Sunday, August 25, 2013

कन्ज्यूमर फ़ोरम में भगवान

http://web.archive.org/web/20140403135323/http://hindini.com/fursatiya/archives/4655

कन्ज्यूमर फ़ोरम में भगवान

धर्मआजकल हमारे एक मित्र कन्ज्यूमर फ़ोरम के चक्कर काट रहे हैं।
उन्होंने कहीं पढ लिया है :
जब-जब होय धरम की हानी,
बाढहिं असुर अधम अभिमानी।
तब-तब धरि प्रभु मनुज शरीरा,
हरहिं दयानिधि सज्जन पीरा।
जबसे ये पढा है उन्होंने तबसे कन्ज्यूमर फ़ोरम में भगवान के खिलाफ़ शिकायत लिखाने के पीछे पड़े हुये हैं। उनकी शिकायत है – रोज इत्ता धरम नष्ट हो रहा है, सज्जन लोग परेशान हो रहे हैं। मंहगाई आसमान छू रही है। लूटपाट हो रही है। गुंडागर्दी बढ़ रही है। इस सबके बाद भी भगवान अवतार नहीं ले रहे हैं।
कन्जूमर फ़ोरम वाला हालांकि खुद हलकान है लेकिन भगवान के खिलाफ़ कोई कार्यवाही करने से हिचक रहा है। वो जानता है कि भगवान सर्वशक्तिमान हैं। लीला के बहाने किसी को भी दो मिनट में निपटा सकते हैं। वह जानता है कि अपने देश का कानून वैज्ञानिक चेतना संपन्न हो गया है। सापेक्षता के सिद्धान्त के आधार पर काम करता है। अपराधी को आर्थिक, राजनैतिक हैसियत देखकर कार्रवाई करता है। थानेदार किसी शरीफ़ को भले दो मिनट में बिना किसी जुर्म के अंदर कर दे लेकिन किसी लफ़ंगे के खिलाफ़ कार्रवाई करने से पहले ’नेताजी’ से उसके संबंध की पड़ताल करता है। फ़िर यहां तो मामला सर्वशक्तिमान के खिलाफ़ कार्रवाई का है। वह मामला टालता है। भगवान का वकील बन जाता है।
भगवान से तुमने कौन सी खरीददारी की है जो तुम उनके खिलाफ़ कन्ज्य़ूमर फ़ोरम में शिकायत कर रहे हो? कन्ज्यूमर फ़ोरम वाला प्रमाण मांग रहा है।
खरीददारी नहीं भाई सर्विस कान्ट्रैक्ट किया है भाई। प्रसाद चढ़ाया है। ये देखो रसीद। प्रसाद तो इसीलिये चढाते हैं कि जहां धरम की हानि होगी वहां भगवान अवतार लेंगे। लेकिन यहां तो धर्म तबाह हो रहा है पर भगवान अवतार ले ही नहीं रहे है।
भगवान का काम अब बहुत बढ़ गया है। भगवान ने खुद आने की गारन्टी जब ली थी तब उनका काम बहुत इत्ता फ़ैला नहीं था। तब की बात और थी। जहां शिकायत मिलती थी खुद दौड़े चले जाते थे। एक जगह तो नंगे पैर भागे चले गये। किसी ग्राह ने पकड़ लिया था गज को। पुकार सुनते ही चप्पल उतार के भागे। गज को बचाया ग्राह से। गज से शिकायत निवारण रजिस्टर पर दस्तखत लिये। दुनिया भर के ग्रंथों में उसकी इंट्री करायी। उसी से उनकी इमेज बनी। काम बढ़ा। अब काम इत्ता बढ़ गया है कि सब जगह जाना संभव नहीं। इसलिये जगह-जगह उन्होंने अपने सर्विस सेंटर खोल रखे हैं। हर मोहल्ले में कई शाखायें हैं।
“मोहल्ले में सर्विस सेंटर ? हमें तो कहीं दिखा नहीं। ” हमारे मित्र हक्के कम बक्के ज्यादा हो गये।
अरे आप शिकायत करने की जिद में अंधे हैं तो कैसे दिखेगा? जगह-जगह फ़ालतू पड़ी जमीन पर कब्जा करके जो मंदिर बने हैं- वही तो हैं सर्विस सेंटर। आप जाइये वहां अपनी अर्जी लगाइये। आपकी समस्या हल हो जायेगी। -उपभोक्ता क्लर्क ने बताया।
लेकिन जगहों पर कब्जा करके मंदिर बनाने वाले गुंडे हैं। भगवान ने उन्हें कैसे अपना एजेंट बनाया भाई? -मित्र आश्चर्य चकित हुये।
अरे जब काम बढ़ता है तो गुंडे भी रखने पड़ते हैं भाई। अभी दो चैनलों ने अपने सैकड़ों पत्रकारों को निकाला। गुंडे लगा रखे थे इस्तीफ़ा लेने के लिये। गुंड़े न होते तो पत्रकार जाते भला?
लेकिन मंदिरों, आश्रमों में हत्या, बलात्कार होते हुये भगवान देखते नहीं क्या? वे उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते?
अरे आप प्रभु की स्थिति समझो भाई। आजकल भगवान की हालत गठबंधन सरकार के मुखिया सरीखी हो गयी है। महंत, मठाधीश स्वयं उनके एजेंट बन जाते हैं। उनके पास लाखों भक्त होते हैं। इन छुटभैये स्वयं भू भगवानों के खिलाफ़ अगर भगवान कोई कार्रवाई करते हैं तो भगवान से समर्थन वापस ले सकते हैं। भगवान की सरकार गिर सकती है। इसलिये भगवान बेचारे चुपचाप देखते रहते हैं।- उपभोक्ता फ़ोरम क्लर्क कायदे से समझाने लगा।
अगर ऐसा ही है भगवान अपने पद से इस्तीफ़ा क्यों नहीं दे देते- मित्र के चेहरे पर भगवान के लिये सहानुभूति उपजी?
अरे ये लोकल भगवान लेने दें तब न। किसी को अपना धंधा थोड़ी बन्द कराना है। भगवान की नियति है सब कुछ चुपचाप होते देखना। टुकुर-टुकुर ताकना। प्रसाद ग्रहण करना और आशीर्वाद देना। इससे अधिक कुछ नहीं उनके हाथ में।
और ये उनकी गारन्टी कि जब-जब धर्म की हानि होगी तब-तब अवतार लेंगे। सज्जनों का कष्ट हरेंगे?
वो गारन्टी तो पूरी हो रही है। जगह-जगह भगवान ले रहे हैं। हर तरह के कष्ट के लिये भगवान अवतार ले रहे हैं। सज्जनों के कष्ट दूर हो रहे हैं। अगर कष्ट दूर न हो रहे होते तो भगवानों की इत्ती डिमाड न होती। उनके खिलाफ़ शिकायत लिखाने से पहले आप सोच लीजिये कि कहीं आप उनकी मानहानि तो नहीं कर रहे। कहीं इलाके किसी स्वयंभू भगवान की नजर में आपकी शिकायत आ गयी तो फ़िर शायद आपको भगवान भी न बचा न पायें।
मित्र अपनी शिकायत समेटकर वापस लौटे हैं। वे अपना अनुभव मुझे सुना रहे हैं हमको उसी समय बगल के घर से हो रहे अखंड रामायण का पाठ सुनाई दे रहा है-
“जब-जब होय धरम की हानी”!
मित्र हमसे पूछ रहे हैं आप बताइये क्या किया जाये?
हम आपसे पूछ रहे हैं आपकी राय क्या है?

11 responses to “कन्ज्यूमर फ़ोरम में भगवान”

  1. रवि
    वैसे, देखा जाए तो भगवान ही आजकल कंजूमर फ़ोरम / सर्वोच्च न्यायालय के चक्कर लगा रहा है – उसे शिकायत है कि उसके भक्त उसका नाम लेकर, और भगवान और धर्म की आड़ लेकर तमाम प्रपंच, राजनीति, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, बलात्कार इत्यादि सबकुछ तो कर रहे हैं. इस पर रोक लगाई जाए!
    पर, शायद भगवान की कोई नहीं सुन रहा!!!
    रवि की हालिया प्रविष्टी..हिंदी के कवियों! जरा मात्रा गिनकर तो कविता करो!!!
  2. देवांशु निगम
    सर्विस सेंटर्स में भी कम्पटीशन है , हमारे यहाँ आइये | तुरंत समाधान पाइए | मुझे मंदिर जाना अच्छा लगता है | ऑफिस वाक् करके जाता हूँ, रास्ते में पड़ता है एक मंदिर , हाथ जोड़ता हूँ , अक्सर शाम को आरती हो रही होती है तो रुक जाता हूँ |
    पर पिछले दिनों पता चला आरती कैंसल कर दी गयी , काहे की कोई महापुरुष भगवान की पूजा कर रहे थे | पहले सुनते थे ये हनुमान मंदिर है, ये शिव जी का मंदिर है यहाँ शनिदेव का मंदिर है | अब सारे भगवान एक ही जगह ला दिए गए हैं | है तो ये किसी एक भगवान का ही मंदिर , पर बाकी भी अवेलेबल हैं |
    किसी हॉस्पिटल टाइप की सिचुएशन है , जैसे किसी हॉस्पिटल में वैसे स्पेसिअलिटी तो ह्रदय रोग की है पर बाकी का इलाज़ भी हो जाता है |वैसे जैसे ओह माई गाड में परेश रावल का डायलोग था “भगवान का मल्टीप्लेक्स खोल रखा है ” |
    मैं भगवान को मानता हूँ | पर ढकोसले मुझे अच्छे नहीं लगते | मंदिर भी जाता हूँ और जो कुछ बतियाना होता है डायरेक्ट भगवान से बतिया लेता हूँ | किसी सेल्फ-क्लेम्ड सेल्स मैन की मुझे ज़रूरत नहीं लगती है |
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..१५ अगस्त का तोड़ू-फोड़ू दिन !!!
  3. प्रवीण पाण्डेय
    उनको भी इतना अधिक भ्रमित और हताश कर दिया है कि सोचते होंगें कि इनका तो यह रोज़ का काम हो गया है, काहे एक अवतार बर्बाद किया जाये।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..नाम, शब्द, रूप
  4. भारतीय नागरिक
    काश, न्यायाधीश की ही भूमिका निभा लेते भगवान.
    भारतीय नागरिक की हालिया प्रविष्टी..क्या हमारे यहाँ सही अर्थों में लोकतन्त्रिक व्यवस्था लागू है?
  5. Abhishek
    आपका ब्लॉग मेरे ही ब्लॉग की तरह कुछ नेटवर्क से खुलता नहीं ! ‘अननॉन डोमेन’ कह देता है. तो हम फीड में ही पढ़ पा रहे हैं. कमेन्ट कर नहीं पाते ! अजीब समस्या है…. कोई हल न मिला मुझे भी.
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..खलल दिमाग का !
  6. सतीश सक्सेना
    भगवान् से आपकी शिकायत करनी पड़ेगी महाराज … ??
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..कौन किसे सम्मानित करता,खूब जानते मेरे गीत -सतीश सक्सेना
  7. दीपक बाबा
    आज भगवान् कंज्यूमर फोरम में हैं….
    कल कोई शरारती तत्व दिल दिमाग गुर्दे की ही गारंटी मांग ले तो ??
    दीपक बाबा की हालिया प्रविष्टी..सब मिथ्या… सब माया… सब बकवास/गल्प….
  8. arvind mishra
    कुछ ब्लागिंग स्लागिंग टाईप भी लिखा करिए न ..थोडा नीचे उतरिये भगवान/ भगवती ज्यादा ऊपर नहीं मिलते !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..गोरे रंग पर ना गुमान कर.…
  9. Anonymous
    बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं… सुन्दर चित्रांकन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena69.blogspot.in/
  10. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] कन्ज्यूमर फ़ोरम में भगवान [...]
  11. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
    “सेकुलर” देस में भगवान काहे अवतार लिहीं भइया ! और जब हम सब धरमनिरपेक्ष हैं तो धरम की कैसी हानि ?

Friday, August 23, 2013

खेलों में फ़िक्सिंग रोकने के सुगम उपाय

http://web.archive.org/web/20140401072829/http://hindini.com/fursatiya/archives/4344

खेलों में फ़िक्सिंग रोकने के सुगम उपाय

पिछले हफ़्ते मीडिया पर आई.पी.एल. के फ़िक्सिंग की किरपा हुयी। घोटाले ने दर्शन दिये। अफ़रा-तफ़री मच गयी। फ़िक्सिंग पर अंकुश लगाने के उपाय सोचे जाने लगे। गोया फ़िक्सिंग कोई हाथी हो और अपन कोई महावत।
महावत भी अंकुश का इस्तेमाल कौन हमेशा करता है? महावत के लिये तो हाथी और अंकुश दोनों जरूरी हैं। जब हाथी पकड़ से बाहर जाता दिखता है तब धीरे से अंकुश छुआ देता है। हाथी जरा सा ठहरता है। महावत अंकुश हटा लेता है। हाथी फ़िर अपनी चल देता है। मदमस्त। यही हाल फ़िक्सिंग का होगा।
खेलों में फ़िक्सिंग पर रोक का कानून तो बन ही रहा है। वह भी पड़ा रहेगा एक कोने में। कानून वाले भी शामिल हो जायेंगे फ़िक्सिंग में। फ़िक्सिंग और धड़ल्ले से होगी जैसे शराब बंदी वाले इलाकों में दारू ज्यादा खपती है।
फ़िक्सिग रोकने के लिये केन्द्रीय सतर्कता आयोग की रोटेशन वाली इस्कीम सबसे मुफ़ीद रहेगी। केंद्रीय सतर्कता आयोग का मानना है कि संवेदनशील पदों पर तीन साल में बदली कर देने से भ्रष्टाचार कम होने की गुंजाइश होती है। तीन साल हुये कि आदमी बदल दिया। आयोग मानता है कि भ्रष्टाचार करने के लिये संपर्क बनाने में समय लगता है। तीन साल में संपर्क बन जाते हैं। तीन साल बाद बदल देने से गुंजाइश कम होती है करप्शन की।
लेकिन होता यह है कि आदमी को तीन साल लगते हैं काम सीखने में। सही गलत समझने में। समझ में आने तक अगला न जाने कित्ती गड़बड़ियां अनजाने में कर चुका है। जबकि करप्शन करने वाला आते ही शुरु हो जाता है। बहरहाल। आइये देखते हैं कि इस रोटेशन नियम का खेल की फ़िक्सिंग रोकने में कैसे उपयोग किया जा सकता है।
सुझाव यह है कि हर मैच के पहले खिलाड़ी बदल दिये जायें। क्रिकेट के खिलाड़ी कबड्डी में, कबड्डी के हाकी में, हाकी के फ़ुटबाल में, फ़ुटबाल के खो-खो में खिलाये जायें। किसी को टास के पहले तक न पता हो मैच में खेलेगा कौन? दिल्ली में क्रिकेट मैच होना है तो बंगाल की हाकी टीम, केरल की नौकायन टीम, पंजाब की कबड्डी टीम के खिलाड़ी रवाना किये जायें। उड़ीसा, म.प्र. और राजस्थान के खिलाड़ी वहां पहले से ही मौजूद रहें। ऐन खेल के पहले कोई भी ग्यारह खिलाड़ी उतार दिये जायें मैदान में। इससे खेल में अखिल भारतीयता भी बनी रहेगी, अनेकता में एकता भी रहेगी।
कमेंट्रर कमेट्री करते हुये कहेगा इस समय पिच पर मौजूद हैं पश्चिम बंगाल के मशहूर मिडफ़िल्डर फ़लाना प्रसाद। मोहन बागान तरफ़ से खेलते हैं। इस गेंद पर उन्होंने बल्ला चलाने की कोशिश की लेकिन पैर ज्यादा तेजी से चला। शायद वे गेंद को आदतन पैर से हिट करना चाहते थे। वो तो गनीमत कि गेंद फ़ेंकने वाले खिलाड़ी लखनऊ के मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी थी और उन्होंने विकेट को नेट समझकर गेंद ऐसे उछाली जैसे वे सर्विस कर रहे हों। गेंद विकेट के पीछे पहुंच गयी लेकिन किसी ने कोई रन लेने की कोशिश नहीं की।
किसी सीन में ऐसा होगा कि गेंद हवा में उछलेगी तो खिलाड़ी उसको कैच लेने की बजाय तेजी से पीछे जाकर उसको अपने पैर पर रोकेगा। क्योंकि खिलाड़ी मूलत: फ़ुटबालर है। कैच लेने में उसको डर है कि ’हैंडलिंग द बॉल’ हो जायेगा। पैर से ड्र्बिलिंग करते हुये विकेट की तरफ़ भागेगा -गोल जैसा कुछ करने के लिये।
पता चला फ़ील्डिंग के लिये क्रिकेट की गेंद के पीछे भागते किसी खिलाड़ी उसई की टीम का खिलाड़ी लपक के दबोच लेगा और फ़ील्ड पर पटक के उसके सीने में चढ बैठेगा क्योंकि वो मूलत: पहलवान है। फ़ील्डिंग भी कश्ती वाले अंदाज में ही करेगा।
हमें पता है कि आप कहेंगे कि इस तरह से तो टीम हमेशा हारती रहेगी।
लेकिन जहां आप यह कहेंगे कि हम फ़ौरन पलट के पूछ लेंगे – आपको खेल से मतलब है कि हार-जीत से? फ़िक्सिंग रोकना है कि जीतना है? फ़िक्सिग रोकने के लिये जीत के लालच पर विजय पानी होगी। और सच पूछा जाये तो बिना फ़िक्सिंग के ही कौन जीतते रहते थे। कित्ते मेडल पाये ओलम्पिक में आज तक? तो हमको कहानी न सुनाओ। खेलों की मिली जुली टीम बनाओ, खेलों को फ़िक्सिंग से बचाओ।
फ़िक्सिंग में आजकल मोबाइल का बहुत प्रयोग होता है। उसका भी उपाय है। एक उपाय तो ये है कि जहां खिलाड़ी रहें वहां मोबाइल जैमर लगा दिये जायें। खिलाड़ियों को अपने साथ जैमर लेकर चलना अनिवार्य कर दिया जाये।
दूसरा उपाय यह है कि खिलाड़ियों को होटल में घुसते ही मोबाइल बांट दिये जायें जैसे पुराने जमाने में हवाई जहाज में बैठते ही उड़नबालायें टाफ़ियां बांटती थीं। उनको ऐसे मोबाइल दिये जायें जिनके नंबर उनको भी पता न हों। एक मोबाइल से एक बार ही बात हो सके। इसके बाद मोबाइल चुनाव जीते हुये जनप्रतिनिधि की तरह नाकारा हो जायें।
मोबाइल के नंबर जब किसी को पता नहीं होंगे तो फ़िक्सिंग मुश्किल भी काम हो जायेगा। पता चला कि फ़िक्सिंग कराने वाला किसी बॉलर को वाइड बॉल करने के लिये फ़िक्स करने के लिये फ़ोन करे तो वो किसी पहलवान के पास पहुंचे। फ़िक्सर कहे कि उन्नीसवें ओवर में वाइड बॉल करना है। खिलाड़ी बताये कि भाई अपन का फ़ेवरिट तो धोबी पाट है। कोई फ़िक्सर कहे कि गेंद को चार रन के लिये हिट करना है तो कोई शतरंज का खिलाड़ी बताये कि भाई चार मोहरे बचे हैं दोनों तरफ़ तो मैं तो बाजी ड्रा ही कराना पसंद करूंगा।
फ़िलहाल तो इन उपायों पर अमल किया जाये। फ़िक्सिंग का बुखार कुछ न कुछ कम जरूर होगा।
अगर आपको इन उपायों की सफ़लता में कोई शंका है तो कोई अनहोनी बात नहीं है। शंका तो अपन को भी है। लेकिन आपको अपना समझ के सलाह दे रहे हैं कि आप ये बयान न जारी करने लगियेगा कि इस उपाय में ये कमी है उस उपाय में वो कमी है। जहां आपने ये सयानापन दिखाया पुलिस आपको पकड़कर ले जायेगी आपके मुंह में तैलिया पलेट के। आप दो मिनट में प्राइम टाइम के आइटम बन जायेंगे-अभी-अभी आ रही ताजा खबर बनकर।
फ़िर न कहियेगा पहले बताया नहीं। :)

2 responses to “खेलों में फ़िक्सिंग रोकने के सुगम उपाय”

  1. ajit gupta
    इतनी मशक्‍कत करने से बेहतर है कि सट्टेबाजी को ही ओपन कर देना चाहिए। जिसे देखना हो वे देखें नहीं तो अपने काम धंधे पर लगे।
  2. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] खेलों में फ़िक्सिंग रोकने के सुगम उपाय [...]

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Wednesday, August 21, 2013

हमें तो लूट लिया मिल के मॉल वालों ने

http://web.archive.org/web/20140403135311/http://hindini.com/fursatiya/archives/4639

हमें तो लूट लिया मिल के मॉल वालों ने


वाल मार्ट
जब मॉल आने का हांका हुआ था तो लग रहा था कि उसके आते ही बाजार में रामराज्य स्थापित हो जायेगा। लेकिन मॉल का हिसाब-किताब तो ऐसा गड़बड़ निकला कि उसके सामने पंसारी भी पानी भरे।
अब आप कहेंगे कि ऐसा कैसे कह सकते हैं आप? त पहिली बात त ई है कि हम कुछ कह नहीं रहे हैं। लिख रहे हैं। अपना अनुभव बता रहे हैं। पढियेगा और मुलाहिजा फ़रमाइयेगा।
हुआ यह कि हमारे इहां कानपुर में कई मॉल हैं। दो ठो घर के पास हैं। दो-तीन घर से दूर हैं। सबमें सामान एक्कै तरह का मिलता है लेकिन जैसे कि दूर के ढोल सुहावने माने जाते हैं वैसे ही हमारे घर में भी सबसे दूर वाला मॉल सबसे अच्छा माना जाता है। कारण भी है – वहां ज्यादा जाने की सोचते हैं, आने-जाने में ज्यादा परेशान होना पड़ता है, ज्यादा बड़ा है, पैसा ज्यादा खर्चा होता है। इस तरह कई ज्यादा जुड़े होने के चलते जब कोई बहुत उत्साहित हो जाता है तब भाग के उस वाले मॉल की तरह निकल लेते हैं।
हम बता चुके हैं कि व्यक्तिगत तौर पर मुझे शापिंग मॉल जैसी जगहें शहर में स्थित सबसे वाहियात जगहों में से लगती है। उसमें से कुछ कारण ये हैं:
  1. जो चाय बाहर तीन रुपये की मिलती है उससे कई गुना घटिया चाय शापिंग मॉल में तीस रुपये में मिलती है।
  2. मॉल में सिवाय सफ़ाई, रोशनी और एअरकंडीशनिंग के बाकी सब स्थितियां अमानवीय लगती हैं। न ग्राहक और न सेल्सस्टाफ़ किसी के बैठने का कोई जुगाड़ नहीं होता।
  3. एक ही चीज के दाम जिस तरह वहां बदलते हैं उस तरह तो जनप्रतिनिधियों के बयान भी नहीं बदलते।
ये जो तीसरा कारण है उसको मॉल वाला अक्सर डिस्काऊंट सेल के नाम से बताते हैं। जब देखो तब किसी न किसी चीज पर छूट का हल्ला मचा देते हैं।
डिकाउंट सेल भी कई तरह की होती है। कभी प्रतिशत छूट, कभी बम्पर सेल और कभी एक के साथ एक/दो/तीन फ़्री वाली। आज कल देश भी तो पूरा बाजार में बदल रहा है। कौन जाने कल को कोई इतिहास वाला पढ़ाये कि देश ने आजादी एक के साथ एक मुफ़्त वाली सेल में पायी जो कि बाद में मोलभाव करने पर एक के साथ दो फ़्री हो गयी। सेल का आकर्षण और आतंक इत्ता भीषण होता है कि आदमी वह सब खरीदने के लिये पिल पड़ता है जो उसकी जरूरत नहीं।
ऐसे ही एक दिन मॉल के डिस्काउंड ऑफ़र की बाढ़ में हमारा परिवार फ़ंस गया। हर तरफ़ छूट ही छूट। हर कपड़े के साथ दो कपड़े फ़्री। बच्चे के लिये कुछ कपड़े लेने थे। छूट इतनी कि बच्चे के कपड़े के साथ मेरे भी ले लिये गये। जबकि हम घटना स्थल पर थे भी नहीं। लेकिन हमारी नाप/नंबर तो थी। सो हमारे लिये भी कपड़े लेने का त्वरित और बोल्ड निर्णय लिया गया। निर्णय पर अमल भी फ़ौरन हो गया।
पुतलाकपड़े के मामले में तो हम मैनीक्वीन हैं। जो पहनने के लिये कहा जाता है, पहन लेते हैं। खरीदने के लिये भले भुनभुनाने का नाटक करें लेकिन खरीदे हुये कपड़े पहनने से मना करने के समय हम उसी तरह नहीं उठाते जैसे सैकड़ों पत्रकारों के निकाले जाने पर दूसरे बड़का पत्रकारों की तरह चुप रहते हैं। घर में रहकर कपड़ा खरीदने वाले की नाराजगी कौन मोल ले?
तो किस्सा कोताह यह कि जब कपड़े हमारे ऊपर चढाये गये तो हाल वही हुआ जैसा स्केच के आधार पर मुजरिम पकड़ने निकली पुलिस का होता होगा। शर्ट पहनी तो सहमते हुये पूछा कि आजकल क्या बनियाइन में भी सामने जेब और कालर फ़ैशन में हैं? पैंट चढाने पर श्रीमती जी खुद बोलीं – ये चूड़ीदार पायजामा लगता है गलती से आ गया।
बहरहाल हमेशा की तरह एक बार फ़िर हीरामन की तरह कसम खायी गयी कि बिना ट्रायल के आगे से किसी के कपड़े नहीं खरीदे जायेंगे । कपड़े बदलने के लिये वापस चल दिये। मॉल में जब पहुंचे तो हर अगला हमें शक की निगाह से देखता पाया गया।
किसी की निगाह में साफ़ लिखा दिखा -डिस्काउंट पर सामान खरीदते हो और वापस भी करना चाहते हो?
किसी की निगाहों का हिन्दी अनुवाद था- इत्ते दिन बाद वापस कैसे होगा?
एक ने कहा – बिना बिल कैसे वापस होगा। उस काउंटर पर बात कर लीजिये।
उस काउंटर वाले ने कहा- इस काउंटर पर नहीं उस पर चलिये अभी आते हैं (मतलब ठंड रख)
उस काउंटर पर संकट कटै मिटै सब पीरा वाले हनुमत वीरा को सुमरते रहे। फ़िर पता चला कि इस काउंटर पर नहीं उस काउंटर पर यह पवित्र काम होगा। आखिर में काउंटर-काउंटर भटकते हुये तय हुआ कि कपड़े बदल सकते हैं। जित्ते के कपड़े थे उत्ते का वाउचर बनवाकर (साथ में हिदायत कि खबरदार जो इत्ते से कम के कपड़े खरीदे) कपड़े लेने कपड़ों के जाम में एक बार फ़िर से धंस गये।
कपड़ों के काउंटर पर पहले तो सेल्समैन ने ठेलुहई करते हुये मौज टाइप ली कि ऐसे कैसे बिना नाप के कपड़े तौला लिये। फ़िर पसीज कर दिखाये। कमीजें और पैंट अपने साथ लेकर हम फ़िर विजेता भाव से आगे बढे।
काउंटर पर शर्टें तो बदल गयीं लेकिन पैंट का पांयचा डिस्काऊंट की झाड़ी में फ़ंस गया। पता चला कि जिस चूड़ीदार पैंट को हम वापस करना चाहते थे उसके साथ जो पैंटे ली गयीं थीं वे हमारे बेटे के लिये थीं। वो अपने साथ लेकर चला गया था। हमारी वाली फ़्री वाली थी। बताया गया कि वापसी तभी संभव है जब सब कपड़े बरामद हों। मजबूरन हम चूड़ीदार पैंट को झोले में धरकर और अपना मुंह झोले जैसा लटकाये वापस आ गये। अब उस पैंट का क्या किया जाये यह समस्या हमारे घर के लिये कश्मीर समस्या सरीखी उलझी हुई है।
हमें लगा कि मॉल से भले तो अपने मोहल्ले के पंसारी जो सामान खराब होने की शिकायत पर घर आकर वापस करते हैं। शर्मिंन्दा होने की एक्टिंग अलग से। यहां मॉल में सामान वापस करना तो अलग सॉरी/ एक्सक्यूज/वी आर हेल्पलेस तक बोल के टरका देते हैं।
जब से हमारे साथ यह हादसा हुआ हम गाते फ़िर रहे हैं- हमें तो लूट लिया मिल के मॉल वालों ने।
आपका क्या कहना है ?

21 responses to “हमें तो लूट लिया मिल के मॉल वालों ने”

  1. देवांशु निगम
    हमारे ऑफिस के पास में एक मॉल है नाम है “स्टार मॉल” | चाय पीते पीते चले जाते हैं अक्सर | गलती से शोपिंग भी हो जाती है कभी कभी | वहाँ पर १००० रूपये की खरीद पर व्हील ऑफ फोर्च्यून घुमाने को मिल रहा था , हम घुमाए तो फ्री पार्किग निकला | हमने कहा खड़े करने के लिए फिलहाल तो साइकिल भी नहीं है , का करें | बड़ी मिन्नतें की तब जाकर १५० रूपये का पिज्ज़ा डिस्काउंट कूपन मिला | वही बात हो गयी “आये थे हरि भजन को , ओटन लगे कपास ” |
    बाकी गुडगाँव में मॉल की कोई कमी नहीं है , ना शोपिंग करने वालों की | माहौल चकाचक रहता है | अपन लोग तो वीकेंड में गर्मी से बचने के लिए भी निकल लेते हैं मॉल | विंडो शोपिंग हमारी फेवरेट है :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..१५ अगस्त का तोड़ू-फोड़ू दिन !!!
  2. shakuntala sharma
    मॉल भी कोई जगह है जाने की ? जेब में चाहे जितना माल हो मुआ मॉल किसी न किसी तरह लूट ही लेता है ।मुझे तो लगता है कि उसकी आँखों में सर्च-लाइट लगा हुआ है । पैसा आप कहीं भी छिपा कर रखें , वह आप से निकलवा लेता है । मैं तो मॉल जाती हूँ तो उतना ही पैसा ले जाती हूँ जितना मुझे खर्च करना होता है और यदि पैसे कम पडे भी तो साथ में फ्रेन्ड्स तो रहते ही हैं और वे हमें उधार देने के लिए एक पैर पर खडे रहते हैं ।
  3. Alpana
    कपड़े के मामले में तो हम मैनीक्वीन हैं। जो पहनने के लिये कहा जाता है, पहन लेते हैं। ”——–
    मेनिक्विन से तुलना करना!वाह!..यह बात बहुत बढ़िया लगी.
    मॉल कल्चर ने भी आम आदमी का बजट बिगाड़ रखा है.
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..क्या बदला है अब तक? क्या बदलेगा आगे?
    1. eswami
      ये फुरसतिया जी का पुराना डायलॉग है – २००६ में हम हंस लिए इस पे .. और इस लेख में था – दोनों बच्चो के फोटो के नीचे वाले पैरा में ..
      http://hindini.com/fursatiya/archives/163
      कोइ बात नहीं!
      eswami की हालिया प्रविष्टी..कटी-छँटी सी लिखा-ई
  4. नीरज दीवान
    कंपनी से हमने एक राष्ट्र मांगा था.. उसने buy one get one free दे दिया। मज़ेदार शैली में जो विडंबनाएँ टिकाई हैं- रचना को चार चांद लग गए।
    ….खरीदने के लिये भले भुनभुनाने का नाटक करें लेकिन खरीदे हुये कपड़े पहनने से मना करने के समय हम उसी तरह नहीं उठाते जैसे सैकड़ों पत्रकारों के निकाले जाने पर दूसरे बड़का पत्रकारों की तरह चुप रहते हैं।
    ….मजबूरन हम चूड़ीदार पैंट को झोले में धरकर और अपना मुंह झोले जैसा लटकाये वापस आ गये। अब उस पैंट का क्या किया जाये यह समस्या हमारे घर के लिये कश्मीर समस्या सरीखी उलझी हुई है।
    …मॉल में सिवाय सफ़ाई, रोशनी और एअरकंडीशनिंग के बाकी सब स्थितियां अमानवीय लगती हैं। न ग्राहक और न सेल्सस्टाफ़ किसी के बैठने का कोई जुगाड़ नहीं होता।
    ग़ज़ब ढाए हो भैया.
  5. amit kumar srivastava
    हमें तो यह ‘माल’ शब्द में ही लोचा लगता है । कोई होंठ गोल कर ‘मॉल’ कहता है ,कोई शुद्ध देहाती की तरह ‘माल’ कहता है । इन शॉपिंग मॉल के आने से पहले पहाड़ों पर रमणीक स्थलों पर ‘मॉल रोड’ के प्रति जिज्ञासु रहे कि उसे मॉल रोड क्यों कहते थे ( पहले तो अनाड़ीपन में वही समझे जो सब समझते हैं …जहां माल -वो माल रोड , हमारी कोई गलती नहीं ,बचपन से रेलवे कॉलोनी में रहे , रेलवे मालगोदाम के सामने की सड़क को आज भी माल रोड कहते हैं क्योंकि वहां माल आता जाता है ) । बाद में विद्वजनो ने बताया जहां अंग्रेज घूमते थे और वहां भारतीयों का जाना वर्जित था ,वह मॉल रोड कहलाता था । अब यह शॉपिंग मॉल ….जहां अनेक दुकानों का एक बड़ा काम्प्लेक्स हो उसे ‘प्लाज़ा’ कहते हैं । अब जब प्लाज़ा और बड़ा हो जाए तो मॉल कहलाता है । पर अब इस मॉल में किसी का प्रवेश वर्जित नहीं है । बस जेब में माल होना चाहिए ऐसे मॉलों में जाने के लिए ।
    अधिकतर लोगों का अनुभव आप जैसा ही रहता है पर संकोच से चुप ही रहते हैं ।
    amit kumar srivastava की हालिया प्रविष्टी..“यादों के पिटारे से …….रक्षाबंधन “
  6. भारतीय नागरिक
    माल की बहार, शापिंग मजेदार.
    ग्राहक त्रस्त, मालिक मस्त……
    भारतीय नागरिक की हालिया प्रविष्टी..नाग ने आदमी को डसा ….
  7. प्रवीण पाण्डेय
    पूरी व्यवस्था है लूट की। एसी के लिये बहुत अधिक धन वसूल लेते हैं।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मन – स्वरूप, कार्य, अवस्थायें
  8. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    मॉल में फिलिम देखने का अनुभव भी कुछ ऐसा ही होता है जैसे जेब कटवाकर आये हों।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..सेमिनार फ़िजूल है: विनीत कुमार
  9. Rekha Srivastava
    मॉल तो हम जैसे लोगों के लिए नहीं है , लेकिन मॉल में घूमते हुए लोग कुछ अधिक ही ताने हुए दिखलाई देते हैं. बस खरीदारी में मॉल के मेंटिनेंस का पैसा जोड़ कर वसूल कर लिया जाता है. अगर पैसा बहुत ज्यादा हो तो उसे बहार के बाजार में भी खर्च कर मनपसंद चीज खरीदी जा सकती है .
    Rekha Srivastava की हालिया प्रविष्टी..स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर !
  10. arvind mishra
    ओह बनारस के माल याद आये
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..ब्लागिंग का ‘गर्भकाल’ और फुरसतिया को बधाई!
  11. सतीश पंचम
    मॉल तब बहुत काम आता है जब जोर की एक नंबर लगी हो और आस पास कहीं मुत्रालय आदि न मिले। कभी-कभी तो मॉल की बढ़ती संख्या देख लगता है सरकार जान बूझकर शौचालयों की बजाय मॉल बनवाने के लिये तरजीह देती है ताकि लोगों को शौचालय, मुत्रालय आदि के भी लाभ सर्वसुलभ हों :-)
    सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी..बनारस यात्रा 10 – समापन किश्त
  12. Swapna Manjusha
    मॉल जाईये और माल न गंवाईये, ई का बात भई ?
    इस सम्पूर्ण ग्रह-मंडल वही तो एक मात्र स्थान है, जहाँ ग्रह-ग्रसित, ग्राहक की प्रतीक्षा में ग्राह बैठे रहते हैं :)
    जब मेनिक्विन होकर गीत गा रहे हैं, मेनकिंग होकर का गज़ब करते होंगे !!:)
    Swapna Manjusha की हालिया प्रविष्टी..बुलंदियों से कुछ मंज़र, साफ़ नज़र नहीं आते हैं ..!
  13. sanjay @ mo sam kaun
    चूड़ीदार पायजामा वाली आपकी फ़ोटो तो दिखाईये.
    sanjay @ mo sam kaun की हालिया प्रविष्टी..चाच्चा बैल
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Tuesday, August 20, 2013

…और ये फ़ुरसतिया के नौ साल

http://web.archive.org/web/20140403135138/http://hindini.com/fursatiya/archives/4629

…और ये फ़ुरसतिया के नौ साल

फ़ूल
….और मजाक-मजाक में फ़ुरसतिया के नौ साल भी पूरे हुये। आज के ही दिन नौ साल पहले 20 अगस्त, 2004 को पहली पोस्ट लिखी थी। कुल जमा नौ शब्द में लिखा था:
अब कब तक ई होगा ई कौन जानता है
इन नौ शब्दों से शुरु हुई खुराफ़ात को हुये नौ साल निकल गये। अनगिनत किस्से यादे हैं इस सफ़र की। उनमें से कुछ इसके पहले की सालगिरह की कहानी बताते हुये लिखे हैं।
रवि रतलामी , जिनका लेख बांचकर हमने ब्लॉग लिखना शुरु किया , दो साल पहले साल में सौ पोस्ट लिखने का काम बताया था। पिछले साल तो साठ ही लिखे। लेकिन इस साल आज तक 93 निकाल दिये। 7 बाकी हैं। दिन बचे हैं 11 । लगता है इस साल उनका दिया ब्लॉगवर्क पूरा हो जायेगा।
इस साल अखबारों में कई लेख छपे। लोगों ने ब्लॉग से उठाकर अखबार में छाप दिये। फ़िर हमने भेजना भी शुरु किया अखवारों में इसी जुलाई से। कुछ छपे कुछ का जबाब ही नहीं आया। छपास कामना पीड़ित हम ब्लॉगर सुबह-सुबह उस अखबार को नेट पर ताकते हैं जिसमें लेख भेजा था। मतलब जिस अभिव्यक्ति के लिये ब्लॉग लिखना शुरु किये गये होंगे वह फ़िर अखबार के आसरे हो गयी।
अखबार में छपने के चक्कर में शब्द सीमा का भी ध्यान रखने लगे। पहले हजार शब्द के नीचे प्रकाशित करने से पहले सोचते थे कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन अब सोचते हैं पांच सौ हुये पब्लिश करो यार। न जाने कौन गरीब अखबार वाला ताक रहा हो इसे उठाने के लिये। :)
अपन की अखबारों में छपने की यह लालसा वैसे ही है जैसे गांव वाले घर वालों को दूध पिलाने की बजाय सुबह-सुबह डिब्बे में भरकर शहर ले जायें। अच्छा सा लिख गया तो भेज दिया अखबार में। नहीं छापेगा अखबार वाला तो पोस्ट कर देंगे हफ़्ते भर बाद ब्लॉग में।
फ़ेसबुक के चलते ब्लॉगिंग कम होने की बात होती रहती है। लेकिन ब्लॉग से जड़े लोग फ़िर-फ़िर जहाज के पंछी की तरह लौट-लौट कर ब्लॉग जहाज पर आते हैं। हम भी टहलते भले रहें दिन भर फ़ेसबुक की गलियों में लेकिन सुकून की तलाश में ब्लॉग आंगन में ही आते हैं।
ब्लॉगिंग में संकलक के अभाव में लोग एक-दूसरे का लिखा पढ़ भी कम पाते हैं। फ़ेसबुक को नोटिस बोर्ड की तरह प्रयोग करके ब्लॉग का लिंक ठेल देते हैं। लोग भी वहां ही ’लाइक’ करके फ़ूट लेते हैं। ब्लॉग तक आते ही नहीं। वो शेर है न इरफ़ान झांस्वी का:
संपेरे बांबियों में बीन लिये बैठे हैं,
सांप चालाक हैं दूरबीन लिये बैठे हैं।
सबको पता है कि ब्लॉग पर जायेंगे तो टिपियाना पड़ेगा। सो फ़ेसबुक की लिंक पर ही लाइक करके, मुश्किया का या फ़िर “टिप्पणी-टिप” देकर फ़ूट लेते हैं।
पहले ब्लॉग पर बवालिया पोस्टों पर तमाम टिप्पणियां/प्रतिटिप्पणियां होतीं थी। अब लोग बवाल निरपेक्ष हो गये हैं। बवाल उदासीन। ऐसा न होता तो सिद्धार्थ और विनीत की पोस्टों पर घमासान टिप्पणीबाजी होती। पोस्टों की बौछार हो जाती।
ब्लॉगिंग के चलते हमें ब्लॉगिंग की दुनिया के अलावा अक्सर लोग लेखक नुमा मानने लगते हैं। हमारे आसपास के ये लोग हमारा लिखा कभी कोई ब्लॉग नहीं पढते। लेकिन गाहे-बगाहे लेखक का उत्साह बढ़ाने के लिये कहते हैं- आप तो खूब लिखते हैं। अपनी कोई कविता सुनाइये। मतलब आम धारणा है अपने यहां कि लेखक है तो कविता ही लिखता होगा। :)
इस मौके पर अनगिनत वे साथी याद आते हैं जो ब्लॉगिंग के इस सफ़र के दौरान साथ रहे। कुछ अभी भी गाहे-बगाहे दिखते हैं। ज्यादातर लम्बे समय से सुसुप्तावस्था में चले गये हैं। कभी-कभी कोई पुरानी पोस्ट दिखती है उनकी तो इधर-उधर की यादगलियों में भटक लेते हैं। वे भी क्या दिन थे। :)
ईस्वामी खुद भले न लिखें अब लेकिन हमारे लिये इतजाम बराबर किये रहते हैं। पिछले दिनों हिन्दिनी साइट हैक हो गयी तो दस-पन्द्रह दिन ब्लॉग दिखना और लिखना भी ठप्प सा रहा। स्वामीजी ने फ़िर दौड़-धूप करके ब्लॉग को छुड़वाया हैकरों के कब्जे से।
इन नौ सालों में हमारे लिखते रहने का कारण हमारा यह भ्रम है कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। यह भ्रम अभी तक बरकरार है। इसलिये लिखना जारी है। :)
आज ब्लॉगिंग के सफ़र के नौ साल पूरे होने के मौके पर अपने तमाम पाठकों को धन्यवाद देते हैं।
सूचना: एक , दो ,तीन , चार , पांच , छह , सात और आठ साल के पूरे होने के किस्से।

72 responses to “…और ये फ़ुरसतिया के नौ साल”

  1. Dr. Monica Sharrma
    बधाई आपको ….. लेखन का सफ़र यूँ ही चलता रहे …शुभकामनायें
    Dr. Monica Sharrma की हालिया प्रविष्टी..आश्रित नागरिक देश क्या गढ़ेंगें
  2. देवांशु निगम
    बधाइयाँ !!!! :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..१५ अगस्त का तोड़ू-फोड़ू दिन !!!
  3. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    इस साल फुरसतिया कट्टा कानपुरी बने..इसका जिक्र तो किया ही नहीं
    आपको पढ़ने के लिए फुरसत निकालना ही पड़ता है। आपके लिखे का आकर्षण बना रहे…आप यूँ ही लिखते रहें..हार्दिक शुभकामनाएँ।
  4. Alpana
    हमारे पंसदीदा ब्लॉग ‘फुरसतिया ‘ के नौ साल पूरे होने पर अनूप जी आप को बहुत-बहुत बधाई .
    इस ब्लॉग ने वाकई एक रेकोर्ड बना लिया है.जिससे नए -पुराने लेखकों को ब्लॉग लेखन में निरंतरता बनाए रखने की प्रेरणा मिलेगी.
    पहले दो साल में पहले साल १०० पोस्ट्स का लक्ष्य पूरा करना आप के लिए मुश्किल नहीं है.[जहाँ तक मेरा अनुमान है कि आप की अधिकतर पोस्ट्स १००० शब्दों से अधिक होती हैं जिनसे आराम से दो -तीन पोस्ट्स बन सकती हैं.]
    ‘छपास कामना पीड़ित’ और आप ? लगता तो नहीं …….ऐसा होता तो अब तक आप की ३-४ किताबें बाज़ार में आ चुकी होतीं! इतनी सामग्री तो आप के ब्लॉग पर ही है.अलग से लिखने की ज़रूरत भी नहीं .
    आप ब्लॉगजगत के ‘सबसे सफल और चर्चित व्यंग्यकार ‘ बिना कोई पुस्तक लिखे ही हैं.फिर भी आप की पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी.
    एक बार फिर से बधाईयाँ और शुभकामनाएँ.
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..क्या बदला है अब तक? क्या बदलेगा आगे?
  5. भारतीय नागरिक
    बधाई हो, ये सफर निरन्तर चलता रहे.
    भारतीय नागरिक की हालिया प्रविष्टी..नाग ने आदमी को डसा ….
  6. naveen raman
    बधाई हो अनुप जी,लगे रहिए………………….
    naveen raman की हालिया प्रविष्टी..जनसत्ता-अखबार का एकमात्र-पाठक
  7. Monika
    हार्दिक बधाई :)
    Monika की हालिया प्रविष्टी..Essay on Raksha Bandhan in English, Rakhi Celebration Ideas
  8. सतीश सक्सेना
    मतलब पहले दिन से आप ऐसे ही थे ..
    बधाई !
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..अब रक्षा बंधन के दिन पर, घर के दरवाजे बैठे हैं -सतीश सक्सेना
  9. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    वाह साहब, ऐसे ही शब्दों की मिठाई से काम नहीं चलेगा। पार्टी दीजिए।
    अभी नहीम तो २०-२१ सितंबर को वर्धा में तो घेर कर ले ली जाएगी।
    साथी ब्लॉगर्स के संख्याबल का तोड़ नहीं मिलेगा आपको।
    और हाँ, आपको ढेरों बधाई। आप ब्लॉग जगत के तेन्दुलकर बनते जा रहे हैं।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..सेमिनार फ़िजूल है: विनीत कुमार
  10. रवि
    चलिए, आपको याद रहा १०० पोस्ट लिखने का आग्रह. अब अगले साल – यानी दशक पूर्ति के लिए सबक बड़ा है – १५० पोस्ट का. यानी हर दूसरे दिन एक पोस्ट लिखने का.
    रहा सवाल अखबारों में छपने की लालसा का, तो गम का यह फ़ेज भी गुजर जाएगा. बहुत पहले मुझे भी लालसा रहती थी, अब तो अखबार वाले पैसे देकर लिखवाने की कोशिश करते हैं तो भी नहीं लिखता – क्या करें, हिंदी अखबार वाले बहुत कम पैसे देते हैं – दैनिक भास्कर का पिछला अनुभव बेहद कड़वा रहा – कुछ समय लगातार लिखा, और जब भुगतान की बारी आई तो एक तिहाई से भी कम पैसा दिया गया!!!
    अखबारों को दूर से राम-राम, अपना ब्लॉग भला. अब यहाँ से उठा के छाप लो तो फिर कोई बात नहीं!!
    रवि की हालिया प्रविष्टी..हिंदी के कवियों! जरा मात्रा गिनकर तो कविता करो!!!
  11. प्रवीण
    .
    .
    .
    @ अब कब तक ई होगा ई कौन जानता है
    ई नौ सालन से तो हो ही रहा है… आगे भी चलत रही, सबै जानत हैं…
    बधाईयाँ !
  12. सतीश पंचम
    नौ साल पूरे हुए और हमें पता भी नहीं चला। ब्लॉगिंग में संभवत: आपको तब से जानते हैं जब आप लल्लू बाजपेई के आल्हा कैसेट सुनते थे :- )
    http://hindini.com/fursatiya/archives/125
    उस समय एकाध पोस्टें नजर में आई थीं। बाद में तो सब नजर ही नजर आतीं गईं :-)
    शुभकामनाएं….ई सफर अइसे ही चलता रहे।
    सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी..इन्तजार-ए-लमही…..बनारस यात्रा – 9
  13. Anonymous
    खुद को अखबार की सीमाओं में न बांधिये, जैसे लिख रहे थे, वैसे ही लिखते रहिये, फ़्री-हैंड :) कानपुर जाने पर पहली बार अहसास हुआ था कि कोई अपने ब्लॉग के नाम से भी जाना जा सकता है, जब आपका नाम लेते ही मेरे बहनोई ने कहा था” अच्छा, फ़ुरसतिया जी?”
    आपका ये सफ़र ऐसे ही आने वाले तमाम सालों तक चलता रहे. अशेष शुभकामनाएं.
  14. shefali
    बहुत बधाई और शुभकामनाएँ …..
  15. sanjay jha
    …………
    सच्ची में ब्लॉग-जगत के ‘तेंदुलकर’ बनते जा रहे हैं.
    बधाईयाँ च शुभकामनायें.
    प्रणाम.
  16. प्रमोद सिंह
    बधाई, बधाई. मार्क ज़ुकरबर्ग के सेल्‍समैनों को हैरान करते रहिये.
    प्रमोद सिंह की हालिया प्रविष्टी..देश जहां जा रहा है का पुरनका गाना..
  17. arvind mishra
    ब्लागिंग का गर्भकाल पूरा करने पर बधाई :-)
    http://mishraarvind.blogspot.in/2013/08/blog-post_20.html
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..ब्लागिंग का ‘गर्भकाल’ और फुरसतिया को बधाई!
  18. ashish rai
    हिंदी ब्लागगिंग के स्तम्भ और व्यंग के व्यामोह में आकंठ डूबे फुरसतिया जी को हार्दिक बधाई और भविष्य में लिखते जाने की शुभकामनायें .
    ashish rai की हालिया प्रविष्टी..बधशाला -13
  19. Kajal Kumar
    अब लोग बवाल निरपेक्ष हो गये हैं :-)
    (चुक गए या समझ गए ! )
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- चँद्रमुखी, अब फि‍र से क्‍यों बीमार है तू
  20. शिरीष कुमार मौर्य
    बहुत बहुत बधाई अनूप जी….२००७ में जब अनुनाद शुरू किया था तो आप और रवि रतलामी जैसे अगुआ ही थे, जिनसे चुपचाप सीखता रहा। यूं ही बना रहे आपका साथ।
  21. Khushdeep Sehgal
    ब्लॉगिंग के महागुरुदेव को कोटि-कोटि बधाई…
    लेखन की ये साधना अनंत-अनंत काल तक चलती रहे…
    आपके आशीर्वाद से इस 16 अगस्त को मैंने भी ब्लॉगिंग में चार साल पूरे कर लिए हैं…
    जय हिंद…
  22. समीर लाल "टिप्पणीकार"
    बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ…यूँ ही लिखते पढ़ते रहिये!! :)
    समीर लाल “टिप्पणीकार” की हालिया प्रविष्टी..पूर्ण विराम: एक कहानी
  23. Manish Kumar
    नौ साल पूरा करने के लिए हार्दिक बधाई ! यूँ ही डटे रहिए मैदान में..
    रवि रतलामी जी का दिया एक लक्ष्य मुझे भी याद है एक हजार पोस्ट तक पहुँचने का। देखें कब पूरा होता है !
    Manish Kumar की हालिया प्रविष्टी..‘एक शाम मेरे नाम’ ने जीता इंडीब्लॉगर ‘Indian Blogger Awards 2013′ में सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग का खिताब !
  24. समीर लाल "स्टार टिपिण्णीकार"
    आप के बताये मार्ग पर चटखा के विनित और सिद्धार्थ जी की वार्तालाप पढ़ आये हैं- आभार!! इसी तरह भविष्य में भी मार्गदर्शन करते रहें. :)
    समीर लाल “स्टार टिपिण्णीकार” की हालिया प्रविष्टी..पूर्ण विराम: एक कहानी
  25. हिमांशु
    कोई नया-नया ब्लॉग जगत में आये तो जिन एकाध ब्लॉग का सुझाव पढ़ने को मिला करता है, उसमे सबसे पहले फुरसतिया हैं. हम सबको ब्लॉग की जीवन्तता से रूबरू कराते हुए वाद-विवाद-संवाद की विभिन्न त्यौरियां चढाते हुए यह ब्लॉगर नौ साल निरंतर रहे तो आश्चर्य नहीं. नौ पूरे हुए पर अदा नौनिहाल सी है इस ब्लॉग की.
    बहुत शुभकामनाएं!
  26. archanachaoji
    हमेशा तो नहीं ,पर पढ़ती हूँ ,जब समय मिलता है … बधाई लिखते रहने की ….
    archanachaoji की हालिया प्रविष्टी..ऐसे बनता है तिरंगा …
  27. वाणी गीत
    बहुत बधाई और शुभकामनायें !
  28. sanjaybengani
    गम्भीर संकल्प से जो सम्भव नहीं होता आपने मजाक मजाक में एक पड़ाव पार कर लिया! नौ-साल! और लिखा अभी भी जारी….
    बधाई! शुभकामनाएं!!
    रस्ते में हम साथ हुए थे और फिर ब्लॉग से अलग सोशल-मीडिया की ओर लार-टपकाते निकल लिये. ब्लॉग आज भी राह तकता सा बैठा है. मगर आपका संकल्प बना रहा…
  29. दीपक बाबा
    ९ अपने में सम्पूर्ण अंक हैं…. ९ वर्ष आपने ब्लॉग्गिंग जैसी विधा में पुरे किये हैं….
    “हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?”
    झाङे रहो कलट्टरगंज …. पोस्ट दर पोस्ट बुनते रहिये ….
    हार्दिक शुभकामनाएं …..
    दीपक बाबा की हालिया प्रविष्टी..हाल ऐ जिन्दगी
  30. Anonymous
    जैसे नौ हुए, वैसे ही नब्बे हों, इसके लिए शुभकामनाएं… देखिए फेसबुक पर लाइक न करके हम ब्लॉग तक आए और पूरी पोस्ट पढ़ी, अब टिप्पणी भी दे रहे हैं
  31. दीपिका
    ये ऊपर की अनामी टिप्पणी मेरी ही है। ज्यादा जल्दबाजी कर दी थी :(
  32. amit kumar srivastava
    ‘ब्लॉगिंग के टॉर्च बियरर’ हैं आप । बहुत बहुत शुभकामनायें और बधाई ।
    और हमारे तो ‘ब्लागाचार्य’ हैं आप ।
    amit kumar srivastava की हालिया प्रविष्टी..“यादों के पिटारे से …….रक्षाबंधन “
  33. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    मतलब शुरू में तो आप ट्विटर के भी कान कतरने वाले थे..
    आपका भ्रम बना रहे और ऐसे ही रिकॉर्ड बनाते चलें.. हिन्दी ब्लॉगिंग के श्रीलाल शुक्ल को बधाई और शुभकामनाएं..
    सतीश चन्द्र सत्यार्थी की हालिया प्रविष्टी..फेसबुक के हिन्दी साहित्य पुरोधा
  34. eswami
    बधाई!
    वैसे अभी साईट हैक्ड ही है, जानता हूँ! मेरी प्राथमिकताएं इन चीजों पर खिन्न होने का भी समय नहीं देतीं. उदासीनता नई गहराई में.
    अपने अपने लेवल की बात है. इधर घर के शेर हिन्दी के पीछे पड लिए, उधर जमाने वाले विकिलीक्स बना चुके.
    eswami की हालिया प्रविष्टी..कटी-छँटी सी लिखा-ई
  35. गिरीश मुकुल
    बधाई हो महाराज
    इहाँ सात पूरे हो गए
    हम भी सोच रए हैं की
    भगवान सत्यनाराण की कथा सुन लेवें
  36. प्रवीण पाण्डेय
    आपको हृदय से शुभकामनायें। आप ९ वर्ष से टिकें है, यह जानकर न जाने कितनों का उत्साह बढ़ जाता है।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मन – स्वरूप, कार्य, अवस्थायें
  37. ताऊ रामपुरिया
    सच माना जाये तो यह एक बडी उपलब्धि ही है, अधिकांश ब्लागर तो शैशवकाल ही पूरा नही कर पाते. लेखन कर्म अबाध गति से चलता रहे इसके लिये हृदय से शुभकामनाएं और बधाईयां.
    रामराम.
  38. kavita rawat
    नौ साल पूरे होने पर हार्दिक शुभकामनाएं!
    यूँ ही ये सिलसिला बढ़ता रहे..
  39. rachna
    बधाई
  40. मृणाल कान्त
    कृपया भ्रम बरक़रार रखें, तमाम साधारण मुद्दों और घटनाओं पर आपका perspective बहुत अलग, deep और मज़ेदार भी होता है| पढ़कर बहुत अच्छा लगता है|
  41. sharmila ghosh
    बहुत बहुत शुभकामनायें अनूप जी.
  42. sanjay @ mo sam kaun
    आपका भ्रम बरकरार रहे, आने वाले हर साल में आप रवि जी के दिये टार्गेट पूरे करते रहें।
    बहुत बहुत बधाई।
    sanjay @ mo sam kaun की हालिया प्रविष्टी..चाच्चा बैल
  43. बी एस पाबला
    भ्रम बना रहे :-)
    बधाई शुभकामनाएं
    बी एस पाबला की हालिया प्रविष्टी..गूगल का नया कार-नामा
  44. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] …और ये फ़ुरसतिया के नौ साल [...]