Thursday, April 14, 2022

बुश बिल्कुल बांगड़ू नजर आता है

 "बुश बिल्कुल बांगड़ू नजर आता है, उसी की तरह बोलता और बिफरता है।"

कृष्ण बलदेव वैद जी की डायरी में 'बांगड़ू ' शब्द पढ़कर अपनी एक पोस्ट याद आई जिसमें मैंने बारात में दूल्हे की बात करते हुए 'बाँगड़ू' शब्द का प्रयोग किया था:
"बारात का केन्द्रीय तत्व तो दूल्हा होता है। जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में।दिग्विजय के लिये निकले बारहवीं सदी किसी योद्धा की तरह घोड़े पर सवार।कमर में तलवार। किसी मुगलिया राजकुमार की तरह मस्तक पर सुशोभित ताज (मौर)। आंखों के आगे बुरकेनुमा फूलों की लड़ी-जिससे यह पता लगाना मुश्किल कि घोड़े पर सवार शख्स कोई वीरांगना हैं या कोई वीर ।पैरों में बिच्छू के डंकनुमा नुकीलापन लिये राजपूती जूते। इक्कीसवीं सदी के डिजाइनर सूट के कपड़े की बनी वाजिदअलीशाह नुमा पोशाक। गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव 'बांगड़ू कोलाज' चला आ रहा है। "
मजे के बात जिस समय मैंने यह शब्द प्रयोग किया था तब इसका ठीक-ठीक मतलब नहीं पता था। लेकिन यह अंदाज था कि इसका मतलब वही होता है जो मैं कहना चाहता हूँ।
29 जनवरी, 2003 को जब वैद जी ने डायरी में बुश के बारे में यह लिखा तब अगर उनको कोई बताता कि उनके बारे में एक लेखक की यह राय है तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होती ? शायद वो पूछते -' इसका मतलब क्या है?' मतलब बताए जाने पर शायद कहते -ऐसा है ? मैं ऐसा दिखता हूं? ग्रेट ! या इसी तरह की कोई बात ! क्या पता वे वैद जी के यहां कोई कार्रवाई करवा देते। 🙂
डायरी के अंश पढ़ते हुए वैद के मन की बातें पता चलती हैं। रोचक टिप्पणियाँ। कुछ अंश :
7-2-2003
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सेमिनारों का अपना एक संसार है -एक पूरा तंत्र। एक सेमीनार की कोख से दूसरा , दूसरे की कोख से तीसरा...... । मैं इस संसार से दूर हूँ।
21-2-2003
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पाली ने फोन पर बताया कि साहित्य अकादमी के हिन्दी पुरस्कार के लिए इस बार राजेश जोशी और मुझमें चुनाव था। अशोक, केदारनाथ सिंह और लीलाधर
जगूड़ी ज्यूरी में थे। अशोक ने मेरा पक्ष लिया, बाकी के दोनों ने राजेश जोशी का। यह सब पाली को 'आउटलुक' (हिन्दी) में प्रकाशित विमलकुमार की रिपोर्ट से मालूम हुआ।
2-3-2003
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गर्मी की धमकियाँ शुरू। देश का छकड़ा ढिचकूँ-ढिचकूँ। सब नेता थके-मांदे और बिके -चुके। अधिकतर के चेहरों पर चिकनी-चुपड़ी चालाकी। यह मैं किधर भटक गया। मुझे देश के नेताओं( और अभिनेताओं) से क्या लेना-देना। मुझे 'तड़पने' के लिए साहित्य के नेता(और अभिनेता) ही काफी हैं, खासतौर पर अब जब कोई काम नहीं कर पा रहा।
15-3-2003
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इराक अमरीकी सरकार के जुनून का शिकार बनकर रहेगा, बावजूद इस हकीकत के कि दुनिया भर की अक्सरियत इस हमले के खिलाफ है। तबाही होगी। इराक टूट-फूट जाएगा। सद्दाम हुसैन बच जाए या मार दिया जाए उस से कोई फरक नहीं पड़ेगा। दहसत-पसंदगी बढ़ जाएगी। इस्लामी कट्टरवाद बढ़ेगा, भारत-पाक झमेला और उलझेगा।
दिल्ली जी महदूद मिडल क्लास जिंदगी के बाहर भारत में भयंकर दुख है, दरिद्र है, बीमारियां हैं, बदसूरती है , अन्याय है जिसके बावजूद करोड़ों लोग जी रहे हैं , ऐसे जैसे सब अनिवार्य हो। दिल्ली के अंदर भी दुख कम नहीं।
मैंने अपने काम में गरीबी और दरिद्र और भूख को उकेरने की कई कोशिशें की हैं, लेकिन कोई बड़ा शाहकार अभी तक इस विषय पर नहीं लिख पाया।
19-3-2003
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इराक पर हमला होने वाला है। सद्दाम हुसैन अगर पागल है तो बुश काम पागल और खतरनाक नहीं ।
23-3 -2003
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इराक पर चल रहे हमले की जो तस्वीरें टीवी पर देखने को मिलती हैं उन से वहां हो रही हौलनाक तबाही की तसवीर सामने नहीं आती। लगता है जैसे आतिशबाजी हो रही हो, आकाश में होली खेली जा रही हो। कोई चीखोपुकार सुनाई नहीं देती, कोई दुख दिखाई नहीं देता, एक मनसूई सी रंगीनी , एक रंगीन खेल तमाशा।
01-04-2003
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इराक पर हमला जारी है। यह लड़ाई महीनों चलेगी। खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं होगी। अमरीकी सरकार नुकसान उठाएगी। इस्लामी कट्टरपन और दहशत पसंदगी को बढ़ावा मिलेगा।
पढ़ी जा रही है अभी तो डायरी ! आप क्या पढ़ रहे हैं ?

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Wednesday, April 13, 2022

ऑटो पर हिमालय



खन्नौत नदी के पुल से आगे बढ़कर दायें मुड़ गए। हरदोई की तरफ। सोचा थोड़ी देर और साइकिलियाया जाए। सुबह चकाचक खिली थी। धूप अभी तेज नहीं हुई थी। चलते गए आगे।
सड़क के दोनों छोर पर लोग अपने-अपने हिसाब से दिन शुरू कर चुके थे। कोई कुछ काम करता दिखा, कोई बतियाता हुआ। घरों के बाहर बैठे सड़क से गुजरते लोगों को देखते दिखे। कोई सिर्फ सामने से गुजरते लोगों को देख रहा था, हवाई अड्डे में चेकिंग करते हुए सामान के स्कैनर की तरह।
कोई-कोई लोग नजर की दायरे में आने से देखना शुरू करके तब तक देखते जब तक सड़क से गुजरता इंसान नजरों से ओझल न हो जाए। इससे अलग कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी सड़क से गुजरते लोगों में दिलचस्पी नहीं थी। वे आसामान ताक रहे थे। आसामान की कुछ बदलियाँ उनकी इस ताकाझाँकी से असहज होकर तेज चाल से दूर भागती दिखीं। उनको भागते देख बादल उनके पीछे लग लिए। वो तो कहो आसमान में एंटी रोमियो पुलिस बल नहीं है वरना बीच आसमान बादल को मुर्गा बनाकर बदली से बादल के हाथ में राखी बँधवाकर ही जाने देता दोनों को।
क्या पता आगे जाकर बदली, बादल के कान में फुसफुसा के कहती हो,’ वो देखो चबूतरे पर बैठा आदमी मुझे घूर रहा है। क्या पता इस पर बादल उससे कहता हो ,’ चिल यार, तुम हो ही इतनी खूबसूरत कि तुमको कोई भी देखते रहना चाहेगा।‘ बदली शायद मुस्कराते हुए उससे कहती हो –‘तुम बहुत बदमाश हो।‘
आगे एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर तमाम लोग बैठे बतियाते दिखे। चबूतरे के पास ही तमाम मिट्टी के बर्तन भी बिक रहे थे। सुराही , गमला , गुल्लक और दीगर बर्तन। आज के समय में जब सिक्के चलन से लगभग बाहर हो गए हैं। ऐसे में गुल्लक बनते और बिकते देख लगा कि एक ही समय में हम एक साथ कितने समयों में जी सकते हैं।
पेड़ के नीचे चबूतरे में बैठे लोगों को तसल्ली से बतियाते देखकर लगा कि आज के समय में नेट एडिक्शन से छुटकारे का उपाय यही है कि जगह-जगह पुलिया, चबूतरे बनवाए जाएं जहां बैठकर लोग आपस में बतियाएं। लेकिन बड़ी बात नहीं कि चबूतरे बनते ही लोग मांग करने लगे कि हर चबूतरे के पास मुफ़्त वाई-फ़ाई की व्यवस्था की जाए ताकि वहां बैठकर तसल्ली से सर्फिंग/चैटिंग की जा सके।
चबूतरे के बगल में ही एक गोशाला दिखी। बड़ी सी गोशाला में करीब सौ के करीब गायें होंगी। बताने वाले ने हालांकि पाँच सौ बताईं। अलग-अलग उम्र की गायें। शुरू में ही बच्चा गायें, आगे बड़ी, बुजुर्ग गायें। तमाम गायों की हड्डियाँ दिख रही थीं। इस तरह कि अगर जरूरत पढे तो बिना एक्सरे के साफ दिख जाएँ, गिनती हो सके। कुछ गायें दूध भी देती होंगी। कई दूधिये दूध के डब्बे/पीपे लिए अंदर आते दिखे। कुछ गायें अपने सुबह का नाश्ता करते दिखीं। नाश्ते में भूसा था। थान के बुफ़े सिस्टम में मुंह से मुंह से सटाये तसल्ली से चारा खाते हुए बछियों के चेहरों को देखकर लगा कि परमानन्द अगर कुछ होता है तो वह यही है जो इन गायों के चेहरों पर पसरा है।
गौशाला के आगे ही एक जगह , जंगले के अंदर कुछ लोग बैठे, बतकही में मशगूल थे। एक बाबाजी धुआँ उड़ाते दिखे। बाहर लिखा था – ‘समाधि श्री उदासी बाबा, राम बाग। ‘ उदासी बाबा के बारे में पहली बार सुना था। पहली नजर में लगा कि समाधि बाबा लोगों की उदासी दूर करते हों या फिर उदास रहते हों। वहाँ मौजूद लोगों से जानकारी ली तो पता चला कि मेरा सोचना गलत था। वहाँ मौजूद लोगों ने बताया कि –“उदासी बाबा नानक जी के पुत्र श्रीचंद के सेवक थे।“
आज जानकारी ली तो पता चला कि उदासी एक अलग संप्रदाय था-‘ सिख धर्म में गुरु नानक के बाद ही एक अलग संप्रदाय का निर्माण हो गया था, जिसका नाम था – उदासी मत। इसकी स्थापना उनके बेटे बाबा श्रीचंद ने ही की थी। सिख संप्रदाय में गृहस्थी व समाज में रह कर जीवन को पवित्र बनाने पर जोर था, जबकि ‘उदासी मत’ में संसार के पूर्ण त्याग पर बल दिया गया।‘
कुछ देर वहाँ रुककर हम आगे चल दिए। बाहर निकलकर देखा तो एक नया आया हुआ आदमी जेब से चिलम निकालकर कुछ धुआँ जैसा उड़ाने लगा। वहाँ मौजूद लोगों ने भी इसमें सहयोग दिया। उदासी दूर करने का हर एक का अपना-अपना अंदाज होता है।
आगे चौराहे पर एक ट्रैक्टर में तमाम लोग बैठे कहीं जा रहे थे। शायद राम नवमी के मौके पर कहीं पूजा करने जा रहे होने। ट्रैक्टर बीच सड़क पर कुछ देर खड़ा रहा। यातायात रुक गया। एक आदमी मोटरसाइकिल पर गैस सिलेंडर लिए ट्रैक्टर के निकलने का इंतजार करता रहा। ट्रैक्टर के मुड़ने , चलने और आगे बढ़ने को जिस अंदाज में वह देख रहा था उससे लगा कि उसकी स्टेअरिंग है जिसको सहारे वह ट्रैक्टर को नियंत्रित कर रहा है। ट्रैक्टर के निकलने के बाद मोटरसाइकिल वाला निकल लिया। हम भी आगे बढ़ गए।
सड़क किनारे एके झोपड़ी में चलती एक दुकान के बाहर खड़े आटो पर बर्फ की कुछ सिल्लियाँ लिए खड़ा था। भारती जी के निबंध , ठेले पर हिमालय की तर्ज पर, आटो पर हिमालय। बर्फ बेचने वाला बच्चा सूजे से छेद करके बर्फ के दुकड़े कर रहा था। एक छोटी सिल्ली के चौथाई हिस्से को दुकान वाले को सौंप दिया। छोटी सिल्ली के चौथाई हिस्से को पाव बताते हुए दाम भी बताए – ‘पौवा साठ।‘ मतलब चौथाई सिल्ली साथ रुपये की।
बर्फ वाला चौथाई सिल्ली के अलावा और भी बर्फ देना चाहता था दुकान वाले को। दुकान वाले ने माना किया। बर्फ वाले ने इस बुजदिली के लिए उसका उपहास टाइप किया। आह्वान किया किया कि बिजनेस में रिस्क लेना आना चाहिए। लेकिन दुकान वाला उसके झांसे में नहीं आया। आटो वाला आटो स्टार्ट करके अपनी बर्फ समेत आगे चल दिया। हम भी आगे निकल लिए !

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Monday, April 11, 2022

रमता जोगी बहता पानी

 


कल बहुत दिन बाद साइकिलिंग की। गद्दी पर हाथ मारा तो साइकिल फौरन तैयार हो गयी चलने को। कोई मनौना नहीं कि इत्ते दिन बाद चल रहे हैं तो आदत छूट गयी, हम न चलेंगे। यह सब इंसानों के चोंचले हैं।
कैंट रोड पर सुबह की चहल-पहल थी। कोई टहल रहा था, कोई आपस में बतिया रहा था। कोई अंगड़ाई ले रहा था। अंगड़ाई लेने का अंदाज ऐसा कि कविता याद आई -'ले अंगड़ाई उठ हिले धरा, करके विराट स्वर में निनाद।'
एक बेंच पर कुछ लोग एक-दूसरे पर कतार में खड़ी साइकिलों की तरह गिरकर सेल्फी ले रहे थे। उनको देखकर लगा 'सेल्फी ही सत्य' है। बगल की बेंच में बैठे एक जन मोबाइल में देखते हुए हंस रहे थे। शायद किसी से बतियाते हुए।
मैदान में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। चल-पहल थी चारो तरफ। मार्निंग वाकर की बेंच अलबत्ता खाली थी। कोई बैठा नहीं दिखा। शायद टहलकर चले गए थे।
लेकिन आगे बायीं तरफ एक जगह सुबह की सैर के साथी दिख गए, इंद्रजीत जी, डॉ त्रेहन, शुक्ला जी और अन्य साथी। एक हेल्थ कैम्प के पास मौजूद थे। एक अस्थायी गुमटी पर मेगा हैल्थ कैम्प लगा था। डायबिटीज जैसी कुछ जांच मुफ्त में होने का इंतजाम। मुफ्त शब्द देखते ही मुझे याद आया -'इस दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं है।'
सुबह के सैर के साथियों से हाल-चाल का आदान प्रदान हुआ जैसे मुलाकात होने पर लोग अपने विजिटिंग कार्ड की अदला-बदली होती है। फ़ोटो भी हुए। फोटो के बिना कोई मुलाकात मानी कहां जाती है।
आगे एक लड़का अपने कुत्ते को टहला रहा था। देखते-देखते दौड़ाने लगा। कुछ देर में जंजीर छूट गई। अब कुत्ता लड़के को दौड़ाने लगा। कुछ दूर के भागने के बाद कुत्ता रुक गया। एक बार पालतू हो जाने के बाद आजाद होने की इच्छा मर जाती है। कुत्ता और लड़का दोनों मिलकर हांफने लगे। हांफते हुए दोनों ने एक-दूसरे को देखा। ताज्जुब की बात लड़के ने कुत्ते के साथ सेल्फी नहीं ली। शायद कुत्ते को पसंद न हो।
पास से गुज़रते हुए देखा कुत्ते की पीठ अधगंजी थी। बाल कहीं-कहीं उड़े थे। शायद इसीलिए कुत्ते को फोटो लेना पसंद न हो।
फुटपाथ पर खड़ी एक ठेलिया बीच अचानक ढाल के सहारे सड़क की तरफ चलने लगी। आहिस्ते से सड़क पर उतरकर बीच सड़क तक आई। इसके बाद वापस पीछे लुढ़कते हुए फुटपाथ किनारे की नाली के सहारे टिककर खड़ी हो गयी। ठेलिया की चाल ढलान पर निभर थी। ढलान खत्म होते ही उसका चलना रुक गया। चलने के लिए दूसरे के भरोसे रहने वाले बहुत दूर नहीं जा पाते हैं।
इस बात को साहित्य पर लागू करते हुए Arvind Tiwari जी ने लिखा -“कुछ लोग साहित्य में ढलान के सहारे ही उतरे हैं ।”
आगे एक बन्दर सीधी चाल से सड़क पार करता दिखा। पूंछ को झंडे की तरह लहराते हुए शाही अंदाज में सड़क पार की उसने, बिना दाएं-बाएं देखे। गोया सड़क का खलीफा हो बन्दर। हम भी सम्मान में 'थम' हो गए।
गोविंद गंज क्रासिंग पर एक महिला आते-जाते लोगों से भीख मांग रही थी। सुनते हैं भीख मांगना अपराध है। लेकिन हर तरफ मांगने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। अकेले भीख मांगना गलत माना जाता हैं। लेकिन मांगना जायज कानूनन हक माना जाता है। संगठन की यही ताकत है। संगठित होकर किया अपराध, अपराध नहीं माना जाता। लूटपाट और हत्या अकेले किये जाने पर अपराध है। लेकिन संगठित होकर करने पर क्रांति कहलाई जाती है।
महिला के बगल ने बैठे दो बच्चे मोबाइल पर कोई पिक्चर देख रहे थे। आस-पास से, दीन-दुनिया से बेखबर।
क्रासिंग पार फल वाला अपनी ठेलिया सजा रहा था। दूसरी तरफ एक ऑटो वाला ड्राइविंग सीट पर बैठा इत्मीनान से बीड़ी पी रहा था। उसके बीड़ी पीने के बेफिक्र और निश्चित अंदाज को देखकर लगा मानो कोई बादशाह अपने तख्ते-ताउस पर बैठे तसल्ली से हुक्का गुड़गुड़ा रहा हो। लेकिन यह उपमा ठीक नहीं। बादशाहों को तसल्ली कहाँ हासिल होती है। उनको तो हर समय अपने तख्त के छिनने की चिंता लगी रहती होगी। जरा दी गफलत हुई कि छिन गयी सल्तनत। बादशाह सलामत से मरहूम बादशाह सलामत में तब्दील हो गए।
ऑटो वाले ने बताया कि पास से सवारी लेकर चर्च में छोड़नी है। इसके दो घण्टे बाद वापस घर छोड़ना है। कप्तान साहब के बगल की खाली पड़ी जमीन झोपड़ी डाल ली है। गुजर-बसर हो रही है।
आगे एक आदमी सड़क किनारे बैठा अखबार पढ़ रहा था। तसल्ली से एक-एक खबर को सूंघते-दिमागस्थ करते हुए। उसके बगल में एक छोटा बच्चा कुछ देर अखबार को बगल से देखता खड़ा रहा, फिर ऊबकर अंदर भाग गया।
जगह-जगह मिठाई की दुकानें गुलजार थीं। हर ठेलिया पर जलेबी छन रही थी। कुछ लोग खड़े होकर खा रहे थे, कुछ ले जा रहे थे। जलेबी बनाता , छानते लोग जिस तल्लीनता से अपने काम में लगे थे उसको देखकर लगा कि नवनिर्माण में जुटे हैं। मोटे कपड़े के छेद से कड़ाही में मैदे की छोटी सीढ़िया बनाकर उनको उलट-पुलटकर सेंकते और फिर चासनी में डुबाकर निकालते लोग। अद्भुत। अनिवर्चनीय।
बहादुरगंज के आगे बीच सड़क पर खड़े दो बुजुर्ग आपस में बतिया रहे थे। एक बुजुर्ग पटरे का जांघिया पहने उसके अगले, बीच के हिस्से को अनिर्वचनीय आनंद से खुजलाते हुए पैजामा पहने दूसरे बुजुर्ग से तसल्ली से बतिया रहे थे। दूसरे बुजुर्ग का जनेऊ उनकी बनियाइन से झांक रहा था, चुटिया कम बालों के बीच 'बालों के मन्त्रिमण्डल' की तरह अलग प्रभावी दिख रही थी। उनके ऊपर नीचे के दांत इस तरह टूटे थे, गोया एक दूसरे की शक्ल न देखने का प्रण लेकर निपट गए हों। ऊपर के दांत नीचे के मसूढ़े में और नीचे का दांत ऊपर के मसूढ़े में फिट, आलिंगनबद्ध। बीच में जो दांत आया, निपट गया।
तसल्ली से 'सड़क चैट' करते बुजुर्ग हमको देखकर चुप हो गए। हमने कुछ इधर-उधर के सवाल पूँछकर 'बुजुर्ग जोड़े' की फोटो लेनी चाही तो दोनों मनाकर खरामा-खरामा चल दिये। दो बुजुर्गों की तसल्ली पूर्ण बातचीत में हम बाधक बने।
घण्टाघर के आगे मंदिर के पास सड़क किनारे कुछ साधू दिखे। पता चला कि वे अयोध्या जी होकर आए हैं। आगे कहीं और जाने की योजना बना रहे हैं। कहां जाने का विचार है पूंछने पर 'साधु प्रवक्ता' ने बयान जारी किया -' सांप, साधु, सिर्री (पागल , सिरफिरा) का कोई ठिकाना नहीं होता' । मतलब कहीं भी जा सकते हैं। एक साधु ने बताया -' हरिद्वार जाने की सोच रहे हैं। कोई साथी मिल जाएगा तो चले जायेंगे।'
हमको याद आया -'रमता जोगी, बहता पानी, इसको कौन सके बिरमाय।
बातचीत करते साधुओं से निर्लिप्त और थोड़ा अलग टाइप बैठे साधु अपने में डूबे बीड़ी पीते , धुंआ उड़ाते चुपचाप बैठे थे। उनकी मुखमुद्रा देखकर लगा मानो चुनाव में हार गई पार्टी का कोई प्रमुख नेता 'पार्टी में रहे या सरकार बनाने वाली पार्टी में शामिल हो जाये' जैसे अहम मसले पर चिंतन कर रहा हो।
हम साधुओं से बतिया ही रहे थे कि एक लड़का अपने जबर कुत्ते को टहलाते हुए लाया और एक खम्बे के पास खड़ा कर दिया। कुत्ते ने टांग उठाकर खम्भे को सींचा। सिंचाई पूरी होते ही उसके चेहरे पर तसल्ली पसर गयी। 'इस सिंचाई अभियान' को देखकर लगा कि अगर सड़कों किनारे लगे खम्भे हटा लिए जाएं तो तमाम कुत्तों की किडनियां खराब हो जाएं। फिर क्या पता भविष्य में होने वाले चुनावों में आश्वासन दिए जाएं -'अगर हम चुनाव जीते तो आपके कुत्तों के लिए हर सौ मीटर पर एक खम्भा लगवाएंगे।'
चौक मोहल्ले में एक जगह फुटपाथ पर बैठे कुछ बुजुर्ग आपस में बतिया रहे थे। घर से बाहर बुजुर्ग मस्त होकर चुहल कर रहे थे।
देखते-देखते , पैडलियाते-पैडलियाते हम केरूगंज पहुंच गए। केरूगंज मतलब शहर की शुरुआत। थोड़ा बांए चले तो खन्नौत नदी का पुल। नदी किनारे तमाम धोबी कपड़े धो रहे थे। कपड़ों की गंदगी नदी को भेंट कर रहे थे। भैंसे 'रिवर बाथ' कर रहीं थी। सुअर किनारे रहकर पानी पी रहे थे।
नदी पार एक मकान पर डॉक्टर अरोरा का इश्तहार हल्ला मचाते हुए लगा था। इश्तहार में सेक्स मरीजों का आह्वान किया था तुरन्त मिलने के लिए। लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं दिखी, न कोई भीड़। कोई इलाज नहीं चाहता, बस बीमारी का रोना।
देखते-देखते सड़क पर से एक सवारी गुजरी। पुल हिलने लगा। हम सहम गए। फौरन साइकिल समेटी और आगे बढ़ गए।

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Saturday, April 09, 2022

लिखत-पढ़त की दुनिया बहुत अनोखी है

 कृष्ण बलदेव वैद की डायरी जारी है। रोचक हिस्सों को अंडरलाइन करने का मन करता है। लेकिन उठकर पेन, पेंसिल लाने का आलस्य मन पर हाबी हो जाता है। इस चक्कर में वह रोचक अंश दाएं-बाएं हो जाता है। आलस्य से जुड़ा यह अंश देखिए:

"आज अपने काम में आ गयी रुकावट के कारणों को फिर कुरेदना चाहता हूँ। मुख्य कारण तो शायद आलस्य ही है और निरन्तरता का टूट जाना, टूटते रहना। एक नागा, अपने पीछे अनेक नागों की संभावना छोड़ जाता है।'
डायरी में अनेक ऐसे लेखकों के जिक्र जिनके अपन ने नाम ही नहीं सुने। कितने कुपढ़ हैं अपन। कोशिश भी तो नहीं की कभी पढ़ने की।
पढ़ने की बात कहें तो कल एक बातचीत (रेतसमाधि के बुकर के लिए नामांकित किये जाने पर आयोजित चर्चा में) एक नामचीन रचनाकार ने जानकारी दी कि श्रीलाल शुक्ल जी के बारे में उनको तब पता चला जब उनके निधन के समाचार आये।
लब्बो-लुआब यह कि दुनिया और उसमें भी लिखत-पढ़त की दुनिया बहुत अनोखी है। दुनिया जहान में जिनका डंका मचा होय, हो सकता है पड़ोस में उनके बारे में जानकारी न होय। इसलिए किसी को अपने बारे में मुगालता नहीं पालना चाहिए। चुपचाप अपना काम करना चाहिए। मस्त रहना चाहिए। निरन्तरता बनाये रहे तो अच्छा। बाकी सफलता-असफलता के लिए बहुत हुडकना नहीं चाहिए।
असफलता के लिए भी काम तो जरूरी है। बिना काम के असफल भी तो नहीं हुआ जा सकता। (वैद जी की डायरी से लिये भाव)
कल किताबों की लिस्ट बनानी शुरू की। कुल जमा पन्द्रह-बीस किताबों की लिस्ट बनी। पुरानी किताबों से मुलाकात रोचक है।
रोचक तो अपने परिवेश से मिलना भी है। इसी लालच में कल दफ्तर से पैदल वापस आये। आये तो परसों भी थे।
आते हुए देखा एक बन्दरिया सड़क किनारे पीठ के बल चित्त लेती हुई थी। दूसरी उसको दुलरा रही थी। मां-बेटी हों शायद। हमको बगल से गुज़रते देखकर भी अनदेखा किया। अपन उसको निहारते हुए निकल लिए।
फैक्ट्री के बाहर निकलते हुए गेट पर दरबान ने जोर से जयहिंद साहब कहा तो हम चौंक गए। हमारी चुप टूट गयी। रुककर हाल-चाल लिए। बोले बतियाये। कई बार बोल-बतिया चुके हैं। अगली बार फिर पूछते हैं मिलने पर वही सवाल तो सोचते होंगे -'अजीब भुलक्कड़ है साहब भी। कल पूछा आज फिर वही बात पूछ रहे हैं।' लेकिन मुझे लगता है कि किसी से तसल्ली से बोल-बतिया लेना भी सुकून की बात है। है कि नहीं ?
फैक्ट्री के बाहर सड़क के पेड़ को देखकर लगा मानो कोई मजदूर काम से लौटकर घर में कपड़े उतारकर चरपैया पर लेटा है। तसल्ली से थकान मिटाते हुए। क्या पता घर पहुँच कर घरैतिन से कहता हो -'अजी सुनती हो, थोड़ी कार्बन डाई आक्साइड लाओ। ताजी, ताजी।' हो सकता है घरैतिन झिड़क देती हो -'सबहन (सब जगह) तो पसरी है कार्बनडाइआक्साइड , जित्ती मन आये खाओ-पियो। आजकल आदमी लोग धड़ल्ले से यही तो छोड़ रहे हैं। हल्ला मचाये हो फालतू मां।'
पेड़ के तसल्ली से लेटने के अंदाज में सूरज भाई का विदा होना भी शामिल है। दफ्तर में बॉस के निकल जाने पर लोग आराम मुद्रा में आ जाते हैं, वही भाव।
आगे कुछ हरे पेड़ दिखे। उसके बगल में थोड़ा दूर एक गंजा होता टाइप पेड़। पेड़ की पत्तियां कम होती दिखीं। ऐसे जैसे डाई करते हुए बुजुर्गों के बाल कम होते जाएं। पेड़ हरे-भरे पेड़ों से थोड़ा दूर खड़ा अकेले में हवा की कंघी से अपने पत्तियों को संवार रहा था। ऐसे जैसे कम बालों वाले लोग जरा सा मौका मिलते ही पीछे वाली जेब से कंघा निकाल कर बचे-खुचे बाल संवारने लगते हैं।
कल शाम सोचा था तसल्ली से कुछ और लिखा जायेगा। लेकिन फिर किताब पढ़ते हुए सो गये। सुबह लेटे-लेटे किताब पढ़ते रहे। सोचा टहलने जाएं, लेकिन आलस्य ने फिर जकड़ लिया।
अब्बी देखा तो सामने सूरज भाई ड्यूटी ज्वाइन कर चुके हैं। किरणें मुस्कराते हुए गुडमार्निंग कर रही हैं। कई क्यारियों के बीच खड़ा पेड़ किसी संयुक्त परिवार के एकमात्र बेटे की तरह प्रफुल्लित, प्रमुदित ऐंठ में खड़ा है। क्यारियां अनुशासित बच्चियों की तरह चुपचाप नाटे कद के पेड़ को ऐंठते देख रही हैं। लिंग भेद लगता है प्रकृति पर भी हावी है।
लिंग भेद की बात लिखते हुए अभी एक समाचार का निटिफिकेशन देखा :
"जितनी देर में मैगी नहीं बनती, मर्द उससे कम देर में किसी को बदचलनी का प्रमाणपत्र दे देते हैं।"
इसी से याद आया वैद जी ने आदमियों की मनोवृत्ति का जिक्र करते हुए अपनी डायरी में लिखा -'कुछ मर्दों की आंखों में उनका लिंग लहराता है।'
दूसरों के बारे में धारणाएं हम अपने सोच के हिसाब से ही बनाते हैं। अपनी कमी का ठीकरा हम दूसरों पर फोड़ देते हैं। तमाम पढ़े-लिखे समझदार लोग भी बिना समझे कई बार जो बयान जारी करते हैं , उनको एहसास नहीं होता कि वह क्या कह रहे हैं।

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Friday, April 08, 2022

कृष्ण बलदेव वैद की डायरी

 'तितलियों की बेकरारी और खामोशी के इनाम के तौर पर ही उनको उनके रंग दिए गए हैं, उनके परों पर नक्कासी की गई है।'

'कोई भी लम्बा सहवास कई प्रकार की आपसी तल्खियों, शिकायतों, चिड़चिड़ाहटों, बेवफ़ाइयों के बावजूद और कारण ही बना रह सकता है। सिर्फ आपसी लगाव के कारण नहीं।'
ऊपर के दो पैरा कृष्ण बलदेव वैद की डायरी के हैं। डायरी का शीर्षक है -'अब्र क्या चीज है? हवा क्या है?'
डायरी के कई पन्ने पढ़ गए। फिर कवर पेज देखा तो पता चला हमको तो अब्र का मतलब ही नहीं पता। पता किया तो पता चला कि 'अब्र' का मतलब बादल।
वैद जी की डायरी पढ़ते हुए लगा कि हमको भी डायरी लिखनी चाहिए। वैसे फेसबुक में हम जो लिखते हैं वो डायरी ही तो है। फेसबुक पूछता है -'आपका दिमाग में क्या है?' जबाब में हम जो लिखते हो वही पोस्ट होता है।
कृष्ण बलदेव वैद जी का लेखन अलग तरह का रहा। उनके लेखन पर अश्लीलता का आरोप लगता रहा। अपनी एक बातचीत में उन्होंने कहा जो कहा उसका मतलब यही निकलता है कि उनके लिए अभिव्यक्ति का स्थान सबसे ऊंचा है।
अपने ऊपर अश्लीलता के आरोपों की फिक्र उनकी डायरी में इस बयान से पता चलती है:
'बिमल इन बाग' के प्रूफ तो पढ़ डाले, लेकिन उसके प्रकाशन को लेकर उत्साहित कम हूँ, चिंतित अधिक। उत्साह की कमी का कारण प्रकाशक 'नेशनल'। वहां से प्रकाशित होकर पुस्तक शायद ही कहीं पहुंचे। चिंता का कारण यह कि लोग फिर उसकी अश्लीलता को पकड़कर बैठ जाएंगे: वैद यौन ग्रंथियों का कथाकार है, बीमार है.....। जब तक कोई प्रकाशक तैयार नहीं हुआ मैं कोशिश करता रहा। अब वह मिल गया है तो मैं ठंडा हो गया हूँ।'
कृष्ण बलदेव वैद की डायरी पढ़ना रोचक है। अभी तो शुरू की है।

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Thursday, April 07, 2022

किताबें

 कल किसी सिलसिले में एक किताब खोज रहा था। किताब नहीं मिली लेकिन खोजने की प्रक्रिया में तमाम अनपढी , अधपढी किताबों से मुलाकात हुई। किताबें कुछ बोलीं भले नहीं लेकिन हमको लगा कि कह रही हों, क्या हमको अलमारी में रखने भर के लिए लाए थे? मन किया किताबों की अलमारी के पास खड़े होकर एक भावुक वक्तव्य रिकार्ड करके पोस्ट कर दें। लेकिन भावुकता का कोरम पूरा नहीं हुआ। स्थगित हो गया मामला।

तमाम अनपढी, अधपढी किताबें ऐसे जिगरी दोस्तों जैसी होती हैं जिनसे मिलने , बतियाने का बहुत मन करता है। लेकिन सोचते हैं तसल्ली से बैठेंगे। लेकिन फुरसत है कि मिलकर नहीं देती।
पिछले दिनों गीतांजलि श्री जी के उपन्यास रेतसमाधि को बुकर पुरस्कार के लिए नामित करने की खबर आई। मन किया उपन्यास खोजकर देंखे, पढ़ें। लेकिन किताबों की किस रैक में है, याद नहीं आया।
नामवर जी के बारे में संस्मरण लिखते हुए काशीनाथ जी ने लिखा है कि वे अपने बनारस में अपने घर में रखी किताबों के बारे में जानकारी देते हुए कहते थे -'फलानी रैक के फलाने नम्बर पर रखी होगी किताब। भेज देना।' अक्सर उनका अंदाज सही ही निकलता था।
एक सच्चे पाठक और किताब के संग्रही मात्र में यह अंतर होता है।
अब सोचा है कि घर में मौजूद किताबों की लिस्ट बनाएंगे। किताबें कहाँ रखीं हैं और पढ़ी हैं कि अधपढी हैं कि अनपढी इसके भी सूची। पढ़ें भले न सब लेकिन जब मन करें तब मिल तो जाएं।
वैसे भी पढ़ने की रफ्तार बहुत कम हो गयी है। कुल जमा एक-दो घण्टे पढ़ पाते हैं। दफ्तर और दीगर व्यस्तताएं किताबों से दूर रखती हैं।
इसके बावजूद कल दूधनाथ सिंह की 'नमो अंधकारम' जिसमें कुल जमा 116 पेज हैं दो दिन में खत्म की।
किताब की शुरुआत में पिकासो का कथन है -'यथार्थ के अनेक रंग होते हैं और उन सबको समेटने का अंत एक अंधेरे में होता है।'
किताब में गुरु के माध्यम से समाज के धतकरम के कुछ किस्से हैं। गुरु के किस्से बयान करते हुये कालिदास के बारे में निम्न जानकारी दी हुई है:
"तब धर्मप्राण ऋषिकुल ने उस शाप दिया-'तूने गुरु महेश्वर के संगोपन क्षणों का वर्णन किया है। तूने अदृश्य को देखा और अलेख्य को लिखा। तेरी उंगलियों में कोढ़ फूटेगा। अब तुझे कभी चैन नहीं मिलेगा। मित्रहीन , अकेला, बौराया हुआ तू किसी वनपथ पर मरेगा। तुझे चीलकौवे भी नहीं खाएंगे।'
उपरोक्त बात कालिदास रचित कुमार सम्भव के बारे में कही गयी है। इसमें शिवपार्वती के संगोपन क्षणों का वर्णन है। इसके बारे में हरिमोहन झा की खट्टरकाका में बीस-पच्चीस साल पहले पहले पढा था। हाल ही में कुमार सम्भव पढ़ने की उत्सुकता के चलते कालिदास ग्रँथवली मंगाई। किताब आते ही फटाक से कुमार सम्भव वाले अंश देखे। कुछ संगोपन क्षणों का वर्णन पढ़ते ही लगा कालिदास जी के लिए 'उपमा कालिदासस्य' क्यों कहा जाता है।
सोचा था आराम से पढ़ेंगे कालिदास ग्रंथावली। लेकिन तसल्ली मिली नहीं। यह भी अधपढी किताबों में शामिल हो गयी।
किताबें और भी पढ़ी हैं इस बीच। उनके बारे में भी लिखेंगे। जल्द ही। फिलहाल तो किताबों की सूची बनाने का मन है। देखिए कब तक बनती है।

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Wednesday, April 06, 2022

 साहित्य में वरिष्ठ लोगों के आपस के भ्रम एक दूसरे की तारीफ , सम्मान और पुरस्कारों से दूर होते हैं।


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Monday, April 04, 2022

परदेसियों से न अखियां लड़ाना



सूरज भाई भन्नाए हुए हैं। कुछ किरणें अभी तक धरती पर नहीं पहुंचीं हैं। सज-संवर रही हैं। इठलाती हुई एक-दूसरे से 'देख री, कैसी लग रही हूँ' पूछते हुए फिर-फिर तैयार हो रही हैं। दूसरी भी बिना उनकी तरफ देखे -'जम रही है, एकदम बिंदास' कहते हुए तैयार हो रही है।
सूरज भाई किरणों की लेट लतीफी से सुलग रहे हैं। धरती पर गर्मी बढ़ रही है। एक बच्ची किरण फूल तैयार है। मुंह फुलाये हुए कोने में बैठी है। सूरज भाई की लाड़ली है। वह गुस्सा है कि जिस फूल पर बैठने के लिए वह जाने वाली थी आज वह उसको एलॉट नहीं हुआ है। सूरज भाई उसको मना रहे हैं लेकिन वह मान नहीं रही। मनौना ले रही है।
असल में बच्ची किरण का फूल से 'वो' टाइप का हो गया है। कल दिन भर फूल ने हवा के सहारे हिल-हिलकर झूला झुलाया था। किरण का मन गुदगुदा गया। आज फिर वह उसी फूल पर जाना चाहती है। लेकिन सूरज भाई ने जब उसको कोई दूसरी जगह एलॉट की तो वह बमक गयी। मनमाफिक सीट न मिलने पर चुनाव न लड़ने की धमकी देते जनप्रतिनिधियों की तरह हरकतें कर रहीं। अब सूरज भाई कोई हाईकमान तो हैं नहीं जो बच्ची पर अनुशासन की कार्यवाही कर दें। बाप हैं बच्ची के। प्यार करते हैं अपनी लाड़ली को। प्यार मजबूत बनाता है तो मजबूर भी करता है।
सूरज भाई बच्ची किरण को समझाने में जुट गए। बताया ''जिस फूल पर जाने की तू बात कर रही उसको कल बंदरों ने नोच कर फेंक दिया। इसीलिए दूसरी जगह एलॉट की है तुझे।"
बच्ची किरण सूरज भाई की बात मान नहीं रही। उसका दिल 'टूट' टाइप का गया है। वह बिफर गयी-"आप झूठ बोल रहे हैं। वह वहीं होगा। कल विदा किया था उसने मुझे हिल-हिलकर। मुझे जाना है उसके पास। नहीं जाऊंगी तो वह मुझे बेवफा समझेगा। मैंने उससे प्रॉमिस किया था। मैं कोई नेता थोड़ी हूँ जो वादा करके मुकर जाऊं। मुझे जाना है उसके पास। वह मेरा इंतजार कर रहा होगा। "
सूरज भाई मजबूरन बच्ची किरण को साथ लेकर आये। वह जगह दिखाई जहां कल फूल खिला था। आज उसकी जगह एकाध पत्तियां थीं। फूल को बंदरों ने नोच डाला था। किरण दुखी हो गयी। कुछ देर गुमसुम खड़ी रही। फिर पास में खिली कली को गले प्यार करती हुई फूल के साथ बिताए समय को याद करती रही। रेडियो पर गाना बज रहा है -'परदेशियों से न अखियां मिलाना।'
किरण का मन किया रेडियो को उठाकर पटक दे। थूर दे बदमाश को जो ऐसा फालतू गाना बजा रहा है। परदेशी बता रहा है फूल को। बदनाम कर रहा उसको। लेकिन जगह छोड़कर जाने का मन नहीं हुआ उसका। कली को गले लगाए वहीं रही वह।
हमारे साथ चाय पीते किरण को कली के साथ खेलते देख सूरज भाई ने सुकून की सांस ली। सारा किस्सा सुनाया मुझे। हम लोग बातों में मशगूल थे इस बीच एक बंदर आया और चुपके से मेज पर रखा बिस्कुट का पैकेट उठा ले गया। एकदम सर्जिकल टाइप। सिर्फ पैकेट उठाया। चाय का कप हिला तक नहीं। हमने दौड़ाया तो आंखे दिखाने लगा।
एक हाथ में बिस्कुट का पैकेट लिए दूसरे हाथ से वह दूसरे बंदरो को भगाने में लगा था। बाकी के बंदर भी उस पर झपट पड़े। सब एक-दूसरे पर राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं की तरफ खौखियाने लगे। अंततः बन्दर के हाथ से बिस्कुट का पैकेट छूट गया। उस पर दूसरे मुस्टंडे बन्दर का कब्जा हो गया। वैसे ही जैसे एक पार्टी के एजेंडे को दूसरी शातिर पार्टी अपना बना लेती हैं।
कुछ देर बाद बंदरों के दोनों गुट चले गए। क्या पता दोनों गुट सारी घटना का वीडियो बनाकर अपने-अपने हिसाब से अपने लोगों में दिखाएं। अपने को दूसरे से बेहतर बताएं। उनके यहाँ भी चुनाव होते हों तो क्या पता इसी आधार पर वोट भी मांगे जाए । आखिर हमारे पूर्वज हैं वो। हमारी ही तरह तो हरकतें करेंगे।
बंदरों के ऊधम से कुचली हुई घास अपने जख्म पर सूरज की किरणों का मरहम लगा रही है। रिक्शे में बैठा हुआ रिक्शेवाला अखबार में चुनाव की खबरें पढ़ रहा है। उससे उतरकर बच्ची स्कूल जा रही है। सूरज भाई चाय खत्म करके वापस चमकने लगे।
सुबह हो गयी है।

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Sunday, April 03, 2022

मुस्कराओ , खिली रहो हमेशा



कानपुर में हमारे एक साथी थे –होदा जी। बातचीत के दरम्यान वे उर्दू शब्दों का इस्तेमाल करते। बाकी शब्द तो और लोग भी इस्तेमाल करते थे। उन पर ध्यान नहीं जाता। लेकिन वे ‘अलग’ की जगह ‘अलहदा’ कहते तो ध्यान जाता उस पर। ‘ये अलहदा है, इसको अलहदा रखना होगा’- इसी तरह से अलहदा आता उनकी बातचीत में। बीस साल पहले प्रयोग किए एक शब्द के जरिए उनके साथ की तमाम बातें अनायास याद आ जाती हैं। उनकी शक्ल, उनका हुलिया,उनकी दाढ़ी। एक शब्द ‘अलहदा’ के जरिए ‘होदा जी’ की यादों की पूरी फ़ाइल यादों की स्क्रीन में भक्क से खुल जाती है।
बोलचाल के दरम्यान हम जिन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं उनमें से ही कुछ हमारे व्यक्तित्व का एक्सरे होते हैं। हमारे द्वारा बोला गया कोई एक वाक्य हमारी पूरी समझ, सोच और नजरिए का श्वेतपत्र होता है। हो सकता है हम उसे अनजाने में, लोगों की देखा-देखी प्रयोग करते हों, लेकिन सुनने वाला अपनी समझ से उससे हमारे बारे में एक समझ बनाता है। हमारे द्वारा बोले शब्द हमारे राजदूत होते हैं।
आजकल अक्सर बातचीत में सुनते हैं –‘देखना पड़ेगा।‘ कोई सूचना मांगने पर अक्सर जबाब मिलता है –‘देखना पड़ेगा साहब।‘ तीन शब्द का यह जबाब एकसाथ अनेक सूचनाएं देता है जबाब देने वाले के बारे में –‘जानकारी नहीं है’, ‘इसका अंदाज नहीं है’,’ देखने का मूड नहीं है’, ‘कहोगे तो देखेंगे’ और भी कई कोण हो सकते हैं इस जबाब के। कुल मिलाकर एक अनुत्साह की मुद्रा में दिया जबाब है यह।
इसी के बरक्स कोई अगर यह जबाब मिलता है – ‘अभी बताते हैं ’, ‘दो मिनट/थोड़ी देर का समय दीजिए बताते’ – इसी तरह का कोई भी जबाब सुनकर लगता है अगला कितना धनात्मक है। हो सकता है ‘देखना पड़ेगा’ जबाब देने वाला ‘अभी बताते हैं’ की तुलना में ज्यादा कर्मठ, समर्पित और कुशल हो लेकिन उसका जबाब पहली नजर में उतना अच्छा नहीं लगेगा जितना कि ‘अभी बताते हैं।
बातचीत, लिखा-पढ़ी के दरम्यान कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनको सुनते ही मन खुश हो जाता है। कई बार उनका सही-सही मतलब भी नहीं पता होता लेकिन उनके सुनते, बोलते, लिखते, पढ़ते मन अनायास गदगद हो जाता है, गुलगुल, प्रफुल्लित, प्रमुदित, किलकित और भी न जाने क्या-क्या।
ऐसे ही एक शब्द है- कायनात। कायनात का मतलब Universe, ब्रह्मांड। लेकिन Universe, ब्रह्मांड के मुकाबले मुझे कायनात कई गुना ज्यादा प्यारा शब्द लगता है। ज्यादा क्यूट, ज्यादा खूबसूरत। शायद ऐसा ‘कायनात’ के Universe, ब्रह्मांड के मुकाबले स्त्रीलिंगी ध्वनि के चलते हो लेकिन सम्पूर्ण ब्रह्मांड, whole Universe के मुकाबले ‘समूची कायनात’ मुझे इतना आकर्षक लगता है कि बार-बार इसे प्रयोग करने का, पढ़ने का, मन करता है।
इसी तरह के अनेक शब्द युग्म अनायास आकर्षक लगते हैं। ‘रोशनी की मीनार’, ‘रोशनी की कंदील’, ‘घाटियों में फूल’। अपन को पता नहीं कि घाटियों में फूल खिले हुए कैसे लगते हैं लेकिन अनजाने जेहन में यह ख्याल गहरे धंसा है कि घाटियों में खिले फूल बहुत खूबसूरत लगते होते होंगे। Anurag Aryaअनुराग आर्य की न जाने कब की एक पोस्ट ‘उम्मीद की साढ़े पाँच फुटी लौ ’ ( http://anuragarya.blogspot.com/2009/04/blog-post_28.html ) के चलते याद है। विनीत Vineet Kumar से जब भी बात होती है तो उनकी ‘दियाबरनी ’ (http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post.html )का जिक्र जरूर होता है।
कोई शब्द, कोई शब्द युग्म किसी को पसंद आने के अनेक कारण होते होंगे। हम अपने सोच के हिसाब से शब्दों को पसंद करते हैं। जबलपुर रहने के दौरान सीखा शब्द ‘अपन’ मुझे जबलपुर प्रवास की तमाम उपलब्धियों में से एक लगता है। मैं, हम में थोड़ा अहं का भाव सा लगता है । 'अपन' में समरस और मिलजुल का भाव है।
‘उजास’ शब्द भी बहुत प्यारा लगता है मुझे। जैसे घर का बड़ा होता बच्चा। इसी को प्रयोग करने के लिए हमने एक कविता भी लिख मारी –तुम मेरे जीवन का उजास हो। इंसान अपने प्यार का इजहार करने के तरीके भी खोज ही लेता है।
दयानंद पाण्डेय जी Dayanand Pandey द्वारा अक्सर प्रयोग किया जाने वाला शब्द ‘बादबाकी’ मुझे इतना आकर्षक लगता है कि उनकी उनकी तमाम सोच, तेवर, बातों, धारणाओं से असहमत और 'अलहदा' विचार होने के बावजूद उनके लेख पढ़ने का मन करता है।
बातें तो बहुत हैं कहने को। लेकिन दीगर काम भी बहुत सारे हैं लिहाज फिलहाल इतना ही। ‘बादबाकी’ एक पुरानी कविता यहां पेश है जिसमें कायनात भी है, रोशनी भी है, सूरज भाई भी हैं, मुस्कान भी है मतलब वह तमाम कुछ जिनका प्रयोग मुझे अच्छा लगता है। कविता मेरे आवाज में सुनने का मन हो तो लिंक टिप्पणी बक्से में है।
बताते चलें कि कल से इस लेख का शीर्षक तय कर रखा था -अलहदा, कायनात और बादबाकी। लेकिन अभी कविता दिख गई तो शीर्षक बदलकर हो गया -मुस्कराओ, खिली रहो हमेशा। यह होता प्रभाव पसंदीदा शब्दों का।
तुमको मुस्कराते देखा
तो मन किया
स्टेच्यू बोल दूँ तुमको
ताकि मुस्कान बनी रहे
तुम्हारे चेहरे पर हरदम।
पर फिर सोचा
फिर तो तुम बनकर
रह जाओगी मैनिक्वीन
जिसमे चस्पा रहती है
हमेशा एक सी मुस्कान।
अब यह चाहता हूँ
कि हमेशा मुस्कराओ
नए नए अंदाज में
हर अंदाज पहले से अलग।
मुस्कराओ
खिली रहो हमेशा
जैसे खिलते हैं घाटियों में फूल
बगीचे में फूलों पर इतराती हैं तितलियाँ
और मुस्कराती है कायनात सूरज की किरणों के साथ।
-अनूप शुक्ल

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Saturday, April 02, 2022

कहां से चले और कहां पहुंच गए

 कल पहली अप्रैल थी। मूर्ख दिवस। हमने सोचा कोई बेवकूफ बनाएगा। लेकिन दिन बीत गया। किसी ने नहीं बनाया। हो सकता है किसी ने बनाया हो लेकिन बताया न हो। यह भी एक तरीका है बेवकूफ बनाने का। इस तरीके से तो जिंदगी भर बेवकूफ़ बनाते रहते हैं। लोग उन गुणों की तारीफ कर देते हैं जो हममें हैं ही नहीं। यह डंके की चोट पर बेवकूफ बनाना है।

लिखना-पढना सब स्थगित सा है आजकल। आइडिये जितने आते हैं वो अमल के इंतजार में बूढ़े होते जाते हैं, किसी सफल लोकतंत्र में नौकरी की तलाश में बूढ़े होते युवाओं की तरह। हम आइडियों से कहते हैं -'अमल में लाएंगे तुमको भी जल्दी ही'। आइडिये मेरे इस आश्वासनों पर हर बार यकीन कर लेते हैं। पूरी दुनिया आश्वासनों के भरोसे जी रही है। आशा है तो जीवन है।
मेरा मन करता है कि उपन्यास लिखा जाए। शुरू करके पांच-सात ड्राफ्ट घसीट दिए जाएं। इसके बाद फाइनल करके पोस्ट कर दें किसी ऑनलाइन साइट में। लेकिन लिखें कैसे यह पता नहीं। लोग कहते हैं अज्ञानता वरदान है। लेकिन इस मामले में अज्ञानता का फल मिल नहीं रहा है। उपन्यास लिखा नहीं जा रहा है।
श्रीलाल शुक्ल जी ने एक बातचीत में कुछ ऐसा कहा था कि हर लेखक के साथ एक “लेखन संगिनी” होनी चाहिए। लेखन के लिए न्यूनतम सुविधा की तरह चाहत थी उनकी।तमाम लोग जिनका लेखन ठहर गया है, यह टोटका आजमा कर देखें।
हमारे पास तो मूल कमी समय और अनुभवों की है। समय तो खैर किसी के पास होता नहीं, निकालना पड़ता है। अनुभव के लिए मेहनत करनी होती है। अनुभव के लिए दुनिया से जुड़ना पड़ता है। पढ़ना, घूमना, मिलना, जुलना, साझा करना , सोचना, विचारना यह सब अनुभव हासिल करने के जरिये हो सकते हैं।
लेकिन खाली अनुभव से ही क्या होगा। अनुभव को पका कर अच्छे से पेश करना ही तो हुनर है लेखन का। वो कहां से आएगा। वो नन्दन जी कहते हैं न :
मैं कोई तो बात कह लूं कभी करीने से,
खुदारा मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे।
पता नहीं हुनर कब आएगा। क्या पता कभी आएगा भी कि नहीं। लेकिन जब आएगा तब आएगा । जब आएगा तब करीने से कह लेंगे। अभी बेकरीने से कहने से कोई रोकता थोड़ी है। करीने से कहने के इंतजार में रहेंगे तो कह ही नहीं पाएंगे। अभी तो भवानी प्रसाद मिश्र जी की बात का सहारा लेते है:
जिस तरह हम बोलते हैं
उस तरह तू लिख
और इसके बाद भी
हमसे बड़ा तू दिख।
पता नहीं भवानी जी कैसे सोचते थे। जैसे भी सोचते होंगे लेकिन उनसे बड़ा दिखने की तो अपन सोच भी नहीं सकते।
कहां से चले और कहां पहुंच गए। बेवकूफी कुछ इससे अलग होती है क्या ?

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