Friday, October 10, 2025

लखनऊ की एक सुबह

 सबेरे दूध लेने गए। धूप निकल आई थी। सूरज भाई दिख नहीं रहे थे। लेकिन सूरज की किरणें सड़क पर कालीन की तरह बिछी थीं। हमको लगा इधर कहीं से सूरज भाई निकलेंगे और हमको टिपियाते हुए कहेंगे- कहां टहल रहे हो सुबह-सुबह?

सड़क किनारे धूप की कालीन पर बैठा एक कुत्ता अपनी टांग से अपना कान खुजा रहा था। कान खुजाते हुए वह चकरघिन्नी की तरह सड़क पर घूमता भी जा रहा था। टांग के पंजे कान में तेजी से कंघी जैसे करने के बाद उसका घूमना बंद हो गया। कान खुजलाने के बाद उसके चेहरे पर परमानंद की आभा पसर गई।
दूध वाले की दुकान खुल गई थी। दूध लेने के बाद पास के ही एटीएम से पैसे निकालने गए। कार्ड घुसा ही नहीं। कई बार कोशिश करने के बाद लगा कि कुछ गड़बड़ है। बाहर निकलकर बगल की दुकान वाले से पता किया तो उसने बताया कि शाम से खराब है एटीएम। पास ही दूसरा एटम भी था। वहां से पैसे निकालने गए। चौकीदार ने बताया -' कौनौ
बदमाशी कीहिस होई। खराब हुईगा होई। आजकल कोहू का कौनौ भरोसा थोरी है।'( किसी ने बदमाशी की होगी।खराब हो गया होगा। आजकल किसी का कोई भरोसा थोड़ी है।)
दोपहर बाद मेट्रो में बगल में बैठे बुजुर्ग से बात हुई। शरीफ, सावधान, गंभीर बुजुर्गों की तरह छुटका बैग लटकाए हुए गंभीरता से बैठे हुए थे। चुप, शान्त। बतियाने के लिहाज से उनसे मैने कहा -' आपकी शर्ट का रंग अलग तरह का है। था काले और स्लेटी रंग को मिलाकर बना कोई रंग।' फिर तो रंग के बारे में कयास लगने लगे। लेकिन तय नहीं हुआ कि कौन सा रंग था उनकी कमीज की।
उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद पसन्द किया है कमीज का रंग। यह भी बताया कि घर के लोगों के कपड़े भी वही खरीदते हैं।हमने पूछा इसका क्या मतलब है? उनकी पसंद पर घर वालों को भरोसा है या उनके आगे किसी की चलती नहीं?
इस पर उन्होंने बताया कि उनकी पसन्द पर घरवालों को भरोसा है। यह बड़ी बात लगी। मेरी तो कपड़ों की पसंद पर मुझे खुद इत्मीनान नहीं। इसीलिए कभी कोई सामान खरीदने का कोई झंझट नहीं।
पता चला कि वो बुजुर्ग बैंक से बारह साल पहले रिटायर हुए। बैंक ऑफ इंडिया ने मुलाजिम थे। मुंबई में छह साल नौकरी के अनुभव बताए। वहां जावरी बाजार इलाके की उनकी बेंच में अरबों रुपए का लेनदेन होता था। बातचीत करते हुए मेट्रो रुकी तो अचानक झटके से खड़े हो गए कहते हुए -' अरे मेरा स्टेशन आ गया। बातचीत करते हुए समय पता ही नहीं चला। '
हम कहने वाले थे कि हर यात्रा के साथ ऐसा होता है। लेकिन जब तक कहें तब तक वो उतर गए थे। मेट्रो चल दी थी थी। हमारा डायलॉग मारने का मौका निकल गया। डायलॉग मायूस हो गया। हमने उसको समझाया कोई बात नहीं बेटा। फिर मौका आयेगा। अभी याद आ गया तो लिख दिया। डायलॉग मुस्करा रहा होगा।
आज सुबह लखनऊ से बंगलौर आए। लखनऊ से बंगलौर आते हुए जेन जी पीढ़ी की बालिकाओं से बात करते हुए आए। एहसास हुआ कि पीढ़ी के अंतर के हिसाब से अनुभव के कारण सोच में अंतर के बावजूद तमाम मानव मूल्य सभी पीढ़ियों के लिए एक जैसे होते हैं।
बंगलौर पहुंचकर लपकते हुए लाउंज में नाश्ता किया। दो रुपए में जितना नाश्ता किया उतने के दम एयरपोर्ट पर दो हजार से कम क्या होंगे।
अब बंगलौर से आगे लक्षद्वीप के लिए बोर्डिंग करते हुए यह पोस्ट लिख रहे हैं। आगे के किस्से लक्षद्वीप से। आप मजे करिए। जो होगा देखा जाएगा।

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Thursday, October 09, 2025

करवा चौथ की ख़रीदारी

 


कल शाम को बाजार गए। करवा चौथ की पूजा का सामान लेने। कल है करवा चौथ। पति के लंबी उम्र की कामना के लिए महिलायें यह व्रत रहती हैं। दिन भर बिना अन्न-जल के व्रत रहना कष्ट कर होता है। अधिकतर महिलाओं की तबीयत खराब हो जाती है। लेकिन वे व्रत रहती हैं। अपने जीवन साथी के जीवन के लिए कष्ट सहती हैं।

इतिहास में इस बात का जिक्र होता है कि बाबर ने अपने बेटे हुमायूँ के बीमार पड़ने उसके ठीक होने की दुआ माँगी थी। हुमायू ठीक हो गया, बाबर बीमार हो गया। बाद में बाबर का इंतक़ाल भी हो गया।
स्त्रियाँ अपने जीवनसाथी के जीवन को लंबा करने के लिए ख़ुद का जीवन ख़तरे में डालती हैं। हर साल लाखों महिलाएं करवा चौथ का और तमाम दूसरे व्रत रहती हैं जिनमें वे अपने घरवालों के जीवन के लिए दुआयें करती हैं। यह आम बात है इसलिए इतिहास में दर्ज नहीं होती। इतिहास में खास बातें दर्ज होती हैं।
घर के पास ही चर्च रोड पर पूजा के सामान की कई दुकानें हैं। पहले बाजार घर से दूर होते थे। अब बाजार आपके घर के पास आ गया है। घर से निकलते ही बाजार शुरू हो जाता है। बल्कि घर में ही घुसा हुआ है बाजार। मोबाइल में आर्डर करो, पैसा खर्च करो, सामान हाजिर।
पूजा के लिए करवा और मिट्टी के सामान लगाए कई दुकानें थीं। सबसे पहले वाली के सामने एक बुजुर्ग महिला छुटकी चाक पर मिट्टी के सकोरे बना रही थी। प्रसन्न मुख हाथ से चाक घुमाते हुए सकोरे बना रही थी। उसके पीछे एक महिला खटिया पर लेटे बच्चे के ऊपर पंखा घुमाते हुए सुला रही थी। यह पंखा डुलाती हुई महिलाएँ तो पहले भी कई बार देखी थीं लेकिन चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाते महिला पहली बार दिखी।
दुकान पर कई तरह के मिट्टी के बर्तन थे। हमें लगा कि सब इसी दुकान पर बनाए गए होंगे। लेकिन दुकान पर सामान बेचते बच्चे ने बताया कि वो सब सामान थोक में बाजार से लाया है। यहाँ बस कुछ सकोरे ही बनाए हैं। यह जानकर याद आया कि बाजार का भी एक बड़ा बाज़ार होता है।
मिट्टी के बर्तन लेने के बाद बाक़ी पूजा के सामान के लिए सड़क पार करके दूसरी दुकान गए। सामान लेने के बाद बालिका ने पैसे कैलकुलेटर पर जोड़े। भुगतान के स्कैनर के लिए देर तक मोबाइल इधर-उधर खोज। मिला नहीं तो तेजी से और हड़बड़ी में खोज। मोबाइल उसके पास ही एक कागज के नीचे बरामद हुआ। भुगतान किया। लौट लिए।
वापस लौटते समय देखा एक आठ-दस साल का बच्चा एक ठेलिया पर मिट्टी के बर्तन और कुछ पूजा का सामान बेच रहा था। उसकी ठेलिया पर कोई खरीदार नहीं दिखा। बच्चा आशा में इधर-उधर देखता खड़ा था। क्या पता कोई ग्राहक उसके पास भी आए और सामान ख़रीदे।
घर आकर सामान की जांच हुई। सामान तो सब थे लेकिन एकाध सामान क्वालिटी चेक में फेल हो गए- 'ये क्यों लाए, वो लाना चाहिए था।' लेकिन आख़िर में कह-सुनकर सब सामान पास करा लिए गए।
सामान के साथ में हम चलनी भी लाए थे। पूजा के बाद अपने जीवन साथी को इसके माध्यम से देखती हैं महिलायें। सवाल हुआ -' तुम तो कल बाहर जा रहे हो। इसका क्या उपयोग होगा?' हमने कहा -'मोबाइल में देख लेना।' मतलब अभी तक जीवनसाथी के बीच में चलनी थी, अब मोबाइल भी आ गया।
लेकिन लगा चलनी तो एक दिन की बात। उसके तो आरपार दिखता है। लेकिन मोबाइल तो लोगों के बीच पक्की दीवार की तरह जमा हुआ है। बगल में रहते हुए भी दूर किए है। बड़ा बदमाश है। ऐसा बदमाश जो बहुत अजीज लगता है और जिसके बिना लगता है गुजारा नहीं होगा।
मोबाइल से जीवनसाथी को देखने से याद आया कि आजकल में ही हमारे पहले कविता संग्रह का ई बुक संस्करण प्रकाशित होगा। प्रकाशित हो जाये तब उसका भी 'मोबाइल विमोचन 'करेंगे। कविता संग्रह का नाम है -'अंधेरे का बड़प्पन।'
पढ़ेंगे मेरी कविताएँ?

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Wednesday, October 08, 2025

हमेशा देर कर देता हूं मैं




 कल सबेरे चाय बनाई। पी। इसके बाद अगली चाय के लिए दूध लेने गए। दुकान अभी खुली नहीं थी। बाहर ट्रे में दूध के पैकेट रखें थे। लोग अपनी जरूरत के हिसाब से पैकेट लेते जा रहे थे। लोग दुकान के बंद शटर के पास चिपके क्यू आर कोड से स्कैन करके भुगतान करते जा रहे थे। बगल में पान मशाले के पैकेट लटकाये हुए आदमी पूछने पर दूध के दाम बताता खड़ा था। हमने दूध लेकर बताया -"पेमेंट कर दिया।" अपने मुँह में रखें पान मसाले के आनंद में डूबे उस आदमी ने बिना मेरी तरफ़ देखे आँख मूँदकर मुंडी हिलाई। उसकी हिली हुई मुंडी -भुगतान प्राप्ति की रसीद थी।

अक्सर लोग यूरोप के कुछ देशों का हवाला देते हुए बताते हैं कि वहाँ कोई दुकानदार तैनात नहीं रहता। काउंटर पर सामान, अधिकतर फल, रखें रहते हैं। लोग सामान लेते हैं। भुगतान करते हैं। चले जाते हैं। कल दूध की दुकान पर भुगतान व्यवस्था देखते हुए लगा अपना देश भी आंशिक यूरोप हो गया है। यह बात लिखते हुए लग रहा है कि कहीं इसको पढ़कर सरकार अखबारों को विज्ञापन के बहाने पैसे देने का एक और विज्ञापन न तैयार कर ले- माननीय के कुशल नेतृत्व में देश/प्रदेश ने यूरोप की बराबरी की।
सड़क पर तमाम बच्चे नीली ड्रेस में HAL की तरफ़ जाते दिखे। दो-दो, चार-चार के समूह में। नीली ड्रेस से बहुजन समाज पार्टी का ध्यान आया। पहले तो लगा कि किसी स्कूल के बच्चे हैं। पूछने पर पता चला कि HAL में अप्रेंटिस करने वाले बच्चे हैं। एक साल की अप्रेंटिस का कोर्स है।सुबह सवा आठ बजे से शाम चार बजे तक क्लास चलती है। हमारे देखते-देखते पचास-साठ बच्चे नीली ड्रेस में HAL की तरफ़ जाते दिखे।
HAL से याद आया कि पिछले दिनों पुराने कागजों में एक काग़ज़ दिखा था जिसमें HAL में भर्ती के लिए इंटरव्यू के लिए बुलावा आया। उस समय तक शायद यूपीएसईबी में नौकरी कर रहे थे तथा इंजीनियरिंग सर्विसेज में सेलेक्शन हो गया था। इसलिए इंटरव्यू देने गए नहीं। गए होते तो क्या पता आयुध निर्माणी बोर्ड के बजाय HAL से रिटायर होते। महीने की नियमित पेंशन के बजाय खर्चे का कोई वैकल्पिक उपाय हुआ होता।
लेकिन ये तो 'अगर ऐसा हुआ तो वैसा होता जैसी बातें' हैं। अपने यहाँ का सबसे रोचक टाइम पास का बहाना। औरंगज़ेब के बजाय दारा शिकोह बना होता, 1857 में आजादी की पहली लड़ाई में अंग्रेज हार जाते, प्रधानमंत्री नेहरू की बजाय पटेल होते, महात्मा गांधी दस साल और जीते, जनता पार्टी ने जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाया होता। इनका कोई मतलब नहीं इसीलिए हम इन पर बेहिसाब बहस करते रहते हैं। बेमतलब की बहस में पास से कुछ जाता नहीं सिवाय समय के। और समय तो बेहिसाब है अपने पास। खर्च ही नहीं होता।
दूध लेने के बाद सोचा कुछ फल भी ले लें। HAL के आगे बढ़ते गए। कोई दुकान खुली नहीं दिखी। एक जगह सार्वजनिक शौचालय के बाहर लोगों की 'दिव्य निपटान' करने वालों का जमावड़ा लगा था। लोग तसल्ली से अंदर जाते,बाहर आते दिख रहे थे। एक ने हाथ की खैनी मुँह के हवाले करते हुए बताया -'आगे दुकान है खुल गई होगी।'
फल की दुकान पर फल देने वाले ने अपना नाम बताया बिलाल। हमने नाम का मतलब पूछा तो उसको पता नहीं था। हमने गुगलिया के बताया -बिलाल मतलब गीला करना, नमी या ताजगी होता है। मुस्लिम बच्चों के नामों बिलाल नाम का मतलब होता है पहला मुअज्जिन (नमाज के लिए बुलाने वाला) पैगंबर मुहम्मद का साथी।
नाम का मतलब पता करके बिलाल को बताया। बालक ख़ुश हुआ लेकिन तब तक हम भुगतान कर चुके थे इसलिए इसके बदले में बालक के चेहरे की खुशी ही हासिल हुई। किसी के चेहरे की खुशी बेशक़ीमती होती है। हम खुश मन वापस लौट पड़े।
रास्ते में एक जगह कुछ लोग बैठे हुए आपस में गपिया रहे थे। एक उजड़े हुए शेड के नीचे कुछ कुर्सियाँ पड़ी थीं। देखने से लग रहा था कभी यह जगह बस स्टॉप रहा होगा। लोग यहाँ बसों का इंतज़ार करते होंगे। आज इसकी उजाड़ हालत देखकर लगा कि हर नई बनी इमारत का भविष्य एक उजाड़ खंडहर होता है। नई इमारत और उजाड़ खंडहर के बीच का समय उस इमारत का इतिहास होता जिसे लोग अपने -अपने हिसाब से पढ़ते हैं।
बस स्टैंड से आगे HAL के सामने की सड़क से लौटते समय कुछ नीली ड्रेस वाले बच्चे लपकते हुए बच्चे HAL की तरफ़ जाते दिखे। उनको शायद देर को गई थी। देरी से मुझे मुनीर नियाज़ी की ग़ज़ल याद आई :
हमेशा देर कर देता हूं मैं
हमेशा देर कर देता हूं मैं
ज़रूरी बात कहनी हो
कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो
उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूं मैं
पूरी ग़ज़ल मुनीर नियाज़ी की आवाज़ में सुनने का मन हो तो लिंक टिप्पणी में दिया है।
इतना लिखने के बाद लगता है निकलना चाहिए वरना देर हो जायेगी।
PS:
1. कल बिलाल नाम का मतलब पता होने पर याद आया कि पंडित वंशीधर शुक्ल ने गीत लिखा था :
उठ जाग मुसाफिर भोर भई
अब रैैन कहां जो सोवत है
जो सोवत है सो खोवत है
जो जागत है सो पावत है।
इस लिहाज से देखा जाए तो शुक्ल जी हमारे बिलाल थे जिन्होंने हमको जागने के लिए यह गीत लिखा। इसी का विस्तार करें तो हर समाज में जो अपने लोगों को जगाने का काम करता हो, दिशा देता है वह अपने लोगों के लिए बिलाल होता है। लेकिन आज के समय में यह लिखने में खतरा है कि कोई कहेगा भाई तू उधर ही चला जा। यहां तो ये नहीं चलेगा। इसलिए इसको लिख नहीं रहे हैं। आप खुद समझदार हैं।
2. ‘देर कर देता हूँ’ सुनते हुए एक गाड़ी के पीछे -‘दुर्घटना से देर भली’ लिखा देखा तो लगा कि नियाजी साहब की ग़ज़ल दुर्घटना से बचाव के लिए लिखी गई है। नियाजी साहब की ग़ज़ल को दुर्घटना से बचाव के आह्वान के लिए प्रयोग की जानी चाहिए।

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Tuesday, October 07, 2025

भरोसा टूटने नहीं देंगे



 मेट्रो स्टेशन से करीब सौ मीटर दूर थे कि मेट्रो आती दिखी। स्टेशन पहुँचने तक रवाना भी हो गई। सोचा कि अगली मेट्रो चार-पाँच मिनट बाद आएगी। उसे पकड़ने के लिए थोड़ा लपकते हुए आगे बढ़े। लिफ्ट, सामान चेकिंग, कार्ड स्वैपिंग की बाधाओं को पार करते हुए एस्केलेटर तक पहुंचे। मेट्रो के आने की आवाज सुनाई दी। एस्केलेटर के ऊपर जाने के साथ हम भी उचकते हुए आगे बढ़े । हमारे आगे एक लड़की भी लपकती हुई बढ़ रही थी। प्लेटफार्म पर पहुंचते ही ट्रेन आ गई। ट्रेन का आख़िरी डब्बा हमारे सामने था। हम लपककर अंदर दाखिल हुए। दूसरे दरवाज़े से वह लड़की भी दाखिल हुई जो हमसे आगे लपकते हुए प्लेटफार्म पर आई थी।

‘मेट्रो पकड़ ही ली ’ कहते हुए ख़ुशी का इजहार किया तो बगल में बैठी बालिका ने भी ‘ हाँ’ कहते हुए ‘ ख़ुशी’ का इजहार किया। बालिका ने अपने बैग से पेपर नैपकिन निकाला । उसे अपने चेहरे पर दबाते हुए घुमाया। जिस तरह तेल से परहेज करने वाले कोलेस्ट्रॉल पीड़ित लोग पकौड़े खाने से पहले उसके ऊपर का तेल कागज से पोंछते हैं कुछ उसी तरह बालिका ने चेहरे को पोंछा ।
चेहरा पोंछने के बाद बालिका ने बालों की क्लिप निकाली। बाल खोले। जूड़ा बनाया। क्लिप लगाई। बैग से मोबाइल निकाला। मोबाइल समंदर में छपाक से डूब गई।
अगले स्टेशन पर अन्य सवारियों के साथ एक बालिका मेट्रो में दाखिल हुई। हमारे और हमारे बगल में बैठी मोबाइल समंदर में डूबी बालिका के बीच की सीट पर बैठ गई। बालिका के हाथ में अंग्रेजी कोई किताब थी। सीट पर बैठकर वह किताब पढ़ने लगी। बहुत दिनों बाद मेट्रो में कोई किताब पढ़ते मिला था।
हमारा ध्यान पहले से बैठी, चेहरा पोंछती, जूड़ा बनाती, मोबाइल में डूबी बालिका से हटकर किताब पढ़ती बालिका की तरफ़ लग गया। देश, दुनिया में आजकल ऐसा ही हो रहा है। एक चीज पर कायदे से ध्यान नहीं जा पाता कि दूसरी चीज सामने आ जाती है। एक अफ़वाह पर क़ायदे से चिंतित होने के पहले ही दूसरी अफ़वाह फैलने लगती है। पहले अफवाहें महीनों तक जिंदा रहती थीं। आजकल अफवाहें 'दिन जीवी' हो गई हैं। आज फ़ैलीं कल निपट गयीं। उसकी जगह नई अफ़वाह ने गद्दी संभाल ली।
हाँ तो हम बता रहे बगल में बैठी लड़की के अंग्रेजी की किताब पढ़ने की। लड़की के हाथ में जो किताब थी उसका नाम था - poor little bitch girl. लिखने वाले का नाम जैकी कॉलिन्स (Jackie Collins)। गूगल में खोजी किताब का तो पता चला कि 1965 में Poor Little Witch Girl नाम से उपन्यास लिखा था फ्रेंच लेखिका Marie Desplechin ने। हमें लगा कि फ्रेंच से शायद अनुवाद किया हो जैकी कॉलिन्स ने। लेकिन किताब और जैकी कॉलिन्स का संबंध मिला नहीं। हमें यह भी लगा कि शायद नाम ग़लत पढ़ लिए हों। सोचा दुबारा नाम देखें बालिका की किताब का। लेकिन इस बीच नैपकिन वाली लड़की उतर गई थी। किताब वाली लड़की उसकी सीट की तरफ़ सरक गई थी।उसके सरकने से हमारे और उसके बीच बनी जगह पर एक और सवारी आकर बैठ गई थी। बालिका और उसकी किताब हमसे एक सीट दूर हो चुकी थी।
हमने एक बार फिर किताब खोजी। इस बार जैकी कॉलिन्स की लिखी किताबें देखीं। पता चला दस साल पहले दुनिया से जा चुकी लेखिका का सत्ताईसवाँ उपन्यास है poor littel bitch girl. उपन्यास के बारे जानकारी लेने पर पता चला कि
Poor Little Bitch Girl is a new, sexy, and explosive novel from perennial best-seller Jackie Collins. (बेस्ट-सेलर जैकी कोलिन्स का एक नया, सेक्सी और विस्फोटक उपन्यास है।)
मन किया इस बात पर नई पीढ़ी की निन्दा करें कि वह सेक्सी और विस्फोटक किताबें पढ़ती है। लेकिन फिर लगा कुछ भी पढ़े वह पढ़ती तो है।
कुछ देर में बालिका अपने उपन्यास को बंद करके फ़ोन पर बात करने लगी। बात करते-करते अगले स्टेशन पर उतर गई। हम भी बाकी यात्रियों को देखते हुए अपने स्टेशन के आने का इंतज़ार करते रहे।
स्टेशन आने पर बाहर निकलते हुए कार्ड लगाने के बावजूद बाहर जाने वाला अवरोध हटा नहीं। यह देखकर बगल वाले बाहर जाते एक बालक ने कहा -"कार्ड उल्टा करके लगाओ।" बालक हमको मुफ्त की सलाह देकर निकल गया। हमने उसकी बात को नजरअंदाज करते कार्ड को फिर से लगाया तो अवरोध हट गया। हम बाहर निकल आए।
मुफ्त की सलाह देना देश के लोगों का सामान्य शिष्टाचार है। देश के नागरिकों की पहचान के लिए लोगों की मुफ्त की सलाह देने की आदत का उपयोग किया जा सकता है। देश के लोगों की नागरिकता का आधार से भी अधिक पुख्ता प्रमाण है -"बिना मांगे सलाह देना।"
स्टेशन पर उतरकर ऑटो किया। हमसे काफ़ी दूर था चौराहे पर ऑटो वाला। सामान्य तरीके से आता तो उसे घूमकर आना पड़ता । हम उसकी लोकेशन देखकर , उसे फ़ोन करके, उसके पास चले गए। सौ कदम चलकर ऑटो का सात सौ मीटर का चक्कर , देश का ईंधन, पर्यावरण, प्रदूषण बचाया। लेकिन इस बात के मीडिया कवरेज के लिए कोई इंतजाम नहीं था। इंतजाम होता तो पता चलता दुनिया को कि सौ कदम चलकर ऑटो की दो किलोमीटर की यात्रा बचाना देश-दुनिया के पर्यावरण रक्षा के लिए कितनी बड़ी कुर्बानी है।
ऑटो में बैठते ही डुओलिंगों का नोटिफिकेशन बजा मोबाइल में। एक सच्चे आशिक़ की तरह डुओलिंगों का संदेश था -"मैं आपका पीछा कभी नहीं छोड़ूँगा। आपने अभी तक प्रैक्टिस नहीं की है फिर भी मुझे विश्वास है आप अभ्यास करेंगे।"
अभी उस संदेश को पढ़ते हुए मुझे लगा कि कोई तो है इस दुनिया में जिसको मुझ पर भरोसा है। हमको वसीम साहब का शेर याद आ गया :
'मैं इस उम्मीद में डूबा कि वो बचा लेगा
अब इसके बाद वो मेरा इम्तहान क्या लेगा?'
देश, दुनिया में तो लोग भरोसा करने वाले के झांसे में आकर डूब रहे हैं लेकिन हमने तय किया हम डुओलिंगों का भरोसा टूटने नहीं देंगे। हम स्पेनिश का अभ्यास करने जा रहे हैं डुओलिंगों के पास।
हमे विश्वास है कि आप यह पोस्ट पढ़ेंगे। पढ़कर बताएँगे भी। मैं आपका पीछा नहीं छोड़ने वाला।

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Sunday, October 05, 2025

मुस्कराइए कि आप लखनऊ में हैं



 मेट्रो स्टेशन के रास्ते में कई मोटर साइकिलें खड़ी दिखी। मोटरसाइकिलों के पीछे खाना ले जाने वाले डब्बे लगे हुए थे। उनमें THE FOOD STOP लिखा था। फ़ूड स्टॉप मतलब खाने का अड्डा। 'नई उमर' से लेकर 'गई उमर' तक के लोग खाने का आर्डर ले जाने के लिए तैयार खड़े थे। सड़क पार ही फ़ूड स्टॉप का रेस्टोरेंट है। रेस्टोरेंट में आर्डर मिलने पर मोटरसाइकिल से भेजा जाता होगा।

फोटो से कई तरह के विज्ञापन किए जा सकते हैं । हर उम्र के लोगों के लिए रोजगार, मोटर साइकिल की बिक्री, फुटपाथ पर लोगों के खड़े होने की आजादी जैसी बातों का प्रचार किया जा सकता है। अँगौछे से मुँह पसीना पोछते बुजुर्ग ने बताया कि अभी आर्डर आयेगा रेस्टोरेंट में तब वे जाएँगे डिलीवरी करने।
कहने को तो भाषा का कोई क्रांतिकारी जानकार यह सच भी बयान कर सकता है कि यह इंतजाम जनता पर खाने पर रोक लगाने के लिए हैं।
मेट्रो में भीड़ नहीं थी। यात्री बड़ी गंभीरता से बैठे थे। सावधान। गंभीर। चुप। कोई आपस में बात करता नहीं दिखा। सब शायद 'पहले आप, पहले आप' सोच रहे थे। बातचीत के सिलसिले में याद आया कि उस्ताद शायर मीर तकी 'मीर' अपनी दिल्ली से लखनऊ की यात्रा में अपने सहयात्री से इसलिए संवाद नहीं किया क्योंकि उनको अंदेशा था कि कहीं उनकी ज़बान ख़राब ना हो जाए ।
एक बच्ची अलबत्ता बड़ी उत्फुल्लता से मेट्रो से बाहर के दृश्य को देख रही थी। बाहर की इमारतें चुपचाप मेट्रो को स्थिर निगाहों से गुज़रते देख रही थीं। क्या पता कहती भी हों -'तुम्हारा बढ़िया है। दिन में पचास बार इधर से उधर आती जाती हो। हम तो एक जगह खड़ी रहने को अभिशप्त हैं।'
इंदिरा नगर से मुंशी पुलिया एक मेट्रो स्टेशन का किराया नौ रुपए हुआ। मुंशी पुलिया मेट्रो स्टेशन पर पूर्वांचल की स्वादिष्ट बाटी चोखा बिक रही थी। लोग गाड़ी के चारों तरफ़ खड़े हुए बाटी चोखा खा रहे थे। एक चलती-फिरती गाड़ी में बाटी-चोखा की दुकान खुली थी। नीचे फुटपाथ पर मात्र 15 दिन में कार चलाना सीखने का विज्ञापन लगा था। बगल में बवाशीर, हाइड्रोसील और गुप्त रोग के इलाज का धुँधलाया बोर्ड लगा था। बाटी-चोखा वाला अपना विज्ञापन करते हुए कह सकता था -' बाटी-चोखा खाओ, बवाशीर, हाइड्रोसील भगाओ।'
लौटते समय मेट्रो रुकते समय एक महिला लड़खड़ा गई। हमने उससे मुफ्त की और बेमतलब (मुफ्त की सलाहें अमूनन बेमतलब की ही होती हैं) कहा -'आराम से उतारिए। मेट्रो आपको उतार कर जायेगी।' मेरे बगल की जेन Z से भी कम उम्र की बच्ची इस बात पर अचानक हंस दी। उसका चेहरा खिला हुआ था। बच्ची को हँसते देखकर सामने की सीट पर बैठा एक गंभीर टाइप का इंसान बच्ची को बगलिया कर हमारे और बच्ची के बीच बैठ गया। शायद वह बच्ची का पिता था। वह कुछ बोला नहीं लेकिन सामने से लपककर मेरे बगल में बैठना बच्ची के लिए 'हँसी ब्रेकर' जैसा था। बच्ची चुप हो गई।
हमने मेट्रो में बैठे तमाम लोगों को ध्यान से देखा। सबके चेहरे गंभीर थे। हर स्टेशन पर यात्री गंभीरता से चढ़ रहे थे, गंभीरता से बैठे थे, गंभीरता से उतर रहे थे। 'मुस्कराइए कि आप लखनऊ में है' के आह्वान का कोई पालन नहीं कर रहा था।
कल एक ऑटो पर लिखा दिखा -'Soory girls my wife very street' अपने हिसाब से इसके मतलब निकाले जा सकते हैं। एक मतलब यह माफ करना लड़कियों मेरी पत्नी बहुत सख़्त है। दुनिया के प्रेम संबंधों के प्रसार में जीवन साथी के प्रभाव का अध्ययन के लिए यह महत्वपूर्ण वाक्य हो सकता है।
जीवन साथी की बात पर याद आया कि दुनिया भर में 'ट्रम्प टैरिफ़ ' के विविध कारणों की चर्चा हो रही है। लेकिन अभी तक किसी ने इस पर ट्रम्प की जीवन संगिनी के असर की चर्चा नहीं की है। बुजुर्ग ट्रम्प के निर्णयों में उनकी युवा जीवन संगिनी का कितना असर है इस पर भी कई लेख लिखने , वीडियो बनाने का स्कोप है। अपने सेवा काल के दौरान मैंने देखा है कि जिन हाकिमों से फ़ोन तक पर बात करने पर उनके अधीनस्थ थर-थर काँपते थे उनमें से कुछ हाकिम अपनी जीवन संगिनी का फ़ोन खड़े होकर, लगभग काँपते हुए रिसीव करते थे और बात पूरी होने जो साँस लेते थे उसको ही आदर्श 'चैन की साँस' कहा जा सकता है।
अभी सुबह एक आदमी पार्क में लगे पेड़ से कनेर के फूल तोड़ रहा था। यह फूल पूजा में चढ़ेंगे। उसके आराध्य इसे ग्रहण करेंगे। अगर पार्क के पेड़ से फूल तोड़ना चोरी है तो उन फूलों को अपनी पूजा में स्वीकार करना चोरी में सहभागिता है। लेकिन दिन बंधु दीनानाथ से कौन क्या कहे?
दूर से कनेर का फूल तोड़ने वाले की फ़ोटो लेते हुए मुझे लगा कि यह उसकी निजता का हनन है। लेकिन फिर लगा कि निजता का अधिकार चोर की हैसियत के हिसाब से लागू होता है। छोटे चोर को सबूतों के आधार पकड़कर जेल में बंद करके सजा दी जा सकती है। लेकिन बड़े और हैसियत वाले चोर के ख़िलाफ़ सबूत पेश करने पर अदालतें उनकी निजता में हनन मानते हुए सबूत के प्रकाशन पर रोक लगा सकती हैं। बड़े चोरों की सुरक्षा चिरकुट लोकतंत्रों की सुरक्षा के लिए आवश्यक तत्व है।
सार्वजनिक जगहों ने फूल तोड़कर पूजा करने से रोकने का प्रयास करती अज्ञेय जी की एक कविता है (साम्राज्ञी का नैवेद्य दान) जिसमें उन्होंने 'जो फूल जहाँ है वहीं रहते हुए पूजा के लिए समर्पित है' जैसी बात कही थी। लेकिन सहज चोरी के समर्थक समाज में कविता का संदेश सहज रूप में बिसरा दिया गया है :
"जो कली खिलेगी जहाँ, खिली,
जो फूल जहाँ है,
जो भी सुख
जिस भी डाली पर
हुआ पल्लवित, पुलकित,
मैं उसे वहीं पर
अक्षत, अनाघ्रात, अस्पृष्ट, अनाविल,
हे महाबुद्ध!
अर्पित करती हूँ तुझे।"
सुबह टहलते हुए पास ही स्थित THE FOOD STOP देखने गए। अभी दुकान खुली नहीं थी। खाने पहुँचाने वाली मोटर साइकिलें चुपचाप , तसल्ली से एक-दूसरे से चुपचाप ऊँघते हुए गपिया रही होंगी। शायद वे अपने सवारों का इंतज़ार कर रहीं हों। क्या पता उनमें से कोई अपनी बगल वाली बाइक से हँसते हुए कह रही हो -'मुस्कराइए कि आप लखनऊ में हैं।'

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Saturday, October 04, 2025

लखनऊ की सुबह



 कल इंदिरा नगर मेट्रो स्टेशन से मेट्रो पकड़ी। तलाशी वाले मुकाम से निकलने के बाद ऊपर मेट्रो की आज सुनाई दी। एक लड़का लपककर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मेट्रो पकड़ने के लिए लपका। अपन और आराम से चलते हुए आगे बढ़े। कोई हड़बड़ी नहीं। अगली वाली पकड़ेंगे। ऊपर पहुँचने पर मेट्रो को सामने से निकलते देखा।

अगली मेट्रो ट्रेन आने में चार मिनट थे। प्लेटफार्म पर हमारे अलावा साथ-आठ यात्री थे। हमारे अलावा एक और लड़का, बाकी लड़कियां। प्लेटफार्म पर आते ही सब अपने मोबाइल में डूब गए। ट्रेन आने पर मोबाइल सहित उसमें बैठ गए।
अगले स्टेशन पर एक लड़का चढ़ा। पीठ पर मोटा बस्ता। सीट खाली होने के बावजूद बच्चा खड़ा रहा। हमने बैठ जाने को कहा तो वह मेरे बगल में बैठ गया। उसकी टी शर्ट पसीने में भीगी थी। हमने उससे बात शुरू कर दी।
पता चला बच्चा कोचिंग पढ़कर लौट रहा था। पीसीएम मतलब फिजिक्स, कैमेस्ट्री, मैथ्स पढ़ता है कोचिंग में। सिटी माँटेसरी स्कूल का छात्र है। सुबह सात से बारह तक स्कूल में पढ़ता है। फिर चार-पाँच घंटे कोचिंग। सुबह का निकला बालक शाम को घर पहुंचता है। दिन भर ज्ञान ग्रहण करते बीतता है। शाम को घर में ख़ुद पढ़ता है। इतनी मेहनत के बाद किसी इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियर बन जाएगा। फिर शायद मैनेजमेंट की पढ़ाई करके कहीं मैनेजर बन जाये। बच्चे का चेहरा पढ़ाई के बोझ से गंभीर था। यह ऐसा बोझ जिसे साझा भी नहीं किया जा सकता।
सिटी मांटेसरी स्कूल,लखनऊ के सबसे अच्छे , काम भर के मंहगे, स्कूलों में माने जाते हैं। यहाँ पढ़ने वाले बच्चे स्कूल के बाद चार-पाँच घंटे कोचिंग पढ़ें। इसके बाद अपनी पढ़ाई पढ़ें। यह अपने यहाँ की पढ़ाई व्यवस्था की कहानी है।
मेट्रो में बैठे सभी यात्री गंभीर, तनावग्रस्त, चितिंत, सोच में डूबे जैसे लगे। किसी के चेहरे पर मुस्कान या हँसी नहीं दिखी। शायद लोगों को डर होगा कि मुस्काते दिखे तो कहीं मुस्कान पर जीएसटी न लगे। हँसते पकड़े गए तो कहीं कोई ख़ुशी टैक्स न ठोंक दे। ईडी का छापा न पड़ जाये कहीं कि देश के सामने इतनी समस्याएँ हैं और खुश होने की कोशिश कर रहा है।कहीं इसकी ख़ुशी में विदेशी सहायता तो नहीं शामिल है।
मेट्रो स्टेशन से बाहर आते हुए लिफ्ट बंद होती दिखी। तब तक लिफ्ट पकड़ने के लिए लपकती एक बालिका ने लिफ्ट के दरवाजों के बीच अपना झोला अड़ा दिया। बंद होते दरवाज़े खुलने लगे। जब तक दरवाज़े पूरे खुलें तब तक हम आराम से लिफ्ट के पास पहुंच गए।कुछ और लोग भी आ गए थे इस बीच। लिफ्ट में दाखिल होने के बाद हमने दो और यात्रियो के लिए दरवाजे खुले रखे। दो मिनट पहले जो लिफ्ट अकेले जा रही थी नीचे वह अब भरी-पूरी जा रही थी।
बंद होती लिफ्ट में झोला अड़ाने वाली बालिका का इतिहास में कोई जिक्र नहीं होगा। लेकिन यह कोई नई बात नहीं। दुनिया में हर पल ऐसे अनगिनत ऐतिहासिक काम होते रहते हैं जिनको कहीं इतिहास में दर्ज नहीं किया जाता।
मेट्रो स्टेशन से बाहर दो खूबसूरत लड़के दिखे। वे कुछ खिलाने के लिए कह रहे थे। शक्ल, सूरत, पहनावे कहीं से भी ग़रीब न दिखते हुए मांगते बच्चे देखकर थोड़ा ताज्जुब लगा। लेकिन फिर अब मांगने वालों के लिए शायद ग़रीब दिखना जरूरी नहीं रहा।
बच्चों ने सामने लगे रस के ठेले से जूस पिला देने की बात कही। हमने रस वाले से उनके लिए दो ग्लास रस का आर्डर किया। उसने रस दे दिया। बच्चे हमसे निर्लिप्त रस पीने में जुट गए। हमने दो बार भुगतान का प्रयास किया। हुआ नहीं। तब तक हमारा ऑटो आ गया। हमने रस वाले के स्कैनर की फ़ोटो खींचकर कहा -"हम भुगतान कर देंगे। नहीं हुआ तो शाम को नक़द देंगे आकर।"
रस वाले ने अगले ग्राहक के लिए रस निकालते हुए मुण्डी हिलाई। हम चल दिए। घंटे भर बाद हमने उसके स्कैनर के फ़ोटो से दुबारा भुगतान की कोशिश की। इस बार हो गया भुगतान। पहले दो असफल भुगतान के प्रयास भी दर्ज थे। स्कैनर पर नाम लिखा था -रियासुद्दीन।
शाम को लौटते समय सोचा रियासुद्दीन से बता दें कि पैसे भेज दिए थे। लेकिन लौटने तक वो चले गये थे। अगले दिन भी दिखे नहीं। शायद कहीं और लगा रहे हों ठेला। बच्चे भी नहीं दिखे। शायद वे भी कहीं और किसी और से कुछ खिलाने के लिए कह रहे हों।
आज लखनऊ में सुबह हो गई है। सड़कें बारिश के पानी में भीगकर ख़ुश होने की कोशिश कर रही हैं। आप भी खुश हो जाइए। ख़ुशी अभी टैक्स फ्री है।

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