Thursday, September 03, 2026

जूता पॉलिश के बहाने



 कल जूते में पॉलिश कराने गए। कैलाश धाम कॉलोनी के गेट पर बैठने वाले ‘ जूता साज’ दिखे नहीं। पूछा तो पता चला कि बहुत दिन से वहाँ नहीं बैठते। यह भी जानकारी मिली कि सेक्टर मार्केट में मिल जायेंगे पॉलिश वाले।


मार्केट गए। कोई दिखा नहीं। पूछा तो पता लगा कि पेड़ के पीछे बैठते हैं पॉलिश वाले। गए। पेड़ की आड़ में , दीवार के सहारे, दुकान सजाये बैठे थे धूरन राम जी।

जुटा पॉलिश के लिए देने से पहले पूछ लिया -‘ गूगल से भुगतान हो जाएगा?’ बोले-‘ हाँ , हो जाएगा।’

अपने यहाँ ऑनलाइन भुगतान की व्यवस्था की स्थिति बहुत शानदार है। ज्यादातर खरीद का और लेन-देन ऑनलाइन होने लगा है। सिर्फ़ बड़े भुगतान, घपले-घोटाले , जनप्रतिनिधियों की ख़रीद-फरोख्त इससे बाहर है।

पॉलिश करते हुए बातचीत से पता चला कि धूरन जी समस्तीपुर, बिहार के रहने वाले हैं। वर्षों पहले आए थे यहाँ। अब यहीं के हो गए। आते-जाते रहते हैं गाँव-जवार। तीज-त्योहार, काम-काज में।

इस बीच उनके एक साथी आए। हाथ में मली हुई सुरती तंबाकू फटकार कर धूरन जी को दी। उन्होंने तंबाकू होंठ के नीचे दबा ली। मुँह बंद हो गया उनका।

यह देखकर लगा कि किसी का मुँह बंद करने का सबसे अच्छा तरीका यही होता है कि उसको कुछ खाने को दे दो। दुनिया में यही चलन आम है। लोग पैसा, पद, प्रतिष्ठा खाकर चुप हो जाते हैं। कुछ बोल नहीं पाते।

तंबाकू खिलाने वाले साथ बेगूसराय , बिहार के हैं। बताया तमाम लोग आसपास के जिलों के हैं बिहार के। बिहार से उत्तर प्रदेश कमाने आने वालों के लिए कोई भाषा की समस्या और शर्त भी नहीं है महाराष्ट्र की तरह।

पॉलिश कराने के बाद धूरन राम जी ने पैसे बताये -30 रुपए। भुगतान किए। तभी उनका नाम पता चला। चलने से पहले उनका फ़ोटो लिया। उनको दिखाया।

लौटते समय जूते की चमक देखकर धूमिल जी की कविता ‘मोचीराम ‘याद आ गई। कविता की ये पंक्तियां ख़ासकर:

“ और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िन्दा रहने के पीछे
अगर सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेंचकर
या रण्डियों की दलाली करके
रोज़ी कमाने में
कोई फर्क नहीं है।”

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