Sunday, February 02, 2014

सूर्य जब-जब थका हारा ताल के तट पर मिला

#‎सूरज‬ भाई चाय की चुस्की लेते बतिया रहे थे। हमने कहा -गुरु एकदम नई सरकार के मुखिया सरीखे चमक रहे हो! सूरज भाई बोले अच्छा ये बताओ शाम को मैं कैसा लगता हूं? हमने कहा दस साल पुरानी लोकतांत्रिक सरकार के मुखिया की तरह बुझे-थके। सूरज भाई भन्ना गये। बोले यार तुम संडे को भी राजनीति करते हो। फ़िर हमने कहा अच्छा चलो सामाजिक हो जाते हैं और बताते कैसे लगते हो शाम को। सूरज भाई श्रोता सरीखे सुनने लगे और मैंने अजय गुप्तजी (शाहजहांपुर) की कविता सुना दी:

सूर्य जब-जब थका हारा ताल के तट पर मिला,
सच कहूं मुझे वो कुंवारी बेटियों के बाप सा लगा।


बेटियों का जिक्र आते ही सूरज भाई बाहर निकल गये और अपनी बेटियों किरण, रोशनी आदि को दुलराने लगे। कायनात और खिल उठी।

अंधेरे के खिलाफ़ सर्च वारंट

दरवज्जा खोलते ही ‪#‎सूरज‬ भाई धड़धड़ा के अन्दर घुस गये। अंग्रेजो के जमाने के जेलर की तरह। साथ में उजाले, रोशनी, प्रकाश और न जाने कित्ते दायें-बायें। सूरज भाई बोले अंधेरे के खिलाफ़ सर्च वारंट है। गिरफ़्तार करने आये हैं। हमने कहा - अरे भाई अंधेरा तो तुमको देखते ही फ़ूट लिया जैसे प्राइम टाइम की बहस से कायदे की बात। सूरज भाई मुस्कराते हुये साथ में चाय पी रहे हैं। किरणें बाहर कड़क्को खेल रही हैं। आपस में धौल धप्पा कर रही हैं। यहां से वहां तक, न जाने कहां-कहां तक

Saturday, February 01, 2014

‎सूरज‬ भाई आज थोड़ा देरी से आये

#‎सूरज‬ भाई आज थोड़ा देरी से आये। बोले -सोचा वीकेन्ड है सो रहे होगे। हम बोले -काहे का वीकेन्ड भाई जाना है ऑफ़िस ! उनके साथ आई किरणें कल के स्टेटस पर आये कमेंट बांचकर मुस्कराती रहीं। पूरी कायनात खिल गई।