Friday, June 02, 2006

संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व

http://web.archive.org/web/20110622182150/http://hindini.com/fursatiya/archives/137

संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व

98b9 [कुछ दिन पहले पुराने कागज खोजते हुये मुझे एक पुराना करीब दस साल पहले का लिखा एक लेख मिल गया। यह लेख कभी मैंने मार्च के माह में मनाये जाने वाले संरक्षा दिवस के अवसर पर प्रकाशित होने वाली पत्रिका के लिये लिखा था। यहां मैं इसे इस लालच में पोस्ट कर रहा हूँ कि इसी बहाने यह सुरक्षित रहेगा। आप इसे पढ़ें तथा अगर पसन्द आये तो इसके पहले लिखा गया लेख 'स्वर्ग की सेफ्टी पालिसी' भी पढ़ डालें( अगर अभी तक न पढ़ा हो)जिसे मैं अपने पसंदीदा लेखों में शुमार करता हूँ।]
हर बार की तरह इस बार भी ‘संरक्षा माह’ के अवसर पर तमाम प्रतियोगिताओं का आयोजन हुआ। भाषण प्रतियोगिता भी हुई। मैं जब इसमें भाग लेने के लिये पहुँचा तो देखा कि हाल में उतने ही लोग थे जितने हर प्रतियोगिता में होते हैं। प्रतियोगी,निर्णायक,संचालक और एक प्रतिनिधि संरक्षा अनुभाग का। चूँकि इस बार प्रतियोगिता का ‘समुचित प्रचार’ हुआ था अत: श्रोताओं,वक्ताओं की संख्या मिलाकर कोरम पूरा सा हो गया था। प्रतियोगिता एक बार फिर स्थगन से बच गई। वक्ता चूँकि उतने ही और वही थे जो हर भाषण प्रतियोगिता में हर वर्ष होते हैं तथा प्रतियोगिता का परिणाम पहले से ही सबको पता था लिहाजा प्रतियोगियों में पर्याप्त उत्साह था।
भाषण प्रतियोगिता का विषय था -’संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व’। अपनी बारी आने पर मैंने बिना सोचे बोलना शुरू कर दिया। मैंने सोचा सोच बाद में लूँगा,बोल पहले लूँ। इससे बोलने में प्रवाह रहता है।समय अनमोल है। सोचकर बोलने में समय लगता है। पहले सोचो,दिमाग में विचार का ताना-बाना बनाओ,ताने-बाने को धकेल कर मुँह तक लाओ तब बोल फूटता है। इस विचार परिवहन में,लाने-ले जाने में, विचार की टूट-फूट हो गई, शब्द नहीं मिले तो और झंझट। ये तो उसी तरह से है कि माल बना पड़ा है लेकिन ट्रक न मिलने के कारण भेजा नहीं जा पाया- टारगेट फेल।
तो बोलने के पहले सोचो क्यों? पहले बोल लो तब सोचो। इस बात को अक्सर लोग नहीं समझते। यहाँ तक कि निर्णय लेकर फाइल में लिखने तक के लिये सोचने में समय गंवाते हैं। मामले लटक जाते हैं। आप खुद सोचकर देखिये कि यदि लोग बिना सोचे निर्णय लेने लगें तो मामले कितनी जल्दी निपटेंगें। पता नहीं वह रामराज्य कब आयेगा?
भाषण प्रतियोगिता में बिना सोचे बोलने का बाद मुझे लगा क्यों न उस चीज के बारे में जान लिया जाय जिसके बारे में मैं अभी धकापेल बोल आया! संरक्षा तथा आध्यात्म के बारे अलग-अलग मैं जानता हूँ। किसी दुर्घटना के बाद मचने वाले हल्ले को संरक्षा कहते हैं तथा पुरुषार्थ की दुकान बंद होने के बाद बचे हुये पदार्थ को आध्यात्म कहते हैं। परंतु संरक्षा के आध्यात्मिक महत्व से मैं एकदम अनजान था। तभी मैं इस विषय पर इतने आत्मविश्वास से बोल गया- अज्ञानी का आत्मविश्वास प्रबल होता है।
किसी दुर्घटना के बाद मचने वाले हल्ले को संरक्षा कहते हैं तथा पुरुषार्थ की दुकान बंद होने के बाद बचे हुये पदार्थ को आध्यात्म कहते हैं
मैंने अपने साथी की तरफ निगाह फेरी। उनका सर फाइलों पर था। यह तय करना मुश्किल था कि उनकी मुद्रा किसी क्रिकेट खिलाड़ी की शतक बनाने के बाद आन्नदातिरेक में पिच को चूमने की मुद्रा थी या फिर चुनाव के तुरंत बाद की बहुमत के अभाव में भंग हुई लोकसभा के सांसद की हताश मुद्रा। उसकी बाहों का घेरा किसी भी ताकांक्षा के लिये कवच था। सांसे आराम के पाले में थीं,आ-जा रही रहीं थीं-मृदु मंद-मंद ,मंथर-मंथर।
मैं यह तय नहीं कर पा रहा था कि उनकी मुद्रा आनन्द की है या हताशा की। एक बारगी तो मैंने सोचा कि पत्र लिखकर इस बारे में अपने’बास’ से राय ले लूँ। परंतु यह सोचकर कि यदि बास से पूछूंगा तो वे कहेंगे- ‘इस पर पहले अपने विचार प्रस्तुत करें,लेखा अनुभाग की राय ले लें तथा यह सुनिश्चित करें कि तय की गयी मुद्रा में कोई शासकीय हानि नहीं है। सारे तथ्यों के साथ निर्णय हेतु मामले को प्रस्तुत करें’ मैंने बास से सलाह लेने का विचार स्थगित कर दिया।
मैंने अपने साथी से ही उनके बारे में पूछने का साहसिक निर्णय लिया तथा उनको नमस्कार किया। उन्होंने अपना फाइलों के आँचल में रखा सर जितना उठ सकता था ,उठाया। उनके मुखमंडल पर खिलाड़ी या सांसद की सांसारिक मुद्राओं से सर्वथा अलग आध्यात्मिकता का सागर लहरा रहा था। वो तो मैं उनको वर्षों से जानता था वर्ना कोई नया आदमी देखता तो इसे कामचोर की सहज मुद्रा समझने की भूल कर बैठता। मैंने उनसे सवाल करने शुरू किये:-
सवाल:-फाइलों पर सर क्यों रखे थे? क्या कुछ सोच रहे थे?
जवाब:- आपने दो सवाल एक साथ पूछ लिये। मैं कोई ‘पीस वर्कर’ तो हूँ नहीं कि सब काम हड़बड़ी में निपटाकर ‘अर्निंग’(दिहाड़ी)पूरी कर लूँ। मुझे समझ में नहीं आ रहा किस सवाल का जवाब पहले दूँ। खैर,सोचता हूँ।
सवाल:- आप इतना कष्ट न उठायें । पहले सवाल का ही जवाब दे दें। उसी में काम हो जायेगा। अपने दूसरे प्रश्न को मैं निरस्त करता हूँ।
जवाब:- आप समझदार हैं। संतोषी हैं। दो की जगह एक ही सवाल के जवाब से काम चलाने की क्षमता है आपमें। नहीं तो तमाम लोग पचीसों सवाल पूछते रहते हैं,जवाब एक के भी नहीं मिलते और वे डमरू बजाते रह जाते हैं। हां , तो जहाँ तक फाइलों और सर का सम्बन्ध है तो मैं जब नया-नया आया था तो सर मेज पर रखता था। फिर फाइलें सर पर रखकर सोने लगा ताकि लोग सोते हुये देख न लें।लेकिन समय तथा अनुभव के साथ पता चला कि मेरा तरीका अवैज्ञानिक था। फाइलें सर पर रखकर सोने से उनके नीचे गिरने का खतरा रहता था। पिछले कुछ दिनों से संरक्षा के हो-हल्लें में हर काम को सुरक्षित तरीके से करने की मारा-मारी मची है। लिहाजा मैंने भी फाइलें सर पर रखने के बजाय अपना सर फाइलों पर रखना शुरू कर दिया है।
सवाल:- क्या यह बेहतर तरीका है?
जवाब:- हाँ,निश्चित रूप से। पहले तो मुझे फाइलों का संतुलन बनाये रखने में बहुत मेहनत पड़ जाती थी। निरन्तर चैतन्य रहना पड़ता था। पलक तक झपका नहीं पाता था। बल्कि कई बार तो बावजूद तमाम सावधानियों के फाइलें धड़ाम से नीचे गिर जातीं थीं। दूसरे लोगों के आराम में तथा कुछ लोगों के काम में खलल पड़ता था। जबकि यह तरीका एकदम सुरक्षित तरीका है-‘फिट एन्ड फारगेट टाइप’ का। सर फाइल पर रखिये, निश्चिंत होकर सोइये।
सवाल:- क्या आप दिन भर सर फाइलों में रखे रहते हैं?
जवाब:- नहीं,अभी इतना अभ्यास कहाँ? तमाम सांसारिक व्याधियां हैं। प्राकृतिक जरूरतों
को पूरा करने के लिये उठना पड़ता है। चाय-पानी कैसे त्याग दें !उसके लिये उठना पड़ता है। बीच-बीच में कुछ लोग और कुछ न होने पर फाइल ही खोजने लगते हैं। कुछ तो सर के नीचे से उठा ले जाते हैं। टोको तो कहते हैं-साहब मंगा रहे हैं। अब इस सब से व्यवधान तो पड़ता ही है। अभी आप से ही वार्तालाप में समय नष्ट हो रहा है।
सवाल:- साहब फाइलें क्यों मंगाते हैं? क्या वो भी फाइलों में सर रखकर सोते हैं?
जवाब:- असल में एक के दफ्तरी शौक अलग-अलग होते हैं। जैसे, फाइलों के बारे में ही लीजिये-
कभी लटकतीं हैं,कभी विचाराधीन हो जाती हैं कभी स्वाधीन विचरण करती हैं,कभी चढ़ाई पर चढ़ती भयंकर तेल पीती गाड़ी की तरह हाँफती हुई चलती हैं,कभी ढाल से उतरती गाड़ी की तरह सरपट चलती हैं। कभी किसी फाइल पर कोई बैठ जाता है,कभी फाइल किसी पर दूसरी फाइल पर बैठ जाती है। कुछ कहा नहीं जा सकता। फाइल निपटाने के तरीके से ही अधिकारी परिभाषित होता है। हमारे बास ‘फाइल निपटाऊ रिपोर्ट- बनाऊ’ टाइप के अधिकारी हैं।
फाइलों के बारे में ही लीजिये-
कभी लटकतीं हैं,कभी विचाराधीन हो जाती हैं कभी स्वाधीन विचरण करती हैं
सवाल:- ‘फाइल निपटाऊ -रिपोर्ट बनाऊ’ टाइप के का मतलब ?
जवाब:- फाइल निपटाऊ का मतलब फाइल सामने आई,दस्तखत कर दिये। काम खत्म। कभी-कभी जब ज्यादा फालतू हुये या बोरियत हो रही है तो मजनून भी पढ़ लिया। ‘रिपोर्ट बनाऊ’ तो खैर मजबूरी में बनना पड़ा उन्हें।
सवाल:- कैसी मजबूरी?
जवाब:- दरअसल आजकल दफ्तर में अगर पाँच पत्र आते हैं तो उनमें से चार में कोई न कोई रिपोर्ट माँगी जाती है। ऐसा भी होता है कि चारों में रिपोर्ट एक ही विभाग ने एक ही विषय पर मांगी हो लेकिन खाली प्रारूप अलग हो। किसी में पिछले तीन साल की सूचनायें मांगी हों,किसी में पिछले चार साल की,किसी में पाँच साल की। यह भी हो सकता है कि किसी में कोई विवरण कम मांगा हो किसी में एक डाटा ज्यादा मांगा गया हो। तो हमारे साहब बनाते रहते हैं रिपोर्टें मजबूरी में। तो वे फाइलों पर सर रखकर तो नहीं सो पाते। हाँ कभी-कभी फाइलों पर सर पटकते जरूर हैं।
सवाल:- रिपोर्ट साहब क्यों बनाते हैं? आप लोग क्यों नहीं बनाते?
जवाब:- पहले तो हम लोग ही बनाते थे। अब जब से कम्प्यूटर पर रिपोर्ट माँगी जाती हैं तब से साहब ही बनाते हैं।हमें आराम हो गया है।हम कागज और फाइल साहब के पास ले जाकर धर देते हैं। कह देते हैं-साहब और चाहे जो काम करा लो लेकिन ये कम्प्यूटर हमारी समझ में नहीं आता। कभी-कभी साहब नाराज होते हैं कि इक्कीसवीं सदी में कम्प्यूटर नहीं आता, सीखना नहीं चाहते तो हम दूसरे बहाने बताते हैं जैसे कि साहब हमारी आँख कमजोर है,सर दर्द होता है,चक्कर आते हैं,कमजोरी महसूस होती है, डाक्टर ने टेलीविजन देखने तथा कम्प्यूटर पर काम करने को मना किया है। कभी-कभी ब्लड-प्रेसर , तनाव, आर्थराइटिस तक को इसी में जोड़ देते हैं। साहब बिचारे क्या करें, पानी पीकर रिपोर्ट बनाने लगते हैं। जब रिपोर्ट बन जाती है ,कम आफिस कापी में नीचे दस्तखत करके साहब के दस्तखत कराकर रिपोर्ट भेज देते हैं। कभी-कभी जब ज्यादा जल्दी होती है तो तो डिस्पैच भी साहब ही कर देते हैं। आफिस कापी पर हमारे दस्तखत छूट जाते हैं तो हमें बाद में करने पड़ते हैं। कर देते हैं। क्या करें ? नौकरी करते हैं तो काम तो करना ही पडे़गा।
सवाल:- लेकिन आपने जो तकलीफें बीमारियाँ बताईं उनमें से कोई भी तो आपको नहीं है। फिर आप कम्प्यूटर पर काम क्यों नहीं सीखते करते?
जवाब:-अब देखो यार, तुमसे क्या छिपाना? सरकारी नौकरी तो खेत जोतने जैसा काम है। जो बैल जितना सीधा होगा उससे उतना ज्यादा जुताई कराई जायेगी। अड़ियल बैल से कोई काम नहीं करा पाता। जबकि चारा दोनों को बराबर मिलता है। तो क्या फायदा सीधा बैल बनके ज्यादा खेत जोतने से? तुम जितना काम सीखते जाओगे उतनी जिम्मेंदारी तुम पर आयेगी। जितना काम टालोगे,आराम में रहोगे। तो क्या फायदा नया काम सीखने में जबकि सबको पता है इसमें मिलना चवन्नी सिवाय सरदर्द के।इसी लिये मैं इस सूचना क्रान्ति,कम्प्यूटर युग के झांसे में नहीं आता। कम्प्यूटर नहीं सीखता।
सरकारी नौकरी तो खेत जोतने जैसा काम है। जो बैल जितना सीधा होगा उससे उतना ज्यादा जुताई कराई जायेगी
सवाल:- तो क्या आपको कभी कामचोरी का अपराध बोध नहीं होता?
जवाब:- पहले कभी-कभी कुछ तकलीफ होती थी। आपको बताऊँ ,जब मैं नया-नया आया था अपना सारा दिन उस चोंचले में खपा देता था जिसे आप लोग साधारण बोलचाल की भाषा में काम करना कहते हैं। क्या बोलते हैं उसे, हां याद आया कर्मठता,कर्तव्यपरायणता, काम के प्रति समर्पण आदि। लेकिन जैसे-जैसे मेरी समझ में इजाफ़ा हुआ ,मुझे लगा कि मैं कहाँ अपना समय बरबाद कर रहा हूँ? मैंने धीरे-धीरे अपने आपको काम-काज के क्षुद्र सांसारिक बंधनों से अपने आपको दूर करना शुरू कर दिया। पहले कुछ दिन तो कचोट सी लगी लेकिन समय के साथ सब ठीक होता गया। अब की हालत तो देख ही रहे हैं आप ।लेकिन आपाधापी की कार्यप्रणाली से इस सुकूनदेह कार्यप्रणाली अपनाने में कुछ महीने बरबाद
हो गये।
सवाल:-अब सब ठीक कैसे हो गया? क्या विचार करके आपने यह कार्यप्रणाली अपनाई?
जवाब:- असल में मैंने इस पर बहुत विचार किया। मैंने सोचा कि काम वास्तव में है क्या? फिर बहुत विचार करने के बाद पाया कि काम का हर एक के लिये अलग मतलब है। मैंने आगे पाया कि काम हर व्यक्ति के लिये वह प्रक्रिया होती है जिसे वह करता रहता है। दिन भर मेहनत करने वाले के लिये मेहनत करते रहना ही काम है। यदि कोई आरामतलब है तो उसके लिये खटिया तोड़ते रहना ही काम है। इसी तरह किसी के लिये किसी मामले का रायता फैलाना काम है तो किसी के फैले रायते को समेटना सबसे बड़ा काम है। कोई दुनिया भर से डरते रहने को काम कहता है कोई डराने को। कोई किसी को चापलूसी करने को काम समझता है दूसरा चापलूसी सुनने को। मैंने आगे विचार किया कि जो मैं कर रहा हूँ उसे करने से क्या फर्क पड़ता है? न करने से क्या बदलाव होता है? मैंने देखा कोई फर्क नहीं पड़ता। नहीं पड़ा। मेरी तन्ख्वाह उतनी ही रही। डीए अपने समय पर बढ़ा। काम उसी रफ्तार से हुआ। फाइलें उतनी ही गति से आगे बढ़ीं। रिपोर्टें आने-जाने की रफ्तार वही रही। हूटर उतनी ही तेज बजे। ओवरटाइम वही रहा। आसपास छायी मुर्दनी वैसी ही बनी रही। कैंटीन की चाय उतनी ही काली रही। पकौड़ी का नमक उतना ही तेज। लब्बोलुआब सब कुछ वही रहा। कुछ नहीं बदला सिवाय कैलेंडरों व कैलेंडर की तारीखों के। तब मुझे अहसास हुआ कि जब मेरे करने न करने से कुछ फरक नहीं पड़ता तो कुछ करूँ ही क्यों? क्यों थकाऊँ इस बेचारे निरपराध शरीर को जिसे मेरी आत्मा ने केवल इस जन्म के लिये किराये पर लिया है! पता नहीं किराया चुकाया भी या बाद में देने की बात करके मामला उधारी पर चल रहा हो। बहुत सोच विचार के बाद मैं आज इस मुकाम पर पहुँचा हूँ। इसमें मेरी मेहनत तथा लगन तो जो है सो है ,भारतीय संस्कृति का बहुत बड़ा योगदान है जो मानती है कि शरीर नश्वर है,आत्मा अमर है। खैर,तुम बताओ कैसे याद किया?
काम का हर एक के लिये अलग मतलब है। मैंने आगे पाया कि काम हर व्यक्ति के लिये वह प्रक्रिया होती है जिसे वह करता रहता है।
सवाल:- मैं आपसे ‘संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व’ विषय पर बात करना चाहता हूँ।मुझे इस विषय पर भाषण देना है। (मैंने जानबूझकर झूठ बोला कि अभी हमें भाषण देना है वर्ना वे कहते अब क्या जरूरत जब काम निकल गया)।
जवाब:-देखो ,आध्यात्म बड़ी मुश्किल से समझ में आने वाली चीज है। मुझ को ही बहुत से लोग कामचोर समझते हैं। बहुत कम लोगों को मेरे आध्यात्मिक स्वरूप की जानकारी है। बहरहाल, बता दूँ कि संरक्षा तथा आध्यात्म में चोली-दामन का साथ है( मुस्कराते हुये वह यह जोड़ना नहीं भूले कि यह अलग बात है कि आजकल चोली तथा दामन दोनों गायब होते जा रहे हैं)। फिर आध्यात्म में तो भारत विश्व का गुरू रहा है।
संरक्षा तथा आध्यात्म में सबसे बड़ा संबंध अक्रियता का है। ‘क्रिया के पहले तब तक अक्रिय रहना जब तक क्रिया सुरक्षित न हो जाय- संरक्षा कहलाती है।’ जबकि ‘आध्यात्म निरन्तर अक्रिया की स्थिति को कहते हैं।’ ये समझ लो कि संरक्षा की स्थिति का निरन्तर विकास आध्यात्म की सीढ़ी की ओर ले जाता है। इतिहास गवाह है इसका कि जब भी कोई महापुरुष अक्रियावस्था को प्राप्त हुआ तो उसकी परिणति आध्यात्म में ही हुई।
संरक्षा की स्थिति का निरन्तर विकास आध्यात्म की सीढ़ी की ओर ले जाता है
वो पूरे जोरशोर से चालू थे। किसी सुबह के चैनेल के बाबा की तरह अबाध गति से प्रवचन के मूड में आ गये थे। लेकिन इस प्रवचन में व्यवधान हुआ। लंच का समय हो गया था सो हूटर हो गया। वे आध्यात्मिक स्थिति से झटके से सांसारिक स्थिति
में आ गये तथा साइकिल उठाकर गेट की ओर चल दिये। चलते-चलते बोले-ये तो मैंने संक्षेप में बिना सोचे-विचारे बताया । लंच के बाद आना तब आगे बताऊँगा। जरूरत हुई तो सोच-विचार कर भी।
अब जबकि लँच खतम हो गया है। शाम होने को है। मैं सोच रहा हूँ कि संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व पर उनके विचार जानने जाऊँ या फिर खुद ही इस पर विचार कर लूँ या फिर एक रूटीन नोट पुटअप करके अपने बास से सलाह कर लूँ।
मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।आप ही कुछ बताओ- क्या करूँ,बिना सोचे-विचारे ही सही।
14fa

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व”

  1. e-shadow
    दस साल पहले भी आप इतने ही धारदार थे, मुझे लगा था कि कुछ और निखार आया होगा, बहरहाल लेख बहुत चुटीला बन पडा है।
  2. nitin 337 28
    44 बहुत खूब!!
    3 16
  3. 13
  4. c1 प्रत्यक्षा 2ca 28
    c0 सोचा कि बिना सोचे कुछ लिखें पर क्या लिखें ये सोचा ही न गया
    3 16
  5. 13
  6. fb Tarun 33b 28
    181 आप सीनियर चिठा्कारों को विशेष आमंत्रण है कि इस बार अनुगूँज में लिख ही डालिये, भाभी जी के गुस्‍से का ठीकिरा हमारे सर पे फोड़ दीजयेगा
    3 16
  7. 13
  8. bf नीरज दीवान 2cc 28
    20f बिना सोचे ही कह रहा हूं कि आपके इस लेख ने अब मुझे सोचने के लिए बाध्य कर दिया है. समझ गए ना आप. चुटीली शैली ने मुझे आपके ब्लॉग पर रोज़ आने वाला मेहमान बना दिया है. नोट कर लें. रोज़ परोसिएगा कुछ.
    3 16
  9. 13
  10. 1cf फ़ुरसतिया » अजीब इत्तफाक है… 321 28
    1fe [...] नीरज दीवान on संरक्षा का आध्यात्मिक महत्वTarun on संरक्षा का आध्यात्मिक महत्वTarun on हमने दरोगा से पैसे ऐंठेप्रत्यक्षा on संरक्षा का आध्यात्मिक महत्वnitin on संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व [...]
    3 16
  11. 13
  12. 197 फ़ुरसतिया-पुराने लेख 2ed 28
    43d [...] 1.संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व 2.अजीब इत्तफाक है… 3.यायावर चढ़े पहाड़ पर… 4.नेतागिरी,राजनीति और नेता 5.अभी उफनती हुई नदी हो… 6.रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी 7.गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी 8.गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता… 9.मौसम बड़ा बेईमान है… 10.सितारों के आगे जहाँ और भी हैं… 11.अमरीकी और उनके मिथक 12.अमेरिका-कुछ बेतरतीब विचार 13.पूर्णिमा वर्मन-जन्मदिन मुबारक 14.पूर्णिमा वर्मन से बातचीत [...]
  13. 1f1 : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176 354 28
    403 [...] 1.संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व 2.अजीब इत्तफाक है… 3.यायावर चढ़े पहाड़ पर… 4.नेतागिरी,राजनीति और नेता 5.अभी उफनती हुई नदी हो… 6.रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी 7.गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी 8.गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता… 9.मौसम बड़ा बेईमान है… 10.सितारों के आगे जहाँ और भी हैं… 11.अमरीकी और उनके मिथक 12.अमेरिका-कुछ बेतरतीब विचार 13.पूर्णिमा वर्मन-जन्मदिन मुबारक 14.पूर्णिमा वर्मन से बातचीत [...]
    3 16
  14. 25
5 3c
4f
2 3 2f

15 Leave a Reply 9f

13
6 e 9f
9c
95
c e5
ad
1a 129 2ed
मेरी ताज़ा प्रविष्टी टिप्पणी में जोडें

Wednesday, May 31, 2006

हम,वे और भीड़

http://web.archive.org/web/20110926115256/http://hindini.com/fursatiya/archives/136

हम,वे और भीड़

हरिशंकर परसाई का लेख ‘आवारा भीड़ के खतरे’ पढ़ने के बाद की ‘भारत भूषण तिवारीजी’ प्रतिक्रिया थी-
अब इसी कडी में ‘हम,वे और भीड’ भी पोस्ट कर दें तो बडी कृपा होगी
हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई
मैं तुरंत तो लेख पोस्ट नहीं कर पाया । लेकिन आज मौका मिला तो यह फरमाइश पूरी कर रहा हूँ। हरिशंकर परसाई का लेख- हम,वे और भीड़ किसी साल की शुरुआत में लिखा गया होगा। लेकिन लेख पढ़ने के बाद लगता है कि यह आज भी सार्थक है।

हम,वे और भीड़

जनवरी के नोट्‌स
एक कैलेण्डर और बेकार हो गया। पन्ना-पन्ना मैला हो गया और हर तस्वीर का रंग उड़ गया। हर साल ऐसा होता है। जनवरी में दीवार पर चमकीली तसवीरों का एक कैलेण्डर टंग जाता है और दिसम्बर तक तस्वीर की चमक उड़ जाती है। हर तस्वीर बारह महीनों में बदरंग हो जाती है।
पुराने कैलेण्डर की तस्वीर बच्चे काट लेते हैं और उसे कहीं चिपका देते हैं। हम सोचते हैं ,बच्चों का मन बहलता है, पर यह उनके साथ कितना बड़ा धोखा है। साल-दर-साल हम उनसे कहते हैं ,लो बेटों ,जो साल हमने बिगाड़ दिया,उसे लो। उसकी तस्वीर से मन बहलाओ। बीते हुये की बदरंग मुरझाई तस्वीरें हैं ये। आगत की कोई चमकीली तसवीर हम तुम्हें नहीं दे सकते। हम उसमें खुद धोखा खा चुके हैं और खाते रहेंगे। देने वाले हमें भी तो हर साल के शुरू में रंगीन तसवीर देते हैं कि लो अभागों ,रोओ मत। आगामी साल की यह रंगीन तसवीर है। मगर वह कच्चे रंग की होती है। साल बीतते वह भद्दी हो जाती है। धोखा, जो हमें विरासत में मिला, हम तुम्हें देते हैं। किसी दिन तुम इन बदरंग तसवीरों को हमारे सामने ही फाड़कर फेंक दोगे और हमारे मुँह पर थूकोगे।
नया साल आ गया। पहले मैं १५ अगस्त से नया साल गिनता था। अब वैसा करते डर लगता है। मन में दर्द उठता है कि हाय , इतने साल हो गये फिर भी! जवाब मिलता है कोई जादू थोड़े ही है। पर तरह-तरह के जादू तो हो रहे हैं। यही क्यों नही होता? अफसर के इतने बडे़ मकान बन जाते हैं कि वह राष्ट्रपति को किराये पर देने का हौसला रखता है। किस जादू से गोदाम में रखे गेहूँ का हर दाना सोने का हो गया? इसे बो दिया जायेगा ,तो फिर सोने की फसल कट जायेगी।
अफसर के इतने बडे़ मकान बन जाते हैं कि वह राष्ट्रपति को किराये पर देने का हौसला रखता है।
जनवरी से साल बदलने में दर्द न उठता , न हाय होती और न ‘फिर भी’ का सवाल उठता। आखिरी हफ्ते में कुछ यादें जरूर होती हैं। २३ जनवरी याद दिलाती है कि सुभाष बाबू ने कहा था- ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’ खून तो हमने दे दिया ,मगर आजादी किन्हें दे दी गयी? फिर भी २४ या २५ तारीख को लाल किले पर सर्वभाषा कवि सम्मेलन होता है जिसमें बडे़-बड़े कवि मेहनत करके घटिया कविता लिखकर लाते हैं और छोटे कवि मेहनत से और घटिया अनुवाद करते हैं। हिन्दी और उर्दू के कवि खास तौर से उचक्कापन और ओवरएक्टिंग करते हैं। यों इन भाषाओं की सारी समकालीन कविता घटिया हीरो की ओवरएक्टिंग है। फिर २६ जनवरी को गणतन्त्र दिवस होता है और हम संविधान की प्रति निकालकर गणतन्त्र के निर्देशक सिद्धान्त और बुनियादी अधिकारो का पाठ करते हैं। इसी वक्त गुरू गोलवरकर की वाणी सुनाई देती है कि यह राष्ट्र तो सिर्फ हिन्दुओं का है-मुसलमान ,पारसी,ईसाई वगैरह विदेशी हैं और खासकर मुसलमान तो देशद्रोही हैं। मगर जो सुरक्षा सम्बन्धी गुप्त बातें पाकिस्तान को देते पकड़े गये,वे शुद्ध ब्राह्मण हैं। यह भी जादू है।
सुभाष बाबू ने कहा था- ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’ खून तो हमने दे दिया ,मगर आजादी किन्हें दे दी गयी?
फिर ३० जनवरी…।
हमारे बापों से कहा जाता था कि आजादी की घास गुलामी के घी से अच्छी होती है। हम तब बच्चे थे,मगर हमने भी इसे सुना ,समझा और स्वीकारा।
आजाद हो गये,तो हमने कहा-अच्छा अब हम गौरव के साथ घास भी खा लेंगे।
नारा लगाने वालों से यह पूछना भूल गये कि कब तक खायेंगे।
मगर हमने देखा कि कुछ लोग अपनी काली-काली भैंसे आजादी की घास पर छोड़ दी और घास उनके पेट में जाने लगी। तब भैंस वालों ने उन्हें दुह लिया और दूध का घी बनाकर हमारे सामने पीने लगे।
धोखा ही हुआ न! हमें और हमारे बापों को बताया ही नहीं गया था कि आजादी की घास तो होगी ,पर कुछ के पास कभी-कभी भैंसे भी होंगी।
अब हम उनसे कहते हैं-यारों तुम भी आजादी की घास खाओ न!
वे जवाब देते हैं-खा तो रहे हैं। तुम घास सीधे खा लेते हो और हम भैंसों की मारफत खाते हैं। वह अगर घी बन जाती है ,तो हम क्या करें?
और हम अपने बाप को कोसते हैं कि तुमने तभी इस बारे में साफ बातें क्यों नहीं कर लीं।वह काली भैंसों वाली शर्त क्यों मान ली? क्या हक था तुम्हें हमारी तरफ से सौदा करने का?
सोशलिस्ट अर्थशाष्त्री से पूछते हैं तो वह अपनी उलझी हुई दाढ़ी पर हाथ फेरकर कहता है-कम्पल्शंस आफ ए बैकवर्ड इकानामी! पिछड़ी अर्थव्यवस्था की बाध्यताएँ हैं ये।
हैं तो। घर से दुकान तक पहुँचते भाव बढ़ जाते हैं।
देश एक कतार में बदल गया है। चलती-फिरती कतार है-कभी चावल की दूकान पर खड़ी होती है,फिर सरककर शक्कर की दूकान पर चली जाती है। आधी जिन्दगी कतार में खड़े-खड़े बीत रही है।
‘शस्य श्यामला’ भूमि के वासी ‘भारत भाग्य विधाता’ से प्रार्थना करते हैं कि इस साल अमेरिका में गेहूँ खूब पैदा हो और जापान में चावल।
हम ‘मदरलैण्ड’ न कहकर ‘फादरलैण्ड’ कहने लगें तो ठीक होगा। रोटी माँ से माँगी जाती है ,बाप से नहीं। ‘फादरलैण्ड ‘ कहने लगेंगे , तो ये माँगें और शिकायतें नहीं होंगी।
मैं फिर भीड़ के चक्कर में पड़ गया।
मेरा एक मित्र सही कहता है- परसाई,तुम पर भीड़ हावी है। तुम हमेशा भीड़ की बात भीड़ के लिये लिखते हो। देखते नहीं , अच्छे लेखकों की चिंता यह है कि भीड़ के दबाव से कैसे बचा जाये।
छोटा आदमी हमेशा भीड़ से कतराता है। एक तो उसे अपने वैशिष्ट्य के लोप हो जाने का डर रहता है,दूसरे कुचल जाने का। जो छोटा है और अपनी विशिष्टता को हमेशा उजागर रखना चाहता है,उसे सचमुच भीड़ में नहीं घुसना चाहिये। लघुता को बहुत लोग इस गौरव से धारण करते हैं,जैसे छोटे होने के लिये उन्हें बहुत बड़ी तपस्या करनी पड़ी है। उन्हें भीड़ में खो जाने का डर बना रहता है।
छोटा आदमी हमेशा भीड़ से कतराता है। एक तो उसे अपने वैशिष्ट्य के लोप हो जाने का डर रहता है,दूसरे कुचल जाने का।
एक तरकीब है,जिससे छोटा आदमी भी भीड़ में विशिष्ट और सबके ध्यान का केंद्र बन सकता है -उसे बकरे या कुत्ते की बोली बोलने लगना चाहिये। भीड़ का उद्धेश्य जब सस्ता अनाज लेने का हो,वह इसके लिये आगे बढ़ रही हो, उसका ध्येय ,एक मन:स्थिति और एक गति हो -तब यदि छोटा आदमी बकरे की बोली बोल उठे , तो वह एकदम विशिष्ट हो जायेगा और सबका ध्यान खींच लेगा।
लोग मुझसे कहीं होशियार हैं। मेरे बताये बिना भी वे यह तरकीब जानते हैं और भूखों की भीड़ में बकरे की बोली बोल रहे हैं।
बड़ा डर है कि भीड़ हमें यानि स्वतंत्र चिन्तकों और लेखकों को दबोच रही है।
वे नहीं जानते या छिपाते हैं कि भीड़ से अलग करके भी किसी एकान्त में दबोचे जाते हैं। लेखकों की चोरी करने वाले कई गिरोह हैं। वे भीड़ में शिकार को ताड़ते रहते हैं और उसे भीड़ से अलग करके ,अपने साथ किसी अँधेरी कोठरी में ले जाते हैं। वहाँ उसके हाथ-पाँव बाँधकर मुँह में कपड़ा ठूँस देते हैं। तब स्वतंत्र चिंतक सिर्फ ‘घों-घों’ की आवाज निकाल सकता है। गिरोहवाले उस ‘घों-घों’ में सौन्दर्यशाष्त्रीय मूल्य ढ़ूँढ़कर बता देते हैं। उसे तत्व ज्ञान सिद्ध कर देते हैं।
जिसकी अनाज की थैली लेकर दूसरा कोई कतार में खड़ा हो ,वह भीड़ से घृणा कर सकता है। जिसका थैला अपने ही हाथ में हो ,वह क्या करे?
भीड़ से बचने का एक तरीका और है। एक मीनार खड़ी करो। उस पर बैठ जाओ। एक लम्बी रस्सी में खाने का डिब्बा बाँधकर नीचे लटकाओ और ऊपर से रोओ। कोई दया करके डब्बे में दाल -रोटी रख देगा। डिब्बा ऊपर खींचकर रोटी खा लो और ऊपर से भीड़ पर थूको।
जिसकी अनाज की थैली लेकर दूसरा कोई कतार में खड़ा हो ,वह भीड़ से घृणा कर सकता है। जिसका थैला अपने ही हाथ में हो ,वह क्या करे?
लेखक की हालत खस्ता है। वह सोचता है कि मेरा अलग से कुछ हो जाये। सबके साथ होने में विशिष्टता मारी जाती है। दिन-भर पेट भरने के लिये उसके जूते घिसते हैं और शाम को काफी हाउस में बैठकर वह कहता है कि हमें कोई भीड़ से बचाओ।
उधर भीड़ कहती है कि कोई हमें इनसे बचाओ।
राजनीति की बू आती है , इन बातों से । है न!
लेखन को तो मनुष्य से मतलब है,राजनीति वगैरह से क्या?
मगर मनुष्य की नियति तय करने वाली एक राजनीति भी है।
लेखक दम्भ से कहता है,पहली बार हमने जीवन को उसके पूर्ण और यथार्थ रूप में स्वीकारा है।
तूने भाई, किसका जीवन स्वीकारा है? जीवन तो अर्थमंत्री के बदलने से भी प्रभावित हो रहा है और अमरिकी चुनाव से भी।
कल अगर फासिस्ट तानाशाही आ गयी , तो हे स्वतंत्र चिंतक ,हे भीड़ द्वेषी, तेरे स्वतंत्र चिंतन का क्या होगा? फिर तो तेरा गला दबाया जायेगा और तूने अपनी इच्छा से कोई आवाज निकालने की कोशिश की तो गला ही कट जायेगा।
आज तू यह सोंचने में झेंपता है और ऊपर से कहता है- आज हम जीवन से सम्पृक्त हैं।
कल अगर फासिस्ट
तानाशाही आ गयी , तो हे स्वतंत्र चिंतक ,हे भीड़ द्वेषी, तेरे स्वतंत्र चिंतन का क्या होगा?
भीड़ की बात छोड़ें। लेखकों की बात करें।
‘अज्ञेय’ को ‘आँगन से पार द्वार’ पर अकादमी -पुरस्कार मिल गया। पहले क्यों नहीं मिला? उम्र कम थी। आम मत है कि ‘आँगन के पार द्वार’ से पहले के संग्रहों की कवितायें अच्छी हैं।
फिर उन पर क्यों पुरस्कार नहीं मिला? तब उम्र कम थी और अच्छी रचना को पुरस्कृत करने की कोई परम्परा नहीं है।
पं. माखनलाल चतुर्वेदी का सम्मान हुआ और थैली भेंट की गयी। पहले क्यों नहीं हुआ? उम्र उनकी भी कम थी।
जानसन ने लार्ड चैस्टरफील्ड को चिट्ठी में लिखा था कि माई लार्ड , क्या ‘पेट्रन’ वह होता है जो किनारे पर खड़ा-खड़ा आदमी को डूबते देखता रहे और जब वह किसी तरह बचकर बाहर निकल आये, तो वह उसे गले लगा ले।
पुरस्कार और आर्थिक सहायता रचना करने के लिये मिलते हैं या रचना बंद करने के लिये?
मैं देने वालों के पास जाऊँ और कहूँ- सर,मैं लिखना बन्द कर रहा हूँ-इस उपलक्ष्य में आप मुझे क्या देते हैं?
सर पूछेगा- कब से बन्द कर रहे हो?
-अगली पहली तारीख से।
सर कहेगा- तुम कल ही से बन्द कर दो तो मैं कल ही से तुम्हारी मासिक सहायता बाँध देता हूँ। खबरदार,लिखा तो बन्द कर दूँगा।
मैं कहूँगा-ऐसा है तो मैं आज से ही बन्द कर दूँगा। आज से ही तनखा बाँध दीजिये।
एक वृद्ध गरीब लेखक बेचाराइधर शहर में घूम रहा है। उसे दो ‘प्रतिष्ठित’ आदमियों से दरिद्रता के सर्टिफिकेट चाहिये। उसने सहायता के लिये दरख्वास्त दी है। उसमें नत्थी करेगा। तब कलेक्टर जाँच करके सिफारिश करेगा कि हाँ,यह लेखक सचमुच दरिद्र है,दीन है। दीन नहीं है, ऐसे दो बेईमान चन्दा खानेवालों ने इसकी दरिद्रता प्रमाणित की है।
क्या मतलब है इन शब्दों का- स्वतंत्रचेता, द्रष्टा,विशिष्ट,आत्मा के प्रति प्रतिबद्द ,आत्मा का अन्वेषी?
जिसने हमें क्रान्ति सिखायी थी औरजो कहता था कि मेरी आत्मा में हिमालय घुस गया है, उसे मैंने अभी देखा।
जिसने ज्वाला धधकाने की बात की थी उसे भी अभी देखा।
जो सन्त कवियों की ‘स्पिरिट’ को आत्मसात किये है, उसे भी देखा।
कहाँ देखा?
मुख्यमंत्री के आसपास। तीनों में प्रतिस्पर्धा चल रही थी कि कौन किस जेब में घुस जाये। कोट की दो जेबों में दो घुस गये।
तीसरे ने कहा-हाय,अगर मुख्यमंत्री पतलून पहने होते तो , तो मैं उसकी जेब में घुस जाता। तीनों ‘एम्प्लायमेण्ट एक्सचेंज’ से कार्ड बनवाकर जेब में रखे हैं। किसी को कुछ होना है,किसी को कुछ।
कहानी पर बात करना व्यर्थ है। मैं पिछले दो महीने से व्यूह- रचना के सम्पर्क में नहीं हूँ। उसे जाने बिना मूल्यों की बात नहीं हो सकती। दिल्ली जाकर चार तरह के लेखकों से मिलूँगा। वे चार तरह के कौन? काफी हाउस वाले,टी हाउस वाले, शालीमार वाले और फोन पर हेलो वाले।
साहित्य की सबसे बड़ी समस्या इस समय यह है कि डा. नामवार सिंह ने एक लेख में श्रीकान्त वर्मा को ‘कोट’ किया है और तारीफ तथा सहमति के साथ किया है। यह चकित करने वाली बात है।
हम सबके लिये आगामी माह का ‘असाइनमेंट ‘ यही है कि हम इस रहस्य का पता लगायें। तब कुछ पढ़ें -लिखें।
-हरिशंकर परसाई

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

6 responses to “हम,वे और भीड़”

  1. आशीष
    परसाई जी के व्यंग्य हंसाते कम चुभते ज्यादा है|
  2. भारत भूषण तिवारी
    पहली टिप्पणी करके कृतज्ञता व्यक्त कर रहा हूँ.फरमाइश इतनी जल्दी पूरी करने हेतु धन्यवाद.
  3. समीर लाल
    बेहतरीन साहित्य पढवा रहे हैं, अनूप भाई. जारी रखें.बधाई हो.
  4. अनूप भार्गव
    परसाई जी एक ‘राष्ट्रीय निधी’ थे , उन की यह रचना पहुँचानें के लिये धन्यवाद.
  5. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.छीरसागर में एक दिन 2.शंकरजी बोले- तथास्तु 3.धूमिल की कवितायें 4.थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई अड्डे से 9.अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा… 10.हम,वे और भीड़ [...]
  6. चंदन कुमार मिश्र
    ‘डा. नामवार सिंह ने एक लेख में श्रीकान्त वर्मा को ‘कोट’ किया है और तारीफ तथा सहमति के साथ किया है। यह चकित करने वाली बात है।’—वाह जी। अजीब सवाला उठाया इन्होंने। अब होये और यह बात कहते तो बालीवुडी-मीडिया पीछे पड़ के कई धाँसू एपिसोड दिखा चुका होता…हमेशा की तरह बेहतर…

Sunday, May 28, 2006

अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा…

http://web.archive.org/web/20110926075915/http://hindini.com/fursatiya/archives/135

अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा…

दिल्ली से मुंबई के लिये जहाज मिला रात के साढ़े दस बजे।मुंबई पहुँचे रात के सवा बजे। टैक्सी ड्राइवर हमारा इंतजार कर रहा था। तुरंत पूना के लिये चल दिया। मुंबई-पूना हाईवे पर झारखंडी ड्राइवर की मुंबइया हिंदी में पिछले बरस मंबई की बाढ़ के किस्से सुनते हुये हम नींद में डूब गये। नींद खुली तो वो अपने झारखंड के बचपन के किस्से सुना रहा था तथा बता रहा था कि जन्मभूमि को कोई कैसे भूल सकता है!
बहरहाल किस्सों में डूबते उतराते जब हम अपने गेस्ट हाउस के कमरे में पहुँचे तो घड़ी चार बजा रही थी। यह समय हमारे बुजुर्गों ने जागने के लिये तय किया है। लेकिन बुजुर्गों से माफी मांगते हुये हम खर्टारे भरने लगे। यह क्रम टूटा सबेरे सात बजे जब चाय आई।चाय आई तो साथ में देबाशीष की याद लाई। हमहू सोचा ,लाओ यार कुछ देर देबू से बतियाई।
किरकी के गेस्ट हाउस में
देबाशीष-अनूप
बात हुई तो पता चला कि देबू ‘पत्नी विछोह सुख’ लूट रहे हैं। अब मुझे कारण समझ में आया कि कैसे मेरी पूना पहुँचने की मेल की सूचना के जवाब में तुरंत देबू ने मुझे अपने घर में ठहराने का वीरता पूर्ण निमंत्रण दे डाला था-बिना पत्नी से पूछे। पत्नी की अनुपस्थिति में पति ,भले ही वो बंगाली ही क्यों न हो,कितना उदार/बहादुर हो जाता है!
बहरहाल हम पहले से ही दाल में काला भांपते हुये अपने गेस्ट हाउस में रुके। कारण यह भी लालच था कि अपने तमाम दोस्तों से मुलाकात हो जायेगी। जानकारी के लिये बता दूँ कि आयुध निर्माणियों की तीन फैक्ट्रियाँ पूना में हैं। जिनमें से एक तो सन्‌ १८२५ को संस्थापित है। यहाँ सेना के लिये विस्फोटक बनते हैं। यहाँ देश की सबसे पुरानी तथा सबसे आधुनिक तकनीक का अनूठा सम्मिश्रण है।
गेस्ट हाउस के बाहर
देबाशीष-अनूप
बहरहाल देबाशीष से हमने कहा,’ भइये तुम्ही अपने को उठा के यहाँ ले आओ। ताकि तुम्हारा कष्ट भी कम हो ,हमारा भी।’
देबू ने हमारा अनुरोध मान लिया-बिना नखरे किये । हम चाय-पीकर राजा बेटा बन कर देबाशीष का इंतजार करने लगे।इंतजार करते-करते आसपास के फोटो भी ‘खैंचे’। उन फोटो में गुलमोहर का भी एक फोटो था।
देबाशीष गेस्ट हाउस के पास ही रहते हैं। सो ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ा। कुछ ही देर में हम देबाशीष से हाथ मिला रहे थे-दिल पहले ही मिल चुका था।
कुछ देर की गुफ्तगू के बाद हमने देबाशीष को दो किताबें सौंप दीं। रागदरबारी तथा आधा गांव। तीसरी कसप अभी बकाया है। वो भी जल्द ही भेंट की जायेगी।देबू ने एक किताब पर क्या लिखा है बता दिया लेकिन दूसरी के बारे में छिपा गये। दूसरी किताब पर हमने लिखा था-‘ हिंदी ब्लागजगत के पितामह के नाम से विख्यात/कुख्यात देबाशीष के लिये तमाम शुभकामनाओं मंगलकामनाओं के साथ।’
देबू को’ब्लागजगत के पितामह’ की पदवी दी है रविरतलामी ने । यह भी संयोग है कि हमको ब्लाग जगत के महासागर में धकेलने वाले रविरतलामी थे तथा शुरूआत हमने देबाशीष के ब्लाग पर उपलब्ध की बोर्ड से की सहायता से कि थी। पहली पोस्ट में बहुत देर की मेहनत के बाद लिखा था-
अब कबतक ई होगा ई कौन जानता है
फिर तो पता नहीं कहां-कहां की बातें होती रहीं। हमने नाश्ता किया । पता चला कि जहाँ हमें जाना था वह जगह देबाशीष के आफिस के पास ही है। फिर तो हमने अपने लिये जो गाड़ी आनी थी उसे मना कर दिया । सोचा कि देबाशीष के साथ बतियाये हुये जायेंगे।
देबाशीष के स्कूटर पर बैठने से पहले हमने हवा के बारे में पूछ लिया । स्कूटर तथा देबू दोनों की हवा सलामत थी। देबू खरामा-खरामा बंगाली स्पीड में स्कूटर चलाते हुये हमें लेकर चल दिये। हम रास्ते भर बतियाते रहे। देबू चूंकि आवारा टाइप के नहीं हैं लिहाजा उनको अपने आफिस के आस-पास की भी तमाम जगहों का अंदाजा नहीं है। हम जब होटल पहुंचे जहां हमारी ट्रेनिंग होने वाली थी तो दस बज रहे थे। देबू हमें छोड़कर आफिस चले गये।
बीच में एकाध बार बात हुई। शाम को जब मेरी क्लास छूटी तो देबू से फिर बात हुई। हमने कहा कि तुम अपना काम करो। शाम को मिलते हैं। देबू मान से भी गये तथा हमें जाने के दो-तीन रास्ते, तरीके बता दिये।इस बीच हम वहीं ‘सोहराब हाल’ में देबाशीष की बताई किताब की दुकान ‘क्रासवर्ड’ में भी टहल आये। वहाँ हर तरफ अंग्रेजी की किताबें पसरी थीं। हम बिना हल किये ‘क्रासवर्ड’ से बाहर आ गये।
इसके बाद हम जाने के सबसे फुरसतिया तथा फोकटिया तरीके का विचार करते बस का इंतजार करते रहे। हम प्रस्थान करने ही वाले थे कि देबाशीष पर ‘अतिथि देवो भव’ के वायरस ने हमला कर दिया। देवता के रोमिंग पर आ चुके मोबाइल के दस रुपये फूंकते हुये वो बोले-आप वहीं रुको मैं आता हूँ।
हम रुक गये। मैं देबाशीष के आने की राह तथा सड़क पर गुजरती सुंदरियों को ताकने लगा। कुछ देर में देबू ने हमारी तपस्या भंग की। तथा हमें तपस्या के फल के रुप में चाय पिलाने का आग्रह किया।आदमी किसी प्रिय से मिलने पर भावविभोर हो जाता है। सुदामा जब कृष्ण से मिले तो कृष्ण वावरे हो गये थे तथा पानी की जगह आँसुओं से ही उनके पैर धोने लगे-
‘पानी परात को हाथ छुओ नहिं नैनन के जल सों पग धोये।’
बियर की दुकान में चाय

चाय ६० रुपये कप
यहाँ हम दोनों ही पर्याप्त बौराये थे सो बिना कुछ बिचारे बियर की दुकान में चाय पीने घुस गये। और जब बिना बिचारे का इनपुट दिया जायेगा तो पछताने का आउटपुट आना लाजिमी था। चाय की कीमत साठ रुपये!
चाय के एक कप की कीमत देखते ही हमें जो चाय अभी तक सर्व भी न की गई थी -उसका स्वाद खराब लगने लगा। मुझे लगता है कि देश के किसी भी हिस्से में चाय की कीमत अगर रुपयों में दो अंको से अधिक है तो वह चाय पीना बेवकूफी है। लेकिन देबू के कारण यह बेवकूफी करनी पड़ी।वैसे हमने कहा भी -आओ यार,कहीं ढाबे पर पीते हैं चाय।लेकिन देबू का सिस्टम अभी तक ‘अतिथि देवो भव’ के वायरस की चपेट में था।
बहरहाल ,हमने चाय तो पी ही। वातानुकूलित हवा का आनंद लेते हुये ढेर सारी बातें की। पता नहीं किन-किन मुद्दों पर,किन-किन लोगों के बारे में। देबाशीष ने कई लोगों की बहुत तारीफ की। जिनमें आलोक,रमन,पंकज,सुनीलदीपक,हिंदीब्लागर आदि इत्यादि के नाम प्रमुख । जीतू की उछल-कूद भी चर्चा से बाहर कैसे रह सकती है(ये नाम मैंने स्मृति के आधार पर लिखे और लोग अपना नाम सुविधानुसार जोड़ लें)। रवि रतलामी भी थे भाई समय बरवाद करने वाली चर्चा में थी इनकी टाइपिंग स्पीड तथा देबाशीष का बयान-’रवि भाई,पता नहीं कहां-कहां लिखते रहते हैं। गजब की स्पीड है भाई।’ तमाम बातें होतीं रहीं। घंटों। शाम होने पर मैं लौट आया। देबू अपने आफिस चले गये। बाद में रात को फिर गेस्ट हाउस में मिलना तय हुआ ।
रात को हम देबू का इंतज़ार करते रहे। आना करीब साढ़े नौ पर तय हुआ था। खाने वाला बार-बार घंटी बजा बजा रहा था-साहब,खाना तैयार है। हम बार-बार कह रहे थे -खाने वाले तो आ जायें।
बहरहाल, खाने वाले समय पर आये । हम खाना खाने के लिये डाइनिंग हाल में गये। खाकर फिर कमरे में आ गये। बतकही होने लगी। हम दोनों ‘दून की’ हाँकने लगे।
इस बीच हमने एक किताब पढ़ी थी ‘हरसूद-३० जून’ । यह वह कस्बा है जो कि तीस जून,२००४ को नर्मदा सागर बाँध परियोजना में डूब गया। सहारा समय के पत्रकार विजय मनोहर तिवारी ने डूब क्षेत्र के लोगों की परेशानियों का प्रत्यक्ष रिपोर्टिंग के बाद के अनुभव इस किताब में लिखे हैं।जो लोग बिना दूसरों की परेशानी जाने मेधा पाटकर या किसी दूसरे पर्यावरणविद को विकास विरोधी बताते हुये बेसाख्ता कोसते हैं उनको ‘हरसूद-३० जून’ तथा वीरेंद्र जैन का उपन्यास ‘डूब’ पढ़ना चाहिये तथा बशीर बद्र का शेर याद करना चाहिये-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने (उजाड़ने)में।
हम लोग विजय मनोहर तिवारी से बातचीत के बारे में योजना बनाते रहे।
इस बीच अतुल,देबू,स्वामी के रिश्ते भी कुछ गरमाहट भरे रहे। हमनें बहुत देर इस मुद्दे पर बातचीत की। संयोग कुछ ऐसा है कि ये तीनों ही हमारे बहुत प्यारे दोस्त हैं। यह भी संयोग है कि मुझे लगता है कि मैं सबके व्यक्तित्व की ‘केमेस्ट्री’ से बहुत हद वाकिफ हूँ।
गेस्ट हाउस के कमरे में

हरसूद डूब गया>
मजे की बात कि अतुल के लेखन के देबाशीष मुरीद हैं,देबू के तकनीकी कौशल और तमाम दूसरी बातों का लोहा स्वामी तथा अतुल मानते हैं स्वामी के दिल के खरे होने की कसमें अतुल खाते हैं( जिनको स्वामी के साथ ईमेलिया मल्ल का बेहतरीन अनुभव है)। सच तो यह है कि इन बेचारों के पास अपनी अइसी कोई बुरी आदत नहीं है जिसकी ढील देते हुये लेकर ये अपने गरमाहट के पेंच बहुत देर तक लड़ा सकें। लेकिन लगता है कि दूरियाँ कुछ दरार बना ही देती है। इसीलिये कहते हैं मिलते रहा करो- दिल मिले न मिले ,हाथ मिलाते रहिये।
दिल-हाथ मिलाते रहना जरूरी भी है। नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि इधर आप पेंच लड़ाने में मसगूल रह जाओ और उधर को लंगड़ डाल के सारा मंझा तथा पतंग लूट ले जाये।
इस मुद्दे पर बतियाते हुये हमने अइसे-अइसे सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विष्लेषण किये कि अगर कहीं उन सबको नेट पर प्रकाशित करा दें तो तमाम समाजविज्ञानी-मनोवैज्ञानिक गण्डा बँधाने चले आयें।लेकिन कौन पड़े झमेले में! आसान नहीं है खलीफागिरी आजकल।
निष्कर्षत: हमने बयान जारी किया –
वो बरतन क्या जो खटके न, वो दोस्त क्या जो भड़के न।
बात करते-करते आधी रात से ज्यादा हो गयी।बातें थीं कि खतम हीं नहीं हो रहीं थी। इसी के लिये शायद किसी ने लिखा है-
रात-रात भर बातें की हैं,
बात-बात पर रातें की हैं।
बहरहाल अगले दिन फिर मिलने का वायदा होकर हमने सभा बरखास्त की।
होटल मधुबन
चाय बढ़िया है यार!
अगले दिन दोपहर के बाद हमारा काम खतम हो गया। चार बजे हमने देबू को बताया । फिर से हम चल दिये अड्डेबाजी के लिये। इस बार अड्डा बना देबाशीष के आफिस के पास का होटल-मधुबन। अड्डे की तरफ जाते हुये देबू ने दूर से अपना आफिस भी दिखाया। हमने कहा कि चलो जरा उसकी भी खिंचाई(फोटो) कर लेते हैं। लेकिन देबू बोले-चलिये पहले चाय पी लेते हैं। तब आराम से बैठेंगे आफिस में।
वैसे हम पहले एक लखनवी चाट की दुकान में चाय पीने गये। वहां देबू ने होटलवाले को मेज साफ करने के लिये कहा। वेटरों में शायद ‘पहले आप,पहले आप’ शुरू हो गया होगा। लिहाजा मेज पर न्यूटन का पहला नियम लग गया।उसकी स्थिति बहुत देर तक जस की तस बनी रही।
होटल मघुबन के बाहर
देबाशीष-अनूप,चाय लड़ाने के बाद
चाय की दुकान हमें बहुत भली लगी। काहे से कि चाय की कीमत चार रुपये थी। दूसरी बात पर्याप्त भीड़ भी थी दुकान में । लुटने का कोई खतरा नहीं था। वेटर ने फोटो भी मुफ्त में खींचा।
यहाँ होटल मधुबन में भी ऐतिहासिक वार्ता हुई। देबू ने हमें ‘इंडीब्लागर अवार्ड’ की बची हुई ‘टी शर्ट’ भेंट की। यह तय था कि यह तो मुझे लेनी ही है,लिहाजा मैंने थोडी़ देर ना-नुकर भी की। फिर बिना शरमाये ग्रहण कर ली।
यहीं देबाशीष ने निरंतर को दुबारा चलाने के बारे में फिर से विस्तार से बातें कीं। निरंतर लगता है देबू के लिये वह तोता हो गया है जिसमें देबू की जान बसती है। देबाशीष ने फिर रमन की तारीफ की निरंतर का डोमैन खतम होने के बहुत पहले उन्होंने देबाशीष को सारे पासवर्ड वगैरह दे दिये थे ताकि देबू निरंतर का डोमैन ‘रिन्यू’ करा ले।
देबाशीष ने मुझसे निरंतर के संचालन के लिये सहयोग मांगा। देबाशीष दूरदर्शी भी हैं। सहयोग की बात करने के पहले इसके पहले आलू चिप्स में नमक मिलाकर खिला चुके थे। अब जिस शहर के लाड़ले का नमक खा लिया तो उसको कैसे मना किया जा सकता है! लिहाजा हम बोले-तथास्तु!
हमने सोचा मौका ऐतिहासिक बनाने के लिये एकाध डायलाग मारने की परम्परा है सो मार दिया जाय।सो हमने – मेरा हर तरह का सहयोग तुम्हारे साथ है। हो सकता है कि हमारे-तुम्हारे कुछ मतभेद बनें रहें लेकिन मतभेद रहें या न रहें सहयोग हमेशा बना रहेगा- अनकंडीशनल मतलब बिना शर्त का।
देबू ने हमारे सहयोग के ठीकरे को बिना भावुक हुये समेट लिया यह कहते हुये कि जब कोई मतभेद की बात हो तो मन में मत रखना,बता जरूर देना।
पता नहीं ससुरे समय को क्या जल्दी पड़ी थी। सरकता जा रहा था-सरपट। कुछ ही देर में हम विदा हुये।तमाम सारी यादें समेटे हुये। इस विदा बेला की हड़बड़ी में देबू के आफिस की फोटो छूट गयी।
अपनी बात खतम करूँ उसके पहले देबू नेझूठी तारीफ करते हुये जो अन्याय हमारे साथ किया उसका जरा कुछ बदला चुका लूँ।
हमारे ख्याल में सबसे पहली खटपट देबू से हमारी ही हुई थी। हमारे ब्लाग का स्वागत करते हुये हमारी भाषा के बारे में कुछ टिप्पणी देबू ने की थी। हमने देबू की खूब खिंचाई की। देबू ने अपनी टिप्पणी में सुधार कर लिया। लेकिन जो चोट देबू ने अपने टिप्पणी वापस लेकर हमें दी वह आजतक कसकती है। तथा हमें अपनी सबसे खराब पोस्ट वही लगती है जिसमें हमने देबू की खिंचाई की थी तथा जिसमें देबू की अफसोसनामे की टिप्पणी है।। लेकिन हमने यह पोस्ट हटाई नहीं -ताकि सनद रहे(सुन रहे हो अतुल)।
यह वह समय था जब हिंदी ब्लागजगत की हवायें देबू के इशारे पर बहतीं थीं।
चलें फिर मिलेंगे
देबाशीष-अनूप
समय के साथ हमारा देबू के साथ याराना बढ़ता गया। तमाम यादगारें जुड़ीं।बहुत कँजूस तारीफ करने वाला होने के बावजूद देबू हमारे लेखन के मुरीद होते गये (ऐसा वही कहते हैं)तथा यदाकदा तारीफ भी करते पाये गये। तथा हम देबू के उस तकनीकी कौशल के प्रशंसक होते गये जो हमारे पल्ले ही नहीं पड़ता था।
अभी देबू की पोस्ट से यह भी पता चला कि हमारा लिखा भी बहुत कुछ उनके पल्ले नहीं पड़ता है। इस लिहाज से हम दोनों बराबर के धरातल पर हैं -दोनों को एक दूसरे का बेहतरीन पक्ष समझ नहीं आता इसलिये एक-दूसरे के मुरीद हैं।
तमाम उतार चढ़ाव के साथ नये लोग जुड़ते चले गये। फिर निरंतर का प्रकाशन शुरू हुआ। लगभग सभी लोग जुड़े थे इसमें लेकिन मुझे लगता है सबसे ज्यादा मेहनत इसमें देबू ने तथा फिर रमन ने की। जुड़े हम भी थे लेकिन तकनीकी तंगी का बहाना करते हुये कई बार बच निलतते थे। देबू को मेहनत बहुत पड़ गई।देबाशीष ने सँपादन का भार किसी और से संभालने की बात कहते हुये संपादन का काम रोक दिया। देबाशीष के बाद सँपादक मँडल में सभी के सामने खुली चुनौती थी, पत्रिका कोचलाने की,लेकिन देबू के बाद पत्रिका चल नहीं सकी।
नतीजतन अगस्त के महीने में निरंतर की स्थिति भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की तरह हो गई। उसकी तमाम खुशनुमा यादें तो बनी रहीं लेकिन पत्रिका निकल नहीं पाई।
बाद में पत्रिका बंद होने के तमाम कारणों में देबू का अपनी बात मनवाने पर अड़ने के रवैया तथा दंभी स्वभाव भी चर्चा में रहा। इसके बाद भी इंडीब्लागीस के समय भी हमने भी देबू को कुछ बातों के लिये कोसा । लेकिन देबू ने जो ठीक समझा, किया। सफलतापूर्वक किया।
देबू से मैंने इस मुद्दे पर बात नहीं की लेकिन जितना मैं जानता हूँ और जितना मैं दो दिन में समझ पाया मुझे लगता है कि
ये ‘बच्चा’ अड़ियल हो सकता है ,दंभी कतई नहीं है।
देबाशीष ने अपनी व्यस्तता का जिक्र करते हुये बताया कि वो सबेरे दस बजे आफिस के लिये निकलकर रात को नौ कभी-कभी दस बजे तक घर पहुँचते हैं। डेस्क पर बैठे-बैठे गरदन अकड़ जाती है। आजकल गरदन के दर्द के कारण हेलमेट तक नहीं लगा पाते।ऐसे में मनचाहा काम करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
देबू बोलते हैं तो बहुत नापतौल कर। यह आदत न बंगालियों से मेल खाती है न बनारसी से-जो बोलते हैं तो बिन्दास बोलते हैं। आवाज का उतार चढ़ाव भी एकदम ‘कंट्रोल्ड’।
मुझे लगा कि अगर संभव होता तो मैं स्वामी की उद्दंडता( कहना मैं शरारत चाहता हूं लेकिन उद्दंडता का मजा ही कुछ और स्वामीजी इसे बिना बुरा माने ग्रहण करें । बुरा मानने की स्थिति में सूचित करें व उद्दंडता को समुचित शब्द से बदलने का सुझाव भी भेजें।),अतुल की कुछ किस्सा गोई जीतेंदर का कुछ गैरजिम्मे दाराना अंदाज़ देबाशीष को ट्रांसफर कर देता। मेरे पास देने को कुछ है नहीं सिवा आवारगी के जज्बे के। लेकिन खुदा गंजे को नाखून नहीं देता।सो जैसा है उसी से काम चलाना पड़ेगा।
पुष्प से खिले रहो हमेशा
गुलमोहर<br />
देबाशीष ने मेरी बहुत तारीफ कर दी । बहुत झूठ बोला। मैं झूठी तारीफ करके देबू को पानी पर नहीं चढ़ाना चाहता । लेकिन सच यह है कि देबाशीष से मिलना मेरे लिये एक उपलब्धि रही। जाने- अनजाने तमाम अवसरों पर किये देबाशीष की खिंचाई याद आई तथा यह सोचकर अफसोस हुआ कि सही या गलत उस समय देबाशीष अकेला था। तमाम मतभेदों पर बातचीत करते हुये देबू के लहजे में किसी के भी प्रति किसी किसिम की कटुता नहीं थी। अपनी कमजोरी भी बताई देबू ने -मैं किसी से बहुत दिन तक नाराज नहीं रह सकता।
मैं जब गया था पूना तो एक ब्लागर से मिलने गया था। लेकिन वहाँ मिले ‘छुटभैये’ ।’छुटभैये’ बड़े खतरनाक होते हैं।लेकिन ज्ञान,समझ,तकनीकी अनुभव,उत्साह में हमसे मीलों आगे खड़े ये ‘छुटभैयों’ से बचा भी तो नहीं जा सकता है।इनके साथ का भी मजा ही कुछ और है। इनके साथ का सुख तो ‘गूंगे का गुड़’ होता है। बयान नहीं किया जा सकता है,अनुभव किया जा सकता है।
मेरी चाहना सिर्फ यही है कि देबाशीष ने जो ‘बड़प्पन’ मेरे ऊपर थोपा है मैं उसके भ्रम की की निरंतरता बनाये रखने में सहयोग कर सकूँ।
तो यह रही पूना ब्लागर कथा जैसे मुझे याद रही तथा जैसी हमने महसूस करी। कुछ आप बतायें कैसी लगी भेंटवार्ता।
मेरी पसन्द
राज जो कुछ हो इशारों में बता भी देना
हाथ जब उससे मिलाना तो दबा भी देना।
वैसे तो इस खत में कोई बात नहीं है
फिर भी एहतियातन इसे पढ़ लो जला भी देना।
यूँ तो हर फूल पर लिखा है कि तोड़ो मत
दिल जब मचलता है तो कहता है छोड़ो मत।
इश्क ने गूंथे थे जो गजरे नुकीले हो गये
तेरे हाथों में तो ये कंगन भी ढीले हो गये।
फूल बेचारे अकेले रह गये हैं साख पर
गांव की सब तितलियों के हाथ पीले हो गये।
पर्वतों पर बर्फ चमकी खेत में मोती उगे
मौसमों की चोलियों बंद ढीले हो गये।
क्या जरूरी करें विषपान हम शिव की तरह
सिर्फ जामुन खा लिये और होंठ नीले हो गये।
-राहत इंदौरी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

18 responses to “अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा…”

  1. मनीष
    कसप किस की रचना है ? जरा बतायें तो ढ़ूँढ़ू पुस्तकालय में ! आप कहीं खड़की तो नहीं गए थे । बेहद रोचक विवरण रहा आपकी यात्रा का ।
  2. hindi blogger
    बड़ी उत्सुकता थी जानने की, कि क्या-क्या चर्चा हुई होगी दो सीनियर ब्लॉगरों के बीच. संपूर्ण वृतांत प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद!
  3. Srijan Shilpi
    ब्लॉग जगत के आप दोनों महारथियों के मिलन से उपजे आनंद रस का आस्वादन करने का अवसर मिला। इस प्रसंग पर देबू दा और अनूप भाई, दोनों द्वारा लिखित सभी पोस्ट पढ़ने के बाद भी कुछ टिप्पणी करने से बचता रहा। लगा कि ऐसा करना अनाधिकार चेष्टा होगी। अनूप भाई से तो अपना कोई परिचय भी नहीं हुआ अभी तक। ज्यादातर ब्लॉगर मित्रों से लगभग अनजान ही हूँ। थोड़ी-बहुत जान-पहचान अब तक देबू दा, अनुनाद और जयप्रकाश मानस से हुई है। परिचर्चा पर भी अपना परिचय जानबूझकर नहीं दिया हूँ। हिन्दी ब्लॉग जगत में प्रवेश करते समय सोचा था कि अपनी व्यक्तिगत पहचान को कभी सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं करूँगा और केवल अपने विचारों एवं लेखन के माध्यम से ही ब्लॉग जगत में सक्रिय रहूँगा। लेकिन देबाशीष जी और अनूप भाई के मिलन का प्रसंग मन को ऐसा भाया कि मैं सोचने पर विवश हो गया कि अब तक मैं क्यों इस नि:स्वार्थ, प्रेमपरायण और सच्चे मित्रों की मंडली से कटा-कटा सा रह रहा था। इसलिए हे मित्रों, आपका एक सहृदय मित्र यहाँ भी है। मेरे विचार कुछ मुद्दों पर भले ही आप सबसे अलग हों, पर वे मेरे सरोकारों और प्रतिबद्धताओं से जुड़े हैं। जहाँ तक दिलदारी की बात है, सच्चे और नि:स्वार्थ लोग मुझे भगवान से भी ज्यादा प्यारे लगते हैं।
  4. Amit
    तस्वीरें बढ़िया हैं और भेंटवार्ता विवरण पढ़कर बढ़िया लगा।
    अनूप जी, देबू दा ने आपको जो टी-शर्ट भेंट की है, उसे पहनकर एक फ़ोटो खिंचवाएँ और उसे भी पोस्ट करें। इंडी-ब्लॉगर वाली टी-शर्ट पहन मस्त लगेंगे। :D
  5. प्रत्यक्षा
    बढिया रहा. तस्वीरें बडी कौशल से खींची गईं हैं. चेहरों के अन्दाज़ लगाने पड रहे हैं.
    गुलमोहर का एक क्लोज़् अप भी खींच लेते. वैसे शायद ठीक ही किया. वहाँ भी अन्दाज़ ही लगाना पडता
  6. समीर लाल
    भेंट वृतांत बहुत ही बहतरीन लगा. खैर, आप तो जो भी लिख दें, वही मज़ेदार हो जाता है, लेखन की जादूगरी से.
  7. रवि
    ….भेंट वृतांत बहुत ही बहतरीन लगा. खैर, आप तो जो भी लिख दें, वही मज़ेदार हो जाता है, लेखन की जादूगरी से…..
    आप चाहे जितनी प्रशंसा फ़ुरसतिया जी की करें परंतु वे स्वयं कोई दर्जन बार अपने लेखन की शुरुआत का श्रेय मुझे दे चुके हैं.
    तो, अब इस असली प्रशंसा का हकदार कौन हुआ?
    :)
  8. समीर लाल
    आप तो रवि भाई हमेशा से प्रथम हकदार हैं, आपकी जिंदाबाद का परचम तो यूँ ही सब लोग लहरा रहे हैं मय फ़ुरसतिया जी के. सारा श्रेय गलियों से होते हुये मेन रोड पर तो आपको ही तो है..:)
  9. Laxmi N. Gupta
    अनूप जी,
    बहुत बढ़िया वृत्तान्त लिखा है, हमेशा की तरह्। बहुत अच्छा लगा।
  10. फ़ुरसतिया » मौसम बड़ा बेईमान है…
    [...] पूना यात्रा के दौरान हमने कुछ फोटो और भी ‘खैंचे’ थे। पूना प्रवास के बारे में लिखते हुये हमने बताया था:- मैं देबाशीष के आने की राह तथा सड़क पर गुजरती सुंदरियों को ताकने लगा। [...]
  11. फुरसतिया » पुस्तक मित्र बनेंगे?
    [...] आज जब किताबों के मंहगे होने का रोना रोया जाता है। लेकिन इस योजना के पेपरबैक किताबों का दाम देखकर लगता है कि किताबें उतनी मंहगी नहीं हैं जितना हम उनको बनाकर उनसे दूर रह लेने में सफ़ल हो जाते हैं। रागदरबारी( श्रीलाल शुक्ल), आधा गांव (राही मासूम रजा) ,कसप( मनोहर श्याम जोशी), झीनी-झीनी बीनी चदरिया( अब्दुल बिस्मिलाह) ऐसी किताबें हैं जिनको अगर आप एक बार पढ़ते हैं तो जिंदगी भर याद रखते हैं। जितनी बार पढ़ते हैं, हर बार नया मजा आता है। ये सारी की सारी किताबें सौ रुपए से कम में उपलब्ध हैं। छूट के बाद जिस दाम में पड़ेंगी उतने में आप अपने दोस्त के साथ किसी कायदे के होटल में एक चाय भी शायद न पी पायें। [...]
  12. एक चिट्ठी शिवजी के नाम
    [...] गये गुरु, मान गये आपके जिगरे को। हम जब देबाशीष से मिलने गये पूना और चाय के दाम देखे साठ रुपये तो [...]
  13. Dr. Mahesh Parimal
    यात्रा वृतांत अच्छा लगा। मैंने 09 अप्रैेल में पूना की यात्रा की थी। चार दिन रुका भी था। पर किसी ब्लॉगर साथी से मुलाकात नहीं हो पाई। यदि आप भाई विजय मनोहर तिवारी (हरसूद 30 जून वाले) से मिलना चाहें, तो कभी भोपाल आएँ। वे मेरे साथ ही दैनिक भास्कर में काम करते हैं। वैसे देबूदादा भी मेरे खयाल से भोपाल के ही हैं। तो उनके साथ आ ही जाएँ। यदि कभी विजय भाई से बात करने की इच्छा हो, तो उसका चलायमान दूरभाष का क्रमांक लिख लें- 9893043200। अच्छा लगेगा उनसे मिलकर। मैं तो ऐसे ही दुप्पल में मिल ही लूँगा।
    महेश परिमल
  14. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई अड्डे से 9.अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा… 10.हम,वे और [...]
  15. हिन्दी तेरा रूप अनूप- श्रीलाल शुक्ल
    [...] के बारे में पहले लिखे लेख आप यहां , यहां , यहां ,यहां , यहां , यहां पढ़ सकते हैं। [...]
  16. चिरागों को जलाने में जला ली उंगलियां हमने : चिट्ठा चर्चा
    [...] मन मचलने लगा। मन मचलने की याद आने पर राहत इंदौरी का शेर याद आ गया- यूँ तो हर फूल पर लिखा है कि [...]
  17. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई अड्डे से 9.अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा… 10.हम,वे और [...]