Friday, March 26, 2021

मुसीबत का मुकाबला डटकर करो

 

पार्क में पेड़ की पत्तियों ने सोशल डिसटैनसिंग को मानने से साफ इंकार कर दिया है। वे नए खिले फूलों के साथ सटकर मस्ती में झूम रहीं हैं। झूले अलबत्ता दूरी बनाए हुए हैं। जहां के तहाँ 'थम' गये हैं। उनको डर है कि जरा कहीं नजदीक दिखे तो कोई तुड़ाई कर देगा।
कमरे में खिड़की खोलते ही अनगिनत किरणें बिना मास्क खिलखिलाते हुए बिस्तर, कुर्सी, फर्श पर पसर गयीं। हम उनको दूरी बनाकर रहने को कहते हैं कि भाई दूरी बनाकर रखो। कोरोना से डरो। वे और पास आकर चमकने लगती हैं।
हम सूरज भाई से कहते हैं अरे भाई समझाओ अपनी इन बच्चियों को। कोरोना से बचकर रहना है। दूरी बनाकर रहना है।
सूरज भाई हंसते हुए कहते हैं -'कोरोना इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ये जन्मजन्मांतर ऐसे ही खिलखिलाते रहेंगी। कोरोना इनसे बचने के लिए देश-देश मारा-मारा घूम रहा है। इनकी संगत में रहो तुम भी बचे रहोगे।'
हम क्या बोलें सूरज भाई ऊपर आसमान में चमकते हुए ड्यूटी बजा रहे हैं। पूरे आसमान में छाए हुए हैं । उनके यहां न लाकडाउन न वर्क फ्रॉम होम। जलवा है सूरज भाई का। हो भी क्यों न ! लाखों-करोड़ों डिग्री टेम्परेचर रखते हैं सूरज भाई। पूरी धरती उनके सामने ऐसी जैसे स्विमिंग पूल में कोई कम्पट। उनके लिए क्या कोरोना, क्या फोरोना।
हम सूरज भाई के साथ सेल्फी लेने की सोचे कि जलवेदार हस्ती के साथ फोटो खिंचा कर अपलोड कर दें। डरेगा कोरोना। लेकिन सूरज भाई ने टोंक दिया कि ऐसे भूत बनके सेल्फी न लो। जरा नहा-धोकर राजा बाबू बनकर आओ तब फोटो खिंचवाओ। उजड़े-उखड़े मुंह फोटो खिंचायोगे तो लोग समझेंगे कि कोरोना के डर से कवि हो गए हो।
हम बोले ठीक। आते अभी नहाकर। सूरज भाई बोले -'हम भी आते जरा रोशनी, गर्मी और उजाले की सप्लाई देखकर।'
ऊपर उठते हुए सूरज भाई कह रहे थे -'चिंता न करो। मुसीबत का मुकाबला डटकर करो। सफाई से रहो, दूरी बनाओ। मस्त रहो। दम बनी रहे, घर चूता है तो चूने दो।'

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