रेशमी कंगूरों पर नर्म धूप सोयी,
मौसम ने नस-नस में नागफनी बोयी।
दोषों के खाते में कैसे लिख डालें
ग़र अंगारे याचक बन पाँखरियाँ माँग गए।
कच्चे रंगों से तस्वीर बना डाली
हल्की बौछार हुए रंग हुए ख़ाली ।
कितनी है दूरी पर जाने क्या मजबूरी
टीस के सफ़र की कई सीढ़ियाँ फलांग गए।
खंड-खंड अपनापन टुकड़ों में जीना
फटे हुए कुर्ते रोज-रोज सीना।
सम्बन्धों की सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह अपना ही बौना पन टांग गए।
टीस के सफ़र की कई सीढ़ियाँ फलांग गए।
-कन्हैयालाल नंदन
नंदन जी के इस गीत को आप उनकी ही आवाज़ में यूट्यूब पर सुन सकते हैं। गीत का कड़ी टिप्पणी में दी है। इस गीत का ऑडियो मुझे मनीष शतदल जी से मिला। उनके पास उनके पिता जी रामप्रकाश शुक्ल 'शतदल' जी द्वारा नियमित किए जाते रहे गीतकारों के सम्मेलन 'शृंगार संध्या' के तमाम ऑडियो उपलब्ध हैं। इनमें देश के प्रसिद्ध गीतकारों के गीत उनकी आवाज़ में उपलब्ध हैं। इनमें गोपालदास नीरज, रमानाथ अवस्थी, उमाकांत मालवीय, किशन सरोज, सिंदूर जी आदि के गीत शामिल हैं। धीरे-धीरे उनको भी यूट्यूब में पेश करेंगे। दुर्लभ गीत हैं ये सब। चैनल सब्सक्राइब कर लें तो आप तक सूचना पहुँचती रहेगी।
इन गीतों के ऑडियो मिलने में कानपुर के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि एवं बहुत शानदार संचालक श्रवण शुक्ल जी का भी योगदान रहा। श्रवण शुक्ल Sharvan Shukla जी की कविताएँ भी आएँगी यूट्यूब पर।
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