Saturday, May 20, 2006

आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार

http://web.archive.org/web/20120730203158/http://hindini.com/fursatiya/archives/131

आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार

स्वामीजी मुझसे बहुत दिन से कह रहे हैं-आरक्षण पर लेख लिखने के लिये। मैं सोच रहा हूँ क्या लिखूँ! आजकल सारे देश में लगभग हर मँच पर आरक्षण पर बहस हो रही है। लोग अपने-अपने तर्क पेश कर रहे हैं। ब्लागर भाइयों ने भी अपने-अपने ब्लाग पर आरक्षण विरोध का ‘लोगो’ लगा रखा है।
आरक्षण के बारे में जब मैं अपने विचार लिखने का प्रयास कर रहा हूँ तो कोशिश यह है कि मैं किसी तार्किक जुगलबंदी से बचा रहूँ। सच तो यह है कि मैं आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में कोई तर्क नहीं पेश करने जा रहा हूँ। मेरी कोशिश है कि जो महसूस करता हूँ वह लिख सकूँ।
जैसा कि पता है कि सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण के विरोध का प्रभावित लोगों द्वारा लोगों विरोध किया जा रहा है। विरोध के कारणों में प्रतिभा की उपेक्षा, गुणवत्ता में गिरावट का डर तथा समाज को पिछड़ेपन के कुयें में ढकेल देने व विकास की गति में नकारात्मक प्रभाव आदि-इत्यादि बताये गये हैं।
यह सच है कि समाज में जब किसी भी वर्ग को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है या किसी दूसरे वर्ग को ज्यादा सुविधायें मिलतीं हैं तो खलता है। बुरा लगता है। जाति पर आधारित आरक्षण से यह प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। जो जातियाँ प्रभावित होती हैं उनकी सहज प्रतिक्रिया होती है कि पुरखों के पापों का दंड हम क्यों भरें?यह कहां का न्याय है कि हमसे कम सक्षम व्यक्ति सिर्फ इस आधार पर ज्यादा पाये कि अनुसूचित जाति-जनजाति का है या फिर पिछड़ी जाति का है।
जो वर्ग या जाति प्रभावित होता है वह यह महसूस करने की हालत में नहीं होता कि जिस वर्ग या जाति को कुछ सुविधायें दी जा रही हैं वे कितने मजबूर हैं,कितने उपेक्षित हैं ,किस हालत में जी रहे हैं। तुलना करते समय लोग ‘संदर्भ पटल’ फ्रेम आफ रेफेरेन्स अपनी सुविधा के अनुसार चुनते हैं।
जाति तथा वर्ग तो बहुत बड़ी बात है। एक ही परिवार में पले लोग इस शिकायत से बच नहीं पाते कि दूसरे के मुकाबले उनको कम सुविधा ,तरजीह मिली। जिन लोगों ने ‘ब्लैक ‘ पिक्चर देखी है उनको शायद याद हो कि किस तरह मिशेल(रानी मुखर्जी) की बहन अपनी शादी के अवसर पर अपनी अपाहिज बहन के मुकाबले मिली उपेक्षा का जिक्र करती है। तुलना करते समय वह अपनी अपाहिज बहन की असहायता भूल जाती है, उसकी तकलीफें भूल जाती है। उसे सिर्फ यह याद रह पाता है कि उसके घर में सदा उसकी अपाहिज बहन की चर्चा होती रही।
सच तो यह है किसी भी समाज में आरक्षण होना कलंक की बात है। किसी समाज के लिये यह शर्मनाक है कि समाज की हालत ऐसी है कि आगे बढ़ने के लिये समाज के किसी वर्ग को आरक्षण देना पड़े। इस लिहाज से भारत में आरक्षण का होना शर्मनाक है । आरक्षण तुरंत खत्म हो जाना चाहिये।
लेकिन बात इतनी सरल नहीं है। न मेरे चाहने से आरक्षण पर कोई फरक पड़ेगा। लिहाजा,फिलहाल आरक्षण से जुड़े कुछ ‘मिथ’ के बारे में मैं अपने अनुभव बताना चाहूँगा।
पहला भ्रम तो यह है कि आरक्षण से आरक्षित वर्ग अपाहिज ही बना रहता है। आजकल समाज में ‘आरक्षण की बैसाखी’ के सहारे आरक्षित जातियां अनारक्षित जातियों को चुनौती देने लगी हैं। जानकारी के लिये बता दूँ कि सरकारी नौकरियों में आजकल आरक्षित जातियाँ अनारक्षित जातियों के प्रत्याशियों को चुनौती देने लगी हैं।
उदाहरण के लिये यदि किसी विभाग में कुल दस पद खाली हैं जिनमें से मान लीजिये ३ आरक्षित हैं तथा ७ पद अनारक्षित हैं। तो ऐसा संभव है कि जब अंतिम चयन हो तो आरक्षित वर्ग के कुल पाँच प्रत्याशी तथा अनारक्षित वर्ग के पाँच प्रत्याशी चुने जाय । इसका कारण यह है कि आरक्षित वर्ग के दो प्रत्याशी ऐसे रहे जिन्होंने सामान्य वर्ग की मेरिट लिस्ट के सात प्रत्याशियों में स्थान ग्रहण किया। इस तरह तीन की जगह पाँच प्रत्याशी आरक्षित वर्ग के चुने गये। तीन अपने आरक्षण के कारण तथा दो अपनी प्रतिभा के कारण।
उपरोक्त उदाहरण में यह कहा जा सकता है कि यह तो प्रतिभा को हताश करना ,उसका हिस्सा मारना हुआ। इसके तमाम तर्क हो सकते हैं लेकिन इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि आरक्षित वर्ग के कम से कम दो प्रत्याशी ऐसे हैं जो प्रतिभा में सामान्य वर्ग से कम नहीं हैं।
सिविल सेवा २००६ के परीक्षा परिणामों के बारे में जानकारी देते हुये योजना आयोग के सदस्य ने बताया कि इस वर्ष पहले १०० में से २५% प्रत्याशी आरक्षित वर्ग के थे। यह भी बताया कि हर साल आरक्षित तथा अनारक्षित वर्ग के प्रत्याशियों के अंको का अंतर कम होता जा रहा है।
कल मैं एक विद्यालय के वार्षिकोत्सव में गया था । वहाँ प्रतिभावान विद्यार्थियों को पुरुस्कार दिये जा रहे थे। मैं पुकारे जा रहे नामों पर गौर कर रहा था। करीब ४०% बच्चे जिन्होंने प्रथम,द्वितीय,तृतीय स्थान पाये वे अनुसूचित जाति,जनजाति तथा पिछड़े वर्गों से थे।
दिन-प्रतिदिन आरक्षित वर्ग के बच्चे आगे आते जा रहे हैं।यह बात गलत साबित हो रही है कि आरक्षित वर्ग सदा ही गैरप्रतिभावान बना रहेगा।
ऐसा संभव हो पाया आरक्षण के कारण ही। अगर इन बच्चों के माँ-बाप को आरक्षण की बैसाखी न मिली होती तो ये बच्चे सरपट दौड़ने के लिये अपने को तैयार न कर पाते।
तो यह कहना बचकानापन तथा सच से मुंह चुराना होगा कि गधे,गधे ही बने रहेंगे। आरक्षण या प्रशिक्षण से उन्हें घोड़ा नहीं बनाया जा सकता । गुणवत्ता जन्मजात नहीं होती । सुविधा,संरक्षण तथा प्रशिक्षण से गुणवत्ता को निखारा जा सकता है।
आरक्षण के विरोधी तर्क देते हैं कि सरकार आरक्षित वर्ग को सुविधायें दे,स्कालरशिप दे,फीस माफ करे। लेकिन यह क्या कि भर्ती में कोटा कर दिया।काबिल हो जायें तो नौकरी तथा उच्च शिक्षा में आने दे। सरकार का सोचना है कि आरक्षण के द्वारा वंचितों का आत्मविश्वास तथा सामाजिक स्तर ऊँचा किया जा सकता है।
ये दो बातें तैरना सीखने के बाद पानी में उतारने की तथा पानी में उतरेंगे तो सीख ही जायेंगे जैसी हैं।
जिन अनुसूचित ,दलित लोगों ने अपने अनुभव लिखे हैं उनसे पता लगता है कि कितनी विषम परिस्थितियों से गुजरकर इन लोगों ने अपना रास्ता बनाया है। केवल गरीबी ही बाधक नहीं होती। अपने समाज में जो हालत दलितों की रही है उसके चलते एक गरीब दलित को गैरदलित गरीब के मुकाबले बहुत अधिक झेलना पड़ता है आगे बढ़ने के लिये। आप कितने भी प्रतिभावान हों अगर कोई आपकी क्षमता का उपहास उड़ाये तो सारी प्रतिभा कपूर बन जाती है। दयापवार,ओमप्रकाश वाल्मीक,शिवमूर्ति वगैरह की आत्मकथाओं से झलक मिलती है इस बात की कि कितना कठिन सफर है दलितों का । अगर इनको आरक्षण की बैसाखी न मिली होती तो जितना भी विकास हुआ है इनका ,न हुआ होता।
हरिजन उत्पीड़न एक्ट का बहुत दुरुपयोग भी होता है लेकिन यह भी सच है कि अगर इस तरह के कानून न हों तो अभी तक हरिजन गरियाये,जुतियाये,लतियाये जा रहे होते।
कोई भी समाज केवल सदिच्छा से हरिजनों की थाली में रोटी नहीं डालता। अगर कानून न हो तो समर्थ वर्ग उनको पहाड़ा पढ़ाता रहता।
जहाँ तक मुझे जानकारी है कि कुछ सालों तक यह होता रहा कि नौकरियों में चयन के लिये आरक्षित वर्ग के समुचित प्रतिनिधि न पाये जाने की स्थिति में सामान्य वर्ग के लोग लिये जाते रहे। आरक्षित वर्ग के लोग रह जाते रहे। जब इसका विरोध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि आरक्षित की सीटों पर सामान्य वर्ग के लोगों का चयन नहीं होगा।अगर यह व्यवस्था न होती तो शायद अभी भी समुचित प्रत्याशी न मिलने की बात कहकर सामान्य लोग चयनित किये जाते रहते।
अब इसे चाहे भला कहें या बुरा लेकिन यह सच है कि अगर कोटा न होता तो आज जितने आगे आये हैं आरक्षित वर्ग के लोग उतने आगे नहीं होते।
प्रोफेशनल कालेज में आरक्षण के कारण सामान्य छात्रों का हक मारे जाने का हौवा खड़ा करने वालों की जानकारी के लिये बताना चाहता हूँ कि आज से बीस साल पहले उप्र में केवल आठ इंजीनियरिंग कालेज थे। आज कम से कम अस्सी इंजीनियरिंग कालेज हैं उप्र में। दस गुना कालजे बढ़े हैं। सीटें तो कम से कम बीस गुना बढ़ी होंगी। भारत भर का आंकड़ा लिया जाय तो यह गुना कम से कम पचीस से ज्यादा ही होगा।
जिस सामान्य वर्ग के बच्चे आतंकित हैं आरक्षण से उनके माता-पिता ने भी बच्चे घास-पतवार की तरह नहीं पैदा किये।वे बहुत पहले ही छोटे परिवार का महत्व समझ गये हैं।तो ऐसा कोई पहाड़ नहीं टूट रहा है अगर कुछ सीटें बंट रहीं हैं।जितनी घटिया शिक्षा तुम पाओगे उतनी घटिया वे भी पायेंगे। शिक्षा का स्तर गिर रहा है- हर जगह। जो बच्चे बमुश्किल इंटर की परीक्षा पास कर पाते हैं वे किसी न किसी इंजीनियरिंग कालेज में घुस जाते हैं किसी न किसी तरह से।
आरक्षण के द्वारा गैरप्रतिभावान लोगों के द्वारा जबरदस्ती काबिल लोगों का हक मारने की बात करते समय यह भी सोचना जरूरी है कि अनारक्षित वर्ग के वे बच्चे कितने प्रतिभाशाली हैं जिनकी फौज डोनेशन वाले कालेजों से निकल रही है?
आरक्षण हर देश-काल में किसी न किसी रूप में रहा है। अपने देश में ही प्राइवेट कंपनियाँ सरकार से इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की गुजारिश करती हैं। विकसित देश अपने किसानों कोसब्सिडी देते हैं। तमाम तरह से अपने लोगों के हक सुरक्षित रखे जाते हैं। विकसित देशों में भी काले लोगों की सुविधाओं के लिये जरूर कुछ कानून होंगे। वे भी तो जन्म के आधार पर होते हैं।
जिन तमाम लोगों के ब्लाग पर आरक्षण विरोध का लोगो चिपका है वे सरकार की ही मेहरबानी से बेहदकम पैसों में अभियंता/डाक्टर होकर बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। यह भी एक किस्म का आरक्षण ही है। प्रतिभा को फलने-फूलने का मौका देने का। सरकार अगर अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है तो कौन बड़ा अपराध करती है।
कहा जाता है कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं होना चाहिये। दूसरे देशों के हवाले दिये जाते हैं। अब चूंकि यहां जाति है इसलिये जाति ही आधार माना गया। जाति अपने यहां डी.एन.ए. टेस्ट की तरह होती है। कभी पीछा नहीं छोड़ती। आप भले ही न मानो जात-पाँत लेकिन जाति आपसे चिपकी रहेगी। बहुत कम लोग अपने को जाति से अलग कर पाते हैं।
हर जाति का अपनी सभा होती है। ब्राह्मण सभा, कान्यकुब्ज सभा, कायस्थ सभा, ठाकुर सभा ,सिंधी समाज तथा और न जाने क्या-क्या। सब अपने-अपने जाति कुल के लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश करतीं हैं। तो सरकार अगर अपना कल्याणकारी रूप बनाये रखने के लिये अपने देश की आबादी के एक हिस्से के लिये आरक्षण करती है तो क्या बुरा करती है!
यह वास्तव में अपने समाज की बड़ी विडम्बना है कि आजादी के साठ साल बाद भी समाज में सामाजिक,आर्थिक समानता लाने के लिये आरक्षण का सहारा लिया जा रहा है।शायद हमारे नीति-निर्माता सही आकलन नहीं कर पाये होंगे-समाज का। यह भी सही है कि जितने प्रयास होने चाहिये समानता लाने के लिये वे नहीं हो पाये होंगे।
आरक्षण की प्रक्रिया के लागू करने के प्रयास में भी तमाम गड़बड़ियां हुईं। जिस तरह तमाम लुटियाचोर आजादी के समय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन गये उसी तरह तमाम संपन्न, विकसित जातियां भी आरक्षित वर्ग में घुस गयीं। राजस्थान की कुछ जातियाँ जो राजकाज में थीं तथा जिनके पास सैंकड़ों बीघे जमीन थी वे पिछवाड़े से जनजाति के चबूतरे पर जा बैठे ।वे दूसरों का हक मार रहे हैं तथा वंचितों का माखौल उड़ा रहे हैं।
पिछड़ी जातियों का भी मामला निराला है। सुनते हैं कि पिछड़ी जातियों का निर्धारण सन् १९३१ की जनगणना के आधार पर हुआ है । एक समाचार(एनएसएस द्वारा कराये एक सर्वे के मुताबिक) के अनुसार देश में पिछड़ों की कुल आबादी की ३६%फीसदी (अगर मुस्लिम ओबीसी को निकाल दें ३२%) है।जबकि प्रस्तावित २७% प्रतिशत आरक्षण का आधार यह है कि पिछड़ों की आबादी कुल आबादी की ५२% है।देश की ३२ फीसदी आबादी के लिये २७% आरक्षण का क्या औचित्य है?
इस पिछड़ी जातियों की आबादी में तमाम संपन्न जातियां शामिल हैं जिनके लिये शिक्षा कभी मुश्किल नहीं रही। न पढ़ाई-लिखाई की उनको कोई जरूरत ही नहीं थी ऐसे ही खाते-पीते मस्त थे। पिछड़ेपन के नाम पर जब तोंदवाले आरक्षण पायेंगे ,चाहें वे मात्रा में कितने ही कम क्यों न हों तो आरक्षण से वंचित वर्ग का खीझना स्वाभाविक है।
वैसे भी किसी वस्तु को पाने वाले के सुख से कई गुना ज्यादा दुख वस्तु से वंचित रह जाने वाले को होता है।
यह सही में बहुत भ्रामक धारणा है कि आरक्षित जाति के लोग काम के मामले में कमतर या कामचोर होते हैं। मेरे साथ तमाम लोग काम करते हैं। कामचोरी,काबिलियत का जाति से कुछ लेना देना नहीं होता। खासतौर से रूटीन के काम में। कई मामलों में तो सामान्य जातियों के लोग असामान्य रूप से काहिली का मुजाहिरा करते हैं।जबकि आरक्षित जाति के लोग अपनी कमजोरी को मेहनत से पाटने का प्रयास करते हैं।
मजे की बात है कि आरक्षित वर्ग में भी ब्राह्मणवादी संस्कार होते हैं। जैसे ही वह आरक्षण की बैसाखी लगाकर ऊपर उठ जाता है फिर वह अपने वर्ग से दूर हटने का प्रयास करता है। अपने को किसी ऊँची जाति के वंशज से जोड़ने का प्रयास करता है। यह स्वाभाविक हीनभावना से ऊबरने का प्रयास होता है।यह बिडम्बना है कि वह उस वर्ग के उत्थान के लिये सार्थक प्रयास नहीं करता है जिससे वह आया है। वह अपनी जाति पर तमाम ऊँची जातियों का मुलम्मा चढ़ाने का प्रयास करता है।
यह कुछ इसी तरह से है जैसे कि हरिजन कल्याण विकास कार्यक्रम के तहत सस्ते मकान लेने के लिये तमाम तथाकथित ऊँची जाति वाले लोग अपनी जाति का टाईटल उखाड़ के फेंक देते हैं।
यह भी विवाद का विषय है कि आरक्षण आखिर कब तक? यह पता नहीं कब थमेगा। लेकिन यह तय है कि कोई भी व्यक्ति चाहे जितना क्रीमी लेयर का क्यों न हो तब तक आरक्षण का फायदा लेना नहीं छोड़ेगा जब तक कि इस पर पाबंदी न लगा दी जाये।
यह विश्वास करना बड़ा मुश्किल होता है उनके लिये कि वे बिना बैसाखी के चल पायेंगे। वैसे भी किसी को भी अपनी प्रतिभा पर इतना भरोसा नहीं होता कि बिना सुरक्षित हुये चलने का जोखिम खुशी-खुशी उठाना चाहे।यहाँ तक की आई.आई.टी. का टापर भी पहले आई.आई.टी. में टाप करता है। फिर एम.बी.ए. करता है। फिर किसी कम्पनी में बिक्री करता है। इस प्रक्रिया में वह उस विषय को भूलता है जिसमें उसने टाप किया होता है।अगर प्रतिभा को अपने पर इतना ही भरोसा होता तो किसी दूसरे की एक सीट न मारकर सीधे एम.बी.ए. की परीक्षा देता। लेकिन फैशन के दौर में गारण्टी की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
अक्सर आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात की जाती है। यह होना चाहिये। लेकिन कौन गरीब है इसकी पहचान बहुत मुश्किल काम है। सरकारी नौकरी में तो तनख्वाह के आधार पर बताया जा सकता है कि कितना गरीब है व्यक्ति लेकिन इसके अलावा गरीबी के बारे में तय करना बहुत मुश्किल है। फिर तमाम लखपति भी अपने को गरीब साबित कर देंगे। जैसा काले धन की पहचान नहीं हो पाती ,गरीबों की पहचान में भी घालमेल होने का खतरा है। कुछ ऐसा ही जैसा कि ‘लैंड सीलिंग एक्ट’ लागू होने पर तमाम जमींदारों ने अपनी हजारों एकड़ जमीन अपने अपने कुत्ते,बिल्लियों तक के नाम करा दी तथा भूदान आन्दोलन में तमाम लोगों ने अपनी बंजर जमीन दान में दे दी। अपना पाया अधिकार छोड़ दे, ऐसा बिरले लोग करते हैं।
यह भी एक विडम्बना ही है कि पिछड़ी जातियों के आरक्षण के बारे में जब भी विचार हुआ,उसमें पिछड़ों को आगे बढ़ाने का विचार कम ,तात्कालिक राजनीति ज्यादा हावी रही।
जैसा कि मैंने कहा कि आरक्षण का मुद्दा ऐसा है कि इसके पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ लिखा जा सकता है। अंतहीन बहस की जा सकती है।
लब्बोलुआबन मेरे विचार निम्नवत हैं:-
१.आरक्षण देश के वंचित लोगों को आगे लाने के लिये जरूरी है। दलित,वंचित लोग अभी भी बहुत पिछ़डे हैं।अभी भी देश में अन्याय,अत्याचार का शिकार दलित ही सबसे ज्यादा हैं। देश में बलात्कार, मारपीट की सबसे ज्यादा घटनायें अनुसूचित जातियों,जनजातियों के साथ ही होती हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति की स्कूलों से ‘ड्रापआउट’ दर ९०% से अधिक है। गाँवों में रहने वाले तमाम दलित लोगों को अभी तक उनके लिये मिलने वाली सुविधाओं के बारे में ही नहीं पता।
२. आरक्षण के प्रतिशत पर पुनर्विचार होना चाहिये। जिन लोगों को एक बार आरक्षण का लाभ मिल चुका है उनको पहचानने तथा उनको आरक्षण से बाहर रखने की प्रक्रिया पर विचार तथा अमल होना चाहिये। अगर क्रीमी लेयर वाले लोग आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया जायें तो अनारक्षित वर्ग का आक्रोश बहुत कम हो जायेगा। शहरों में रहने वाले आरक्षित वर्ग के डाक्टर,इंजीनियर,अधिकारी जब अपने बच्चों के लिये आरक्षण का फायदा लेते हैं तो समाज के दूसरे वर्ग की कुंठा सहज है।
३. जो जातियाँ आरक्षण का नाजायज फायदा ले रहीं हैं उनकी पहचान के प्रयास तथा उनको बाहर करने के उपाय होने चाहिये। यह बहुत कठिन काम है। लेकिन जरूरत है इसकी।
४.पिछड़ी जातियों की गणना आज के परिप्रेक्ष्य में होनी चाहिये। जो जातियाँ सम्पन्न हैं उनको इसका फायदा नहीं मिलना चाहिये। यह मुद्दा सबसे ज्यादा संवेदनशील है। हरियाणा,उ.प्र.,बिहार,म.प्र. की जो तमाम जातियाँ पिछड़ी जातियों मे शामिल हैं उनमें से बहुत सी जातियाँ बहुत सम्पन्न तथा प्रभावशाली हैं।इनको आरक्षण देने से समाज में वैमनस्यता तथा भेदभाव बढे़गा।अनारक्षित वर्ग के लिये यह पचा पाना मुश्किल हो जाता है कि हर तरह से उसके बराबर तथा कहीं से ऊँची सामाजिक स्थिति वाला उसका साथी आरक्षण के नाम पर उसके आगे निकल जाता है।
आगे के लिये मुझे लगता है कि जैसी कि अपने देश की परम्परा रही है उससे मुझे नहीं लगता कि कुछ खास फरक पड़ेगा-आरक्षण विरोधयों के हल्ले-गुल्ले से। सरकार ने नौकरियों में आरक्षण कर ही दिया है।शिक्षा में भी कर ही देगी। आज नहीं तो कल,कल नहीं तो परसों। कुछ विरोध होगा लेकिन आरक्षण होकर रहेगा। शायद कुछ आरक्षण आर्थिक स्थिति के आधार पर भी हो जाय।
इससे अनारक्षित वर्ग में आक्रोश होगा। कुछ दिन धरना,आन्दोलन होगा फिर सब शान्त हो जायेगा। ज्यादा दिन कुछ नहीं होगा क्योंकि माँग तथा आपूर्ति के नियम का पालन करते हुये धुँआधार इंजीनियरिंग मेडिकल कालेज खुलते जायेंगे। सीटें बढाने का विकल्प अच्छा है लेकिन वह उस दर्द का इलाज नहीं कर पायेगा जिसमें कोई अनारक्षित बच्चा अपने से कम अंक वाले आरक्षित बच्चे को चयनिते होते देखेगा।
नौकरी के स्तर पर कुछ खास फरक नहीं पड़ेगा। सरकारी नौकरियाँ लगातार कम हो रहीं हैं ।निजी कंपनियों में नौकरी में एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट की कीमत आज कुछ हजार रुपये प्रति माह से लेकर लाखों रुपये प्रतिमाह है। वहाँ प्रतिभा का कोई विकल्प नहीं है। प्राइवेट कंपनियाँ अपना घाटा उठा के आरक्षण नहीं करेंगीं। वे हर सरकारी व्यवस्था की काट खोज के केवल उन्हीं लोगों को चुनेंगी जो उनके काम का हो। कान्ट्रैक्ट पर नौकरियाँ शुरू हो ही गयी हैं।
यह लेख मैंने चार दिन पहले लिखा था। नेट के नखरे के कारण पोस्ट न कर सका। इस बीच आरक्षण समर्थक भी सड़क पर आ गये हैं। विरोधी तथा समर्थकों को पुलिस समान भाव से पीट रही है। बवाल बढ़ता जा रहा है। देश के कर्णधार सोच रहे हैं कि क्या किया जाय।
बहरहाल,हमारे विचार जैसे थे वैसे ही हैं। उनमें कोई बदलाव नहीं आया है ।
मुझे तो जो लगता है मैंने बता दिया अब आगे-आगे देखिये क्या होता है ।
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14 responses to “आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार”

  1. सृजन शिल्पी
    बहुत संतुलित और सहज भाव से आपने यह लेख लिखा है अनूप भाई। बिना उत्तेजित हुए सच बयान कर सकने और विरोधी पक्ष को भी सहमत कर लेने की क्षमता है आपके लेखन में। आप तो जानते ही हैं कि ‘परिचर्चा’ पर जीतू भाई इस विषय पर बहस छेड़े हुए हैं। मेरा खयाल है कि आपका यह लेख सबको आरक्षण के संदर्भ में संतुलित रूप से सोचने के लिए प्रेरित करेगा।
  2. प्रेमलता पांडे
    सामाजिक ज़िम्मेदारी के साथ लेख सधा हुआ है, तथ्यात्मक है। तेज जलते चूल्हे में सीली लकड़ी का कार्य करेगा जिसकी बहुत ज़रुरत है। नौजवान भिड़ने की मुद्रा में हैं जबकि आवश्यकता मिलकर प्रगति करने की है। गतानुगतः लोकः से दूर ले जाएगा। सभी को सोचने को विवश करेगा। धंयवाद।
    प्रेमलता पांडे
  3. anunad
    अनूप भाई, आप जितने विशालहृदय हैं, उतने ही महामना भी हैं | मेरा भी यही विचार है कि आरक्षण का विरोध न किया जाय बल्कि आरक्षण को लागू करने के तरीके में सुधार की माँग की जानी चाहिये | आरक्षण का फायदा यदि सम्पन्न जातियाँ और पिछडी जातियों के सम्पन्न लोग लेते हैं तो यह दोहरा संकट है – इससे अनारक्षितों को तो घाटा होता ही है, असली घाटा असल में पिछडे लोगों को ही होता है; क्योंकि आरक्षण के बावजूद वे बंचित रह जाते हैं |
    इसलिये आरक्षण लागू करते समय “क्रीमी लेयर” और सम्पन्न जातियों को इसके दायरे से बाहर रखा ही हजाना चाहिये |
  4. मनीष
    आरक्षण के विविध पहलुओं पर बेहद संतुलित लहजे में आपने अपने विचार रखे हैं . आपके इस लेख के निचोड़ से मैं पूरी तरह सहमत हूँ । पर एक सवाल मन को परेशान करता रहता है कि क्या कभी हमारी भावी पीढ़ियाँ आरक्षण मुक्त समाज में जन्म ले सकेंगी ?
  5. जीतू
    अनूप भाई के अपने विचार है, कोई जरुरी नही है कि हम एक दूसरे के विचारों से सहमत हों।अनूप भाई ने अपने विचार प्रभावशाली तरीके से रखे है, हो सकता है जीवन से उनके जो साक्षात्कार हुए हो, मेरे ना हुए हों। मेरा अब भी मानना है, आरक्षण सही नही है।जब आप उन्हे शिक्षा मे आरक्षण दे रहे है, नौकरियों मे आरक्षण दे रहे है तो पेन्शन भी शुरु करवा दीजिए, मै तो कहता हो, चमम्च से मूँह मे निवाला देने से तो अच्छा है उन्हे अपनी जीविका चलाने लायक बनाइये, जब तक आरक्षण रहेगा तब तक उन्हे प्रतियोगी नही बनाया जा सकता। हाँ यदि आरक्षण देना ही है तो सबसे आर्थिक स्थिति का आकलन करके आरक्षणं दीजिए, वो भी एक लिमिटेड समय तक।उसके बाद आरक्षण बन्द।लेकिन बदकिस्मती से अपने देश मे ऐसा होता नही है,वोट की क्षुद्र राजनीति की वजह से नेता आरक्षण हटाते नही।
    सरकारी नीतियां कितनी नीचे के लेवल तक पहुँचती है, वो हम सभी जानते है, इस प्रोपोस्ड आरक्षण का भी क्रीमी लेयर ही फायदा उठाएगी, ये पक्का है।
    स्रूजनशिल्पी जी,रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है।
  6. समीर लाल
    बहुत बढियां, तार्किक जुगलबंदी से बचते हुये अपने अहसासों को बेहद बखूबी व्यक्त किया है, अनूप जी.वाकई,आगे-आगे देखिये क्या होता है. शायद कुछ अच्छा ही हो…
  7. ratna
    मैं जीतू जी के विचारों से सहमत हूँ ।
  8. eswami
    “तो यह कहना बचकानापन तथा सच से मुंह चुराना होगा कि गधे,गधे ही बने रहेंगे। आरक्षण या प्रशिक्षण से उन्हें घोड़ा नहीं बनाया जा सकता । गुणवत्ता जन्मजात नहीं होती । सुविधा,संरक्षण तथा प्रशिक्षण से गुणवत्ता को निखारा जा सकता है।”
    गुरुदेव,
    मेरे अनुरोध पर यह लेख लिखने के लिए आभारी हूं! आपके संतुलित विचार पढ कर बहुत प्रसन्न भी हूं!
    मोटे तौर पे लाजिकल टेबिल बनाने पर आठ तरह के केंडिडेट हैं आपके पास –
    १) सामान्य वर्ग वाला संपन्न गुणी
    २) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न गुणी
    ३) सामान्य वर्ग वाला संपन्न कम गुणी
    ४) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी
    ५) पिछडे वर्ग वाला संपन्न गुणी
    ६) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न गुणी
    ७) पिछडे वर्ग वाला संपन्न कम गुणी
    ८) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी
    यदी गुणवत्ता जन्मजात नही होती तो आरक्षण का आधार जातियां तो होना ही नही चाहिए – गुणी चाहे असंपन्न हो चाहे संपन्न हो, वो चाहे सामान्य वर्ग मे हो या पिछडे वाले में – वो अपना स्थान बना लेगा!चाहो तो पिछडे वर्ग के असंपन्न गुणी को छात्रवृत्तीयां दो ना हम विरोध कहां कर रहे हैं?
    अब रही की कम गुणी को मौका देने की बात – तो आरक्षण के आधार पर पिछडा संपन्नवर्ग जो है वो सामान्य वर्ग के असंपन्न गुणी का हक क्यों छीन रहा है?
    बाकी आसान कांबिनेशन आप भी इंजीनियर हो – लगा के देख लो की आरक्षण के तौर तरीके अन्यायपूर्ण हैं और तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति को बढावा देने के लिए ही गढे गए हैं.
    ओवर आल मैं जीतू की बात का समर्थन करता हूं!
  9. रजनीश मंगला
    ये सारी चर्चा बहुत शिक्षाप्रद रही। क्या आरक्षण की चर्चा नक्सलवादियों के संदर्भ में की जा सकती है?
  10. सृजन शिल्पी
    जीतू जी की इस टिप्पणी के संदर्भ में कि
    “सृजनशिल्पी जी, रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है”
    मेरा उनसे यह स्पष्टीकरण है कि स्वस्थ चर्चा में मेरा भी विश्वास है। मुझे कतई शिकायत नहीं है आरक्षण पर किसी बहस से। इसीलिए मैंने उत्साहपूर्वक परिचर्चा में भाग भी लिया और उठाए गए मुद्दों पर विस्तार से टिप्पणी भी की। ऊपर मैंने सिर्फ उस बहस का जिक्र भर किया था। आप तो नाहक ही नाराज हो गए।
  11. e-shadow
    जीतू भैया को मेरा भी पूरा समर्थन।
  12. अशोक
    सर्वप्रथम मैं श्रीमान् जीतू एवं श्रीमान् ईस्‍वामी को उनके ज्‍वलंत एवं तथ्‍यात्‍मक विचारों को प्रस्‍तुत करने हेतु धन्‍यवाद ज्ञापित करना चाहूँगा। वहीं श्रीमान् अनूप जी भी इस बात से पूर्णतया सहमत हैं कि इस मुद्दे पर पक्ष या विपक्ष में कहने को उनके पास भी बहुत कुछ है। मैं अपने शहर की एक घटना का वर्णन कर रहा हूँ। आज से ग्‍यारह वर्ष पहले एक युवक का आरक्षण के आधार पर (व़ह भी ॠणात्‍मक अंक प्राप्‍त करने पर) शासकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की शिक्षा के लिए चयन हो गया (दुर्भाग्‍यवश)। अब चूँकि उस युवक का बौद्धि‍क‍ स्‍तर किसी चिकिस्‍तक का कंपाउण्‍डर बनने के लायक भी नहीं था, उस युवक ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने में अपनी लगन, मेहनत और सहनशीलता का परिचय देते हुए पूरे दस वर्ष च‍िकित्‍सक बनने के प्रयास में लगाए। यह उसका दुर्भाग्‍य (?) था कि ग्‍यारहवें वर्ष उसे न्‍यायालय की शरण में जाना पड़ा, यह कहते हुए कि उसे जानबूझकर उत्‍तीर्ण नहीं किया जाता है। न्‍यायालय में प्रकरण की जॉंच में यह स्‍पष्‍ट हो गया कि जब छात्र कॉपी में लिखेगा ही नहीं, तो वह उत्‍तीर्ण होने के स्‍वप्‍न कैसे देख सकता है।
    सिर्फ़ एक इसी प्रकरण से अब आप सोचें कि अयोग्‍य जन को आरक्षण सुविधा देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। अगर वह युवक मुन्‍नाभाई की स्‍टाईल में डॉक्‍टर बन जाता तो ? और भी आगे सोचिए, अगर आप बीमार पड़ने की अवस्‍था में ऐसे ही किसी चिकित्‍सक के पास इलाज कराने पहुँचते। बेहतर होता कि उस युवक को प्राथमिक कक्षा से ही नि:शुल्‍क पुस्‍तकें, कपड़े आदि ईमानदारी से मुहैया कराए जाते, तो शायद वह युवक कम से कम कम्‍पाऊन्‍डर तो बनने की प्रवेश परीक्षा में मेरिट में आ सकता था। यही नहीं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में में कोई क्रीमीलेयर वर्ग की श्रेणी न होने से किसी कलेक्‍टर, एसडीएम यानि वर्ग एक अधिकारी के पाल्‍य भी आरक्षण सुविधा का लुत्‍फ उठाते हैं। यह तो अन्‍याय है। आप ज्रबरन ही किसी को जम्‍प कराकर किसी संवैधानिक पद पर बिठाऍंगे तो क्‍या वास्‍तविक तरक्‍की मिल पाना संभव है ? बौद्धिक विकास एक सतत् प्रक्रिया का फल है, यदि विकास कराना ही है तो बौद्धिक विकास हो, ऐसा प्रयास करें।
    अंत में यही कहना चाहूँगा, आरक्षण से विकास तो कतई नहीं हो सकता।
    (लेखक स्‍वयं अन्‍य पिछड़ा वर्ग से संबंध रखता है एवं आरक्षण के लाभ से कोसों दूर रहने में ही देशहित को देखता है)
  13. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 4.थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र [...]

Saturday, May 13, 2006

थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता

http://web.archive.org/web/20120730203153/http://hindini.com/fursatiya/archives/130

थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता

धूमिल
गीदड़ की जब मौत आती है तो शहर की तरफ भागता है। इसी तरह ब्लागर को जब अपना कचूमर निकलवाना होता है तो वह फरमाइशी पोस्ट लिखता है। यह देखकर अच्छा लगा कि ‘धूमिल की कवितायें’ काफी लोगों ने पसन्द कीं। धूमिल की कविताओं का खास तेवर उनका अपना खास है।
कुछ शब्द,मुहावरे धूमिल के डिजाइनर शब्द हैं। साफगोई चकित करती है। कवितायें स्तब्ध करती हैं।सोचने पर मजबूर करती हैं। जब वे कहते हैं-
मैंने एक-एक को
परख लिया है।
मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाजा खटखटाया है
मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ
उठायी है उसको मादा
पाया है।
वे सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं । लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि-
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।
तो लगता है कि ‘धूमिल’ कविता के द्वारा समाज का एक्सरे दिखा रहे हैं हमें।
ब्लागर को जब अपना कचूमर निकलवाना होता है तो वह फरमाइशी पोस्ट लिखता है।
बहरहाल,बात फरमाइश की हो रही थी। अतुल ने अभिव्यक्ति में प्रकाशित अशोक चक्रधर के संस्मरण में धूमिल द्वारा प्रयोग किये गये शब्द ‘थेथरई मलाई’ के बारे में जानकारी देने के लिये फरमाइश की है:-
अब चक्रधर जी ने बताया नही , आप ही बताईये कि यह थेथरई मलाई क्या होती है?
मेरी जानकारी में थेथर भोजपुरी अंचल में प्रयोग किया जाने वाला शब्द है। ‘थेथर’ ऐसे शख्स को कहते हैं जिस पर किसी के समझाने का असर नहीं होता है। हिंदी में बेहया शब्द थेथर के कुछ नजदीक का शब्द लगता है। हमारे एक मित्र आलोक प्रसाद ,जो खुद भले कभी न पढ़ें लेकिन हर मिलने वाले को मेरा ब्लाग पढ़ने की सलाह देते हैं , अक्सर थेथर शब्द का प्रयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि थेथर एक जंगली पौधा होता है जो चाहे जितना काटो फिर से उग आता है। उ.प्र. में भी बेशरम बेल होती है जो तालाबों के किनारे पैदा होती है तथा गर्मी में जब दुनिया के सारे पेड़ सूख रहे होते हैं,तब भी हरियाता है।
थेथर से ही बना है थेथरई । मतलब बेहयाई। बिना किसी का लिहाज किये बेसिरपैर की हरकतें करते रहना। किसी के समझाने का कोई असर नहीं होता थेथर पर।
थेथरई मलाई धूमिल का डिजाइनर ‘शब्द -युग्म’ है। यहाँ धूमिल जब कहते हैं-‘इनको दो थेथरई मलाई,कविता कौन ससुर चाहता है?’ तो समकालीन मंचीय कविताओं के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करते हैं।
धूमिल का संकेत समय-समाज से कटी उन कविताओं की तरफ है जो मंच पर बहुत सराही जाती हैं। लटके-झटके में रूमानी बातें गीतों के माध्यम से पेश करने वाले कवियों कविताओं के प्रति नाराजगी का भाव है। मलाई आकर्षक होती है लेकिन थेथरई के साथ जुड़कर वह समय-समाज से कटी चीज हो गयी।
धूमिल यह भी कहना चाहते हैं कि अपने समय से कटकर रूमानी (मलाईदार) कविता करना थेथरई है। अधिसंख्य कवियों के अनुकरण में जनता की पसंद भी उसी के अनुसार हो जाती है। इसीलिये धूमिल क्षोभ से कहते हैं-
‘इनको दो थेथरई मलाई,कविता कौन ससुर चाहता है?’
थेथरई मलाई के अर्थ के संदर्भ में मैंने आज ही फोन पर प्रख्यात कथाकार काशीनाथ सिंह जी से भी बात की। धूमिल का उनका बहुत दिनों का साथ रहा है। उनका भी यही मत है कि धूमिल ने थेथरई मलाई का प्रयोग समय-समाज से कटी उन कविताओं के संदर्भ में किया है जो दिखने में तो आकर्षक,मनलुभाऊ हैं लेकिन समाज का सच नहीं बयान करतीं।
यह तो हुआ अतुल के सवाल का जवाब। अब हम अपनी बात बतायें।
धूमिल की कविताओं के बारे में दोस्तों की रुचि देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। इसी बहाने हमारे साथी मृणाल की टिप्पणी भी बहुत दिन बाद मिली। मृणाल भी बनारस में पढ़े हैं। भोलेभण्डारी इतने कि सिविल सर्विस में पहले प्रयास में ही ४० रैंक के बावजूद सबसे नीचे की पोस्ट पाये काहे से कि ये अपने आप्शन भरे ही नहीं थे।दुबारा चाहते तो चयन हो जाता लेकिन कहते हैं कौन ससुरा किच-किच में पड़े-बड़ी बाहियात नौकरी है डी.एम.वगैरह की। आजकल कलकत्ता में पोस्टेड हैं। ब्लाग के शुरुआती दिनों में मृणाल ने बहुत बातें सिखाईं थीं मुझे।हमारा लैपटाप भी मृणाल का ही पसंद किया हुआ है।
धूमिल की कविताओं पर लोगों की प्रतिक्रिया ने मुझे पानी पर चढ़ा दिया तथा मैंने धूमिल की लंबी कविता’ पटकथा ‘ अपने साथियों को पढ़ाने की सोची। मैंने जब टाइप करते हुये दुबारा-तिबारा कविता पढ़ी तो मुझे अपनी लिखी कवितायें पर रविरतलामी की बात सच लगी। अपनी सारी कवितायें क्या तुकबंदी ही कहें -कूड़ा लगीं।
बहरहाल मैंने पूरे तीस पेज की पूरी कविता टाइप की तथा इसे यहां पोस्ट करते हुये सुकून हो रहा है कि हिंदी साहित्य की एक मील की पत्थर कविता मेरे माध्यम से हमारे साथियों तक पहुंच रही है। कविता लंबी है। आराम से आनन्द उठायें,बिना हड़बड़ाये हुये। देखें तमाम जगह आप महसूस करेंगे कि बात आपको ही संबोधित करके कही गयी है।

पटकथा

जब मैं बाहर आया
मेरे हाथों में
एक कविता थी और दिमाग में
आँतों का एक्स-रे।
वह काला धब्बा
कल तक एक शब्द था;
खून के अँधेर में
दवा का ट्रेडमार्क
बन गया था।
औरतों के लिये गै़र-ज़रूरी होने के बाद
अपनी ऊब का
दूसरा समाधान ढूँढना ज़रूरी है।
मैंने सोचा !
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच/अपनी भूख को ज़िन्दा रखना/जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की/वाजिब मजबूरी है।
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच
अपनी भूख को ज़िन्दा रखना
जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की
वाजिब मजबूरी है।
मैंने सोचा और संस्कार के
वर्जित इलाकों में
अपनी आदतों का शिकार
होने के पहले ही बाहर चला आया।
बाहर हवा थी
धूप थी
घास थी
मैंने कहा आजादी…
मुझे अच्छी तरह याद है-
मैंने यही कहा था
मेरी नस-नस में बिजली
दौड़ रही थी
उत्साह में
खुद मेरा स्वर
मुझे अजनबी लग रहा था
मैंने कहा-आ-जा-दी
और दौड़ता हुआ खेतों की ओर
गया। वहाँ कतार के कतार
अनाज के अँकुए फूट रहे थे
मैंने कहा- जैसे कसरत करते हुये
बच्चे। तारों पर
चिडि़याँ चहचहा रही थीं
मैंने कहा-काँसे की बजती हुई घण्टियाँ…
खेत की मेड़ पार करते हुये
मैंने एक बैल की पीठ थपथपायी
सड़क पर जाते हुये आदमी से
उसका नाम पूछा
और कहा- बधाई…
घर लौटकर
मैंने सारी बत्तियाँ जला दीं
पुरानी तस्वीरों को दीवार से
उतारकर
उन्हें साफ किया
और फिर उन्हें दीवार पर (उसी जगह)
पोंछकर टाँग दिया।
मैंने दरवाजे के बाहर
एक पौधा लगाया और कहा–
वन महोत्सव…
और देर तक
हवा में गरदन उचका-उचकाकर
लम्बी-लम्बी साँस खींचता रहा
देर तक महसूस करता रहा–
कि मेरे भीतर
वक्त का सामना करने के लिये
औसतन ,जवान खून है
मगर ,मुझे शान्ति चाहिये
इसलिये एक जोड़ा कबूतर लाकर डाल दिया
‘गूँ..गुटरगूँ…गूँ…गुटरगूँ…’
और चहकते हुये कहा
यही मेरी आस्था है
यही मेरा कानून है।
इस तरह जो था उसे मैंने
जी भरकर प्यार किया
और जो नहीं था
उसका इंतज़ार किया।
मैंने इंतज़ार किया–
अब कोई बच्चा
भूखा रहकर स्कूल नहीं जायेगा
अब कोई छत बारिश में
नहीं टपकेगी।
अब कोई आदमी कपड़ों की लाचारी में
अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा
अब कोई दवा के अभाव में
घुट-घुटकर नहीं मरेगा
अब कोई किसी की रोटी नहीं छीनेगा
कोई किसी को नंगा नहीं करेगा
अब यह ज़मीन अपनी है
आसमान अपना है
जैसा पहले हुआ करता था…
सूर्य,हमारा सपना है
मैं इन्तजा़र करता रहा..
इन्तजा़र करता रहा…
इन्तजा़र करता रहा…
जनतन्त्र,त्याग,स्वतन्त्रता…
संस्कृति,शान्ति,मनुष्यता…
ये सारे शब्द थे
सुनहरे वादे थे
खुशफ़हम इरादे थे
सुन्दर थे
मौलिक थे
मुखर थे
मैं सुनता रहा…
सुनता रहा…
सुनता रहा…
मतदान होते रहे
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
यानी कि कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब का।
वह हमें विश्वशान्ति के और पंचशील के सूत्र
समझाता रहा। मैं खुद को
समझाता रहा-’जो मैं चाहता हूँ-
वही होगा। होगा-आज नहीं तो कल
मगर सब कुछ सही होगा।
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे/उसी लोकनायक को/बार-बार चुनता रहा/जिसके पास हर शंका और/हर सवाल का/एक ही जवाब था/यानी कि कोट के बटन-होल में /महकता हुआ एक फूल/गुलाब का
भीड़ बढ़ती रही।
चौराहे चौड़े होते रहे।
लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज
खाकर-निरापद भाव से
बच्चे जनते रहे।
योजनायेँ चलती रहीं
बन्दूकों के कारखानों में
जूते बनते रहे।
और जब कभी मौसम उतार पर
होता था। हमारा संशय
हमें कोंचता था। हम उत्तेजित होकर
पूछते थे -यह क्या है?
ऐसा क्यों है?
फिर बहसें होतीं थीं
शब्दों के जंगल में
हम एक-दूसरे को काटते थे
भाषा की खाई को
जुबान से कम जूतों से
ज्यादा पाटते थे
फिर बहसें होतीं थीं/
शब्दों के जंगल में/हम एक-दूसरे को काटते थे/भाषा की खाई को/जुबान से कम जूतों से/ज्यादा पाटते थे
कभी वह हारता रहा…
कभी हम जीतते रहे…
इसी तरह नोक-झोंक चलती रही
दिन बीतते रहे…
मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया।
मेरा सारा धीरज
युद्ध की आग से पिघलती हुयी बर्फ में
बह गया।
मैंने देखा कि मैदानों में
नदियों की जगह
मरे हुये साँपों की केंचुलें बिछी हैं
पेड़-टूटे हुये रडार की तरह खड़े हैं
दूर-दूर तक
कोई मौसम नहीं है
लोग-
घरों के भीतर नंगे हो गये हैं
और बाहर मुर्दे पड़े हैं
विधवायें तमगा लूट रहीं हैं
सधवायें मंगल गा रहीं हैं
वन-महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियाँ
अकाल का लंगर चला रही हैं
जगह-जगह तख्तियाँ लटक रहीं हैं-
‘यह श्मशान है,यहाँ की तश्वीर लेना
सख्त मना है।’
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच/अपनी भूख को ज़िन्दा रखना/जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की/वाजिब मजबूरी है।
फिर भी उस उजाड़ में
कहीं-कहीं घास का हरा कोना
कितना डरावना है
मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का
सबसे बड़ा बौद्ध- मठ
बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है
अखबार के मटमैले हासिये पर
लेटे हुये ,एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का
शांतिवाद ,नाम है
यह मेरा देश है…
यह मेरा देश है…
हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक
फैला हुआ
जली हुई मिट्टी का ढेर है
जहाँ हर तीसरी जुबान का मतलब-
नफ़रत है।
साज़िश है।
अन्धेर है।
यह मेरा देश है
और यह मेरे देश की जनता है
जनता क्या है?
एक शब्द…सिर्फ एक शब्द है:
कुहरा,कीचड़ और कांच से
बना हुआ…
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठण्ड के लिये
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है।
जनता क्या है?
एक शब्द…सिर्फ एक शब्द है:/कुहरा,कीचड़ और कांच से/ बना हुआ…/एक भेड़ है/जो दूसरों की ठण्ड के लिये/अपनी पीठ पर/ऊन की फसल ढो रही है
एक पेड़ है
जो ढलान पर
हर आती-जाती हवा की जुबान में
हाँऽऽ..हाँऽऽ करता है
क्योंकि अपनी हरियाली से
डरता है।
गाँवों में गन्दे पनालों से लेकर
शहर के शिवालों तक फैली हुई
‘कथाकलि’ की अंमूर्त मुद्रा है
यह जनता…
उसकी श्रद्धा अटूट है
उसको समझा दिया गया है कि यहाँ
ऐसा जनतन्त्र है जिसमें
घोड़े और घास को
एक-जैसी छूट है
कैसी विडम्बना है
कैसा झूठ है
दरअसल, अपने यहाँ जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
दरअसल, अपने यहाँ जनतन्त्र/एक ऐसा तमाशा है/जिसकी जान/मदारी की भाषा है।
हर तरफ धुआँ है
हर तरफ कुहासा है
जो दाँतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अन्धकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहाँ
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिये,सबसे भद्दी गाली है
हर तरफ कुआँ है
हर तरफ खाई है
यहाँ,सिर्फ ,वह आदमी,देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है
यहाँ,सिर्फ ,वह आदमी,देश के करीब है/जो या तो मूर्ख है/या फिर गरीब है
मैं सोचता रहा
और घूमता रहा-
टूटे हुये पुलों के नीचे
वीरान सड़कों पर आँखों के
अंधे रेगिस्तानों में
फटे हुये पालों की
अधूरी जल-यात्राओं में
टूटी हुई चीज़ों के ढेर में
मैं खोयी हुई आजादी का अर्थ
ढूँढता रहा।
अपनी पसलियों के नीचे /अस्पतालों के
बिस्तरों में/ नुमाइशों में
बाजारों में /गाँवों में
जंगलों में /पहाडों पर
देश के इस छोर से उस छोर तक
उसी लोक-चेतना को
बार-बार टेरता रहा
जो मुझे दोबारा जी सके
जो मुझे शान्ति दे और
मेरे भीतर-बाहर का ज़हर
खुद पी सके।
–और तभी सुलग उठा पश्चिमी सीमान्त
…ध्वस्त…ध्वस्त…ध्वान्त…ध्वान्त…
मैं दोबार चौंककर खड़ा हो गया
जो चेहरा आत्महीनता की स्वीकृति में
कन्धों पर लुढ़क रहा था,
किसी झनझनाते चाकू की तरह
खुलकर,कड़ा हो गया…
अचानक अपने-आपमें जिन्दा होने की
यह घटना
इस देश की परम्परा की -
एक बेमिशाल कड़ी थी
लेकिन इसे साहस मत कहो
दरअस्ल,यह पुट्ठों तक चोट खायी हुई
गाय की घृणा थी
(जिंदा रहने की पुरजो़र कोशिश)
जो उस आदमखोर की हवस से
बड़ी थी।
मगर उसके तुरन्त बाद
मुझे झेलनी पड़ी थी-सबसे बड़ी ट्रैजेडी
अपने इतिहास की
जब दुनिया के स्याह और सफेद चेहरों ने
विस्मय से देखा कि ताशकन्द में
समझौते की सफेद चादर के नीचे
एक शान्तियात्री की लाश थी
और अब यह किसी पौराणिक कथा के
उपसंहार की तरह है कि इसे देश में
रोशनी उन पहाड़ों से आई थी
जहाँ मेरे पडो़सी ने
मात खायी थी।
मगर मैं फिर वहीं चला गया
अपने जुनून के अँधेरे में
फूहड़ इरादों के हाथों
छला गया।
वहाँ बंजर मैदान
कंकालों की नुमाइश कर रहे थे
गोदाम अनाजों से भरे थे और लोग
भूखों मर रहे थे
मैंने महसूस किया कि मैं वक्त के
एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूँ
अब ऐसा वक्त आ गया है जब कोई
किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है
अब न तो कोई किसी का खाली पेट
देखता है, न थरथराती हुई टाँगें
और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कन्धा’ देखता है
हर आदमी,सिर्फ, अपना धन्धा देखता है
सबने भाईचारा भुला दिया है
आत्मा की सरलता को भुलाकर
मतलब के अँधेरे में (एक राष्ट्रीय मुहावरे की बगल में)
सुला दिया है।
सहानुभूति और प्यार
अब ऐसा छलावा है जिसके ज़रिये
एक आदमी दूसरे को,अकेले –
अँधेरे में ले जाता है और
उसकी पीठ में छुरा भोंक देता है
ठीक उस मोची की तरह जो चौक से
गुजरते हुये देहाती को
प्यार से बुलाता है और मरम्मत के नाम पर
रबर के तल्ले में
लोहे के तीन दर्जन फुल्लियाँ
ठोंक देता है और उसके नहीं -नहीं के बावजूद
डपटकर पैसा वसूलता है
गरज़ यह है कि अपराध
अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है
जो आत्मीयता की खाद पर
लाल-भड़क फूलता है
अपराध/अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है/जो आत्मीयता की खाद पर/लाल-भड़क फूलता है
मैंने देखा कि इस जनतांत्रिक जंगल में
हर तरफ हत्याओं के नीचे से निकलते है
हरे-हरे हाथ,और पेड़ों पर
पत्तों की जुबान बनकर लटक जाते हैं
वे ऐसी भाषा बोलते हैं जिसे सुनकर
नागरिकता की गोधूलि में
घर लौटते मुशाफिर अपना रास्ता भटक जाते हैं।
उन्होंने किसी चीज को
सही जगह नहीं रहने दिया
न संज्ञा
न विशेषण
न सर्वनाम
एक समूचा और सही वाक्य
टूटकर
‘बि ख र’ गया है
उनका व्याकरण इस देश की
शिराओं में छिपे हुये कारकों का
हत्यारा है
उनकी सख्त पकड़ के नीचे
भूख से मरा हुआ आदमी
इस मौसम का
सबसे दिलचस्प विज्ञापन है और गाय
सबसे सटीक नारा है
वे खेतों मेंभूख और शहरों में
अफवाहों के पुलिंदे फेंकते हैं
भूख से मरा हुआ आदमी/
इस मौसम का /सबसे दिलचस्प विज्ञापन है और गाय/सबसे सटीक नारा है
देश और धर्म और नैतिकता की
दुहाई देकर
कुछ लोगों की सुविधा
दूसरों की ‘हाय’पर सेंकते हैं
वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं
उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है
वे मुस्कराते हैं और
दूसरे की आँख में झपटती हुई प्रतिहिंसा
करवट बदलकर सो जाती है
मैं देखता रहा…
देखता रहा…
हर तरफ ऊब थी
संशय था
नफरत थी
मगर हर आदमी अपनी ज़रूरतों के आगे
असहाय था। उसमें
सारी चीज़ों को नये सिरे से बदलने की
बेचैनी थी ,रोष था
लेकिन उसका गुस्सा
एक तथ्यहीन मिश्रण था:
आग और आँसू और हाय का।
इस तरह एक दिन-
जब मैं घूमते-घूमते थक चुका था
मेरे खून में एक काली आँधी-
दौड़ लगा रही थी
मेरी असफलताओं में सोये हुये
वहसी इरादों को
झकझोरकर जगा रही थी
अचानक ,नींद की असंख्य पर्तों में
डूबते हुये मैंने देखा
मेरी उलझनों के अँधेरे में
एक हमशक्ल खड़ा है
मैंने उससे पूछा-’तुम कौन हो?
यहाँ क्यों आये हो?
तुम्हें क्या हुआ है?’
‘तुमने पहचाना नहीं-मैं हिंदुस्तान हूँ
हाँ -मैं हिंदुस्तान हूँ’,
वह हँसता है-ऐसी हँसी कि दिल
दहल जाता है
कलेजा मुँह को आता है
और मैं हैरान हूँ
‘यहाँ आओ
मेरे पास आओ
मुझे छुओ।
मुझे जियो। मेरे साथ चलो
मेरा यकीन करो। इस दलदल से
बाहर निकलो!
सुनो!
तुम चाहे जिसे चुनो
मगर इसे नहीं। इसे बदलो।
मुझे लगा-आवाज़
जैसे किसी जलते हुये कुएँ से
आ रही है।
एक अजीब-सी प्यार भरी गुर्राहट
जैसे कोई मादा भेड़िया
अपने छौने को दूध पिला रही है
साथ ही किसी छौने का सिर चबा रही है
एक अजीब-सी प्यार भरी गुर्राहट /जैसे कोई मादा भेड़िया/अपने छौने को दूध पिला रही है/साथ ही किसी छौने का सिर चबा रही है
मेरा सारा जिस्म थरथरा रहा था
उसकी आवाज में
असंख्य नरकों की घृणा भरी थी
वह एक-एक शब्द चबा-चबाकर
बोल रहा था। मगर उसकी आँख
गुस्से में भी हरी थी
वह कह रहा था-
‘तुम्हारी आँखों के चकनाचूर आईनों में
वक्त की बदरंग छायाएँ उलटी कर रही हैं
और तुम पेड़ों की छाल गिनकर
भविष्य का कार्यक्रम तैयार कर रहे हो
तुम एक ऐसी जिन्दगी से गुज़र रहे हो
जिसमें न कोई तुक है
न सुख है
तुम अपनी शापित परछाई से टकराकर
रास्ते में रुक गये हो
तुम जो हर चीज़
अपने दाँतों के नीचे
खाने के आदी हो
चाहे वह सपना अथवा आज़ादी हो
अचानक ,इस तरह,क्यों चुक गये हो
वह क्या है जिसने तुम्हें
बर्बरों के सामने अदब से
रहना सिखलाया है?
क्या यह विश्वास की कमी है
जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गयी है
या कि शर्म
अब तुम्हारी सहूलियत बन गयी है
नहीं-सरलता की तरह इस तरह
मत दौड़ो
उसमें भूख और मन्दिर की रोशनी का
रिश्ता है। वह बनिये की पूँजी का
आधार है
मैं बार-बार कहता हूँ कि इस उलझी हुई
दुनिया में
आसानी से समझ में आने वाली चीज़
सिर्फ दीवार है।
और यह दीवार अब तुम्हारी आदत का
हिस्सा बन गयी है
इसे झटककर अलग करो
अपनी आदतों में
फूलों की जगह पत्थर भरो
मासूमियत के हर तकाज़े को
ठोकर मार दो
अब वक्त आ गया है तुम उठो
और अपनी ऊब को आकार दो।
क्या यह विश्वास की कमी है/जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गयी है/या कि शर्म /अब तुम्हारी सहूलियत बन गयी है
‘सुनो !
आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ
जिसके आगे हर सचाई
छोटी है। इस दुनिया में
भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क
रोटी है।
मगर तुम्हारी भूख और भाषा में
यदि सही दूरी नहीं है
तो तुम अपने-आपको आदमी मत कहो
क्योंकि पशुता -
सिर्फ पूँछ होने की मज़बूरी नहीं है
वह आदमी को वहीं ले जाती है
जहाँ भूख
सबसे पहले भाषा को खाती है
वक्त सिर्फ उसका चेहरा बिगाड़ता है
जो अपने चेहरे की राख
दूसरों की रूमाल से झाड़ता है
जो अपना हाथ
मैला होने से डरता है
वह एक नहीं ग्यारह कायरों की
मौत मरता है
जो अपना हाथ/मैला होने से डरता है/वह एक नहीं ग्यारह कायरों की /मौत मरता है
और सुनो! नफ़रत और रोशनी
सिर्फ़ उनके हिस्से की चीज़ हैं
जिसे जंगल के हाशिये पर
जीने की तमीज है
इसलिये उठो और अपने भीतर
सोये हुए जंगल को
आवाज़ दो
उसे जगाओ और देखो-
कि तुम अकेले नहीं हो
और न किसी के मुहताज हो
लाखों हैं जो तुम्हारे इन्तज़ार में खडे़ हैं
वहाँ चलो।उनका साथ दो
और इस तिलस्म का जादू उतारने में
उनकी मदद करो और साबित करो
कि वे सारी चीज़ें अन्धी हो गयीं हैं
जिनमें तुम शरीक नहीं हो…’
तुम अकेले नहीं हो/और न किसी के मुहताज हो/लाखों हैं जो तुम्हारे इन्तज़ार में खडे़ हैं/वहाँ चलो।उनका साथ दो
मैं पूरी तत्परता से उसे सुन रहा था
एक के बाद दूसरा
दूसरे के बाद तीसरा
तीसरे के बाद चौथा
चौथे के बाद पाँचवाँ…
यानी कि एक के बाद दूसरा विकल्प
चुन रहा था
मगर मैं हिचक रहा था
क्योंकि मेरे पास
कुल जमा थोड़ी सुविधायें थीं
जो मेरी सीमाएँ थीं
यद्यपि यह सही है कि मैं
कोई ठण्डा आदमी नहीं है
मुझमें भी आग है-
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ
एक ‘पूँजीवादी’दिमाग है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीज़ों की शालीनता
बनी रहे।
कुछ इस तरह कि काँख भी ढकी रहे
और विरोध में उठे हुये हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे…
और यही है कि बात
फैलने की हद तक
आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार
चन्द सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है।
मैं खुद को कुरेद रहा था
हर बार/चन्द सुविधाओं के लालच के सामने/अभियोग की भाषा चुक जाती है।
अपने बहाने उन तमाम लोगों की असफलताओं को
सोच रहा था जो मेरे नजदीक थे।
इस तरह साबुत और सीधे विचारों पर
जमी हुई काई और उगी हुई घास को
खरोंच रहा था,नोंच रहा था
पूरे समाज की सीवन उधेड़ते हुये
मैंने आदमी के भीतर की मैल
देख ली थी। मेरा सिर
भिन्ना रहा था
मेरा हृदय भारी था
मेरा शरीर इस बुरी तरह थका था कि मैं
अपनी तरफ़ घूरते उस चेहरे से
थोड़ी देर के लिये
बचना चाह रहा था
जो अपनी पैनी आँखों से
मेरी बेबसी और मेरा उथलापन
थाह रहा था
प्रस्तावित भीड़ में
शरीक होने के लिये
अभी मैंने कोई निर्णय नहीं लिया था
अचानक ,उसने मेरा हाथ पकड़कर
खींच लिया और मैं
जेब में जूतों का टोकन और दिमाग में
ताजे़ अखबार की कतरन लिये हुये
धड़ाम से-
चौथे आम चुनाव की सीढ़ियों से फिसलकर
मत-पेटियों के
गड़गच्च अँधेरे में गिर पड़ा
नींद के भीतर यह दूसरी नींद है
और मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है
सिर्फ एक शोर है
जिसमें कानों के पर्दे फटे जा रहे हैं
शासन सुरक्षा रोज़गार शिक्षा …
राष्ट्रधर्म देशहित हिंसा अहिंसा…
सैन्यशक्ति देशभक्ति आजा़दी वीसा…
वाद बिरादरी भूख भीख भाषा…
शान्ति क्रान्ति शीतयुद्ध एटमबम सीमा…
एकता सीढ़ियाँ साहित्यिक पीढ़ियाँ निराशा…
झाँय-झाँय,खाँय-खाँय,हाय-हाय,साँय-साँय…
मैंने कानों में ठूँस ली हैं अँगुलियाँ
और अँधेरे में गाड़ दी है
आंखों की रोशनी।
सब-कुछ अब धीरे-धीरे खुलने लगा है
मत-वर्षा के इस दादुर-शोर में
मैंने देखा हर तरफ
रंग-बिरंगे झण्डे फहरा रहे हैं
गिरगिट की तरह रंग बदलते हुये
गुट से गुट टकरा रहे हैं
वे एक- दूसरे से दाँता-किलकिल कर रहे हैं
एक दूसरे को दुर-दुर,बिल-बिल कर रहे हैं
हर तरफ तरह -तरह के जन्तु हैं
श्रीमान्‌ किन्तु हैं
मिस्टर परन्तु हैं
कुछ रोगी हैं
कुछ भोगी हैं
कुछ हिंजड़े हैं
कुछ रोगी हैं
तिजोरियों के प्रशिक्षित दलाल हैं
आँखों के अन्धे हैं
घर के कंगाल हैं
गूँगे हैं
बहरे हैं
उथले हैं,गहरे हैं।
गिरते हुये लोग हैं
अकड़ते हुये लोग हैं
भागते हुये लोग हैं
पकड़ते हुये लोग हैं
गरज़ यह कि हर तरह के लोग हैं
एक दूसरे से नफ़रत करते हुये वे
इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में
असंख्य रोग हैं
और उनका एकमात्र इलाज-
चुनाव है।
हर तरह के लोग हैं/एक दूसरे से नफ़रत करते हुये वे/इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में/असंख्य रोग हैं/और उनका एकमात्र इलाज-/ चुनाव है।
लेकिन मुझे लगा कि एक विशाल दलदल के किनारे
बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है
उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है
जिससे लगातार-भयानक बदबूदार मवाद
बह रहा है
उसमें जाति और धर्म और सम्प्रदाय और
पेशा और पूँजी के असंख्य कीड़े
किलबिला रहे हैं और अन्धकार में
डूबी हुई पृथ्वी
(पता नहीं किस अनहोनी की प्रतीक्षा में)
इस भीषण सड़ाँव को चुपचाप सह रही है
मगर आपस में नफरत करते हुये वे लोग
इस बात पर सहमत हैं कि
‘चुनाव’ ही सही इलाज है
क्योंकि बुरे और बुरे के बीच से
किसी हद तक ‘कम से कम बुरे को’ चुनते हुये
न उन्हें मलाल है,न भय है
न लाज है
दरअस्ल उन्हें एक मौका मिला है
और इसी बहाने
वे अपने पडो़सी को पराजित कर रहे हैं
मैंने देखा कि हर तरफ
मूढ़ता की हरी-हरी घास लहरा रही है
जिसे कुछ जंगली पशु
खूँद रहे हैं
लीद रहे हैं
चर रहे है
मैंने ऊब और गुस्से को
गलत मुहरों के नीचे से गुज़रते हुये देखा
मैंने अहिंसा को
एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुये देखा
मैंने ईमानदारी को अपनी चोरजेबें
भरते हुये देखा
मैंने विवेक को
चापलूसों के तलवे चाटते हुये देखा…
मैंने अहिंसा को/एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुये देखा/मैंने ईमानदारी को अपनी चोरजेबें/भरते हुये देखा/मैंने विवेक को/चापलूसों के तलवे चाटते हुये देखा…
मैं यह सब देख ही रहा था कि एक नया रेला आया
उन्मत्त लोगों का बर्बर जुलूस। वे किसी आदमी को
हाथों पर गठरी की तरह उछाल रहे थे
उसे एक दूसरे से छीन रहे थे।उसे घसीट रहे थे।
चूम रहे थे।पीट रहे थे। गालियाँ दे रहे थे।
गले से लगा रहे थे। उसकी प्रशंसा के गीत
गा रहे थे। उस पर अनगिनत झण्डे फहरा रहे थे।
उसकी जीभ बाहर लटक रही थी। उसकी आँखें बन्द
थीं। उसका चेहरा खून और आँसू से तर था।’मूर्खों!
यह क्या कर रहे हो?’ मैं चिल्लाया। और तभी किसी ने
उसे मेरी ओर उछाल दिया। अरे यह कैसे हुआ?
मैं हतप्रभ सा खड़ा था
और मेरा हमशक्ल
मेरे पैरों के पास
मूर्च्छित- सा
पड़ा था-
दुख और भय से झुरझुरी लेकर
मैं उस पर झुक गया
किन्तु बीच में ही रुक गया
उसका हाथ ऊपर उठा था
खून और आँसू से तर चेहरा
मुस्कराया था। उसकी आँखों का हरापन
उसकी आवाज में उतर आया था-
‘दुखी मत हो। यह मेरी नियति है।
मैं हिन्दुस्तान हूँ। जब भी मैंने
उन्हें उजाले से जोड़ा है
उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है
इसी तरह तोड़ा है
मगर समय गवाह है
कि मेरी बेचैनी के आगे भी राह है।’
‘दुखी मत हो/ यह मेरी नियति है/मैं हिन्दुस्तान हूँ/ जब भी मैंने उन्हें उजाले से जोड़ा है/उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है/इसी तरह तोड़ा है/मगर समय गवाह है/कि मेरी बेचैनी के आगे भी राह है।’
मैंने सुना। वह आहिस्ता-आहिस्ता कह रहा है
जैसे किसी जले हुये जंगल में
पानी का एक ठण्डा सोता बह रहा है
घास की की ताजगी- भरी
ऐसी आवाज़ है
जो न किसी से खुश है,न नाराज़ है।
‘भूख ने उन्हें जानवर कर दिया है
संशय ने उन्हें आग्रहों से भर दिया है
फिर भी वे अपने हैं…
अपने हैं…
अपने हैं…
जीवित भविष्य के सुन्दरतम सपने हैं
नहीं-यह मेरे लिये दुखी होने का समय
नहीं है।अपने लोगों की घृणा के
इस महोत्सव में
मैं शापित निश्चय हूँ
‘भूख ने उन्हें जानवर कर दिया है/संशय ने उन्हें आग्रहों से भर दिया है/फिर भी वे अपने हैं…/जीवित भविष्य के सुन्दरतम सपने हैं’
मुझे किसी का भय नहीं है।
‘तुम मेरी चिंता न करो। उनके साथ
चलो। इससे पहले कि वे
गलत हाथों के हथियार हों
इससे पहले कि वे नारों और इस्तहारों से
काले बाजा़र हों
उनसे मिलो।उन्हें बदलो।
नहीं-भीड़ के खिलाफ रुकना
एक खूनी विचार है
क्योंकि हर ठहरा हुआ आदमी
इस हिंसक भीड़ का
अन्धा शिकार है।
तुम मेरी चिन्ता मत करो।
मैं हर वक्त सिर्फ एक चेहरा नहीं हूँ
जहाँ वर्तमान
अपने शिकारी कुत्ते उतारता है
अक्सर में मिट्टी की हरक़त करता हुआ
वह टुकड़ा हूँ
जो आदमी की शिराओं में
बहते हुये खू़न को
उसके सही नाम से पुकारता हूँ
इसलिये मैं कहता हूँ,जाओ ,और
देखो कि लोग…
भीड़ के खिलाफ रुकना/
एक खूनी विचार है/क्योंकि हर ठहरा हुआ आदमी/इस हिंसक भीड़ का /अन्धा शिकार है।
मैं कुछ कहना चाहता था कि एक धक्के ने
मुझे दूर फेंक दिया। इससे पहले कि मैं गिरता
किन्हीं मजबूत हाथों ने मुझे टेक लिया।
अचानक भीड़ में से निकलकर एक प्रशिक्षित दलाल
मेरी देह में समा गया। दूसरा मेरे हाथों में
एक पर्ची थमा गया। तीसरे ने एक मुहर देकर
पर्दे के पीछे ढकेल दिया।
भय और अनिश्चय के दुहरे दबाव में
पता नहीं कब और कैसे और कहाँ–
कितने नामों से और चिन्हों और शब्दों को
काटते हुये मैं चीख पड़ा-
‘हत्यारा!हत्यारा!!हत्यारा!!!’
मुझे ठीक ठीक याद नहीं है।मैंने यह
किसको कहा था। शायद अपने-आपको
शायद उस हमशक्ल को(जिसने खुद को
हिन्दुस्तान कहा था) शायद उस दलाल को
मगर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है
मेरी नींद टूट चुकी थी
मेरा पूरा जिस्म पसीने में
सराबोर था। मेरे आसपास से
तरह-तरह के लोग गुजर रहे थे।
हर तरफ हलचल थी,शोर था।
और मैं चुपचाप सुनता हूँ
हाँ शायद -
मैंने भी अपने भीतर
(कहीं बहुत गहरे)
‘कुछ जलता हुआ सा ‘ छुआ है
लेकिन मैं जानता हूँ कि जो कुछ हुआ है
नींद में हुआ है
और तब से आजतक
नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये
मैंने कई रातें जागकर गुजा़र दीं हैं
हफ्तों पर हफ्ते तह किये हैं
अपनी परेशानी के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिये हैं।
और हर बार मुझे लगा है कि कहीं
कोई खास फ़र्क़ नहीं है
ज़िन्दगी उसी पुराने ढर्रे पर चल रही है
जिसके पीछे कोई तर्क नहीं है
हाँ ,यह सही है कि इन दिनों
कुछ अर्जियाँ मँजूर हुई हैं
कुछ तबादले हुये हैं
कल तक जो थे नहले
आज
दहले हुये हैं
हाँ यह सही है कि
मन्त्री जब प्रजा के सामने आता है
तो पहले से ज्यादा मुस्कराता है
नये-नये वादे करता है
और यह सिर्फ़ घास के
सामने होने की मजबूरी है
वर्ना उस भले मानुस को
यह भी पता नहीं कि विधानसभा भवन
और अपने निजी बिस्तर के बीच
कितने जूतों की दूरी है।
मन्त्री जब प्रजा के सामने आता है/तो पहले से ज्यादा मुस्कराता है/नये-नये वादे करता है/और यह सिर्फ़ घास के/सामने होने की मजबूरी है
वर्ना उस भले मानुस को /यह भी पता नहीं कि विधानसभा भवन/और अपने निजी बिस्तर के बीच /कितने जूतों की दूरी है।
हाँ यह सही है कि इन दिनों -चीजों के
भाव कुछ चढ़ गये हैं।अखबारों के
शीर्षक दिलचस्प हैं,नये हैं।
मन्दी की मार से
पट पड़ी हुई चीज़ें ,बाज़ार में
सहसा उछल गयीं हैं
हाँ यह सही है कि कुर्सियाँ वही हैं
सिर्फ टोपियाँ बदल गयी हैं और-
सच्चे मतभेद के अभाव में
लोग उछल-उछलकर
अपनी जगहें बदल रहे हैं
चढ़ी हुई नदी में
भरी हुई नाव में
हर तरफ ,विरोधी विचारों का
दलदल है
सतहों पर हलचल है
नये-नये नारे हैं
भाषण में जोश है
पानी ही पानी है
पर
की
च
ड़
खामोश है
मैं रोज देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का
एक पुर्जा़ गरम होकर
अलग छिटक गया है और
ठण्डा होते ही
फिर कुर्सी से चिपक गया है
उसमें न हया है
न दया है
मैं रोज देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का/एक पुर्जा़ गरम होकर/अलग छिटक गया है और/ठण्डा होते ही/फिर कुर्सी से चिपक गया है
नहीं-अपना कोई हमदर्द
यहाँ नहीं है। मैंने एक-एक को
परख लिया है।
मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाजा खटखटाया है
मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ
उठायी है उसको मादा
पाया है।
वे सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं । लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि-
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।
मैंने एक-एक को परख लिया है/मैंने हरेक को आवाज़ दी है/हरेक का दरवाजा खटखटाया है/मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ उठायी है /उसको मादा
पाया है।
भूख और भूख की आड़ में
चबायी गयी चीजों का अक्स
उनके दाँतों पर ढूँढना
बेकार है। समाजवाद
उनकी जुबान पर अपनी सुरक्षा का
एक आधुनिक मुहावरा है।
मगर मैं जानता हूँ कि मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है।
मेरे देश का समाजवाद/
मालगोदाम में लटकती हुई /उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है/और उनमें बालू और पानी भरा है।
यहाँ जनता एक गाड़ी है
एक ही संविधान के नीचे
भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम
‘दया’ है
और भूख में
तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलबाड़ी है।
मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है/जिसमें आधा तेल है/और आधा पानी है/
मैं अक्सर अपने-आपसे सवाल
करता हूँ जिसका मेरे पास
कोई उत्तर नहीं है
और आज तक –
नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये
मैंने कई रातें जागकर गुजार दी हैं
हफ्ते पर हफ्ते तह किये हैं। ऊब के
निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण
जिये हैं।
मेरे सामने वही चिरपरिचित अन्धकार है
संशय की अनिश्चयग्रस्त ठण्डी मुद्रायें हैं
हर तरफ शब्दभेदी सन्नाटा है।
दरिद्र की व्यथा की तरह
उचाट और कूँथता हुआ। घृणा में
डूबा हुआ सारा का सारा देश
पहले की तरह आज भी
मेरा कारागार है।
-धूमिल
Popularity: 4% [?]

16 responses to “थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता”

  1. विनय
    वाह! आह! आउच!
  2. विनय
    पिछले अस्पष्ट संदेश के लिए माफ़ी. पर यही स्थिति हुई इस स्तब्धकारी कविता को पढ़ने के बाद.

    क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ
    एक ‘पूँजीवादी’दिमाग है
    जो परिवर्तन तो चाहता है
    मगर आहिस्ता-आहिस्ता
    कुछ इस तरह कि चीज़ों की शालीनता
    बनी रहे।

    आउच! तीखी, करारी, सीधी चोट.
    अनूप को ढेरों साधुवाद यह ३०-पृष्ठीय कालजयी कविता टाइप कर नेट पर प्रकाशित करने के लिए.
  3. e-shadow
    बाप रे बाप, इतनी लंबी कविता…. आपका स्टेमिना जबरदस्त है.. वैसे हमेशा की तरह लेख जानदार है
  4. Theluwa
    Aisee kavitayen hamen samajh nahin aati.
    Kisi ko sunaanee padegee, tab samjhenge.
  5. अनूप भार्गव
    इतनी सटीक और चुभती हुई बात पहले नहीं पढी ।
    बहुत बहुत धन्यवाद …
  6. समीर लाल
    बहुत जबरदस्त, आपकी मेहनत जो आपने टाईपिंग करने मे लगाई होगी, पूर्णतः सफ़ल रही.
    आगे भी ऎसे ही श्रृंखला बनाये रहें, यही अभिलाषा है.
    बहुत बहुत धन्यवाद.
  7. आशीष
    फुरसतियाजी,
    इन कविताऒ को रवीजी के रचनाकार पर भी डाल दे!
    आशीष
  8. रवि
    भड़ौती और थेथरई के चक्कर में तो, कथाकार राजेन्द्र यादव भी स्वीकारते हैं कि अपने रचनाकारिता के आरंभिक दिनों में वे यही करते रहे हैं.
    वे अभी भी दुविधा में हैं कि उनके द्वारा किशोर वय में लिखा गया अब तक अप्रकाशित उपन्यास प्रकाशित करें या नहीं – वे समझते हैं उसमें भड़ौती थेथरई सब कुछ है. गहराई के सिवाय.
    जबकि मैं समझता हूँ कि जब वह उपन्यास प्रकाशित होगा, तो वह सर्वाधिक चर्चित होगा – एक स्थापित कथाकार के किशोरवय की मनोस्थितियों को चित्रित करता उपन्यास – क्योंकि आमतौर पर आदमी की रचनाओं में भोगा हुआ यथार्थ तो दिखाई दे ही जाता है.
    तो, रचनाकारिता में परिपक्वता, समय के साथ ही आती है.
    एक बात और, जब आप प्रसिद्ध हो जाते हैं – हुसैन या मुक्तिबोध की तरह, तो जो कुछ भी रचते हैं- तो उसमें हजारों गहराई वाले अर्थ आपके आलोचक निकाल लेते हैं और आपको महान सिद्ध कर देते हैं.
    भले ही आपने कूची से रंग यूँ ही फेंक दिया हो या सीधी सपाट दो लाइनें लिख दी हों.
    और, जब निराला ने तुकबंदी छोड़ने की शुरूआत की तो क्या कम गालियाँ उन्हें मिलीं थीं?
    दुष्यंत को पारंपरिक ग़ज़लकारों ने कितना गरियाया था?
    कुल मिलाकर, सारी बातें रिलेटिव ही प्रतीत होती हैं.
    ऐसे में, आपकी लिखी कविताएँ भी कम नहीं हैं.
    बहरहाल, धूमिल की इस लंबी कविता को रचनाकार में पुनःप्रकाशित करने की अनुमति देंगे.
  9. ratna
    अनूप जी, आरम्भ में धूमिल जी का मादायों पर कायरता का आरोप दुखद लगा पर ज्यों-ज्यों उनकी पूरी कविता को पढ़ा तो दुख और खुशी के भाव उनके विचारों की आग में झुलस कर स्वाह हो गए और मैं देर तक संज्ञा शुन्य हुई उस की तपिश को महसूस करती रही । इतनी आग समेटे कैसे जीते थे धुमिल जी । इस अमुल्य निधी को खोज कर लाने औऱ उसकी चमक दिखाने व हीरे और काँच का फरक बताने का धन्यवाद मेरे आभार का तोल इस बात से करिए कि इसे टाइप करने में मुझे बीस मिनिट लगे है।—–ऱत्ना.
  10. प्रेमलता पांडे
    कविता पढकर लगा मानो धधकते ज्वालामुखी में बैठकर कोई ऋषि तपस्या कर रहा हो और दूसरा (आप) साथ खड़ा हॊ।
    यह जन्मे कवि की अमर कविता है। धन्यवाद।
    शुभेच्छु
    प्रेमलता
    (थेथरई मलाई का प्रयोग चिकनाई रहित दूध की मलाई के लिए भी प्रयुक्त होता है-यह किसी हलावाई ने बताया है)
  11. अतुल
    हमने सिर्फ एक शब्द का अर्थ पूछा था, बदले में अमूल्य निधि मिली पढ़ने को। तृप्त हुये गुरुदेव।
  12. eswami
    सबसे पहले ब्लागिंग की विधा को सार्थक करती इस पोस्ट के लिए बधाई! लेकिन फ़िलहाल धन्यवाद करने से अधिक शिकायत करने के मूड मे हूं.
    किताबों के ढेर में दफ़्न इस जीवंत कविता को आप तब सामने क्यों नही लाए जब मैं आज के (अ)कवियों, (अ)श्रोताओं की चलते कविता की आत्मा के निकल चुकने का प्रलाप कर रहा था? तब विजय ठाकुर कविता के बचाव में उपलब्ध थे! हां तब आपने दूसरे कवियों की पंक्तियों से अपनी बात कही थी लेकिन मेरे दोबारा रोने गाने के बावजूद यह कविता बाहर नही आई!
    ये वो कविता है जो मेरे लिये लिखी गई थी – जिसे पढने के लिए मैं बेताब हो रहा था और जिसके अनुपलब्ध होने पर मैने कह दिया था “कविता मर गई”!
    रवि भाई ऐसी निधि रचनाकार पर डालना आपका अधिकार भी है कर्तव्य भी! :)
  13. abha
    अच्छा शब्द पूछा मैने, हेहर. हेहर में से निकला थेथर ,थेथर से निकली इतनी बड़ी पोस्ट, पोस्ट में टाईप हुई इतनी बड़ी कविता , कविता में से निकले तरह तरह के चेहरे:) कमाल के आदमी हैं अनूप शुक्ल :)
  14. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] बोले- तथास्तु 3.धूमिल की कवितायें 4.थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ [...]
  15. चंदन कुमार मिश्र
    ‘बि ख र’…यह कविता है या हिन्दुस्तान का लोकतांत्रिक इतिहास? आपको बहुत बहुत धन्यवाद इसके लिए। यह कविता…इतिहास के प्रोफ़ेसरों की हजार किताबों से बेहतर है…और…जिंदा कविता है…
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..जय हे गांधी ! हे करमचंद !! (कविता)
  16. चंदन कुमार मिश्र
    हाँ…भोजपुरी में हम पौधे को बेहाया कहते हैं…जिसे कहीं फेंक दे…दिवाल पर…छत पर…कहीं भी…एक डंठल तोड़कर तो लग जाता है…बेहया शायद यहीं से होगा…थेथर एक शब्द है…जिसका इस्तेमाल १००० में ९९९ बार काबिल लोग करते हैं, जो वास्तव में बिलकुल काबिल नहीं होते…जब उनके पास तर्क नहीं होता…उनके अहम् को धक्का लगता है…वे कहते हैं…थेंथरई मत कर…
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..जय हे गांधी ! हे करमचंद !! (कविता)

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