Wednesday, September 11, 2013

रुतबा दिखाने की मासूम ललक

http://web.archive.org/web/20140420082455/http://hindini.com/fursatiya/archives/4733

रुतबा दिखाने की मासूम ललक

बिना टिकटकल जबलपुर रेलवे स्टेशन पर धरपकड़ हुई। तमाम लोग बेटिकट पकड़े गये। जुर्माना भरवाया गया। बेटिकट लोगों में एक डीएसपी और एक एसडीएम भी थे। एसडीएम के साथ उनका गनमैन भी था- जैसे अमेरिका के साथ इंग्लैंड लगा रहता है। पकड़े जाने पर गनमैन ने तो जुर्माना भर दिया लेकिन साहब ने सबको देख लेने की धमकी देते हुये दौड़ लगा दी। सरपट निकल लिये। पुलिस वाले उनको पकड़ न पाये। डीएसपी साहब ने पहले तो अपना रौब दिखाया लेकिन स्टाफ़ के न झुकने पर उन्होंने तत्काल जुर्माना भरा और ये बोलते हुये चले गये कि सबको अपना रुतबा दिखाने का मौका ऊपर वाला जरूर देता है।
यात्रा में बेटिकट चलना तो खैर आम बात है। लेकिन जुर्माना वसूला जाना खास बात है। आपसी सहमति से लेन-देन हो जाने का चलन ज्यादा है। इससे दोनों पक्षों को आराम रहता है। जुर्माना वसूली में अमला लगता है। तमाम लोग चाहिये। लिखा पढ़ी होती है। हिसाब करना पड़ता है। समझाना पड़ता है। फ़िर खजाने में जमा करना पड़ता है। समय की बरबादी होती है। रुपये को कई जगह धक्के खाने पड़ते हैं। जुर्माना वसूली की इस बहुआयामी समस्या का सहज हल आपसी लेन-देन होता है। एक के हाथ का मैल दूसरे की जेब में चला जाता है। गंदगी (पैसे) का स्थानान्तरण दो लोगों तक ही सीमित रहता है।
इस जुर्माना कथा का अध्ययन करने पर कुछ और पहलू दिखते हैं। दिन भर चले इस जुर्माना यज्ञ में तमाम लोग पकड़े गये। लेकिन विस्तार से वर्णन डीएसपी और एसडीएम का ही हुआ। अखबार वाले की नजर भेदभाव पूर्ण है। यह नौकरशाही को बदनाम करने की साजिश है। उसका मनोबल गिराने का षडयंत्र है। उनकी सार्वजनिक निजता का उल्लंघन है।
यह एक तरह से आम जनता का भी अपमान है। बेटिकट चलने की बहादुरी आम आदमी ने भी दिखाई और खास आदमी ने भी। लेकिन चर्चा खास आदमी की हुई। आम आदमी का जिक्र गोल। मीडिया का यह रवैया भेदभाव पूर्ण है।
डीएसपी साहब के जुर्माना भरने और एसडीएम साहब के सरपट भाग लेने से यह पता चलता है पकड़े जाने पर पुलिस के अधिकारी कानून की ज्यादा इज्जत करते हैं। एसडीएम कानून अपने हाथ में लेकर फ़ूट लेते हैं।
पुलिस के सिपाही भागते एसडीएम को पकड़ न पाये इससे अंदाजा लगता है कि प्रशासन के लोग मौका पड़ने पर बहुत तेज काम करते हैं। एसडीएम साहब के भागने की खबर सुनकर रागदरबारी के सनीचर के भागने की बात याद आ गयी। साहब को तो खोजखाज कर सम्मानित करना चाहिये कि साहब होने के बावजूद वे इत्ती तेज भाग लेते हैं कि पुलिस वाले उनको पकड़ नहीं पाते।
रागदरबारी में ही “अफ़सर नुमा चपरासी और चपरासी नुमा” अफ़सर का जिक्र है। यहां डीएसपी और एसडीएम का जिक्र है। एसडीएम फ़ूट लिये। डीएसपी खड़े रहे। डीएसपी का काम दौड़ने-भागने का होता है। एसडीएम का कुर्सी तोड़ने का। दोनों ने अपने काम के स्वभाव के विपरीत आचरण किया। दौड़ने वाला खड़ा रहा, बैठने वाला फ़ूट लिया। मामला एसडीएम नुमा डीएसपी और डीएसपी नुमा एसडीएम सरीखा हो गया। इससे एक बार फ़िर से सिद्ध हुआ कि भारत की नौकरशाही अपना काम मन लगाकर करने की आदी नहीं।
डीएसपी के रुतबा दिखाने का मौका मिलने वाली बात से अपने यहां की नौकरशाही के मिजाज की झलक मिलती है। बेटिकट यात्रियों से बिना किसी से भेदभाव किये जुर्माना वसूलना यों तो रूटीन काम है लेकिन डीएसपी इसे रुतबा दिखाना समझता है। इससे पता चलता है कि अपने यहां कि नौकरशाही अपना रूटीन काम तभी करती है जब उसका रुतबा दिखाने का मन होता है। अपना काम करना मतलब रुतबा दिखाना।
इसी समय मुझे पिछले दिनों रेलवे बोर्ड के एक मेंबर द्वारा रेलमंत्री को घूस देते हुये पकड़े जाने का किस्सा याद आ गया। लोग बताते हैं कि मेम्बर को लपेटने वाले पुलिस अधिकारी पहले कभी मेम्बर के ही अधीन थे। आरपीएफ़ में। मेम्बर कभी उन पर रुतबा दिखाते थे। पुलिस अधिकारी ने कसम खायी थी कि वे भी कभी अपना रुतबा दिखायेंगे। जैसे कभी चाणक्य ने खायी होगी नंद वंश का नाश करने के लिये। बाद में वे पुलिस अधिकारी सीबीआई में आ गये। सीबीआई की पोस्ट उनके लिये चन्द्रगुप्त साबित हुई। मौका ताड़कर उन्होंने मेम्बर को रुतबा दिखा दिया। उनकी रेलवे बोर्ड की मेम्बरी का नाश कर दिया। चेयरमैन बनने के सपने का संहार कर दिया। मेम्बर अन्दर हो गये। उनके रुतबे की पारी समाप्त हो गयी। रेलवे बोर्ड के मेम्बर का घूस देते हुये पकड़ा जाना वास्तव में भारतीय नौकरशाही की ’रुतबा दिखाने की मासूम ललक’ का प्रदर्शन था।
इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में नौकरशाही उत्ती निकम्मी नहीं है, जित्ता हल्ला मचता है। वास्तव में उसको अपना रुतबा दिखाने के मौके नहीं मिलते। रुतबे के सारे मौके जनप्रतिनिधि, माफ़िया, गुंडे , ठेकदार और मठाधीश लूट ले जाते हैं। वे बेचारे रुतबे के मौके के अभाव में दीन-हीन बने रहते हैं। पकड़े जाने पर रेलवे का जुर्माना तक भरना पड़ता है।
बहुत हुआ। अब दफ़्तर चलकर कुछ रुतबा दिखाने का जुगाड़ किया जाये। :)

16 responses to “रुतबा दिखाने की मासूम ललक”

  1. sanjay jha
    क्या बात है……………..बरे मासूमियत से धोया गया???
    प्रणाम.
  2. soniya srivastava
    बड़ी मजेदार पोस्ट है लेकिन है बिलकुल सत्य मैंने भी कई बार सार्वजनिक रूप से लेनदेन का दृश्य देखा है लेकिन तब इतना मजेदार नहीं लगा जितना पढ़कर लगा. वाकई आपमें सामान्य लगने वाली घटनाओं को विशिष्ट बनाने की अद्भुत क्षमता है
    अतिसुन्दर
    बधाई
  3. Tarunkulshrestha
    V nice sir.keep it up.maa sarsvati ki kripa apki kalam ko ase he milti rhe
  4. Kajal Kumar
    रेल में बेटि‍कट यात्रा करने का अनुभव अपना भी है और वह भी एक डि‍वि‍ज़नल कमि‍श्‍नर साहब और लाव-लश्‍कर के साथ. जि‍स स्‍टेशन से रेल पकड़ी उस शहर में कर्फ़्यू लगा हुआ था. 2 स्‍टेशन बाद उतरना था. समझ ही नहीं आया था यात्रा इस कि‍ पूरे उपक्रम में टि‍कट खरीदी कब की जानी चाहि‍ए थी.
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- उपले थापता, तै बेरा पाटता
  5. arvind mishra
    छपने लायक पोस्ट :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..मुझ पर पड़े बीस नौकरी के वर्ष तीस!(श्रृंखला)
  6. प्रवीण पाण्डेय
    जय हो, विधिवत धोया है, सब स्वच्छ और निर्मल दिखने लगा।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..पर्यटन – रेल अपेक्षायें
  7. amit kumar srivastava
    एक किस्सा याद आ गया । एक रेलवे क्रासिंग के केबिन में केबिन मैन की बीबी उसका खाना लेकर आई हुई थी । अचानक से केबिन मैन को अपना ‘रूतबा’ दिखाने की सूझी । उसने अपनी बीबी से कहा , देखो मेरा ‘रूतबा’ देखना है ,मै जब चाहूँ फाटक बंद कर सकता हूँ और सारे ये बड़े बड़े मोटर वाले लोग ठहर जाते हैं और मेरा इंतज़ार करते हैं कि कब मै फाटक खोलूँ । ऐसा कहते हुए उसने अचानक फाटक बंद कर दिया । सारा ट्रैफिक ठहर सा गया । बीबी खुश , वाह क्या ‘रूतबा’ है । तभी एक पुलिस की जीप आई ,दरोगा ने देखा ,बिना ट्रेन के समय के फाटक बंद है । वह उतर कर गया और उसने खींच कर दो झापड़ उस केबिन मैन को मारा । केबिन मैन ने फाटक खोल दिया । बीबी ने पूछा ,यह क्या है । इस पर केबिन मैन बोला ,”यह उसका ‘रूतबा’ है ” ।
    amit kumar srivastava की हालिया प्रविष्टी..“शीर्षक कैसा हो…….”
  8. Yashwant Yash
    फैंटास्टिक!
  9. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    आनंद दायक मस्त पोस्ट है। फुरसत में लिखी गई लगती है।
  10. पंछी
    हमेशा की तरह … लाजवाब :)
    पंछी की हालिया प्रविष्टी..Pencil Sketch of Kids
  11. विवेक रस्तोगी
    वाह दिल खुश हो गया, ऐसे टाइम पर तो पहचान वाले टीटी भी काम नहीं आते, बस अपने को पता होना चाहिये कि किधर बचा जा सकता है, अपन ने भी कई बार ये अनुभव लिये हैं, परंतु रेल्वे पुलिस और टीटी हमेशा बचाव के लिये साथ रहते थे ।
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..जीवन के तीन सच
  12. किलर झपाटा
    आप भी ना शुक्ला अंकल अच्छे खाँ को भी पस्त कर देंगे व्यंग कसने में।
  13. Anonymous
    शुक्लजी आप अद्भुत हैं
  14. Abhishek
    और ऐसे लोग भी होते हैं जो बिन टिकट यात्रा कर लेने के बाद वापसी का टिकट खरीद फाड़ के फेंक देते हैं :)
    पढ़ते पढ़ते याद आ गए एक ऐसे सज्जन.
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..संयोग
  15. संतोष त्रिवेदी
    गजब !
    मिसिर जी का कहा पूरा हुआ,जनसत्ता में छपकर।
  16. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] रुतबा दिखाने की मासूम ललक [...]

Monday, September 09, 2013

यार दंगा ही तो भड़का है

http://web.archive.org/web/20140420082232/http://hindini.com/fursatiya/archives/4724

यार दंगा ही तो भड़का है

मुजफ़्फ़रनगरकल इतवार था। देखते-देखते बीत गया।
हमने बहुत कहा कि आराम से रहो यार! काहे हड़बड़ाये हो। धीरे-धीरे गाड़ी हांको। लेकिन माना नहीं पट्ठा। बीत गया।
कित्ते तो काम बाकी थे इतवार को करने के लिये। लेकिन कोई पूरा नहीं हुआ। सब काम आपस में पहले आप, पहले आप कहते रहे। लेकिन हुआ कोई नहीं। हर काम को यही लगता रहा कि जैसे ही वो हो गया उसका महत्व खतम हो जायेगा। भाव गिर जायेगा। वह दिमाग से बाहर हो जायेगा।
जब कोई काम अपने को कराने के लिये प्रस्तुत न हुआ तो आरामफ़र्मा रहे दिन भर। करवटें बदलते रहे बिस्तर पर लेटे-लेटे। पहले दांये करवट ली तो थोड़ी देर बाद दिमाग ने हल्ला मचाया कि दक्षिणपंथी राजनीति नहीं चलेगी। बायें हो गये तो हल्लामचा -वाममार्गी मत बनो। थककर सीधे लेट गये तो ’सेकुलर कहीं का’ का हल्ला मचा। मन तो किया कि झटके से उठ जायें और कुछ काम निपटा दें लेकिन फ़िर दया आ गयी। इत्ते दिन का साथ रहा है उन कामों का। मन नहीं किया किसी को निपटाने का। बारी-बारी से करवटें बदलते रहे। टीवी पर दंगे की खबरे देखते रहे।
दंगे की खबरें देखते हुये कुछ-कुछ ज्ञान हुआ कि दंगे कैसे भड़कते हैं। जो बच्चे मारे गये उनका बाप भर्राई आवाज में कह रहा है:

”हमारा आम आवाम से कोई झगड़ा नहीं है, हम नहीं चाहते की ख़ूनख़राबा हो या कोई नाहक़ मारा जाए. हमारे बच्चों की लाशें पड़ी थी और हम लोगों से ग़ुस्से पर क़ाबू करने की अपील कर रहे थे. हमने कहा कि जो हमारे साथ होना था हो गया. जो हमारे बच्चे मर गए वे मर गए, अब कहीं और किसी बेगुनाह को मारने-मरवाने से क्या होगा? शांति में ही सबका फ़ायदा है.”
लेकिन अब बात कौम की इज्जत की है तो दंगा कैसे रुके? बदला लिया जाना जरूरी है। सो जारी है दंगा। चुनाव भी आने वाले हैं। इसलिये जनता के नुमाइंदे अपनी पूरी क्षमता से लगे हुये हैं। कोई दंगे के फ़र्जी वीडियो चलवा रहा है। किसी के यहां से हथियार बरामद हो रहे हैं।
कवि लोग भी अपने-अपने काम में जुटे हुये हैं। दंगे से मौसमी बुखार निजात पाने के लिये एंटीबॉयटिक कवितायें पेश कर रहे हैं। कवितायें इत्ती असरदार होती हैं कि उनको देखते ही दंगा सर पर पांव धरकर नौ दो ग्यारह हो जाता है। समझदार डॉक्टर लोग ’दंगा क्यों भड़का?’ की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश कर रहा है। कोई एक कौम को दोषी ठहरा रहा है कोई दूसरी को। जो कौमी लफ़ड़े में नहीं पड़ना चाहते वो ठीकरा प्रशासन पर फ़ोड़ रहे हैं। दोष दे दिया हो गया काम। इससे ज्यादा और कोई क्या सहयोग कर सकता है दंगा भड़काने से रोकने के लिये।
दंगे का मूल कारण खोजने निकलें तो बात दूर तलक निकल जायेगी और ले-देकर आदम और हव्वा और उनकी सेवबाजी तक पहुंचेगी। लेकिन इस बार का प्रस्थान बिंदु एक लड़के द्वारा एक लड़की से छेंड़खानी रही। हमारे समाज के लड़के बेचारे इतने निरीह और कम अक्ल और संस्कार विपन्न हैं कि उनको यह अंदाजा ही नहीं कि किसी लड़की से छेड़छाड़ के अलावा कोई और व्यवहार भी किया जा सकता है। उनको शायद लगता है लड़की को छेड़ा नहीं जवानी बर्बाद चली जायेगी, जीवन चौपट हो जायेगा। जवानी बर्बाद चले जाने से बचाने के लिये कुछ लड़के जवानी का एहसास होते ही सबसा पहला काम लड़की छेड़ने का करते हैं। बात हुय़ी तो गाना गाने लगे- मैंने तुझे चुन लिया, तू भी मुझे चुन। दिल निकाल के फ़ेंक दिया लड़की के सामने। ये मेरा मर्द दिल है, अपना भी इसी में लपेट दे और कहानी खतम कर कर। लड़की पट गयी तो जवानी सुफ़ल वर्ना आगे फ़िर तेजाब, हमला, बलात्कार जैसे आम हो चुके हथियार तो हैं हीं।
कारण पता नहीं क्या हैं लेकिन आज के समाज में तेजी से बढ़ते बाजार का प्रभाव भी होगा इसके पीछे। जो चीज अच्छी लगी उसको हर हाल में हासिल करना ही एक मात्र मकसद हो जाता है जवानों को। लड़की भी उनके लिये एक सामान जैसी ही है। अच्छी लगी तो उनके पास ही होनी चाहिये। लड़की की मर्जी से उनको क्या मतलब?
बिडम्बना यह है कि जो लड़की अच्छी लगी उसको को सामान समझकर हर हाल में हासिल करने के उज्जड भावना को वे प्रेम का नाम देते हैं।
प्रेम तो काशी के गुंडे नन्हकू सिंह ने भी किया था। उसने जिससे प्रेम किया उसकी और उसके परिवार की रक्षा के लिये अपनी कुर्बानी दी। बोटी-बोटी कटवा दी लेकिन अपने प्रेम की रक्षा की।
लेकिन वो पुराने जमाने का प्रेम का था जो बलिदान देता था। आज प्रेम आधुनिक हो गया है। वह छेड़छाड़ और उसके बाद दंगा भड़काने तक सीमित हो गया है।
अरे हम भी कहां कहां की सोचने लगे भाई। जैसा कि आपको पता है कि दंगों की आग में सब अपनी रोटी सेंक लेते हैं। सो कट्टा कानपुरी ने भी इस दंगे का फ़ायदा उठाकार कुछ शेर निकाल लिये। लीजिये फ़र्माइये वो जिसे शाइर लोग मुजाहिरा कहते हैं:
यार दंगा ही तो भड़का है,
कहीं कोई जंग तो छिड़ी नहीं।
बस कुछ लोग ही तो मरे,
पर मुआवजा दिया की नहीं।
मंहगाई ,लूट और घपले देखे,
अब एक चीज ये भी सही।
हर तरह की वैराइटी है,
किसी चीज की कमीं नहीं।
-कट्टा कानपुरी

5 responses to “यार दंगा ही तो भड़का है”

  1. Kajal Kumar
    संस्‍कार.
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- सारी नूडल्‍ज़ चाइनीज़ नहीं होतीं
  2. प्रवीण पाण्डेय
    जो भी सीखा, जिसने सीखा,
    खींस निपोरे, बाहर आया।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..अगला एप्पल कैसा हो
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    कट्टा जी की शायरी में हल्का – फुल्का दंगा।
    इश्कबाज लड़कों को देखो कैसे करते नंगा॥
    कैसे करते नंगा नेता और धर्म के चेलों को।
    बलवायी भी समझ न पाये राजनीति के खेलों को।
    सरकारी है अभयदान तो मौत पे लगता सट्टा।
    दंगा पर दोहे लिखकर भी क्या कर लेंगे कट्टा।?
  4. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] यार दंगा ही तो भड़का है [...]
  5. Dr Dharmendra Varshney
    जनता है तैश में,नेता कर रहे ऐश,
    अधिकारी ले रहे कैश और इकॉनमी हो रही क्रैश
    एकोनोंमी हो रही क्रैश करावंगे दंगा
    होगा किसी दिन सिरिया जैसा पंगा
    जब पब्लिक सड़क पर आएगी
    मुह तोड़ जवाब दिलवाएगी
    नेता सुधर जाओ नहीं तो कही के नहीं रहोगे
    सड़क पर अपाहिज होकर कही पड़े होगे

Saturday, September 07, 2013

सीरिया, अमेरिका,सुस्मिता और तालिबान

http://web.archive.org/web/20140420082034/http://hindini.com/fursatiya/archives/4711

सीरिया, अमेरिका,सुस्मिता और तालिबान

सीरियासुन रहे हैं कि अमेरिका सीरिया पर हमला करने जा रहा है। सोच रहे हैं कि ये अमेरिका को हमला-फ़मला करने के अलावा और कुछ सूझता नहीं क्या? जब देखो तब उठाये बंदूक टहलता रहता है। कभी इस पर गोली दागी कभी उस पर। कभी वियतनाम तो कभी ईराक तो कभी अफ़गानिस्तान और अब सीरिया। फ़ौज भेजने और वापस बुलाने के अलावा लगता है और कोई काम ही नहीं रह गया है अगले के पास।
मजे की बात कि हमले का हल्ला वो भाई मचा रहे हैं जिनको गद्दी संभालते ही शांति का नोबल थमा दिया गया। नोबल शांति की ट्राफ़ी लिये मिसाइल का बटन दबा रहे हैं। शांति की स्थापना के लिये अशांति मचा रहे हैं।
सीरिया पर हल्ले की बात सुनकर सीरिया के बारे में पढ़ा। इजरायल और ईराक के बीच सैंडबिच सा सीरिया दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं का गवाह रहा है। 1963 से आपातकाल लागू है। साक्षरता 75% शिक्षा मुफ़्त और अनिवार्य। फ़िर भी पचास साल से आपातकाल चल रहा है। ये कैसी साक्षरता है को 75% पढ़े-लिखे लोग 50 साल से आपातकाल बर्दास्त कर रहे हैं। कुछ झमेला जरूर है मिट्टी, हवा ,पानी में वहां की।
बताते हैं कि सीरिया ने रासायनिक हथियारों से लोगों को मारा। यह बात अमेरिका को नागवार गुजरी। उसने कहा कि वो हमला करेगा सीरिया पर। लोगों को मिसाइल से मारेगा। बतायेगा कि रासायनिक हथियारों के मुकाबले मिसाइल बेहतर उपाय है जनसंहार का। सेल्समैन की तरह नरसंहार का मुजाहिरा करेगा। दूसरे देशों को फ़ुसलायेगा – ये अच्छा हथियार है। ले लो। सस्ते में । तुम्हारे लिये दाम कम लगा देंगे। घर बैठे दुश्मन को निपटाने का चौकस हथियार है।
सीरिया से खबरें आ रही हैं कि वहां से लोग भाग रहे हैं। शरणार्थी बनकर हजारों की संख्या में पलायनकर रहे हैं अगल-बगल के देश में। अमेरिकी हमले की खबरें सुनकर पलायन और बढा है। अमेरिका वहां मिसाइल से हमला करेगा। एकदम ठीक निशाने पर लगेंगी मिसाइलें। मजे से टीवी पर देखेगा कि निशाना ठीक लगा कि पांच हाथ दूर गिरी मिसाइल। ठीक लगी तो ’वाऊ’ करके अंगूठा ऊपर करेगा और इधर-उधर गिरी तो ’शिट, मिस्ड इट’ करके दुबारा दागेगा।
कुछ दिन बाद सीरिया जब काम भर का तबाह हो जायेगा तब वो वहां पुनर्निमाण करेगा। तेल लूटेगा। ठेका लूटेगा। अपनी पिट्ठू सरकार बनायेगा। फ़िर दुनिया भर में गाना गायेगा – हमने सीरिया में लोकतंत्र की स्थापना कर दी।
मेराज फ़ैजाबादी का शेर याद आता है:

पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना,
फ़िर जलते हुये शहरों में पानी बेचना।

अमेरिका के पास खूब सारे हथियार हैं, खूब सारे बुद्दिजीवी हैं, खूब सारा पैसा है, खूब सारा खाने-पीने को है। अगर उसको लगता है कि किसी देश पर हमला करके उसको बरबाद करना ही सबसे अच्छा हल है उसकी समस्या का तो फ़िर बेचारा वो मजबूरी में हमला करके ही मानता है। फ़िर उसको कोई रोक भी नहीं पाता।
अपनी सोच के अलावा कोई तर्क भी उसके पल्ले नहीं पड़ते।
पिछले दिनों तालिबानों ने सुस्मिता बनर्जी की हत्या कर दी। तालिबानों को समझ में ही नहीं आया कि इस पढ़ने-लिखने वाली, लोगों में जागरुकता फ़ैलाने वाली महिला से कैसे निपटा जाये। मजबूरन उन्होंने उस बहादुर महिला को निपटा दिया।
इसी तरह अमेरिका को समझ में ही नहीं आता कि सीरिया पर हमला करने के अलावा भी उसका कोई इलाज है।
इससे लगता है कि कुछ मामलों में दुनिया के सबसे उन्नत, लोकतांत्रिक देश और एक जाहिल आतंकवादी संगठन की सोच में ’जरको’ फ़र्क नहीं होता।
है कि नहीं?

11 responses to “सीरिया, अमेरिका,सुस्मिता और तालिबान”

  1. पंछी
    agree
    पंछी की हालिया प्रविष्टी..Essay on Independence Day in Hindi
  2. सतीश सक्सेना
    दुनियां से काबुली का ,भरोसा चला गया !
    वह मिट गयी पर सुष्मिता को याद करेंगे !
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..अफगानों की छाती पे , ये निशान रहेंगे -सतीश सक्सेना
  3. sanjay jha
    वाओ…………
    @ ’जरको’…………….क्या कहिये’ ???
    @पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना,
    फ़िर जलते हुये शहरों में पानी बेचना।……..मार डाला?????
    प्रणाम.
  4. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    आज आपके व्यंग्य की मिसाइल एकदम सही ठिकाने पर लगी है- वाऊ।
    बहुत दिन बाद इत्ता जोरदार पढ़ने को मिला आपके की बोर्ड से या हो सकता है यही मुझे अधिक अच्छा लगा हो !
  5. arvind mishra
    चलिए जनरल नालिज बढ़ा कई दिन से किसी प्रतियोगी छात्र से पूछने वाला था -व्यंगार्जन भी हुआ … आभार!
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..हाय रे हिंदी ब्लॉगर पट्टी!
  6. प्रवीण पाण्डेय
    हर ओर नरक मचा रखा है,
    केहि बिधि तारण होय तुम्हारा,
    दुष्कृत दिखहिं तुम्हें जग सारा।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..अगला एप्पल कैसा हो
  7. Abhishek
    है तो ! बिलकुल भी फर्क नहीं.
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..संयोग
  8. रवि
    ब्लॉग का डिफ़ॉल्ट फ़ॉन्ट आकार बढ़ाएं – हम जैसे उम्र दराज लोगों को थोड़ी परेशानी होती है. पर, ये ज्ञान न देने लग जइयो कि कंट्रोल प्लस से खुद क्यों नहीं कर लेते – तो और भी तो पृष्ठ और ब्लॉग हैं इंटरनेट पर…:)
    रवि की हालिया प्रविष्टी..शुक्र है, कि फ़ाइलें ग़ायब हैं!
  9. यशवन्त
    कल 09/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!
  10. Anonymous
    बहुत बढ़िया और धारदार…..
  11. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] सीरिया, अमेरिका,सुस्मिता और तालिबान [...]

Wednesday, September 04, 2013

खोये सामान का मिलना

http://web.archive.org/web/20140420082443/http://hindini.com/fursatiya/archives/4707

खोये सामान का मिलना

खोया सामानकल अचानक मेरे मोबाइल का खोया हुआ कवर मिल गया।
बहुत दिन से खोया था। करीब महीना हुआ। शायद और ज्यादा। हमने सब जगह खोज लिया था। घर, दफ़्तर, दोस्त का कमरा। यहां, वहां न जाने कहां-कहां। लेकिन अगले ने मिल के नहीं दिया। फ़िर सोचा जाओ यार नहीं मिलते तो न मिले। हम भी तुमको नहीं खोजते।
कवर के अभाव में मोबाइल बेचारा नंगा हो गया। जब तक जेब में पड़ा रहता तब तो ठीक। जब बाहर निकलता तो शरमाता हुआ सा निकलता। कुछ दिन बाद जब आदत पड़ गयी तो बेशरम हो गया। जेब में न भी रखो तब भी आराम से सामने पड़ा रहता।
ब्लैकबेरी के मोबाइल का ये कवर पहले भी खो चुका था एक बार। लेकिन उस बार खोते ही दूसरा ले आये थे। इसलिये कि मोबाइल नया-नया था उन दिनों। पन्द्रह हजार का मोबाइल बिना कवर के रहे यह अच्छा नहीं लगता। उस समय की मोबाइल की कवर की जरूरत ताजी प्रेमिका की फ़रमाइश सी लगी। पन्द्रह हजार के मोबाइल के लिये चार सौ का कवर कौन बड़ी चीज है। जैसे ही खोया फ़ौरन नया ले आये।
लेकिन इस बार हालात जरा अलग टाइप के थे। कवर जब खोया तो मोबाइल दो साल पुराना हो चुका था। जो मोबाइल मैं पन्द्रह हजार में लाया था उसी मॉडल का मेरा एक दोस्त हाल ही में लाया -नौ हजार के करीब। इधर-उधर गिरते-पड़ते मेरा मोबाइल राणा सांगा हो चुका है। कैमरे के मोतियाबिंद हो चुका है। मकान का फ़ोटो खैंचो लोग पूछते हैं ये कौन सा पेड़ है। दायें बायें वाले कई खिड़कियां ऐसे खुली हैं जैसे लगता है अपने देश की सीमा रेखा है ये। चीनी, पाकिस्तानी, बांगलादेशी जहां से जिसका मन आया घुसता चला आता है। लेकिन हम दूसरा कवर लेने का काम स्थगित किये रहे। नौ हजार के मोबाइल के लिये चार सौ का कवर लेना विलासिता लगने लगा।
मोबाइल का कवर न खरीदने के पीछे रुपये बाबू के खराब हाल का भी बहाना जुड़ गया। रुपया भाई इतनी तेजी से गिर रहें है कि हम उन्हीं को देखते रह गये हक्का-बक्का। फ़िर हमने अपने निर्णय में देशभक्ति भी नत्थी कर दी। ब्लैकबेरी विदेशी कम्पनी है। उसका कवर न खरीदेंगे। देश भक्त बनकर रुपये के हाल सुधारने में सहयोग करने लगे।
धीरे-धीरे बिना कवर का मोबाइल सहज लगने लगा। कवर के जरूरत ’बेफ़ालतू’। हमको यह भी इहलाम हुआ कि अपन की तमाम जरूरतें ’बेफ़ालतू’ की हैं। उनके बिना भी धड़ल्ले से काम चल सकता है।
लेकिन कल हुआ कि हमारी चाबियां भी गुम हो गयीं। हमको अच्छे से पता था कि चाबियां हमारे ही कमरे में हैं। लेकिन हमने पहले अपने दोस्तों के कमरे, मेस, दफ़्तर, गाड़ी, सड़क और तमाम दीगर जगहों पर कस के खोजाई की। जब नहीं मिली तो कमरे के कोने-अतरे तला्शने का काम शुरु किया। चाबी जरूरी थी सो वनवासी राम जैसे बेकल होते हुये सबसे पूछते जा रहे थे:
हे कूड़े,करकट,मकड़ी की जाली,
तुम देखी मेरे ताली की ताली?
चाबी तो नहीं मिली लेकिन एक कोने में बेचारा मोबाइल कवर बरामद हुआ। असहाय सा पड़ा था। कित्ती छिपकलियां उस पर गुजरीं होंगी। कित्ती चुहियों ने उस पर कबड्डी खेली होगी। गर्द, गुबार में बेचारे के हाल रुपये जैसे हो गये थे। हमने उसको प्यार से उठाया। पहले गंदे कपड़े से, फ़िर साफ़ कपड़े से और फ़िर शर्ट से पोंछ कर सहलाया। उसके हाल कभी कड़क अफ़सर रहे और अब सालों से जेल में बंद बंजारा जी हाल सरीखे बेहाल लगे। हमने उसको लाड़ से सहलाकर मोबाइल उसमें धर लिया। कभी मेले में बिछुड़ गये भाई जब वर्षों बाद मिलते हैं तो एक-दूसरे के गले मिलकर मारे खुशी के रोने लगते हैं वैसे ही मोबाइल और कवर आपस में मिलकर भावुक हो गये। उनका प्रेम देखकर आंखें गीली हो गयीं।
इसके बाद तो फ़िर चाबी भी मिल गयी। लैपटॉप के नीचे दबी हुई थी। इसके पहले पिछले हफ़्ते मोटर साइकिल की चाबी भी मिल चुकी जो और पहले खोयी थी।
ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है। चीजें खो जाती हैं। खोयी रहती हैं। खोजने पर नहीं मिलती। फ़िर कोई दूसरी चीज खोजने पर तीसरी मिल जाती है। चौथी खोजने पर आठवीं। कभी-कभी तो यह भी होता है कि तमाम वो चीजें भी मिलती हैं जो कभी खोयी नहीं होती हैं। लेकिन मिलने पर पता चलता है कि ये तो बहुत दिन से मिल नहीं रही थी।
अब जब इस समय यह लिख रहा हूं तो तमाम चीजें याद आ रही हैं जो काफ़ी दिन से मिल नहीं रही हैं। इनमें से मेरी हाईस्कूल की मार्कशीट भी है, पत्नी का पैन कार्ड है और भी कई चीजें हैं। ये खोई जरूर हैं लेकिन यह भरोसा है कि घर में ही कहीं हैं। मिल जायेंगी। आज नहीं तो कल।
यह तो अपने स्तर की बात हुई। देश के बारे में अगर देखा जाये तो कौन सोचता होगा कि देश के स्तर पर क्या-क्या खोया है? रुपये की कीमत, दुनिया में साख, आत्मनिर्भरता का भाव, आगे बढ़ने की ललक सभी कुछ तो कहीं खोया-खोया सा है। क्या पता ये सब कब वापस आयेंगे। कभी आयेंगे भी या नहीं।
लगता तो है कि एक न एक दिन सब वापस आयेगा। आयेगा और साथ में और भी बहुत कुछ लायेगा।
क्या आपको भी ऐसा लगता है?

8 responses to “खोये सामान का मिलना”

  1. amit kumar srivastava
    मोबाइल कवर का तो पता नहीं आज हिदुस्तान अखबार में आपका एक लेख जरूर मिला है । और हाँ ,मिला मोबाइल कवर और फोटो जूते की ,रखरखाव कुछ गड़बड़ है ।
    amit kumar srivastava की हालिया प्रविष्टी..“शीर्षक कैसा हो…….”
  2. डॉ अजय कुमार
    रोजमर्रा ,आम जिन्दंगी में ऐसा मेरे साथ भी होता रहता हैं |रोज सोचता हूँ ,आज से ध्यान रखूँगा ,पर फिर अगले दिन से व्ही सब कुछ |
  3. सतीश सक्सेना
    कुछ चीजें तो याद अवश्य रखे रहना …
    मंगलकामनाएं !
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..इतने भी मगरूर न हों, सम्मान न दें , इन प्यारों को -सतीश सक्सेना
  4. भारतीय नागरिक
    खोयी हुई इंसानियत ही वापस मिल जाये हम लोगों को।
    भारतीय नागरिक की हालिया प्रविष्टी..क्या हमारे यहाँ सही अर्थों में लोकतन्त्रिक व्यवस्था लागू है?
  5. arvind mishra
    “ब्लैकबेरी के मोबाइल का ये कवर पहले भी खो चुका था एक बार।”
    अच्छा अच्छा तो यह पोस्ट इसलिए भी है कि तनिक रौब गांठा जा सके कि हम कोई टटपुजिया हिन्दी ब्लॉगर नहीं बल्कि ब्लैक बेरी रखता हूँ ! :-)
    वैसे ब्लैकबेरी कई ब्लॉगर रखते हैं :-)
    वैसे जरा सावधान रहिएगा किसी की अमानत जवानी मत कहीं खोवा दीजियेगा -नहीं तो उसे इकहरे दुहरे भरेपूरे में खीजने का झंझट मोल लेना होगा -आसाराम जी का देख ही रहे हैं :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..गोरे रंग पर ना गुमान कर.…
  6. प्रवीण पाण्डेय
    कवर आदि के चक्कर में नहीं पड़ते हैं, अधिक चीजें होने से मन उलझा रहता है।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..पर्यटन – आनन्द का कार्य
  7. Abhishek
    हर फ़ोन को एक दिन राणा सांगा हो जाना है… ये उपमा बहुत जमी :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..संयोग
  8. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] खोये सामान का मिलना [...]

Saturday, August 31, 2013

देश का भविष्य कक्षा के बाहर

http://web.archive.org/web/20140420082345/http://hindini.com/fursatiya/archives/4694

देश का भविष्य कक्षा के बाहर

शिवमबच्चे का नाम शिवम है। पिता का नाम छोटे। मां का नाम पता नहीं। वो बूढ़ा माता की बिटिया है। बूढ़ा माता का भी कोई नाम है कि नहीं पता नहीं। एक सामान्य बात है। अपने यहां मां लोगों के नाम नहीं होते। मां के नाम कवितायें होती हैं। शेर होते हैं। शायरी होती है। नाम नहीं होते। नाम से लय बिगड़ती है, कविता, शेर और समाज की भी।
बच्चा कक्षा पांच में पढ़ता है। उसको स्कॉलरशिप मिलनी है। उसके लिये फ़ार्म भरवाने आया है। मां साथ में है। बच्चा दस साल कुछ महीने का है। बताता नहीं तो यही लगता कि अभी कक्षा एक-दो में होगा। पहले स्कूल में ही वजीफ़ा मिल जाता था। अब सरकार सीधे खाते में देगी। सरकार अब किसी पर भरोसा नहीं कर पाती। वजीफ़ा सीधे खाते में भेजेगी। सीधे खाते में भेजने से वजीफ़ा पाने वाले को भी आसानी होगी। लेकिन बच्चे की मां झल्ला रही है। कह रही है- पहिले सीधे मिल जाति रहैं। अब जानै कौन-कौन झमेला!

बच्चा स्कूल छोड़कर फ़ार्म भरने के लिये इधर-उधर घूम रहा है। स्कूल वालों ने फ़ार्म थमा दिये हैं। भराकर लाओ। धीरे-धीरे स्कूल वाले भी अनपढ होते जा रहे हैं।
फ़ार्म भरने के लिये नाम, कक्षा के अलावा और कोई विवरण पता नहीं न बच्चे को न उसकी मां को। बच्चा पांचवीं में पढ़ता है। उसको अपनी जन्मतिथि नहीं पता। घर का पता नहीं पता। उसको कुछ नहीं पता अपने नाम के सिवाय। साथ के सब कागज प्लास्टिक के थैले से उलटने के बाद भी विवरण नहीं मिलते। वे लौट जाते हैं। अगले दिन आयेंगे सब ’कागज’ लेकर। वजीफ़े के लिये बैंक का खाता खुलना जरूरी है।
आज बच्चा फ़िर अपनी अम्मा के साथ सब कागज लेकर आता है। अभिभावक की जगह पर पिता के अलावा कोई और नाम है। पता चला नाना हैं। वजीफ़े के तीन सौ महीने मिलने हैं। खाता खुलने का फ़ार्म सब अंग्रेजी में है। कुछ कालम भरने के लिये मैं अपने बैंक वाले भाईसाहब से पूछता हूं। फ़ार्म भरते हुये और भी बातें होती रहती हैं।
सरनेम पर पता चलता है कि कुरील हैं। बच्चे की मां बताती है- कुरील लिखत हन, चमार जाति है।
मैं बैंक फ़ार्म में केवल बच्चे का नाम और पिता का नाम भरता हूं।
पांचवी में पढ़ने वाले शिवम से मैं पहाड़े सुनाने के लिये कहता हूं। सुना नहीं पाता। नाम लिख लेता है। बताता है कोचिंग पढ़ने जाता है। आज ज्यादातर बच्चे दो जगह पढ़ते हैं। दो तरह के स्कूल हो गये हैं। एक स्कूल में नाम लिखाने, वजीफ़ा, मिड डे मील, लैपटॉप और डिग्री वगैरह के लिये। दूसरा पढ़ने के लिये। सफ़ल होने के लिये दोनों में जाना अनिवार्य होता जा रहा है।
बता रही हैं बच्चे की मां कि शिवम का एडमिशन उसकी मौसी ने कराया था। मौसी मतलब उसकी छोटी बहन। आई.टी.आई. की थी वो। घर में आने वाले एक लड़के के साथ भागकर शादी कर ली। घर वालों ने पुलिस में रिपोर्ट की। लड़की बालिग थी। उसने कहा उसने अपनी मर्जी से शादी की। घर वालों ने कचहरी में ही लड़की और उसके पति को बहुत मारा। लड़की से सम्बन्ध खतम कर लिये। लड़की उनके लिये मर गयी। अपनी मर्जी से शादी करने वाली लड़कियों की नियति ही होती है घर वालों के लिये मर जाना।
लड़की घर वालों के लिये मर भले गयी हो लेकिन उसकी बातें याद आती हैं घर वालों को। फ़ार्म भराने आयी लड़के की मां बताती है- वो यहिते कहिके गयी है कि बबुआ पढ़ाई न छ्वाड़ेव। खूब पढ़ेव।
हमने पूछा कि अपनी मर्जी से शादी कर ली तो कौन गुनाह किया? लड़के की मां बताती है -“बिरादरी में नाक कट गयी। बता के करती तो धूमधाम से शादी करते। भाग के करी तो इज्जत चली गयी। फ़ार्म भरने के बहाने चली गयी।”
बताते हुये मुझे अपनी चचेरी बहन याद आ गयी। वो अपनी मर्जी से एक लड़के से शादी करना चाहती थी। इस कारण उसने कई लड़कों से शादी मना कर दी। घर वालों को जब पता चला तब सब एकदम अड़ गये कि शादी उस लड़के से तो नहीं करेंगे। बहन भी अड़ गयी- शादी उसी से करेंगे। आखिर में उसकी मर्जी से शादी की व्यवस्था हुई। पिता और उसके समर्थ भाई शादी में नहीं शामिल हुये। उनके लिये लड़की मर चुकी है। किसी के लिये भले वह मर चुकी हो लेकिन फ़िलहाल वह अपने पति के साथ खुश है।
यह पोस्ट लिखते हुये बच्चा दुबारा आया फ़ार्म दिखाने। उसकी फोटू खींची। ऊपर उसी की फ़ोटो है। मोबाइल में दिखाने पर बताया कि टेड़ी है। फ़िर दूसरी खैंची। अब वो बैंक जा रहा है। फ़ार्म जमा करने। वजीफ़े के लिये स्कूल छोड़ा बच्चे ने दो दिन। कैसे पहाड़े याद कर पायेगा? आज हालांकि वह कुछ सहज था। बारह तक पहाड़े भी सुनाये। आगे नहीं आते।
पूछने पर बच्चा मां, नानी और मौसी के नाम भी बताता है। नाम तो सबके होते हैं। लेकिन हम उनको भूल जाते हैं। भूलते क्या , याद ही नहीं करते। जरूरत ही नहीं पड़ती।
टी.वी. पर गिरफ़्तारी से भागते आशाराम, पकड़े गये भटकल, गिरते रुपये और संसद में अमर्यादित बहस के किस्से आ रहे हैं। एक चैनल करीना और सैफ़ की मोहब्बत के किस्से बयान कर रहा है।
मन किया कि बच्चे से पूछे कि इस सब के बारे में उसको क्या जानकारी है। लेकिन बच्चे के चेहरे पसरी मजबूरी और जिम्मेदारी के भाव देखकर सहम गया मन।
ये बच्चा हमारे देश का भविष्य है। देश का भविष्य वजीफ़े के लिये कक्षा छोड़कर बैंक, स्कूल और इधर-उधर भटक रहा है।
अपन भी सब निर्लिप्त भाव से लिखते हुये पूछ रहे हैं -आपका क्या कहना है इस मसले में।

12 responses to “देश का भविष्य कक्षा के बाहर”

  1. विवेक रस्तोगी
    सरकार यही तो चाहती है कि बचपन भी जिम्मेदार हो जाये, जिससे विद्यालय में शिक्षा मिले ना मिले परंतु विद्यार्थी को कम से कम यह पता होना चाहिये कि बैंक में कैसे काम होता है और कौन से कागज की जुगाड़ कहाँ से होती है.. धन्य है हमारे देश के भविष्य के नौनिहाल !!
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..म्यूचयल फ़ंड में डाइरेक्ट या रेग्यूलर प्लॉन किसमें निवेश करें ?(Where to Invest Mutual fund Direct or Regular plan)
  2. archanachaoji
    बहुत दुखद स्थिती होती जा रही है , …
    archanachaoji की हालिया प्रविष्टी..अगर हम ठान लें मन में …..
  3. भारतीय नागरिक
    आजकल पढ़ने से कुछ नहीं हासिल, बिना पढ़े जरूर पढ़े लिखों पर चाबुक चलाते दिखाई देते हैं.
  4. shakuntala sharma
    यह सच- मुच चिन्तनीय विषय है कि इस देश का बचपन महफूज़ नहीं है , वह कूडा बिन रहा है ।
  5. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    मेरा कहना यहा कि यह ‘चिंतित व्यंग्य’ है।
  6. Kajal Kumar
    :(
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- सो रहे थे क्‍या ?
  7. प्रवीण पाण्डेय
    भविष्य है वह देश का, आपके पास आ गया है, सही दिशा में बढ़ जायेगा।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..पर्यटन – एक शैली
  8. कट्टा कानपुरी असली वाले
    आप अक्सर सहमे सहमे रहते हो प्रभु …?
    वे भी दिन थे,जब चलने पर,धरती कांपा करती थी,
    मगर आज,वो जान न दिखती,बस्ती के सरदारों में ! -सतीश सक्सेना
    कट्टा कानपुरी असली वाले की हालिया प्रविष्टी..हमने हाथ लगाकर देखा,ठंडक है, अंगारों में -सतीश सक्सेना
  9. Madan Mohan saxena
    सुन्दर ,सरल और प्रभाबशाली रचना। बधाई।
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/
  10. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
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