्दी ब्लागिंग की रत्ती भर समझ नहीं है।”
    श्री श्री संतोष त्रिवेदी, आपकी इन बातों पर ब्लोगिंग के प्रारम्भ से जुड़ा कोई भी सीनियर ब्लॉगर हँसेगा ही। इतना आकाश में उड़ना बहुधा अपनी ही भद्द करवा देता है, यह तो जानते ही होंगे। मुझे भले ही आपकी दृष्टि में समझ नहीं है पर निस्संदेह आपको आपकी समझ मुबारक। इतना मत छ्लकें कि लोगों को कहावतें याद आने लगें।
    Dr. Kavita Vachaknavee की हालिया प्रविष्टी..ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े
  21. arvind mishra
    संतोष जी ,
    भारी भरकम बौद्धिक और झूठें अभिजात्य – आग्रहों से मुक्त हो लोग जीवन के कुछ जीवंत पलों को साझा कर लें तो बार बार के अवसाद ग्रस्त होनें से बच सकते हैं !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..वर्धा ब्लॉगर सम्मलेन -जो किसी ने नहीं लिखा!
  22. बी एस पाबला
    सजीव चित्रण
    बी एस पाबला की हालिया प्रविष्टी..काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  23. amit
    बढ़िया है ब्लॉगर मीट हो गई , कभी यहाँ दिल्ली में खूब होती थी, अब तो खैर ज़माना हो गया :)
    amit की हालिया प्रविष्टी..मकई पालक सैण्डविच…..
  24. sanjay @ mo sam kaun
    आपने तो उनके कमरे के बाहर अपना सामान अड़ा ही दिया था, ये तो अरविन्द जी अपने सिद्धांत पर अड़े रहे और एक जंगल में एक ही शेर रहा, हमें तो यूँ लग रहा है कि कयामत की रात बस आते-आते रह गई :)
    sanjay @ mo sam kaun की हालिया प्रविष्टी..कभी सोचता हूँ…
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  29. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    […] वर्धा राष्ट्रीय संगोष्ठी -कुछ यादें […]

Wednesday, September 18, 2013

हिन्दी दिवस पर कवि सम्मेलन

http://web.archive.org/web/20140402081134/http://hindini.com/fursatiya/archives/4762

हिन्दी दिवस पर कवि सम्मेलन

हिन्दी दिवस14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। तरह-तरह के आयोजन होते है। प्रतियोगितायें भी। नारा प्रतियोगिता, काव्य प्रतियोगिता, टिप्पण लेखन। आदि-इत्यादि। वगैरह-वगैरह। एक्सेट्रा-वेक्सेट्रा! कुछ जगह तो सारा काम हिन्दी में होने लगता है- हिन्दी सप्ताह में। हिन्दी लिख-पढ़ लेने वाले लोग ऐसे मौके पर पंडितजी टाइप हो जाते हैं। उनके हिन्दी मंत्र पढ़े बिना किसी कोई फ़ाइल स्वाहा नहीं होती। काम ठहर जाता है। हिन्दी का जुलूस निकल जाने का इंतजार करती हैं फ़ाइलें। हिन्दी सप्ताह बीते तब वे आगे बढ़ें।
साहब लोग हिन्दी का ककहरा जानने वालों को बुलाकर पूछते हैं- पांडे जी अप्रूव्ड को हिन्दी में क्या लिखते हैं? स्वीकृत या अनुमोदित? ’स’ कौन सा ’पूरा या आधा’ , ’पेट कटा वाला’ या सरौता वाला?
काव्य प्रतियोगिताओं में लोग हिन्दी का गुणगान करने लगते हैं। छाती भी पीटते हैं। हिन्दी को माता बताते हैं। एक प्रतियोगिता में दस में से आठ कवियों ने हिन्दी को मां बताया। हमें लगा कि इत्ते बच्चे पैदा किये इसी लिये तो नही दुर्दशा है हिन्दी की?
कुछ जगह कवि सम्मेलन भी कराया जाता है। कवियों की मांग बढ़ जाती है। निठल्ले घूमते तुक्कड़ कवि का भी शेड्यूल बन जाता है। Y2K के समय की बोर्ड पर हाथ धरने वाले अमेरिका चले गये कम्प्यूटर एक्सपर्ट बनकर। हिन्दी दिवस के मौके पर तमाम चुटकुले बाज भी धड़ल्ले से वहां कविता पढ़ आते हैं जहां दीगर दिनो में वे प्रवेश भी न पा सकें।
ऐसे ही हिन्दी दिवस के मौके पर आयोजित एक कवि सम्मेलन के हम गवाह बने। चार-पांच कवि बुलाये गये थे कवि सम्मेलन में। कैंटीन के हाल में मंच सजा। आम दिनों में जिन मेजों पर थालियां सजतीं थी उन पर चद्दर डालकर कवियों को सजा दिया गया। जहां खाने का सामान् सजता था कभी वहां सुनने का सामान विराज रहा था। मेजें सब दिन जात न एक समान सोचती हुयी सी चुप थीं। वैसे भी कवि कहीं भी कविता पढ़ सकता है। अज्ञेय जी ने नदी में खड़े होकर कविता पढ़ डाली।
मेजें उठक-पटक का शिकार थीं। पायों में योजना विभाग की नीतियों की तरह मतभेद था। पायों के मतभेद की शिकार मेज पर जब कोई कवि हिलता तो मेज उनकी विचारधाराओं की तरह हिलने लगती। कवि आमतौर पर विचारधारा से मुक्ति पाकर ही मंच तक पहुंचता है। किसी विचारधारा से बंधकर रहने से गति कम हो जाती है। मंच पर पहुंचा कवि हर तरह की विचारधारा जेब में रखता है। जैसा श्रोता और इनाम बांटने वाला होता है वैसी विचारधारा पेश कर देता है। सब कवि नीरजजी जैसे ईमानदार तो नहीं होते न जो खुलेआम कह सकें कि कविता के अलावा जिन्दगी में उनको जो भी मिला सब नेता जी ने दिया।
हाल में मेजों पर बैठे कवियों के सामने श्रोता जम गये। शिकार और शिकारी आमने-सामने। बंद हाल में कविता पढ़ते हुये कवि के सामने कई चुनौतियां होती हैं। श्रोता शरीफ़ों की तरह बैठें हो तो कवि को भी शरीफ़ बनना पड़ता है। समय का बंधन हो तो कवि असहज हो जाता है। समय बांधकर कवि से कविता पढ़वाना उससे कविता उगलवाने जैसा होता है। कवि को मजा नहीं आता लेकिन क्या करे? कविता पढ़ता है मजबूरी में। मां शारदे को प्रणाम करके।
बहरहाल कवितायें शुरु हुईं। सरस्वती वंदना के बाद। कवियों को पता है कि सामने बैठे श्रोता दो घंटे ही बैठेंगे। इसके बाद छुट्टी होते ही इनका कविता प्रेम कपूर की तरह हवा हो जायेगा। पांच बजते ही स्कूल की घंटी बजते ही बस्ता लेकर भाग जाने वाले बच्चों की तरह फ़ूट लेंगे। इसलिये हर कवि पहले पढ़ लेना चाहता है। कोई कोई ज्यादा समझदार कवि तो संचालक से कह भी देता है- भाईसाहब मुझे पहले पढ़वा दीजियेगा। जरा फ़लानी जगह जाना है। लेकिन और ज्यादा समझदार संचालक झांसे में नहीं आता। नंबर के हिसाब से कविता पढ़वाता है।
एक कवि ने शुरुआती वाह-वाही से भावविभोर होकर अपनी लंबी कविता शुरु की- आशीर्वाद चाहूंगा कहकर। बाकी कवि कसमसा गये। मेज जोर से हिली। एक ने दूसरे के कान में कहा- ये तो पन्द्रह मिनट खा जायेगी। दूसरों का भी तो ख्याल रखना चाहिये। कवि कविता पढ़ने में तल्लीन है। समय,श्रोता, साथी कवि किसी का लिहाज नहीं है उसे। मां भारती की गोद में नादान शिशु की तरह अठखेलियां करता करता शिशु हो जैसे। श्रोता वाह-वाह कहते हैं तो दुबारा पढ़ता है भाव विभोर होकर। चुप रहते हैं तो एक बार और दुबारा पढ़ता है यह सोचते हुये कि शायद श्रोता सुन नहीं पाये उसको ।
बाकी के कवि कविता पढ़ते कवि को रकीब की तरह देखते है। उसकी डायरी को सौत की नजर से। मन ही मन वह अपनी कविता भी छांटता है। चुपके से डायरी पलटते हुये सोचता है कि कौन सी कविता पढ़ेगा आज। वैसे ही जैसे अमेरिका किसी देश पर हमला करने के बहाने खोजता है।
कोई-कोई कवि जब देखता है कि श्रोताओं का मन उससे उचट गया तो वो चुटकुले सुनाने लगता है। वैसे आजकल के ज्यादातर कवि अधिकतर तो चुटकुले ही सुनाते हैं। बीच-बीच में कविता ठेल देते हैं। श्रोता चुटकुला समझकर ताली बजा देते हैं तो अगला समझता है- कविता जम गयी।
विदेश घूमकर आये कवि का कवितापाठ थोड़ा लम्बा हो जाता है। वो कविता के पहले, बीच में, किनारे, दायें, बायें अपने विदेश में कविता पाठ के किस्से सुनाना नहीं भूलता। सौ लोगों के खचाखच भरे हाल में काव्यपाठ के संस्मरण सालों सुनाता है। फ़िर मुंह बाये , जम्हुआये श्रोताओं की गफ़लत का फ़ायदा उठाकर अपनी सालों पुरानी कविता को -अभी ताजी, खास इस मौके पर लिखी कविता बताकर झिला देता है।
कोई-कोई कवि किसी बड़े कवि के नाम का रुतबा दिखाता है। दद्दा ने कहा था- कि बेटा तुम और कुछ भी न लिखो तब भी तुम्हारा नाम अमर कवियों में लिखा जायेगा। कुछ कवि अपने दद्दाओं की बात इत्ती सच्ची मानते हैं कि उसके बाद कविता लिखना बंद कर देते हैं। जैसे आखिरी प्रमोशन पाते ही अफ़सर अपनी कलम तोड़ देते हैं। अपनी अमर कविता के बाद कोई और कविता लिखकर वह मां भारती का अपमान नहीं करना चाहता। अमर कविता की रेढ़ पीटता है। जनता का आशीर्वाद मांगता है।
करते-करते पांच बजने को हुये। आखिरी कवि को आवाज दी गयी। बहुत तारीफ़ के साथ। कवि ने घड़ी के साथ श्रोताओं का कसमसाना देख लिया था। लेकिन उसे अपनी अमर कविता पर भरोसा था। आंख मूंदकर भावविभोर होकर कविता पढ़ता रहा कवि। श्रोता खिसकते हुये दरवाजे की तरफ़ बढ़ते गये। कवि को एहसास सा हुआ कि कविता लौट-लौटकर उस तक ही आ रही है। लेकिन वह पढ़ता रहा। छुट्टी का समय होते ही हूटर बजा। सारे सुधी श्रोता कांजी हाउस की दीवार टूटते ही अदबदाकर बाहर भागते जानवरों की तरफ़ फ़ूटने लगे। कवि ने पैसेंजरी लय समेटते हुये राजधानी की स्पीड पकड़कर कविता पूरी की। उसे दद्दा याद आ रहे थे जिन्होंने कहा था- बेटा तुम्हाई जे कबिता अमर कबिता है।
कविता मैदान से पीठ दिखाकर भागते श्रोताओं की तरफ़ स्नेह से निहारते हुये संचालक ने सबको धन्यवाद दिया। कवियों को लिफ़ाफ़ा थमाते हुये वह मन ही मन संकल्प कर रहा था कि अगली बार नास्ता पहले नहीं आखिरी में बंटवायेगा। चाय की जगह कोल्ड ड्रिंक रखेगा।
ऐसा हमने हिन्दी दिवस पर एक कवि सम्मेलन में देखा। आपने भी कोई कवि सम्मेलन सुना?

मेरी पसन्द

रमानाथ अवस्थी
रमानाथ अवस्थी
आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गई तरल बनिये।
जिसको पीने से कृष्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिये।
जिसको जो होना है वही होगा,
जो भी होगा वही सही होगा।
किसलिये होते हो उदास यहाँ,
जो नहीं होना है नहीं होगा।।
आपने चाहा हम चले आये,
आप कह देंगे हम लौट जायेंगे।
एक दिन होगा हम नहीं होंगे,
आप चाहेंगे हम न आयेंगे॥

रमानाथ अवस्थी

5 responses to “हिन्दी दिवस पर कवि सम्मेलन”

  1. soniya srivastava
    बड़ी मजेदार अभिव्यक्ति है. इतना सरल और सच वर्णन आप ही कर सकते है. ये किसी और के बूते की बात नहीं है. वाकई हम लोगों में यही कमी है की १००० रुपये खर्च करके एक घटिया सी फिल्म देख लेंगे पर दिल को छू लेने वाली कविताएं नहीं सुन पायेंगे वो भी मुफ्त में. यही भारतीय कविता की विडंबना है.
    इतनी अच्छी पोस्ट लिखने के लिए मेरी बधाई स्वीकार करे.
  2. dr parveen chopra
    आप का लेख हमेशा की तरह यथार्थ पर आधारित और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है।
    पढ़ कर मज़ा आ गया…. लेख पढ़ते पढ़ते कितनी बार हंसी रोक नहीं पाया।
    dr parveen chopra की हालिया प्रविष्टी..बलात्कार केस में पोटैंसी टेस्ट बोलें तो…
  3. प्रवीण पाण्डेय
    एक अजब सी उलझन होती है जब भी यह दिन आता है, समझना कठिन होता है कि प्रसन्न हों कि दुखी।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..एप्पल – एक और दिशा निर्धारण
  4. sanjay jha
    - आशीर्वाद चाहूंगा ………????????????
    प्रणाम.
  5. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] हिन्दी दिवस पर कवि सम्मेलन [...]

Tuesday, September 17, 2013

ऐसे गुजरा पचासवां जन्मदिन

http://web.archive.org/web/20140402081042/http://hindini.com/fursatiya/archives/4751

ऐसे गुजरा पचासवां जन्मदिन

जन्मदिनकल हम पचास के हो गये। फ़ेसबुक, फ़ोन और मेल में झमाझम शुभकामनाओं की बारिश हुई। जन्मदिन की शुरुआत तो खैर एक दिन पहले ही कानपुर में हो गयी। पत्नीश्री हमको घसीटकर मॉल में ले गयीं। वे हमारे लिये कुछ उपहार लेना चाहती थीं।अपने पैसे बचाने की मंशा से हम उनको मोतीझील में लगे पुस्तक मेले में ले गये। फ़टाफ़ट किताबें छांटकर अपने ए.टी.एम. से भुगतान किया और घर में आकर उनसे कहा ये उपहार तुम्हारी तरफ़ से हमारे लिये। देखियें किताबों के नाम:
  1. पूछिये परसाई से- परसाई जी के सवाल-जबाब का संकलन
  2. खेल सिर्फ़ खेल नहीं है- प्रभाष जोशी
  3. अलग-ज्ञान चतुर्वेदी
  4. व्योमकेश दरवेश (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का पुण्य स्मरण)- विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी
  5. आखिरी कलाम- दूधनाथ सिंह
  6. गंगा स्नान करने चलोगे- विश्वनाथ त्रिपाठी
  7. कनुप्रिया- धर्मवीर भारती
  8. 17 रानाडे रोड- रवीन्द्र कालिया
  9. ट-टा प्रोफ़ेसर- मनोहर श्याम जोशी
  10. चोर का रोजनामचा-ज्यॉं जेने
किताबें श्रीमती जी के सामने धरकर हमने कहा कि भाई अपने दिये उपहार पर अपने हाथ से कुछ लिख तो दो- कुछ कुछ ऐसे जैसे पैसे वाले तमाम लेखक अपने को सम्मानित करने का पूरा खर्चा उठाते हैं। लेकर पोस्टर, निमंत्रण पत्र , फ़ूल माला और इनाम राशि के। इसके बाद फ़ुल विनम्रता से सम्मानित होते हैं। लिखवाने की जिद इसलिये भी थी कि बाद में कोई किताबों पर हुये खर्चे के लिये टोंक न सके और इसलिये भी कि इसके बाद उपहार के नाम पर कोई और खर्चा न हो।
बहरहाल पत्नी जी अपनी मोतियों सरीखी सुन्दर लिखावट (यही कहा जाता है भाई और यह सच भी है) किताबों पर सप्रेम भेंट लिखा। एक में तो यह लिखा-


ऐसे ही निरन्तर लिखते रहो।
इसको हमने सहेज के धर लिया है। कभी समय बरबादी के लिये टोके जायेंगे तो कह देंगे कि -तुम्ही ने कहा था निरन्तर लिखने को।
इसके बाद जबलपुर के लिये चल दिये। सोमवार के दिन दफ़्तर में कई काम के चलते वापस आ जाना पड़ा। ट्रेन में ही शुभकामनाओं की बौछार शुरु हुई जो जबलपुर पहुंचते-पहुंचते धुआंधार में बदल गयी। हाल ये हुआ कि पूरा दिन शुभकामनायें बटोरते बीता। शेर में कहा जाये तो:


जन्मदिन के लिये मिला था बस एक दिन यार,
आधा संदेसे बांचते बीता, आधा फ़ोन पर बात करते।
संस्कारधानी लौटते ही ’कट्टा कानपुरी’ की आत्मा सवार हो गयी। ’कट्टा कानपुरी’ ने ये चिरकुट सी तुकबंदी एक पुर्जे में घसीटकर थमा दी कि ये डालो फ़ेसबुक पर:


हुये पचास के अपन आज,
रहे चकरघिन्नी से नाच। गंगा-नर्मदा के बीच फ़ंसे हैं,
’चित्रकूट’ बनाती बिगड़े काज।
हाफ़ संचुरी तो निकल गयी,
किया न कोई काम न काज।
घरवाले कहते हैं ऐसे ही हैं जी,
दोस्त बताते -पक्का लफ़्फ़ाज।
दफ़्तर में क्या बोलेगा कोई,
साहब न हो जायें नाराज।
अब खुदई कुछ देखेंगे जी ,
नवका कौन बजेगा साज ।
शुभकामनायें भेजी हैं सबने,
हैं आभारी हम बहुतै आज।
-कट्टा कानपुरी
ये तुकबंदी बांचकर कुछ लोगों ने अपने भी हाथ भी साफ़ कर लिये। कविता कब्ज से मुक्त हुये। लेकिन हमारी कालेज की सहपाठिन रहीं श्रीमती ज्योति शुक्ला ने हड़काते हुये लिखा- विनम्रता की भी हद होती है। जन्मदिन पर लिखी कविता अच्छी है लेकिन सच्ची नहीं। उनके हिसाब से हम अपनी तुकबंदी में विनम्रता की हद पार कर गये। और झूठी कविता लिखी। लेकिन हमारा कहना है कि भाई विनम्रता पर कब तक गुंडों, माफ़िया और जनसेवकों का कब्जा बना रहेगा। आम आदमी का भी तो कुछ हक बनता है न विनम्रता पर। और अगर कविता सच्ची नहीं तो वो तो मेरी ही बात की पुष्टि है- दोस्त बताते -पक्का लफ़्फ़ाज।
जन्मदिन जैसे मौके ऐसे होते हैं जब आदमी थोड़ा भाऊक टाइप होकर सोचने लगता है और जीवन क्या जिया अब तक क्या किया वाली प्रश्नावली में उलझ जाता है। फ़िर हमारा तो मामला पचास का था। सौ साल अगर अलॉट होते हों तो दो आश्रमों और पचास-पचास के ’ब्रिटेनिया बिस्कुट’ जैसी स्थिति में खड़े होकर सोचा कि एक ठो और तुकबंदी ठेल दें जिसकी शुरुआत हो:
खाक जिया, बर्बाद किया,
घंटा जिया बस टंटा किया।
लेकिन ’कट्टा कानपुरी’ ने इस तुकबंदी पर लिखने से इंकार कर दिया यह कहते हुये कि एक तुकबंदी बहुत है तुम्हारे लिये। ज्यादा से दिमाग में गैस भर जायेगी। अपने को खास समझने लगोगे।
जन्मदिन के मौके का फ़ायदा उठाकर मैंने अपने एक दोस्त को मित्र भावुकता के पाले में घसीटकर अपने बारे में उनकी राय पूछी। अगला उछलकर भावुकता के पाले से बाहर हो गया और दार्शनिककता और दुनियादारी की देहरी पर खड़ा होकर कहा- हम अपने को जित्ता अच्छा बनाना चाहते हैं उसका अगर दस प्रतिशत भी बना सकें तो वही बहुत है। मतलब साफ़ कि अच्छी-अच्छी बातें बनाने से बेहतर है कि अच्छा बनने का सच्चा प्रयास किया जाये।
आश्रम के लिहाज से गृहस्थ से वानप्रस्थ में सरक गये। पिछले डेढ़ साल से घर से बाहर हैं तो इसके लिये कहा जा सकता है कि गृहस्थ आश्रम में अच्छी परफ़ार्मेन्स देखते हुये आश्रम प्रमोशन पहले हो गया? वापस गृहस्थी में लौटने के लिये छटपता रहे हैं जैसे छंटे हुये कर्मचारी नेता स्टॉफ़ का प्रमोशन ठुकराकर हमेशा कर्मचारी ही बने रहना चाहते हैं ताकि मजे करते रह सकें।
कल ही एक और मित्र का रात को फोन आया। बताया कि वो हमारा ब्लॉग पिछले तीन-चार सालों से पढ़ रहे हैं। कुछ पोस्टों को पढ़कर रो चुके हैं। कुछ से हौसला बंधा। तीन साल से बात करने की सोच रहे हैं लेकिन मारे संकोच के बात करने की हिम्मत न जुटा सके। जन्मदिन के मौके पर उनका बात करना अच्छा लगा। बहुत देर तक बातें हुईं। यह भी लगा कि सालों तक जुड़े रहने के बाद भी बातचीत के अभाव में हम आपस में एक दूसरे के बारे में कितना कम जानते हैं।
ऐसे तो कई मौकों पर घर से बाहर जन्मदिन मना। लेकिन कल शाम एकदम अकेले पन में बीता। यहां किसी को हवा ही नहीं थी कि हमारा जन्मदिन है। घर में होते तो अम्मा गुलगुले बनाती। पत्नीश्री जबरियन केक कटवाती। कुछ उपहार और जरूर ले आतीं। बच्चों के साथ अपन भी बच्चे बनते। आश्रम शिफ़्टिंग इतने चुपचाप तो नहीं ही होती। घर से दूर होने का एहसास कल कुछ ज्यादा ही हो गया।
जन्मदिन के मौके पर तमाम मित्रों, शुभचिन्तकों की शुभकामनायें और प्यार मिला। सबको घटनास्थल पर जैसा मिला जहां मिला के हिसाब से धन्यवाद और आभार देने का प्रयास कर रहा हूं। जिनको जबाब नहीं दे पाया किसी चूक के चलते उनको यहां खुले आम आभार दे रहा हूं। जो मित्र शुभकामनायें भेजने में चूक गये उनकी शुभकामनायें भी जबरिया ग्रहण करके उनके प्रति आभार प्रकट कर रहे हैं।
इति श्री जन्मदिन कथा।

मेरी पसन्द



परेशानी
आधा जीवन जब बीत गया
वनवासी सा गाते रोते,
अब पता चला इस दुनिया में,
सोने के हिरन नहीं होते।
संबध सभी ने तोड़ लिये,
चिंता ने कभी नहीं तोड़े,
सब हाथ जोड़ कर चले गये,
पीड़ा ने हाथ नहीं जोड़े।


परेशानी
सूनी घाटी में अपनी ही
प्रतिध्वनियों ने यों छला हमें,
हम समझ गये पाषाणों में,
वाणी,मन,नयन नहीं होते।
मंदिर-मंदिर भटके लेकर
खंडित विश्वासों के टुकड़े,
उसने ही हाथ जलाये-जिस
प्रतिमा के चरण युगल पकड़े।

परेशानी
जग जो कहना चाहे कहले
अविरल द्रग जल धारा बह ले,
पर जले हुये इन हाथों से
हमसे अब हवन नहीं होते।

–कन्हैयालाल बाजपेयी

13 responses to “ऐसे गुजरा पचासवां जन्मदिन”

  1. सतीश सक्सेना
    - कनुप्रिया दो बार खरीद / मार लाये हो, उसे बापस कर आइये..
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..हाय द्रवित मन मेरा कहता, काश साथ तुम मेरे होतीं -सतीश सक्सेना
  2. हर्षवर्धन
    चलिए पचासा तो आप भी ठोंक ही दिए :) विनम्रतापूर्वक जबर्दस्ती वाले उपहार के लिए बधाई।
  3. Anonymous
    अत्यन्त हदयस्पर्शी लेख लिखा है आपने सर! हँसी- हँसी में बहुत गूढ बातें कह दीं आपने सर! पुस्तक मेले में मुझे भी जाना है
  4. sanjay jha
    “ऐसे ही निरन्तर लिखते रहो।” ………बेशक ऐसे ही लिखते रहिये.
    पोस्ट हँसी-हँसी में ………. सेंटी करनेवाला है……..
    दुसरे वाले ‘कट्टा-शेर’ पूरे हों बब्बर शेर के तरह…………
    आपकी पसंद ……….. खूब पसंद आया………
    प्रणाम.
  5. रवि
    चलिए, हमारी भी ले ही लीजिए – बधाई!
    वैसे, पचासवां हो या इक्यावनवां, कउनो फर्क नहीं है – काहे कि हम पचासवां इक्यावनवां तो दो तीन साल पहले ही निपटा चुके हैं!
    रवि की हालिया प्रविष्टी..सॉफ़्टवेयर स्थानीयकरण में मानक लाने के लिए FUEL के बढ़ते कदम
  6. पंछी
    Your posts are amazing blend of emotions and humour…One of my favourite blogger :)
    पंछी की हालिया प्रविष्टी..Poem on Positive Attitude in Hindi
  7. suman patil
    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं जबरिया नहीं हार्दिक है स्वीकारे :)
    हंसी हंसी में बहुत कुछ सार्थक पढ़ने को मिला आभार !
  8. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    वाह! सुंदर पोस्ट। आपकी पसंद हमेशा की तरह लाज़वाब।
  9. यशवन्त
    कल 19/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!
  10. प्रवीण पाण्डेय
    आपको अर्धशती की शत कामनायें।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..एप्पल – एक और दिशा निर्धारण
  11. Abhishek
    :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..संयोग
  12. Sahayogi
    आपकी लेखनी धाराप्रवाह चलती है और विचार बहुत सुंदरता से प्रकट होते हैं. मुझे आपका यह ब्लॉग बहुत ही पसंद आया. मैं आपकी तरह कोई कवी तो नहीं हूं इसलिए कोई दोहा या पंक्ति, आपकी तारीफ में नहीं लिख सकता इसका अफसोस है, और रहेगा.
  13. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] ऐसे गुजरा पचासवां जन्मदिन [...]