Wednesday, May 10, 2006

धूमिल की कवितायें

http://web.archive.org/web/20120723013807/http://hindini.com/fursatiya/archives/129

धूमिल की कवितायें

धूमिल
सुदामाप्रसाद पाण्डेय’धूमिल’ मेरे पसंदीदा कवि हैं। धूमिल की कविताओं के संकलन ‘संसद से सडक तक’ तथा ‘कलसुनना मुझे’ समकालीन कविता में उल्लेखनीय माने जाते हैं। धूमिल की कविताओं के अंश लोग अपने लेखों ,भाषणों को असरदार बनाने के लिये करते हैं।
धूमिल का जन्म वाराणसी के खेवली गांव में हुआ था। पढ़ने में मेधावी थे लेकिन शिक्षा दसवीं तक ही हुई। दसवीं के बाद आई टी आई वाराणसी से विद्युत प्राप्त करके इसी संस्थान में विद्युत अनुदेशक के रूप में कार्यरत रहे।
३८ वर्ष की अल्पायु में धूमिल की मष्तिष्क ज्वर से मृत्यु हो गयी।
प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह धूमिल के मित्रों में से थे । उन्होंने धूमिल पर बेहद आत्मीय लेख लिखे हैं।जिससे धूमिल की सोच का पता चलता है। धूमिल के बारे में एक लेख प्रसिद्ध लेखक श्रीलाल शुक्ल ने भी लिखा है जब धूमिल अपने इलाज के सिलसिले में लखनऊ थे। अशोक चक्रधर के संस्मरणात्मक लेख से उनके व्यक्तित्व का अंदाजा लगता है।
धूमिल की कुछ कवितायें अनुभूति में संकलित हैं। लेकिन जिन कविताओं के लिये धूमिल जाने जाते हैं-मोचीराम, राजकमलचौधरी के लिये,अकाल-दर्शन,प्रोढ़ शिक्षा तथा पटकथा, उनमें से कोई कविता यहां उपलब्ध नहीं है।
धूमिल की कुछ कविताओं के अंश यहां मैं दे रहा हैं। शायद आपको पसन्द आयें ।
कविता के बारे में धूमिल का विचार है:-
एक सही कविता
पहले
एक सार्थक वक्तव्य होती है।
जीवन में कविता की क्या अहमियत है-
कविता
भाष़ा में
आदमी होने की
तमीज है।
लेकिन आज के हालात में -
कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुये
आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।
तथा
कविता
शब्दों की अदालत में
अपराधियों के कटघरे में
खड़े एक निर्दोष आदमी का
हलफनामा है।
बुद्धजीवियों,कवियों के बारे में लिखते हुये वे सवाल करते हैं:-
आखिर मैं क्या करूँ
आप ही जवाब दो?
तितली के पंखों में
पटाखा बाँधकर भाषा के हलके में
कौन सा गुल खिला दूँ
जब ढेर सारे दोस्तों का गुस्सा
हाशिये पर चुटकुला बन रहा है
क्या मैं व्याकरण की नाक पर रूमाल बाँधकर
निष्ठा का तुक विष्ठा से मिला दँ?
आज के कठिन समय में प्यार के बारे में लिखते हुये धूमिल कहते हैं:-
एक सम्पूर्ण स्त्री होने के
पहले ही गर्भाधान की क्रिया से गुज़रते हुये
उसने जाना कि प्यार
घनी आबादीवाली बस्तियों में
मकान की तलाश है।
बेकारी, गरीबी, बढ़ती जनसंख्या के बारे में लिखते हुये कहते हैं धूमिल-
मैंने उसका हाथ पकड़ते हुये कहा-
‘बच्चे तो बेकारी के दिनों की बरकत हैं’
इससे वे भी सहमत हैं
जो हमारी हालत पर तरस खाकर,खाने के लिये
रसद देते हैं।
उनका कहना है कि बच्चे हमें
बसन्त बुनने में मदद देते हैं।
देश में एकता ,क्रान्ति के क्या मायने रह गये हैं:-
वे चुपचाप सुनते हैं
उनकी आँखों में विरक्ति है
पछतावा है
संकोच है
या क्या है कुछ पता नहीं चलता
वे इस कदर पस्त हैं-
कि तटस्थ हैं
और मैं सोचने लगता हूँ कि इस देश में
एकता युद्ध की और दया
अकाल की पूंजी है।
क्रान्ति -
यहाँ के असंग लोगों के लिये
किसी अबोध बच्चे के-
हाथों की जूजी है।
अपराधी तत्वों के मजे हैं आज की व्यवस्था में:-
….और जो चरित्रहीन है
उसकी रसोई में पकने वाला चावल
कितना महीन है।
सबसे प्रसिद्ध कविता पंक्तियां धूमिल ने अपनी लंबी कविता पटकथा में लिखीं हैं।इस कविता में आजादी के बाद से सत्तर के दशक तक का देश के हालात का बेबाक लेखा- जोखा है:-
मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?
अंत में धूमिल की लंबी कविता ,मोचीराम, पूरी की पूरी यहां दी जा रही है:-
राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे
क्षण-भर टटोला
और फिर
जैसे पतियाये हुये स्वर में
वह हँसते हुये बोला-
बाबूजी सच कहूँ-मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है
मेरे लिये,हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिये खड़ा है।
और असल बात तो यह है
कि वह चाहे जो है
जैसा है,जहाँ कहीं है
आजकल
कोई आदमी जूते की नाप से
बाहर नहीं है
फिर भी मुझे ख्याल है रहता है
कि पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच
कहीं न कहीं एक आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं,
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर
हथौड़े की तरह सहता है।
यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं
और आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’
बतलाते हैं
सबकी अपनी-अपनी शक्ल है
अपनी-अपनी शैली है
मसलन एक जूता है:
जूता क्या है-चकतियों की थैली है
इसे एक आदमी पहनता है
जिसे चेचक ने चुग लिया है
उस पर उम्मीद को तरह देती हुई हँसी है
जैसे ‘टेलीफ़ून ‘ के खम्भे पर
कोई पतंग फँसी है
और खड़खड़ा रही है।
‘बाबूजी! इस पर पैसा क्यों फूँकते हो?’
मैं कहना चाहता हूँ
मगर मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही है
मैं महसूस करता हूँ-भीतर से
एक आवाज़ आती है-’कैसे आदमी हो
अपनी जाति पर थूकते हो।’
आप यकीन करें,उस समय
मैं चकतियों की जगह आँखें टाँकता हूँ
और पेशे में पड़े हुये आदमी को
बड़ी मुश्किल से निबाहता हूँ।
एक जूता और है जिससे पैर को
‘नाँघकर’ एक आदमी निकलता है
सैर को
न वह अक्लमन्द है
न वक्त का पाबन्द है
उसकी आँखों में लालच है
हाथों में घड़ी है
उसे जाना कहीं नहीं है
मगर चेहरे पर
बड़ी हड़बड़ी है
वह कोई बनिया है
या बिसाती है
मगर रोब ऐसा कि हिटलर का नाती है
‘इशे बाँद्धो,उशे काट्टो,हियाँ ठोक्को,वहाँ पीट्टो
घिस्सा दो,अइशा चमकाओ,जूत्ते को ऐना बनाओ
…ओफ्फ़! बड़ी गर्मी है’
रुमाल से हवा करता है,
मौसम के नाम पर बिसूरता है
सड़क पर ‘आतियों-जातियों’ को
बानर की तरह घूरता है
गरज़ यह कि घण्टे भर खटवाता है
मगर नामा देते वक्त
साफ ‘नट’ जाता है
शरीफों को लूटते हो’ वह गुर्राता है
और कुछ सिक्के फेंककर
आगे बढ़ जाता है
अचानक चिंहुककर सड़क से उछलता है
और पटरी पर चढ़ जाता है
चोट जब पेशे पर पड़ती है
तो कहीं-न-कहीं एक चोर कील
दबी रह जाती है
जो मौका पाकर उभरती है
और अँगुली में गड़ती है।
मगर इसका मतलब यह नहीं है
कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी है
मुझे हर वक्त यह खयाल रहता है कि जूते
और पेशे के बीच
कहीं-न-कहीं एक अदद आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट
छाती पर
हथौड़े की तरह सहता है
और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िन्दा रहने के पीछे
अगर सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेंचकर या रण्डियों की
दलाली करके रोज़ी कमाने में
कोई फर्क नहीं है

और यही वह जगह है जहाँ हर आदमी
अपने पेशे से छूटकर
भीड़ का टमकता हुआ हिस्सा बन जाता है
सभी लोगों की तरह
भाष़ा उसे काटती है
मौसम सताता है
अब आप इस बसन्त को ही लो,
यह दिन को ताँत की तरह तानता है
पेड़ों पर लाल-लाल पत्तों के हजा़रों सुखतल्ले
धूप में, सीझने के लिये लटकाता है
सच कहता हूँ-उस समय
राँपी की मूठ को हाथ में सँभालना
मुश्किल हो जाता है
आँख कहीं जाती है
हाथ कहीं जाता है
मन किसी झुँझलाये हुये बच्चे-सा
काम पर आने से बार-बार इन्कार करता है
लगता है कि चमड़े की शराफ़त के पीछे
कोई जंगल है जो आदमी पर
पेड़ से वार करता है
और यह चौकने की नहीं,सोचने की बात है
मगर जो जिन्दगी को किताब से नापता है
जो असलियत और अनुभव के बीच
खून के किसी कमजा़त मौके पर कायर है
वह बड़ी आसानी से कह सकता है
कि यार! तू मोची नहीं ,शायर है
असल में वह एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी का
शिकार है
जो वह सोचता कि पेशा एक जाति है
और भाषा पर
आदमी का नहीं,किसी जाति का अधिकार है
जबकि असलियत है यह है कि आग
सबको जलाती है सच्चाई
सबसे होकर गुज़रती है
कुछ हैं जिन्हें शब्द मिल चुके हैं
कुछ हैं जो अक्षरों के आगे अन्धे हैं
वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं
और पेट की आग से डरते हैं
जबकि मैं जानता हूँ कि ‘इन्कार से भरी हुई एक चीख़’
और ‘एक समझदार चुप’
दोनों का मतलब एक है-
भविष्य गढ़ने में ,’चुप’ और ‘चीख’
अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से
अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं।
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31 responses to “धूमिल की कवितायें”

  1. अतुल
    अब चक्रधर जी ने बताया नही , आप ही बताईये कि यह थेथरई मलाई क्या होती है?
  2. e-shadow
    आदरणीय फुरसतिया जी, आपके साहित्यानुरागी मानस से ऐसे ही रत्न निकलते रहें।
  3. समीर लाल
    वाह भाई फ़ुरसतिया जी, बहुत बढिया जानकारी दी धूमिल जी के बारे मे.नाम सुना था, मगर इतने विस्तार से ज्ञात न था.ऎसे ही ज्ञानवर्धन करते रहें.
  4. अनूप भार्गव
    आप की पसन्द बहुत अच्छी है । धूमिल जी की कविताओं और उन से विस्तृत परिचय करवानें के लिये धन्यवाद।
  5. सागर चन्द नाहर
    धन्यवाद फ़ुरसतिया जी,
    स्व. धूमिल जी की कविता कि ये पंक्तियाँ बहुत कुछ जाती हैं।
    “और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िन्दा रहने के पीछे
    अगर सही तर्क नहीं है
    तो रामनामी बेंचकर या रण्डियों की
    दलाली करके रोज़ी कमाने में
    कोई फर्क नहीं है”
  6. प्रत्यक्षा
    आपके सौजन्य से इन कविताओं को पढा. धूमिल की और भी कवितायें पोस्ट करें
  7. hindiblogger
    अब तक धूमिल को नेताओं के झूठी ज़ुबान से ही जाना था. पहली बार ढंग का परिचय मिला है. धन्यवाद स्वीकार करें!
  8. ratna
    अति सुन्दर
  9. अभिनव
    जय हो, अनूप भाईसाहब,
    पढ़कर अच्छा लगा, धूमिल की रचनाएँ कभी धूमिल ना होने वाले भावों से बनीं हैं। वैसे अपने मुक्तिबोध जी भी कुछ कुछ इसी लीक पर लिखते थे और भी अनेक समाजवादी तेवर के कवि इन भावों पर अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं।
    आशा है कि आपके अन्य पसंदीदा कवियों के विषय में भी जनता जनार्दन को पढ़ने को मिलेगा। रमानाथ जी के गीत की कुछ पंक्तियां आपने पहले एक बार पोस्ट करीं थीं, “शहनाई सारी रात”, यदि वो गीत याद हो तो कृपया सुनाइएगा।
  10. mrinal
    once again, thanks for that exquisite verse called ‘mochiram’ from shri dhoomil. Read it repeatedly. To say that it is a good poem is to not understand the very thoughts conveyed in the poem. So, whatever it was, it was great. Few words etch so deeply. I like it. Thanks for introducing me to a great poet and a greater work.
  11. फ़ुरसतिया » थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता
    [...] mrinal on धूमिल की कवितायेंmrinal on अरे ! हम भँडौ़वा लिखते रहे ….अभिनव on शंकरजी बोले- तथास्तु अभिनव on धूमिल की कवितायेंratna on धूमिल की कवितायें [...]
  12. रजनीश मंगला
    फुरसतिया जी, बहुत खुशी है कि पुराना साहित्य अब नवीन टेक्नोलोजी में पुनर्जीवित हो रहा है।
  13. kali
    चिठ्ठा जगत के दिग्गज के द्वारा कविता जगत के दिग्गज का सन्समरण सुबह सुबह पढ कर मन प्रसन्न हो गया. फुरसत से लिखते रहो.
  14. rachana
    शुक्रिया अनूप जी, बढिया कविताएँ पढने को मिलीँ!
  15. Laxmi N. Gupta
    अनूप जी,
    धूमिल जी से परिचय कराने के लिये धन्यवाद। मुझे इनके बारे में कुछ भी नहीं मालूम था। ‘मोचीराम’बहुत प्रभावशाली और सशक्त रचना है।
  16. फुरसतिया » जूते का चरित्र साम्यवादी होता है
    [...] वैसे पुराने जमाने में ऐसा होता आया है जब आदमी की औकात के लिये जूता भी एक पैमाना माना गया। सुदामा के लिये दरबान ने कहा- पांय उपानहु की नहिं सामा! पैरों में जूतों की भी औकात नहीं है। धूमिल ने भी कहा है- यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं और आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’ बतलाते हैं सबकी अपनी-अपनी शक्ल है अपनी-अपनी शैली है [...]
  17. मर्यादित हिंदी के अमर्यादित संदर्भ «
    [...] क्या आप सब भाषा और मर्यादा के नाम पर धूमिल जैसे अद्भुत कहन वाले कवि की कविताओं को A सर्टिफिकेट देने की सोच रहे हैं, क्योंकि धूमिल के यहां तमाम अमर्यादित पंक्तियों को पढ़ कर तो आप सब के मर्यादित मन को ठेस पहुंचती होगी। मैं जानना चाहूंगा कि आप सब की क्या राय है धूमिल की निम्नलिखित पंक्तियों के बारे में- जिसकी पूंछ उठाया, उसको मादा पाया। या जांघ और जीभ के चालू भूगोल में। क्या आप सब इन पंक्तियों को मर्दानगी भरी और अमर्यादित कह कर खारिज़ करेंगे या रोक लगाना चाहेंगे। यह सारी बातें मैं अपने बचाव में नहीं कह रहा हूं। बल्कि भूले हुओं को याद दिला रहा हूं कि हिंदी साहित्य की वह परंपरा, जिस पर गरिमा और मर्यादा का मुलम्मा पोता जा रहा है, वह सिर्फ विनम्रता और तथाकथित शालीनता की सुंदर सुसज्ज वीथियों से होकर यहां तक नहीं पहुंची है। बल्कि कहन की कई कोटियां रही हैं कई परंपराएं। [...]
  18. Ritesh Tripathi
    आजकल थेथरई मलाई खाने वाले ही ज़्यादा हैं.सच को पचाना इतना तो मुश्किल नहीं है…खैर.
  19. Vinod Kumar Mishra
    Dhoomil ji ki kavita samaj ki sacchhaiyon par chot karti hai aur unhain ughad kar rkh deti hain. ShreeLal shukla ji ke shabdon mein feechkar patak deti hai.
    Saadhvad.
  20. Sourabh Chandramohan Gupta
    Priya Fursatiya ji,
    Dhhomil ki kavitaon me gajab ka khichav hai. Main MA-1st Hindi Literature ke liye mochiram kavita dhoond raha tha. Laga nahi tha ki itni prabhavshali hogi.
    Yeh panktiyan sidhe dil par dastak deti hain.
    “और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िन्दा रहने के पीछे
    अगर सही तर्क नहीं है
    तो रामनामी बेंचकर या रण्डियों की
    दलाली करके रोज़ी कमाने में
    कोई फर्क नहीं है ”
    Aise hi hum sabhi ka ghan vardhan karte rahiye.
    Dhanyavad.
  21. कौतुक
    धूमिल जी के बारे में बताने के लिए और उनकी रचना पढ़वाने के लिए हम आपके आभारी रहेंगे. नाम सुना था उनका पर इतने विस्तार से मालूम न था.
    उनके नाम पर उनकी रचनाओं के लिए गूगल किया तो यह लिंक मिला. शायद आपको मालूम हो.
    http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/dhoomil/index.htm
  22. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] में एक दिन 2.शंकरजी बोले- तथास्तु 3.धूमिल की कवितायें 4.थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता [...]
  23. om sapra
    shri anup shukla ji
    Namastey,
    dhumil is really a exemplary poet, with emotional touch as well a feeling for a gentle and common man, expressing his aspirations and trying to highlight sanctity of his dreams.
    congratulation for such a nice blog containin…g beautiful poems/articles etc.
    regards,
    -om sapra, delhhi-9
    9818180932
  24. om sapra
    shri anup shukla ji
    Namastey,
    dhumil was really a exemplary poet, with emotional touch as well a feeling for a gentle and common man, expressing his aspirations and trying to highlight sanctity of his dreams.
    congratulation for such a nice blog containin…g beautiful poems/articles etc.
    regards,
    -om sapra, delhhi-9
    9818180932
  25. shri kant pandey
    thank you for giving a nice information on DHOOMIL.
  26. Bhalchandra Dube
    I was never a student of literature. But this poem Mochiram is crude reality of our surrounding and suggest us for a meaningful life. Thanks for such a good blog.
  27. Rajeev shrivastva
    mai dhumil kvita ka bhut bda prsnsk hu.dhumil pd kr mujhejine ka ashi mtlb aur jivan ko kis prkar se behtr bnaya ja skta hai o miane dhumil kvita se sikha.
  28. sayyad mudassir
    ek aadmi roti belta hai 2ra khata 3ra aadmi n roti belta hain n roti khata hai vo kewal roti se khelta hai.ye panktiya man ko chhu lenewali hai.
  29. shri kant pandey
    बहुत ही अच्छा प्रयास है धूमिल को याद करने का.
    धन्यवाद
  30. धूप-छांव में बुने गये अनुबन्धों का क्या होगा : चिट्ठा चर्चा
    [...] बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुये लिखा था: एक सही कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य [...]

Tuesday, May 09, 2006

शंकरजी बोले- तथास्तु

http://web.archive.org/web/20120723013900/http://hindini.com/fursatiya/archives/128

शंकरजी बोले- तथास्तु

विष्णुजी बहुत देर तक नारद जी की राह देखते रहे। लेकिन नारदजी पुराने हिंदी ब्लागरों की तरह नजर से गायब थे। बहुत देर तक सोचते रहने के बाद जब कुछ भी समझ में नहीं आया तो उन्होंने टेलीफोन आपरेटर से कहा -शंकरजी से बात कराओ।
लाइन तुरंत मिल गयी। घंटी जा रही थी। शंकरजी के मोबाइल से रिंग टोन आ रही थी-
डमऽडमऽडमऽ निनाद ,डमऽडमऽडमऽ वयम,
चिकाड़ चारु ताण्डवम्‌,तनों-तुन: शिव:शिवम्‌।

रिंग टोन बजने के दौरान विष्णुजी भी सोचते रहे कि अपने मोबाइल में भी शंकरजी के मोबाइल की रिंगटोन की तरह विष्णुसहस्रनाम का रिंगटोन लोड करा लें। मुफ्त में प्रचार होता रहेगा।
विष्णुजी जानते थे कि फोन रिंगटोन पूरी होने के बाद ही उठेगा। इसलिये उन्होंने इस बीच चाय-पानी का आर्डर दे दिया ताकि आराम से शंकरजी से चाय पीते हुये बतिया सकें। बहुत दिन से दोनों लोगों की बातचीत नहीं हुयी थी।
फोन शंकरजी के किसी गण ने उठाया। विष्णुजी ने बताया -मैं विष्णु बोल रहा हूं। शंकरजी से बात कराओ।
गण बोला-भगवन,भगवन से तो अभी वार्ता सम्भव नहीं है।कुछ देर लगेगी। उनके आने पर मैं आपसे बात कराता हूं।
विष्णुजी ने सहज कौतूहल वस पूछा- क्यों? कहां गये हैं भोले भण्डारी? क्या कर रहे हैं?
इधर ही हैं। डमरू बजा रहे हैं।-गण ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया।
डमरू बजा रहे हैं! इतनी सड़ी गर्मी में! क्या हो गया?
अरे भगवन ,हम यहां कैलाश पर्वत से बोल रहे हैं। यहां तो मारे सर्दी के कांप रहे हैं हम। भगवान के डमरू से तेज आवाज तो सर्दी के मारे दांतों के किटकिटाने से आ रही है। सारा शरीर विदेश में अंग्रेजी न जानने वाले प्रवासी के आत्मविश्वास सा थरथरा रहा है।
अच्छा शंकरजी कितनी देर में खाली होंगे? डमरू बजाने के बाद क्या करेंगे?-विष्णुजी ने शंकरजी की दिनचर्या में दिलचस्पी दिखाई।
डमरू के बाद भगवान शंकर रोज थोड़ी देर त्रिशूल चलाने की पैक्टिस करते हैं। बस आने ही वाले हैं। किसी भी क्षण पधार सकते हैं।
गण अपनी बात खतम करता तब तक उधर से भगवान शंकर अपने शरीर पर भभूत लपेटे चेहरे पर तेज धारण किये आते दिखाई दिये।गण से दोनों आंखों से ही इशारा करके पूछा -किसका फोन है? गण ने रिसीवर पर हाथ रखकर बताया-क्षीरसागर से भगवान विष्णु का। यह कहते हुये उसने फोन भगवान शंकर को थमा दिया। भगवान शंकर विष्णुजी से बतियाने लगे।
हालचाल के बाद विष्णुजी ने पूछा- क्या बात है आजकल डमरू-त्रिशूल का अभ्यास चल रहा है। कहीं फिर प्रलय का प्रोग्राम है क्या? किसकी शामत आ रही है?
शामत-वामत तो खैर क्या! लेकिन मुझे लगता है कि डमरू,त्रिशूल,तीसरा नेत्र मेरे ‘कोर कम्पीटेंस’ के आइटम हैं। लिहाजा इन पर पकड़ बनी रहनी चाहिये। सो मैं रोज डमरू,त्रिशूल चलाने की नेट प्रैक्टिस करता हूँ।-शंकरजी ने बताया।
और प्रलय नेत्र! उसको भी रोज खोलने का अभ्यास करते हैं?-विष्णुजी ने पूछा।
अरे नहीं भगवन,आप भी मजाक करते हैं। तीसरा नेत्र खुलेगा ,आपके भक्त मरेंगे, तो आप भला मुझे जीने देंगे? उसे तो मैंने अब ‘कम्प्यूटराइज’ करवा लिया है। बिना ‘पासवर्ड’ के खुलता ही नहीं । ‘पासवर्ड’ भी मैंने याद नहीं किया है। अपने कैलाश बैंक के लाकर में रखा है। इससे यह फायदा होगा किसी के भड़काने पर मेरा नेत्र तुरंत नहीं खुलेगा। गुस्सा आयेगा भी तो जब तक बैंक जाकर लाकर खोलकर पासवर्ड देखूंगा तब तक सारा गुस्सा शांत हो जायेगा। क्योंकि यहां की बैंकें अभी भी भारत देश की दूसरी बैंकों की तरह हैं। यहां अगर सबेरे लाकर खुलवाने,पैसा निकलवाने जाओ तो शाम तक तो काम ही हो पाता है। इतनी देर में गुस्सा क्या लोग तक ठंडे हो जाते हैं। इससे तमाम निरपराध लोग बच जायेंगे।
अच्छा तो जो अभी पिछले दो तीन सालों में कुछ जगहों में प्रलय आई उसमें आपने अपने ‘पासवर्ड’ का प्रयोग करके काम किया था। मतलब वो सारी ‘हाईटेक’ प्रलय थीं?
उसका भी यार बड़ा किस्सा हैं। जब मैंने अपने प्रलयनेत्र का ‘कम्प्यूटराइजेशन’ कराया तो ऐसे कुछ ही दिनों में पता नहीं किस शातिर ‘हैकर’ ने मेरा ‘पासवर्ड’ पता नहीं कैसे चुरा लिया । तथा तमाम जगह प्रलय मचा दी। कहीं बम कहीं तूफान कहीं कुछ कहीं कुछ। सारी जगहों में हाहाकार मच गया। जब मुझे पता चला तो मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गयीं। ससुरा एक भूस्खलन और हो गया।
उस दिन से मैं बहुत सावधान हो गया। अपने पासवर्ड के किसी असफल आशिक के दिल की तरह कई टुकडे़ किये। किसी को इस लाकर में रखा किसी को उस लाकर में। अब हालत यह है कि अगर तुम सोचो कि हम आज प्रलय ला दें तो दिन बीत जायेगा पासवर्ड ही ‘असेम्बल’ करने में।
इसका मतलब आप अपनी ताकतों पर लगाम लगा रहे हैं। विष्णुजी ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुये पूछा।
कैसी ताकत विष्णुजी ! आप भी दुनिया के बहकावे में आ जाते हो। हमारे पास क्या ताकत है? अपने मन से हम किसी को मारना चाहे तो मार नहीं सकते। मारने के पहले उसके कर्मों की बैलेंस सीट देखो। अगर कहीं कोई गलती से मारा जाय तो जवाबदेही अलग से बनती है।
ताकत क्यों नहीं शंकरजी ! आप जिसकी तरफ नजर उठा के देख लो तो वो तो गया काम से।-विष्णुजी ने शंकर जी को पानी पर चढ़ाते हुये कहा।
अरे नहीं भाई,हम कोई किसी प्रजातंत्र के नेता तो हैं नहीं जो कि जो मन में आये करते रहें ।कोई टोंकने वाला नहीं। यहां तो हमेशा जी धुकुर-पुकर करता रहता है कि कहीं कोई बेगुनाह न मारा जाय।-शंकरजी संजीदगी से बोले।
विष्णुजी ने फिर कहना जारी रखा-आप किसी को मारो या न मारो लेकिन आपके पास जो संहार की ताकत है उसका जलवा तो है ही।
कैसा जलवा प्रभो लगता है आप भी भ्रम में हैं। हमारे एक भक्त कवि हैं -कविवर सुरेंद्र शर्मा। उन्होंने बताया कि असली ताकत तो देवियों के हाथ में हैं। धन-सम्पदा तो लक्ष्मीजी के पास है,विद्या-बुद्धि सरस्वतीजी के पास है,शक्ति की देवी दुर्गा हैं।पेटपूजा का विभाग अन्नपूर्णा के पास है। सारे ताकतवार काम तो देवियों के पास हैं। फिर हमारा किस बात का जलवा!
हमारी ‘सर्विस कंडीशन’ भी कितनी जटिल हैं। मुझे बैठा दिया पहाड़ पर। कपड़े के नाम पर मृगछाला। मारे ठंड के हाल खराब हैं। सवारी भी क्या गजब! बैल दिया है। पहाड़ से उतरो तो लड़खड़ाते हुये पाताल लोक में गिरो जाकर। हथियार बेशक हम प्रयोग न करें लेकिन ये भी क्या तुक कि त्रिशूल है हमारे पास। ऐके-४७ के जमाने में भला त्रिशूल क्या करेगा?
शंकरजी की आवाज का दर्द विष्णुजी महसूस कर रहे थे।उनके दर्द को कम करने की गरज से बोले- हां आप सही कहते हैं भगवन! हम लोगों की हालत सही में उतनी अच्छी नहीं है जितनी दिखती है। अब देखिये मुझे डाल दिया है यहां क्षीरसागर में। करवटें बदलते रहते हैं सारा दिन इधर -उधर। जरा सा झपकी लगी नहीं कि नींद टूट जाती है शेषनाग के हिलने-डुलने से। पर क्या करें निभाना है।पालनकर्ता जो हैं पूरे ब्रह्मांड के।
शंकरजी को लगा कि विष्णुजी अपनी हालत कहीं उनसे भी दयनीय न साबित कर लें सो बात टालने के लिये उन्होंने कहा- वहां तो बहुत गर्मी पड़ रही होगी। यहां आ जाइये न ! कुछ दिन मन बहल जायेगा।
विष्णुजी को अपना दुख प्रकट करने का मौका अनायास मिल गया। बोले- हां सोच तो मैं भी रहा था।लेकिन पेट्रोल का खर्चा सोचकर हिम्मत नहीं होती। वैसै भी गरुड़ का माडल इतना पुराना है कि ‘एवरेज’ बहुत बढ़ गया है। सोच रहा हूं कि सीएनजी किट लगवा लूं तब कहीं निकलूँ।
अपनी बात खतम करते -करते विष्णुजी को कुछ याद आया। बोले- शंकरजी इस बार की बातचीत में आपने अंग्रेजी के बहुत शब्द प्रयोग किये। ऐसा बदलाव किस कारण? आप तो अंग्रेजी के मामले में पाकिस्तानी क्रिकेटर इंजमाम थे। अंग्रेजी बोलने वाले लोग भी आपसे आपकी भाषा में बात करते थे। यह अच्छी बात है, लेकिन सोच में यह बदलाव कैसे हुआ।
शंकरजी बोले -एक तो हमें यह लगा कि भाषा तो पुल के समान होती है। दो दिलों को,देशों को, संस्कृतियों को जोड़ती है। फिर यह भी कि पुल जहां बनते हैं वहां विकास होता है। लिहाजा हमने धीरे-धीरे अंग्रेजी का पुल भी बनवा लिया। लेकिन यह उतना महत्वपूर्ण कारण नहीं जितना कि दूसरा कारण है।
विष्णुजी ने पूछा-क्या कारण है दूसरा?
शंकरजी ने बताना शुरू किया- आप तो जानते हैं कि हम भोले भंडारी के रूप में जाने जाते हैं। हमारे यहां जो कोई कुछ भी मांगता है वह मैं बिना सोचे दे देता हूं। कई बार तो हमारी ही जान के लाले पड़ जाते हैं क्योंकि हमने बिना सोचे वरदान दे दिये। भस्मासुर का किस्सा तो पता है ही आपको!
हां,उस किस्से को कौन नहीं जानता ! विष्णुजी पहलू बदलते हुये बोले।
हां तो ऐसा हुआ कि हमारे नंदीजी को भी चेला बनाने को शौक है। बनाये होंगे तमाम चेला । कुछ ज्यादा मुंह लगे हैं। इनका मोबाइल खराब था तो उनको ये हमारा मोबाइल नम्बर दे दिये हैं। एक दिन हमारे मोबाइल की घंटी बजी तो हमने ही उठाया।
उधर से आवाज आई- हू इज देयर आन द लाइन?
उस समय हम अंग्रेजी तो जानते नहीं थे। लेकिन आवाज मरी-मरी सी थी।हम समझे कि कोई साधारण सा वरदान मांग रहा है। हम उस दिनों बहुत उदार थे। चिंता नहीं करते थे कि कोई क्या मांग रहा है? सो हम बोले -तथास्तु।
फिर आवाज ने पूछा- इज ‘मि.नंडी’ देयर? कैन आई टाक टु हिम?
हमें लगा कि शायद ये नंदी से जानपहचान का सहारा लेकर और कुछ वरदान मांग रहा है-हम फिर बोल दिये- तथास्तु।
इस तरह विष्णुजी आपको बतायें कि करीब आधे घंटे हमसे वह आवाज अंगेजी में बतियाती रही और हर बार यह सोचकर कि वह आवाज कुछ वरदान मांग रही है- हम हर बार तथास्तु कहते रहे।
इस तरह आधे घंटे के बाद जब पता नहीं कैसे फोन कटा तो हमें लगा कि पता नहीं कितने वरदान मांग किये गये नंदी का नाम लेकर। हमें उस दिन की किसी बात का कोई मतलब याद नहीं इसीलिये यह भी डर लगता रहा कि कहीं कुछ आत्मघाती वरदान न दे दिया हो हमने अनजाने में।
उसी दिन हमने तय किया कि अब तो अंग्रेजी सीखनी ‘मस्ट ‘है।बिना इसके काम नहीं चलने वाला। इसीलिये हम आजकल रोज एक घंटा एक अमेरिकन एजेंसी से आनलाइन अंग्रेजी सीखते हैं। इसी कारण बातचीत में अंग्रेजी शब्द आ जाते हैं-’अननोइंगली।’
विष्णु ने पूछा – अंग्रेजी तो ठीक लेकिन अमेरिकन अंग्रेजी ही किसलिये?
शंकरजी ने बताया -कुछ खास बात नहीं लेकिन हमारे नंदी का एक भक्त है वो बताता रहता है कि अंग्रेजी सीखो तो अमेरिकन वर्ना न सीखो। उसने यह भी बताया कि अगर सही तरीके से बोली जाये तो जो आत्मविश्वास अमेरिकन अंगरेजी के बोलने में आता है वह और किसी अंग्रेजी में नहीं आता। उसने बहुत मेहनत करके बताया कि अगर अमेरिकन अंदाज अपनाया जाय तो उजड्डता भी आत्मविश्वास की तरह लगती है। इसीलिये हमने पुरानी सारी अंगरेजी भूल कर अब अमेरिकन अंगरेजी सीखना शुरू कर दिया।
अब तो धीरे-धीरे अंग्रेजी भाषा पर पकड़ भी बढ़ रही है। बोलने में भले कुछ अटकन होती है लेकिन समझने में कतई भटकन नहीं होती।
देर बहुत हो गयी थी। विष्णुजी को नारदजी आते दिखाई दिये। वे शंकरजी से बोले-अच्छा शंकरजी,बहुत अच्छा लगा बहुत दिन बाद बात करके आपसे।
शंकरजी बोले- हां,हमें भी बहुत अच्छा लगा। ऐसे ही कभी-कभी बात करते रहा करिये।
विष्णुजी विदा लेते-लेते शंकरजी के अंग्रेजी ज्ञान की बात का ध्यान करते हुये अंग्रेजी मोड में आ गये। बोले-ओके देन सी यू,टाक टु यू लेटर,टेक केयर,बाय-बाय।
शंकरजी तुरंत बोले- तथास्तु।
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19 responses to “शंकरजी बोले- तथास्तु”

  1. e-shadow
    बहुत अच्छा लगा। ऐसे ही कभी-कभी बात करते रहा करिये।
  2. आशीष
    तथास्तु !
  3. समीर लाल
    “डमरू,त्रिशूल,तीसरा नेत्र मेरे ‘कोर कम्पीटेंस’ के आइटम हैं। लिहाजा इन पर पकड़ बनी रहनी चाहिये। “..बहुत सही. मज़ा आ गया, अनूप जी.अब विष्णु जी स्टाईल: “ओके देन सी यू,टाक टु यू लेटर,टेक केयर,बाय-बाय।”
  4. विनय
    अब तो अंग्रेजी सीखनी ‘मस्ट‘ है।
    हा हा. हँसी से भरे इस लेख के बीच मुझे एक गंभीर मुद्दा झाँकता दिखाई दिया.
    अंग्रेज़ी में पढ़े-लिखे भारतीय वर्ग के एक बड़े हिस्से की स्थिति “आपके” शंकर जी से बहुत मिलती है. जहाँ उन्हें अपनी आम बातचीत में हर दूसरे शब्द को अंग्रेज़ी में बोलने में अभिमान का अनुभव होता है, वहीँ अगर कोई गंभीर चर्चा अंग्रेज़ी में करनी हो तो उनके पास ‘तथास्तु’ से ज़्यादा कहने को कुछ नहीं होता. आपके शंकर जी कम से कम एक भाषा तो ठीक बोल सकते हैं. पर अब जो वे अमेरिकन अंग्रेज़ी के चक्कर में पड़े हैं तो राम जाने.. :)
  5. अतुल
    एक ऐसे ही बच्चे की अम्मा अपने बच्चे से बार बार अँग्रेजी पोंकने को उद्यत थी। कभी मेज पर रखे सामान को पुचकारती कि बोलो बेटा एप्पल, माँगो स्वीट डिश , कोई आये तो कहो हेल्लो। आखिर में हमने ही उनके राजा बेटा को कोंचा “कि बेटा आस्क मम्मा वाट्स दैट थिंगी?” हमारी उँगली दालमोठ की प्लेत को इशारा कर रही थी, बच्चा प्रश्नसूचक निंगाहो से मम्मा को ताक रहा था और मम्मा … आप खुद कल्पना कर लो।
  6. जगदीश
    “अमेरिकन अंदाज अपनाया जाय तो उजड्डता भी आत्मविश्वास की तरह लगती है।”
    जॉर्ज बुश ओलंपिक पर भाषण देने खड़े हुए और बोलना शुरू किया ‘ओ…ओ…ओ…’ तो सचिव ने बताया महोदय ये तो ओलंपिक का निशान है आपका भाषण इसके नीचे से शुरू होता है।
  7. रवि
    अब इससे पहले कि फ़ुरसतिया जी का लिखा नया विष्णु पुराण सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे, बंधुओं इस पुराण को यहीं समाप्त करने का अनुरोध किया जाए.
    दरअसल, आपकी साइकिल का पंक्चर कहीं हो गया है और उसे ठीक कराकर सड़क पर लाना जरूरी है – पुराण तो और भी कई हैं, लिख लेंगे – यायावरी वृत्तांत तो आप का देखा सुना भोगा है वो तो आपको ही लिखना होगा.
    यात्रा वृत्तांत में बाधा पड़ गई है, उसे दूर कर जरा नियमितता लाएँ, यही निवेदन है
  8. आशीष
    हम रविजी के प्रस्ताव का अनुमोदन करता हूं !
  9. प्रत्यक्षा
    इंस्टालमेंट में आपके दोनों पुराण पढ गये. तैंतीस करोड देवी देवताओं के हिसाब से इतने कथा , कहानी, पुराण का स्कोप तो बनता ही है. लिखते रहिये :-) )
  10. अतुल
    हम प्रत्यक्षा जी के प्रस्ताव का अनुमोदन करते हैं।
  11. मनीष
    रुचिकर लगी आपकी ये कथा ! अच्छा व्यंग्य साधा है आपने आंग्ल भाषा पर !
  12. अभिनव
    भाईसाहब,
    अब पुस्तक भी प्रकाशित करा ही लीजिए। प्रिंट आउट ले लेकर थक गए हैं, आपका लेख हमारे पास टिकता ही नहीं है जो देखता है ले के चल देता है, चाहे हिंदी जानता हो या नहीं। यदि पुरानी पुस्तकें पहले से हैं तो कृपया प्रकाशक का पता दीजिए।
  13. फ़ुरसतिया » अजीब इत्तफाक है…
    [...] कुछ दिन पहले जब मैंने कुछ लेख लिखे तो रवि रतलामी जी ने फतवा जारी किया :- अब इससे पहले कि फ़ुरसतिया जी का लिखा नया विष्णु पुराण सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे, बंधुओं इस पुराण को यहीं समाप्त करने का अनुरोध किया जाए.दरअसल, आपकी साइकिल का पंक्चर कहीं हो गया है और उसे ठीक कराकर सड़क पर लाना जरूरी है – पुराण तो और भी कई हैं, लिख लेंगे – यायावरी वृत्तांत तो आप का देखा सुना भोगा है वो तो आपको ही लिखना होगा.यात्रा वृत्तांत में बाधा पड़ गई है, उसे दूर कर जरा नियमितता लाएँ, यही निवेदन है [...]
  14. फ़ुरसतिया » लागा साइकिलिया में धक्का,हम कलकत्ता गये
    [...] हम जब भी कोई लेख लिखकर देवताओं से जुड़ने का प्रयास करते हैं हमारे आशीष तथा रवि रतलामी हमें पकड़कर घसीट लेते हैं। स्पीड ब्रेकर बन कर खड़े हो जाते हैं कि पहले साइकिल चलाओ। हमें स्वर्ग से घसीटकर जमीन पर खड़ा कर देते हैं तथा साइकिल का हैंडिल पकड़ा देते हैं। यह कुछ ऐसा ही है कि एड्रस से बचाव के लिये प्रचार करते हुये से कोई कहे- अरे पहले टी.बी.,मलेरिया,खांसी,पीले-बुखार से निपट लो तब एड्स से निपटने के लिये उछल- कूद करना। [...]
  15. anitakumar
    हम प्रत्यक्षा जी से सहमत, साइकिल बाद में ठीक करवा लेना, पहले स्वर्ग लोक की कथाएं और सुना दिजीए। मस्त, मस्त हैं
  16. कविता वाचक्नवी
    अच्छा लगा। खूब रोचक व सार्थक है।
  17. शंकरजी अंग्रेजी सीख रहे हैं
    [...] [तीन साल पुरानी पोस्ट की रिठेल। जनता भी भोले भंडारी की तरह है। ] [...]
  18. ismat zaidi
    anoop ji vandana ke saujanya se pahli bar ap ko padhne ka saubhagya prapt hua ,maza aa gaya ,lekhan ke kshetra men shayad sab se mushkil kam hai vyangya likhna ,lekin aap ne samsaamyik vishyon ko itni sundarta aur sahajta se chhua hai ki man praphullit ho gaya .
    itna badhiiya vyangya padh kar parsai ji ki yaad aa gayi ,dhanyavad aap ka bhi aur vandana ka bhi .
  19. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] में एक दिन 2.शंकरजी बोले- तथास्तु 3.धूमिल की कवितायें 4.थेथरई मलाई तथा [...]

Sunday, May 07, 2006

छीरसागर में एक दिन

http://web.archive.org/web/20120820220149/http://hindini.com/fursatiya/archives/127

छीरसागर में एक दिन

विष्णुजी छीरसागर में शेषशैया पर ऊंघ रहे थे। शेषनाग भी जम्हुआई ले रहे थे। अचानक किसी लहर को ठिठोली सूझी वह झटके से शेषनाग के ऊपर लस्टम-पस्टम होते हुये विष्णुजी से जा लगी। विष्णुजी चिहुंककर जाग गये। लहरस्पर्श का सुख दबाते हुये गीले पीताम्बर के साथ गंभीरता का चोला लपेट लिया। शेषनाग ने मुस्तैदी के साथ कमांडो वाले अंदाज में फुफकार कर सारा पानी फिर क्षीरसागर में डाल दिया।
सब कुछ जैसे का तैसा हो गया। सिर्फ लहर के साथ विष्णु जी की नींद परिदृश्य से ओसामा बिन लादेन बन कर गायब हो गयी थी।
जैसा कि होता है सब कुछ सामान्य हो जाने के बाद खतरे का अलार्म घनघना उठा। तमाम अन्य लोगों के साथ नारदजी लदफद करते हुये घटना स्थल पर नमूदार हुये।
विष्णुजी ने सबको बताया कि लफड़ा क्या हुआ था। यह भी कि अब लहरें तक शरारत करने लगीं हैं। उनके चेहरे की गंभीरता से मुस्कान झांक रही थी। मुस्कान विशेषज्ञों का कहना था कि मुस्कान से शरारत खरोंच कर उसमें गरिमा का लेप लिया किया गया था।
बाद में मुझसे अपने तक ही सीमित रखने का वायदा लेकर नारदजी ने बताया कि वह लहर और कोई नहीं कृष्णावतार के समय की यमुना की लहर थी जो यमुना के साथ बहते हुये सागर में आ मिली। यहां क्षीरसागर में जब भी विष्णुजी को अकेला पाती है,उनको चौंकाने के लिये चुहुलबाजी कर देती है। विष्णुजी को भी मजा आता है । उनके कृष्णावतार के बचपने की याद आ जाती है। तमाम सारी शरारतें याद आ जातीं है तो मन तरोताजा हो जाता है।विष्णुजी के चेहरे पर अलौलिक,दिव्य, मोहिनी मुस्कान का भी यही राज है।
कुछ मुंह लगे छुटभैये देवताओं ने कहा -महाराज इस मामले की तो जांच होनी चाहिये। वो तो कहो कि आप जागते हुये सो रहे थे,शेषनाग भी साथ में थे वर्ना कोई कुछ भी आरोप लगा सकता था। कि विष्णुजी लहर के साथ रंगरेलियां मना रहे थे।
हां साहब ,ये सही कह रहे हैं। एक दूसरा नया देवता उवाचा। एक-एक स्टिंग आपरेशन से पल्ला छुड़ाने में,निपटाने में कभी-कभी पूरा साल निकल जाता है। पहले विपक्षी दलों की शरारत बताओ,फिर देश को कमजोर करने वाली ताकतों की साजिस बताओ फिर दुनिया भर की कसमें खाओ, पार्टी की मजबूती के इस्तीफा देने का नाटक करो,समर्थकों से शांति बनाये रखने की अपील करो, खुद को पार्टी का अनुशासित सेवक बताओ, देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा जताओ, जज को पटाओ , पत्रकारों से कुछ पक्ष में लिखवाओ ,काउंटर स्टिंग आपरेशन करवाओ। तब कहीं साला एक स्टिंग आपरेशन निपट पाता है। बड़ा बवाल है,कचूमर निकल जाता है। चुनाव का समय हुआ तो भइया गई भैंस पानी में । एक पंचवर्षीय योजना का सारा माल पंचतत्व में विलीन हो जाता है।
विष्णुजी ने इस तरह का ज्ञानोपदेश बहुत दिन बाद सुना था। देवता चेहरा भी नया था सो पलकों पर ‘आपकी तारीफ’! का इस्तहार चिपकाया।
देवता ने गला खखारकर अपना परिचय देना शुरू किया। उसने तमाम झूठ अपने बारे में बोलने का प्रयास किया लेकिन उसे आश्चर्य हुआ कि उसका झूठ बोलने वाला साफ्टवेयर काम ही नहीं कर रहा था।
उसने मोबाइल पर अपने पीए को फोन मिलाया तो मोबाइल से आवाज आ रही थी -क्षमा करें आप जिनसे सम्पर्क करना चाहते हैं उनसे फिलहाल बातचीत सम्भव नहीं है। नवदेवता ने एक बार फिर मोबाइल सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी को कोसने के लिये मन में समुचित भाव पैदा किये । इतने मेहनत मात्र से उसके माथे पर पसीना चुहचुहा आया।
विष्णुजी ने अपने ‘अन्तरयामी ‘वाले साफ्टवेयर से देवता की परेशानी भांप ली। बोले- आपके देश की संसद की तर्ज पर यहां मोबाइल जैमर लगे हुये हैं। इसके अलावा यहां एक नया साफ्टवेयर भी लगाया गया है जिसके कारण कोई भी यहां झूठ नहीं बोल सकता है। चूंकि अभी गारंटी पीरियड में है इसलिये यह साफ्टवेयर काम भी कर रहा है। इसीलिये तुम झूठ बोलने के प्रयास में सफल नहीं हो पा रहे हो । इसीलिये तुम्हारे माथे पर पसीना आ रहा है।
विष्णु जी ने बोलना जारी रखा- हम पसीने से परहेज करते हैं क्योंकि पसीना मेहनत का प्रचार करता है। यहां स्वर्ग में मेहनत मेहनत की भावना का प्रवेश वर्जित है लिहाजा पसीना यहां की आचार संहिता के खिलाफ है। तुम अभी नये हो इसलिये शायद यहां के तौर-तरीके मालूम नहीं होंगे आशा है जल्द ही सीख जाओगे। फिलहाल निस्संकोच अपना परिचय दो। हम सुनने के लिये बेताब हैं।
देवता धरती से अपने कर्मों के चढ़ावे और जुगाड़ की लिफ्ट पर चढ़कर नया-नया स्वर्ग में आया था। जितने सतकर्म उसने किये थे उससे ज्यादा उसने कुकर्म किये थे। लेकिन चित्रगुप्त के आफिस में तैतान बाबू को ले-देकर उसने अपने कुकर्मों की पासबुक गायब करा दी थी। उसका स्वर्गारोहण यह तरीका बहुत प्रचलित हो गया था तथा स्वर्ग की जनसंख्या प्रगति की दर भारत की जन संख्या प्रगति की दर को पीछे छोड़ रही थी।
देवता जानता था कि स्वर्ग भी भारत देश की संसद की तरह है जहां एक बार पहुंच जाने पर बड़े से बड़ा अपराधी तमाम आरोपों के बावजूद कार्यकाल पूरा होने के पहले निकाला नहीं जाता । अपनी स्वर्गारोहण एजेंसी की धाक का ध्यान करते हुये तथा विष्णुजी के निस्संकोच बोलने की बात का ध्यान करते हुये सारा सच बयान कर दिया।
यह घपला सुनते ही सारी सभा शर्म-शर्म चिल्लाने लगी। सारी बातें सुन लेने के बाद विष्णुजी ने अपने कानों पर हाथ रख लिये। पहले तो उनके मन में विचार आया कि चित्रगुप्त के आफिस के बाबू को तुरंत निलंबित कर दें लेकिन उजड्ड बाबू यूनियन के कारण वहां पर होने वाले संभावित बवाल को सोचते हुये उन्होंने अपना इरादा त्याग दिया।
सारी सभा की निगाहें विष्णुजी के चेहरे पर लगीं थीं। विष्णुजी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। फिर अचानक उन्हें याद आया कि जब समस्या का कोई हल समझ में नहीं आता तब वार्ता की जाती है। उन्होंने केबीसी वाले अमिताभ बच्चन वाले अंदाज में कहा -गांधी जी से बात कराओ।
आपरेटर ने फोन लगा के दे दिया। उधर टेप बज रहा था- मैडम तो चुनाव में बिजी हैं। चुनाव आचार संहिता के कारण फिलहाल किसी से बात करने में असमर्थ हैं।
विष्णुजी झल्लाये -ये फोन अमेरिका लगा दिये क्या जो टेप बज रहा है। गांधी जी अमेरिका में कब से रहने लगे? वो क्या कोई कम्प्यूटर इंजीनियर हैं?ये मैडम कौन हैं ? यार ये कहां लगा दिया फोन?
इसके बाद विष्णुजी किसी नये एनआरआई की तरह अपने ज्ञान का मुजाहिरा करने से बाज नहीं आये कि अमेरिका में लोग फोन पर अपना संदेश छोड़कर सप्ताहांत में इसके उसके घर फुट्टफैरी करते रहते हैं।
आपरेटर ने चेहरे पर काम भर की घबराहट तथा काम भर की विनम्रता का लेप लगाते हुये आत्मविश्वास की चासनी में लपेट कर कहा-महाराज आपने गांधीजी बात कराने को कहा। मैंने सोनिया गांधी जी से बात कराने के लिये फोन मिलाया। क्या आप प्रियंका गांधी से बात करना चाहते हैं या राहुल गांधी से? दोनों अभी तो चुनाव दौरे पर होंगे । किसी बैलगाड़ी में बैठे फोटो खिंचा रहे होंगे।उनका भी मोबाइल नहीं है मेरे पास।
विष्णुजी ने अपने चेहरे पर याहू का गुस्से वाला आइकन चिपकाया।बोले -यार कैसी बातें करते हो? गांधीजी को नहीं जानते ? गांधीजी मतलब महात्मा गांधी। मोहनदास करम गांधी-लंगोटी वाले,गुजराती। गुजरात जहां सड़क साफ करने के लिये मंदिर,मस्जिद तथा अब तो आदमी भी साफ कर दिये गये।अखबार नहीं पढ़ते क्या?
आपरेटर ने अपनी विनम्रता तहाकर अलग रख दी। झुंझलाते हुये बोला-महाराज, गांधीजी को कहां अब कोई पूछता है? आपका भी पुराना रिकार्ड साल में दो फोन का रहा है। २ अक्टूबर को तथा दूसरा ३० जनवरी को। इसके अलावा तो कभी बात नहीं होती। इसीलिये मैं समझ नहीं पाया। खैर, ये लीजिये गांधीजी के यहां घंटी जा रही हैं।
विष्णुजी ने कहा- ठीक है जरा वीडियो कान्फ्रेंसिंग भी कराओ। हम देखते हुये बात करना चाहते हैं महात्मा जी से। बहुत दिन से देखा नहीं महात्माजी को!
आपरेटर ने वीडियोकान्फ्रेंसिंग के लिये कनेक्शन किया तो पहले तो स्कीन पर लहरें दिखती रहीं। सारे बटन दबाने के बावजूद जब लहरों का अतिक्रमण नहीं हटा तो आपरेटर ने सिस्टम सप्लाई करने वाली कंपनी को कोसते हुये स्क्रीन को तीन-चार बार ठोंका तो एकाएक स्क्रीन पर तस्वीर सी नजर आने लगी।
बिना ठोंके साला आजकल कोई काम नहीं करता -आपरेटर ने तस्वीर की सेटिंग ठीक करते हुये कहा।
सेटिंग ठीक होने पर दिखाई दिया कि स्वर्ग तथा नरक के बीच ‘नो मैंन्स लैंड’ में हजारों -लाखों लोगों की भीड़ जमा थी। उधर एक संवाददाता माइक लिये बोल रहा था-
ये जो आप लाखों लोगों की भीड़ देख रहे हैं ये वे लोग हैं जिनके स्वर्ग या नर्क में जाने का निपटारा होना अभी बाकी है।
लगभग सभी लोगों ने अदालतों में स्टे ले रखा रखा है। गर्मी की छुट्टियों में सारे जज या तो हिलस्टेशनों में चले गये हैं या उनके दिमाग में हिलस्टेशन उग आये हैं लिहाजा सारी अदालतों में कार्यवाही भारत देश के विकास की तरह धीमी पड़ गयी है। अधिकतर लोगों की शिकायत है उनकों उनके कर्मों के मुताबिक जगह नहीं मिली। जितने लोग हैं उतनी तरह की शिकायतें हैं:-
-कुछ लोगों का कहना है कि धरती से जिस बोरे में उनकी आत्मा पैक करके आई थी वह रास्ते में फट गया लिहाजा उनके सत्कर्म खो गये।ट्रेवेल एजेंसी का ठेका चूंकि यमराज करते हैं लिहाजा वे यमराज को दोष देते हुये स्वर्ग में जगह मांग रहे हैं।
- कुछ लोग अपने हिसाब में गड़बड़ी की शिकायत कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके पाप बढ़ा-चढ़ा कर तथा पुण्य काट-छांट कर चढ़ाये गये हैं। अपनी बात के प्रमाण में वे अपने चार्टेड एकाउंटेट द्वारा बनाई तथा सत्यापित बैलेंस सीट दिखा रहे हैं।
-कुछ लोग स्वर्ग में मिलने वाली सुविधाओं से नाखुश हैं। वे कह रहे हैं कि इससे ज्यादा सुविधायें तो उन्हें धरती पर थीं। वे धरती पर वापस जाने के लिये परेशान हैं लेकिन यमराज के कार्यालय से उन्हें बताया गया कि उनकी सांसे पूरी हो चुकीं हैं । वे अब वापस नहीं भेजे जा सकते हैं।इनमें से कुछ लोगों ने धरती की तमाम गरीब आत्माओं से उनकी सांसे खरीद ली हैं तथा वापस धरती पर जाने के लिये यमराज दूत तथा दरबान को पटाने के लिये अपने दलालों को लगा दिया है।
-कुछ लोग गलती से यहां आ गये हैं। उनको वापस भेजने की व्यवस्था की जा रही है। लेकिन उनका कहना है कि अब वे वहां जाकर करेंगे क्या? उनके मुर्दे जलाये जा चुके हैं। वे रहेंगे कहां? कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि तमाम लोगों के शरीर में पचास तरह की आत्मायें रहती हैं। उनके शरीर रिटायरिंग रूम की तरह होंते हैं। ऐसे ही किसी शरीर में रह लेना कुछ दिन लेकिन आत्मायें अपना हक मांग रही हैं।
-कुछ आत्मायें कह रही हैं कि उनके साथ उनके पाप-पुण्य तो आ गये लेकिन उनका ग्रीन कार्ड नहीं आ पाया। वे कह रहे हैं कि मेहनत तथा अनुशासन से अर्जित किया गया उनका ग्रीनकार्ड उन्हें वापस किया जाय। ताकि अगले जन्म में जब पैदा होने की बारी आये तो किसी अमेरिकी कोख में जुगाड़ लगे। मेहनत से सीखी अंग्रेजी भी काम आ जायेगी। ऐसे लोगों को देवदूत देवभाषा में समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि यहां पाप-पुण्य के अलावा कोई करेंसी कोई जुगाड़ नहीं काम करता । लेकिन वे मान नहीं रहें हैं। तूफानी अंग्रेजी में आंखे गोलियाते,चौड़ियाते हुये कह रहे हैं- व्हाट आर यू टेलिंग? डालर एंड ग्रीनकार्ड आर नाट वैलीड हेयर! अगर कहीं बुश को पता चल गया तो एज यूजुअल ,ही विल अटैक हेयर,विदाउट थिंकिंग अबाउट एनीथिंग!
बहरहाल ये तो थीं कुछ झलकियां नो मैंस लैंड में लाखों की तारीख में धरना दे रहे लोगों की। अब आपको हम ले चलते हैं नो मैन्स लैंड के पास ही स्थित गांधी जी की कुटिया की तरफ। ये देखिये स्क्रीन पर आपको दिख रहे हैं महात्मा गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई जी। महात्मा गांधी कुटिया में कोने में लेटे हुये हैं। बाहर उनकी बकरी बंधी है। कस्तूरबा गांधी जी महात्माजी के तलुओं में मालिश कर रही हैं।
महात्मा गांधी जब आये थे तो उन्होंने अपना चरखा साथ में लाने के लिये बहुत प्रयास किये। लेकिन प्रयास में सफल नहीं हो पाये। लेकिन महात्मा गांधी ने हार नहीं मानी। अपने स्वदेशी तथा स्वाबलंबन को यहां स्थापित कर के दिखाया। यहां के तमाम खराब पड़े कंप्यूटरों की बोर्ड निकालकर चर्खे का बेस बनाया। उसके ऊपर कूड़े में पड़ी बेकार सीडी लगाकर चरखे के पहिये बनाये तथा बेकार पड़े कैसेट का टेप निकाल कर चरखे की डोर बना ली। चरखे के हैंडिलकी जगह पैन ड्राइव को लगा दिया। अब जगह -जगह गांधीजी के चरखे ,कम्प्यूटर के कबाड़ से बने चरखे, चल रहे हैं। स्वर्ग में अब लोग किसी पीसी के खराब होने पर कहते हैं-अपना पीसी चरखा बन गया है।
बहरहाल जब सारा दृश्य विष्णुजी के सामने साफ नजर आने लगा तो उन्होंने महादेव देसाई से कहा -महादेवजी आपको मेरी आवाज सुनाई दे रही है।
महादेव देसाई ने मौज लेते हुये मुस्कराकर जवाब दिया- हां महाराज सुनाई दे रही है। हमारे कान कोई न्याय व्यस्था तो हैं नहीं जो सुनाई न दे।
विष्णुजी फिलहाल मौज मे मूड में नहीं थे-बोले महात्माजी से बात कराइये। वे कैसे हैं। उनके क्या हालचाल हैं?
महादेवजी बोले- हाल तो उनके दिव्य हैं लेकिन वे फिलहाल बात नहीं कर सकते। मौनव्रत धारण किये हैं।
मौन व्रत की बात पर विष्णुजी का भुनभुनाने का मन किया लेकिन वीडियो कान्फ्रेंसिंग का ख्याल करके चेहरे पर चिंता लपेटते हुये बोले- किसलिये मौनव्रत धारण किया है महात्मा जी ने? किस बात से दुखी हैं? क्या फिर किसी ने उनका दिल दुखाया है?
महादेव देसाई जी ने बताया नहीं बात कोई खास नहीं है। महात्माजी ने नये जमाने के लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिये अपना ब्लाग शुरू किया है। अभी तक यहां किसी ने उसका नोटिस नहीं लिया। न स्वागत किया न ही उनके विचारों की तारीफ की। पहले तो इस बात से दुखी थे। एक पोस्ट इस दुख पर भी लिखी तब भी किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की। इसपर भी महात्मा जी को कोई तकलीफ नहीं हुई। उनको तो इस बात का अभ्यास है कि उनके कट्टर अनुयायी होने का ढोल पीटने वाले तक उनकी बात पर आचरण न करें।
अच्छा ! मैंने भी कुछ सुना है ब्लाग के बारे में। नारद से पूछा भी था कि कैसे लिखते हैं ब्लाग लेकिन नारद ने आज तक बताया नहीं। पूरा कोकाकोला का फार्मूला बना रखा है ब्लाग लेखन विद्या को। वैसे महात्मा जी ने लिखा क्या था? कोई कविता-सविता लिखी थी क्या? हमारे तमाम भक्त अक्सर शिकायत करते हैं कि फलाने की कविता पढ़कर सरदर्द हो गया। ढिमाके ने कुछ ऐसा लिखा कि समझ में ही नहीं आया। इसी तरह की कोई चीज तो नहीं लिखी उन्होंने?
नहीं साहब, महात्माजी ये सब खुराफात नहीं करते। आदतें बदली नहीं हैं अभी भी। हम लोग बहुत समझाते हैं महात्माजी अब तो अपनी आदतें बदल डालिये। बकरी बेंच के दीजिये यहां कामधेनु है ही जो मुफ्त में सबकी जरूरतों को पूरा करती है। लेकिन वो कहते हैं महादेव तुम भ्रम में हो कि कामधेनु मुफ्त में सबकी जरूरतें पूरा करती है। ये बेचारी भी तो किसी की हुक्म की गुलाम है। कामधेनु मुफ्त दूध के बदले तुमसे तुम्हारे श्रम करने की आदत ले लेती है। जब तुम पूरी तरह इस पर आश्रित हो जाओगे तब तुम्हें यह , अपने आका के इशारे पर,किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की तरह छोड़कर किसी दूसरी जगह चली जायेगी।
अच्छा तो आज क्या हुआ जिसके कारण महात्माजी ने मौनव्रत धारण किया?विष्णुजी अब कुछ बोर तथा कुछ अधीर होने लगे थे। स्कीन पर साफ दिख रहा था कि उनका मेकअप अब पुराना हो गया था तथा चेहरे पर पावडर के नीचे की सिलवटें चुगली करने लगीं थीं।
आप हंसेगे सुनकर लेकिन यह सच है कि अब आज महात्माजी ने ब्लाग खोला तो खुल ही नहीं रहा था। बड़ी मुश्किल से खुलता दिखा लेकिन बार-बार उसमें HTML-404 Error दिखा के बंद हो जा रहा है।इससे महात्माजी को लग रहा है कि कोई उनके काम को ४२० का काम बताना चाहता है लेकिन हिंदी ठीक से जानने के कारण ४२० को ४०४ लिख रहा है।
महात्मा जी दर्द दोहरा है । एक तो लोग उनके प्रयासों को धोखाधड़ी बताने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरे लोग हिंदी की गिनती भी ठीक से नहीं जानते जिससे कि मुहावरे का सटीक प्रयोग नहीं हो पा रहा है। इसीलिये उन्होंने दुखी होकर मौनव्रत धारण कर लिया।
विष्णुजी आगे कुछ पूछते तब तक सम्पर्क टूट गया। देश की आम जनता की तरह तब तक सभा का ध्यान नये देवता किये घपले से हटकर नये चोंचले ,ब्लागिंग पर लग गया था।विष्णुजी सफलतापूर्वक अपने जन भावना को अपने अनुकूल रुख देने में सफल हुये थे। इसी कौशल के कारण वे युगों-युगों से सारे ब्रम्हांड के पालनकर्ता बने हुये थे।
बहरहाल,ब्लागिंग के बारे में जानने के लिये वे एक बार फिर उस्सुक हुये तथा इधर-उधर देखने पर जब नारदजी नहीं दिखे तो अर्दली से अकबरी अंदाज़ में बोले- नारद को बुलाया जाय।माबदौलत नारद के गुफ्तगू करना चाहते हैं। उनको यहां आने के लिये कहा जाये।
अर्दली कुछ देर तक इधर-उधर टहलकर वापस आया तथा फर्सी सलाम बजाता हुआ बोला- जहांपनाह ,हजरज नारद अपने किसी डुप्लीकेट से हिसाब बराबर करने भारत देश की ओर जाते पाये गये हैं।
विष्णुजी ने कुछ देर सोचा कि अब क्या करें लेकिन चेहरे पर तमाम बल डालने के बावजूद वे तय नहीं कर पाये कि क्या किया जाय। नारद के बिना उनकी हालत बिना विभाग के मंत्री तथा बिना चमचे के नेता की तरह हो रही थी।
विष्णुजी ने नारदजी के मोबाइल पर एक बार फिर से सम्पर्क करने का प्रयास किया। हर बार की तरह एक बार फिर उन्हें सुनाई- क्षमा करें जिनसे आप वार्ता करना चाह रहे हैं उनसे फिलहाल सम्पर्क नहीं हो पा रहा है।विष्णुजी पिछले आधे घंटे में सौ बार क्षमा कर चुके थे। उनके धैर्य का बांध तथा कृष्णावतार के समय में जरासंध को निन्यानबे बार क्षमा रिकार्ड भंग हो चुका था। चुके हुये धैर्य,नये रिकार्ड की ललक तथा नारदजी के सम्पर्क न हो पाने के मिलेजुले गठबंधन ने उनको क्रोध के मंच पर विराजमान करा दिया ।
इसके बाद जो हुआ वह ऐतिहासिक था,धार्मिक था,सामाजिक था,आर्थिक भी कम नहीं था।
क्रोध के मंच पर विराजमान विष्णुजी ने गुस्से में नथुने फड़काते हुये मोबाइल जमीन पर पटक दिया।
जब वातानुकूलित आश्रमों में रहने वाले बाबाओं को यह घटना पता चली तो उन्होंने बताया विष्णुजी ने जो चीज पटकी थी वह शेषनाग का फन था उसी से सुनामी का तूफान आया। समाज में बढ़ते पाप से रुष्ट होकर भगवान ने यह चेतावनी दी थी। सो हे नराधमों मायामोह त्याग कर प्रभुचरणों में मन लगाओ।
बाबाओं की घटना के सहारे मोबाइल पटकने की बात तक पहुंची मोबाइल कंपनियों तक जब यह बात पहुंची तो पागलों की तरह विष्णु जी को इंटरव्यू के लिये खोजने लगीं। हर कंपनी ने अपने सबसे होनहार ,बुद्धिमान,आकर्षक ,युवा को इसके लिये लगा दिया। पागलपन की दौड़ में जब पता चला कि विष्णुजी मादा नहीं पुरुष हैं तो साथ में आकर्षक युवा के साथ खूबसूरत युवती को भी लगा दिया। कुछ समझदार लोगों ने बताया भी कि जब युवती जा ही रही है तो युवा की क्या जरूरत ? क्या फायदा समय,पैसा बरबाद करने का? लेकिन उन्हें यह कहकर चुप करा दिया गया -जाने दो दोनों को।पता नहीं कब किसकी क्या जरूरत पड़ जाय।
हर कंपनी का एकमात्र उद्देश्य विष्णुजी से यह कहलाना था कि जो मोबाइल गुस्से में उन्होंने फेंका वह प्रतिद्वंदी कंपनी का था तथा जब से इस कंपनी का मोबाइल लिया है तबसे उनको कोई तकलीफ नहीं हुई है।
जब किसी भी कंपनी का प्रतिनिधि विष्णुजी से मिल नहीं पाया तो कारण खोजने पर पता चला कि वो तो स्वर्ग में रहते हैं। यदाकदा पृथ्वी पर आते जाते हैं। वो भी न जाने किस भेष में।स्वर्ग में तो केवल आत्मा जा सकती है। सशरीर संवाददाता नहीं जा सकता है।
तबसे हर मंदिर में सारी मोबाइल कंपनियां निगाह रखे हुये हैं। कुछ ने पुजारियों की चोटियों पर अपने एंटीना टावर लगा दिये हैं।इससे एक पंथ दो काज हो रहा है। विष्णुजी पर निगाह भी रखी जा रही है तथा ग्राहकों को सेवा भी मिल रही है। व्यर्थ की टावरों की तोड़फोड़ से भी बचाव हो रहा हैं। सुप्रीमकोर्ट का स्टे है न देवस्थानों पर तोड़फोड़ के खिलाफ।
स्वर्ग में केवल आत्मा जा सकती है यह जान लेने के बाद कुछ कंपनियों के किसी भी कीमत परिणाम प्राप्त करने के विचार से ओतप्रोत अधिकारी गंभीरता पूर्वक विचार कर रहे हैं कि किसी संवाददाता के शरीर से रूह निकाल कर स्वर्गलोक भेजा जाये। रूह वहां जाकर विष्णुजी का इंटरव्यू लेकर उसकी आडियो फाइल बनाकर भेज दे।
वे यह भी विचार बना रहे हैं कि अगर वह संवाददाता सकुशल किसी तरह वापस आ गया तो उसे एकमुश्त कई प्रमोशन दे देंगे। अगर खुदा न खास्ता वह नहीं लौट पाया तो उसकी जिंदगी भर की तनख्वाह का जितना गुना वो चाहेगा वह जिसे जायेगा उसके खाते में डाल दिया जायेगा-उसकी आत्मा की स्वर्ग यात्रा शुरू होने के तुरंत बाद।
इस बारे में समाचार पत्रों में आकर्षक विज्ञापन देने के लिये बेहतरीन प्रबंध संस्थानों की ,विज्ञापन एजेंसियों की सेवायें भी लेने के बारे में विचार लिया जा रहा है।
जब मैं यह बातें अपने कुछ दोस्तों को बता रहा था तो वे हम पर हंस रहे थे- क्या बेवकूफों की तरह बातें करते हो ? ऐसा भी कहीं होता है? कौन कंपनी भला करेगी ऐसी बेवकूफी की हरकतें!
हमारे दूसरे ज्ञानी दोस्तों ने मेरी बात तथ्यों के आधार पर खारिज कर दी। उनका कहना है कि मेरा देवताओं के बारे में ज्ञान अधकचरा है। संहार का काम तो शंकर जी का है।विष्णुजी तो पालनकर्ता हैं। वे कैसे सुनामी जैसा संहारक काम कर सकते हैं!
इस ज्ञान के आलोक में तय हो गया मेरी बातें बेवकूफी की हैं। यह भी कि मेरी अकल घास चरने चली गयी है।
मुझे भी अपनी बातें बेवकूफी की लगतीं थीं तथा मैं भी अपने दोस्तों की हंसी में अपना ठहाका मिला लेता था।
ऐसा अक्सर होता था। हमारी बेवकूफियां हंसने का कारण बनी रहतीं थीं।
लेकिन पता नहीं क्यों अब दोस्तों ने मेरी बात पर हंसना बंद कर दिया है । वे अब मेरी बेवकूफी की बात पर चुप्पी साध लेते हैं।
मैंने जब कारण पता करना चाहा तो किसी ने बताया नहीं लेकिन मुझे लगता है कि वे समाचार पत्रों के आवश्यकता है वाले विज्ञापन एक दूसरे से छिपाकर पढ़ने लगे हैं।इन्ही विज्ञापनों में से एक में ब्रह्मांड के किसी भी कोने में जाकर खबर जुटाने में सक्षम ,आकर्षक संवाददाताओं की आवश्यकता का विज्ञापन छपा है।
इससे मेरा दिल बैठने लगता है।
पता नहीं आपको कैसा लगता है?

20 responses to “छीरसागर में एक दिन”

  1. नितिन
    अनूपजी,
    मज़ा आ गया!!
    वैसे ये मैनें समीर जी के कहे अनुसार चेप के रखा था!!
    समीर जी ने तो कहा था बिना पढे ये (क्या लिखते हैं, हंसते हंसते बुरा हाल हो गया. अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा) चिपका सकते है, लेकिन पढ के चिपकाने का मज़ा ही कुछ और!!
  2. सुनील
    वत्स, इस घोर पाप ले लिए तुम्हें सजा मिलेगी. तुम्हारी यह हिम्मत कि हमारे देवलोक में ही स्टिंग आपरेशन करके तुम हमारी अँदरूनी बातों का यूँ ही जनता के सामने रखो ? तुमने शायद यह सोचा कि इतनी सी बात के लिए प्रभु स्वर्गलोक से यहाँ आने से रहे ? शायद तुम्हें गलतफहमी हो गयी कि तुम्हारा ब्लाग भी महात्मा जी का ब्लाग है ? और तो और, तुमने हमारे बारे में यह युवक युवती की क्या बात निकाली जिससे लक्ष्मी को शक हो गया है. वह तो हमने केवल सागरमँथन के दौरान असुरों से अमृत चुराने के लिए नारी वेष धारण किया था. खैर तुम्हे सफाई देने से क्या फायदा, तुम इसे हमारा कन्फेशन बना कर छाप दोगो.
    एक तो वैसे ही लोगों में श्रद्धा कम हो रही है उस पर तुम यह ऊलजलूल लिखोगे तो इस जगत का क्या होगा, यह नहीं सोचा तुमने ? जाओ, हमने भी अपना रामबाण वायरस छोड़ दिया है, अब करके दिखाओ ब्लागिंग तो मानूँगा.
  3. समीर लाल
    इस लेख को पढने का सफ़र काफ़ी लम्बा रहा.बीच बीच मे लगने लगा परसाई जी का समग्र पढ रहे हैं, फ़िर नींद से जागे, अरे, अपने फ़ुरसतिया जी लिखे हैं यह तो.कई सारे लेख एक साथ. परसाई जी को पढने मे तो टिप्पणी लिखनी नही होती, मगर यहाँ तो उसका भी पंगा है, सो ध्यान से पढते रहे बिना लाईनें कुदे.काफ़ी रोचक और उससे भी ज्यादा, वृहद लिखें है, मजा आया पढ कर.अब फिर से इन्तजार.
  4. विनय
    लंबा है पर अच्छा है। एक साथ कईयों को लपेटे में लिया है।
    अमरीकी उद्दंडता (arrogance) पर यह तंज मुझे खास करारा लगा:
    “तूफानी अंग्रेजी में आंखे गोलियाते,चौड़ियाते हुये कह रहे हैं- व्हाट आर यू टेलिंग? डालर एंड ग्रीनकार्ड आर नाट वैलीड हेयर!”
  5. ई-स्वामी॔
    १. “तूफानी अंग्रेजी में आंखे गोलियाते,चौड़ियाते हुये कह रहे हैं- व्हाट आर यू टेलिंग? डालर एंड ग्रीनकार्ड आर नाट वैलीड हेयर!”
    मूलभूत रूप से गलत है! अमरीका में हम बोलते हैं “सी यू इन हैल्ल” – हमें मालूम है हम कहां जा रहे हैं और जहां जाएंगे हैल्ल बना देंगे – इसे बोलते हैं इमानदारी अत: स्वर्ग में कोई अमरीकी पहूंचेगा नही डायलाग मारने का सवाल ही पैदा नही होता. इसका दूसरा मतलब ये है की अमरीकी कहता है “भाड में जाओ, हम खुश हैं” इसे बोलते हैं उद्दंडता ही ही!
    २. और बाकी ये डायलाग जब भी मारा जाता है वो उद्दंडता नहीं आत्मविश्वास है! “मेरे टेक्स के डालर का सरकार ने क्या किया? ये स्थान कैसे छूट गया अमरीकी पकड से!” वाला आत्मविश्वास जो भारत वालों को उनकी सरकारें कभी नही दे सकतीं!
    ३. उपरोक्त दोनो जानकारियां दे देने के बाद किसका अमरीका आने का चाव कम हो लेगा देखता हूं – बाकी जहां हम उद्दंड लोगों के बीच पहूंचने को क्यों मरा जा रहा है?
  6. नारद मुनि
    नारायण! नारायण!
    वत्स फुरसतिया,
    मै देख रहा हूँ, तुम्हारा उद्दंडता दिन प्रति दिन बढती जा रही है, प्रभु से भी मेरी बात हुई थी,वो बहुत नाराज थे,बाकी देवतागण तो कह रहे थे कि फुरसतिया का स्वर्ग का वीजा ही कैन्सिल करवा दो, रोजाना विपक्षी दलों की तरह स्टिंग आपरेशन चलाता रहता है। लेकिन विष्णु जी ने धेर्यपूर्वक तुम्हारा लेख पढा,अपनी आलोचना को सुना, उन्होने एक आफ़र भेजा है।तुम्हारे लिए विष्णु जी का एक मैसेज है: “काहे भीतर की बात बाहर लाते हो, आओ मान्डवली कर लें।”
    उधर महात्मा जी बहुत उदास है, बोले इत्ती मुश्किल से चरखे का फ़ार्मूला बनाया था, वो भी तुमने लीक कर दिया है, अब सारे देवता आपना पुराना कम्प्यूटर खुद ही रीसाइकिल कर देंगे। वे बेचारे फिर से खाली हो जायेंगे।
    बकिया लेख अच्छा लिखे हो, लम्बा है, लेकिन अच्छा है। वो उड़नतश्तरी वाले भाईसाहब के हिसाब से :
    अच्छा लिखे हो, हँसते हँसते पेट मे बल पड़ गये, अगले लेख का इन्त्जार रहेगा।
    (देखना कट पेस्ट मे कोई गलती तो नही हो गयी)
    बकिया चकाचक
    नारायण! नारायण!
  7. ratna
    कुछ लम्बा है पर काफी मज़ेदार है
  8. अतुल
    अगर किसी ऊँचे स्थान पर खड़े होकर नीचे देखो या फिर रोलर कोस्टर पर बैठकर पेट मे जो अहसास होता है उसे बटरफ्लई इफेक्ट कहते हैं। यह डुप्लीकेट नारद जी का मान्डवली आफर उसी तितलियों के अहससा से तो नही उपजा? बेचारे धरती के नारद सोच सोच के परेशान न हों कि अब आगे क्या होने वाला है? अब हम भी सोच रहे हैं जब तक स्वँय नारद जी का एख करारा हास्य लेख इस विषय पर न आये कि उनको “नारद” बनने की प्रेरणा कैसे मिली भैंस कथा आगे बढ़ाने में मजा नही आयेगा।
  9. e-shadow
    क्या लिखते हैं, हंसते हंसते बुरा हाल हो गया. अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा
  10. फ़ुरसतिया » शंकरजी बोले- तथास्तु
    [...] e-shadow on छीरसागर में एक दिनअतुल on छीरसागर में एक दिनratna on छीरसागर में एक दिननारद मुनि on छीरसागर में एक दिनई-स्वामी॔ on छीरसागर में एक दिन [...]
  11. विनय
    swaamii jii:
    २. और बाकी ये डायलाग जब भी मारा जाता है वो उद्दंडता नहीं आत्मविश्वास है! “मेरे टेक्स के डालर का सरकार ने क्या किया? ये स्थान कैसे छूट गया अमरीकी पकड से!” वाला आत्मविश्वास जो भारत वालों को उनकी सरकारें कभी नही दे सकतीं!
    मुझे यह लगता है कि यह आत्मविश्वास से ज़्यादा अनभिज्ञता (ignorance) है. इस मामले में एक आम अमरीकी, एक आम भारतीय से बहुत अलग नहीं है. दोनों का सामान्य ज्ञान अपने मुहल्ले और शहर से बाहर नहीं जाता. जब उन्हें पता चलता है कि उनके अपने परिचित दायरे से बाहर भी एक दुनिया है और वह उनकी दुनिया की तरह से काम नहीं करती, तो उन्हें अचरज होता (“shock” लगता) है. फ़र्क़ दोनों में यह है कि जहाँ एक आम भारतीय को ऐसे मौकों पर हीन बोध होता है, उसका अमरीकी भाई ऐसे में उद्दंडता प्रकट करता है.
  12. Tarun
    लिखा तो बढ़िया है पढ़ते पढ़ते हमें लगा कि बालाजी टेलि फिल्‍म्‌स के सीरियल की तरह खत्‍म ही नही होगा। मानना पढ़ेगा इतना लम्‍बा लेख लिख कर टाईप करने पर।
  13. अनूप भार्गव
    बहुत अच्छे …
  14. anitakumar
    हा हा ! धांसू च फ़ांसू…हंसते हंसते पेट में बल पढ़ गये। थोड़ा लंबा ज्यादा हो गया लेकिन फ़िर भी अंत तक ग्रिप बनाये रखा।
  15. anitakumar
    हा हा ! धांसू च फ़ांसू…हंसते हंसते पेट में बल पढ़ गये। थोड़ा लंबा ज्यादा हो गया लेकिन फ़िर भी अंत तक ग्रिप बनाये रखा।
  16. कविता वाचक्नवी
    आप बहुत अच्छा लिखते हैं, यही कह सकती हूँ। आनन्द आ गया। आजकल ऐसा कल्पनाशीलतापूर्ण व हास्यपरक लेखन लगभग हिन्दी में नगण्य होता चला जा रहा है।
    मुझे लगता है, इस एक दिन को दो दिन बना दीजिए। पूर्व भाग का लालित्य एक दम अलग प्रकार है व उत्तर भाग का लेखन दूसरी प्रकार का, जिसमें आप कुछ चीजों को शामिल करने के विचार में सहजप्रवाह को पूरी तरह मोड़ते दिखाई दे रहे हैं। एक समानान्तर अन्तर कालसन्दर्भ का भी है, पहले भाग का मिथक,प्रसंग आदि एकदम जहाँ उत्फुल्लता पैदा करते हैं, वहीं दूसरे भाग में आधुनिक विसंगत जीवन के प्रतीक व प्रसंग हैं।
    अपनी बात खुले मन से व एकदम सहजभाव से कह दी है, बिना यह सोचे कि आप को किसी बात पर आपत्ति न हो। अन्यथा तो नहीं लेंगे, यह छूट ले रही हूँ।
  17. शंकरजी अंग्रेजी सीख रहे हैं
    [...] है। ]विष्णुजी बहुत देर तक नारद जी की राह देखते रहे। लेकिन नारदजी पुराने हिंदी [...]
  18. : …लीजिये साहब गांधीजी के यहां घंटी जा रही है
    [...] }); }[आज कुछ नया लिखने की सोच रहे थे। फ़िर यह लेख याद आ गया। सोचा आज इसे ही फ़िर से पोस्ट [...]
  19. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] 1.छीरसागर में एक दिन 2.शंकरजी बोले- तथास्तु 3.धूमिल की कवितायें 4.थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई अड्डे से 9.अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा… 10.हम,वे और भीड़ [...]
  20. Devanshu Nigam
    छुटभैये देवता… ;) वाह सर जी!!!!
    Devanshu Nigam की हालिया प्रविष्टी..मोड़ पे बसा प्यार…