आज तैराकी सीखने का पहला दिन था। स्वीमिंग पूल में पहली बार उतरे। ककहरा सीखा तैराकी का।
सीखने के पहले तैयारी भी की। कल स्वीमिंग कास्ट्यूम खरीदने गये। कई दुकानों में पूछने के बाद एक जगह मिला । घुटन्ना , कैप और पानी वाला चश्मा। सबसे मंहगा चश्मा पड़ा। सब मिलाकर 1250 रुपए खर्च हो गए।
जब हम स्वीमिंग के कपड़े खरीदने जा रहे था तब सड़क के बीच वाली फ़ुटपाथ पर तमाम चूल्हे जलते दिखे। दिहाड़ी मजदूर खाना बना रहे थे। खुले आसमान के नीचे रात के अंधेरे में खाना बनाते लोग। सबेरे यहीं से दिहाड़ी का जुगाड़ करेंगे। रात में पानी बरसा तो कहाँ रुकेंगे इसका अंदाज़ नहीं।
सबेरे गए तो दिहाड़ी मजदूर तैयारी करते दिखे। कोई खाना बना रहा था, कोई बातें। अभी उनकी मंडी सजी नहीं थी। कुछ देर में सजेगी।
स्वीमिंग पूल में बाहर गाड़ी खड़ी करके अंदर गए। 3500/- रुपए महीने के और 100/- रजिस्ट्रेशन के जमा किया। पैसा जमा किया एडमिशन हो गया। फार्म और मेडिकल आराम से जमा किया जाएगा।
अपना सामान जमा करके सीधे पूल में उतर गए। तीन-चार उस्ताद तैराकी सिखाने वाले वहाँ बैठे। निर्देश दे रहे थे। पानी में उतर कर हमने पूछा -'हमारा पहला दिन है। बताओ क्या करें?'
'मुँह से साँस लेकर पानी के अंदर नाक से साँस छोड़ने की प्रैक्टिस करिए।' -तैराकी उस्ताद इतना बताकर दूसरे तैराक को कुछ सिखाने लगा।
हमने पानी के बाहर मुँह सांस लेकर , नाक से सांस छोड़ने का अभ्यास किया। इसके बाद सर पानी के अंदर घुसाया। नाक से सांस छोड़ी। पानी के बुलबुले गुड़-गुड़ करके निकले। शरीर थोड़ा ऊपर उठा। हमें लगा अगली साँस भी हमें पानी के अंदर ही लेनी है। लेने की कोशिश की, पानी मुँह के अंदर चला गया। हम ऊपर आ गए। हमें लगा हमारी तकनीक में कोई गड़बड़ी है। अभ्यास से सीख जायेंगे। दो तीन बार करने पर भी ऐसा ही हुआ।
जब पानी के अंदर सांस लेने में सफल नहीं हुए तो बगल वाले बच्चे ने बताया -' पानी के अंदर सांस सिर्फ़ छोड़नी है। लेनी बाहर है। अंदर साँस नहीं लेनी है ।'
मतलब हम ग़लत तरीक़े से साँस ले रहे थे। लेकिन गलती करने के बाद सीख भी गए। जो बात गुरु ने नहीं सिखाई वह हमारी गलती ने सिखा दी।
हमको लगा -' किसी काम को सीखने में ग़लतियाँ सबसे बड़ी गुरु होती हैं। जो चीज गुरु नहीं सिखा सकता वह ग़लतियाँ सिखा देती हैं।'
इसके बाद हमने पानी के बाहर मुँह से साँस लेना और पानी में नाक से सांस छोड़ने का अभ्यास किया। किनारे बैठ स्वीमिंग कोच को बताया। उसने कहा -'पचास बार प्रैक्टिस करिए।' हमको 'पूल वर्क' देकर वह दूसरे को गाइड करने लगा।
हमने पचास बार की जगह सत्तर बार साँस लेने, छोड़ने का अभ्यास किया। सत्तर पर रुक गए। सोचा अब आगे दूसरी कोई एक्सरसाइज सीखेंगे।
साँस लेने छोड़ने के अभ्यास के बीच अगल-बगल तैरते लोगों को देखते रहे। एक बच्चा सीखते हुए हमारे बगल से निकला। हमने उसको निकलते हुए देखा। हाथ में वह सेफ़्टी बेल्ट की तर्ज पर गुब्बारे जैसा बाँधे था।
हमने कोच को बताया कि पचास साँसे ले लीं। अब बताओ क्या करें। उसने कहा फ्लोटिंग करिए। पानी में सीधे लेट जाइए। हाथ लंबे करके। हमने सोचा -' पानी कोई बिस्तर है जो उसमें लेट जाएँ? क्या मजाक है?'
उसने फिर समझाया -'साँस लेकर हाथ लंबे करके सांस रोकिए। पानी में सीधे हो जाइए।'
हमने किया। हो भी गया। पानी में सीधे लेट गए। जैसे रस्सी में बँधा कपड़ा तेज हवा में फड़फड़ाता हुआ सीधा हो जाता है उसी तरह हम पानी में सीधे हो गए। चार -पाँच बार किया। इसके आगे और करते तब तक सीटी बज गई। टाइम पूरा हो गया।
हम पानी से बाहर आ गए। शरीर हल्का महसूस हो रहा था। कोच ने कहा -'बाक़ी कल सिखायेंगे। सब सिखा देंगे।'
हमको श्रीलाल शुक्ल जी की लिखी बात याद आई -"नदी के किनारे जो मल्लाह रहते हैं उनके बच्चे होश सँभालने के पहले ही नदी में तैरना शुरू कर देते हैं।"
हमने सोचा हमारे परिवार वाले अगर नदी किनारे रहते होते न जाने कब तैरना सीख चुके होते। 3600/- महीना बचते। लेकिन अब क्या किया जा सकता है। नदी न नहीं स्वीमिंग पूल ही सही।
आज घंटे भर में तैराकी का ककहरा सीखा। तैराकी की वर्णमाला के दो अक्षर बबलिंग और फ्लोटिंग सीख गए। बाक़ी का सबक कल सीखेंगे।
बाहर आकर स्वीमिंग पूल के किनारे सेल्फी लेकर बच्चों को भेजी। बच्चों ने शाबासी देते हुए कहा -'बढ़िया है।'
आप भी अगर अभी तक नहीं सीखें हैं तैरना तो सीख लीजिए। मजेदार है।

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