Friday, October 11, 2013

सचिन का संन्यास बच्चों के हित में

http://web.archive.org/web/20140420081922/http://hindini.com/fursatiya/archives/4943

सचिन का संन्यास बच्चों के हित में

सचिनआज घर फोन किया तो बच्चे ने बात करने से इंकार कर दिया। कारण पूछने पर पता चला कि सचिन क्रेकेट से रिटायर हो रहे हैं। हमें समझ नहीं आया कि बच्चा हमने नाराज है सचिन से। अरे भाई हमने थोड़ी कोई कहा था सचिन से रिटायर होने को। उसने सन्यास की घोषणा की उससे निपटो। हमसे क्यों खफ़ा हो रहे हो।
क्रिकेट जैसे निठल्ले और समय खपाऊ खेल के देवता की उपाधि पाया खिलाड़ी रिटायर हो रहा है। हर चैनल प्राइम टाइम पर सचिन चालीसा पढ़ने में लगा है। सचिन की उपलब्धियां और खूबियां बखानी जा रही हैं। क्रिकेट के सर्वकालिक बेहतरीन खिलाड़ी की विदाई का मामला है। अगले दस दिन तक मीडिया पलट-पलट कर फ़िर-फ़िर सचिन चर्चा करता रहेगा। एक ही चैनल पर दो एंकर एक के बाद एक सचिन चर्चा कर रहे हैं। सचिन रिकार्ड के लिये खेलते नहीं थे लेकिन रिकार्ड उनके लिये बनते रहते थे। 200 वें टेस्ट की विदाई भी एक ऐसा ही रिकार्ड है।
हमारे दोनों बच्चे सचिन के पक्के फ़ैन हैं। सचिन की बुराई सहन नहीं कर सकते। मैं अक्सर कहता कि सचिन में फ़िनिशिंग हुनर नहीं है। कपिलदेव की वर्ल्डकप की 175 रन सरीखी एक्को पारी नहीं खेले तो वे सचिन की कई पारियां गिना देते। सचिन के मामले में बात करते हुये मेरे बच्चे राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता की तरह बहस करने लगते जो अपनी पार्टी के एक घपले की चर्चा पर विपक्षी पार्टी के पचास घोटाले गिना देते हैं।
आजकल सचिन जल्दी आउट हो जाते थे। उनके जाते ही टीवी बंद कर देते। सचिन के खेलते हुये टीवी देखना बच्चों का सहज अधिकार सा बना रहता है। मैंने बच्चे से कहा – सचिन ने पता है क्यों रिटायरमेंन्ट की घोषणा की?
बच्चे ने कहा कि हां पता है इसलिये कि आजकल वह रन नहीं बना पा रहा था।
हमने कहा – नहीं भाई इसलिये संन्यास लिया उसने ताकि तुम आराम से पढ़ सको। तुम्हारी पढ़ाई के लिये सचिन से खेल को अलविदा कह दिया।
सचिन का रिटायरमेंट देश के बच्चों के हित में है। वे अब आराम से पढ़ सकेंगे। उनके अच्छे नम्बर आयेंगे। लेकिन क्या पता सचिन के प्रभाव से निकले बच्चे विराट इफ़ेक्ट में आ जायें!
सचिन के संन्यास कें पीछे राजनीति का भी बहुत बड़ा हाथ है। सचिन अभी खेलते रहना चाहते थे और कहते भी मैं तब तक खेलते रहना चाहता हूं जब तक आनन्द आता है। सचिन को आनन्द अभी भी आ रहा था लेकिन जबसे राजनीति में आडवाणी जी की गति देखकर उन्होंने सोचा रिटायरमेंट ले लिया जाये वही अच्छा है।
बीच-बीच में बुजुर्गों ने कहा भी कि सचिन को रिटायरमेंट ले लेना चाहिये। लेकिन सचिन एक ठो सैकड़ा ठोक देते। लोग फ़िर गाना गाने लगते- अरे अभी तो सचिन में बहुत क्रिकेट बची है। खेलने दो भाई। अब किसी को तो निकालना ही था भाई तो सहवाग को और भज्जी को निकाल दिया। भले ही कुछ दिन के लिये। अब उनके वापस आने की गुंजाइश कम होती जा रही है।
अनन्यविज्ञापन कम्पनियों को भी विराट और धोनी में ज्यादा मजा आ रहा था। वे भी सोच रहीं होंगी कि अब भगवान विदा हों तो इन नये देवताओं पर और पैसा लगाया जाये।
एक बेहतरीन खिलाड़ी जब विदा हो रहा है। सचिन ने खेल के लिये मेहनत की, पसीना बहाया। आदर्श बने रहे। उनका खेलते रहना घरों में टीवी खुल रहने का कारण बना रहा। सचिन को खेलते देखने के लिये लोग घर जल्दी आ जाते थे, छुट्टी ले लेते थे। मींटिंग दायें-बायें कर देते थे और भी न जाने क्या-क्या?
सचिन के विदा होते समय मैं सोच रहा हूं कि खिलाड़ी तो विदा हो रहा है। लेकिन खिलाने वाले कब विदा होंगे? जिसको खेलते देखने के लिये टीवी खुल जाते थे वह विदा हो रहा है। लेकिन वे कब दफ़ा होंगे जिनको देखते ही लोग टीवी बन्द कर देते थे। बीसीसीआई अध्यक्ष कब रिटायर होंगे? पवार साहब कब सचिन से सीखेंगे? वे देश के बच्चों का भला कब सोचेंगे?

मन करे तो ये भी देखें

  1. सचिन का खेल, संन्यास और गुस्सा
  2. सचिन राज्यसभा में- कुछ सीन

14 responses to “सचिन का संन्यास बच्चों के हित में”

  1. हितेन्द्र अनंत
    शत प्रतिशत सहमत!
    1. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
      तेंदुलकर के बारें में नौ प्रसिद्ध उक्तियाँ :
      1. मैं चाहता हूँ कि मेरा बेटा सचिन तेंदुलकर बने- ब्रायन लारा
      2. हम एक टीम से नहीं हारे जिसका नाम इंडिया है; बल्कि हम एक आदमी से हार गये जिसका नाम सचिन है- मार्क टेलर
      3. हमारे साथ कुछ भी बुरा नहीं हो सकता अगर भारतीय जहाज में हमारे साथ सचिन तेंदुलकर बैठे हों- हाशिक अमला
      4. वह उस लेग-ग्लान्स को एक छड़ी से भी खेल सकता है- वकार यूनुस
      5. दुनिया में दो तरह के बल्लेबाज हैं : (1) सचिन तेंदुलकर (2) दूसरे सभी – एंडी फ्लॉवर
      6. मैंने भगवान को देखा है। वे टेस्ट मैंचों में भारत की ओर से चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करते हैं – मैथ्यू हेडेन
      7. जब सचिन बैटिंग करते हैं तो मैं उसमें खुद को देखता हूँ – डॉन ब्रैडमैन
      8. जब सचिन बैटिंग कर रहे हों तो अपने अपराध कर डालो, क्योंकि उस समय भगवान भी उसकी बैटिंग देखने में व्यस्त रहते हैं- आस्ट्रेलियाई प्रशंसक
      9. सर्वश्रेष्ठ बयान जो बराक ओबामा ने दिया- “मुझे क्रिकेट नहीं मालूम; फिर भी मैं सचिन को खेलते देखता हूँ… इसलिए नहीं कि मुझे उसका खेलना पसन्द है, बल्कि इसलिए कि मैं वह कारण जानता चाहता हूँ कि क्यों जब वह बैटिंग कर रहे होते हैं तो मेरे देश के उत्पादन में पाँच प्रतिशत की गिरावट आ जाती है।”
      सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..सेकुलरिज्म का श्रेय हिंदुओं को: विभूति नारायण राय
  2. ashok kumar avasthi
    सचिन के रिटायरमेंट से उनके भारत-रत्न मिलने की संभावना पर विचार नहीं किया?
  3. प्रवीण पाण्डेय
    आप भ्रम में न रहियेगा, सचिन के बाद दूसरे को हीरो बना लेंगे बच्चे।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..वर्धा से कानपुर
  4. संतोष त्रिवेदी
    संन्यास सचिन के हित में भी है:-)
  5. विवेक रस्तोगी
    क्रिकेट अपने को कभी पसंद नहीं आया २२ खिलाड़ी खेलते हैं और पूरी दुनिया उन्हें देखकर अपना वजन बड़ा लेती है, दरअसल आलस फैलाने वाला खेल है।
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..बस तुम्हें… अच्छा लगता है.. मेरी कविता
  6. HARSHVARDHAN
    आज की विशेष बुलेटिन जेपी और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।
  7. Anonymous
    सही….मगर बच्‍चे फि‍र कि‍सी को ढूंढ लेंगे
  8. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    :)
  9. click for source

Thursday, October 10, 2013

चुनाव घोषणा पत्र में च्यवनप्राश

http://web.archive.org/web/20140420084252/http://hindini.com/fursatiya/archives/4919

चुनाव घोषणा पत्र में च्यवनप्राश

चुनाव घोषणा पत्र“…..लैपटॉप तो रखना ही पड़ेगा। ठेल दिया!” ….. और बताओ और क्या घुसेड़ दें घोषणा पत्र में ,दादा?
ये ठीक किया। लैपटॉप तो चुनाव घोषणापत्र में ऐसा हो गया है जैसे दहेज के सामान की लिस्ट में गाड़ी। दूल्हा चाहे गदहा, गोबर गणेश हो लेकिन दहेज में उसको गाड़ी तो चाहिये ही चाहिेये। बाजी बाजी तो ससुर कहते हैं कि दुल्हन भले न मिले लेकिन शादी में गाड़ी जरूर मिले। -दादा बगल की लुटिया में पान मसाला थूकते हुये बोले।
सीन राजनीतिक पार्टी का है। चुनाव घोषणा पत्र तय हो रहा है। जीत जाने पर वोटरों को बांटे जाने वाले प्रसाद पर चिंतन चल रहा है।
अच्छा लैपटॉप की जगह आईपैड न कर दें? कुछ अलग देना चाहिये। -एक ने सुझाव दिया।
अरे यार देओ चाहे जो कुछ लेकिन लिखो लैपटॉपै। और कुछ लिखोगे तो जनता समझेगी कि कैसी चिल्लर पार्टी है जो लैपटॉप तक नहीं दे रही। देने को लैपटॉप की जगह काले डब्बा बंटे हैं लेकिन नाम यहै हुआ न कि न कि लैपटॉप बंटे हैं। लैपटॉपै रहन देव। अगला आइटम सोचा जाये। – दादा ने लैपटॉप पर फ़ाइनल मोहर मारते हुये कहा।
बुजुर्ग बढ़ेंगे इस बार चुनाव में। उनके लिये कुछ रखा जाये। -एक कार्यकर्ता ने सुझाया?
बुजुर्ग क्यों बढ़ेंगे भाई? संस्कारी पार्टियां तक अपने बुजुर्गों को धकिया के बाहर कर रही हैं। तो बुजुर्ग वोटर काहे को आयेगा वोट डालने। बुजुर्गों की कोई इज्जत तो करता नहीं आजकल। वो काहे वोट डालने आयेंगे? – अगले ने सवाल उछाला।
इज्जत नहीं होती तभी तो आयेंगे बुजुर्ग। वे बदले की भावना से आयेंगे। अपना गुस्सा दिखाने। बेइज्जती का बदला लेने। तुमने हमको पीएम न बनने दिया हम तुमको शपथ न लेंगे देंगे। तुमने हमको खारिज किया हम तुम सबको रिजेक्ट करेंगे। वैसे भी बुजुर्गों की नजरों में वर्तमान रिजेक्टेड माल ही होता है। वह सोचता है आज की पीढ़ी जो कर रही है वो सब फ़ालतू है। जो उसके समय में हुआ वही सही था। बहुत बुजुर्ग आयेंगे रिजेक्ट करने। उनके लिये कुछ होना चाहिये घोषणा पत्र में। – चर्चा में तर्क का छौंका लगाते हुये कार्यकर्ता ने कहा।
अरे यार जो व्हील चेयर पर होगा वो वोट डालने कैसे आयेगा? जो वोट डालने न आये उसके लिये पैसा क्या खर्चना? -व्हील चेयर बेकार है।
अरे ये भी तो हो सकता है कि जो चलने-फ़िरने से मोहताज हैं वो व्हील चेयर की लालच में आ जायें वोट डालने और अपने उम्मीदवार पर ठप्पा लगा दें। व्हील चेयर छोड़ो मत। डाले देते हैं। – व्हील चेयर समर्थक वीटो मुद्रा में आ गया।
च्यवनप्राशबुजुर्गों के लिये व्हील चेयर कैसी रहेगी? – एक ने सुझाव दिया।
अरे यार तुम तो ऐसे अड़ गये व्हील चेयर के लिये जैसे तुम्हारे बिटिया/दामाद की व्हील चेयर की फ़ैक्ट्री है। ऐसा है तो साफ़ बताओ। आपस में क्या छुपाना। बताओ डाल देते हैं। -कार्यालय में चुहलबाजी होने लगी।
अरे भाई हम कोई बिजनेस से राजनीति में आये हैं जिसकी कोई फ़ैक्ट्री होगी। ये धंधे तो पैसे वाले करते हैं जो ब्लैकमनी पर खड़िया पुताई के लिये आते हैं राजनीति में। हम तो होलटाइमर हैं। शुरु से अब तक दरी बिछाने वाले। और मानो फ़ैक्ट्री होगी भी तो क्या कमीशन छोड़ दिया जायेगा खरीद में? वो तो देना ही पड़ेगा न! ज्यादा मुंह न खुलवाओ सुबह-सुबह।- होलटाइमर भावुक टाइप हो गये।
बहस सुनकर बेचारी व्हील चेयर दूसरे सामानों के समर्थन में बैठ गई। अगले सामान तय होने लगे।
बुजुर्गों को अपने नाती-पोतों को खिलाने का शौक बहुत रहता है। इसी बहाने घर में टिके भी रहते हैं। ऐसा करते हैं बुजुर्गों के लिये खिलौने की घोषणा कर देते हैं। पूरा घर खुश हो जायेगा। घर के बच्चे खुश तो सब खुश। फ़ेमिली पैकेज हो जायेगा।
लेकिन आजकल बच्चे हो कहां रहे हैं। सब नौजवान तो देश में राजभाषा के कार्यान्वयन की तरह् शादी मुल्तवी किये पड़े हैं। जैसे कहा जाता है कि जब हिन्दी सक्षम होगी तब लागू होगी वैसे ही युवा पीढ़ी कहती है कि सेटल हो जायें तब शादी करेंगे। औ जब शादी नहीं होगी तो बच्चे कहां से होंगे। इसलिये खिलौना बेकार है। -खिलौना भी घुस नहीं पाया चुनाव घोषणा पत्र में।
मन तो करता है ससुर पूरे वाल मार्ट को डाल दें घोषणा पत्र में। जो मांगोगे वो देंगे। बस एक बार सेवा का मौका दे दो। सबको परखा बार-बार, हमको भी परखो न एक बार। – लिखने वाले ने अपने हृदयोद्गार व्यक्त किये।
चुनाव भावुकता से नहीं लड़े जाते बच्चा। घोषणापत्र में भावुकता दिखेगी तो जनता समझेगी ये कवि लोग हैं। राजनेता नहीं हैं। चुनाव घोषणा पत्र लिखना कोई कविता लिखना नहीं है कि जो मन आया ठेल दिया। घोषणा पत्र ललित निबन्ध सरीखा होना चाहिये जो पढ़ने में मनभावन होना चाहिये। भले ही उसका मतलब कुछ न निकले। -दादा ने विरोधाभाषी तर्क देते हुये चुप किया कलमकार को।
च्यवनप्राश और चुनावहोते-करते सब आईटम पर चर्चा होती गयी। आइटम खारिज होते गये। आखिर में तय हुआ कि बुजुर्गों के लिये कोई युटिलिटी आइटम बोले तो काम की चीज की घोषणा की जाये।
काम की चीज में “आत्मरक्षा के लिये पिस्तौल” से लेकर “सर दर्द भगाने के लिये झंडू बॉम” तक पर बहस करने के बाद बात फ़ाइनली च्यवनप्राश पर आकर टूटी। चुनाव घोषणा पत्र में बुजुर्गों के लिये च्यवनप्राश डाल दिया गया। निर्णय हुआ कि अगर पार्टी चुनाव जीतेगी तो हर बुजुर्ग को प्रतिमाह च्यवनप्राश का एक किलो का डिब्बा देगी। बारह डिब्बे के साथ साल में एक चम्मच मुफ़्त में। पांच साल के लिये साठ डिब्बे च्यवनप्राश और पांच चम्मच साथ में दिये जायेंगे। बुजुर्ग चाहें तो घर के बाकी सदस्यों को भी च्यवनप्राश खिला सकते हैं लेकिन उसके लिये चम्मच उनको अपने जुगाड़ करने होंगे।
चुनाव घोषणा पत्र प्रकाशित होते ही उस पर चर्चा होने लगी। टेलीविजन पर शाम की प्राइम टाइम बहस का विषय था कि बारह च्यवनप्राश के डिब्बे के साथ केवल एक चम्मच की घोषणा कहीं परिवार कहीं संयुक्त परिवार को बांटने की कोशिश तो नहीं है। क्या यह घोषणा पार्टी को बहुमत दिला पायेगी।
हम तो कुछ समझ नहीं पा रहे हैं इस पर क्या कहें? आप की कोई राय हो तो बतायें। एंकर को एस.एम.एस. करें।
सूचना: यह पोस्ट संक्षिप्त रूप में 11.10.2013 के हिन्दुस्तान में छपी।

9 responses to “चुनाव घोषणा पत्र में च्यवनप्राश”

  1. प्रवीण पाण्डेय
    सबको लुभाने के लिये एक एक चीज। नौकरी करने वालों को कोई टैक्स न देने का सुझाव भी दे दीजिये, सब मान जायेंगे।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..वर्धा से कानपुर
  2. संतोष त्रिवेदी
    बहुत मस्त और जिताऊ घोषणा-पत्तर है भाई:-)
    *****रेटिंग।
  3. कट्टा कानपुरी असली वाले
    यह कट्टा कानपुरी नकली अब,जो न कराय वही कम है !
    जीतेगा वही , जो पढ़ लेगा , इनके फार्मूलों में, दम है !
    - कट्टा कानपुरी असली वाले
    कट्टा कानपुरी असली वाले की हालिया प्रविष्टी..जब से इन्होने जनम लिया है, देश में नफरत आई है – सतीश सक्सेना
  4. ashok kumar avasthi
    बहुत बढ़िया आईडिया है.सबको पसंद आएगा.पोलिटिकल पार्टी वाले इस व्यंग को समझ नहीं पाएंगे. देखना इस बार के इलेक्शन में एइसे ही वादे होंगे.कोई पार्टी बार्बी डॉल न देने लगे.
  5. rachana tripathi
    पार्टी में चालू टाइप चमचा होगा तो एक-आद चम्मच और बढ़ा देगा.
    rachana tripathi की हालिया प्रविष्टी..राजनीति अब शरीफों के लिए नहीं रही…
  6. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    च्यवनप्राश दीजिए मनमोहन और आडवाणी को। नौजवानों को दीजिए मुफ़्त इंटरनेट कनेक्शन ताकि फेसबुक और ट्विटर पर अपना टाइम खोटी कर सकें और ब्लॉग पर अपने ग़म ग़लत कर सकें। उसके बाद आराम से देश बेंच खाइए।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..सेकुलरिज्म का श्रेय हिंदुओं को: विभूति नारायण राय
  7. Rekha Srivastava
    अरे भाई ये घोषणा पत्र जो तैयार करवा रहे हैं , उसमें देश की ४९ प्रतिशत आबादी के लिए कुछ विशेष शामिल नहीं किया गया है और अगर वह बिगड़ गयी न तो समीकरण बदल जायेंगे . इसलिए घोषणा पत्र में संशोधन करके कुछ हमारे लिए भी डालिए . ज्यादा कुछ नहीं बस सभी महिलाओं को एक ठौ २४ कैरेट का नेकलेस शामिल करवा दीजिये . चाहे फिर उसमें छोटा बड़ा एक हीरा ही क्यों न जड़ा हो?
    Rekha Srivastava की हालिया प्रविष्टी..पांच वर्ष ब्लोगिंग के !
  8. देवांशु निगम
    हर महीने फोन में टाक टाइम डलवाने का कुछ जुगाड़ करवाइए , तौ मजा आये !!!!
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..The “Talented” Culprit Since 1992
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] है सबके लिये शौचालय – कहीं हो न जाये चुनाव घोषणा पत्र में च्यवनप्राश सचिन का संन्यास बच्चों के हित में ये [...]

Wednesday, October 09, 2013

सबके लिये शौचालय – कहीं हो न जाये

http://web.archive.org/web/20140420082729/http://hindini.com/fursatiya/archives/4928

सबके लिये शौचालय – कहीं हो न जाये

शौचालयपिछले हफ़्ते शौचालय और देवालय का बड़ा हल्ला रहा मीडिया में।
कोई बोला देश को देवालय नहीं शौचालय चाहिये।
सुनते ही कोई और बोला – अरे शौचालय वाली बात तो हमने कही पहले। हम इसके कोलम्बस हैं। आप देवालय वाले लोग शौचालय की बात कैसे कह सकते हैं? वास्कोडिगामा बने रहिये, कोलम्बस मती बनिये।
इसके बाद तो पूरा देश शौचालय बनाम देवालय की लड़ाई में जुट गया। अखबार, टेलिविजन और सोशल मीडिया जहां देखो वहां बयानों का दिब्य निपटान होने लगा।
मंदिर और मकान (रोटी,कपड़ा और मकान) का वायदा पूरा न कर सकने वाले लोग शौचालय की मांग पूरी करके नंबर लूटना चाहते हैं। खाने और रहने का इंतजाम भले न कर पायें लेकिन निपटने की व्यवस्था के लिये जान लगा देंगे। हरेक के लिये शौचालय सुलभ करवा देंगे। कुछ ज्याादा करना भी नहीं होग। मंदिर और मकान के नक्शे में एक ठो 2 बाई 2 के कमरे का जुगाड़ हो जायेगा।शौचालय की मांग पूरी हो जायेगी।
यह जरूरत कब पूरी होगी, कैसे होगी इसके बारे में बयान वीरों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन इस बारे में पढ़ा गांधीजी का एक लेख याद आता है जिसमें उन्होंने खुले में निपटने से मना किया था। इससे बीमारियां फ़ैलती हैं। विस्तार से बताते हुये गांधीजी ने लिखा था कि कैसे खेत में निपटने के लिये जाने पर एक खुरपी साथ लेकर जायें। गढढ़ा खोदंकर उसमें शौच करें और फ़िर गढढे को मिट्टी से बंद कर दें। गांधीजी अंतिम आदमी की जरूरत समझते थे। इसलिये इतने विस्तार से बताया तरीका।
जितना विस्तार से गांधी जी ने एक गढढा खोदने की तरकीब बताई, योजना समझाई उतना तफ़सील से तो पूर देश के लिेये शौचालय के बारे में बयान देते हुये न तो ’बयानिया कोलम्बस’ ने सोचा होगा न “डायलागिया वास्कोडिगामा” ने। शौचालय वाले बयान से निपट कर अगला बयान गढ़ने लगे होगे। उल्टे वे खेत खतम करने में सहयोग कर रहे हैं ताकि आदमी गांधी जी वाले तरीके से निपटने तक को मोहताज हो जाये।
इस बयान युद्ध् के बीच ही कानपुर जाना हुआ। शहर में घुसते ही पटरियों के किनारे निपटते लोग दिखे। पटरी के पार लोगों के घर देखे। घर के पास के जमा बरसाती पानी तालाब की शक्ल ले चुका था जिसमें पालीथीन की चादर सी पसरी थी। घर, घर के पास की जमीन और पालीथीन पटे गढ़हे (छोटा तालाब) देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था कि घर कहां खतम होता है और शौचालय कहां शुरु होता है। दोनों का सह अस्तित्व अगर कोई बयान वीर देख ले तो क्या पता कि बयान जारी करे कि हमने अपने देशवासियों के लिेये मकान और शौचालय दोनों की व्यवस्था एक साथ कर दी। टू इन वन। रहना है तो झुपड़िया में घुस जाइये, निपटना हो खुल्ले में आ जाइये। आगे के काम के लिय थोड़ा और तालाब तक आइये। पोछने का काम पालीथीन से। पूरे देश में हर जगह निपटने की सहज-सुलभ व्यवस्था है।
यूनीसेफ़ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 1.1 अरब लोग खुले में शौच करते हैं। लेकिन यह भी सोचने वाली बात है कि अगर कभी सारा देश बंद में निपटने लगेगा तो क्या होगा। इस बारे में प्रर्यावरण पत्रकारिता को समर्पित सोपान जोशी का मानना है कि सोपान जोशी मानते हैं कि हर एक के पास शौचालय हो जाए तो बहुत बुरा होगा। ”
खुदा न खास्ता अगर ये बयानवीर सबके लिये शौचालय का इंतजाम करने पर अड़ गये और हो भी गया इंतजाम तो हाल क्या होगा सुनिये पर्यावरण पत्रकार सोपान जोशी से:
“हरेक के पास शौचालय हो जाए तो बहुत बुरा होगा। हमारे सारे जल स्रोत-नदियां और उनके मुहाने, छोटे-बड़े तालाब, जो पहले से ही बुरी तरह दूषित हैं- तब तो पूरी तरह तबाह हो जाएंगे। आज तो केवल एक तिहाई आबादी के पास ही शौचालय की सुविधा है। इनमें से जितना मैला पानी गटर में जाता है, उसे साफ करने की व्यवस्था हमारे पास नहीं है। परिणाम आप किसी भी नदी में देख सकते हैं। जितना बड़ा शहर, उतने ही ज्यादा शौचालय और उतनी ही ज्यादा दूषित नदियां। दिल्ली में यमुना हो चाहे बनारस में गंगा, जो नदियां हमारी मान्यता में पवित्र हैं वो वास्तव में अब गटर बन चुकी हैं। सरकारों ने दिल्ली और बनारस जैसे शहरों में अरबों रुपए खर्च कर मैला पानी साफ करने के संयंत्र बनाए हैं। इन्हें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कहते हैं। ये संयंत्र चलते हैं और फिर भी नदियां दूषित ही बनी हुई हैं। ये सब संयंत्र दिल्ली जैसे सत्ता के अड्डे में भी गटर का पानी बिना साफ किए यमुना में उंडेल देते हैं।
जितने शौचालय देश में चाहिए, उतने अगर बन गए तो हमारा जल संकट घनघोर हो जाएगा पर नदियों का दूषण केवल धनवान लोग करते हैं, जिनके पास शौचालय हैं। गरीब बताए गए लोग जो खुले में पाखाने जाते हैं, उनका मल गटर तक पहुंचता ही नहीं है क्योंकि उनके पास सीवर की सुविधा नहीं है फिर भी जब यमुना को साफ करने का जिम्मा सर्वोच्च न्यायालय ने उठाया तो झुग्गी में रहने वालों को ही उजाड़ा गया। न्यायाधीशों ने अपने आप से ये सवाल नहीं किया कि जब वो पाखाने का फ्लश चलाते हैं तो यमुना के साथ कितना न्याय करते हैं। ”
कितना भला लग रहा है यह सोचते हुये कि अपने यहां नेताओं के बयान सिर्फ़ बयान तक ही सीमित रहते हैं। उनके कार्यान्वयन का खतरा नहीं रहता।

8 responses to “सबके लिये शौचालय – कहीं हो न जाये”

  1. sanjay jha
    ………..
    ………..
    अब साडी कवायद इस बात को लेकर रहेगी के……….’इस बात के कोलम्बस हम हैं’
    ………..
    प्रणाम.
  2. rachana tripathi
    इसके बावजूद भी गाँव में शौचालय तभी सुचारु रूप से चल पायेगा जब उस शौचालय में पानी की व्यवस्था हो, और यह तब संभव है जब वहाँ चौबीस घंटे बिजली मौजूद हो। क्योंकि वहां के लो्ग पानी से धुलने-धुलाने का चक्कर नही पालते ।
    ऐसे ही जलस्तर गिरता जा रहा है.. देश की अर्थ व्यवस्था भी चरमरायी हुई है..खाएंगे तभी तो जाएंगे..पांच किलो अनाज में कब्जियत के शिकार होने की संभावनाएं ज्यादा है।
  3. रवि
    तो फिर सोपान जोशी के मुताबिक घरेलू शौचालयों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए…
    और, कल्पना करें कि अगर ऐसा हो गया, तो पांच सितारा सुविधा भोगी लोगों को लोटा लेकर बाहर जाते देखना … :)
    रवि की हालिया प्रविष्टी..याहू! 1 टीबी ईमेल बॉक्स बिलकुल मुफ़्त
  4. प्रवीण पाण्डेय
    हो न हो, पर उसे कौन टाल सका है, मार्ग तो निकाल ही लेगा, जिसे जाना होगा।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..वर्धा से कानपुर
  5. arvind mishra
    कम से कम आप तो रहने ही दिए होते -अब ‘सोचालय’ वाले क्या करेगें ?
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..नौकरी के तीन दशक -संस्मरण श्रृंखला
  6. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम के अंतर्गत गरीबों को शौचालय बनवाने के लिए आर्थिक व तकनीकी मदद दी जाती है जिसके लिए पंचायतीराज विभाग जिम्मेदार है। इसके अंतर्गत जो शौचालय बनाये जाने हैं उनमें सीवर लाइन या सेप्टिक टैंक नहीं बनाना होता बल्कि छोटे-छोटे सोख्ता गढ्ढे बनाये जाते हैं। इसमें गोल जालीदार दीवार ईंटों से बनायी जाती है। मलमूत्र आदि इस गढ्ढे में पहुँचता है तो उसका द्र्व भाग जमीन द्वारा सोख लिया जाता है और ठोस भाग सूखकर या जीवाणुओं द्वारा खा लिये जाने के बाद मिट्टी में मिल जाता है। इस प्रकार इससे नदियों को कोई खतरा नहीं है।
    अधिक से अधिक शौचालय बनना सबके लिए अच्छा है।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..सेकुलरिज्म का श्रेय हिंदुओं को: विभूति नारायण राय
  7. Dr. Shilpi Yadav
    कानपूर का ऐसा सजीव चित्रांकन ! क्या कहना !
    वैसे गाँव के लोगो के लिए खुले में शौच के लिए जाना कुछ ऐसे है जैसे हम सब के लिए फेसबुक ……..
    सोशल नेटवर्किंग सुबह सुबह चैटिंग हो जाती है |
  8. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] सबके लिये शौचालय – कहीं हो न जाये [...]

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Tuesday, October 08, 2013

भारतीय ’लेट लतीफ़’ क्यों होता है

http://web.archive.org/web/20140420082430/http://hindini.com/fursatiya/archives/4909

भारतीय ’लेट लतीफ़’ क्यों होता है

परसाई-जी’पूछो परसाई से’ में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तरों में परसाई जी की तार्किकता, सरलता, सहजता और आत्मीयता के दर्शन होते थे। जाने कितने उकसाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी उन्होंने पूरी सहजता से दिये हैं। उदाहरणार्थ, एक प्रश्न है- ’आपके पास हर प्रश्न का जबाब है। क्या आप अक्ल के जहाज हैं?’ परसाई का उत्तर है- ’मेरे पास हर प्रश्न का जबाब नहीं है। जबाब सही हो, यह भी जरूरी नहीं है। मैं लगातार सीखता जाता हूं। मामूली आदमी हूं।’
ऐसे ही दो प्रश्न और उनके जबाब यहां पेश कर रहा हूं:
प्रश्न: भूतपूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री जेम्स कैलोहम को एक बार एक महिला ने अपनी चोली पेश करते हुये कहा था कि सरकार की बजाय यह मुझे ज्यादा सहारा देती है, क्या शोषित भारतीय महिलायें भी ऐसा ही नहीं सोचती होंगी? (भिलाई से छोटेलाल दुबे)
उत्तर: यह सवाल तो आप महिलाओं से पूछिये वे क्या अनुभव करती हैं। भारत में ऐसी ही असुरक्षा के लिये सरकार कुछ हद तक जिम्मेदार है। पर ज्यादा जिम्मेदारी हमारी पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था की है। परिवार में बहुओं को यातना हम लोग ही तो देते हैं। परिवार और समाज में ही अमानवीयता है। जब सड़क पर स्त्री को कोई मनचला छेड़ता है तो आसपास के पुरुष नपुंसक हो जाते हैं? वे क्यों पीठ फ़ेरकर चल देते हैं? वे क्यों नहीं उस मनचले पर झपटकर उसकी पिटाई करते? वे क्यों नहीं स्त्री की रक्षा करते?
(देशबंधु, 23 अक्टूबर, 1983)
आलस्यप्रश्न: फ़्रांस के लोग भावुक, नजाकत वाले, अमेरिकी लोग जांबाज, ब्रिटिश लोग औपचारिकता वाले , भारतीय लेट लतीफ़ होते हैं। यह विभिन्नता क्यों पाई जाती है? -रायपुर से अंजलि गोडबोले।
उत्तर: फ़्रांस के लोग भावुक, सुरुचि संपन्न तथा कला प्रेमी माने जाते हैं- जैसे भारत के बंगाली। इसका कारण दीर्घकालीन जीवन परिस्थितियां , ऐतिहासिक अनुभव और सांस्कृतिक परम्परा है। पर अमेरिकी लोग जांबांज नहीं होते। उन्हें लड़ना नहीं आता। उनके पास अच्छे से अच्छे हथियार होते हैं पर उन्हें न रणनीति आती है और न ही वे बहादुर होते हैं। कारण यह कि गृहयुद्ध के बाद वे कभी लड़े नहीं। वे सारी दुनिया से अलग रहे। दूसरे महायुद्ध से उन्होंने लड़ना शुरु किया। पर इसके बाद वे जहां लड़े बुरी तरह हारकर भागे। वे कोरिया में चीनियों से पिटे जिनके पास पुरानी बन्दूकें थीं फ़िर भी उनकी दुर्गति हुयी। वियतनाम में अमेरिकी कई साल हमला करते रहे। पर वियतनामियों ने उन्हें इतनी बुरी तरह पीटा कि उन्हें भागना पड़ा। भागने के लिये हो ची मिन्ह से चौबीस घंटे का समय मांगा। फ़िर ईरान में उनकी दुर्गति हुई। अभी बेरुत से पिटकर भागे। सच्चे जाबांज वियतनामी हैं, जिन्होंने फ़्रांस और अमेरिका को मार भगाया। अंग्रेज ’रिजर्व्ड’ और औपचारिक होते हैं। कारण हैं इसके- एक तो यह बनिया कौम है। बनिया कभी दिल नहीं खोलता। दूसरे,यांत्रिक हैं। तीसरे सबसे बड़े साम्राज्यवादी रहे हैं, उसका अहंकार है। चौथे, इंग्लैंड द्वीप समूह है। मुख्य भूमि यूरोप में नहीं है। फ़्रांसीसी और जर्मन अंग्रेंजो को गंवार और जंगली मानते रहे हैं। इसलिये भी अंग्रेज मुश्किल से मुंह खोलता है। बिना परिचय के बात नहीं करता और आत्मक्रेंदित रहता है। उसने अपनी विशिष्टता के लिये ’मैनर्स’ बना लिये हैं।
भारतीय ’लेट लतीफ़’ क्यों होता है। दार्शनिक रूप से भारतीय कालातीत है। वह काम में नहीं जीता, आत्मा अमर है, बार-बार जन्म लेना है उसे तो जल्दी किस बात की। वास्तव में कई सदी पहले भारतीयों ने कोई दायित्व लेना छोड़ दिया था। इसलिये उसने समय की पाबन्दी छोड़ दी। पाबन्दी धार्मिक कर्मकांड में रही। या नियम से सूर्योदय से पहले कान में जनेऊ लपेटकर शौच के लिये नदी जाने में। हमारी अनियमितता का कारण जलवायु भी है। फ़िर हमारी भोजन की आदत है। हम दोपहर में भरपेट भोजन करते हैं और दो घंटे ऊंघते हैं। वास्तव में भारी नास्ता करना चाहिये और हलका दोपहर का भोजन। पर गरीबी या परम्परा के कारण अधिकांश लोग नाश्ता नहीं करते। दोपहर को पेट को चावल से भरते हैं और ऊंघते हैं।
(देशबन्धु 6 मई,1984 )

3 responses to “भारतीय ’लेट लतीफ़’ क्यों होता है”

  1. विवेक रस्तोगी
    ना हमसे नाश्ता भारी होता है, और ना ही खाना.. पर खाने के बाद ऊँघने का क्रम टूटता नहीं है..
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..बस तुम्हें… अच्छा लगता है.. मेरी कविता
  2. प्रवीण पाण्डेय
    व्याख्या सच में प्रभावित कर गयी, सच में ऐसा ही होता है।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..वर्धा से कानपुर
  3. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] भारतीय ’लेट लतीफ़’ क्यों होता है [...]

Sunday, October 06, 2013

लंच बॉक्स, सिक्स सिग्मा और समाज

http://web.archive.org/web/20140420081307/http://hindini.com/fursatiya/archives/4884

लंच बॉक्स, सिक्स सिग्मा और समाज

लंच बॉक्सपिछले हफ़्ते ‘लंच बॉक्स’ देखी। जबलपुर के समदड़िया मॉल में। बुधवार का दिन। आमतौर पर अपन बुधवार को ही सनीमा देखने जाते हैं। हर टिकट 100 रुपये का। स्नैक्स का कूफ़न अलग से। इस बार बुधवार को गांधी जयन्ती थी। सोचा भीड़ ज्यादा होगी तो पहले से नेट से करा लिये। टिकट 150/- का पड़ा। अभी तक हमें ये नहीं पता है कि इस बुधवार को टिकट 100 का काहे नहीं मिला? क्या इसलिये कि गांधी जयन्ती थी या फ़िर नेटबाबा हमें मंहगे पड़े। कारण पता चलते ही हम अपने ज्यादा पैसे ठुकने का दोष उसपर डालकर दो मिनट उसको मन लगाकर कोसेंगे। लेकिन वह बाद में अभी तो पिक्चर के बारे में बात करते हैं।
एक घंटे पचास मिनट की पिक्चर जब खतम हुयी तो यही मन किया कि अभी और चलनी चाहिये। यही पिक्चर की अच्छी होने का शायद सबसे बड़ा प्रमाण है। कहानी मुम्बई के आपाधापी वाले जीवन के एक परिवार की। पत्नी इला (निरमत कौर) अपने पति को रिझाने के लिये तरह-तरह के जनत करती है लेकिन पति अपने काम में डूबा है। पत्नी अपनी आंटी से पूछकर एक दिन खास खाना तैयार करती है। लंचबॉक्स में रखकर भेजती है। उस दिन डिब्बा पूरा खाली आता है। पत्नी खुश होती है कि खाना बहुत मन से खाया है तो आकर तारीफ़ करेगा। लेकिन पति का व्यवहार वैसा ही रूखा, उदासीन। पत्नी पूछती है तो बताता है कि खाना रोज जैसा ही था। उदास पत्नी इला अगले दिन भी खास खाना लंचबॉक्स में भेजती है। वह भी पति के पास न पहुंचकर किसी दूसरे के पास पहुंचता है। पति की प्रतिक्रिया वही उदासीन। पत्नी इला और अनजान व्यक्ति , साजन फर्नांडिस,(इरफान ) जिसके पास गलती से डिब्बा पहुंचता है, में संदेशों का आदान-प्रदान होता है। दोनों तरफ़ खाने से ज्यादा उत्सुकता संदेशों की होती है। इस बीच पत्नी को अपने पति के किसी और से चक्कर की सुंगंध भी मिलती है। वह अनजान लंच बॉक्स पाने वाले अनजान व्यक्ति से मिलने का मन बनाती है। बुलाती है। उत्कंठित नायिका को नायक देखता है लेकिन न मिलने का तय करता है। दोनों के बीच उमर के अंतर को न मिलने का कारण बताता है। कहानी और आगे बढ़ती है। एक और पात्र असलम मियां ( नवाज़ुद्दीन ) की मजेदार प्रेमकहानी भी बीच में दखल देती है जिसकी प्रेमिका उसके साथ भाग के तो आ गयी निकाह अब्बा की मर्जी से करने की जिद है। आखीर में साजन फ़र्नांडीज को इला से मिलने के लिये उसके घर की तरफ़ जाते हुये दिखाये जाता है। मिलन के खूबसूरत मोड़ के पहले ही पिक्चर का ‘द एंड’ हो जाता है- ऐसे समय जब लगता है कि यार कम से कम मिला तो देते दोनों को। एक बार से डायलाग बुलवा देते -कभी-कभी गलत ट्रेन में बैठने से भी सही मंजिल मिल जाती है।
6 sigmaपिक्चर की सारी बुनावट लंच बॉक्स के गलत जगह पहुंचने की थीम पर है। बड़ा रोचक है यह देखना कि यह गलती नियमितता के साथ होती है। माने कि सुव्यवस्थित अव्यवस्था। मुंबई के डब्बे वाले इस काम में सौ साल से भी ज्यादा समय से लगे हुये हैं। करीब पांच हजार लोग, जो कि बहुत कम पढ़े-लिखे हैं, इस काम को ऐसे सलीके से अंजाम देते हैं कि दिन में करीब दो लाख लोगों तक टिफ़िन तीन घंटे के भीतर पहुंचा देते हैं। काम करने का तरीका ऐसा कि इनके व्यवसाय को 6 सिग्मा प्रमाणपत्र हासिल है। 6 सिग्मा प्रमाणपत्र मिलने का मतलब दस लाख बार कोई काम किया जाये तो गलती की सम्भावना अधिकतम 3.4 हो सकती है। अपने काम में ईमानदारी और अनुशासन का आत्मविश्वास के चलते ही डिब्बावाले यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि उनसे डब्बा डिलीवरी में गड़बड़ भी हो सकती है। इसीलिये जब नायिका इला डिब्बा वाले से अपना डिब्बा गलत जगह पहुंचने की बात कहती है तो वह मानने से फ़ौरन इंकार कर देता है यह कहते हुये कि लंदन से राजकुमार भी देख चुके हैं इस हमारे काम को। उन्होंने भी काम की तारीफ़ की है (4 नवंबर 2003 को प्रिंस चार्ल्स ने मुंबई स्टेशन पर 20 मिनट तक सिस्टम को समझा और फिर उन्हें इंग्लैंड में शाही शादी में आमंत्रित किया था)। डब्बे वालों पर श्रीनिवास पंडित ने एक किताब भी लिखी गयी है।
डिब्बे बालेएक सिक्स सिग्मा प्रमाणपत्र पाये संस्थान द्वारा वितरण में हुई नियमित गड़बड़ी की थीम पर बनी इस खूबसूरत फ़िल्म पर लिखते समय टेलीविजन पर समाचार सुनते जा रहे हैं। चारा घोटाले मामले में सुनायी गयी सजा और आशाराम के कुकर्मों के किस्सों पर चर्चा हो रही है। लाखों लोग इस तरह के अपराधों में संलग्न हैं। धड़ल्ले से करप्शन और कुकर्म करने में लगे हैं। लाखों अपराधियों में सजा चंद लोगों को ही मिलती है। लगता है समाज में अपराध और न्याय व्यवस्था में भी सिक्स सिग्मा लागू है। यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि लाखों अपराधियों में 3-4 से अधिक को सजा देने की गलती न हो जाये। समाज के सबसे जहीन लोग इस व्यवस्था को बनाये रखने में अपने हुनर का योगदान करते हैं। उनकी रोजी, रोटी और रुतबा समाज के इस आपराधिक सिक्स सिग्मा प्रमाणपत्र को बचाये रखने में ही है। उनके अथक प्रयासों की बदौलत ही अपराध और भ्रष्टाचार व्यवस्था का सिक्स सिग्मा बचा हुआ है। लाखों अपराधियों में से गिने-चुने लोगों को ही सजा का मुंह देखना पड़ता है।
इस अपराध और न्याय व्यवस्था का अपराधियों को बचाने का सिक्स सिग्मा प्रमाणपत्र न जाने कब छिनेगा? यह सोचते हुये हम यह भी सोच रहे हैं कि लंच बॉक्स सरीखी खूबसूरत कोई और फ़िल्म कब देखने को मिलेगी?

8 responses to “लंच बॉक्स, सिक्स सिग्मा और समाज”

  1. रचना त्रिपाठी
    अब तो लंच बॉक्स देखने का मन हो गया है।
    आप मेरा भी कुछ खर्च कराएंगे।
    रचना त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..बंदर के हाथ में बंदूक..
  2. प्रवीण पाण्डेय
    हम भी लंचबॉक्स दे आये, बड़ी अच्छी लगी। वैसे तो जिस प्रकार की कोडिंग की जाती है, भूल की संभावना ही नहीं। यदि ६ सिग्मा से भी चलें तो एक या दो दिन भूल हो भी सकती है, पर एक ही भूल नियमित नहीं हो सकती है। पहली बार कैसे पात्र के पास नहीं पहुँचा, यह भी विवेचन का विषय है।
    ईश्वर को मूढ़ पति और गुणी पत्नी को न्याय देना था, इसीलिये भूल हुयी नहीं वरन करवायी गयी।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..बंगलोर से वर्धा
  3. विवेक रस्तोगी
    फिल्म का अंत करने में जल्दी कर दी गई ..
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..बस तुम्हें… अच्छा लगता है.. मेरी कविता
  4. Mukesh Kumar Sinha
    मुझमे भी देखने की उत्कंठा जग उठी ………
  5. arvind mishra
    मुझे तो अभी लम्बे समय तक आप लोगों की समीक्षा पर ही निर्भर रहना है !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..और ज़िंदगी चल पडी …..(नौकरी के तीस वर्ष-श्रृंखला )
  6. Abhishek
    :)
    देखा हमने भी ये फिल्म.. सिग्मा का ख्याल नहीं आया. डिब्बा वाला हार्वर्ड का नाम भी लेता है :)
    सिग्मा इधर भी था –
    http://baatein.aojha.in/2012/07/blog-post.html
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..संयोग
  7. पंछी
    Nice Read
    पंछी की हालिया प्रविष्टी..Poem on Discipline in Hindi
  8. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] लंच बॉक्स, सिक्स सिग्मा और समाज [...]