Wednesday, August 10, 2005

अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी



आजकल मुझे कन्हैयालाल नंदन की कविता सूरज की पेशीबार-बार याद आ रही है:-
नजरों के ओछेपन जब इतिहास रचाते हैं,
पिटे हुये मोहरे पन्ना-पन्ना भर जाते हैं,
बैठाये जाते हैं सच्चों पर पहरे तगड़े,
अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी,
किरणें ऐसे करें गवाही जैसे परदेसी ,
सरेआम नीलाम रोशनी ऊंचे भाव चढ़े,
भरी धार लगता है जैसे बालू बीच खड़े।
ये अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी का मामला आजकल चल रहा है। महाभ्रष्ट आई.ए.एस. अफसरों को प्रतिवर्ष चिन्हित करने की मुहिम छेड़ने वाले उ.प्र. के वरिष्ठ नौकरशाह श्री विजय शंकर पांडे के खिलाफ शासन हरकत में आ गया है। कुछ और लिखने के पहले थोड़ी जानकारी विजयशंकर पांडे के बारे में।
विजय शंकर पांडे उन चंद बेहद ईमानदार आई.ए.एस. अधिकारियों में माने जाते हैं जो शासन के बेईमान अधिकारियों के खिलाफ लगातार मुहिम छेड़ते रहे हैं । उनकी ईमानदारी की लोग मिसाल देते हैं। जैसा सुना जाता है कि वे अपने कलक्टर के कार्यकाल के दौरान अपने बंगले में उगी फसल का पैसा भी सरकारी खजाने में जमा कराते रहे। जिन जगहों में रहे वहां की नौकरशाही परेशान हो जाती थी इन सिरफरे ईमानदार साहब से। समयपालन होने लगता। लखीमपुर में जब डी.एम. थे तो उगाही करने वाले दफ्तरों के कर्मचारियों पर अंकुश लगाने के लिये नियम बनाया था कि कार्य के दौरान इतने रुपये से अधिक किसी के पास पाये गये तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। बहुतों के खिलाफ की भी।फतेहपुर में पोस्टिंग के दौरान अपने अनुभव लिखते हुये तफसील से बताया कि गुंडा तत्वों का मनोबल कैसे ध्वस्तकियाजा सकता है। कैसे जनता में आत्मविश्वास जगाया जा सकता है। ऐसे सिरफिरे नौकरशाह की नौकरी कभी सुकूनदेह नहीं रही। लगातार उनके तबादले होते रहे। महत्वहीन पदों पर भेजे जातेरहे।
लोग कहते हैं कानून अंधा होता है लेकिन यह सच नहीं है। कानून काना होता है। यह जिधर मन होता है उधर देखता है।- हरिशंकर परसाई
बात यहीं तक नहीं रही। उन्होंने आईएएस एशोसियेशन के माध्यम उ.प्र. के भ्रष्टतम अधिकारियों को चिन्हित करने का काम किया। इनमें भूतपूर्व मुख्यसचिव श्री अखंड प्रताप सिंह भी थे जिनके खिलाफ रिटायर होने के बाद ही मुकदमा शुरु हो सका। वर्तमान मुख्यसचिव को भी आईएएस एशोसियेशन ने महाभ्रष्ट अधिकारी के रूप में चिन्हित किया था।इस बार भी यहप्रक्रिया शुरु होने वाली थी।
अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक- इस बीच ८,अगस्त ,२००५ को जारी शासनादेश के अनुसार निजी मतदान के द्वारा किसी को अधिकारी को भ्रष्ट बताने को दुराचरण करार दे दिया गया है। मतलब अब एशोसियेशन किसी को अपने विवेक से भ्रष्ट ठहराने का काम करेगी तो गैरकानूनी काम होगा।इस बीच विजयशंकर पांडे को भी एक जांच में फंसाया गया था। कुछ अनियमितताओं को लेकर जांच की गई थी ।जांच में वे निर्दोष पाये गये थे लेकिन रिपोर्ट को स्वीकृत करने वाले अधिकारियों को भी भ्रष्ट अधि कारी के रूप में चिन्हित कर चुके थे लिहाजा शायद रिपोर्ट में फेर बदल किया गया । तथा अब उनके खिलाफ कार्रवाई की कवायद चल रही है। कल गिरफ्तारी की भी अफवाह रही। जिसके लिये पांडेजी का कहना है- “मैं तो गिरफ्तारी के लिये तैयार बैठा हूं ।कोई आये तो।”
श्री पांडे ने हाईकोर्ट में शरण लेकर अपने खिलाफ चल रही सतर्कता जांच में हेराफेरी व खुद को फंसाये जाने का आरोप लगाते हुये पूरे प्रकरण की जांच सी.बी.आई. से कराने की गुहार की है।उनकी याचिका पर आज सुनवाई होने वाली है। आगे क्या होगा यह समय बतायेगा। लेकिन यह तय है कि ईमानदारी का परचम लहराने का खामियाजा श्री पांडे को तो भुगतना पड़ रहा है।
भारत में आई.ए.एस. लाबी सबसे ताकतवर मानी जाती है। देश के सबसे जहीन लोग इस सेवा में आते रहे हैं। इन जहीन लोगों का बहुमत या तो श्री पांडे के खिलाफ होगा या निर्लिप्त-यह सोचकर कि यह तो पांडेजी का मामला है वे खुद निपटेंगे-व्हाट कैन आई डू?
जब पड़ोसी के घर में आग लगने पर आप सोचते हैं कि आप तो सुरक्षित हैं तब यह भी सोच लेना चाहिये कि अगला जलने वाला घर आपका भी हो सकता है।
देश की यह सबसे जहीन ,ताकतवर लाबी -”यू सो मी द फेस ,आई विल सो यू द रूल” के स्वर्णिम नियम का अनुपालन करते हुये शानदार ढंग से काम करती है।
शासन के लोग बतायेंगे कि उनके खिलाफ मामला चल रहा है लिहाजा हम कुछ नहीं कह सकते हैं। अखबार को कल से दूसरा मसाला मिल जायेगा। उनको भी तो अपना अखबार चलाना है। पूरी दुनिया को देखना है। कहां तक एक ईमानदार माने जाने वाले अधिकारी का साथ देते रहें?
हरिशंकर परसाई जी ने कहीं लिखा है- लोग कहते हैं कानून अंधा होता है लेकिन यह सच नहीं है। कानून काना होता है। यह जिधर मन होता है उधर देखता है।
लोग कहते हैं कि जब पड़ोसी के घर में आग लगने पर आप सोचते हैं कि आप तो सुरक्षित हैं तब यह भी सोच लेना चाहिये कि अगला जलने वाला घर आपका भी हो सकता है।
लोग कहते हैं कि ब्लाग में बड़ी ताकत होती है। क्या सच में ऐसा है?
मेरी पसंद
तुम्हारा हर काफिला
मतलब की सुरंग से गुजरता है
हर कदम
फायदे के राजमार्ग पर
पड़ता है।
तुम ,
अभी बदले नहीं,
इसीलिये बहुमत में हो।
-अनूप शुक्ला

2 responses to “अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी”

  1. eswami
    गुरुवर्,
    ब्लागमंडल मे किसी ने टिप्पणी की थी की भारत का नुकसान पढे लिखों ने ज्यादा किया है! १६ आने सच बात है.
    हम सब अलग-अलग मामलों मे किसी ना किसी बहुमत या अल्पमत वालों मे शरीक होते हैं मगर एक बहुमत मे सभी शरीक हैं की भारत मे ईमानदार सरकारी पदाधिकारी अल्पसंख्यक हैं.
  2. आलोक कुमार
    ईमानदारी का फल, मिलेगा ही, और वह भी मीठा। यहाँ नहीं तो वहाँ।

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Monday, August 08, 2005

हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा



आज दुनिया में हैरी पाटर का हल्ला है। नित नये तथ्य सामने लाये जा रहे हैं। सारी हैरी पाटर की किताबें साथ-साथ रखी जायें तो दुनिया को इतनी बार घेर लेंगी। एक के ऊपर एक रखी जायें तो चांद तक इतनी बार आने-जाने लायक सीढ़ी बन जायेगी। सारी किताबें मिलाकर पढ़ी जायें तो एक आदमी को सारी किताबों के बराबर शब्द पढ़ने में इतने हजार साल लगेंगे ।आदि-इत्यादि। वगैरह-वगैरह।
हैरी पाटर की लेखिका जोएला कैथलिन रालिंग के बारे में भी दिन-प्रतिदिन नये-नये तथ्य या पुराने तथ्य नये रूप में सामने आते रहते हैं। हैरी पाटर लिखने के पहले की उनकी आर्थिक हालत ऐसी भी नहीं थी कि किताब लिखने के लिये कागज खरीद सकें। आज छह किताबें लिखने के बाद उनके पास इतना पैसा है कि ये खरीद सकतीं हैं वो खरीद सकती हैं।
हैरी पाटर एक चमत्कारी बालक है। जो अपने जादू के जोर से बुराई की प्रतीक शक्तियों पर कब्जा करता है । खतरे में पढ़ता है लेकिन विजयी होता है ,अपनी जादुई ताकतों से। यह फंतासी चरित्र दुनिया में इतना लोकप्रिय है कि बच्चे घंटों लाइन में लगकर किताब खरीद कर रातों-रात जगकर पढ़ रहे हैं।
हैरी पाटर एक चमत्कारी बालक है। जो अपने जादू के जोर से बुराई की प्रतीक शक्तियों पर कब्जा करता है ।
मुझे न हैरी पाटर से कोई चिढ़ है न कोई लगाव । लेकिन जब दुनिया में इतना हल्ला मचा देखता हूं तो उसकी खूबी जरा नजदीक से देखने का मन करता है। पाता हूं कि हैरी पाटर का पूरा कथानक शक्ति तथा गोपनीय ज्ञान प्राप्त करने के प्रयास से गुंथा हुआ है। बच्चे जादूगरी की तालीम पाते हुये सिर्फ अपना भला करना सीख रहे हैं। बच्चे सीख रहे हैं कि पर्यावरण को सुविधानुसार बदल डालो। लोगों को उनकी मर्जी के खिलाफ काम कराने के लिये दवायें पिलाने की मंशा पर जोर है।हर मुश्किल से
निजात पाने के लिये जादुई ताकतों पर कब्जा करने पर जोर है। ऐन-केन-प्रकारेण अपने लक्ष्य पाने की यानी कि साधनों की चिंता बिना काम को अंजाम देने का संदेश है।
हैरी पाटर के लक्ष्य प्राप्ति का अंदाज मुझे उस डायनासोर का अंदाज लगता है जो किसी मंजिल को पाने के लिये दौड़ रहा है तथा उसके रास्ते में जो कोई भी आ रहा है वह भू लुंठित होता जा रहा हैं। जाने -अनजाने मैं जब भी इस मासूम चेहरे वाले बच्चे को देखता हूं तो लगता है कि ऐन-केन-प्रकारेण अकेले दम मंजिल हासिल करने की सीख घुट्टी में पीने वाला यह बच्चा धीरे-धीरे उस मानसिकता में पहुंच जायेगा जब जो यह सोचेगा वही सच मानेगा। जिसे गलत देखेगा ,रौंद डालेगा।
हैरी पाटर के लक्ष्य प्राप्ति का अंदाज मुझे उस डायनासोर का अंदाज लगता है जो किसी मंजिल को पाने के लिये दौड़ रहा है तथा उसके रास्ते में जो कोई भी आ रहा है वह भू लुंठित होता जा रहा हैं।
हैरी पाटर को जब याद करता हूं तो अनायास होरी याद आता है।होरी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान का नायक है जो कर्ज में डूब के मरा। हैरी और होरी दोनों के लेखक संयोग से ३१ जुलाई को पैदा हुये थे। हां दोनों की नियति में अंतर था। प्रेमचंद ने समाज की स्थितियों से प्रभावित होकर अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़ी तथा जब १९३६ में लखनऊ में प्रगतिशील आंदोलन की स्थापना करने आये तो उनके जूते फटे थे। उनका मानना था कि साहित्य, समाज तथा राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। जो समय की मांग थी उसे अपने साहित्य के माध्यम से दुनिया के सामने रखा । तमाम सवालों के हल सोचे। दबे-कुचलों की स्थितियां बयान की तथा उनके बदलाव के लिये जमीन बनाने का रास्ता सुझाया। साम्राज्यवादियों तथा प्रतिगामी राजनीति की पोल खोलने का प्रयास किया । सभी जगह समानता तथा सामूहिकताकी वकालत की।
उसके वरक्स ,अपनी हर किताब से दिन पर दिन संपन्न होती जा रही ,हैरी पाटर की लेखिका अपने पाठक वर्ग को तिलिस्मी संसार में ले जाती हैं। जहां -नहिं कोउ अबुध न लक्षन हीना।हैरी पाटर में प्रेम तथा साहस तो है लेकिन सही गलत में घालमेल है।बाल मन को भूलभुलैया में ले जाकर छोड़ दिया जाता है।जहां वह देखता कि नायक हैरी का जादू अलादीन का वह चिराग है जिसके बाद फिर कुछ करने को नहीं रह जाता। यह हैरी का हल्ला बिकाऊ तो है लेकिन टिकाऊ नहीं है।इसके पांव हवा में हैं। कुछ साल में इसकी हवा निकल जायेगी।
हैरी का हल्ला बिकाऊ तो है लेकिन टिकाऊ नहीं है।इसके पांव हवा में हैं। कुछ साल में इसकी हवा निकल जायेगी।
हैरी पाटर की तुलना प्रेमचंद के ही आसपास रहे देवकीनंदनखत्री की चंद्रकांता सीरीज की किताबों से की जा सकती है। अपने जमाने खत्री जी का लिखा पढ़ने के लिये लोगों ने हिंदी सीखी। आज वे ‘ऐयारी’ के किस्से इतिहास में दफन हैं।हालत यह है कि पचास रुपये में १००० से अधिक पन्नों की‘देवकीनंदनसमग्र’ की बिक्री ठप्प है। ऐयारी का नशा उतर गया, हर नशे का समय होता है।
होरी का नाम तो ऊपर लिया गया नाम साम्य के लिये। हैरी का मुकाबला करा लीजिये हामिद से। तीस के दशक का हामिद का चिमटा आज भी हैरी के सैकड़ों डिजाइनर जादुओं तथा ताम-झाम पर भारी पड़ेगा। ईदगाह में उस जमाने के मंहगे खिलौनों की हवा निकालते हुये हामिद अपने चिमटे के बारे में बताता है:-
उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए मियॉँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं, जो मियॉँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागे, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीन पर लेट जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।
हामिद के पास अभाव की पूंजी है । वह तमाम दुनियावी ताम-झाम में भी अपनी दादी को नहीं भूलता। बाजार की चीजों के प्रति ललक है लेकिन अंधा लालच नहीं कि ० डाउनपेमेंट की किस्तों पर लुभावनी चीजें खरीद ले।
हैरी पाटर की नकारात्मकता यह है कि खास लोगों की सोच का प्रतिनिधित्व करती है। गरीब अश्वेत बच्चे कहीं नहीं हैं यहां। अपने साधनों पर खुशी हासिल करने के बजाय ताकत ,किसी भी कीमत पर , हासिल करने की सीख साम्राज्यवादी अंदाज है। हैरी पाटर को हर हाल में जीतना है क्योंकि वह साम्राज्यवादी प्रभुता का प्रतीक है।
हैरी का मुकाबला करा लीजिये हामिद से। तीस के दशक का हामिद का चिमटा आज भी हैरी के सैकड़ों डिजाइनर जादुओं तथा ताम-झाम पर भारी पड़ेगा।
आज हैरी के दिन हैं । समय से बड़ा कोई नहीं होता । पर मुझे न जाने क्यों‘ईदगाह’ कहानी के कुछ पन्ने हैरी पाटर के हजारों पन्नों पर भारी लगते हैं तथा हामिद का चिमटा हैरी के किसी भी जादू से ज्यादा आत्मविश्वास से भरा लगता है। कारण शायद यह भी है कि हामिद का सच मुझे अपना सच लगता है जबकि हैरी पाटर का सच किसी का सच नहीं है सिवाय चंद लोगोंकी फंतासी के।
आपको क्या लगता है?

13 responses to “हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा”

  1. eswami
    विडियो गेम खेलने से कबड्डी खेलना मन और स्वास्थ्य के लिये ज्यादा सही है.गालिब की गज़लें “कांटा लगा” छाप रीमिक्स से ज्यादा स्तरीय हैं. पिज्जा से दलिया ज्यादा उचित है. ऐसी तमाम तुलनाएं साहित्य के अलावा भी हर जगह कर सकता हूं. दुनिया मे हर चीज की एक जगह,एक बाजार और एक भूमिका है और कोई भी काम करने का तरीका अलग-अलग समाजों मे अलग-अलग हो सकता है.
    अगर आपने बचपन मे कामिक्स कथाएं नही पढीं तो आप स्पाईडर मेन किल-बिल १ और २, सिन सिटी जैसी फ़िल्मों मे दिखाई कलात्मक हिंसा – जी हां, कलात्मक हिंसा बहुत ही सुंदर, कलात्मक हिंसा सराहने के काबिल नही – बाकायदा बाउंसर निकल जाएगी – “इस मे क्या है” टाईप! भले ही सत्यजित राय वाली शतरंज के खिलाडी को समीक्षित कर सको और उपन्यास से कितना न्याय हुआ इस पर पेल मचा सको!पर आप किल-बिल मे क्विंटन टेरेन्टिनो ने क्या कमाल किया है समझ नही सकोगे संदेश कैसे दिया है समझ नही सकोगे!
    साहित्य का उद्देश्य हमेशा शिक्षित करना ही क्यों हो? मनोरंजित करना भी तो हो – मनोरंजन के बाद, पढने की लत के बाद धीरे से स्वाद बदलो ना आप!आज हिंदी पढने वाले इस लिये कम है की या तो साहित्य मेलोड्रामा, कविता-शविता परोसता है या प्रवचन और उनको पढने वाले अपने आप को ज्यादा एलीट समझते हैं.
    हामिद का चिमटा उन तमाम बच्चों को गिल्ट देता है जिन्होंने मध्यमवर्गिय परिवारों मे भी पैदा हो कर बाल हठ किये होंगे – सारे हामिद जैसे स्याने नही होते इस का ये मतलब नही की बाकी बच्चे अपने माता-पिता की आर्थिक सीमितता नही समझे होंगे, बाल-मन है खिलौना चाहेगा. और उन तमाम मा-बाप को ये शिक्षा देता है की तुम्हारा बच्चा हामिद है या नही इस की लिटमस टेस्ट लो और ना हो तो पडोसी की औलाद हामिद है वो नही है ये तुलना करने से मत चूको!क्या ये नही होता? क्या ये नही हुआ?? भाड मे गया हामिद और उसका चिमटा – मेरी चले तो ये कहानी कालिज के लेवल पर कोर्स मे होना चाहिए स्कूल के लेवल पर नही! गिल्ट-मांगरीग देसी मेन्टेलिटी को प्रमोट करती है ये कहानी!!
  2. Anaam
    सही लिखा है बन्धु! शीर्षक बहुत ही बढिया है! शुक्ला जी आपकी बातें मन को छू लेती हैं| लगता है..किसी ने हमारे दिमाग़ से विचार निकाल कर यहान र्रख दिये हों| आप तो गुरु हैं हमारे!
  3. आशीष
    सही कहे हो शुक्ला जी। दम है। लेकिन क्या हमारे चन्दामामा, मधुमुस्कान, लोटपोट और पंचतन्त्र की कहानियां हैरी पॉटर से कम हैं? कम से कम मुझे तो नहीं लगता है। सवाल है बाजारीकरण और भारतीय मानसिकता का। हमारे भारतीय प्रकाशक और भारतीय पाठक विदेशी घटियापन को पढ़ने के लिये काफ़ी रकम खर्च कर सकते हैं लेकिन जब वही रकम अच्छे देसी सामान पर खर्च करने को कहा जाये तो मोलभाव होता है और आलोचनायें होती हैं और ये है गुलाम मानसिकता और हीनता के भाव के कारण।
  4. अनुनाद
    हामिद और हैरी अपनी-आपनी पसन्द और अपनी-अपनी सोच का विषय है |
    ये इससे निर्धारित होता है कि आप साहित्य ( स + हित्य ; या, हित सहित ) का उद्देश्य क्या मानते हैं | जैसे तुलसीदास जी का मानना है कि -
    कीरति भनिति भूति भलि सोई |
    सुरसरि सम सबकर हित होई ||
    ( वही कीर्ति , कविता और धन अच्छा है जो गंगा के समान सबके लिये हितकर हो )
    शुक्ला जी को साधुवाद जो धारा के विपरीत चलने का साहस करते हैं | धारा की दिशा में तो प्राणहीन तिनका भी बह लेता है |
    अनुनाद्
  5. फ़ुरसतिया » ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहानी है
    [...] नहीं जीवनबोध की कहानी है मेरे लेखहैरी पाटर का जादू तथा हामिद का चिमटा पर [...]
  6. फुरसतिया » अपनी फोटो भेजिये न!
    [...] जोशीजे बताया कि उन्होंने मेरे लेख हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा और जहां का रावण कभी नहीं मरता पढ़ रखे हैं। इन दोनों लेखों से ही उन्होंने अन्दाजा लगा लिया कि हम कोई लेखक टाइप के आइटम होंगे। और उन्होंने हमारी फोटो मांगी संग्रह के लिये। [...]
  7. फुरसतिया » पत्रकार ब्लागिंग काहे न करें, जम के करें!
    [...] बहसें पहले भी होती रहीं हैं। हैरी पाटर बनाम हामिद और अमेरिकी जीवन पर तमाम ब्लागर्स ने इसके पहले तमाम गर्मागर्म बहसें कीं लेकिन इतनी श्रद्धापूर्वक नहीं। हिंदी ब्लागिंग के कुछ बेहतरीन लेख अनुगूंज में मिल सकते हैं। [...]
  8. ईमानदारी - खरीद न सको तो मैनेज कर लो
    [...] भी पढिये न: 1. हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा 2. ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की [...]
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] दिये जायें ? 2.अधूरे कामों का बादशाह 3.हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा 4.अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी [...]
  10. संतोष त्रिवेदी
    आज की पीढ़ी जिस तरह अपने नए आदर्श गढ़ रही है,हैरी उसी का मोहरा है !इसे हमारा दुर्भाग्य कहिये या सौभाग्य ,हम जिस ज़माने में पैदा हुए और जहाँ लिखाई-पढ़ाई की, वहां हैरी कहीं दूर तक नहीं दिखा! ‘होरी और ‘हामिद’ भले ही हमारे प्रेरणास्रोत रहे हों आज के युवा उनके बारे में सोचना भी पसंद नहीं करेंगे !
    मुंशी प्रेमचंद का लेखन शौकिया और समाजसेवा के लिए था,जबकि रोलिंग साहिबा का विशुद्ध व्यावसायिक.मुंशीजी ने यथार्थ को कागज़ पर उतारा जबकि इनने फंतासी को हवा में!आर्थिक लिहाज़ से रोलिंग की सफलता-दर बहुत अधिक है पर साहित्य का वास्तविक मूल्य उसके पाठक और उसका उद्देश्य होता है,जिसमें कथा-सम्राट प्रेमचंद जी के आगे कोई नहीं टिकता !
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..‘स्लटवाक’ के पैरोकार !
  11. Anonymous
    हर्री पोट्टर एक काल्पनिक कथा है… इसकी तुलना वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित कथाओं से नहीं करनी चाहिए.
  12. चंदन कुमार मिश्र
    हम इतने उदार नहीं क्योंकि हम बुद्ध नहीं जो स्वामी जी की तरह सोच सकें। वे एक साम्राज्यवादी और पूँजीवादी विचारधारा के मानने वाले लगते हैं, हालांकि वे सम्माननीय हैं, आदरणीय हैं, बेहतर लिखते हैं, अन्दाज भी बढ़िया और अनोखा है उनका। लेकिन हैरी और रोलिंग पर आपका लिखा एक नये पक्ष को सामने लाता है। ये सब लूट पाट का नमूना है…जिससे जनता को लगाना चूना है…
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..एक बार फ़िर आ जाओ (गाँधी जी पर एक गीत)
  13. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    ग़ज़ब का आलेख है। बहुत बढ़िया।

Saturday, August 06, 2005

अधूरे कामों का बादशाह


सबेरे से दोपहर तक का समय सफलतापूर्वक बरबाद करके देश की प्रगति में भरपूर योगदान कर चुकने के बाबजूद तिवारी जी अपने काम से खुश नहीं दिख रहे थे। मन कुछ बेचैन सा था।लंच होने ही वाला था लेकिन न जैने कैसे झटके से उठे। सामनेपर पड़ी फाईलों से कुछ बिना देखे उठाकर वे साहब के कमरे की तरफ चल दिये। रास्ते में अपने चेहरे पर ६७:३३ के अनुपात में जिम्मेदारी और बेचैनी का मिश्रण पोतकर वह साहब के कमरे के सिस्टम में चुपके से किसी वायरस की तरह घुसे तथा हालात का जायजा लेने लगे।
दफ्तर में सुव्यवस्थित अव्यवस्था फैली थी। साहब की मेज पर करीब १०० किलो फाईलें तथा सामने की कुर्सियों पर करीब ५०० किलो शरीर पसरे थे। साहब के मुंह के दांये कोने में ‘पारकर’ का पेन घुसा था तथा बायें कोने में पान का कब्जा था। मुंह के बीच का रास्ता आवाज की आवा-जाही के लिये था।माथे के ऊपर रंगीन चश्मा किसी कार के बोनट सा टंगा था।साहब की दशा फिलहाल सोचनीय थी लिहाजा यह अंदाज लगा पाना जरा कठिन था कि साहब के चेहरे से जो टपक रहा था उसे तनाव कहा जाय या तेज!
जैसा कि सर्वविदित है कि अधिकारी चाहे कर्मठ हो या कामचोर ,उसके काम करने का विशिष्ट तरीका होता है। इस सिद्धांत के अनुपालन में साहब के काम करने का भी खास तरीका था। वे मंजिल पाने से ज्यादा यात्रा करते रहने के हिमायती थे। कोई काम निपटाने की बजाय उसे करते रहने में साहब को ज्यादा सुकून मिलता। मातहतों से बातचीत करते तो भी इस अंदाज को नहीं छोड़ते। वे एक बार में कभी भी किसी व्यक्ति से कभी भी पूरी बात नहीं करते। दो-तीन मिनट किसी से बतियाते । फिर उसके बगलवाले से । फिर उसके भी बगल वाले से। उनके दफ्तर में लोग आते भले ही अलग-अलग समय पर हों पर जा हमेशा साथ-साथ ही पाते थे।
कुछ लोग मजाक में कहते कि साहब को किसी फकीर ने बताया है – ‘जिस दिन तुमने कोई काम पूरा कर दिया उसी दिन तुम्हारे दिन पूरे हो जायेंगे।’
अधिकारी चाहे कर्मठ हो या कामचोर ,उसके काम करने का विशिष्ट तरीका होता है।
शायद इसीलिये साहब की सक्रियता वहीं तक रहती जहां तक काम मुश्किल दिखता। जहां लगा कि काम को पूरा होने अब कोई नहीं रोक सकता ,वहीं साहब निष्क्रिय हो जाते। फिर भी यदि कहीं काम पूरा होने की आशंका दिखती तो अपने स्तर से काम को ‘लंबित’सूची में डाल देते।साहब के साथी प्यार से उन्हें अधूरे कामों का पूरा बादशाह कहते थे। मातहतों में वे कटियागुरु के नाम से जाने जाते थे-जो लोगों को हमेशा अपने से उलाझाये रखते।
बहरहाल साहब को लगा कि काम तेजी से बढ़ना चाहिये।सो उन्होंने डांटते हुये कहा-
मि.मिश्रा,यह लेटर मैंने आपको’पर्सनली लास्ट वीक’ दिया था-फोटोकापी कराके। दफ्तर की फोटो कापी मशीन तीन महीने से खराब थी है तो अपने पैसे से फोटो कापी करा यी। पर अभी तक आपने इसे पढ़ातक नहीं । कमाल है। कोई’ सेंस आफ अरजेंसी’ ही नहीं।
मिश्राजी शायद स्वामी रामतीर्थजी के झांसे में आकर सीखी ध्यानवस्था में थे। साहब ने दोबारा झल्लाहट बढ़ाकर सवाल दोहराया तो तिवारीजी ,जो कि बगलवाले साथी द्वारा कोहनियाये जाने की साजिस के कारण ध्यानावस्था से जाग्रतावस्था में आ चुके थे, बोले- साहब ,आपका यह आरोप मिथ्या है कि मैंने यह पत्र पढ़ा नहीं। अंग्रेजी का हर पत्र मैं कम से कम तीन बार पढ़ता हूं- अच्छी तरह समझने के लिये। इसे भी तीन बार पढ़ा। हां,यह संभव है कि पत्र को हमारे तथा आपके समझने में समझने में अंतर हो।क्योंकि समय की स्वाभाविक कमी की वजह से आप शायद एक बार ही पढ़ पायें हों।
साहब बोले-अरे,हमारे तुम्हारे पढ़ने से क्या पत्र का मतलब बदल जायेगा?
मिश्राजी बोले-निश्चित हुजूरेआला! अब आप यह समझिये कि पत्र लिखने वाले तथा पढ़ने वालों(मेरे,आपके) के अंग्रेजी सीखने के कार्यकाल में कुछ तो अंतराल होगा। इस अंतराल में शब्दों के मायने बदल गये होंगे। जैसे कि हमारे जमाने में फ्रेंडशिप का मतलब मित्रता होता था। अब इसका मायने अवसरानुकूलता जैसा हो गया है।
मिश्राजी ने जब दूसरे उदाहरण देने के लिये सांस ली तो पाया कि साहब उनके बगलवाले से मुखातिब थे तथा किंचित रोष से पूछ रहे थे-
आपको तीन दिन पहले दिया था यह काम मैंने ।अभी तक किया नहीं। क्या मजाक बना रखा है!
वर्माजी ने सहमने का नाटक करते हुये कहा-साब,सच कह रहे हैं आप। पर तमाम कोशिश के बावजूद मैं इसे कर नहीं सका। काफी मुश्किल है। समझ के ही नहीं दे रहा कि कैसे होगा?साहब उखड़ गये- क्या खाक मुश्किल है! तीस साल हो गये कलम घिसते ,बाबूगिरी करते हुये आपको। इतना छोटा सा काम नहीं कर पाये-तीन दिन में। ये तो कोई अफसर भी कर सकता है।
वर्माजी साहब के रोष के झांसे में आये बिना बोले-हां साब, सच कह रहे हैं आप। अब अफसर सिर्फ बाबूगिरी करने लायक तो रह गये है। सारी अफसरी तो नेताओं को ‘आउटसोर्स ‘कर दी है।तभी तो काम और देश ठहरा हुआ है।
काम के बीच में देश को फंसा पाकर साहब को लगा कि जरूर कोई ऊंची बात है। जिसको तुरंत समझना जरूरी है। लिहाजा वे सोचने के लिये लपककर चिंतनकक्ष ,जो कि दुनिया में बाथरूम के नाम से जाना जाता है,अंतर्ध्यान हो गये। लोग गप्पाष्टक में जुट गये।
अब अफसर सिर्फ बाबूगिरी करने लायक तो रह गये है। सारी अफसरी तो नेताओं को ‘आउटसोर्स ‘कर दी है।तभी तो काम और देश ठहरा हुआ है।
-यार ये कटिया गुरु कब छोड़ेगे?
-देखते जाओ आगे-आगे होता है क्या?
-समय की इतनी बरबादी! तीन घंटे से मीटिंग कर रहे हैं। नतीजा सिफर।
-तो तुम क्या समझते हो मींटिंग नतीजे के लिये होती है। मीटिंग ,मीटिंग के लिये होती है।
-हमें समझ में नहीं आता कि तुम लोग घंटे बरबादी के लिये काहे रोते हो? क्या डाक्टर ने बताया है घड़ी बांधने को? हम तो पिछले तीस साल से कैलेंडर से काम कर रहे हैं। आजतक कभी घड़ी के मोहताज नहीं रहे।
बातें शायद और से चलतीं तब तक कमरे में इधर से साहब तथा उधर से मातहतों की नयी खेप घुसी।घुसते ही सबने बची कुर्सियों पर पिंडारियों की तरह कब्जा कर लिया। एक व्यक्ति एक पद के सिद्धान्त के अनुसार कमरे की सारी कुर्सियों पर लोगों का कब्जा हो गया। साहब ने कमरे के बाहर लगा लाल बल्ब जला दिया।कमरा रेड लाइट एरिया में तब्दील हो गया।
साहब दुबारा लोगों से मुखातिब हुये। बोलना शुरु करते ही दरवाजा ‘फ्लडगेट’ की तरह झटके से खुला। तथा पांडेजी हड़बड़ाते हुये अंदर घुसे।वे कुर्सियों को अनदेखा करके साहब के बगल में जाकर खड़े हो गये।कागज साहब के सामने फैलाते हुये बोले-साहब जरा इनमे दस्तखत कर दीजिये।
साहब- देखिये ,अभी मैं कुछ जरूरी मीटिंग कर रहा हूं। इसीलिये बाहर लाल बल्ब जला रखा है।
पांडे जी को लगा जैसे उनको किसी होमगार्ड ने चौराहे पर लाल बत्ती क्रास करते गाड़ी सहित पकड़ लिया हो तथा आखों ही आंखों में पूछ रहा हो -मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये!
वर्माजी बोले-हुजूरेआला, आप मीटिंग करते रहिये। हम कौन होते हैं रोकने वाले आपको। रही बात लालबत्ती को अनदेखा करने की तो इसे मेरी बेअदबी या गुस्ताखी न समझा जाये । हम तो हुजूर के दरबार में सर झुकाकर सजदा करने आते हैं देखते ही नहींकि ऊपर लाल-बल्ब जल रहा है या नीला।आप तो फिर भी कमरे में बल्ब जला के बैठते हैंकमरे में । पहले वाले साहब तो कमरे के बाहर बल्ब जला के तड़ी पार कर जाते थे। हम लोग दिन भर बल्ब लाल से हरा होने के इन्तजार में रहते । शाम को पता चलता कि साहब दूसरे शहर में बास के कमरे के बाहर बत्ती हरी होने का इंतजार कर रहे होते हैं। खैर आप दस्तखत कर दीजिये ।हम चलें
साहब बोले-अरे पहले पढ़ तो लेने दो।
वर्माजी बोले- अरे साहब,क्या फायदा ! आपकी समझ में कुछ आयेगा नहीं। मैं बीस साल से रिपोर्ट बना रहा हूं मुझे कुछ नहीं समझ आया आज तक तो आप क्या समझेंगे।आज आखिरी तारिख है रिपोर्ट भेजने की। अगर आज नहीं गयी तो सोमवार को रिमान्डर आ जायेगा।
साहब को हेडक्वार्टर ,रिमान्डर के अलावा कुछ समझ में नहीं आया। जब किसी अधिकारी को कुछ नहीं समझ आता तो वह दस्तखत कर देता है यह मानते हुये उन्होंने दस्तखत कर दिये।
साहब ने काम में मन लगाने की कोशिश की । एक काम पूरा होने के नजदीक पहुंच गया । यह देखकर साहब घबरा गये। तब तक फोन बजा। साहब ने हलो किया। उधर से फोन कट गया ।फिर भी साहब बोले,तुम खाना लगाओ मैं आ रहा हूं। मातहतों से बोले-सी इज वेटिंग फार लंच।
तिवारीजी कैंटीन की तरफ बढ़ते हुये सोच रहे हैं जब मेमसाहब घर में है तो वे कौन मैडम हैं जिनके आदेश पर उनकी पत्नी उनको कैंटीन के भरोसे छोड़कर किटी पार्टी में शामिल होने गयी हैं!
अधूरे कामों के बादशाह उर्फ कटिया गुरु की कार धुंआ उड़ाते हुये उनके सामने से गुजर गई।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “अधूरे कामों का बादशाह”

  1. प्रत्यक्षा
    बहुत अच्छे !क्या खाका खींचा है……..मज़ा आ गया…
    प्रत्यक्षा
  2. Atul
    एक हास्य पढा था शायद अभिव्यक्ति पर “भाबू”, उसकी याद ताजा हो गयी। वह और यह लेख दोनो हमारी कार्य संसकृति का जीवंत चित्रण हैं।
  3. syllable
    syllable
  4. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] कैसे छोड़ दिये जायें ? 2.अधूरे कामों का बादशाह 3.हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा [...]
  5. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] कैसे छोड़ दिये जायें ? 2.अधूरे कामों का बादशाह 3.हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा [...]

Monday, August 01, 2005

संस्कार कैसे छोड़ दिये जायें ?













मैं जब भी कुछ लिखने की सोचता हूं तोपिछली पोस्ट याद आती है।लगता है कि कुछ छूट गया जो कि लिखा जाना जरूरी है।इस पोस्ट पर कुछ साथियों के सुझाव भी हैं।स्वामीजी, पद्मजा तथा तरुणका मानना है कि लड़का-लड़की विवाह के बाद घरवालों से अलग रहें।अतुलका कहना है कि अन्तरराज्यीय,अन्तरजातीय संबंध बनाने से स्थितियां सुधर सकती हैं।आलोक का मानना है कि यह लड़के का फर्ज है कि वह मौके की नजाकत को समझे तथा लड़की को लड़की को विश्वास दिलाये कि वह उसका शुभचिंतक है।
लगता है कि कुछ छूट गया जो कि लिखा जाना जरूरी है।इस पोस्ट पर कुछ साथियों के सुझाव भी हैं।
मैं खुद क्या सोच रहा था कहना बड़ा मुश्किल है।जब हम दूर होते हैं समस्याओं के हल बड़े सरल दिखते हैं।पास से देखने पर तमाम पेंच दिखते हैं।समाजशास्त्री हीइसका सम्यक विवेचन कर सकते हैं।पर जो मुझे लगा वह लिखने का प्रयास करता हूं। शुरुआत पात्र-परिचय से:-
लड़का:- लड़का अपने मां-बाप का अकेला पुत्र है। पिता राज्य सरकार में राजपत्रित अधिकारी हैं।बेटे को भरपूर प्यार मिला है। शिक्षा-दीक्षा में बहुत अच्छा न रहा पाने के कारण नौकरी कुछ बहुत अच्छी नहीं मिली।स्वभाव से उग्र-गुस्से को मर्दों का आभूषण मानने वाला।मारपीट से परहेज नहीं।तुनकमिजाजी के कारण कोई स्थायी दोस्त नहीं। ढींग हांकने की आदत से मजबूर। कमाई बहुत अच्छी न होने के कारण आर्थिक रूप से पिता पर काफी कुछ निर्भर। पिता से अल्पसंवाद, डर को श्रवणकुमार का रूप देता है।
लड़की:- तीन बहनों तथा एक भाई में सबसे छोटी।पढ़ी-लिखी,खूबसूरत। शादी के पहले तीन बहनों में सबसे चुलबुली।पिता की बचपन में मृत्यु।दोनों बड़ी बहने तथा भइया का सुखी वैवाहिक जीवन।सीधी तथा डरपोक की हद तक विनम्र।
लड़के के पिता:- स्वभाव से गरम मिजाज के स्वामी। सामंतवादी सोच। लंबे अर्से से एक ही जगह पोस्टेड। दफ्तरी दांव-पेंच के चलते हर बात में शंका करने कीस्वाभाविक आदत। मर्दाने गुणों को धारण करने की आदतन ललक। वायदे के अनुसार काम करने की कोशिश।अधिकार भाव।विरोध सहन करने में कमजोर। अपनी सोचके अनुसार तर्क का जामा पहनाने के लिये सदैव तत्पर। दुनियावी अर्थ में सफल।
लड़के की मां:-आम मध्यम वर्गीय मां। पति की जायदतियों को स्वाभाविक मानकर सहन करने की शिक्षा देने वाली।लड़के के प्रति अतिशय प्रेम। लड़के को हमेशा साथ रखने की कोशिश।
लड़के की बहन:- पढ़ी-लिखी,तेज-तर्रार-स्मार्ट सी युवा कन्या। विवाह होना है। भाभी से बदतमीजी को वह सामान्य व्यवहार मानती है।उम्र में भाभी के लगभग बराबर। भइया से दो साल छोटी।
लड़की के घरवाले:- आम लड़की वालों की तरह। विनम्र, सशंकित,डरे-सहमे।पिता की मौत के बाद सारी जिम्मेदारियां सबसे बड़े लड़के ने पूरी कीं।मां लड़के पर निर्भर।दो दामाद भले- स्वभाव से खुशमिजाज।
जितना मैं समझ पाया वह यह कि सब लोग अपने हिसाब से सही आचरण कर रहे थे। लड़के का पालन-पोषण दुलार-प्यार में हुआ।उसके अवगुणों को बहादुरी से बखाना गया। एकबार लड़के की मां ने बखाना-हमारा लड़का अपने साथ के लड़कों को पीट देता था। बड़े-बड़े गुंडे लड़कों को इसने धूल चटा दी है।आमबात है कि जिस पक्ष की वाह-वाही होती है हम उसका अधिक मात्रा में अंगीकरण करते जाते हैं।इसी तरह के धूल चटाने वाली तमाम आदतों से जाने-अनजाने लड़का विभूषित होता गया।
शादी के बाद अपना कहने को बीबी मिली तो वह सारे गुण अपने बीबी पर प्रदर्शित करने लगा।प्रेम में गहराई लाने के लिये यदा-कदा मारपीट भी करने लगा। जब लड़की ने यह बात अपनी सास को बताई तो उनका कहना था -ये सब तो होता ही है। निभाना ही पड़ेगा।वे शायद भुक्त भोगी थीं। लड़का अपने बाप द्वारा स्थापित स्वर्णिम परम्परा का निर्वाह कर रहा था।
जबतक लड़का बिना किसी रोक-टोक के पीटता रहा तबतक ससुराल वालों का प्यार लड़की के प्रति बना रहा।कुछ दिन बाद रोज-रोज की हरकतों से तंग आकर लड़की अपने मायके चली आयी तब से ससुराल वालों का रुख बदल गया। लड़की में बुराइयां दिखने लगीं। लड़का कुछ दिन बेचैन रहा। रोज-रोज माफी मांगकर तथा आइंदा सही व्यवहार करने का वायदा करके पत्नी को वापस ले आया।अपनी हर बात घर में बताता था लिहाजा इस घटना को उसके घर वालों ने व्यक्तिगत अपमान के रूप में लिया। तथा हर तरह से लड़की वालों को गलत ठहराने के प्रयास शुरु कर दिये।वे उस मानसिकता में जीते हैं -मायके से लड़की की डोली उठती है,ससुराल से लड़की की अर्थी ही निकलती है।
लड़का अमरबेल की तरह पिता पर हर तरह से निर्भर था।वह परतंत्र भारत के पुलिसवालों की तरह देशवासियों पर मजबूरी के अत्याचार करता रहा।लड़की इतनाआतंकित होती गई कि विरोध करने की हिम्मत भी न जुटा पायी। वह ससुराल वालों के रसूख से इतना सहमी थी कि कोई भी कदम उठाने की सोचने के पहले सोचती कि अगर प्रयास असफल रहा तो मायके वाले परेशानी में पड़ जायेंगे। आज कानूनी हालत यह है कि यदि शादी के बाद लड़की ससुराल वालों के खिलाफ किसी भी प्रकार के उत्पीड़न की रिपोर्ट लिखाती है तो सारा परिवार (ससुराल) नाचा-नाचा फिरता है लेकिन उसको इसका अंदाजा नहीं था। जब हालात बहुत बिगड़ गये। लड़की का फोन सुना जाने लगा तब वह चिड़चिड़ी होती गई। जिन घर वालों से बात करने के लिये वह परेशान रहती थी उनका फोन आने पर कहती-आपलोग फोन किसलिये करते हैं? मत किया करें फोन। इसके बाद फिर जो हुआ वह बताया गया।
दुनिया में उस व्यक्ति से अभागा कोईनहीं होता जिसको ,निस्वार्थ भाव से, गलत बात पर टोंकने वाले साथी नहीं मिले होते
घटना के बाद लड़का अगले दिन लड़का मेरे पास आया । पूछा- मैं अपनी पत्नी को बिना कैसे रहूंगा? मैंने कहा-यह तो तुम्हे तय करना होगा। पर यह भी है कि कुछ न कुछ गड़बड़ तुम्हारी तरफ से जरूर है वर्ना तुम्हारी पत्नी तुम्हें इस तरह छोड़ के न जाती। मैंने सलाह भी दी कि उसको अपने पैरों पर खड़े होनेका प्रयास करना चाहिये। उसने माना कि घर में उसकी हालत कमजोर है ।वह यह भी सोच रहा था कि अब दोनों पक्ष केस दायर करेंगे। तथा बीबी से उसकी मुलाकात की संभावनायें कम होती जायेंगी। मैंने आश्वस्त किया कि लड़की वालों की तरफ से ऐसा कुछ नहीं होगा। पर वह डरा हुआ था कि कहीं उसके पिता अपने बचाव में कुछ न लिखा-पढ़ी न कर दें। अनुरोध भी किया कि मैं उसके पिता को समझाऊँ कि वे कुछ बिगाड़ वाला काम न करें। मैंने कहा -ठीक है। तब उसने यह भी कहा -मेरे पिताजी को पता न चले कि मैं आपके पास आया था। मैंने यह भी मान लिया। गया भी तथा समझाने का प्रयास भी किया।अभी तक दोनों पक्ष शान्त हैं।लड़का इधर-उधर से प्रयास करके पत्नी से बात करने की कोशिश करता रहता है।लड़की फिलहाल किसी भी तरह से वापस आने की नहीं सोचती।
जो कारण मुझे पता लगे उससे मेरी धारणाओं की पुष्टि हुई कि लड़का घरवालों पर कई तरह से निर्भर है।इसीलिये भी वह अपनी पत्नी के खिलाफ ऊलजलूल हरकतेंकरता रहता है। लड़के के कोई ऐसे दोस्त भी नहीं हैं जो उसे सही बात के लिये सलाह सकें तथा गलत बात पर टोंक सके।दुनिया में उस व्यक्ति से अभागा कोई नहीं होता जिसको ,निस्वार्थ भाव से, गलत बात पर टोंकने वाले साथी नहीं मिले होते।उसकी बहन भी भाई की कमजोर हालत के चलते भाभी से बदतमीजी करने को स्वाभाविक समझती है। लड़का कुछ दिन घर से बाहर रहा जिस शहर में लड़की का मायका है। इससे लड़के की मां को यह अहसास हुआ कि लड़का जाने-अनजाने हाथ से निकलता जा रहा है ।वह लड़का, जो आर्थिक रूप से बाप पर निर्भर हो,हाथ से निकल जाये यह कोई मां कैसे बरदास्त करसकती है? लिहाजा वे हर संभव प्रयास करती रहीं कि लड़का मजनूपने की हालत से निकले। यह मौका भी जल्द ही आ गया जब लड़के का तबादला दूसरे प्रदेश हो गया। इकलौते लड़के को दूसरे प्रदेश भेजने की बजाय उसको इस्तीफा दिलाकर घर बैठा दिया गया। फिर यही सब हुआ।
जिस देश के मर्यादा पुरुषोत्तम तक ने दुनिया के कहने पर अपनी पत्नी को त्याग दिया उस देश के, बाप पर डरने की हद तक निर्भर ,लड़के बीबी के साथ कैसे खड़े होने का हौसला जुटायेंगे ?
तमाम मत जो व्यक्त किये गये वे सब अलग-अलग हालात के लिये ठीकहो सकते हैं।पर मुझे जो लगता है वह यह है कि लड़की को अपने अधिकार की जानकारी तथा जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की सीख बेहद जरूरी है।आर्थिक आत्मनिर्भरता भी जरूरी है ।हालांकि भारत में आमतौर पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलायें भी पूरी जिंदगी पिटते हुये बिता देती हैं।मानसिक मजबूती तथा आत्मनिर्भरता ज्यादा जरूरी हैं।लड़के को भी अपनी समझ रखनी चाहिये तथा बीबी को गुलाम न समझ करसाथी समझने की तमीज आनी चाहिये।
पर समस्या यह है कि जिस देश के धर्मराज तक मां के कहने पर बीबी को बांटने के लिये तैयार हो गये तथा जिस देश के मर्यादा पुरुषोत्तम तक ने दुनिया के कहने पर अपनी पत्नी को त्याग दिया उस देश के, बाप पर डरने की हद तक निर्भर ,लड़के बीबी के साथ कैसे खड़े होने का हौसला जुटायेंगे ?वह भी तब जब बीबी को पीटने का संस्कार उन्हें विरासत में मिला है। संस्कारों को कैसे छोड़ दिया जाये?
लड़की की तारीफ मैं इस बात के लिये करूंगा कि मौका मिलने के बावजूद उस दिन पुलिस से तथा आज तक भी उसने ससुराल वालों पर झूठे इल्जाम नहीं लगाये। बहरहाल फिलहाल वह अपने मायके में है । दुबारा चहकना सीख रही है।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

10 responses to “संस्कार कैसे छोड़ दिये जायें ?”

  1. Jitu
    व्देखो भइया, इस समस्या का समाधान थोड़ा विचित्र है
    पहले पहल तो लड़के के बापजी को साधा जाये, और उन्हे दुनियादारी समझायी जाये, कुछ बुजुर्ग लोगो के द्वारा दहेज उत्पीड़न कानून की धाराये, बहुत ही विनम्र शब्दो मे समझायी जाये. साथ ही उनसे बहुत विनम्र अन्दाज मे बताया जाय कि सिर्फ एक रिपोर्ट करने पर पूरा का पूरा परिवार फ्री मे जेल मे हालीडेज मनायेगा, और इज्जत मे वृद्दि होगी सो अलग. तब शायद वे कुछ पिघलें.
    गलती लड़की वालों की भी है, निकम्मे लड़के से अपनी फूल जैसी बेटी ब्याहने के लिये किसी डाक्टर ने कहा था क्या? खैर अब क्या हो सकता है, एक बात तो है, लड़का लड़की को बहुत प्यार करता है, यही प्यार ही इस समस्या के समाधान का बेस बनेगा. लड़की वालों को चाहिये, लड़के को स्वावलम्बी बनाने मे कुछ सहयोग करें और धीरे धीरे समस्या को सुलझाने की कोशिश करें.
    फिर भी समस्या एक दिन मे नही सुलझने वाली, एक जरा सी गलती या जल्दबाजी मे दो दिलो बिछड़ जायेंगे. जो दुनिया का सबसे बड़ा जुर्म होगा.
  2. आलोक कुमार
    आत्मनिर्भरता नहीं होने से ही पङ्गा शुरू हुआ है। अभी भी समय है।
  3. Atul
    कूपमँडूकता
    “इकलौते लड़के को दूसरे प्रदेश भेजने की बजाय उसको इस्तीफा दिलाकर घर बैठा दिया “, यह अनजानी टेरीटरी में पैर जमाने से डरने की सोच हमारे क्षेत्र के लोगो को अपनी चौहद्दी से आगे नही जाने देती। घर के शेर बने रहते हैं और बने रहना चाहते हैं।
  4. आशीष
    सवाल मानसिकता का है। मैं पूछता हूं कि इस समाज में कितने लोगों की शादियां बिना दानदहेज और शोशे बाजी के बिना हुई हैं। जब किसी का लड़का है तो उसको दहेज अच्छा लगता है और जब लड़की की बात आती है तो वही चीज गंदी लगने लगती है। सवाल ये है कि क्या भारतीय लोग इस लेन देन से मुक्ति पा सकते हैं? दहेज धारा वगैरह से कुछ नहीं होने वाला। ऐसी धारायें बनती रहती हैं और लोग दहेज लेते रहते हैं। जैसे कि दलित उत्पीढ़न चलता रहता है जबकि सबको मालूम है कि ये कानूनी अपराध है।
    ये इस पर निर्भर है कि समाज क्या चाहता है?
  5. राजेश कुमार सिंह
    बहुत बढिया कहा , आशीष जी आपने।
    -राजेश

Wednesday, July 27, 2005

बारिश में भीगते हायकू का छाता

पानी बरसा,
छत टपक गई
अरे बाप रे!

मिट्टी थी जो,
कीचड़ बन गई,
अरे बाप रे!

सड़कें जाम,
स्कूल बंद हुये,
मज़ा आ गया!

पानी भी क्या,
हचक के बरसा
सब हैरान!

बाढ़ आ गई,
सब कुछ चौपट,
अब क्या होगा!

सांप-नेवला,
एक पेड़ के नीचे
वाह रे भैया!

बाजार बंद,
बोहनी के भी लाले
आगे क्या होगा!

सब्जी कड़की
सब सामान सुने
दाम उछालें!

चूल्हा सिसका,
कैसे आग जलेगी
लकड़ी गीली!

नेता जी बोले,
जहाज मंगा लेव
दौरा कर लें!

साहब बोला,
ये तो होता ही है,
छान पकौड़ी!

फाइल बोली,
चल भाग जा सूखे
मेरी बारी है!

लैला चहकी,
किधर हो मजनू
लव हो जाये!

ये जी मुस्काई,
आज जान सकी मैं,
बड़े वैसे हो!

टूटी छत है,
खुली व्यवस्था सी
कोई भी आये!

दरारें बोली,
मेरे पानी भइया
धीरे निकलो!

छाता चहका,
सुन मेरी छतरी
पूरी बिक जा!

गौमाता बोली,
राहें चौराहे सूने
चलों बैठ लें!

देहली बोली,
मेरी जान मुंबई
फिर फंस ली!

नदी बावरी,
तट को खा गयी
बड़ी बुरी है!

बूँद बैठकी
में हल ये निकला
काम शुरु हो!

जर्जर छज्जा,
घोटाले के बाद के
ग्राफ सा गिरा!

बीमारी बोली
सब जान निकालो
मौका बढिया!

मोर नाचता
बड़ा बेशर्म,बना
अमेरिका है!

बरखा रानी!
बहुत बरस लीं
अब तो बक्सो!

बदरी बोली
सुन मेरे बदरे
अब तो छोड़ो!

काफी हो गया
फुरसतिया बोले
पोस्ट कर दे!



15 responses to “बारिश में भीगते हायकू का छाता”

  1. इहाँ मालवा मे पानी नाहीं है
    त्राहि-त्राहि मची है
    अगले साल क्या पियेंगे ?
  2. बहुत अच्छे!
  3. झूमता रहा
    मना मयूर क्यों
    बरसात में
    काले बादल
    कितने मनमौजी
    बरसे कहाँ
  4. एक हायकू और……
    एकाकी बैठे
    पानी की टपटप
    सुनते हम…
  5. ये मेरी ओर से
    पानी मिलाने
    का काम बरखा का
    ग्वाले खुश।
    खुले गटर
    कमर भर पानी
    हड्डी संभालो।
    सिली माचिस
    फूल गये किवाड़
    वर्षा है आई।
  6. Achhe hain saare haiku lekin itne saare ek hi din kaiku
  7. [...] ��ी रहती हैं-चाहे वो फिर फुरसतिया के हायकू हों अनूप भार्गव की नज़्म या फिर सा [...]
  8. [...] इसके बाद मैंने अपने बारिश के मौसम के बारे में लिखे अपने हायकू सुनाना शुरू किया और सारे नहीं सुना पाये कि पब्लिक हक्का-बक्का से रह गये| हमने तुरंत मौके की नजाकत को देखते हुये हायकू-कतरन समेट लिया और कविता का पूरा थान फैला दिया| कविता पढ़ी:- आओ बैठे कुछ देर पास में, कुछ कह लें,सुन लें बात-बात में| [...]
  9. [...] पहले तो मेरा मन हुआ कि बरसात में कुछ हायकू की बौछार कर दी जाये- पानी बरसा, छत टपक गई अरे बाप रे! [...]
  10. [...] ये भी पढें: बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  11. anitakumar
    देहली बोली,
    मेरी जान मुंबई
    फिर फंस ली!
    :) मुंबई को फ़ंसने में भी मजा आता है, न फ़ंसे तो बच्चों को पानी में चलने का मजा, स्कूलों से अचानक मिली छुट्टी का मजा कैसे मिले। हम तो कहत है बरसो रे हाय बैरी बदरवा बरसो रे, जोर से बरसो, रोज बरसो, ताकि हम रोज पकौड़ी का मजा ले सके मसालेदार चाय के साथ्। बारिश में भीगने का अपना ही एक मजा है। जिस दिन बारिश होती है हम तो जानबूझ कर छाता भूल जाते हैं ।
  12. [...] 1. त्रिवेणी: एक विधा 2. गुलजार की कविता,त्रिवेणी 3.बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  13. [...] 1.तुलसी संगति साधु की 2.बदरा-बदरी के पिछउलेस 3.एक ब्लागर मीट रेलवे प्लेटफार्म पर 4.घर बिगाड़ा सालों ने 5.बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  14. very nice. keep on writting.