इस बार की वॉक चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर से बल्लीमारान में ग़ालिब की हवेली तक थी। रास्ते में भारतीय इतिहास में दर्ज मुख्य इमारतों बेगम समरू की हवेली, शीशगंज गुरुद्वारा, सुनहरी मस्जिद, उस्ताद दाग़ के नाम पर बने बाजार, फतेहपुरी मस्जिद होते हुए ग़ालिब की हवेली को देखते हुए बीते तीन-चार सौ साल के इतिहास में चहल-क़दमी करनी थी। करीब दो घंटे की वॉक में तीन-चार सौ साल के इतिहास से रूबरू हो लिया।
वॉक साढ़े सात बजे शुरू होनी थी। अपन पौने आठ बजे लालकिला मेट्रो स्टेशन पर उतरे। गौरी शंकर मंदिर के सबसे पास यही मेट्रो है। स्टेशन से बाहर निकलकर क़रीब दस लोगों रास्ता पूछते हुए दो सौ मीटर की दूरी पर स्थित गौरी शंकर मंदिर पहुँचे। करीब आठ बजे। वॉक शुरू हो चुकी थी। शुरुआती आपसी परिचय के बाद आलोक पुराणिक अपना शुरुआती व्याख्यान शुरू कर चुके थे।सामने सड़क के पास गौरी शंकर मंदिर था। मंदिर की दूसरी तरफ़ फ़ुटपाथ पर खड़े होकर आलोक पुराणिक ने गौरीशंकर मंदिर और मंदिर बनने के समय दिल्ली की स्थिति की जानकारी दी।
गौरीशंकर मंदिर शैव धर्म का प्रमुख केंद्र है। बताया जाता है कि यहाँ स्थित भूरे रंग का शिवलिंग 800 साल पुराना है। भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित यह मंदिर मराठा सैनिक आपा गंगाधर द्वारा 1761 में पुनर्निर्मित किया गया था। उस समय दिल्ली के हाल बेहाल थे। दिल्ली एक ऐसे दौर से गुजर रही थी जहाँ मुगलों की सत्ता खत्म हो रही थी, मराठों का वर्चस्व टूट गया था और दिल्ली विदेशी लुटेरों के साये में थी। अहमद शाह अब्दाली ने 1756-57 में दिल्ली में भयंकर कत्लेआम और लूटपाट की थी, जिससे शहर उबर नहीं पाया था। 1761 के युद्ध की पृष्ठभूमि में भी अब्दाली का डर व्याप्त था।
अहमद शाह अब्दाली के ख़ौफ़ का अंदाज़ उस समय पंजाब में प्रचलित इस कहावत से लगाया जा सकता है :
खादा पीत्ता लाहे दा,
रहंदा अहमद शाहे दा
अर्थात् जो खा लिया पी लिया और तन को लग गया वो ही अपना है, बाकी तो अहमद शाह लूट कर ले जाएगा।
ऐसे समय में भगवान का ही सहारा होता है। हारे को हरिनाम। मराठा सैनिक द्वारा पुनर्निर्मित गौरीशंकर मंदिर देश के प्रमुख शिवमंदिरों में है।
गौरीशंकर शिवमंदिर के बाहर से ही दर्शन करके हम चाँदनी चौक की गलियों में घूमते हुए बेगम समरू की हवेली देखने पहुँचे।
बेगम समरू की हवेली के रास्ते में भारतीय स्टेट बैंक की इमारत दिखी। 200 साल से अधिक पुरानी (1806 में निर्मित) पुरानी यह इमारत मूल रूप से 'बैंक ऑफ दिल्ली' था और 1857 की क्रांति के दौरान क्षतिग्रस्त होने के बाद, अब यह भारतीय स्टेट बैंक की सबसे पुरानी और प्रमुख शाखाओं में से एक है। इतवार होने के चलते बैंक बंद था वरना अंदर के भी कुछ हाल-चल ले लेते।
बेगम समरू की हवेली की तरफ़ जाते हुए गलियों में लोग ऊँघते दिखे। गली में कूड़ा उठना शुरू हो गया था। शायद लोगों को अंदाज़ हो गया था कि दिल्ली वॉक वाली टीम चाँदनी चौक के दौरे पर निकल चुकी है।
बेगम समरू की हवेली एक ऐतिहासिक इमारत है। इसे अब भगीरथ पैलेस के नाम से जाना जाता है। यह एशिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक मार्केट के रूप में जानी जाती है।
इमारत के ऊपर LLOYDS BANK LIMITED और बायें कोने में सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया लिखा है। इधर-उधर फैले तारों के मकड़जाल से गिरी यह इमारत कभी दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण इमारतों में रही होगी। ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण आज भी लेकिन पूरी तरह उपेक्षित है।
बेगम समरू की दास्तान बड़ी रोचक है। बेगम समरू का मूल नाम फरज़ाना ज़ेब उन-निसा था। बचपन में माता-पिता के न रहने पर अनाथ हो जाने पर उनको बेगम गुलबदन ने अपने कोठे पर पनाह दी। वहाँ उन्होंने 18वीं सदी के भारत में एक नर्तकी के रूप में अपना करियर शुरू किया। नर्तकी के रूप में काम करते हुए फरज़ाना ज़ेब उन-निसा की मुलाक़ात फ़्रांसीसी मूल के भाड़े के सैनिक वाल्टर रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे से हुई। सोम्ब्रे की पत्नी होने के बाद उनका नाम जोआना नोबिलिस सोम्ब्रे हुआ। जो बाद में बिगड़कर सहज रूप में बेगम समरू के नाम से प्रचलित हुआ।
रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे के हरम में जूनियर पत्नी के रूप में दाखिल होने के समय बेगम समरू की उमर महज़ 14 वर्ष थी। सोम्ब्रे 45 साल के थे। आज के हिसाब से देखा जाये तो सोम्ब्रे बेगम समरू के साथ बाल विवाह के दोषी पाए जाते। सोम्ब्रे से विवाह के बाद कश्मीरी मूल की फरज़ाना ज़ेब उन-निसा सुन्नी से धर्मांतरित कैथोलिक ईसाई हो गईं।
रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे को 'सोम्ब्रे' (Sombre) या 'सोमरू' (Sumroo) के नाम से जाना जाता था, जो उनके द्वारा पहने जाने वाले उदास/गंभीर चेहरे के हाव-भाव के कारण पड़ा।
1763 में पटना में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के दौरान, इसने 82 यूरोपीय अधिकारियों और लगभग 4000 सैनिकों का बेरहमी से कत्ल किया था, जिसके कारण इसे 'बुचर ऑफ पटना' या 'पटना का कसाई' उपनाम मिला।
रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे की अपनी सेना थी जो भाड़े में भारतीय रियासतों की तरफ़ से लड़ती थी। दिल्ली के उस समय के बादशाह शाह आलम द्वितीय ने मेरठ के पास सरधना की जागीर उनको दे दी। बेगम समरू अपने पति के साथ जागीर का काम देखती थीं।रेनहार्ड्ट सोम्ब्रे के निधन के बाद बेगम समरू सीधे जागीर का काम देखती थीं।
तात्कालिक समय में बेगम समरू के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे मुग़ल बादशाह की सलाहकार बनाई गईं थी क्योंकि उनको युद्ध लड़ना आता था।
बेगम समरू की सेना में 3000 सिपाही थे जिसमें 100 गोरे सैनिक थे जो बेगम समरू के एक इशारे पर जान देने को तैयार रहते थे। सरधना पर करीब छह दशक तक राज करने वाली बेगम समरू 47.6 बिलियन डॉलर ( 44.30 ख़रब रुपये) से ज्यादा की संपत्ति की मालकिन थीं। वे 1836 में अपनी मृत्यु के समय उत्तर भारत की सबसे धनी महिलाओं में से एक थीं, और उनकी विशाल विरासत का एक बड़ा हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के पास गया।
बेगम समरू की हवेली में प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी को भी याद किया गया। मनु कौशल जी ने अपने मिजाज के मुताबिक़ अकबर इलाहाबादी का शेर पढ़ा :
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
इसके बाद उन्होंने अकबर इलाहाबादी द्वारा लिखित दिल्ली दरबार के किस्से 'जल्वा-ए-दरबार-ए-देहली' सुनाई। 1903 में लॉर्ड कर्जन द्वारा आयोजित इस दिल्ली दरबार के अपने अनुभव बताते हुए लिखा :
"सर में शौक़ का सौदा देखा
देहली को हम ने भी जा देखा
जो कुछ देखा अच्छा देखा
क्या बतलाएँ क्या क्या देखा।"
दिल्ली दरबार में लेडी कर्जन के डांस को देखकर बाक़ी लोगों के हाल बयान करते हुए अकबर इलाहाबादी लिखते हैं :
है मशहूर-ए-कूचा-ओ-बर्ज़न
बॉल में नाचें लेडी-कर्ज़न
ताइर-ए-होश थे सब के लरज़न
रश्क से देख रही थी हर ज़न
(इस शेर में अकबर इलाहाबादी दिल्ली दरबार के दृश्य का वर्णन करते हुए तंज (व्यंग्य) कस रहे हैं कि जब 'लेडी कर्ज़न' बॉल (डांस पार्टी) में नाच रही थीं, तो वहां मौजूद सभी लोगों के होश उड़ गए थे (होश के पंछी कांप रहे थे) और अन्य महिलाएं रश्क (ईर्ष्या/जलन) से उन्हें देख रही थीं। यह औपनिवेशिक दौर की संस्कृति पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी है। )
अफ़ग़ान, फ्रेंच, ब्रिटिश लुटेरे आकर यहाँ लूटपाट करते रहे। इस बात को फ़राज़ के शेर के ज़रिए याद किया :
दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें।
अकबर इलाहाबादी के सियासी अंदाज में लिखे शेर के बहाने नीतीश कुमार जी को याद करते आलोक पुराणिक ने यह शेर पढ़ा :
"ईमान की तुम मेरे क्या पूछती हो मुन्नी,
शिया के साथ शिया, सुन्नी के साथ सुन्नी।"
बेगम समरू की हवेली में लगी छत की ईंटे देखकर लगा कि वे वहाँ टंगे-टंगे थक गईं और बाहर निकलने को बेताब हैं।
बेगम समरू की हवेली के बाद हम शीश गंज गुरुद्वारे की तरफ़ बढ़े। गुरुद्वारे के पहले फुटपाथ पर बैठे कई सेवादार दिखे। उनमें से कुछ अपना मेडिकल बॉक्स लिए लोगों की मरहम पट्टी कर रहे थे।
शीशगंज गुरुद्वार साहिब दिल्ली के नौ ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। यह पहली बार 1783 में बघेल सिंह द्वारा नौवें सिख गुरु तेग बहादुर की शहादत स्थल की याद में बनाया गया था। सिक्खों के नवें गुरु गुरु तेगबहादुर जी को इस स्थान पर 11 नवंबर 1675 को मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के आदेश पर नौवें सिख गुरु का सिर काटा गया था। इससे पहले कि उनके शरीर को सार्वजनिक दृश्य के सामने लाया जा सके, उसे उनके एक शिष्य लखी शाह वंजारा द्वारा अंधेरे की आड़ में चुरा लिया गया, जिन्होंने गुरु के शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए अपने घर को जला दिया; आज इसी स्थान पर गुरुद्वारा रकाब गंज स्थित है। लखी शाह बंजारा रकाब (घोड़े की काठी) बनाने का काम करते थे इसलिए उनके घर की जगह पर बने गुरुद्वारे को गुरुद्वारा रकाबगंज नाम दिया गया।
गुरु तेग बहादुर का सीस काटे जाने के पहले उनके तीन प्रमुख सिख साथियों (भाई) को शहीद किया गया था, जिनके नाम हैं:
भाई मति दास (Bhai Mati Das): इन्हें आरी से चीरकर शहीद किया गया था।
भाई सती दास (Bhai Sati Das): इन्हें रुई में लपेटकर जिंदा जला दिया गया था।
भाई दयाला (Bhai Dayala): इन्हें उबलते पानी की कड़ाही में डालकर शहीद किया गया था।
इन सभी को 1675 में दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी के साथ उनके सामने शहीद किया गया था, क्योंकि उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
गुरुद्वारा सीस गंज साहिब में शहीदी स्थल और वह पेड़ है जहाँ गुरु तेग बहादुर का सिर काटा गया था।
भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट 1979 से भारत के राष्ट्रपति को सलामी देने के बाद सीस गंज गुरुद्वारे को सलामी देती है। इस प्रकार सिख रेजिमेंट भारतीय सेना की इकलौती रेजिमेंट है जो गणतंत्र दिवस परेड में दो बार सलामी देती है।
गुरु तेग बहादुर के मारे जाने के बाद सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने सम्राट औरंगज़ेब को कड़ा पत्र लिखा। पत्र के मजनून का हिंदी अनुवाद आलोक पुराणिक जी ने करते हुए सुनाया :
"सारी कोशिश के बावजूद इंसाफ़ नज़र नहीं आता जब
तलवार उठाकर जंग ही सही रास्ता रह जाता तब।"
गुरु तेग बहादुर जी के बारे में कवि रूप की भी जानकारी दी मनु कौशल जी ने। उन्होंने उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब में 15 रागों में 59 शब्द (पद) और 57 श्लोक रचे। उनका एक दोहा यहाँ पेश है :
धन दारा संपत्ति सकल, जिनि अपनी करि मानि।
इन में कुछ संगी नहीं, नानक साची जानि॥
गुरुद्वारा सीस गंज साहिब से कुछ ही दूर पर वह सुनहरी मस्जिद है जहाँ से उस समय के ईरानी लुटेरे नादिरशाह ने कत्लेआम का ऐलान किया था। लूट के इरादे से भारत आए नादिरशाह के मार्च 1739 में दिल्ली पहुँचने पर यह अफ़वाह फैली कि नादिर शाह मारा गया। इससे दिल्ली में भगदड़ मच गई और फारसी सेना का कत्ल शुरू हो गया। उसने इसका बदला लेने के लिए दिल्ली में भयानक खूनखराबा किया और एक दिन में कोई 20-22 हजार लोग मार दिए गए । इसके अलावा उसने शाह से विपुल धनराशि भी ली। मोहम्मद शाह ने भारत की जनता से जजिया कर आदि के रूप में लूटी गये धन के अलावा सिंधु नदी के पश्चिम की सारी भूमि भी नादिर शाह को दान में दे दी। हीरे जवाहरात का एक ज़खीरा भी उसे भेंट किया गया जिसमें कोहनूर तख़्तेताउस शामिल थे । नादिर को जो सम्पदा मिली वो करीब 85 करोड़ रुपयों की थी। 85 करोड़ रुपए की कीमत को आज सोने के भाव से जोड़ें, तो यह रकम आज की जीडीपी से भी अधिक हो सकती है।
नादिर शाह के पास भारत से लूट की दौलत इतनी ज़्यादा हो गई थी कि लौटने पर उसने अपने राज्य में तीन साल तक कोई कर नहीं लगाया।
उस समय दिल्ली लूटमार का खुला मैदान जैसी थी। लोगों के हाल बयान करते हुए शायर मीर तकी मीर ने लिखा था :
दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का।
दिल्ली के हाल देखकर लोग दिल्ली छोड़कर दूसरी जगहों की तरफ़ पलायन कर रहे थे। मीर तकी मीर ने इसे बयान करते हुए लिखा :
"ग़ुस्से से उठ चले हो तो दामन को झाड़ कर
जाते रहेंगे हम भी गरेबान फाड़ कर।
दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर।"
सुनहरी मस्जिद के बाद हम लोगों का कारवां चाँदनी चौक स्थित दाग बाजार की तरफ़ बढ़ा। दाग बाज़ार उर्दू के बेहतरीन शायर दाग देहलवी के नाम पर बना बाजार है। नाम है -कूँचा उस्ताद दाग़ व्यापार मंडल ( होलसेल क्लॉथ मार्केट)।
दाग़ देहलवी (1831–1905) उर्दू शायरी के एक अत्यंत लोकप्रिय और रूमानी शायर थे, जिन्हें 'बुलबुल-ए-हिंद' और 'दबीर-उद-दौला' जैसी उपाधियों से नवाजा गया था। नवाब मिर्ज़ा ख़ान उनका असली नाम था और उन्होंने अपनी सादी लेकिन प्रभावशाली उर्दू में शायरी की। दाग़ की शायरी में प्रेम, रूमानियत और दिल्ली की तहजीब की झलक मिलती है।
उस्ताद दाग़ का शुमार आज सबसे ज्यादा गाये जाने वाले शायरों में है। दाग देहलवी की माँ वजीर ख़ानम उस समय की प्रतिष्ठित महिला थीं। उन्होंने मुगल युवराज मिर्जा मुहम्मद फ़ख़रू, जो अंतिम मुगल बहादुर शाह ज़फ़र के उत्तराधिकारी थे, से प्रेम निवेदन किया और उनसे पुनर्विवाह किया। इस कारण उन्होंने दिल्ली के लाल किले में विशेषाधिकार प्राप्त शिक्षा प्राप्त हुई । वहाँ उन्होंने सर्वोत्तम शिक्षा प्राप्त की और बाद में उस्ताद जौक के मार्गदर्शन में रहे। बाद में, उन्होंने उर्दू साहित्य और कविता की बारीकियों पर ग़ालिब से भी सलाह ली । उन्हें सुलेख और घुड़सवारी का भी भी प्रशिक्षण दिया गया था ।
दाग दहलवी हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मशहूर शायर इक़बाल के उस्ताद थे। दिल्ली, रामपुर के बाद वे हैदराबाद में रहे। हैदराबाद में रहते हुए वे दरबारी कवि और मार्गदर्शक नियुक्त हुए। वहीं उनका 74 की उम्र में इंतक़ाल हुआ।
आलोक पुराणिक जी ने दाग़ देहलवी में मिजाज का परिचय कराने के लिए उनका यह शेर पढ़ा :
"वंदे वायस सुनते-सुनते कान अपने भर गए
क्या इबादत को हमीं हैं, सब फ़रिश्ते मर गए?"
दाग साहब अपने परिचय में ख़ुद की तारीफ़ करने से परहेज नहीं करते थे। उन्होंने अपने बारे में लिखा :
"दाग़ इक आदमी है गर्मा-गर्म
ख़ुश बहुत होंगे जब मिलेंगे आप।"
दाग देहलवी के तमाम शेर एक के बाद एक सुनाये गए। उनमें से कुछ यहाँ पेश हैं :
- "हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़',
जो लोग कुछ नहीं करते, कमाल करते हैं।"
-"वो क़त्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये काम किसने किया है ये काम किसका था।"
-"तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता,
वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता।"
- "मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है।"
उर्दू की तारीफ़ करते हुए भी दाग ने लिखा :
-"उर्दू है जिसका नाम, हमीं जानते हैं 'दाग़',
सारे जहाँ में धूम, हमारी ज़बान की है।
नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो,
कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते।"
मनु कौशल जी ने उस्ताद दाग़ की शायरी में पॉज के कमाल का जिक्र करते हुए कुछ शेर सुनाये। शेर में पॉज के अनुसार शेर के मानी कैसे बदल जाते हैं इसका जिक्र किया। एक शेर पढ़कर उन्होंने पॉज के साथ शेर के मतलब बदलने उदाहरण पेश किया।
-"सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं।
मैं 'दाग़' हूँ मरता हूँ इधर देखिए मुझ को
मुँह फेर के ये आप किधर देख रहे हैं।
-तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
ग़ालिब के इस शेर में भी पॉज के चलते शेर का मतलब बदलने के बारे में बताया मनु जी ने :
दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए।
मनु कौशल के की दाग के बारे में बातचीत को हमारे साथ वहीं फुटपाथ पर बैठा एक कुत्ता भी सुन रहा था। कुछ दाग साहब की शायरी तो उसने तसल्ली से सुनी लेकिन ग़ालिब का जिक्र आते ही वह उठकर चला गया। इससे यह बात साबित होती है कि दाग़ साहब आसानी से समझ में आने वाले शायर हैं। ग़ालिब को समझना थोड़ा मुश्किल है।
दाग देहलवी रोमानी शायर हैं। संसार के सौन्दर्य के मुक़ाबले जन्नत की हूरों की ख़ारिज करते हुए उन्होंने शेर लिखा । इस शेर को मनु जी अपनी आवाज में पढ़ा :
" आरज़ू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई
जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई।"
जिसमें लाखों बरस की हूरें हों,
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई।"
'कई चाँद थे सरे-आसमाँ' शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास है, जो 18वीं-19वीं सदी की दिल्ली, शायरी, तहज़ीब और संस्कृति का जीवंत चित्रण करता है। दाग देहलवी की माँ जीनत ख़ानम पर केंद्रित इस उपन्यास में दाग देहलवी के बचपन और उनकी शायरी के शुरुआती दिनों का जिक्र है।
दाग बाजार के पास ही स्थित फतेहपुरी मस्जिद है। इसका निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की पत्नी फतेहपुरी बेगम ने 1650 में करवाया था। उन्हीं के नाम पर इसका नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। ये बेगम फतेहपुर से थीं। इसीलिए उनक नाम फतेहपुरी बेगम पड़ा।
अंग्रेज़ों ने इस मस्जिद को 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद के बाद, नीलाम कर दिया था। शायद स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिमों की भागेदारी से नाराज होकर अंग्रेजों ने ऐसा किया होगा। जिसे राय लाला चुन्नामल ने मात्र 19000 /- रुपए में खरीद लिया था। जिनके वंशज आज भी चाँदनी चौक में चुन्नामल हवेली में रहते हैं। जिन्होंने इस मस्जिद को संभाले रखा था। बाद में 1877 में सरकार ने इसे चार गांवों के बदले में वापस अधिकृत कर मुसलमानों को दे दिया, जब उन्हें दिल्ली में रहने का दोबारा अधिकार दिया गया था। ऐसी ही एक दूसरी मस्जिद, अकबराबादी बेगम द्वारा बनवाई गई थी, जिसे अंग्रेज़ों ने बर्बाद करवा दिया था। माना जाता है कि यह वर्तमान नेताजी सुभाष पार्क (दिल्ली) क्षेत्र में स्थित थी।
इसी तरह औरंगज़ेब की बेटी ज़ीनत-उन-निसा बेगम द्वारा निर्मित ज़ीनत-उल-मस्जिद को भी अंग्रेजों ने ज़ब्त कर लिया था और इसे ब्रिटिश सैनिकों के लिए एक बेकरी में बदल दिया था।
जीनत-उल-मस्जिद के बेकरी में बदल देने की सीख शायद जाटों से मिली होगी। 1761 में भरतपुर के जाट महाराजा सूरजमल की सेना ने आगरा विजय के दौरान ताजमहल में भूसा भरवाया था। जाट सेना ने ताजमहल के कीमती सामान, जैसे चांदी के दरवाजे, झूमर और कालीन लूट लिए थे और इसे एक अस्थाई अस्तबल या गोदाम के रूप में इस्तेमाल किया था।
फतेहपुरी मस्जिद देखने के बाद हम लोग बल्लीमारान स्थित ग़ालिब की हवेली की देखने गए। अपन पहले भी एक बार यहाँ आए थे लेकिन उस समय यह रखरखाव के लिए बंद थी। उस समय आलोक जी ने कहा था कि उनको साथ लिए बिना ग़ालिब से मिलना संभव नहीं है। इस बार आलोक जी और मनु कौशल जी दोनों साथ थे।
ग़ालिब की हवेली में ग़ालिब से जुड़ी तमाम तस्वीरें, किताबें, डाक टिकट और उनसे जुड़ी चींजे थीं। एक चौसर भी रखी थी जिस पर कुछ पांसे भी रखें थे। शायद ग़ालिब उनसे खेलते होंगे। ग़ालिब की हवेली में एक तरफ़ दीवार पर ग़ालिब की बड़ी फ़ोटू और उतने ही बड़ी जगह पर ग़ालिब का प्रसिद्ध शेर लिखा था :
उग रहा है दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा 'ग़ालिब'
हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आई है
(इसका मतलब है घर इतने लंबे समय से खाली पड़ा है कि उसकी दीवारों पर घास (सब्ज़ा) उग आई है, और शायर अब बयाबान (जंगल/वीरान जगह) में भटक रहा है, जबकि उसके अपने घर में (जो अब जंगल बन गया है) बहार आ गई है।)
ग़ालिब के बारे में प्रसिद्ध लेखक मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी ने लिखा है -"ग़ालिब दुनिया में वाहिद (अकेला) शाइ'र है जो समझ में ना आए तो दुगना मज़ा देता है।"
इस परिभाषा के अनुसार हम ग़ालिब का दोगुना मजा लेने की फ़िराक़ में थे। लेकिन हमारी मंशा पर आलोक पुराणिक जी और मनुकौशल जी ने पानी फेर दिया। ग़ालिब के कई शेर सुनाकर हमको समझाये भी। ग़ालिब के जीवन से जुड़ी कई बातें, उनके ख़त और दोस्तों से गुफ़्तगू के किस्से सुनाए। मनु कौशल ने ग़ालिब का कलाम सुनाया :
"उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
देखिये, पाते हैं उश्शाक़ (प्रेमियों ) बुतों से क्या फ़ैज़,
इक बरहमन ने कहा है, कि ये साल अच्छा है।
(ग़ालिब कह रहे हैं कि प्रेमियों (उश्शाक़) को महबूब (बुतों) से क्या हासिल होता है, यह तो देखने वाली बात है; लेकिन एक पंडित (बरहमन) ने भविष्यवाणी की है कि यह साल अच्छा रहेगा) ये शेर ग़ालिब की मन:स्थितियों का बयान करता है। फ़ाकामस्ती के दिनों में भी उनको प्रेमियों के सामीप्य का ललक है।
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है।"
ग़ालिब लंबे समय तक कर्जदार रहे। लेकिन उनकी खुराक देखकर ऐसा नहीं लगा कि किसी कर्ज में डूबे इंसान की खुराक है। ग़ालिब की मनपसंद खुराक इस तरह थी :
"तले कबाब,दाल मुरब्बा, भुना गोस्त, शाम्मी कबाब, बेसन की कढ़ी और पकौड़ियाँ, चने की दाल, चटनी, अचार, सिरका, सोहन हलवा, आम, मिश्री (भोजन के बाद), पिसे हुए बादाम (मिश्री के साथ) हुक्का।"
आलोक जी ने कहा -'ग़ालिब में उस समय दुनियावी लिहाज़ से तमाम ऐब थे। लेकिन आज हम ग़ालिब को उन खराबियों के कारण नहीं बल्कि उनके काम की वजह से याद करते हैं।'
मनु जी ने ग़ालिब की प्रसिद्ध ग़ज़ल सुनाते हुए उस पर विस्तार से चर्चा की :
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
तिरे वा'दे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता
ग़ालिब के शेरो-शायरी के अलावा दोस्तों को लिखे खत भी कमाल के हैं। मनु कौशल जी ने ग़ालिब के कुछ ख़तों का ज़िक्र किया। एक पत्र में अपने दोस्त को खाते-पीते रहने ऐश करते रहने की सलाह देते हुए लिखते हैं -' मिश्री की मक्खी बनो, शहद की मक्खी नहीं।'
आलोक जी ने ग़ालिब के इस शेर को सुनाते हुए बताया कि शायद ग़ालिब के समय भी कोरोना महामारी हुई थी तभी ग़ालिब ने यह लिखा था :
हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
(मरने के बाद जो बदनामी (रुसवाई) झेलनी पड़ी, उससे बेहतर था कि मैं दरिया में डूब कर मर जाता। अगर ऐसा होता, तो न मेरा जनाज़ा निकलता और न ही कोई मज़ार (कब्र) बनती, जिससे मेरी रुसवाई से बचा जा सकता था।
एक पत्र में अपने दोस्त को ग़ालिब लिखते हैं -'पंद्रह दिन तक रोटी के साथ शराब मिलती थी। अब केवल रोटी मिलती है शराब नहीं ।'
आलोक पुराणिक ने ग़ालिब की शराब के प्रति अशक्ति का जिक्र करते हुए कहा -'ग़ालिब साहब आज होते तो पक्का किसी शराब कंपनी के ब्रांड एंबेसडर होते।'
ग़ालिब के प्रसिद्ध शेर :
ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं,
रोइए जार-जार क्या, कीजिए हाए-हाए क्यों।
(जिसमें उन्होंने जीवन की नश्वरता और दुनिया की बेरुखी पर कटाक्ष किया है। उनका कहना है कि इंसान के जाने के बाद दुनिया रुकती नहीं, सब कुछ चलता रहता है, इसलिए किसी के लिए भी बहुत ज़्यादा मातम (रोने) की ज़रूरत नहीं है। यह शेर आत्माभिमानी और यथार्थवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है। )
इस शेर की पैरोडी कैफ़ अहमद सिद्धिकी की पैरोडी Ira Puranik ने सुनाई:
हो गए नाकाम तो पछताएँ क्या
दोस्तों के सामने शरमाएँ क्या
हो रहे हैं फ़ेल हम दो साल से
घर में जा कर अपना मुँह दिखलाएँ क्या
(पूरी पैरोडी पोस्ट के साथ के वीडियो में सुने)
गौरी शंकर मंदिर के शिव मंदिर से शुरू हुई वॉक को ग़ालिब की हवेली पर ख़त्म करते हुए आलोक पौराणिक जी ने ग़ालिब का शिव की नगरी बनारस की तारीफ़ में लिखा शेर सुनाया और उसका मतलब भी बताया।
शिव मंदिर से शुरू हुई दिल्ली वॉक शिव की नगरी की तारीफ़ में पूरी हुई। इसके बाद सबका ग्रुप फ़ोटो हुआ।
वॉक पूरी होने के बाद हम लोग नाश्ते का लिए जिस दुकान पर पर पहुँचे उसका भी शंकर जी से सीधा कनेक्शन था। दुकान का नाम था - 'शिव शंकर मिष्ठान भंडार।' कचौड़ी, सब्जी के साथ स्वादिष्ठ लस्सी ने इस वॉक को 'गौरी शंकर मंदिर से ग़ालिब अकादमी' की पहले की वॉक से अधिक स्वादिष्ठ बनाया।
नाश्ता करने के बाद लोग अपने-अपने घर की तरफ़ प्रस्थान कर गए। इस तरह दिल्ली वॉक पूरी हुई।

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