Wednesday, May 24, 2006

एक पोस्ट हवाई अड्डे से

http://web.archive.org/web/20110925195554/http://hindini.com/fursatiya/archives/134

एक पोस्ट हवाई अड्डे से

बहुत दिन से हुये हमने घोषणा की थी देबाशीष को तीन किताबें देने के लिये। पोस्ट आफिस घर के एकदम पास होने के बावजूद हम किताबें पोस्ट नहीं कर पाये। आज सोचा खुद ही दे आते हैं। सो हम चले किताबें लेकर पूना की तरफ। कानपुर से लखनऊ टैक्सी से तथा लखनऊ से दिल्ली सबेरे हवाई जहाज से आ गये।
अब इस समय पूना जाने के लिये लिये मुम्बई के हवाई जहाज का इंतजार किया जा रहा है।
पूना जाने के लिये मुम्बई का जहाज हमारे ट्रैवेल एजेंट की मेहबानी से मिला। असल में मेरा जाने का कार्यक्रम अचानक बना । ट्रैवेल एजेंट ने टिकट भी तुरंत दे दिया। हम दिल्ली भी सकुशल आ गये। दिल्ली में अपने दोस्त पाठक जी से भी मिले तथा नंदकिशोर तिवारी से भी। पाठक हमारे कालेज के साथी हैं तथा फिलहाल एनसीसी आफिस में अधिकारी हैं। नंदकिशोर पत्रकार हैं तथा शीघ्र ही किसी दिन किसी अखबार के सम्पादक हो जायें तो अचरज उन्हें भले हो हमें न होगा।
तो हम गये पाठक जी के दर्शन करने के लिये तथा दोनों के दर्शनों के लिये नंदू को बुला लिया। वहां बैठते ही बात आरक्षण पर आ गयी। किसी ने डायलाग मारा -ठाकुरों से हमारा विश्वास उठ गया है । जब पाया आरक्षण बढ़ा दिया।बहरहाल हम करीब घंटा भर गपियाने-बतियाने चाय-पान के बाद निकल लिये। इस बीच नंदकिशोर ने पता नहीं किसको बताया-तुम कपिल सिब्बल को कवर कर लो,तुम फलाने को कवर कर लो। हम थोड़ा व्यस्त हैं।
हमने इसे हवा-पानी दिखाने का प्रयास मानते हुये कहा-नहीं,बालक तुम निकलो। फिर हम सब निकल आये।
खैर,जब हम हवाई अड्डे आये तो चार बजे थे। करीब घंटा भर हम हवाई अड्डे के ही कैफे से कुछ ब्लाग पर कमेंट करते रहे। देखा जाये तो ५० रुपया प्रति घंटा की दर की किसी सेवा से हम पहली बार कमेंट कर रहे थे। तो यह बात जीतू तथा प्रत्यक्षा को समझनी चाहिये कि उनके ब्लाग पर आज के कमेंट कितने मूल्यवान हैं।
हमने तो यह भी सोचा था कि पोस्ट भी लिखा जाय लेकिन उड़ान का समय छह बजे था सो हम साढ़े पांच बजे चले अपनी सीट टटोलने।
सीट के लिये जब हमने टिकटें बढ़ाई काउंटर की तरफ तो हमें देखा गया गहराई से तथा बताया गया -ये फ्लाइट तो चली गयी चार बजे। ये छह बजे का टाइम किसने बताया आपको?हमने चेहरे पर अवसरानुकूल दीनता चिपकाते हुये माजरा बयान किया कि हमारी टिकट पर छह बजे लिखा है फ्लाइट का समय तो हम उसी के हिसाब से आये हैं। अब आप बतायें कि क्या कर सकते हैं?
खैर हमें ज्यादा शहीदाना गौरव का हक न देते हमारी टिकट रात की दिल्ली -मुम्बई फ्लाइट में कर दी गयी। मुम्बई इसलिये क्योंकि पूना के लिये अगली फ्लाइट कल शाम को ही है तथा हमारी काम वहां कल सबेरे है।इसके बाद हमने लखनऊ अपने दोस्त गिरिजेशमाथुर को फोन किया लखनऊ जो कि लखनऊ से उसी फ्लाइट में आने वाला है जिससे हमें आगे मुंबई जाना है। उसे भी पूना जाना है। कल मैं उससे कह रहा था कि क्या बेवकूफ हो यार,तुम पूना सीधा जाने की बजाय मुंबई होकर का रहे हो। आज उसी का साथ है। मुंबई से आगे के लिये उसने पहले से ही टैक्सी तय कर रखी है । गपियाते हुये जायेंगे।
तो इस तरह देबू को किताबें एक दिन और देर से मिलेंगी तथा हमारी ब्लागर मीट एक दिन और टल गयी।वैसे ब्लागर मीट तो हमने दिल्ली हवाई अड्डे पर भी करने का प्रयास किया लेकिन जिन ब्लागर्स से सम्पर्क लिया वे इस ऐतिहासिक काम में साथ न दे पाये।
जो हो लौटते समय कुछ करने की सम्भावनायें बरकरार हैं। मैं पूना से रात की उडा़न से २६ को लौटूंगा। २७ को सबेरे की उडा़न से लखनऊ जाउंगा।
फिलहाल इतना ही,बाकी पूने से। यात्रा की शुभकामनायें अतुल ने अभी आनलाइन बातकरते हुये दे दीं। बाकी की हम खुद ले लिये।किसी को कोई एतराज?

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

14 responses to “एक पोस्ट हवाई अड्डे से”

  1. अतुल
    पूना की तस्वीरों और वहाँ की प्रगति की समीक्षा आपके शब्दों में पढ़ने का इंतजार रहेगा।
  2. e-shadow
    यात्रा की शुभकामनायें आपको। या रेलवे की भाषा में “आपकी यात्रा मंगलमय हो”।
  3. समीर लाल
    मंगलमयी यात्रा के लिये शुभकामनाऎं.
  4. Tarun
    खुब जमेगी जब मिल बैठेंगे दिवाने दो. यात्रा मंगलमय हो
  5. नारद मुनि
    आपकी यात्रा मंगलमय हो।
    अब कुछ सावधानियां बरते:(ये कानपुर से भैजी ने हमको SMS करके बोला है कि आपको बता दें)

    अंगोछें को कसकर बांधे रखे, पोटली से गुड़ निकालते समय एयरपोर्ट के फ़र्श पर ना फ़ैलाएं, गुड़ निकालकर, पोटली को अंगोछे से बांधकर वापस डंडे पर लटका लें।डन्डा सीट पर मत रखें, कन्धे पर सही रहेगा।

    वो जो पड़ोस मे अंग्रेज दिखने वाली महिला बैठी है ना, उसकी तरफ़ ज्यादा मत देखें, उसकी मुस्कराहट बता रही है तो वो एमवे का सामान बेचती है।ध्यान रखें। और हाँ दवाइयां समय पर ले लें,ज्यादा तला वला मत खाएं।देबू को किसी बात पर गुस्सा मत दिलाएं।
    बकिया चकाचक।
  6. रवि
    ये तो बहुत नाइंसाफ़ी है.
    देबू को किताब देने खुद पूना की सैर, और हमें कोरियरे से निबटा दिया.
    बहुत नाइंसाफ़ी है.
    इसकी सजा मिलेगी.
    इसकी सजा मिलेगी.
    पूना से वापसी पर रतलाम में रुकना होगा.
    नहीं तो…
  7. SHUAIB
    शुभकामनायें और यात्रा मुबारक हो आपको।
  8. संजय बेंगाणी
    शिवाजी कि राजधानी रहे पुना पर आपके लेख का हम भी उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं. मिले तो देबुभाई को हमारा नमस्कार कहिएगा.
  9. आशीष
    अईयो, जब आदी दूर आ ही गये हो तो मदरास होते हुये वापिस जाओ ना, इदर मदरास मे बी एक ब्लागर मीट हो जायेगा ना जे !
  10. फ़ुरसतिया » अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा…
    [...] फ़ुरसतिया on एक पोस्ट हवाई अड्डे सेएक महाब्लॉगर से मुलाकात at नुक्ताचीनी on अति सर्वत्र वर्जयेत्‌debashish on अति सर्वत्र वर्जयेत्‌आशीष on एक पोस्ट हवाई अड्डे सेसंजय बेंगाणी on एक पोस्ट हवाई अड्डे से [...]
  11. आशीष
    हां जी , हम तैयार है ! मेरा नम्बर है ९८८४०६६७१७
    घर का नंबर है ३२९१२९५७( ये नम्बर घर का है जहां मै सोते समय रहता हूं)
  12. अतुल
    गुरूदेव आप आयुध निर्माणी फैक्ट्री के प्रबँध तंत्र को किसी अमेरिकी फैक्ट्री के भ्रमण प्रोग्राम के लिये सेट कर लीजिये, हवाई अड्डे पर हम पहुँच जायेंगे, चाहे कैनेडी एयरपोर्ट हो, नेवार्क, ला गार्डिया , फिलाडेल्फिया, बाल्टीमोर या फिर वाशिंगटन ड्यूलूस एयरपोर्ट ये सारे के सारे अपनी परिधि में हैं। जल्दी प्रोग्राम बनाईये , स्वागत की पूरी तैयारी है।
  13. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई अड्डे से 9.अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा… [...]

Monday, May 22, 2006

अति सर्वत्र वर्जयेत्‌

http://web.archive.org/web/20110926075800/http://hindini.com/fursatiya/archives/133

अति सर्वत्र वर्जयेत्‌

मैं कई बार सुन चुके राहत इन्दौरी के शेर फिर से सुन रहा था-
दोस्तों से मुलाकात के नाम पर
नींम की पत्तियां को चबाया करो।
तब तक जीतेंदर फिर नमूदार हुये गूगल टाक पर। मिलते ही हमें हड़काने लगे।हड़काने में स्वाभाविकता लाने के लिये वो हकला भी रहे थे। बोले- बच्चों को हड़काते हो?
एक बारगी तो हम सही में हड़क गये। हमारी जानकारी के अनुसार जीतेंदर एक बच्ची के पिता हैं। ये झटके से ‘बच्चे’ कहां से आ गये। हमने सोचा शायद इसी का तनाव हो कि हकलाते हुये हड़काने का अभ्यास कर रहे हों।
खैर ,हमने पूछा- किसको हड़काया?
जीतेंदर बोले -अतुल को हड़काया।उसकी पोस्ट उड़वा दी।
हम बोले -लाहौलविला कूवत। हड़काने के लिये हमें अतुल ही मिले हैं?
इसके बाद हमने जो सवाल पूछने शुरू किये तो जीतू तुरंत हे हे हे मोड में आ गये। बोले-दिल पर मत लेना। गुस्सा मत करो। गाली दे लो। जो करो लेकिन मामला सेटल कर लो।
हम बोले -हमारा दिल तो हमारी बेगम लेकर टहलने गयीं हैं। दिल पर कैसे लेगें तुम्हारा हेहेहे! इसे तो वहीं परिचर्चा के किसी टापिक पर सेटल करो।
परिचर्चा का नाम लेते ही जीतेंदर ने हमें दुबारा पकड़ लिया जैसे किसी टोकरी से उछलते किसी मेढक उसके बाकी साथी मेढक जकड़ लेते हैं,बाहर नहीं जाने देते।बोले -यार,आओ उधर परिचर्चा में कविता-सविता कराओ। लिखाओ।
कविता के साथ सविता का कापीराइट स्वामीजी का है। हम यह सोच कर किनारा करने के लिये टरकाऊ डायलाग मार दिये- सोचकर बतायेंगे।
अब जीतेंदर पुराने सेल्समैन रहे हैं। गंजों को कंघी बेचते रहे हैं। सो कैसे हमें छोड़ दें। दूसरी बात इन्हें सोच-विचार से बहुत डर लगता है। हमारे सोचने की बात सोच के भी घबरा गये। घबराहट दबा के बोले -क्या भाभी से पूछोगे?
हम बोले-उनसे पूछेंगे तो ये ब्लागिंग भी बंद हो जायेगी। वो पहले ही कहतीं हैं -तुम्हें और कुछ कायदे का काम नहीं सूझता जो दिन भर खुटुर-पुटुर करते रहते हो।
जीतेंदर को हम कैसे समझायें कि कविता की मौज लेना और बात है कविता लिखना-लिखवाना और बात है। वो तो कहो कि उनको परिचर्चा का काम याद आ गया तो वे बोले -आओ उधर ही बतियाते हैं परिचर्चा मंच पर। हमें बचने का तरीका समझ में आ गया-हम बोले तुम चलो हम आते हैं।
इस तरह जीतू को तू चल मैं आया कहकर मैंने नेट से नाता तोड़ा तथा इधर खुटुर-पुटुर शुरू कर दी।
इस बातचीत के बीच तमाम हाँ-हूँ भी हुई। इसी दौरान हमने पूछा -किसने बताया कि मैंने अतुल को हड़काया?
जीतेंदर ने खुलासा किया- स्वामी ने बताया कि तुमने अतुल की पोस्ट पर कुछ कमेंट किया। फिर जी नहीं भरा तो मेल
लिखी इससे अतुल ने दुखी होकर पोस्ट को उड़न तस्तरी बना कर गलती संख्या ४०४ में तब्दील कर दिया।
हमें लगा कि स्वामी लोग देश का बेड़ा गर्क कर रहे हैं। खबरें इधर-उधर कर रहे हैं।बहरहाल ,बात अतुल की की जाये।
ये जो हमारे अतुल हैं उनका ‘सेंसिटिविटी इन्डेक्स’ बहुत ऊंचा है। जो लोग कहते हैं कि दुनिया की सबसे ऊंची चीज एवरेस्ट शिखर है वो गलतफहमी में हैं। उन्होंने हमारे अतुल का ‘सेंसिटिविटी इन्डेक्स’ नहीं देखा। देखा होता तो एवरेस्ट को दूसरे नंबर पर रखते।
तो हुआ कुछ यूं कि अतुल ने एक पोस्ट लिखी अक्षरग्राम पर। उस पोस्ट में जानकारी दी गयी थी कि कैसे कुछ शरारती लोगों ने भारत में स्थित देबाशीष के नाम से अमेरिका में स्थित रमण कौल के फोन से अमेरिका में ही डेरा जमाये स्वामीजी को फोन किया।
अब पोस्ट करने के बाद हमें दिखाई गयी तो हमें लगा कि कुछ कमेंट करना जरूरी है। सो हमने अपना टिप्पणी धर्म निभाया। टिप्पणी कुछ ऐसी ही थी सलाहनुमा जिससे कुछ बुरा लगा होगा अतुल को।लिहाजा उन्होंने प्रतिटिप्पणी की । हमें लगा कि अब उपदेश मुद्रा में आया जाय ।लिहाजा हमने मेल लिख मारी। वैसे भी हमारी टाइपिंग स्पीड रविरतलामी के आसपास ही हो रही होगी।
हमारी मेल मिली तो हमारे अतुल जी का ‘ सेंसटिविटी इंडेक्स ‘ आपरेटिव हो गया। उन पर लक्ष्मीगुप्तजी के उन गुरू जी की आत्मा आ गयी जो चेलों की गलती पर खुद को पीटने लगते थे।
और अतुल ने अपने ब्लागजगत के अनुभवों की दूसरी पोस्ट का कत्ल कर दिया।नये लोगों की जानकारी के लिये बता दें कि पहले भी अतुल पोस्ट करने के बाद अपनी एक बेहतरीन पोस्ट उड़ा चुके हैं।
इनकी पोस्ट के साथ हमारे भी एक कमेंट का खून हो गया। हमने सोचा किसी थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखायें लेकिन फिर यह सोचकर कि जमानत भी हमें ही लेनी पड़ेगी ,हम रुक गये।जानकारी के लिये यह भी बता दें कि अतुल दो अनूप के बीच घिरे रहते हैं। इनके साथ विडम्बना है कि इनके छोटे भाई का नाम भी अनूप है तथा हमें ये भाई साहब कहते हैं वो भी अनूप हैं।
हमने यह भी सोचा कि इस विषय पर अनुगूँज का आयोजन किया जाय या परिचर्चा पर बिना बात के बहस की जाय कि पोस्ट लिखने के बाद उसे कमेंट के सहित उड़ा देना कहां तक जायज है?
मुझे लगता है कि पोस्ट कितनी भी खराब हो,उडा़ई नहीं जानी चाहिये। यहाँ तो खराबी की बात ही नहीं सोच का फरक था। खराब पोस्ट भी रहनी चाहिये ताकि सनद रहे ।
बहरहाल पोस्ट के चक्कर में मुख्य बात तो रह ही गयी।
तो जैसा कि बताया गया कि रमन के फोन से किसी ने स्वामी को फोन किया जिसमें परिचय दिया गया कि वो देबाशीष बोल रहा है।देबाशीष पूना में रहते हैं। वे अमेरिका में नहीं हैं। ऐसे में अमेरिका में रहने वाले रमन के फोन से स्वामी को देबाशीष के नाम से फोन करने वाला कौन हो सकता है?
भारत में तो आम बात है कि झुमरी तलैया का फोन रामनगर लग जाये । लेकिन अमेरिका में भी ऐसा होना लगा -कमाल की बात है! लेकिन यहां फोन ही नहीं लगा बात भी हुई। तब माज़रा क्या है?
अब रमन,स्वामी,देबाशीष इतनी प्रसिद्ध हस्तियाँ तो हैं नहीं कि इनके फोन के पीछे दुनिया भर के हैकर पड़ जायें तथा इनके फोन से बतियाने का जुगाड़ करें। न इससे कुछ आर्थिक लाभ होने वाला है किसी को।
जैसा कि अतुल ,स्वामी,रमन का सोचना है शायद यह काम किसी सयाने बनने वाले किसी ब्लागर का है जो अपनी तकनीकी काबिलियत की धाक जमाना चाहता है।
अगर मामला ऐसा ही है तो यह काबिलियत प्रदर्शन की हरकत बाजार में कपड़े उतार के ध्यान आकर्षित करने तथा साथ में ‘बोल्डनेस’ की ट्राफी जीतने की इच्छा रखने जैसा है मामला।
जो भी यह बचपना कर रहा है उससे यही कहा जा सकता है-ये अच्छी बात नहीं है।कहा भी गया है-अति सर्वत्र वर्जयेत्‌।
हैकिंग तो चोरी है। सेंधमार के किसी के घर में घुसने कोई बहादुरी है क्या ?
हो सकता है कि कल को हमारे ब्लाग का पासवर्ड उड़ा के कोई बहादुर चोर हमारे नाम से लिखने लगे। लोग कहने लगें कि क्या लिखते हो यार!
हम फिर भी कहेंगे लिखो बबुआ,हमसे अच्छा लिख सकते हो ,हमसे खराब लिख सकते हो लेकिन हमारे जइसा कैसे लिखोगे?
लेकिन यह इतना आसान नहीं है। चोर कोई न कोई सुराग जरूर छोड़ जाता है।
हम गैर तकनीकी ब्लागर तो ऐसे भोले भंडारी हैं कि जाने कितनो को अपना पासवर्ड दिये हैं हमें खुद ही याद नहीं। फकीरों को क्या चोरी का डर!
बात कुछ खास नहीं है लेकिन कहना चाहता हूँ कि सयानापन खतरनाक भी हो सकता है।
बकौल स्वामीजी-
मै अपने शब्द आपके मूह मे डालने की गुस्ताखी नही कर रहा और बिना मांगी सलाह देने से भी बचना चाहता हूं – लेकिन हमारी प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए की हम विस्मित या प्रभावित होने के बजाए दु:खी हैं की कोई हिंदीप्रेमी अपना समय हिंदी की सेवा मे लगाने के बजाए इस तरह के गिमिक्स में लगा रहा है. कोड क्रैक करने से ज्यादा मज़ा किसी नए ब्लागर को पहली बार हिंदी लिखत देखने से मिलती है और उन्हे सहायता करने से मिलती है – सो नए प्रोग्रामर्स को अपनी उर्जा सही जगह लगानी चाहिए. इसका मतलब ये नही की हैकिंग-क्रैकिंग मत करो – करो लेकिन अलग सर्वर बनाओ उस पर करो. जो सीखना चाहें उन्हे सिखाओ – गैरकानूनी काम मत करो. अभी हाल ही में एक जवान पट्ठा पांच साल के लिए अंदर हो गया – ज्यादा श्याणपत या ओवर स्मार्टनेस भारी पड जाती है! तीन और हाल ही में फ़िर धरा गए हैं – इन बेवकूफ़ों को पता नही है की किस आग से खेल रहे हैं.
हम और कुछ नहीं कहेंगे सिवा इस बात के कि अतुल अपना गुस्सा अपनी पोस्टों पर मत उतारा करो। तुम्हारी पोस्टें वैसे भी भारत में कन्याओं की संख्या की तरह कम होती जा रही हैं। कन्याओं की संख्या कम होने से आशीष जैसे बालक अन्ना को पीछे लगाये हुये हैं।और तुम्हारी पोस्टों की संख्या कम होने से इस तरह की फालतू पोस्टें बढ़ रही हैं। अगर गुस्सा उतर गया हो तो फिर से लिखो अपना सारा वार्तालाप जो होगा देखा जायेगा।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “अति सर्वत्र वर्जयेत्‌”

  1. अतुल
    भाई साहब क्या गजब कर रहे हैं, आशीष भी सच्चे हिंदी प्रेमी है, तेजी से मात्रासुधार की ओर प्रयासरत है, अब इतनी भी रैगिंग न करिये कि ब्लागिंग छोड़ के भाग जाये।
    आशीष भाई तुम लगे रहो, कमेंटियाने के लिये हम और जीतू हैं ।
  2. eswami
    यह पूरा प्रकरण एक साथ बहुत मनोरंजक समझदारियों और बेवकूफ़ियों से लद-फ़द रहा है! मामला गंभीर है पर मनोरंजक भी है – लेकिन जैसा आपने कहा “अति सर्वत्र वर्जयेत!”
  3. समीर लाल
    मामला कुछ गंभीर टाइप का दिख रहा है, मगर विवरण के आभाव मे, सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगा, लिखा अच्छा है और मामला तूल ना पकडे, इसलिये शुभकामनाऎं.
  4. नारद मुनि
    तुम बाज नही आए, शुकुल। जब तुमको हड़काया था और तुम हड़क गये तो फिर गाना गाने की का जरुरत? काहे दुनिया को बता रहे हो कि हड़का दिया।तुम तो कल गच्चा देकर निकल गये, अब आना बेटा आनलाइन।
    और भौजी तुम्हारा दिल वापस लेकर आ गयी होंगी,उनसे दिल वापस लेकर साफ़ सूफ़ कर लेना और दिल से पूछ लेना कि अब का करना है?
    अरे यार, वो कानपुर मे रिक्शे और ट्रकों के पीछे बहुत गजब गजब के शेर लिखे होते है, यार एक पोस्ट उस पर भी लिखो, फ़ोटू के साथ।
  5. आशीष
    माना कि हम हैंकिंग के उस्ताद है, लेकिन हमारी जिंदगी मे आयी कन्याओ की कसम “ये कारनामा हमारा नही है !”
    रही बात हम और कन्याओ कि आज हम भी राज खोल ही देते है कि हमारी जिन्दगी मे कन्या आते आते एन मौके पर भाग क्यो खडी होती है.. बस इंतजार किजीये …..
  6. debashish
    गुरुजी मज़ाक मज़ाक में गहरी बात करने की आप की कला का कोई सानी नहीं!
  7. एक महाब्लॉगर से मुलाकात at नुक्ताचीनी
    [...] कुछ दिन पहले अनूप का ईमेल आया, बोले जिन किताबों को भेंट करने का वायदा किया था वो देने स्वयं आ रहा हूँ। ज़ाहिर है जिन चिट्ठा मित्र से अब तक केवल फोन पर बातचीत हुई या फिर चित्रों में ही जिन्हें देखा हो उनसे मिलने की बात पर मन उत्साहित तो था ही, पर बड़भैया से मुलाकात के पहले थोड़ा सहमा भी था। जीवन और साहित्य के निचोड़ से ओतप्रोत उनके लेख तो कई मर्तबा इस तुच्छ बुद्धि के सर से चार इंच उपर ही तिरते रह जाते हैं, उन पर टिप्पणी करने का माद्दा हमेशा नहीं जुट पाता, अब भई जिनके ब्लॉग पर टिप्पणी करने पर भी डर लगता हो और जिनकी हल्की डपट से अतुल अपनी पोस्ट हटा देते हों, ऐसे महाब्लॉगर से मिलने के लिये थोड़ा साहस तो जुटाना ही पड़ता है। पर जब मुलाकात हुई तो अपेक्षा से भी अधिक मन को भा गये अनूप। दो दिनों में कई बार भेंट हुई और वस्तुतः अनूप ने मेजबान की ही जम कर मेहमान नवाज़ी कर डाली। [...]
  8. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई अड्डे से 9.अथ पूना [...]

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Sunday, May 21, 2006

आवारा भीड़ के खतरे

http://web.archive.org/web/20120826145743/http://hindini.com/fursatiya/archives/132

आवारा भीड़ के खतरे

हमारे देश में युवाओं की आबादी सबसे ज्यादा है। युवा ऊर्जा के प्रतीक होते हैं। इस ऊर्जा के सार्थक उपयोग से देश का बहुमुखी विकास हो सकता है। वहीं उनका गलत इस्तेमाल किये जाने की संभावना भी बनी रहती है। नये उमर के लोगों के लिये सही-गलत की पहचान के खतरे हमेशा रहते हैं।
प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी इस समस्या के बारे में कहते हैं:-
नयी उम्रों की खुदमुख्तारियों को कौन समझाये,
कहां से बच के चलना है कहां जाना जरूरी है।

हमारे पसंदीदा लेखक हरिशंकर परसाई का लेख ‘आवारा भीड़ के खतरे’ इसी बात पर विचार करता है। यह लेख मैं अपने दोस्तों के लिये पेश कर रहा हूँ:-
हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई
एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया – पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर माडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया।आसपास के लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया-हरामजादी बहुत खूबसूरत है।
हम ४-५ लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ये सवाल दुनिया में भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं-पश्चिम के सम्पन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी। अमेरिका से आवारा हिप्पी और’हरे राम हरे कृण्ण’ गाते अपनी व्यवस्था से असंतुष्ट युवा भारत आते हैं और भारत का युवा लालायित रहता है कि चाहे चपरासी का काम मिले,अमेरिका में रहूँ । ‘स्टेट्स’ जाना है यानि चौबीस घंटे गंगा नहाना है। ये अपवाद है। भीड़-की-भीड़ उन युवकों की है,जो हताश,बेकार और कुद्ध हैं। संपन्न पश्चिम के युवकों के व्यवहार और भारत के युवकों के व्यवहार में अंतर हैं।
सवाल है-उस युवक ने सुंदर माडल के चेहरे पर पत्थर क्यों फेंका? हरामजादी बहुत खूबसूरत है-यह उस गुस्से का कारण क्यों है? वाह ,कितनी सुंदर है-ऐसा इस तरह के युवक क्यों नहीं कहते?
युवक साधारण कुर्ता पाजाम पहने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त । शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिये भटकता रहा था।धंधा कोई नहीं। घर की हालत खराब। घर में अपमान बाहर अवहेलना। वह आत्म ग्लानि से क्षुब्ध।घुटन और गुस्सा। एक नकारात्मक भावना। सबसे शिकायत । ऐसी मानसिकता में सुंदरता देखकर चिढ़ होती है। खिले हुये बुरे फूल बुरे लगते हैं। किसी के अच्छे घर से घृणा होती है।सुंदर कार पर थूकने का मन होता है। मीठा गाना सुनकर तकलीफ होती है। अच्छे कपड़े पहिने खुशहाल साथियों से विरक्ति होती है। जिस चीज से ,खुशी ,सुंदरता, संपन्नता,सफलता,प्रतिष्ठा का बोध होता है,उस पर गुस्सा आता है।
बूढ़े-सयाने लोगों को लड़का जब मिडिल स्कूल में होता है,तभी से शिकायतें होने लगती हैं। वे कहते हैं- ये लड़के कैसे हो गये ? हमारे जमाने में ऐसा नहीं था। हम पिता ,गुरू समाज के आदरणीयों की बात सिर झुका के मानते थे। अब ये लड़के बहस करते हैं। किसी की नहीं मानते ।मैं याद करता हूँ कि जब मैं छात्र था,तब मुझे पिता की बात गलत तो लगती थी,पर मैं प्रतिवाद नहीं करता था। गुरू का भी प्रतिवाद नहीं करता ।समाज के नेताओं का भी नहीं। मगर तब हम किशोरावस्था में थे,जानकारी ही क्या थी? हमारे कस्बे में दस-बारह अखबार आते थे। रेडियो नहीं । स्वतंत्रता संग्राम का जमाना था।सब नेता हमारे हीरो थे-स्थानीय भी और जवाहरलाल नेहरू भी। हम पिता,गुरू,समाज के नेता आदि की कमजोरियाँ नहीं जानते थे। मुझे बाद में समझ में आया कि मेरे आया कि मेरे पिता कोयले के भट्टों पर काम करनेवाले गोंडों का शोषण करते थे।
पर अब मेरा ग्यारह साल का नाती पाँचवीं कक्षा का छात्र है। वह सबेरे अखबार पढ़ता है,टेलीविजन देखता है,रेडियो सुनता है। वह तमाम नेताओं की पोलें जानता है। देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला की आलोचना करता है। घर में कुछ ऐसा करने को कहो तो प्रतिरोध करता है-मेरी बात भी तो सुनो। दिन भर पढ़कर आया हूँ। अब फिर कहते हो कि पढ़ने बैठ जाऊँ। थोड़ी देर नहीं खेलूँगा नहीं तो पढ़ाई भी नहीं होगी। हमारी पुस्तक में लिखा है। वह जानता है कि घर में बड़े कब-कब झूठ बोलते हैं।
ऊँची पढ़ाईवाले विश्वविद्यालय के छात्र सबेरे अखबार पढ़ते हैं, तो तमाम राजनीति और समाज के नेताओं के भ्रष्टाचार , पतन शीलता के किस्से पढ़ते हैं। अखबार देश को चलाने वालों और समाज के नियामकों के छल,कपट,प्रपंच ,दुराचार की खबरों से भरे रहते हैं। धर्माचार्यों की चरित्र हीनता उजागर होती है। यही नेता अपने हर भाषण हर उपदेश में छात्रों से कहते हैं-युवकों ,तुम्हें देश का निर्माण करना है( क्योंकि हमने नाश कर दिया)तुम्हें चरित्रवान बनना है(क्योंकि हम तो चरित्रहीन हैं) शिक्षा का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, नैतिक चरित्र का ग्रहण करना है-(हमने शिक्षा और अशिक्षा से पैसा कमाना और अनैतिक होना सीखा) इन नेताओं पर छात्रों-युवक की आस्था कैसे जमें? छात्र अपने प्रोफेसरों के बारे में सब जानते हैं। उनका ऊँचा वेतन लेना और पढ़ाना नहीं। उनकी गुटबंदी ,एक दूसरे की टांग खींचना,नीच कृत्य,द्वेषवश छात्रों को फेल करना,पक्षपात ,छात्रों का गुटबंदी में उपयोग। छात्रों से कुछ भी नहीं छिपा रहता अब। वे घरेलू मामले भी जानते हैं ।ऐसे गुरुओं पर छात्र कैसे आस्था जमायें।ये गुरू कहते हैं-छात्रों को क्रांति करना है। वे क्रांति करने लगे तो सबसे पहले अपने गुरुओं को साफ करेंगे। अधिकतर छात्र अपने गुरुओं से नफरत करते हैं।
बड़े लड़के अपने पिता को भी जानते हैं। वे देखते हैं कि पिता का वेतन तो तीन हजार है ,पर घर का ठाठ-बाट आठ हजार रुपयों का है। मेरा बाप घूस खाता है। मुझे ईमानदारी के उपदेश देता है। हमारे समय के लड़के-लड़कियों के लिये सूचना और जानकारी के इतने माध्यम खुले हैं, कि वे सब क्षेत्रों में अपने बड़ों के बारे में सब कुछ जानते हैं। इसलिये युवाओं से ही नहीं बच्चों से भी अंधआज्ञाकारिता की आशा नहीं की जा सकती।हमारे यहां ज्ञानी ने बहुत पहले कहा था-
प्राप्तेषु षोडसे वर्षे पुत्र मित्र समाचरेत।
उनसे बात की जा सकती है,उन्हें समझाया जा सकता है। कल परसों मेरा बारह साल का नाती बाहर खेल रहा था। उसकी परीक्षा हो चुकी है और लंबी छुट्टी है। उससे घर आने के लिये उसके चाचा ने दो तीन बार कहा। डाँटा। वह आ गया और रोते हुये चिल्लाया -हम क्या करें? ऐसी तैसी सरकार की जिसने छुट्टी कर दी। छुट्टी काटना उसकी समस्या है। वह कुछ तो करेगा ही। दबाओगे तो विद्रोह कर देगा। जब बच्चे का यह हाल है तो तरुणों की प्रतिक्रियाएँ क्या होंगी।
युवक-युवतियों के सामने आस्था का संकट है। सब बड़े उसके सामने नंगे हैं। आदर्शों ,सिद्धातों,नैतिकताओं की धज्जियाँ उड़ते वे देखते हैं। वे धूर्तता ,अनैतिकता, बेईमानी,नीचता को अपने सामने सफल और सार्थक होते देखते हैं। मूल्यों का संकट भी उनके सामने हैं।सब तरफ मूल्यहीनता उन्हें दिखती है। बाजार से लेकर धर्मस्थल तक। वे किस पर आस्था जमाएँ और किसके पदचिन्हों पर चले? किन मूल्यों को माने?
यूरोप में दूसरे महायुद्ध के दौरान जो पीढ़ी पैदा हुई उसे ‘लास्ट जनरेशन’(खोई हुई पीढ़ी) का कहा जाता है। युद्ध के दौरान अभाव ,भुखमरी,शिक्षा ,चिकित्सा की ठीक व्यवस्था नहीं। युद्ध में सब बड़े लगे हैं, तो बच्चों की परवाह करने वाले नहीं। बच्चों के बाप और बड़े भाई युद्ध मारे गए। घर का, संपत्ति का,रोजगार का नाश हुआ। जीवन मूल्यों का नाश हुआ। ऐसे में बिना उचित शिक्षा, संस्कार,भोजन कपड़े के विनाश और मूल्यहीनता के बीच जो पीढी़ बढ़कर जवान हुई ,तो खोई हुई पीढ़ी । इसके पास निराशा ,अंधकार,असुरक्षा,अभाव,मूल्यहीनता के सिवा कुछ नहीं था। विश्वास टूट गये थे। यह पीढ़ी निराश , विध्वंसवादी,अराजक,उपद्रवी,नकारवादी हुई। अंग्रेज लेखक जार्ज ओसबर्न ने इस क्रुद्ध पीढ़ी पर नाटक लिखा था तो बहुत पढ़ा गया और उस पर फिल्म भी बनी। नाटक का नाम है-’लुक बैक इन एंगर’। मगर यह सिलसिला यूरोप के फिर से व्यवस्थित और सम्पन्न हो जाने पर भी चलता रहा। कुछ युवक समाज के ‘ड्राप आउट’ हुए। ‘बीट जनरेशन’ पैदा हुई। औद्योगीकरण
के बाद यूरोप में काफी प्रतिशत बेकारी है। ब्रिटेन में अठारह प्रतिशत बेकारी है। अमेरिका ने युद्ध नहीं भोगा। मगर व्यवस्था से असंतोष वहाँ भी पैदा हुआ। अमेरिका में भी लगभग बीस प्रतिशत बेकारी है। वहाँ एक ओर बेकारी से पीड़ित युवक हैं ,तो दूसरी ओर अतिशय सम्पन्नता से पीड़ित युवक भी। जैसे यूरोप में वैसे ही अमेरिकी युवकों ,युवतियों का असंतोष,विद्रोह, नशेबाजी,यौन स्वछंदता और विध्वंसवादिता में प्रकट हुआ। जहाँ तक नशीली वस्तुओं के सेवन का सवाल है,यह पश्चिम में तो है ही,भारत में भी खूब है। दिल्लीविश्वविद्यालय के पर्यवेक्षण के अनुसार दो साल पहले(१९८९ में) सत्तावन फीसदी छात्र और पैंतीस फीसदी छात्राएँ नशे के आदी पाए गए। दिल्ली तो महानगर है। छोटे शहरों में ,कस्बों में नशे आ गये हैं। किसी-किसी पान की दुकान में नशा हर कहीं मिल जाता है। ‘स्मैक’ और’पाट’ टाफी की तरह उपलब्ध हैं।
छात्रों-युवकों को क्रांति की,सामाजिक परिवर्तन की शक्ति मानते हैं। सही मानते हैं। अगर छात्रों युवकों में विचार हो,दिशा हो,संगठन हो और सकारात्मक उत्साह हो। वे अपने से ऊपर की पीढ़ी की बुराइयों को समझें तो उन्हीं बुराइयों के उत्तराधिकारी न बनें,उनमें अपनी ओर से दूसरी बुराइयां मिलाकर पतन की परंपरा को गे नहीं बढ़ाएँ। सिर्फ आक्रोश तो आत्मक्षय करता है।
एक हर्बर्ट मार्क्यूस चिंतक हो गये हैं,जो सदी के छठे दशक में बहुत लोकप्रिय हो गये थे। वे ‘स्टूडेंट पावर’ में बहुत विश्वास करते थे। मानते थे कि छात्र क्रांति कर सकते हैं। वैसे सही बात यह है कि अकेले छात्र क्रांति नहीं कर सकते। उन्हें समाज के दूसरे वर्गों को शिक्षित करके चेतनाशील बनाकर संघर्ष में साथ लेना होगा। उन्हें समाज के दूसरे वर्गों को चेतनाशील बनाकर संघर्ष में साथ लेना होगा।लक्ष्य निर्धारित करना होगा। आखिर क्या बदलना है यह तो तय हो।अमेरिका में हर्बर्ट मार्क्यूस से प्रेरणा पाकर छात्रों ने नाटक ही किये। हो ची मिन्ह और चे गुएवारा के बड़े-बड़े चित्र लेकर जुलूस निकालना और भद्दी,भौडी़,अश्लील हरकतें करना। अमेरिकी विश्वविद्यालयों की पत्रिकाओं में बेहद फूहड़ अश्लील चित्र और लेख कहानी। फ्रांस के छात्र अधिक गंभीर शिक्षित थे। राष्ट्रपति द गाल के समय छात्रों ने सोरोबोन विश्वविद्यालय में आंदोलन किया। लेखक ज्यां पाल सात्र ने उनका समर्थन किया। उनका नेता कोहने बेंडी प्रबुद्ध और गंभीर युवक था। उनके लिये राजनीतिक क्रांति करना तो संभव नहीं था। फ्रांस के श्रमिक संगठनों ने उनका साथ नहीं दिया। पर उनकी मांगें ठोस थीं जैसे शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन। अपने यहाँ जैसी नकल करने की छूट की क्रांतिकारी मांग उनकी नहीं थी।पाकिस्तान में भी एक छात्र नेता तारिक अली ने क्रांति की धूम मचाई। फिर वह लंदन चला गया।
युवकों का यह तर्क सही नहीं है कि जब सब पतित हैं ,तो हम क्यों नहीं हों। सब दलदल में फँसे हैं,तो जो लोग नये हैं,उन्हें उन लोगों को वहाँ से निकालना चाहिये। यह नहीं कि वे भी उसी दलदल में फँस जाएँ। दुनिया में जो क्रांतियाँ हुई हैं, सामाजिक परिवर्तन हुये हैं,उनमें युवकों की बड़ी भूमिका रही है। मगर जो पीढ़ी ऊपर की पीढ़ी की पतनशीलता अपना ले क्योंकि वह सुविधा की है और उसमें सुख है वह पीढ़ी कोई परिवर्तन नहीं कर सकती। ऐसे युवक हैं,जो क्रांतिकारिता का नाटक बहुत करते हैं,पर दहेज भरपूर लेते हैं।कारण बताते हैं-मैं तो दहेज को ठोकर मारता हूँ ।पर पिताजी के सामने झुकना पड़ा। यदि युवकों के पास दिशा हो,विचारधारा हो,संकल्पशीलता हो,संगठित संघर्ष हो तो वे परिवर्तन ला सकते हैं।
पर मैं देख रहा हूँ एक नई पीढ़ी अपने से ऊपर की पीढ़ी से अधिक जड़ और दकियानूस हो गई है। यह शायद हताशा से उत्पन्न भाग्यवाद के कारण हुआ है। अपने पिता से अधिक तत्ववादी ,बुनियाद परस्त(फंडामेंटलिस्ट) लड़का है।
दिशाहीन,बेकार,हताश,नकारवादी,विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है।इसका उपयोग खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन,हिटलर और मुसोलिनी ने किया। यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उन्माद और तनाव पैदा कर दे।फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्योंके विनाश के लिये ,लोकतंत्र के नाश के लिये करवाया जा सकता है।
-हरिशंकर परसाई
जून १९९१
मेरी पसन्द
उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो।
जिंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगे उड़ाया करो।
दोस्तों से मुलाकात के नाम पर
नींम की पत्तियां को चबाया करो।
चाँद,सूरज कहाँ,अपनी मंजिल कहाँ
ऐसे वैसों को मुँह मत लगाया करो।
-राहत इन्दौरी

13 responses to “आवारा भीड़ के खतरे”

  1. नितिन
    अति सुन्दर!!
  2. सागर चन्द नाहर
    बहुत सुंदर पर कटु सत्य लिखा है आपने
  3. समीर लाल
    परसाई जी की लेखनी की तो बात ही निराली है. आपका बहुत आभार कि आपने उन्हें यहाँ उपलब्ध कराया.साधुवाद. आगे भी ऎसी ही आशा है.
  4. eswami
    परसाईं जी का लेख और उस पर राहत इन्दौरी के शेर वाह! गुरुदेव तुस्सी ग्रेट हो!! :)
    मुझे पता नही था की परसाईंजी की पूरे दुनिया के सामाजिक मनोविज्ञान पर ऐसी धांसू पकड है. बहुत बहुत धन्यवाद.
  5. आशीष
    परसाई जी की लेखनी का कोई जवाब नही है, तिलमिलाने वाले व्यंगय होते थे उनके !
  6. रजनीश मंगला
    बहुत अच्छा लेख, बहुत बढ़िया जानकारी। धन्यवाद।
  7. pe-shadow
    क्या बात है अनूप जी।
  8. भारत भूषण तिवारी
    अब इसी कडी में ‘हम,वे और भीड’ भी पोस्ट कर दें तो बडी कृपा होगी.
  9. फ़ुरसतिया » हम,वे और भीड़
    [...] हरिशंकर परसाईका लेख ‘आवारा भीड़ के खतरे’ पढ़ने के बाद की ‘भारत भूषण तिवारीजी’ प्रतिक्रिया थी- [...]
  10. अनुराग
    एसा लगता है जैसे परसाई जी के देश और दुनिया की समस्या का इलाज है। सच में, अगर आप मुझसे पूछें कि मेरा आदर्श कौन है तो मैं अपने माँ बाप से ज्याद आगे नहीं सोच पाउँगा।
  11. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई [...]
  12. चंदन कुमार मिश्र
    बेहतर और धारदार, जैसा कि तय है परसाई जी लिखेंगे ही। ‘नेता अपने हर भाषण हर उपदेश में छात्रों से कहते हैं-युवकों ,तुम्हें देश का निर्माण करना है( क्योंकि हमने नाश कर दिया)तुम्हें चरित्रवान बनना है(क्योंकि हम तो चरित्रहीन हैं) शिक्षा का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, नैतिक चरित्र का ग्रहण करना है-(हमने शिक्षा और अशिक्षा से पैसा कमाना और अनैतिक होना सीखा)’—यह तो सत्य है भाई साहब!
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..जय हे गांधी ! हे करमचंद !! (कविता)
  13. चंदन कुमार मिश्र
    ऐसा लगता है जैसे हमने, हमारे देश ने पिछले कई दशकों से कुछ नहीं किया है और स्थितियाँ ज्यों-की-त्यों या कहिए और अधिक भयावह बनी हुई हैं।…परसाई जी के कहे का अर्थ यह भी है कि १९९१ से २०११ तक तो पक्का सुधार नहीं हुआ है, किसी तरह।
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..जय हे गांधी ! हे करमचंद !! (कविता)