Sunday, October 12, 2025

लक्षद्वीप में टहलाई



 शाम की चाय पीने के बाद बाज़ार के लिए निकले। फ़ोन चार्ज करने के लिए केबल ख़रीदने। पैदल निकले। होटल स्टॉफ ने कहा भी -'स्कूटी लेते जाइए।' लेकिन अपन पैदल ही निकल लिए।

थोड़ी दूर जाने के बाद याद आया कि जिस जिस फ़ोन का केबल लेना है वह तो कमरे में ही छूट गया। दूसरे होटल का नाम भी नहीं याद किया। वापस लौटने में भटक गए तो जायेंगे कहाँ? लौट लिए। फ़ोन लेने और होटल का नाम नोट करने के लिए।
रास्ते में मोटरसाइकिल से होटल स्टॉफ़ जसीम आते दिखे। उसने बताया कि Anany सर का फ़ोन आया था। हम आपके साथ चलेंगे बाज़ार। हम बैठ गए बाइक के पीछे। कमरे में आकर मोबाइल लिया। होटल का नाम नोट किया और वापस बैठ गए बाइक पर।
जसीम ने बताया कि यहाँ पेट्रोल प्रति बाइक दस लीटर प्रति माह के हिसाब से मिलता है। 140 रुपए प्रति लीटर। इससे ज़्यादा की जरूरत के लिए ब्लैक में लेना पड़ता है -200 प्रति लीटर। कार के लिए बीस लीटर प्रति माह मिलता है।
बाजार की तरफ़ जाते हुए तमाम लोग जसीम के जानने वाले मिले। सात-आठ हज़ार की आबादी है आगाती आइलैंड की। अधिकतर लोग जान पहचान के। सड़क पर लड़कियां/महिलाएं स्कूटी चलाती दिखीं। सब हिजाब में। अधिकतर लोग मुस्लिम हैं यहाँ।
रास्ते में स्कूल, अस्पताल, डाकघर दिखे। स्कूल यहाँ इंटर तक है। आगे पढ़ने के लिए बाहर जाना पड़ता है।
एक इलेक्ट्रॉनिक की दुकान पर पता किया। उसके पास आइफ़ोन का केबल ख़त्म हो गया था। उसने दूसरी दुकान का पता बताया। हम उधर गए। वहाँ काउंटर पर एक बच्ची कॉपी में कुछ लिखने का अभ्यास कर रही थी। मलयालम का ककहरा। बात करने पर मुस्करा दी। बोली नहीं। लेकिन आँख के कोने से हमारी बातचीत सुनती रही।
पहले हमने पता किया कि कोई कनेक्टर मिल जाये जिससे सी टाइप केबल से आई फ़ोन जुड़ जाये। कनेक्टर मिला नहीं। फिर उसने केबल निकाल के दी। चार्जिंग हो रही थी। केबल के दाम 270/- रुपए। आइफ़ोन की केबल आनलाइन शायद 1100-1200 रुपए की मिलती है। 270/- में शायद डुप्लीकेट होगी। लेकिन चल रही थी। ले ली।
चलने के पहले बच्ची की फोटो ली। उसको दिखायी। मुस्करा के देखी उसने। पापा के कहने पर उसने थेंक्यू बोला। हाथ मिलाया। हम वापस लौट लिए।
लौटते हुए बाइक का चार्ज हमने ले लिया। बहुत दिनों बाद बाइक चला रहे थे। शुरुआत में थोड़ा लहराये। जसीम ने बाइक चलाते हुए वीडियो बनाया। थोड़ी देर में आराम से चलाने लगे बाइक। बीच-बीच में जसीम गियर बदलने को, हार्न देने को कहते रहे। रास्ते में मिलने वाले लोगों को नमस्ते, वडक्कम भी करते जा रहे थे जसीम।
अपने बारे में भी बताया जसीम ने। घर में छोटा भाई, बहन, माँ-पिता हैं। पिता पहले मेहनत, मजदूरी करते थे। चाय बेचते थे। देर रात जिन जगहों पर चाय की जरूरत हो सकती है वहाँ दुकान लगाते थे। अब घर में रहते हैं।
सत्ताईस-अट्ठाइस के हो चुके जसीम से उसकी शादी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि पहले बहन की शादी करेंगे। फिर ख़ुद की। बहन अभी दूसरे द्वीप में कामर्स में ग्रेजुएशन कर रही है।
बहन की शादी के लिए उसके लिए घर बनवाना है। बातचीत से पता चला कि यहाँ मातृ सत्तात्मक समाज है। लड़का लड़की के यहाँ आकर रहता है।लड़की की शादी के लिए घर जरूरी है। अपना घर और बहन के लिए बनाया जा रहा घर भी दिखाया जसीम ने बाहर से।
और बात करने पर जसीम ने अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड के बारे में बताया। स्कूल के दिनों की साथी थे वह। इंटर के बाद रेडियोग्राफी का कोर्स करने के बाद वह कतर चली गई। वहाँ रेडियोग्राफ़ी का काम मिल गया उसको। शादी तय हो गई थी जसीम की उससे। लेकिन रेडियोग्राफी का कोर्स करने और उसके बाद नौकरी मिलने के बाद लड़की ने शादी से मना कर दिया। अपने साथ रेडियोग्राफी का कोर्स करने वाले लड़के से करेगी शादी।
लड़की के शादी मना करने की बात बताते हुए जसीम ने कहा -' उसकी पढ़ाई के लिए हमने पैसा भी खर्च किया। इसी लिए बहन के लिए घर बनवाने में देरी हुई। लेकिन उसकी मर्जी।उसको बेहतर साथी मिल गया तो उसने हमसे शादी से मना कर दिया। बहन के लिए घर इस साल बन जाएगा। बहन की शादी के बाद करेंगे शादी। अपनी एक्स गर्लफ़्रेंड के बारे में कोई और नकारात्मक बात नहीं की जसीम ने। जसीम ने बताया कि उनके नाम का मतलब होता है -महान, बड़ा, शक्तिशाली या मजबूत। अपने नाम के हिसाब बनने की कोशिश करते लगे जसीम।
जसीम के साथ घूमते हुए आगाती का सारा इलाका देख डाला हमने। वेस्ट जेट्टी, ईस्ट जेट्टी, लैगून बीच। सब अपने टूर के लोगों के साथ विस्तार से देखने थे इसलिए ज़्यादा रुके नहीं कहीं। देखते रहे, चलते रहे।
ईस्ट जेट्टी के पास नीचे पानी में तमाम लोग कुछ खोजते दिखे। पता चला 'कावड़ी' खोज रहे हैं। पानी में पत्थर की छोटी चट्टाने ऐसे दिख रही थीं मानो कीचड़ हो वहाँ। नीचे कावड़ी बीनते बच्चियों में से एक से जसीम ने कावड़ी फेंकने को कहा। बच्ची ने नीचे से कावड़ी फेंकी। सटीक थ्रो की तरह। जसीम ने ' कावड़ी थ्रो' कैच करके हमको दिखाई कावड़ी। बड़ी कौड़ी जैसी थी वह जिसे जसीम कावड़ी बता रहे थे। हमने हाथ में लेकर उसकी फ़ोटो ले और वापस कर दी। उस बच्ची ने उसे बिना गिराये कैच कर लिया। क्रिकेट का अच्छा अभ्यास है दोनों का।
बाद में जसीम ने बताया कि यहाँ भी आईपीएल की तर्ज पर क्रिकेट टूर्नामेंट होता है। वह भी क्रिकेट खेलता है। बोलिंग करता है। पचास रुपये है उसका बेस प्राइज। ऑकशन में कितने पैसे मिलेंगे यह बाद में पता चलेगा लेकिन खेलना है उसे।
लौटते में हमने अपने होटल के पास ही एक जगह बैठकर चाय पी।जसीम के कई दोस्त मिले वहाँ। वे चाय-नाश्ते के बाद वापस जा रहे थे। वहाँ चाय-नाश्ता करने वाले तमाम लोग बैठे थे। परिवार सहित। रेस्टोरेंट का नाम था फैमिली रेस्टोरेंट। महिलायें ही चलाती हैं इसे। शाम को तीन-चार बजे से शुरू होकर रात नौ-दस बजे तक चलता है रेस्टोरेंट।
फैमिली रेस्टोरेंट में काम देखने वाली महिला हमारे लिए दो चाय और प्लेट में कुछ नाश्ता रख गई। समोसा और बड़ा जैसे दिखने वाले नाश्ते के सामान नॉन वेज थे। हमने बताया तो वो हमारे लिए मीठा बड़ा टाइप कुछ व्यंजन लाई। नारियल और दूसरी चीजों से बने उस व्यंजन में अंदर जो भरा था उसको खाते हुए हमको शकरकंद की याद आई। उससे ही बचपन में किसी सब्जी बेचने वाली महिला (काछिन) के बारे में लिखी सुनी कविता याद आई :
"शकरकंद सी शकल बनाई
गाजर की पैजानिया
आलू के दो बंद लगाए
ठुमक चली काछनिया।"
चाय के लिए भुगतान करने काउंटर पर गए । दो चाय और जो नाश्ते में जो कुछ खाया था उसके चालीस रुपये हुए। चाय दस रुपये की एक। नाश्ते में उस सामान के ही पैसे लिए दुकान वाली ने जितना हमने खाया था। जो खाया नहीं था, छोड़ दिया था प्लेट में बिना खाये, बिना ख़राब किए उसके पैसे नहीं लिए थे।
जसीम ने बताया कि यहाँ होटल जितना खाते हैं उतने के ही पैसे पड़ते हैं। जो नहीं खाते उसके पैसे नहीं पड़ते। अगर ख़राब नहीं किया है तो वही सामान दूसरे को सर्व करते हैं।
इससे लगा कि यहाँ छुआछूत और बाजार का उतना हल्ला नहीं है। कुछ लोगों को यह खराब लग सकता है कि किसी दूसरे का बचा हुआ हमको सर्व कर दिया। लेकिन मेरी समझ में बर्बादी बचाने के लिहाज से अच्छी बात है। सामुदायिक भावना का प्रतीक है यह चलन।
चाय पीने के बाद जसीम हमको होटल में छोड़कर घर चले गए।
लक्षद्वीप यात्रा के पहले के क़िस्सा यहाँ पहुँचकर पढ़ सकते हैं :
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सुबह की चाय और रेलिंग पर कप



 बाजार से आइफ़ोन का केबल लाकर फ़ोन चार्जिंग पर लगा दिया। फ़ोन सामान्य गति से चार्ज हुआ। ऐसा लगा नहीं कि ओरिजनल केबल नहीं है। हो सकता है बाद में कुछ फ़र्क़ पड़े। फ़ोन चार्ज होने के बाद लगा बाहरी दुनिया से संपर्क की स्थिति में हैं। हालांकि पिछले करीब आठ-दस घंटे बिना इस फ़ोन के भी आराम से गुजारा हो रहा है।

(इससे पहले का किस्सा यहाँ पढ़ें https://www.facebook.com/share/r/17dJCmRxFR/)
रात को खाना खाने के बाद मिठाई में आइसक्रीम थी। पूरी कटोरी भर आइसक्रीम न कहने का मन बनाते, बनाते खा ले। परदेश में परहेज से परहेज किया जा सकता है।
सोचा था खाने के बाद कुछ पढ़ेंगे। लिखेंगे। डुयोलिंगों पर स्पेनिश का पाठ पूरा करेंगे। पिछले दो दिनों से बराबर बुजुर्ग की तरह ताने मार रहा है -'Your Spanish won’t practice itself. Start a lesson Practice makes progress!' (आपकी स्पेनिश भाषा का अभ्यास अपने आप नहीं होगा। एक पाठ शुरू करें। अभ्यास से प्रगति होती है!) हम पाठ शुरू करने की सोचते हुए कब सो गए पता ही नहीं चला।
सुबह उठने के बाद चाय मंगाई। सुबह की चाय शानदार लगती है। थोड़ी देर कमरे में बैठकर चाय पी। फिर याद आया दरवाजा बाहर बालकनी में खुलता है जहाँ से समुद्र दिखता है। दरवाजा खोलकर बालकनी में बैठकर चाय पीते हुए सामने समुद्र की लहरों को देखते रहे। फिर चाय का कप बालकनी की रेलिंग पर रखकर उसका फ़ोटो लिया।
हमको फ़ोटो लेते हुए सामने समुद्र में तैरने वाली मछलियाँ सोचती होंगी -'अजीब नमूना इंसान है। चाय के कप का फ़ोटो लेने आया लक्षद्वीप।' उनको क्या पता इसके क्या मजे हैं।
हम दुनिया में कहीं हों , सुबह हमेशा सुहानी होती है। आसपास के दृश्य मजेदार लगते हैं। लगता है जीवन की शुरुआत हो रही है। लेकिन यह सब भी मन-मूड पर निर्भर करता है। कभी-कभी तो सुबह से ही लगता है, ये दिन भी बीत गया। बहुत पहले कभी इस बीत गया, रीत गया वाले मूड से गुजरते हुए लिखी ये लाइन याद आ गयीं :
"सबेरा अभी हुआ नहीं है
पर लगता है
यह दिन गुज़र गया हाथ से
हथेली में जकड़ी बालू की तरह ।
अब
सारा दिन फिर
इसी एहसास से जूझना होगा।"
यह एहसास बहुत कम दिन रहा। लेकिन कविता जैसी चीज में दर्ज हो जाने के कारण ऐसे लगता है पूरा जीवन ही झमेले में बीता।
कल पहली मंजिल के जिस कमरे में सोए थे उसमें बालकनी से सड़क और समुद्र दोनों दिखते हैं। सुबह सड़क पर जाते लोग दिखे। कम चौड़ी सड़क पर दो लड़कियां जाती दिखीं उनमें से एक मोबाइल पर कुछ देखती जा रही थी। उनका फ़ोटो लेने की सोचते-सोचते वे फ़ोन कैमरे की जद से बाहर चली गयीं।
सड़क पर जाने वाले लोग कम ही थे। थोड़ी देर बाद दो महिलायें सड़क के दो छोरों पर जाती दिखीं। उनके चलने से ऐसा लग रहा था कि मानों दोनों में अबोला सा हो रखा है और दोनों आपस में सड़क भर की दूरी बनाए चल रही हैं।
सड़क के दोनों तरफ़ समुद्र सौ-सौ कदम की दूरी पर है। ऐसे जैसे समुद्र ने सड़क और उससे जुड़ी सौ-सौ कदम की ज़मीन का आलिंगन किया हो। अंग्रेजी में कहें तो टाइट हग करके रखा है। हर पल एक नई नहर अपने आलिंगन में ली हुई ज़मीन को उपहार में देता है। ज़मीन उसे वापस कर देती है। समुद्र फिर नई लहर भेंट करता है। ज़मीन वापस करती है। समुद्र कोशिश में लगा रहता है।
कल सुबह की बात करते हुए आज दोपहर हो गई। नंदन जी की कविता याद आ गई:
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
उड़ते हुए कल सुबह से आज दोपहर तक आ गए। इतनी आवारगी ठीक नहीं। अब फिर कल सुबह पर लौटते हैं जब हम कमरे की बालकनी पर बैठे चाय पी रहे थे।
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Saturday, October 11, 2025

'अंधेरे का बड़प्पन' कविता संग्रह का प्रकाशन

 


कल हमारे कविता संग्रह का प्रकाशन हुआ। कविता सग्रह का नाम है -'अंधेरे का बड़प्पन।' यह नाम Alok Puranik जी ने तय किया है जो कि 'कट्टा कानपुरी' के इस शेर से लिया गया है :

जरा सा जुगनू भी चमकता है अँधेरे में
यह अँधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है।
यह कविता संग्रह हमारी किताब है।
'अंधेरे का बड़प्पन' में मेरी शुरुआती कविताओं से लेकर हाल तक की कवितायें शामिल हैं। 'कट्टा कानपुरी' के कलाम भी शामिल हैं। आसानी से समझ में आने वाली इन कविताओं की ख़ासियत यह है कि इनको पढ़कर हर किसी को लग सकता है -"अरे इसमें क्या खास बात है। इससे अच्छा तो हम भी लिख सकते हैं।"
'अंधेरे का बड़प्पन' का कवर पेज हमारी भतीजी Swati Awasthi ने बनाया है। स्वाति शौकिया तौर पेंटिंग करती हैं और आजकल बच्चों को ड्राइंग और पेंटिंग का काम सिखाती हैं। किताब पर नाम लिखने का काम किया है हमारे बेटे Anany ने। 'अंधेरे का बड़प्पन' के ई बुक संस्करण का मोबाइल विमोचन हमारी जीवन संगिनी Suman ने कल करवा चौथ के दिन चांद देखने के बाद किया।
हमारे ब्लॉगिंग और फेसबुक से जुड़े साथियों को समर्पित इस कविता संग्रह की क़ीमत 50 रुपए रखी गई है। ख़रीदने का लिंक टिप्पणी में दिया गया है।
कविता संग्रह का प्रिंट संस्करण भी जल्द ही आएगा। उसके आने की सूचना भी जल्द ही मिलेगी।
आपकी बधाई और शुभकामनाओं के लिए अग्रिम आभार।

https://www.facebook.com/share/p/14dHkWHajdp/



बंगलौर से लक्षद्वीप



 लखनऊ से बंगलौर की फ्लाइट सुबह पांच दस पर थी। बंगलौर सात पचपन पर पहुंचना था। अगली फ्लाइट दस पांच पर थी। दो घंटे में हमें लखनऊ वाली फ्लाइट से सामान लेना, बंगलौर एयरपोर्ट में टर्मिनल बदलना, बोर्डिंग पास बनवाना, सामान देना, सिक्योरिटी चेकिंग और फिर बोर्डिंग करना था। लग रहा था कि कहीं देर न हो जाए। लेकिन सुरक्षा जांच के बाद नौ बजे बोर्डिंग के लिए पहुंच गए।

डिजी यात्रा एप में बोर्डिंग पास अपलोड होने के चलते फटाफट आगे बढ़ते गए। डिजी यात्रा एप आधार से जुड़ा रहता है। आँख की पुतली देखकर क्लियेनरेंस दे देता है।
बोर्डिंग के लिए बीस मिनट का समय देखकर लाउंज तरफ बढ़े। सोचा नाश्ता कर लें। एसबीआई का क्रेडिट कार्ड था। उसको दिखाकर लाउंज में घुसे। फटाफट नाश्ता किया। मैसूर मसाला डोसा। ग्लास टमलर में चाय पी। पांच मिनट बजे थे तो कुछ फल और दूसरी चीजें भी खाई। दो रुपए के क्रेडिट कार्ड में जितना कुछ खाया उतना एयरपोर्ट में भुगतान करके खाते तो दो हजार रुपए से कम खर्च होते।
बोर्डिंग का इंतजार करते हुए घर से फ़ोन आया। पता चला कि हम अपना आई फ़ोन का चार्जजिंग केबल और चार्जर घर में ही भूल गए थे। भुलक्कड़ी भी अपने में मजेदार आदत है। जिस चीज को सबसे ध्यान में रखने की सोच रहे थे, वही भूल गए। मोबाइल 60% से ज़्यादा चार्ज था।चार्जर तो एक और था लेकिन केबल नहीं थी पास में। सोचा एयरपोर्ट पर केबल ले लें लेकिन महीन मिली। लक्षद्वीप में लेने की सोचकर बोर्डिंग के लिए बढ़े।
बोर्डिंग के पहले लक्षद्वीप का परमिट देखा जाता है। कुछ लोगों के परमिट बैग में थे। लोगों ने निकालकर दिखाए और बैठे जहाज़ में।
जहाज़ छुटका वाला था। एक लाइन में चार सीट। बैठ गए। हमारे बगल की सहयात्री कड़क अंग्रेजी में अपने दोस्तों को फ़ोन पर लक्षद्वीप जाने की सूचना दे रही थीं। बताया उन्होंने कि वे लक्षद्वीप स्कूबा डाइविंग के लिए जा रही हैं। लक्षद्वीप स्कूबा डाइविंग के लिए अच्छी जगह मानी जाती है।
उड़ान का समय हो जाने के बाद भी जहाज अपनी जगह ही खड़े-खड़े कदमताल करता रहा। आधे घंटे बाद तेजी से हिला और हवाई पट्टी पर भागता हुआ आसमान में पहुँच गया।
बैंगलोर से लक्षद्वीप का सफ़र क़रीब सवा दो घंटे का था। सोचा सहयात्री से बतियायेगे। लेकिन जहाज उड़ते ही वो अपनी आँख और कान पर कैप लगाकर मुँह बंदकर सो गई। उनको देखकर लगा कि गांधी जी की बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो वाली तीनों फ़ोटुएँ एक में मिल गई हैं। हम अपनी सीट से उठकर खिड़की वाली सीट पर आ गए। नीचे देखने लगे। नीचे कुछ देर बादल दिखे, फिर हरे पहाड़ और लक्षद्वीप आते-आते समुद्र दिखाई देने लगा। देखते-देखते जहाज़ लक्षद्वीप पर उतर गया।
अगाती हवाई अड्डे की हवाई पट्टी बहुत छोटी है। तीन तरफ़ समुद्र से गिरी हुई। पासा ही आगमन-प्रस्थान स्थल लिखी हुई इमारतें। हम टहलते हुए आगमन स्थल की तरफ़ बढ़े। पगडंडी जैसी सड़क के चारो तरफ़ घर टाइप का बगीचा। थोड़ी देर, सौ मीटर से भी कम दूरी पर लहराता समुद्र।
बाहर निकलने के पहले सबके परमिट चेक हुए। इसके बाद बाहर निकलकर सूटकेस समेटा। सूटकेस उठाकर बाहर की तरफ़ चलते समय याद आया चश्मा अंदर ही भूल गए। फौरन अंदर गए। मेरा चश्मा परमिट रजिस्टर पर शान से ऐठा बैठा था। उठाते हुए काउंटर पर बैठे सुरक्षा अधिकारी को धन्यवाद दिया। उन्होंने कुछ कहाँ नहीं। मुस्करा दिए अलबत्ता।
जिस आसानी से हम अपना चश्मा लेने बाहर से दुबारा अंदर चले गए उससे मुझे अपनी अमेरिका यात्रा की याद आ गई जब एक सूटकेस बाहर गेट के पास रखकर दूसरा लेने जाते समय हमको वहाँ तैनात सुरक्षा कर्मी ने रोक लिया था। बहुत समझाने और अनुरोध के बाद साथ जाकर सूटकेस लेने जाने दिया था।
इससे लगा कि बड़ी जगहों के बड़े झमेले होते हैं। झमेले कभी कभी झमेले कम, चोचले ज़्यादा होता है। कभी कभी इसी चक्कर में लोग बड़ा दिखाने के लिए तमाम चोचले पाल लेते हैं।
बाहर निकले तो ड्राइवर ने मेरा सामान गाड़ी में रखा। पास ही सेल्फी प्वाईंट के सामने खड़ा करके मेरा फ़ोटो ले लिए। फोटो किसी राष्ट्रगान वाले कार्यक्रम का लगा। हमने सेल्फी लिए और बैठ गए गाड़ी में।
ठहरने की जगह केवल दो किलोमीटर दूर है एयरपोर्ट से। पतली सड़क के दोनों और छोटे-छोटे होटल, घर बने हुए हैं। हवाई अड्डे के पास होने के कारण अधिक़तम दो मंजिला भवन बनाने की इजाज़त है। घर होटल के बाद स्थानीय कला के चित्र बने हुए। सड़क के दोनों करीब सौ-सौ मीटर के बाद समुद्र देखकर लगा कि ये लहरे सड़क की सुरक्षा और निगरानी के लिए तैनात हैं।
होटल के कमरे में तौलिये किसी पक्षी की आकृति की तरह रखें हुए थे। हमने सोचा जाने के पहले इसको बनाने का तरीका सीखकर जाएँगे।
होटल का सर्विसिंग स्टाफ हिमाचल प्रदेश का है। उत्तर भारतीय लोगों के खाने के हिसाब से कुल्लू मनाली के बच्चे यहाँ काम के लिए लाए गए हैं। नहाने-धोने के बाद लंच किया। हम अकेले थे होटल में कल।
होटल में आने के बाद से लगातार आई फ़ोन के केबल के बारे में पूछते रहे। मिला नहीं। तय हुआ कि शाम को जाएँगे बाजार केबल खोजने। यह तय करने के बाद हम आराम फ़रमा हो गए। हम तो आराम से लेट गए लेकिन बाहर समुद्र की लहरों का मूड कुछ और ही था। वे एक-दूसरे को ठेलते हुए बार-बार समुद्र तट की तरफ़ आ रही थीं। एक दूसरे से हँसी मजाक करते हुए तट को छूते हुए वापस लौट रही थीं।
लक्षद्वीप यात्रा के आगे के किस्से यहाँ पहुँचकर पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/r/15uS5HFoUP/