Friday, April 12, 2019

हवा में जूता उर्फ़ जूतिकल स्ट्राइक

आजकल ’सर्जिकल स्ट्राइक’ का बड़ा हल्ला है। अपने जहाज पड़ोस में बमबारी कर गये। अगले ने पड़ोसी धर्म निभाते हुये अपने जहाज भी उड़ाये। मीडिया, अखबार, सोशल मीडिया सब जगह ’सर्जिकल स्ट्राइक’ का कब्जा हो गया।

’सर्जिकल स्ट्राइक’ भ्रम पैदा करने वाला है। ’सर्जिकल’ से लगता है कोई सर्जरी का मामला है- स्वास्थ्य से संबंधित। ’स्ट्राइक’ मतलब हड़ताल। सब काम ठप्प। न काम करेंगे, न करने देंगे वाला माहौल ! इस लिहाज से ’सर्जिकल स्ट्राइक’ मतलब हुआ – ’सर्जरी वाली हड़ताल !’ मतलब टोटल निठल्लापन ! लेकिन ’सर्जिकल स्ट्राइक ’का असली मतलब ही अलग। जब तक दुश्मन को पता चले, तब तक मारकर फ़ूट लो।
कुछ लोगों को ’सर्जिकल स्ट्राइक’ पर शक हुआ। उन्होंने सबूत मांगे। नेति-नेति कहा। अविश्वास किया इस पर। मामला एकदम हिन्दुस्तान- पाकिस्तान टाइप हो गया। विश्वासी लोग हिन्दुस्तान हो गये। अविश्वासी पाकिस्तान। हिन्दुस्तानियों ने पाकिस्तानियों पर आरोपों की ’सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी। देशभक्ति के बमों मिसायलों से हमले कर दिये। पूरा पाकिस्तान धुंआ-धुंआ हो गया। देशभक्तों ने नारा लगाया-’ जो अपने देश से करे प्यार, वो सर्जिकल से कैसे करे इंकार।’
यह तो हुई ऊंची समझ और ऊंची पसंद वाले लोगों की बात। इसके अलावा गरीबी, भुखमरी , बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसी समस्यायों के शाश्वत हमले झेलती आम आबादी को समझ ही नहीं आया कि ’सर्जिकल स्ट्राइक’ होती क्या है? उनको समझ ही नहीं आ रहा कि यह कोई नई समस्या है या उनकी समस्याओं का कोई इलाज! यह कोई नया बवाल है या फ़िर कोई ’जो बोले सो निहाल !’
जब तक पहली ’सर्जिकल स्ट्राइक’ का मामला समझ में आये तब तक एक और हो गयी। एक जनसेवक ने दूसरे को भरी सभा में जुतिया दिया। दे दनादन। शायद उसने अपनी आम जनता को समझाने के लिये ऐसा किया हो। जनता को शिक्षित और दीक्षित करने की जिम्मा भी तो जनप्रतिनिधि का ही होता है। उदाहरण पेश करके समझा दिया अगले ने – “ये देक्खो ऐसे होती है ’सर्जिकल स्ट्राइक।’ “
कुछ लोगों ने इस जूतमपैजार और हाथापाई का बुरा माना। घटना की ’निंदा’ की । कुछ ने ’कड़ी निंदा’ भी की। ’निंदा’ और ’कड़ी निंदा’ के बारे में आपको पता ही होगा कि सर्जिकल स्ट्राइक के पहले इन्हीं से हमले किये जाते थे दुश्मन देशों पर। 'निंदा' और 'कड़ी निंदा' दोनो हथियार एक ही घराने के हैं। बस अंतर कड़ेपन का होता है। पानी और बर्फ़ के अंतर की तरह। किसी ग्लास में रखा हुआ पानी चार हाथ दूर तक फ़ेंककर मारा जा सकता है लेकिन उसी की जमी हुई बर्फ़ फ़ेंककर चालीस हाथ दूर तक चोट पहुंचा सकती है। इससे लगता है कि जो 'निंदा' दूर तक मार करती है वह ’कड़ी निंदा’ होती है।
जो लोग कड़ी निंदा की ताकत को कम करके आंकते हैं उनको वीर रस के कवियों को सुनना चाहिये। जिस तरह से वीर रस के कवि माइक पर पाकिस्तान को हड़काते हैं उससे लगता है कि अगर माइक लगाकर सीमा रेखा पर रस का कवि सम्मेलन करवा दिया जाये तो पाकिस्तान अपने फ़ौज-फ़ाटे समेत रोज सौ मीटर पीछे खिसकता चला जाये।
जिन लोगों ने इस जूतमपैजार का बुरा माना वे इस घटना के उजले पहलुओं की अनदेखी कर रहे हैं। जनसेवकों पर अक्सर उनकी कथनी और करनी में अंतर होने का आरोप लगाया जाता है। सरेआम जूतम पैजार और मार कुटाई करके जनसेवकों ने अपने व्यवहार की कथनी और करनी का अन्तर मिटाने का प्रयास किया है। गुंडागर्दी और जनसेवा में कितनी निकटता है यह बताने की कोशिश की है। उन्होंने यह बताने की भी कोशिश की है कि अपनी गुंडागर्दी के लिये शरमाने की बजाये उस पर गर्व करना चाहिये। अपनी समाज विरोधी हरकतों के उजागर होने के डर से अपने को मुक्त किया है। ’डर के आगे जीत है’ के हिसाब से अपनी भविष्य की विजय सुनिश्चित की है।
हमारे एक मित्र का मानना है कि जूता चलाने वाले जनसेवक तबियत से थोड़ा शायराना हैं। उनकों पापुलर मेरठी का यह शेर बहुत पसन्द है:
’न देखा करो मवालियों को हिकारत से,
न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाए ।’
यह शेर उनके जेहन पर इस कदर सवार हो गया कि वे वजीर बनने का रास्ता गुंडागर्दी को मानने लगे। इस के असर में आकर उन्होंने जूतेबाजी कर दी।
यह कतिपय विडम्बनाओं के मूर्तिमान होने का सर्जिकल उदाहरण है।
हमारे एक मित्र मानते हैं कि गुंडागर्दी आज की राजनीति का सहज स्वीकार्य तत्व है। जूतम पैजार और हाथापाई गुंडों के सहज आभूषण हैं। जूतम पैजार के साथ हाथापाई भी स्वाभाविक है। इसलिये जो हुआ उसमें कोई बुरा नहीं है। बल्कि इस घटना से राजनीति में पारदर्शिता के नये आयाम खुले हैं।
हमारे दूसरे देशभक्त मित्र मानते हैं कि राजनीति में गुंडागर्दी कोई खराबी नहीं है। गुंडई आज की राजनीति का प्राणतत्व है। ताकत है। देशसेवा के चक्कर में कोई अपनी ताकत को कब तक छिपाता रहेगा। देशसेवा में इतनी बदतमीजी तो चलती है। बल्कि बिना बदतमीजी के जनसेवकों को अब लोग अपना नुमाइंदा मानने से इंकार कर देते हैं। लेकिन इन जनसेवकों से बड़ी चूक यह हुई कि उन्होंने गुंडागर्दी के साथ देशभक्ति का कोई नारा नहीं लगाया। न ’भारतमाता की जय’ कहा न ही ’इंकलाब जिन्दाबाद’। कुछ न कहते तो ’वंदेमातरम’ का नारा तो लगा ही सकते थे। अगर वे ऐसा करते तो उनकी सारी हरकत देशसेवा साबित हो जाती फ़िर किसी की उनकी निन्दा करने की किसी की हिम्मत न होती।
अपने मित्र की बात को गलत कहने की सोच ही रहे थे कि हमें उनके बिना जूते के फ़ीते दिख गये। मित्र की बात का विरोध करने पर की ’जूतिकल स्ट्राइक’ सम्भावित आशंका ने हमें चुप कर दिया। एक हाथ अपने सर पर रखकर दूसरे से मुट्ठी भींचते हुये हमने जोर से ’ जयहिंद’ बोला तो मित्र मुस्कराते हुये बोले-’अब जय एयर इंडिया के होस्टेज की तरह जयहिंद बोला ही है तो चाय ही पिला दो।
’भारतमाता की जय’ बोलते हुये हमने चाय का पानी चढा दिया। दूध-चीनी के साथ ’इंकलाब जिन्दाबाद’ बोल दिया। मित्र ने शाबासी देते हुये बयान जारी किया- ’अब तुम सच्चे देशभक्त हो गये।’
हमारे मित्र हमारे घर में घुसकर हमारी चाय पीते हुये हमको देशभक्ति का प्रमाणपत्र दे रहे हैं। हमारे पास उनको धन्यवाद देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
अट्टहास के अप्रैल , 2019 अंक में प्रकाशित। शीर्षक सौजन्य से Alok Puranik

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10216535519273941

No comments:

Post a Comment