Wednesday, August 05, 2015

बुजुर्गों से मुलाकात

आज सुबह आलस के चलते साइकिल नहीं चलाई।शाम को निकले गद्दी पर हाथ मारकर धूल झाड़ते हुए। इस्टार्ट करते ही रिम और सड़क की दूरी कम होती लगी। पता चला हवा कम थी। शायद सुबह चलाई नहीं तो गुस्से में हवा बाहर फेंक दी पहिए ने।

बहरहाल हवा भरवाई। शारदा मन्दिर के पास। साईकिल वाले भाई जी ने बताया कि पहले इंद्रानगर में थे दूकान। अब यहां 700 रूपये के किराये पर हैं तीन साल से। बोले-साईकिल लोगों ने रखना कम कर दिया। आमदनी कम हो गयी है। दोनों पहियों की हवा के 4 रूपये। बकाया चार रुपया देने के लिए जेब से मसाला पाउच की थैली से रेजगारी निकाल के लिए। मसाला खाते नहीं लेकिन मसाला पाउच की थैली के उपयोग का सार्थक उपयोग में क्यों चूकें।

रांझी होते हुए खमरिया की तरफ आये। हम बाएं रास्ता देखते हुए आ रहे थे। थोड़ा ज्यादा ही बांये देख गए शायद। यह एहसास तब हुआ जब 'सडक़ सभा' कर रही गायों में से एक से साईकिल भिड़ंत हो गयी।वो तो कहिये भिड़ंत हल्की थी और गायें शरीफ तथा आसपास किसी चैनल की कोई ओबीवैन नहीं गुजर रही थी वरना अब तक आप घटना का विवरण किसी चैनल पर देख रहे होते।

आगे फिर एक बार बीच सड़क पर रखे अवरोध से भिड़ते हुए बचे। 'सावधान' लिखे हुये बैरियर इतनी सफाई और सावधानी से अँधेरे में रखे हुए थे कि उनसे बचने का मतलब यही माना जाएगा कि वाहन चालक फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।


हम सब खतरों से बचते-बचाते खमरिया के अतिथि गृह पहुंचे जहां हमारे भूतपूर्व वरिष्ठ महाप्रबन्धक विज्ञान शंकर, जी जो कि आयुध निर्माणी बोर्ड से मेंम्बर होकर 2004 में रिटायर हुए, से मुलाकात हुई। साहब ओ ऍफ़ सी, कानपुर में हमारे वरिष्ठ महाप्रबन्धक थे। उस समय की कई यादें और उसके बाद और पहले की अनगिनत यादें हम लोगों के साथ की हैं।

11 साल हो गए उनको रिटायर हुए। हमारे कालेज के पहले बैच के छात्र होने के नारे वे हमारे डबल सीनियर हुए। अब तो हमारे बुजुर्ग की हैसियत से भी आदरणीय हैं। हमारी किताब 'पुलिया पर दुनिया' उन्होंने ईबुक खरीद कर पढ़ी। वैसे भी बताते हैं कि मैडम और साहब हमारा लिखा पढ़ते रहते हैं। ऐसा सीनियर और बुजुर्ग जब तारीफ करे जिसका स्वयं भाषा पर जबरदस्त अधिकार हो तो खुशनुमा तो लगता है लेकिन यह भी लगता है कि जहां चूक होती होगी वहां मुस्कराते हुए देखते भी होंगे।

साहब की सबसे बड़ी खासियत उनकी सहजता है। कार्यकाल के दौरान 'साधारण लोगों' पर उनका असाधारण विश्वास रहा।उत्पादन के मामले में कई उपलब्धियां उनके नाम हैं। यह अलग बात है कि कई मौकों पर उनका श्रेय और फायदा चतुर लोगों ने झपटा।उनकी यादों को साझा करने की बात मैं जब भी उनसे कहता हूँ तो वे कहते हैं- मैं जिन बातों को भूल जाना चाहता हूँ आप उनको मुझसे फिर से याद करने के लिए कह रहे हैं।
हमने साहब से आग्रह किया कि आपकी टिकट बुक करा दें आप लोग सिनेमा देख आइये। लेकिन साहब ने कहा- आप साथ में चलिए तो चले। लेकिन हम दिन में दफ्तर रहे और शाम को साहब के साथ रहे साथी अपने घर ले गए सो सनीमा स्थगित रहा।


खमरिया से लौटे तो रांझी में अपने कॉलेज के एक और सीनियर डा. शुक्ला के दवाखाने होते हुए आये। शुक्ल जी मोतीलाल से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद अपने शौक के चलते होम्योपैथिक डाक्टर हो गए। 23-24 साल से प्रैक्टिस कर रहे। जिस दुकान से साइकिल खरीदी वह बता रहा था -'बन्दा इंटेलिजेंट है। बिहार तक से मरीज आते हैं इसके पास।'

काबिलियत की बात तो खैर मरीज जाने लेकिन शुक्ल जी के बचपन के साथी रहे राजगोपाल जी ने बताया कि शुक्ल जी 'बचपन में' बड़े शरारती थे और अपने मोहल्ले की एक बंगाली लड़की को बचपन में चिढ़ाते थे। शुक्ल जी ने इस आरोप को गरिमापूर्वक स्वीकार करते हुए अपनी शरारतों के कुछ किस्से बयान किये। हमने सुझाव दिया कि 'बचपन में' के स्थान पर 'बचपन से' कहना अधिक समीचीन और सत्य के निकट होगा। शुक्लजी ने उदारता का परिचय देते हुए संसोधन स्वीकार कर लिया।

शुकुल जी की दूकान पर चाय पीते हुए गपियाये। किताब 'पुलिया पर दुनिया' हाथ में थी हमारे । हम उसको दिखाने को ले गए थे विज्ञान शंकर जी को।किताब देखकर डाक्टर साहब ने अपने से सम्बंधित पन्ना व्हाट्सऐप पर मंगा लिया इस वायदे के साथ कि वे किताब ई बुक खरीदेंगे।


शुक्ल जी के यहां चले तो नाई की दुकान दिखी तो ब्रेक मारे साइकिल को। बाल कटवाते हुए सोचा कि सेल्फी ले लें और पोस्ट करें। लेकिन यह सोचकर नहीं किये कि जिन लोगों ने दो दिन पहले हमारी फोटो लाइक करते हुए वाह वाही टिप्पणियॉ दी हैं वे लोग हमारी 'सेल्फी शक्ल ' देखकर कहीं अपनी लाइक वापस लेते हुए कमेंट मिटा न दें। दूसरा खतरा यह भी कि बाल कटी सेल्फी देखकर घरवाला कोई न कोई जरूर टोंकता बाल इत्ते छोटे क्यों करवाये, डाई क्यों नहीं कराया, कलम इतनी क्यों। सिर्फ एक सेल्फी के लालच से बचकर हम इतने सवालों के जबाब देने से बचे।

बाल कटाकर जब लौटे तो रांझी मोड़ पर बिना हेडलाइट वाले स्कूटर वाले न मेरे बगल से गुजरते हुए कहा-देखकर नहीं चलते। जिस तरह सड़क पर गाड़ियों की गुंडागर्दी बढ़ रही है उससे देखकर ऐसा लगता है कि बड़ी बात नहीं कि आने समय में सड़क पर पैदल चलते आदमी को कहा जाए कि भैया निकलने के पहले जो कहना सुनना हो कह के जाओ। सड़क पर पता नहीं कौन अंधाधुंध गति से चलता हुआ चालक ठोंक दे यह कहते हुए-देखकर नहीं चलते। अँधा है क्या बे।

रात हो गयी। अब खाना खा ले। समय पर खाना खाने और सोने का आदेश हुआ है। पालन जरूरी है न।

फ़ेसबुक की टिप्पणियां

थोड़े से दिन जुगाडे थे

थोड़े से दिन जुगाडे थे, संसद ने बहस के लिए,
कुछ निलम्बन में बीत गए, बाकी चीख पुकार में।

बैठा तो दिया था, जनता को बाजार की गोद में,
बची कि निपट गयी, पता चलता नहीं चीख पुकार में।

स्मार्ट बनेंगे, आगे बढ़ेंगे, होगी समूची दुनिया मुठ्ठी में,
जाने क्या-क्या बड़बड़ा रहा है ,वो नींद के खुमार में।
-कट्टा कानपुरी
प्रेम कवितायें लिखता कवि अक्सर
वियोग के किस्से लिखता है।

दुख ओढ़ता है, पीड़ा बिछाता है
अपने को गिरा पड़ा और
अगले को बहुत ऊंचा बताता है।

कविताओं में दिखते
प्रेमियों के बीच इतना
दुख, अलगाव, पीड़ा, बेचैनी
देखता हूं तो मन करता है
भगवान से कहूं
कि हे ईश्वर
दुनिया के और सारे झमेले तो हम झेल लेंगे
लेकिन अगर हो सके तो एक दया करो दीनानाथ
ये दो प्रेमियों के बीच का प्रेम हटा लो दुनिया से!

बहुत अझेल है दीनबंधु दुनिया में
साथ-साथ रहते दो प्रेमियों के किस्सों
में दुख, पीड़ा, वियोग के घिसे-पिटे बयान सुनना।

-कट्टा कानपुरी

Tuesday, August 04, 2015

'कुत्तन की नाईं' सिकुड़ के परे रहत हैं

कई दिन बाद आज साईकिल सैर को निकले। जगे तो पहले तो लगा बरसात हो रही है। थोड़ी देर अलसाये लेते रहे। अलसैट से उबरे तो उठे। देखा बाहर मौसम खुशनुमा सा था। आशिकाना च। फिर क्या निकल लिए साइकिल स्टार्ट करके।

सड़क पर लोग टहलने निकल लिए थे। एक हाथ में छाता थामे दूसरे को डुलाते हुए लोग सुबह की सैर कर रहे थे। जुवा पीढ़ी होती तो छाते की जगह शायद मोबाइल थमा होता।

दो बच्चे स्कूटी पर स्कूल ड्रेस में जा रहे थे। पीछे बैठा बच्चा एक साइकिल को हैंडल से थामे था। शायद पंचर हुई हो साइकिल। साइकिल स्कूटर के साथ चलने हांफ रही थी फिर भी संगत दिए भाग रही थी। हमारा समझाने का मन हुआ की ऐसे में धीरे-धीरे जाओ। कहीँ स्कूटी को ब्रेक लगाना पड़ा तो मुश्किल होगी। हमें अपने साईकिल यात्रा के दिन याद आये जब हम ट्रकों के पीछे डाले की जंजीर पकड़कर बिना पैडल मारे चलते थे और क्लीनर हमको डांटकर जंजीर छोड़ने को कहता था।लेकिन हमारा मन जब तक जबान को कहे तब तक वो आवाज की पहुंच से बाहर हो गए थे। हमरे वसीम बरेलवी का यह शेर याद करके मामला खत्म किया:

कहां से बच निकलना है, कहां जाना जरूरी है।
नए जमाने की खुदमुख्तारियों को कौन समझाये
आगे एक आदमी टी शर्ट पहने तेजी से टहल रहा था। टी शर्ट के पीछे बनती लहरियादार सिकुड़न का पैटर्न हर कदम के साथ बदल रहा था। दांया पैर आगे होने पर सिकुड़न का पैटर्न एक तरफ तो बायां पैर आगे होने पर दूसरी तरफ। लोकतंत्र में सरकारों के बदलने पर जैसे संस्थाओं के चरित्र बदलते हैं कुछ उसी तरह टहलते हुए आदमी की टी शर्ट का पैटर्न बदल रहा था।

आगे बैरियर बन्द था। हमने चाय की दूकान पर चाय पीते हुए ट्रेन के गुजरने का इन्तजार किया। ट्रेन हल्ला मचाते हुई गुजरी। उसको लगा हम कहीं दूर होंगे इसलिए जोर से बोल रही थी। लेकिन हम तो वहीं थे।


बैरियर पार करके ओवरब्रिज के नीचे दो लोग चूल्हा सुलगाये भात पकाते दिखे। ढिंढ़ोरी के पास के एक गांव से मजूरी करने आये हैं। बारिश में काम नहीं मिलता तो घर जाने की सोच रहे हैं। पैसा हो जाए तो निकल जाएंगे। यहां तो पानी में दोनों तरफ से बौछार में 'कुत्तन की नाईं' सिकुड़ के परे रहत हैं।

हमने पूछा कित्ता किराया तो बोले 100 रुपया है। हमने कहा कि हम फिर आएंगे और तब तक किराया न जुटा तो दे देंगे। चले जाना घर। वो बोले- भैया तुम भले आदमी हो। ठहर के पूछ लिए हाल चाल। नई त आज के समय कौन पूछत काऊ के हाल।

अपने लिए भले आदमी सुनकर अच्छा और अटपटा दोनों एक साथ लगा। अटपटा इसलिए कि प्रकृति की सर्वोत्तम कही जाने वाली कृति इंसान के हाल इतने बेहाल कि कोई उसके हाल सुन ले इतने में ही वह निहाल हो जाए।


हम आगे चले दीपा से मिलने। पता चला कि वह मन्दिर गयी है समय पूछने। लौटी तो हमने पूछा कि तुम तो समय खुद जान जाती हो। फिर मन्दिर क्यों गयी समय पूछने। बोली-मन्दिर पूजा करने और मन्नत मागने गए थे। क्या मांगा? बोली-हमको पढ़ाई लिखाई सिखा दें। हमने कहा-सीख जाओगी। मेहनत करो।

साथ में टॉफ़ी ले गए थे आज। लेकर थैंक्यू बोला दीपा ने। बोली अपनी सहेली मुस्कान को भी खिलाएंगे। कहने पर एक अधूरी कविता भी सुनाई ।हमने पूछा -हमारे साथ चलोगी? बोली- अभी तो स्कूल जा रहे। हमने पूछा-इतवार को चलोगी? बोली-इतवार को तो हम नानी के यहां जाते हैं।

चलते हुए दीपा की फोटो खींची। उसको दिखाई।खुश हुई। बोली-आपने जो उस दिन फोटो खींची थी वह हमको एक अंकल ने दिखाई थी। कह रहे थे वो आपके दोस्त हैं। फोटो देखते हुए उसने मेरी पत्नी के साथ फोटो भी देखी। कहा-आंटी की फोटो है! बहुत अच्छी है। कहते हुए वह स्कूल चली गई।

लौटते हुए फिर वो ढिंढ़ोरी वाले भाई जी मिले।अब तक उनकी पत्नी सामने के हैण्डपम्प से नहाकर लौट आई थीं। साथी पास की दुकान से ग्लास में चाय ले आया। भाई जी ने अपनी पत्नी को बताया -'जे चाय के पैसे भैया जी ने दिए हते।' उनकी पत्नी ने अपनी चाय का ग्लास हमको देना चाहा। हल्की जिद भी की।हमने मना किया यह कहते हुए कि हमने अभी पी है।

उस आदमी की फोटो खींचने के बाद देखा तो उसका जूता पूरा खुला था। मुक्त अर्थव्यवस्था की तरह। हर तरह की हवा आने की खुली छूट।

लौटकर कमरे पर आये। पोस्ट लिखी और अब दफ्तर जा रहे हैं। चलते-चलते यह याद आया कि जब
तीसरे पैरा में 'मुश्किल होगी' लिखा था न तो वो वाला गाना याद आया था:
तुम मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं
तुम किसी और को चाहो तो 'मुश्किल होगी'।
लेकिन हमने इस गाने को डांट के भगा दिया। इसकी जगह रमानाथ अवस्थी की गीत पंक्ति फिट की:
तुम मेरे होकर कहीं रहो
मैं बहुत बहुत खुश तनिक तनिक नाराज।
लिखने को तो लिख दिया लेकिन फिर आवाज उठ रही है कि भाई कोई जबरदस्ती है किसी का होकर रहना।
खैर यह तो बहस का विषय है। अभी तो दफ्तर बुला रहा है। जल्दी आओ, फाइलें इंतजार में हैं। सो अब चले। आप अच्छे से रहना। खुश । मुस्कराते हुए। बिंदास। जो होगा देखा जायेगा।

Monday, August 03, 2015

अफ़लातून से मुलाकात

आज कई वर्ष बाद Aflatoon जी से मिलना हुआ। हम जब बीएचयू गए थे 1985-86 में इंजीनियरिंग के बाद हायर स्टडी के लिए तो वहीं परिचय और मेलजोल और फिर मित्रता हुई। बाद में ब्लॉगिंग के दिनों में फिर मिले इलाहाबाद में हुए ऐतिहासिक ब्लॉगर सम्मेलन में जिसका आयोजन वर्धा विश्वविद्यालय के सौजन्य और सिद्धार्थ की अनथक मेहनत के चलते हुआ था।

बनारस में अफ़लातून जी स्टेटिस्टिक्स के छात्र थे। गांधीजी के सचिव रहे महादेव जी देसाई के पुत्र नारायण देसाई जी के सुपुत्र अफ़लातून जी को राजनीति का पारिवारिक संस्कार मिला। गांधी जी के मूल्यों पर चलने वाले नारायण देसाई जी गांधी कथा सुनाते थे। हाल ही में लम्बी बीमारी के बाद स्वस्थ हो गए थे लेकिन फिर वे नहीं रहे।


अफ़लातून जी समाजवादी जनपरिषद से बीएचयू से चुनाव लड़ते थे। उपाध्यक्ष पद का। बीएचयू आई.टी. में पढ़ने लिखने वाले छात्रों में काफी लोकप्रिय थे लेकिन जीतने के लिए दीगर संकायों के लोगों के वोट जिस तरह से पड़ते थे उसके चलते हमारे सामने तो कभी चुनाव नहीं जीत पाये अफ़लातून जी। बाद में तो फिर खैर छात्रसंघ के चुनाव पर ही रोक लग गयी।

आज मुलाक़ात होने पर तमाम यादें फिर ताजा हुई। अफ़लातून जी ने मेरे बारे में कुछ बातें बताई कि उनके चुनाव में कैसे सहयोग करते थे हम। हमें कुछ याद नहीं लेकिन हमने उनकी बात मान ली।

हमें यह जरूर याद आया कि हम अफ़लातून जी के आह्वान पर कुछ मुसहर बच्चों को उनकी बस्ती में पढ़ाने जाते थे।एक दिन साइकिल से अपने मित्र योगेन्द्र पाठक के साथ उन बच्चों को सारनाथ भी ले गए थे।बच्चों को पढ़ाने का काम ऐसा है जिसे मैं फिर से करना चाहता हूँ। देखिये।


अफ़लातून जी के जरिये ही समाजवादी चिंतक किशन पटनायक का लिखा हुआ पढ़ने को मिला। उनका एक लेख है- 'विकल्पहीन नहीं है दुनिया'। इस लेख में किशन पटनायक जी ने दुनिया की परस्पर निर्भरता बताते हुए समझाया है कि दुनिया के बाकी देश सर्वशक्तिमान माने जाने वाले अमेरिका का बहिष्कार कर दें तो अमेरिका की सारी हेकड़ी निकल जायेगी।

सुबह से दोपहर बाद 3 बजे तक के हमारे निवास पर प्रवास में तमाम यादें साझा हुईं। चलते समय खबर आई की अफ़लातून जी की बिटिया, Pyoli Swatija जो कि सुप्रीम कोर्ट में वकील है, को किसी विरोध प्रदर्शन में पुलिस ने रोक लिया है। बिटिया को फोन करके बधाई देते हुए अफ़लातून जी ने खबर साझा की और चले गए। खबर साझा न करते तो बिटिया से हड़काये जाते।

अफलातून जी को सबसे अधिक उत्सुकता 'पुलिया' देखने की थी। उनको दिखाने ले गए पुलिया। 'सर्वहारा पुलिया' पर उनके साथी विक्रमा मौर्या जी के साथ फोटो भी लिया।

Sunday, August 02, 2015

अहा देशभक्ति भी क्या

अहा देशभक्ति भी क्या!
इसको गरियाया उसको ठोंक दिया।

तुम हमसे असहमत कैसे हो भाई
तुमको तो गद्दार कहना ही होगा
अगर देशभक्त कहलाना है तुमको
हमारी तरह तुमको रहना होगा ।


स्कूल खुला है अहा-नया,नवीन
फौरन इसमें भर्ती हो जाओ
नई किताबें हैं , गणवेश नया है
फौरन आओ एडमिशन पाओ।

तर्क बहस के दिन बीत गए अब
गाली,मार-पिटाई के दिन आये
सही-गलत अब कौन देखता
बहुमत वाले का झंडा फहराये।

देशप्रेम का पाठ सीखना होगा
नहीं रटे तो फिर पिटना भी होगा
सब शब्दकोश अब हुए निरस्त
परिभाषायें नई सीखना होगा।

अरे गलत मत समझो भाई
हमने तो बस एक बात बताई
मित्रता दिवस है आज पड़ गया
यह तो है बस उसकी बधाई।

अहा देशभक्ति भी क्या!
इसको गरियाया उसको ठोंक दिया।

-कट्टा कानपुरी