Friday, June 16, 2006

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…

http://web.archive.org/web/20110925133309/http://hindini.com/fursatiya/archives/144

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…

[आज अभिव्यक्ति का गुलमोहर विशेषांक देखा। इसमें
गुलमोहर के बारे में जानकारी है , कहानियां है,कवितायें हैं,पूर्णिमा वर्मन का ललित निबन्ध हैं,नाटक है और खुदा झूठ न बुलाये खाक़सार का लेख भी है। 'खाक़सार' उर्दू शब्द है जिसका हिंदी अनुवाद शायद 'माटीमिले' होता होगा। अगर यह सच है तो देखा जाय कि कितना दूरी तय कर लेता शब्द अनुवादित होते-होते। बहरहाल ,आप मेरा अभिव्यक्ति में प्रकाशित लेख पढ़िये। यह पूर्णिमा जी द्वारा सम्पादित लेख है। देखिये कि सम्पादन क्या होता है? इस बीच हम मौके का फायदा उठाकर अपना मूल लेख जो मैंने भेजा था अभिव्यक्ति के लिये वह यहाँ पेशकर रहा हूँ।बहाना यह है कि अभिव्यक्ति शुषा फान्ट में है जबकि हमें चाहिये यूनीकोड फान्ट। संपादित लेख आप अभिव्यक्ति में पढ़ सकते हैं।]

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता
गुलमोहर
मैं गुलमोहर पर लेख का मजनून सोच रहा हूँ।
दिमाग में गाना बज रहा है-गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…।
गाने की पहली लाइन सुनते ही मैं सोचने लगता हूँ कि किसका नाम गुलमोहर है- मेरी जानपहचान में। कोई चेहरा याद नहीं आता जिसका नाम गुलमोहर हो। मोहल्लों के नाम याद हैं जिनके नाम गुलमोहर के नाम पर रखें गये हैं-गुलमोहर पार्क,दिल्ली।
गुलमोहर के बारे में जानकारी के लिये किताबें टटोलता हूँ । हजारीप्रसाद द्विवेदी रचनावली देखता हूँ । ‘अशोक के फूल’ तथा ‘शिरीष के फूल’ के मिलते हैं। लेकिन गुलमोहर नदारद है।
कहाँ छिपे हो गुलमोहर के फूल!गुलमोहर गुमशुदा है।इसीलिये शायद गाना बना है-गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…। तो कम से कम खोजना तो न पड़ता गुलमोहर को। तुम्हारे बारे में लिख देता। काम हो जाता।
गुमशुदा गुलमोहर की तलाश इन्टरनेट पर करता हूँ तो पूर्णिमा वर्मन जीकी कविता मिलती है:-
खिड़की के नीचे से प्यार गुनगुनाता है
गुच्छा गुलमोहर का हाथ यों हिलाता है
अभी नहीं अभी नहीं
कल आयेंगे
गांव तुम्हारे।
यहाँ भी गुलमोहर गच्चा दे गया। बोला कल आयेंगे, वो भी गाँव ।लगता है मुँह चुरा रहा है गुलमोहर।
लगा कि किसी का क्या भरोसा करना! खुद देखा जाय गुलमोहर को,कहाँ खिला है,कैसा लगताहै, क्यों टरका रहा है ,क्या गुल खिला रहा है,मुलाकात क्यों टाल रहा है!कल पड़े भरी दुपहरी में कैमरा लपेट के।
बाहर प्रचन्ड धूप खिली थी।लेकिन ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा। गुलमोहर का पेड़ सामनेखड़ा था। उसे देखते ही माज़रा समझ में आ गया। जनाब क्यों टरका रहे थे मुलाकात को। गुलमोहर का पेड़ बगल के अमलतास से बतिया रहा। दोनों को इकट्ठे देखकर लगा कि दो कामचोर कर्मचारी काम के घण्टों में लापरवाही से बतिया रहे हैं । लगा तो यह भी कि समलैंगिकता का फैशन पेडों ने भी अपना लिया है।लाल गुलमोहर को पीले अमलतास से बतियाते देख मेरा मन लाल-पीला होने को हुआ लेकिन जुगल-जोड़ी को देखकर मन हरा हो गया।कल्पना के घोड़े सरपट दौड़ने लगे।
गुलमोहर गर्मी में खिलता हैं । प्रचंड गर्मी में जब तमाम दूसरे फूल दुम दबा के फूट लेतेहैं तब गुलमोहर सर उठा के गर्मी का बहादुरी से मुकाबला करता है। गर्मी के प्रति गुस्से से लाल । गर्मी ने उसके साथियों को धरासायी जो कर दिया है ।
लगता तो मुझे यह भी है गुलमोहर शर्मीला होता है। उसका अपना कोई रंग नहीं होता। लेकिन जब अमलतास से गुपचुप गुफ्तगू करते पकडा़ जाता है तो मारे शरम के लाल हो जाता है। डर के अमलतास पीला पड़ जाता है।
मेरे कुछ जनवादी दोस्त कहते हैं कि गुलमोहर लाल फूल धारण करता है। क्रांति का प्रतीक होताहै। वहीं दूसरे जनवादी साथी बताते हैं कि गुलमोहर बेहया होता है। जब दूसरे फूल मुरझा रहे होते हैं तब खिलता है। शरम तक नहीं आती कि साथियों के जाने का दुख मनाये। बेहयासर उठाये हिलता -डुलता रहता है।
गुलमोहर समर्थक साथी बताते हैं कि यह बताता है कि कैसे भीषण गर्मी का सामना करतेहुये सर उठा के जिया जाता है। विरोधी दोस्त बताते हैं गुलमोहर को देखकर लगता है कि कोई लाल-लाल गाल वाला नेता सूखे मुँह वाले समर्थकों के बीच खड़ा भाषण दे रहा हो।
तमाम गुलमोहर के पेड़ तमाम प्रेम कथाओं के गवाह रहते हैं। लेकिन कोई गुलमोहर कापेड़ इतना छतनार नहीं होता कि अपनी छाँह में बैठे जोड़े को आसमान की बेधती निगाहोंसे बचा सके। गुलमोहर की छाँव प्रेमियों को अपने नीचे केवल खड़े होने की सुविधा देतीं है,लेटने का उपक्रम करते ही आसमान टोंक देता है।
फैशन के दौर में गारण्टी की अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। गर्मी में खिला गुलमोहर खूबसूरततो दिखता है लेकिन जैसे सुन्दरता की सार्थकता छुई-मुई होने में होती है। गुलमोहर कापेड़ भी फुसफुसा होता है। इसके नीचे आप खड़े होकर कल्पना की पींगे तो मार सकते हैंलेकिन इसकी डालपर झूला डालकर नहीं झूल सकते।
देख रहा हूँ कि मौसम तथा गुलमोहर की जुगलबँदी सी हो रही है। दोनों आग उगल रहे हैं।संगति का असर हम पर भी पड़ रहा है। हम वापस घर लौटते हैं। गाना अभी भी बज रहा है-गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…।
अब कारण समझ में आ रहा है लोग अपना नाम गुलमोहर रखने में किसलिये कतराते हैं। भयानक गर्मी में सर उठाकर खिले रहने का हौसला सबका नहीं होता। यह गुलमोहरही है जो जलते हुये भी खिलता रहता है। लाल गुलमोहर पीले अमलतास से बतियाता है। मनको हरा-हरा कर जाता है। रखोगे अपना नाम गुलमोहर!
मेरी पसंद


गर्म रेत पर चलकर आए
छाले पड़ गये पाँव में
आओ पल भर पास में बैठो
गुलमोहर की छांव में। नयनों की मादकता देखो
गुलमोहर में छाई है
हरी पत्तियों की पलकों में
कलियाँ भी मुस्काई हैं।
बांहे फैला बुला रहे हैं
हम सबको हर ठांव में।
चार बरस पहले जब इनको
रोप-रोप हरसाये थे
कभी दीमक से कभी शीत से
कुछ पौधे मुरझाये थे
हर मौसम की मार झेल ये
बने बाराती गांव में।
सिर पर बांधे फूल मुरैठा
सज -धजकर ये आये हैं
मौसम के गर्म थपेड़ों में
जी भरकर मुस्काए हैं
आओ हम इन सबसे पूछे
कैसे हंसें अभाव में।
-रामेश्वर काम्बोज’हिमांशु’

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

7 responses to “गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…”

  1. रवि
    अभिव्यक्ति पर जैसे तैसे मैं टिपियाया था-
    आप तो किसी मुर्दा (व्यक्ति) पर भी धारदार व्यंग मार सकते हैं!
    गुलमोहरी आलेख में गरमी और छांह दोनों ही मिले.
  2. ratna
    very interesting,as usual.
  3. debashish
    और मुझे अब समझ आया कि पुणे में आपने गुलमोहर के चित्र भला क्यों उतारे!
  4. e-shadow
    क्या बात है। समझा संपादन क्या है।
  5. प्रेमलता पांडे
    आपका लिखा पढ़ने की तो भूख लगती है। अद्वितीय भाव ।
    प्रेमलता
  6. फ़ुरसतिया » मौसम बड़ा बेईमान है…
    [...] प्रेमलता पांडे on गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…e-shadow on गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…debashish on गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…ratna on गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…रवि on गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता… [...]
  7. फ़ुरसतिया » फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.संरक्षा का आध्यात्मिक महत्व 2.अजीब इत्तफाक है… 3.यायावर चढ़े पहाड़ पर… 4.नेतागिरी,राजनीति और नेता 5.अभी उफनती हुई नदी हो… 6.रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी 7.गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी 8.गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता… 9.मौसम बड़ा बेईमान है… 10.सितारों के आगे जहाँ और भी हैं… 11.अमरीकी और उनके मिथक 12.अमेरिका-कुछ बेतरतीब विचार 13.पूर्णिमा वर्मन-जन्मदिन मुबारक 14.पूर्णिमा वर्मन से बातचीत [...]

Wednesday, June 14, 2006

गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी

http://web.archive.org/web/20111108131252/http://hindini.com/fursatiya/archives/143

गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी

फिराक़ गोरखपुरी पर लेख के बाद सागर चन्द नाहर जी की फिर फरमाइश है गुलजार की नज्‍़म की। हमें लगता है कि हमें अपने चिट्ठे का नाम ‘फ़ुरसतिया’ से बदलकर ‘फरमाइशी‘ करना पड़ेगा। बहरहाल ग्राहक भगवान का रूप होता है की तर्ज पर पाठक को सर्वेसर्वा मानते हुये सागर चन्द नाहर जी की मांग के अनुसार गुलजार की नज्‍़म बोस्की पेश की जा रही है।
हिंदी-उर्दू के कवि-शायर तथा गीतकार,फिल्म निर्माता- निर्देशक गुलजार का जन्म १८ अगस्त,१९३६ को दीना नामक कस्बे में हुआ था ,जो कि अब पाकिस्तान में है।उनका बचपन का नाम सम्पूरन सिंह था।
गुलजार ने हिंदी फिल्मों के लिये तमाम गीत लिखे हैं जिनमें से कुछ तो बहुत लोकप्रिय हैं।
भारतीय सिनेमा में उल्लेखनीय योगदान के लिये गुलजार को वर्ष २००४ में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषन सम्मान से सम्मानित किया गया।इसके अतिरिक्त गुलजार को तमाम बार हिंदी सिनेमा में उनके गीतों तथा निर्देशन के लिये के लिये सम्मानित किया गया तथा कई पुरस्कार मिले।
गुलजार का विवाह प्रसिद्ध सिनेतारिका राखी से हुआ।
राखी-गुलजार की पुत्री मेघना गुलजार ,जिनका घरेलू नाम बोस्की है ,भी फिल्म निर्देशक हैं।
गुलजार ने बोस्की के विवाह के अवसर पर दो नज्‍़में लिखीं थीं जिनके लिये फरमाइश की गई थी।
वे दोनों नज्‍़में यहाँ पेश की जा रही हैं:-
बोस्की-१
बोस्की ब्याहने का अब वक्‍़त क़रीब आने लगा है
जिस्म से छूट रहा है कुछ कुछ
रूह में डूब रहा है कुछ कुछ
कुछ उदासी है,सुकूँ भी
सुबह का वक्‍़त है पौ फटने का
या झुटपुटा शाम का है मालूम नहीं
यूं भी लगता है कि जो मोड़ भी अब आयेगा
वो किसी और तरफ़ मुड़ के चली जायेगी
उगते हुए सूरज की तरफ़
और मैं सीधा ही कुछ दूर अकेला जा कर
शाम के दूसरे सूरज में समा जाऊंगा!
बोस्की-२

नाराज़ है मुझ से बोस्की शायद
जिस्म का इक अंग चुप चुप सा है
सूजे से लगते हैं पांव
सोच में एक भंवर की आंख है
घूम घूम कर देख रही है बोस्की, सूरज का टुकड़ा है
मेरे खू़न में रात और दिन घुलता रहता है
वह क्या जाने,जब वो रूठे
मेरी रगों में खू़न की गर्दिश मद्‌धम पड़ने लगती है
रजनी भार्गव,गुलजार,अनूप भार्गव
रजनी भार्गव,गुलजार,अनूप भार्गव
हमारे नामाराशि अनूप भार्गव गुलजार के बडे़ प्रशंसक हैं। जब हम लेख टाइप कर रहे थे तो आनलाइन मिल गये। बताया कि गुलजार के बारे में याहू पर एक साइट है। फिलहाल यह साइट डाउन चल रही है।
जिनको गुलजार के बारे में और जानकारी चाहिये वे साथी लोग इस साइट के सदस्य बन सकते हैं।
पिछले दिनों न्यूयार्क में हुये कवि सम्मेलन में गुलजार ने भी शिरकत की थी। हमारे अनूप भार्गव ने भी वहाँ कविता पाठ किया था।
कवि सम्मेलन की यादें बांटते हुये अनूप भार्गव जी ने बताया कि मेघना गुलजार भी न्यूयार्क गयीं थीं। उनके पति आउटसोर्सिंग का व्यापार करते हैं। मेघना ने वहां गुलजार पर केंद्रित १८ मिनट की फिल्म भी दिखाई थी जिसपर गुलजार की टिप्पणी थी-ये बहुत नाइन्साफी है कि हमारे पूरे जीवन को १८ में समेट दिया जाय।
गुलजार के फोटो खोजते-खोजते हम परेशान हो गये लेकिन नहीं मिला। फिर हमें कवि सम्मेलन के बाद अनूप भार्गव के द्वारा भेजा गया फोटो मिला। फोटो जैसा कि दिख रहा है बहुत खूबसूरत है। गुलजार को बीच में घेरे हुये भार्गव दम्पति हैं। श्रीमती रजनी भार्गव भी कवितायें लिखती हैं।अब यह पता नहीं कौन सी साजिश है अनूप भाई की कि उनकी कवितायें सामने नहीं आने देते। मैंने एक बार भाभीजी का भी ब्लाग बनाने को कहा तो बताया कि समय मिलने पर बनाऊँगा। पांच मिनट में ब्लाग बनता है,आज हमसे पूरा एक घंटा बतियाये लेकिन पाँच मिनट नहीं निकाल पाये ।
बहरहाल हमें लगा कि अमेरिका के कैमरे इतने अच्छे होते होंगे तभी फोटो इतना अच्छा आया।
लेकिन हमें अनूप भार्गव ने बताया -फोटो तो अच्छा आना ही था। दो लोग मिलकर कितना खराब कर पाते। लेकिन उन्होंने यह फिर भी नहीं बताया कि वे दो लोग कौन हैं जिनके ऊपर फोटो खराब करने के प्रयास का आरोप है।
बहरहाल ,इस मामले को यहीं अटकलें लगाने के लिये छोड़ते हुये गुलजार की त्रिवेणी में डुबकी लगवाता हूँ।
त्रिवेणी क्या है यह गुलजार जी के माध्यम से समझा जाय तो बेहतर होगा।त्रिवेणी के बारे में गुलजार लिखते हैं:-


त्रिवेणी न तो मसल्लस है,ना हाइकू,ना तीन मिसरों में कही एक नज्‍़म। इन तीनों ‘फ़ार्म्ज़’में एक ख्‍़याल और एक इमेज का तसलसुल मिलता है। लेकिन त्रिवेणी का फ़र्क़ इसके मिज़ाज का फर्क है। तीसरा मिसरा पहले दो मिसरों के मफ़हूम को कभी निखार देता है,कभी इजा़फा करता है या उन पर ‘कमेंट’ करता है। त्रिवेणी नाम इस लिये दिया गया था कि संगम पर तीन नदियां मिलती हैं। गंगा ,जमना और सरस्वती। गंगा और जमना के धारे सतह पर नज़र आते हैं लेकिन सरस्वती जो तक्षिला(तक्षशिला) के रास्ते बह कर आती थी,वह ज़मीन दोज़ हो चुकी है। त्रिवेणी के तीसरे मिसरे का काम सरस्वती दिखाना है जो पहले दो मिसरों में छुपी हुई है।

यहाँ कुछ त्रिवेणियाँ दी जा रहीं हैं। आप इनमें गोते लगायें। मुझे लगता है कि समीरलाल कुंडलिया उस्ताद हो ही गये हैं अब त्रिवेणी पर भी हाथ साफ करें। लेकिन त्रिवेणी के सबसे नजदीक प्रत्यक्षाजी की कवितायें हो सकती हैं। दो चाय के बीच वे चार त्रिवेणी बहा सकती हैं। उनकी शुरुआत के दौर में लिखी कविता :-
रात भर ये मोगरे की
खुशबू कैसी थी
अच्छा ! तो तुम आये थे
नींदों में मेरे ?

मुझे याद आ रही है।
यहाँ पेश हैं गुलजार लिखित कुछ त्रिवेणियाँ:-
१.मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने

रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे
२.सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खा़ली कासा(भिक्षापात्र)
रात जो गुज़री,चांद की कौड़ी डाल गई उसमें
सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।
३.सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर
कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।
४.शोला सा गुज़रता है मेरे जिस्म से होकर
किस लौ से उतारा है खुदावंद ने तुम को
तिनकों का मेरा घर है,कभी आओ तो क्या हो?
५.ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी
खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आयें!
६.लोग मेलों में भी गुम हो कर मिले हैं बारहा
दास्तानों के किसी दिलचस्प से इक मोड़ पर
यूँ हमेशा के लिये भी क्या बिछड़ता है कोई?
७.आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!
चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा
८.पौ फूटी है और किरणों से काँच बजे हैं
घर जाने का वक्‍़त हुआ है,पाँच बजे हैं
सारी शब घड़ियाल ने चौकीदारी की है!
९.बे लगाम उड़ती हैं कुछ ख्‍़वाहिशें ऐसे दिल में
‘मेक्सीकन’ फ़िल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे।
थान पर बाँधी नहीं जातीं सभी ख्‍़वाहिशें मुझ से।
१०.तमाम सफ़हे किताबों के फड़फडा़ने लगे
हवा धकेल के दरवाजा़ आ गई घर में!
कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो!!
११.कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे
ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।
१२. वह मेरे साथ ही था दूर तक मगर इक दिन
जो मुड़ के देखा तो वह दोस्त मेरे साथ न था
फटी हो जेब तो कुछ सिक्के खो भी जाते हैं।
१३.वह जिस साँस का रिश्ता बंधा हुआ था मेरा
दबा के दाँत तले साँस काट दी उसने
कटी पतंग का मांझा मुहल्ले भर में लुटा!
१४. कुछ मेरे यार थे रहते थे मेरे साथ हमेशा
कोई साथ आया था,उन्हें ले गया,फिर नहीं लौटे
शेल्फ़ से निकली किताबों की जगह ख़ाली पड़ी है!
१५.इतनी लम्बी अंगड़ाई ली लड़की ने
शोले जैसे सूरज पर जा हाथ लगा
छाले जैसा चांद पडा़ है उंगली पर!
१६. बुड़ बुड़ करते लफ्‍़ज़ों को चिमटी से पकड़ो
फेंको और मसल दो पैर की ऐड़ी से ।
अफ़वाहों को खूँ पीने की आदत है।
१७.चूड़ी के टुकड़े थे,पैर में चुभते ही खूँ बह निकला
नंगे पाँव खेल रहा था,लड़का अपने आँगन में
बाप ने कल दारू पी के माँ की बाँह मरोड़ी थी!
१८.चाँद के माथे पर बचपन की चोट के दाग़ नज़र आते हैं
रोड़े, पत्थर और गु़ल्लों से दिन भर खेला करता था
बहुत कहा आवारा उल्काओं की संगत ठीक नहीं!
१९.कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से
टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को!
२०.कोने वाली सीट पे अब दो और ही कोई बैठते हैं
पिछले चन्द महीनों से अब वो भी लड़ते रहते हैं
क्लर्क हैं दोनों,लगता है अब शादी करने वाले हैं
२१. कुछ इस तरह ख्‍़याल तेरा जल उठा कि बस
जैसे दीया-सलाई जली हो अँधेरे में
अब फूंक भी दो,वरना ये उंगली जलाएगा!
२२.कांटे वाली तार पे किसने गीले कपड़े टांगे हैं
ख़ून टपकता रहता है और नाली में बह जाता है
क्यों इस फौ़जी की बेवा हर रोज़ ये वर्दी धोती है।
२३. आओ ज़बानें बाँट लें अब अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात, ना हमको समझना है।
दो अनपढ़ों कि कितनी मोहब्बत है अदब से
२४.नाप के वक्‍़त भरा जाता है ,रेत घड़ी में-
इक तरफ़ खा़ली हो जबफिर से उलट देते हैं उसको
उम्र जब ख़त्म हो ,क्या मुझ को वो उल्टा नहीं सकता?
२५. तुम्हारे होंठ बहुत खु़श्क खु़श्क रहते हैं
इन्हीं लबों पे कभी ताज़ा शे’र मिलते थे
ये तुमने होंठों पे अफसाने रख लिये कब से?
गुलजार की ये कवितायें (बोस्की तथा त्रिवेणियां) मैंने उनकी पुस्तक रात पश्मीने की से ली हैं। इस किताब की भूमिका लिखते हुये गुलजार लिखते हैं:-


उम्मीद भी है घबराहट भी कि अब लोग क्या कहेंगे,और इससे बड़ा डर यह है कि कहीं ऐसा न हो कि लोग कुछ भी न कहें।

मुझे लगा कि गुलजार हमारा डर बयान कर रहे हैं।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

23 responses to “गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी”

  1. Jagdish
    मेरे खास रहे हैं गुलजार। बुकमार्क कर लिया साहब यह पन्ना।
  2. रवि
    गुलजार के बारे में एक प्रसिद्ध भारतीय फ़िल्म निर्माता कहते हैं – तुम्हारे लिखे गीत मुझे बिलकुल समझ नहीं आते. मगर दर्शक उन्हें बेहद पसंद करते हैं.
    लकड़ी की काठी, चड्डी पहन के फूल खिला और चप्पा चप्पा चरखा चले ये चंद उदाहरण हैं.
  3. आशीष
    गुलजार के एक पंखे हम भी है !
  4. अनूप भार्गव
    अब इस लेख पर तो पहली टिप्पणी लिखनी ही पडेगी । सब से पहले तो एक अच्छे लेख (और उस से भी अच्छी तस्वीर)के लिये धन्यवाद :-) तस्वीर किस एक के कारण और किन दो के बावजूद अच्छी बन पड़ी है , इसे राज ही रहने दें …..
    गुलज़ार साहब वास्तव में एक ‘युगपुरुष’ हैं , इतनी बहुमुखी प्रतिभा (गीतकार, कथाकार, पटकथा लेखक, निर्माता, निर्देशक ) शायद ही किसी में देखनें को मिले । लेकिन इन सब से बड़ी बात जो मुझे लगी वह है उन की विनम्रता और सरलता । एक छॊटी सी घटना सुनाता हूँ । मैं , गुलज़ार साहब , नन्दन जी और गोपीचन्द नारंग जी ‘होटल’ की ‘लौबी’ में बैठे बात कर रहे थे, तभी रजनी बाहर से आई । वह वहीं खडे हो कर चर्चा में शामिल हो गई । गुलज़ार साहब नें एक बार रजनी से बैठनें के लिये कहा । रजनी कुछ ज़ल्दी में थी , उस नें कहा ‘नहीं ऐसे ही ठीक है’ । गुलज़ार साहब नें बड़े सहज तरीके से कहा ” अगर आप नहीं बैठेंगी तो हम सब को खड़ा होना पड़ेगा” । बात बहुत छॊटी सी थी लेकिन जिस सहज़ता से उन्होंनें यह कहा, स्पष्ट था कि उस में बिल्कुल भी कृत्रिमता नहीं थी और उन का ‘नारी’ के प्रति ‘सहज सम्मान’ का प्रतीक थी ।
    बात रजनी की आई तो अनूप भाई ! आप की शिकायत बिल्कुल ‘वाज़िब’ है , बस ‘ब्लौग’ ज़ल्दी ही आनें वाला है । तब तक इन से काम चला लें :
    http://manaskriti.com/kaavyaalaya/kuchh_naheen_chaahaa.stm
    http://manaskriti.com/kaavyaalaya/abhivyaktiyaan.stm
    http://manaskriti.com/kaavyaalaya/seepee_mein_motee.stm
    http://manaskriti.com/kaavyaalaya/samay_ki_lipi.stm
    अब कुछ सूचनाएं , गुलज़ार साहब पर एक बहुत खूबसूरत ‘याहू ग्रुप’ है जिस का मैं सदस्य हूँ । http://groups.yahoo.com/group/gulzarfans/ , बहुत अच्छी सामग्री पढनें को मिलती है ।
    गुलज़ार साहब अपनी उम्र के अनुसार काफ़ी ‘फ़िट’ लगते हैं । इस का राज है ‘हर रोज़ सुबह १ १/२ घंटे ‘टैनिस’ और ‘योग’ ।
    गुलज़ार साहब की ‘त्रिवेणी’ अर्थपूर्ण तो लगती हैं लेकिन उन्हे किसी गज़ल गायक द्वारा गाये जाननें की कल्पना मुश्किल लगती है । न्यूयौर्क में हुए ‘जगजीत सिह’ के कार्यक्रम (जिस मे उन का परिचय गुलज़ार साह्ब नें करवाया था) में जगजीत जी नें चुनी हुई ‘त्रिवेणी’ को गानें का प्रयास किया जो मुझे तो बहुत अच्छा और साहसपूर्ण कदम लगा।
    अब आपके समान ‘टाइप’ करनें की क्षमता तो नहीं है , इसलिये अभी इतना ही।
  5. Hindi Blogger
    बहुत-बहुत धन्यवाद! क्या शानदार लेख और क्या ज़ोरदार टिप्पणी!
  6. सागर चन्द नाहर
    भाई साह्ब,
    गुलज़ार साहब के बारे में लेख और कविताओं के लिये धन्यवाद, परन्तु यह वे कविता नहीं है यह तो बोस्की के विवाह के समय लिखी गई है,मैने जिस कविता संग्रह का जिक्र किया था उस का नाम था ” हमाली बोछकी” (Hamali Bochhaki)जब बोस्की तुतलाया करती थी, उन दिनो गुलज़ार साहब ने यह कविता बच्चों की तुतलायी भाषा में लिखी थी में उस संग्रह को ढूंढ रहा हुँ अगर मिल गया तो जरूर अपने चिठ्ठे पर सभी के लिये प्रकाशित करुंगा।
  7. राकेश खंडेलवाल
    अब असमंजस हो गया है कि किसकी तारीफ़ की जाये. कॄतिकार गुलज़ार की या फिर
    अनूप ? जी की इतनीबातें बतलाने के लिये.
  8. भारत भूषण तिवारी
    वैसे न्यूयॉर्क वाले कार्यक्रम में मैं भी था (सौजन्य: अनूप भार्गव). वहाँ ग़ुलज़ार साहब की पुस्तक ‘चाँद पुखराज का’खरीदी और पहले पृष्ट पर उनका ऑटोग्राफ़ भी लिया.चूँकि पुस्तक उर्दू में है, ग़ुलज़ार साहब ने दस्तखत उर्दू में किए. उसी पुस्तक से कुछ त्रिवेणियाँ, जो उन्होनें कार्यक्रम में भी पढीं थीं.
    सब पे आती है अपनी बारी से
    मौत इन्साफ़ की अलामत है
    ज़िन्दगी सब पे क्यूँ नहीं आती
    भीगा भीगा सा क्यूँ है ये अखबार
    अपने हॉकर को कल से चेंज करो
    पाँच सौ गाँव बह गए इस साल
    शाम गुज़री है बहुत पास से होकर लेकिन
    सिर पे मंडलाती हुई रात से जी डरता है
    सिरचढे दिन की इसी बात से जी डरता है
    रात के पेड पे कल ही तो उसे देखा था
    चाँद बस गिरने ही वाला था पके फल की तरह
    सूरज आया है, ज़रा उसकी तलाशी लेना
  9. प्रत्यक्षा
    आहा ! मज़ा आ गया गुलज़ार की त्रिवेणियाँ पढ कर. अब चूँकि “फुरसतिया” से “फरमाइशी” चिट्ठा हो ही गया है तो कुछ और त्रिवेणियाँ पोस्ट की जाय.
    और अनूप भार्गव जी से भी गुजारिश है..आपने ई-कविता पर एक बार गुलज़ार जी की कुछ बडी सुन्दर त्रिवेणियाँ पोस्ट की थीं . उन्हे दोबारा फिर चिट्ठे पर पोस्ट करें.
    अनूप जी ने मेरी एक कविता इस लेख में डाली, शुक्रिया शुक्रिया. :-) )
    गुलज़ार साहब की त्रिवेणी मेरे लिये ऐसी जैसे ज़मीन पर से चाँद देखूँ
  10. अनूप भार्गव
    अब यह फ़रमाइशी चिट्ठा हो ही गया है तो प्रत्यक्षा की यह फ़रमाइश भी पूरी की जाये । शायद इन ‘त्रिवेणियों: का ज़िक्र हो रहा है । ये मेरी पसन्द की हैं जो मैनें उन की पुस्तक ‘त्रिवेणी’ में से ली हैं :
    –
    इतनें लोगों में , कह दो आँखों को
    इतना ऊँचा न ऐसे बोला करें
    लोग मेरा नाम जान जाते हैं ।
    –
    शाम से शमा जली , देख रही है रास्ता
    कोइ परवाना इधर आया नहीं देर हुई
    सौत होगी जो मेरे पास में जलती होगी
    –
    रात के पेड पे कल ही देखा था
    चाँद बस पक के गिरने वाला था
    सूरज आया था , ज़रा उस की तलाशी लेना
    –
    सामनें आये मेरे, देखा मुझे, बात भी की
    मुस्कुराये भी पुरानी किसी पहचान की खातिर
    कल का अखबार था, बस देख लिया, रख भी दिया
    –
  11. Apoorv Bhumesh
    Its really a nice effort. The work is informative and throws light on the relevant aspects of the poet’s personality and his notable works.
    The poet definitely has a valuable contribution in writing meaningful poetry.
  12. निधि
    अनूप जी, मेरे चिट्ठे पे की गयी आपकी टिप्पणियों के ज़रिये आपके चिट्ठे तक पहुँची । वैसे फुरसतिया नाम से परिचित हूँ, नारद जी की मेहरबानी से । पर यहाँ पहली बार आयी हूँ । और आयी तो ऐसी आयी हूँ कि सुबह से आपके पुराने सभी लेख पढ़ने मे लगी हुई हूँ । ज्ञान का भन्डार है यहाँ तो । आपकी लेखन शैली भी बड़ी रोचक लगी । हमारी महतारी भी कानपुर-बनारस की हैं । ननिहाल वहीं है हमारा । इसलिये वहाँ की भाषा बड़ी अपनी सी लगती है । अब तो हम आपके चिट्ठे पे आत रही । आप न लिखबे करी तो हम जबरिया लिखाय लिहिन आपसे ।
  13. मनीष
    गुलजार मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं । उनकी त्रिवेणियाँ पहले भी पढ़ीं थीं पर आपने जिस अंदाज में यहाँ पढ़वाया उसका लुत्फ ही अलग था ।
    हाँ गुलजार प्रेमियों से मेरा अनुरोध है कि पवन झा की web site http://www.gulzaronline.com पर जरूर जायें। गुलजार के गीतों और कविताओं का पवन जैसा अच्छा विश्लेषक मैंने नहीं देखा।
  14. फ़ुरसतिया » सितारों के आगे जहाँ और भी हैं…
    [...] और अचानक हमें ख्याल आ गया सो हमने सच बयान कर ही दिया- अनूप भार्गव को जो प्रचार-प्रसार के लिये सम्मान मिला है वो हमारे लेख के चलते मिला। इसके कारण लोगों को अनूप भार्गव के बारे में पता चला । सम्मानित करने वाले भी हमारे ब्लाग पर इनका फोटो देखकर प्रभावित हुये बिना न रह सके। [...]
  15. manju mahima bhatnagar
    अनूपजी,
    गुलज़ार सा. और नंदन जी की गज़ले पढ़्कर आन्नद आगया। मान गए सा. यह वाकई फ़ुरसत का काम है जो शायद सबके बस का नहीं। आपको साधुवाद। अभी इसमें काफ़ी कुछ पढ़ना है,जो फ़ुरसत निकालकर ही पढ़ना होगा।
    शुभमस्तु
    मंजु महिमा
  16. લયસ્તરો » ત્રિપદી - મુકેશ જોષી
    [...] આવો જ પ્રયોગ ગુલઝારે હિન્દીમાં કર્યો છે – એને એ ત્રિવેણી કહે છે. એમણે તો ત્રિવેણીઓનો આખો સંગ્રહ પ્રગટ કર્યો છે. જોકે ગુલઝારની ત્રિવેણી આ ત્રિપદીથી થોડી અલગ પડે છે. ગુલઝારની ત્રિવેણી શું છે જાણવા અને થોડી ત્રિવેણીઓ માંણવા માટે હિન્દી બ્લોગર ફરસતિયાસાહેબનો આ પોસ્ટ જોશો. [...]
  17. कुछ निन्दनीय पंक्तियाँ माँ के लिए « ॥दस्तक॥
    [...] कुछ निन्दनीय पंक्तियाँ माँ के लिए June 14, 2006 at 6:19 pm | In सामान्य | माँ की शान में हजारों शब्द लिखे जा चुके हैं, हिन्दी चिठ्ठा जगत में भी अक्सर माँ पर कुछ ना कुछ लिखा जाता रहा है, अब कल ही अपने श्री अनूप शुक्ला जी ने अपने चिठ्ठे “फ़ुरसतिया” पर स्व. फ़िराक गोरखपुरी जी की कविता माँ प्रकाशित की, परन्तु क्या माँ की निन्दा की जा सकती है? खासी भाषा के कवि किन फाम सिं नौगकिनरिह की एक कविता कुछ निन्दनीय पंक्तियाँ माँ के लिए की कड़ी यहाँ दे रहा हुँ मर्यादा की दृष्टि से कविता यहाँ प्रकाशित नही कर पा रहा हुँ और उसका लिंक दे रहा हुँ कविता के कुछ शब्द आघात जनक है, परन्तु कवि बहुत सहजता से अपने शब्दों को कह जाते हैं [...]
  18. manoj manu
    hum to samajhte ki ek hami hai gulzar ke kayal,
    dekha to laga puri kaynat hi ‘gulzar’ hai gulzar se.
  19. ब्लाग लिखता हूं तसल्ली नहीं मिलती
    [...] त्रिवेणी: एक विधा 2. गुलजार की कविता,त्रिवेणी 3.बारिश में भीगते हायकू का [...]
  20. ब्लाग लिखता हूं तसल्ली नहीं मिलती
    [...] त्रिवेणी: एक विधा 2. गुलजार की कविता,त्रिवेणी 3.बारिश में भीगते हायकू का [...]
  21. anupam agrawal
    इतना अच्छा और ढेर सब लिख दिया है आपने डरते डरते .
    और अब आप ये चाह रहें हैं कि लोग कुछ भी ना कहें .डर का तो बहाना है .
    अरे अब लोग कहेंगे और आपको सुनना पडेगा .
    और फ़िर इसी तरह और अच्छी चीज़ें लिखनी पड़ेंगी .
  22. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] हो… 6.रघुपति सहाय फ़िराक़’ गोरखपुरी 7.गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी 8.गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता… 9.मौसम [...]
  23. sharad pawar
    गुलजार की त्रिवेणी वैसी है जैसी ……….गंगाजल की एक पवित्र बूंद

Sunday, June 11, 2006

नेतागिरी,राजनीति और नेता

http://web.archive.org/web/20110101193413/http://hindini.com/fursatiya/archives/140

नेतागिरी,राजनीति और नेता

अनुगूंज-२०
अनुगूँज के विषय नेतागिरी,राजनीति और नेता पर कुछ लिखने के पहले देश प्रख्यात व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल के लेख दि गैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
इस लेख में एक ट्रांसपोर्ट अफसर एक गाड़ी चलाना सिखाने वाले उस्ताद से उसका ड्राइविंग लाइसेंस मांगता है। उस्ताद कहते हैं कि उनके पास लाइसेंस नहीं है। उन्हें गाड़ी चलाना नहीं आता। अफसर चालान की धमकी देता है तब उस्ताद कहते हैं-
कर दीजिये,पर आप साबित कैसे करेंगे कि मैं गाड़ी चलाना जानता हूँ।
इसके बाद की कहानी ये है:-
अपने को काबू में लाकर अफ़सर अब अफसराना अन्दाज़ में पूछता है,”यानी कि खुद गाड़ी चलाने की तमीज नहीं और दूसरों को आप गाड़ी चलाना सिखा रहे हैं?”
“बेशक़ ज़नाब,आपने दुरुस्त फरमाया,” उस्ताद अफस़र की गाड़ी के बोनेट पर बाईं कुहनी टेक देते हैं और,जैसे नीचे बैठी जनता को लालकिले के ऊपर से सम्बोधित कर रहे हों,कहते हैं,”पर इससे आपको हैरत क्यों हो रही है? ऐसा तो आजकल सारे देश में हो रहा है। खुद अपने को देखिये,आप संस्कृत में एम.ए. हैं पर मोटरों के महकमें में अफसर हो बन गये हैं। मैं एक करोड़पति को जानता हूँ । वह कुछ गुप्त रोगों से पीड़ित था। चिकित्साशास्त्र से उसका कुल मिलाकर यही रिश्ता था। वह अब एक प्राइवेट कालेज चला रहा है। मैं एक ऐसे शख्स को भी जानता हूँ जो एक चुंगी चौकी पर नाकाबदार था। यानी उसके सारे जीवन का कुल यही अनुभव था कि किस तरह सड़क के आर-पार शहतीर खींचकर सामने आती गाड़ी को रोक लिया जाय। आज वह एक राज्य में गृहमन्त्री है और पुलिस कप्तानों को कानून और व्यवस्था के दाँवपेंच सिखाता है। सिर्फ भैंस चराकर आजकल मुख्यमन्त्री हो जाते हैं और मुँह खोलकर ‘भक्’ से जैसे ही कोई आवाज निकालते हैं वही उनका नीति सम्बन्धी वक्तव्य बन जाता है। उन्हें भरोसा है,और इस बात की अकड़ भी ,कि जो भैंस चरा सकता है वह राज्य के आठ-दस करोड़ इंसानों को भी चरा सकता है क्योंकि उधर भैंस है और इधर भेंड़ें हैं। और आप उन्हें भी हैं जिन्हें मिनिस्टरी तो दूर ,जिला परिषद के अध्यक्ष की कुर्सी तक कभी नहीं मिली और वे अचानक देश के प्रधानमन्त्री बन बैठे। आप भला मुझी से गाड़ी चलाने का लाइसेंस क्यों मांग रहे हैं? यहाँ से दिल्ली तक जाकर कहीं भी चेक कर लीजिये, प्रजातन्त्र की गाड़ी चलानेवाले और उस्ताद बनकर उन्हें सिखानेवाले आपको जो भी मिलेंगे,मुझसे कतई बेहतर नहीं होंगे। इसके बावजूद आप मेरा चालान करना चाहें तो कर दें। पर आपको शिकायत नहीं होनी चाहिए कि मैंने पूरी बात नहीं बताई। इसलिए कहना पड़ता है कि मैं अनाथ हूँ। मैं उनमें से हूँ जिन पर मामूली कानून लागू नहीं होते। यानी मैं कोई जनता नहीं हूँ। मैं वी.आई.पी. हूँ। इत्तफा़क़ से आपके मेरे परिवहन मन्त्री मेरे भतीजे हैं।”
इतना कहकर उस्ताद मेरी ओर देखते हैं और मेरी सवालिया निगाह का जवाब देते हैं,”जी हाँ। यह मेरा तीसरा भतीजा है। पर वह कभी ड्राइवर नहीं रहा। पहले वह बस कंडक्टर था,यूनियनबाजी़ के चक्कर में उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा। आखि़र में मरता क्या न करता ,बेचारा मिनिस्टरी कर रहा है।”
देश की राजनीति पर यह उद्धरण टाइप करने के बाद मुझे समझ नहीं आता कि नेतागिरी,राजनीति,और नेता पर क्या कुछ लिखा जाय!
इस बारें में मुझे गीतकार रामेंन्द्र त्रिपाठी की कविता याद आती है:-
राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है,
इस मंडी ने सारी मदिरा पी ली है।
किसी भी देश की नियति को उस देश की राजनीति सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। यह विडम्बना ही रही कि हमारे देश में आजादी के बाद अगर किसी पेशे का सबसे ज्यादा पतन हुआ है तो वह राजनीति का हुआ है। देश की नियति को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले पेशे में देश के सबसे घटिया लोग घुसे हैं।
देश के सबसे घटिया लोग राजनीति में इसलिये हैं क्योंकि अच्छे लोग राजनीति को गन्दा समझकर यहाँ में आना नहीं चाहते। वे दूसरे माध्यमों से देश की सेवा करना चाहते हैं। यह सोचकर कि जब कभी राजनीति साफ होगी तब यहाँ आयेंगे ,अच्छे लोग साफ सुथरी जगहों में चले जाते हैं। अच्छे तथा क्षमतावान लोग गंदगी से दूर भागते रहे-साफ,सुथरी निरापद जगहों पर।
गंदगी उनका पीछा करती रही। गंदगी की रफ्तार तथा मात्रा बहुत तेज होती है। देश,दुनिया का हर निरापद स्थान गंदगी की चपेट में आ चुका है।
कारण क्या थे समझना शायद मुश्किल हो लेकिन देश की राजनीति दिन पर दिन पतित होती जा रही है। नेताओं का कुर्सी के सिवाय कोई सिद्धान्त नहीं रहा। कभी दक्षिणपंथी पार्टियों से घृणा करने वाले देश का चक्का जाम करने का जीवट तथा करिश्मा रखने वाले जुझारू तेवर वाले नेता दक्षिण पंथी पार्टी की गोद में बैठकर उसके संयोजक मँत्री बन जाते हैं। कुर्सी के लिये नेता अपनी पूरी की पूरी पार्टी लेकर फर्शफांद (क्रासिंग द फ्लोर)जाता है। जिस आपातकाल में लोग अपना मुँह सिले गुफाओं में बैठे रहे वे आपातकाल के बाद अपने गुफावास के दौरान वीराने में किये इशारों को आपातकाल के साहसिक विरोध के रूप में व्याख्यायित तथा महिमामंडित करते हैं।
राजनीति में जनता से जुडा़व को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। आम जनता अब राजनीति में सबसे निचले पायदान पर पहुँच चुकी है। राजनीति अब सेवा , त्याग के चोंचलों से उबरकर ‘इवेंट मैंनेजमेंट’ बन गई है। जनसंवेदना को मैनेज करने का कौशल सबसे बड़ी काबिलियत है।
राजनेताओं के इसी काबिलियत को बयान करते हुये शायर मेराज़ फैजाबादी लिखते हैं:-
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना,
फिर जलते हुये शहरों में पानी बेचना।
आम जनता रोज ठगी जाती है। नेताओं से उसका मोहभंग हो चुका है तथा विश्वास उठ गया है। मध्यवर्ग जिसे कभी बुद्धिजीवी वर्ग कहा जाता था तथा समाज के दिशानिर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला माना जाता था उसे मध्यवर्ग से उच्चवर्ग की तरफ बढ़ने का रास्ता दिख गया है। त्याग,तपस्या,कुर्बानी जैसे शब्द बचकाने तथा फैशन से बाहर हो गये हैं। कुछ साल पहले बच्चे अपने बुजुर्गों के इन जज्बों को आदर देते थे। तब उनके आसपास वे थे तथा उनके बुजुर्ग थे। लेकिन अब समय के साथ दुनिया बहुत तेज हो गई है। वे अपने बुजुर्गों की अनाकर्षक एकरूपता के अलावा चमकती-दमकती दुनिया तथा झटके से सम्पन्न होते लोगों की भीड़ को देखते हैं। उन्हें लगता है कि हमारे बुजुर्गवार फालतू में अपनी जिंदगी बरवाद कर रहे थे।
ऐसा हो ही नहीं सकता कि समाज के एक हिस्से की गंदगी दूसरे हिस्से में बदबू न करे। समाज तथा राजनीति एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। राजनीति तो हमारे समाज का शोकेश है। जैसा समाज है वैसी राजनीति है। देश में गुंडे,मवाली,भ्रष्ट,आवारा लोग छा रहे हैं तो राजनीति में कैसे इससे बची रहेगी।
सरकारी दफ्तरों में सारे नियम,कानून को धता बताते हुये येन-केन-प्रकारेण कागज पर अपना लक्ष्य पूरा करने वाले अधिकारी जब डैसिंग,स्मार्ट और रिजल्ट ओरियेंटेड माने जायेंगे तो ऐसे लोग बढ़ेंगे ही जो राहत घोटाला,छात्रवृत्ति घोटाला,टाटपट्टी घोटाला ये घोटाला ,वो घोटाला करते पाये जायेंगे।
आजादी के समय एक रेल दुर्घटना के कारण नैतिक जिम्मेदारी मानते हुये लालबहादुरशाष्त्री ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। पचास सालों में भारतीय राजनीति इस भावुकता से उबर चुकी है। बडे़ से बड़ा अपराध के बावजूद नेता तब तक कुर्सी नहीं छोड़ता जब तक धकिया के बाहर न कर दिया जाय। उसका देशसेवा का बुखार तब तक नहीं उतरता जब तक कि उसे ठंडा करने के लिये हिमालय न भेजा जाय।
हर नेता दूसरे से घटिया हरकतें करके उसका रिकार्ड तोड़ना चाहता है। इसके बाद हर नेता दूसरे को अपने से घटिया सिद्ध करने में अपना पूरा कौशल लगा देता है। हरिशंकर परसाई के शब्दों में:-
हर नेता दूसरे की धोती खींचता है। कुछ तो शुरू से ही सिर्फ चढ्ढी पहने हैं। वे नाडा़ खींचते ही नंगे हो जाते हैं।
पूरी एक पीढ़ी बीत जाती है एक नेता पर हुये अपराध का निर्धारण करने में । फैसला होते-होते नेता का प्रमोशन हो जाता है-वह दूसरे लोक में राजनीति करने चल पड़ता है। यहाँ फाइलों तथा नेता की मूर्ति पर फूल चढ़ा दिये जाते हैं। यह व्यवस्था का राजनीति करण है।
देश का सबसे जहीन तबका सिविल सर्विसेस को माना जाता है। कभी उसके नीर-क्षीर विवेक पर समाज को भरोसा था। उसकी सहमति के बिना नेता कोई कदम नहीं उठा पाते थे। लेकिन ‘मिडिल क्लास’ से निकली इस क्रीम में पता नहीं कौन सी खुशबू या बदबू मिल गई कि यह क्रीम नेताओं के तलुये चाटती फिरती है। आपातकाल के दौरान के अनुभव बयान करते हुये किसी ने लिखा-
हमारे देश की नौकरशाही को बैठने को कहो तो वह लेट जाती है।
जब देश की सबसे जहीन,ताकतवर लाबी देश के सबसे निठल्ले,गैरजिम्मेदार नेताओं के इशारों पर नाचेगी तो राजनीति कैसे चलेगी?
ये कैसे हो सकता है कि कल तक पारिवारिक संपदा के नाम कुछ खेतों की मल्कियत वाला मास्टर कुछ सालों में सैकड़ों करोड़ कमा ले तथा देश के सबसे जहीन लोगों से युक्त राजस्व सेवा,आयकर वाले बगले झांकते रहें। उन्हें हवा तक न लगे।
यह नौकरशाही का राजनीतिकरण है कि वह वही देखती है जिसे देखने से उसका सुख चैन बना रहे। जिस पर अमल करते हुये वह बीस हजार की तन्ख्वाह में बीस लाख के ऐशो-आराम जुटा सके।इसमें कीमत भी कुछ खास नहीं चुकानी पड़ती है। सिर्फ कुछ समझौते करने पड़ते हैं। आत्मा को मारना पड़ता है। दुनिया में सब ऐसे ही चलता है , समझना पड़ता है। तथा कभी-कभी निलंबन से बचने के लिये सरेआम हवाई अड्डे पर नेता के पैर पकड़ने पड़ते हैं।
देश के हर व्यवसाय को राजनीति ने प्रभावित किया है। वहीं हर क्षेत्र का प्रभाव राजनीति पर पड़ता है। ये कोई बंद डिब्बे में अलग-अलग रखे आइटम नहीं हैं जो एक दूसरे पर असर न डालें।
अनुगूँज के विषय पर आते हुये आमिर खान के बहाने कुछ बातचीत। इस मुद्दे पर हुये घटनाक्रम से राजनीति के चरित्र का कुछ अंदाज पता चलता है।
मेधा पाटकर तथा अन्य उनके साथी नर्मदा आंदोलन से जुड़े हैं। पता नहीं किन परिस्थितियों में आमिर खान ने उनका समर्थन किया। गुजरात के कुछ छुई-मुई लोगों ने हल्ला मचा दिया कि हम आमिर की फिल्म ‘फ़ना’ गुजरात में चलने नहीं देंगे।गुजरात के लोगों को शायद अपने संविधान के मौलिक अधिकार बिसर गये जिनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी एक अधिकार है।
पता नहीं सारे गुजरात वालों के इस बारे में क्या विचार हैं लेकिन आमिर खान ने बयान दिया कि चाहे गुजरात वाले कुछ कहें,मेरी फिल्म देखें या न देखें मैं अपना बयान नहीं बदलूँगा।
बात सिर्फ इतनी थी। लेकिन जितना प्रचार मेधा पाटकर को शायद पिछले बीस सालों के अनवरत आन्दोलन से नहीं मिला होगा उससे कहीं ज्यादा ‘कवरेज ‘आमिर खान के नर्मदा बांध से प्रभावित लोगों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण बयानबाजी तथा बाद के ‘प्रायोजित शहीदाना तेवर’ से मिल गया।
सच तो शायद यह होगा कि आमिर खान के बयान से नर्मदा आन्दोलन के लोगों को जितना फायदा हुआ होगा उससे कहीं ज्यादा उनकी फिल्म को प्रचार मिल गया होगा।
कुछ दिन के लिये माहौल यह बना कि लगा नर्मदा बांध के विस्थापितों के एकमात्र मसीहा आमिर खान हों।आमिर खान एक गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं। गुजरात गये होंगे। किसी ने पूछ लिया होगा- हाऊ डु यू फील अबाउद नर्मदा वैली सफरर ? रंग दे बसंती का नायक बोला होगा- वेल, दे मस्ट बि प्ररापरली रिहैबिटेट। इसी की कड़ी से जुड़े कुछ और सवाल रहे होंगे । जाहिर है कुछ जवाब भी होंगे। मीडिया की कृपा से मामला उछल गया -गरमाता रहा। (यहाँ दिये संवाद काल्पनिक हैं। अंग्रेजी में इसलिये कि आमतौर पर हिंदी फिल्मों के अभिनेता अंग्रेजी बोलने में ज्यादा सहज होते हैं।)
आमिरखान को यह समझ नहीं होगी कि कैसे इनको निपटा जाये। वे नायकों के लिये सर्वसुलभ शहीदाना तेवर वाले खम्भे पर चढ़ लिये । जितने टीवी कवरेज मैंने देखे उनमें मेरे ख्याल में किसी में भी आमिर खान ने मेधा पाटकर या नर्मदा आन्दोलन से जुड़े लोगों में से किसी का नाम लिया या उनके महत्व का रेखांकन किया। पूरे पीड़ितों के मसीहा बनकर सीना खोलकर खड़े हो गये -लो उड़ा दो तोप से।
अगर आमिर खान नेता होते तो इस लांचिग पैड से आगे बढ़कर इस मुद्धे पर आंदोलन करते तथा धीरे-धीरे मेधा पाटकर की जमीन पर अपना हल चलाने लगते। इसे कहते मेधा पाटकर से मुद्दा छीनकर अपनी नेतागिरी चमकाना। लेकिन इसमें भी मेहनत पड़ती है। लिहाजा आमिरखान का यह कदम नेतागिरी के दायरे में नहीं आयेगा। इसे खाली ‘इवेंट मैंनेजमेंट’ कहा जायेगा। उनकी फिल्म चल गई। अब इस मुद्दे पर उनके कोई बयान मेरे ख्याल से नहीं आयेंगे।
आजकल राजनीति बहुत जटिल प्रक्रिया हो गयी है। केवल त्याग,तपस्या,सेवा भाव लिये हुये आप स्वयंसेवक से आगे नहीं बढ़ पायेंगे। आपका कार्यक्षेत्र केवल रैलियों में पूड़ी-सब्जी बटवाना तथा हमारा नेता कैसा हो,नेताजी जैसा हो से आगे नहीं बढ़ेगा। इसके आगे बढ़ने के लिये आपको हर वह काम करने पड़ेंगे जिनसे दूर रहने के लिये आप भाषण करते रहते होंगे।मुद्दे झपटने होंगे। दूसरे के लिये काम पर अपना पत्थर लगवाना होगा। और न जाने क्या-क्या करना होगा। इस पर भी पता नहीं कि सफलता आपके कदम चूमें या आपको लतिया के किसी दूसरे की गोद में जा बैठे।
राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। कोई मूल्य शाश्वत नहीं। पता नहीं कब नेता को माला पहनाते अनुयायी के हाथ नेता का घोंट दे तथा जनहित में नेता की विरासत संभाल ले। पता नहीं कब नेता के चरण छूता सेवक नेता के पैर के नीचे की कालीन घसीट कर नेता को जमीन सुंघा दे तथा उसके ठीक होने तक खड़ाऊँ शासन करने लगे । तथा बाद में नेता को अस्पताल से जेल भेज से तथा जनहित में खड़ाऊँ शासन की अवधि अनन्त काल तक बढ़ाता रहे। पता नहीं कब नेता किसी मुद्दे पर यू टर्न लेकर एकदम विपरीत अंदाज में जनता के साथ मुट्ठियाँ भांजने लगे।
नेहरू जी के अलावा जितने भी प्रधान मंत्री देश में बने वे सारे के सारे किसी न किसी दूसरे को प्रधानमंत्री न बनने देने की साजिश का परिणाम रहे।
रूस में कम्युनिस्ट सरकार के पतन के बाद का दृश्य याद है मुझे। न जाने कहाँ से एक नशे में डूबी आंखो वाला आदमी कूदकर टैंक के ऊपर चढ़ गया तथा भाषण देने लगा। कुछ दिन बाद वही रूस का राष्ट्रपति बना। पता नहीं मैं कितना सही हूँ लेकिन लोग बताते हैं कि जो स्तालिन लेनिन के बाद रूस की सत्ता पर काबिज हुये लेनिन उनको बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे तथा बाद के दिनों में स्तालिन के तानाशाही रवैये ने कम्युनिस्ट सरकार को असहिष्णु ,गैरजनवादी सरकार बनाने की दिशा में शुरुआत की जिसके कारण अंतत: वहां कम्युनिस्ट सरकार का पतन हुआ।
राजनीति मेरा विषय नहीं है। न ही मेरा इसमें कोई दखल हैं । लेकिन मुझे लगता है कि राजनीति समाज के हर क्षेत्र को प्रभावित करती है। वहीं समाज का हर क्षेत्र राजनीति पर कुछ न कुछ असर जरूर डालता है। आज हमारे देश की राजनीति में गिरावट है, पतन है तो इसका कारण हमारा समाज है। समाज के लोग जब तक साफ नहीं होंगे राजनीति में गंदगी बनी रहेगी। राजनीति के पतन के पीछे हमारी यह सोच सबसे ज्यादा जिम्मेदार है कि यह क्षेत्र गन्दा है। शरीफों के जाने के काबिल नहीं है। जब शरीफ लोग किनाराकसी करेंगे तो गुंडे,मवाली उसमें घुसेंगे ही।
यह मामला कुछ कुछ किसी पार्क की तरह है जिसमें जब आम जनता की भीड़ कम होती है तो गंजेड़ी,भंगेड़ी,नशेड़ी चिलम लेकर अखाड़ा जमा लेते हैं। अपने बगीचे को बचाना हो तो उसके लिये सही माली का काम भी इंतजाम भी करना पड़ता है।
अपने उद्धार के लिये हम देवदूत की तरह नेताओं की बाट जोहते रहे तो पता नहीं देवदूत कब अवतार लें। तब तक हम नेतागिरी का तांडव झेलते रहें-नेतागिरी, राजनीति और नेता को कोसते हुये।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

7 responses to “नेतागिरी,राजनीति और नेता”

  1. nitin
    बहुत ही सटीक लेख है.
    “राजनीति अब सेवा , त्याग के चोंचलों से उबरकर ‘इवेंट मैंनेजमेंट’ बन गई है। जनसंवेदना को मैनेज करने का कौशल सबसे बड़ी काबिलियत है।”

    जनसंवेदना के मैनेजमेंट में हमारे नेता शायद दुनिया के सबसे बेहतरीन मैनेजर है. कोई मुद्दा ना हो तो मुद्दा बना कर नेतागिरी कर लेते है.
  2. Tarun
    अनूपजी मजा आ गया पढ़ कर क्‍या सटीक लेख लिखा है -
    किसी भी देश की नियति को उस देश की राजनीति सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। यह विडम्बना ही रही कि हमारे देश में आजादी के बाद अगर किसी पेशे का सबसे ज्यादा पतन हुआ है तो वह राजनीति का हुआ है। देश की नियति को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले पेशे में देश के सबसे घटिया लोग घुसे हैं।
    वैसे नेहरू जी भी किसी और को देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखना नही चाहते थे और शायद यही आज की राजनीति का बीज हो
  3. SHUAIB
    हमेशा से आपका लेख पढ कर बहुत अच्छा लगा है।
  4. संजय बेंगाणी
    बहुत अच्छा लिखा हैं, लगता हैं मौका ही ढ़ूंढ़ (खोज) रहे थे यह सब लिखना का.
    वैसे आपके इस कथन से सहमत नहीं हुं कि
    “नेहरू जी के अलावा जितने भी प्रधान मंत्री देश में बने वे सारे के सारे किसी न किसी दूसरे को प्रधानमंत्री न बनने देने की साजिश का परिणाम रहे।”
    दरअसल नेहरू भी पटेल को प्रधानमंत्री न बनने देने का जुगाड़ थे.
  5. आशीष
    अपने उद्धार के लिये हम देवदूत की तरह नेताओं की बाट जोहते रहे तो पता नहीं देवदूत कब अवतार लें। तब तक हम नेतागिरी का तांडव झेलते रहें-नेतागिरी, राजनीति और नेता को कोसते हुये।
    पूरे लेख पर भारी पढती हैं, जरूरत है पढे लिखे लोगो की जो लोक पारित्राण पार्टी के नेताऒ के साथ चले. लेकिन बेचारे १०% वोट भी नही ले पाये।
    लेकिन मुझे खुशी है कि मैने उन लोगो का चुनाव प्रचार किया था।
  6. e-shadow
    क्या लिखा है गुरुदेव। आप तो एकदमै छा गये हैं।
  7. अवलोकन: अनुगूँज 20 - नेतागिरी, राजनीति और नेता at अक्षरग्राम
    [...] इन्हें छींटे बौछार का फायदा ये हुआ कि अच्छे वोट मिल गये। इस बीच प्रेमलता पांडे ने पर्चा भरने की फर्जी सूचना दे दी ये भी कयास लगाये गये कि हो सकता है कि इन्होने प्रेम की लता पर्चे के चारों ओर लपेट नामांकन ही वापस ले लिया हो। अपना पर्चा भरने आये फुरसतिया तो लगता था पर्चा भरने बड़ी फुरसत में आये हैं क्योंकि कहने लगे पहले हमसे ड्राइविंग सीखो तभी आगे की बात करेंगे। जबरदस्त सी ड्राइविंग सीखा लगे कविता करने [...]

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