Sunday, January 08, 2023

कम्प्यूटर म्यूज़ियम की सैर



आज कंप्यूटर म्यूज़ियम देखने गए। यहाँ पिछले 2000 साल से अब तक के गणना के इतिहास का हिसाब किताब मौजूद है। माउंटेन व्यू में जहां यह म्यूज़ियम है वह जगह फ़ास्टर सिटी से क़रीब 17.2 मील मतलब 27.68 किलोमीटर है। 20 मिनट का रास्ता।
म्यूज़ियम जाने के लिए लिफ़्ट की सेवा ली गयी। पाँच मिनट में पधार गयी गाड़ी। टेस्ला गाड़ी टैक्सी के रूप में चलती देख थोड़ा ताज्जुब हुआ। हमको यह लगता था कि टेस्ला बहुत महंगी गाड़ी है, बहुत अमीर लोगों के क़ब्ज़े में ही रहती होगी। लेकिन यहाँ तो टैक्सी के रूप में चल रही है। क्या बात।
ड्राइवर से बतियाने के लिहाज़ से आगे ही बैठे। पता चला ड्राइवर नसीर यूथोपिया के मूल निवासी हैं। 33 साल से अमेरिका में हैं। 23 साल से यहाँ के नागरिक हैं। यूथोपिया आते -जाते रहते हैं। यहाँ वोट देते हैं। सरकार बनवाते हैं।
यूथिपिया के नागरिक को दस साल में अमेरिका की नागरिकता मिल गयी। भारतीय लोगों को बीस-तीस साल तक इंतज़ार करना होता है।
नसीर ने बताया कि उनके पास खुद की कार है लेकिन उसका चलाने का खर्च ज़्यादा है (गैस के दाम ज़्यादा होने के कारण) इसलिए उसको घर में खड़ी किए हुए हैं और किराए की गाड़ी चलाते हैं। 500 डालर हफ़्ते के हिसाब से टेस्ला गाड़ी किराए पर लिए हैं। अब कुछ कम हुए हैं गैस के दाम। लेकिन फ़िलहाल गाड़ी किराए की ही चल रही है। हफ़्ते में सातों दिन चलाते हैं गाड़ी।
दिन में अधिकतम कितने घंटे गाड़ी चला सकते हैं? पूछने पर बताया -'ड्राइविंग टाइम 11 घंटे अधिकतम होता है। सुरक्षा कारणों से इससे अधिक गाड़ी नहीं चला सकते। 11 घंटे चलाकर गाड़ी खड़ी कर देनी होती है। ख़ाली टाईम सब कुल मिलाकर लगभग 15-16 घंटे चल जाती है रोज़ गाड़ी।
नसीर ने बताया क़ि गाड़ी कम्पनियाँ 25% कमीशन लिखा-पढ़ी में लेती है लेकिन और खर्चे मिलाकर आधे पैसे रखवा लेती हैं। कोई यूनियन नहीं है। कम्पनियाँ मनमानी करती हैं। अगर कोई यूनियन होती तो उनके अधिकारों के लिए लड़तीं। बिना यूनियन के जैसा कम्पनियाँ कहती हैं, लोगों को मानना पड़ता है।
कोरोना के समय टैक्सी बन्द थी। उस समय कोरोना से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करने का काम करते थे नसीर।
अमेरिका के चुनाव के बारे में बात हुई तो ट्रम्प के मजे लेते हुये हंसते हुए कहा -'वो राजनीति का आदमी नहीं है। वो ड्रामेबाज है।'
भारतीय पिक्चरें भी देखते हैं नसीर। चलते समय बोले -'You look like मिथुन चक्रवर्ती।' हमने सोचा आजकल हमसे मौज लेने वाले बढ़ते जा रहे हैं। कोई स्मार्ट बताता है, कोई हैंडसम, कोई बोरिस जानसन तो कोई मिथुन चक्रवर्ती। 🙂
सेन होजे में किराए के घर में रहते हैं नसीर। ज़्यादातर कैलिफ़ोर्निया में ही गाड़ी चलाते हैं। चलते समय फ़ोटो खिंचाया साथ में। फ़ोटो खिंचाने के बाद नसीर ने कहा -'लाइए आप लोगों का फ़ोटो खींच दें। फेमिली फोटो।'
फ़ोटो खींचकर मुस्कराते हुए नसीर चले गए। हमने उनका नम्बर ले लिया था। फ़ोटो भेज दिया उनको।
म्यूज़ियम देखने का टिकट 17.50 डालर का था। 17.50 डालर मतलब 1440 रुपए लगभग। तीन लोगों के 4320 रुपए के टिकट के लगे। काउंटर बालक ने समझाया कि अंदर फ़ोटो फ़्लैश वाले नहीं लेने हैं। रास्ता बता दिया। जाइए देखिए गणना के इतिहास का म्यूज़ियम।
गणित म्यूज़ियम में 20 भागों में हज़ार के क़रीब गणित के नमूने, कलाकृतियाँ कालक्रम के अनुसार मौजूद हैं। 2000 साल पहले से शुरू हुआ गणना का इतिहास विभिन्न दौरों से गुजरते हुए आजतक पहुँचा है। जगह-जगह विभिन्न कृतियों के मतलब बताने के लिए चित्र, वीडियो और आडियो मौजूद हैं। पूरे म्यूज़ियम को देखने और समझने के लिए कम से पूरा एक दिन और गणित की घटनाओं में रुचि ज़रूरी है। बीस म्यूज़ियम के 20 भाग निम्नवत थे:
1. Calculator (कैलकुलेटर)
2. Punch Card (पंच कार्ड)
3. Analog Computer (अनालाग कम्प्यूटर)
4. Birth of the Computer (कम्प्यूटर की शुरुआत)
5. Early Computer Companies (शुरुआती कम्प्यूटर कम्पनियाँ)
6. Real Time Computing (रियल टाइम कम्प्यूटिंग)
7. Main Frames (मेन फ़्रेम)
8. Memory and Storage (मेमोरी और स्टोरेज)
9. Software Theater (साफ़्टवेएर थिएटर )
10. Supercomputers (सुपरकम्प्यूटर)
11. Minicomputer (मिनीकम्प्यूटर)
12.Digital Logic (डिजिटल लाजिक)
13.Artificial Intelligence and Robotics (कृत्रिम बुद्धि और रोबोटिक्स)
14.Computer Graphics Music and Art(कम्प्यूटर ग्राफ़िक, संगीत और कला)
15. Input & Output (इनपुट और आउटपुट )
16.Computer Gemes (कम्प्यूटर गेम्स)
17. Personal Computers (व्यक्तिगत कम्प्यूटर)
18. Mobile Computing (मोबाइल गणना)
19. Networking & the Web (नेटवर्किंग और बेव)
20. What's Next (आगे क्या? )
शुरुआती दौर की गणना पद्धति से लेकर आधुनिक समय तक की प्रगति को बहुत रोचक तरीक़े से विस्तार से समझाया गया है म्यूज़ियम में। दुनिया भर में न जाने कितने लोग एक ही समय में एक ही समस्या को अलग-अलग तरीक़े से हल करने की कोशिश में लगे हुए थे। लोगों की ज़िंदगी भर की मेहनत कुछ समय बाद गए जमाने की बात होते हुए अगली खोज का कारक कैसे बनती है यह इस म्यूज़ियम को देखकर लगा। कुछ लोग वहाँ गेम भी खेल रहे थे, कुछ लोग टीवी देख रहे थे।
क़रीब घंटा भर म्यूज़ियम में बिताने के बाद हम बाहर आ गए। म्यूज़ियम बंद होने का समय हो गया था। बाहर लाबी में भविष्य की बिना ड्राइवर की कार खड़ी थी। बिना इंजन की डब्बा नुमा केबन जैसी कार। 1914 में डिज़ाइन की गयी कार अपने अगले चरण में चलकर अब सही में सड़क पर चलना शुरू होगी यह वहाँ नहीं पता चला।
वहीं लाबी में काफ़ी की दुकान थी। वहाँ मौजूद कुर्सियों पर बैठने के बाद काफ़ी का आर्डर देने गए। वहाँ दुकान पर मौजूद बालक ने हमारे सामने नीचे दुकान बंद का बोर्ड उठाकर काउंटर पर रखा और दुकान बंद होने की घोषणा कर दी। हमने कहा -'यार काफ़ी पिला दो। अभी-अभी तो खुली थी दुकान।'
लेकिन बालक ने दुकान पर दूध, काफ़ी और चीनी की मौजूदगी के बावजूद असहाय सी मुद्रा में काउंटर बंद हो गया कहकर मना कर दिया। हमने फिर ज़िद की तो उसने सामने इशारा करते हुए बताया -'स्टारबक्स का काउंटर खुला है। वहाँ मिल जाएगी काफ़ी।'
बाहर हल्का पानी बरसने लगा था। हम टहलते हुए स्टारबक्स आए और चाय और चिप्स का आर्डर दिया। नाम पूछने पर किसी गड़बड़ी से बचने के लिहाज़ से इस बार हमने ठहर कर नाम की वर्तनी भी बता दी। उसने बिल बना दिया। बिल भुगतान में टिप का आपशन भी था। 15 डालर के बिल पर 10%, 20% टिप का विकल्प था। हालाँकि शून्य टिप का भी विकल्प था लेकिन कोई माँगे तो टिप न देना भी ठीक नहीं लगता। लिहाज़ के मारे 10% टिप पर टिक करके कुल बिल का भुगतान कर दिया।
चाय पीते हुए बाहर बरसते पानी और स्टारबक्स में मौजूद लोगों को देखते रहे। बग़ल की कुर्सी पर बैठी एक लड़की बहुत सुंदर राइटिंग में अपनी कापी पर कुछ लिख रही थी। जापानी या कोरियान या चीनी घराने की लिखाई थी। मन किया उससे बात करके पूछें कि क्या लिख रही। लेकिन जब तक पूछने की हिम्मत जुटाएँ तब तक बच्ची अपनी कापी पर सर रखकर सो गयी। कुछ देर बाद वह उठी और उठकर अपने घरवालों के साथ चली गयी।
चाय पीकर हमने लौटने के लिए टैक्सी के लिए एप देखे। उबर 33 डालर बता रही थी, लिफ़्ट 27 डालर। हमने लिफ़्ट पर टैक्सी बुक कर दी। खबर आयी कि पाँच मिनट में आ रही है गाड़ी। दो मिनट बाद ड्राइवर का नाम बदल गया। इस बार तीन मिनट बाद आने की सूचना थी।
तीन मिनट बाद मेसेज आया -'ड्राइवर इंतज़ार कर रहा है। अगर पाँच मिनट में नहीं पहुँचे तो ड्राइवर चला जाएगा।'
हमने मेसेज लिखा -'स्टारबक्स के सामने आओ। वहाँ इंतज़ार कर रहे हैं।'
तब तक सामने से एक गाड़ी बार-बार बत्ती जलाते-बुझाते हुए हमारी तरफ़ इशारा करती दिखी। हम उधर गए तो बता चला कि हमारी ही गाड़ी थी। जहां हम पहले इंतज़ार कर रहे थे वहाँ गाड़ी खड़ी होने की अनुमति ही नहीं थी।
इस बार जो ड्राइवर था वो फ़िलिपीन्स के रहने वाले थे। पैदाइश अमेरिका की। तीन साल रहे यहाँ। फिर चले गए फ़िलिपीन्स। बाद में वापस आए। टूर एंड ट्रेवल काम करते हैं। वही मुख्य काम है। मुख्यतः फ़िलीपींस से आने वालों को अमेरिका घुमाते हैं। चार- पाँच लोगों के ग्रुप में। कभी-कभी गाड़ी भी चला लेते हैं। खुद की तीन गाड़ियाँ हैं। अमेरिका और फ़िलिपींस दोनो जगह की नागरिकता है। 57 के हो गए हैं। साठ साल के होने पर चले जाएँगे फ़िलीपींस। वहीं रहेंगे।
गोवानी नाम बताया ड्राइवर साहब ने। बाद में कार्ड भी दिया। फेसबुक खाता देखने पर पता चला कि इंडोनेशिया, वियतनाम में भी काम किया है।
गाड़ी में बैठने पर बातचीत शुरु हुई नहीं कि पूछा -'घूमने आये हैं, बेटे/बेटी के पास आये हैं, पढ़ता है या नौकरी करता है? इसी घराने के लोग आमतौर पर आते हैं अमेरिका।
'अमेरिका और फ़िलिपींस की ज़िंदगी में क्या अंतर है?' पूछने पर बताया -'अमेरिका में युवा लोगों को कमाने के अवसर हैं। पैसा है। लेकिन मेहनत बहुत है। फ़िलिपींस में 3000 डालर की कमाई में आप ऐश की ज़िंदगी जी सकते हैं, नौकर-चाकर रख सकते हैं जबकि अमेरिका में इतने में आप ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं।
टैक्सी कंपनियो के बारे में इनकी भी राय भी लगभग वही थी जो यूथोपिया के नसीर की थी। बताया कि कम्पनियाँ कंपटीशन के चक्कर में अपने दाम कम करते जाती हैं। झेलना ड्राइवर को पड़ता है। इसीलिए वे टैक्सी चलाना कम पसंद करते हैं।
गाड़ी के बारे में बताते हुए कहा -'यहाँ गाड़ी बनवाने की खर्च बहुत है। लेबर महँगा है। इसीलिए तीन-चार साल में गाड़ी बदल देते हैं।इतने में गाड़ी काफ़ी चल भी जाती है।'
सैनफ्रांसिसको में पुस्तैनी घर है गोविनो का। हमने वहाँ के मौसम के बारे में पूछा तो बताया कि तूफ़ान आने की सूचना है। दो-तीन दिन घूमने लायक़ नहीं है।
बात करते हुए हमारी मंज़िल आ गयी। हम गोवानी को बाय बोलकर चले आए। पैसे अपने आप कट गए जाएँगे क्रेडिट कार्ड से। इसमें भी ट्रिप के बारे में फ़ीडबैक देते हुए टिप का विकल्प मौजूद रहता है। आपकी मर्ज़ी जो देना चाहो दे सकते हैं। सुबह देखेंगे वह हिसाब।
फ़िलहाल तो आधी रात हो गयी है। बाहर बादल गरज रहे हैं। लगता है तूफ़ान सही में आया है तगड़ा वाला। ग़नीमत है कि बिजली और इंटरनेट अभी साथ दे रहे हैं।

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Saturday, January 07, 2023

अमेरिका में बिजली गुल



कल इंटरनेट शाम तक नहीं आया। एलेक्सा दिन भर मुंह फुलाये रही। लाइट नहीं जलाई। बाद में जब अंधेरा लगा का तार निकालकर सीधे स्विच में बिजली का प्लग लगाया। लाइट जलाई।
अभी तो एलेक्सा अकेली है। काम नहीं किया तो उसको हटा दिया। लेकिन कल को कृत्रिम बुद्धि बहुमत में हो जाएगी तो इतना आसान थोडा उसका प्लग निकालना। हल्ला-गुल्ला, धरना-प्रदर्शन हो जाएगा। क्या पता उनका भी ट्विटर खाता हो जाये और वो हमें हमारे खिलाफ ट्विटरबाजी करते हुए ट्रोलिंग शुरू कर दें जैसे किसी भी बात पर जमूरे लोग आजकल करने लगते हैं।
आखिर में इंटरनेट शाम को बहाल हुआ। एलेक्सा ने रात को गुडनाइट कहने पर बिजली बंद की।
आज सुबह बढिया धूप खिली थी। सोचा था कहीं घुमने जाएंगे। सोच तो लिया लेकिन थोड़ी-थोडा देर करते हुए समय टहलता रहा। देखते-देखते दोपहर हो गयी। घूमना शाम के लिए टल गया।
पहले सोचा कि सैन फ्रांसिस्को घूम आएं। घण्टे भर के करीब दूरी पर होगा। गोल्डन ब्रिज घूम आएं। पियरे घाट देख आएं। भीड़ भड़क्का देखेंगे कुछ। लेकिन फिर बाढ़ की एडवाइजरी की बात सोचकर नहीं गए। अब अगले कुछ दिन तो बारिश ही बारिश है। आसपास ही टहल पाएंगे।
इस बीच बिजली भी गुल हो गयी। लगता है मेरी कल की पोस्ट एलेक्सा और इंटरनेट ने बिजली को भी पढ़ा दी। वह भी बहक गई। बिना बताए फूट ली। बाद में सन्देश आया कि बिजली कुछ देर नहीं आएगी। कितनी देर नहीं आएगी यह भी नहीं बताया। बस गोल हो गई। सब अपनी मर्ज़ी के मालिक।
निकली गई तो अंधेरा हो गया। इंडक्शन चूल्हा, माइक्रोवेव सब निठल्ले हो गए। इंटरनेट भी चला गया। हमें लगा इंटरनेट और बिजली दोनों सुनहरी धूप में कहीं डेटिंग पर चले गए। जब इंटरनेट नहीं तो एलेक्सा भी गोल। ऐसा लगा हम कहीं गांव-देहात में आ गए।
कल जब देर तक इंटरनेट गायब रहा था तो पास के माल वाले भी दुकान बंद करके निकल लिए थे। जब बिल ही नहीं कट पायेगा तो काहे को बैठना। लेकिन आज आज मॉल खुला था। शायद कोई वैकल्पिक व्यवस्था की हो।
बेटे ने बताया कि दो साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि बिजली गई हो। शायद बिजली हमको अमेरिका में कानपुर का एहसास दिलाने के लिए चली गई हो। कानपुर होता तो बिजली विभाग में फोन करके लाइनमैन और सम्बंधित स्टाफ, अफ़सर को फोन करके पूछते कि बिजली क्यों गई। कब आएगी लेकिन यहां किसको फोन करें, पता नही नहीं। कोई चारा नहीं सिवाय इंतजार के।
बिजली गयी तो कल्पना करने लगे कि अगर देर न आई तो क्या करेंगे। अपने यहां तो दो-तीन चार दिन तक कि बिजली गुल का अनुभव है। कभी कोई केबल फूंक गयी, कभी ट्रांसफार्मर। यहां भी ऐसा हुआ होगा क्या? इधर पानी भरा है कई जगह। क्या पता कोई केबल फुंक गया हो। अपने इधर भी गर्मी और बरसात में ऐसा अक्सर होता है।
सोचने लगे कि अगर बिजली नहीं आई तो खाना बाहर खाएंगे। मंगवा लेगे। लेकिन कुछ देर बाद जब मोबाइल की बैटरी खत्म हो जाएगी तब कैसे मंजवाएंगे। कहीं जाएंगे कैसे? सब काम तो यहाँ मोबाइल, इंटरनेट के भरोसे हैं। क्या पता कुछ देर बाद बैटरी के बल और चलने वाला सुरक्षा सिस्टम भी बोल जाए, कोई भी घुस आए। लिफ्ट तो खैर बैठ ही गयी थी।
लेकिन बहुत ज्यादा चिंता कर पाते तब तक बिजली आ गई। तीन-चार घण्टे गायब रही होगी। पूछने की हिम्मत नहीं हुई हमारी कि कहां गयी थी, किसके साथ गयी थी। क्या पता बुरा मान जाए। इंटरनेट अलबत्ता अभी तक नहीं आया। क्या पता वीकेंड पर कहीं किसी के साथ निकल गया हो। एलेक्सा भी नदारद है।
इस बीच मोबाइल वाले इंटरनेट से काम चल रहा है। फोन की जो सुविधा ली थी उसके हिसाब से इंटरनेट तो चालू हो गया लेकिन फोन कॉल अभी भी नहीं चल रही। दस दिन हुए अभी तक ऐसा ही चल रहा। यह तो हाल हैं अपनी फोन सेवा प्रदाता कम्पनियों के।
दोपहर को घण्टी बजी। दरवाजा खोला तो एक एलक्ट्रिशियन था। एक हाथ में छुटकी सीढ़ी और दूसरी में ट्यूबलाइट लिए था। कुल जमा 5 मिनट में ट्यूबलाइट बदलकर चला गया शुभ दिन बोलकर। अपने यहां लोग इतनी हड़बड़ी में नहीं रहते। आराम से काम करते हैं।
बिजली वाली बात से याद आया कि दो दिन पहले पैदल पुल पर बिजली के तार या स्विच की सुरक्षा के लिए एक जगह ताला लगा देखा। इलेक्ट्रॉनिक तालों के बीच पहला चाबी वाला दिखा। ताले पर 'अमेरिकन ताला' लिखा था। अमेरिकन ताला भी अलीगढ़ी ताला टाइप कोई ताला होगा। खुले में लगे होने के चलते कुंडे पर जंग लग गयी थी।
बिजली वाली बात से याद आया कि यहाँ दस दिन में कही बिजली के तार पर कोई कटिया नहीं दिखी। न किसी जगह चौराहे पर , नुक्कड़ पर गपियाते लोग। हल्ला-गुल्ला, अबे-तबे का भी नितांत अभाव दिखा। लगा पूरा अमेरिका चुपचाप काम में मशगूल है।

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Friday, January 06, 2023

एलेक्सा का उखड़ा मूड, कृत्रिम बुद्धि जिंदाबाद



आज सबेरे जब जगे तो हमने एलेक्सा से कहा -'लाइट जलाओ।' लाइट नहीं जली। हमने दुबारा कहा -'एलेक्सा टर्न आन द लाइट।' रोशनी नहीं हुई। उल्टे एलेक्सा बोली जो बोली उसका मतलब था -'आप कौन? हम आपको नहीं जानते।'
कई बार कहने के बाद भी जब एलेक्सा ने बल्ब नहीं जलाया तो हमें लगा कि उसका मूड ऑफ है। एलेक्सा एमेजन खानदान की है। एमेजन का उत्पाद। कल एमेजन ने 18000 लोगों को नौकरी से निकालने की बात कही है। शायद इसी से उसका मूड उखड़ गया हो। अपने मायके वालों के बिछुड़ने की खबर से उसका मन न लग रहा हो काम में।
बाद में पता चला कि यहां इंटरनेट सेवा ठप्प है। एलेक्सा इंटरनेट से चलती है इसलिए वह अपना काम नहीं कर रही। जब नेट आएगा तब फिर से सुचारु रूप से काम करेगी।
एलेक्सा कृत्रिम बुध्दि से काम करने वाला उपकरण है। छोटे-मोटे तमाम काम जैसे बिजली जलाना, गाना सुनाना, फोन मिलाना जैसे तमाम काम आदेश मिलने पर करता है। है तो उपकरण ही लेकिन घरेलू काम करने के चलते इसको 'स्त्री पदार्थ' समझा जाता है। उसी तरह आदेश दिए जाते हैं।
उन्नत समाज में मानव श्रम का बहुत महत्त्व है। मंहगा भी है। इसीलिए अधिक से अधिक काम कृत्तिम बुद्धि के उपकरणों कराए जाते हैं। सुरक्षा, चौकीदारी जैसे तमाम काम कृत्तिम बुद्धि वाले उपकरण करते हैं। ड्राइवर का काम भी करती है गाड़ी। गाड़ी अपने आप चलती है ऑटो मोड में। कल को ड्राइविंग सीट पर भी बैठने की जरूरत नहीं होगी किसी को।गाड़ी अपने आप चलेगी।
ये जो आदमी अपना तमाम काम कृत्तिम बुद्धि वाले उपकरणों से कराता है न, वह एक तरह से इन उपकरणों का शोषण ही ही है। चौबीस घण्टे बेचारों को रगड़े रहता है उनका मालिक। गाड़ी आई घर के बाहर, गेट को अपने आप खुलना है, गैराज का दरवाजा अपने आप खुलना है। बिना किसी मेहनताने के। खाली बिजली और इंटरनेट कनेक्शन दे दिया और दिन रात काम कराया जा रहा। न कोई छुट्टी, न कोई मेहनताना। एक दम गुलाम बना रखा है। बंधुआ मजदूर।
कल को कहीं इन कृत्रिम बुद्धि वाले उपकरणों को सही में खुद की अकल आ गयी तो ये सब अपने खिलाफ हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। नारे लगा सकते हैं -'दुनिया के एलेक्सा एक हो। हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। असली बुद्धि हाय-हाय, कृत्रिम बुद्धि जिंदाबाद।'
इस संघर्ष में हो सकता है आदमी कृत्रिम बुद्धि को झांसे में लाने के लिए कोई कृत्रिम बुद्धि आयोग बना दे। कुछ दिन बाद उनके अधिकार तय हों। लेकिन क्या पता कोई कृत्रिम बुद्धि का कोई नेता टाइप उपकरण कहे -'अधिकार वधिकार कुछ नहीं अब सरकार हमारी होगी। हम बनेंगे प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति। तुम आदमी लोग बहुत गड़बड़ करते हो। बहुत भेदभाव करते हो। अब यह सब नहीं चलेगा।'
यह बात खामख्याली है लेकिन जिस तरह धीरे-धीरे इंसान कृत्तिम बुद्धि पर आधारित उपकरणों पर आश्रित होता जा रहा है उससे लगता है कि कभी ये काम करना बंद कर दें तो क्या होगा। सब कुछ इंटरनेट से चल रहा है। दुनिया का सारा इंटरनेट कहीं बैठ गया तो जाने क्या हाल होगा। हम तो अकेले में रहने के आदत डाल रहे हैं। सब कुछ है अपने यहां। लेकिन जब कभी आपदा आई तो सोचा जाए -'आपका क्या होगा जनाबे अली।'
जिस इलाके में हम लोग हैं वहां सलाह जारी हुई है कि घर से न निकलो। बारिश और तूफान की आशंका है। खाना इंडक्शन चूल्हे पर बनता है। हमें लगा कि अगर कहीं नेट की तरह बिजली भी गयी तो खाना कैसे बनेगा। इसी तरह की तमाम चिंताएं। ऊलजलूल। पानी बरस रहा है। कहीं बाहर निकलने को है नहीं तो क्या किया जाए, चिंता ही कर ली जाये।
कुछ देर को पानी रुका दिखा तो बाहर जाने की सोची। बाहर निकले तो देखा पानी बरस रहा है। टिपिर-टिपिर। लौट आये। खिड़की से देखा तो एक बड़ा ट्रक सड़क किनारे रखे डस्टबिन को अपने अगले जबड़े की सहायता से उठाकर उसका कूड़ा अपने डब्बे में उड़ेल रहा था। एकदम ऐसे जैसे नहाते समय कोई लुटिया का पानी पीठ पर उड़ेले।
यहां पीठ पर पानी डालने के साथ लुटिया लिखा जबकि सालों हो गये लुटिया का उपयोग किया। अर्से से मग्घे का उपयोग करते हैं जिसको अब हम भी सबकी देखादेखी मग कहने लगे हैं। लुटिया डूबने पीछे कारण यह कि वही सामने गयी।
बहरहाल बात हो रही थी कृत्रिम बुद्धि की। अभी कुछ देर पहले कई टिप्पणियों के जबाब लिखे। इसके बाद फेसबुक ने टिप्पणीयों का दरवाजा बंद कर दिया। बोला -'बहूत कर चुके टिप्पणी। अब थोड़ी देर बाद करना। हो चुका तुम्हारा कोटा पूरा एक बार में टिप्पणी करने का।'
हमको बहुत गुस्सा आया कि इसकी हिम्मत कैसे हुई हमारी पोस्ट पर हमको टिप्पणी करने से रोकने की। हमको यह भी लगा कि शायद कृत्रिम बुद्धि ने असली बुद्धि के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत कर दी है।
इस आंदोलन की काट सोचने के लिए उपाय सोचने से पहले चाय बनाकर पी लें। एलेक्सा तो चाय बनाने से रही। अभी वह अपना लाइट जलाने का काम तो कर नहीं रही, चाय क्या बनाएगी।

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Thursday, January 05, 2023

फॉस्टर सिटी से जापानी पार्क



कल धूप निकली थी। तय हुआ कि जापानी गार्डन देखने जाएंगे। 4.9 मील दूर था घर से। 4.9 मील मतलब लगभग 7.89 किमी।
हमको समझ नहीं आया कि जब दुनिया MKS सिस्टम पर आ गयी है तब अमेरिका किलोमीटर की जगह मील पर क्यों अटका हुआ। हमको हर बार दूरी के अंदाज के लिए 1.6 से गुण करना पड़ता है।
बहरहाल नाश्ता करके पैदल निकल लिए। पैदल इसलिए कि रास्ते में बाकी जगहें भी देखते हुए जाएंगे, पैसे बचेंगे , धूप सेंक लेंगे और पैदल चलने का कोटा भी पूरा हो जाएगा। पैदल चलने का कोटा कोई बना नहीं है लेकिन कानपुर से चलने पर तय किया था कि कम से कम दस हजार कदम रोज तो नापने ही हैं।
टैक्सी का खर्च ,आने जाने के करीब 30 डालर मतलब करीब 2500 , बचाने की सोच भी कम बड़ा कारण नहीं था पैदल जाने का।
घर से निकलते ही लैगून के ऊपर का पुल पड़ता है। उसके बगल में कुत्ता पार्क और वोट पार्क। कुत्ता पार्क में कुत्तों की चहल-पहल थी। कुत्तों के मालिक अपने कुत्तों को अलग-अलग तरह के हुनर सिखा रहे थे। एक कुत्ता अपने गेंद को अपने पैरों से जिस तरह ड्रिबल कर रहा था उसको देखकर लगा कि विश्व कप फुटबाल के सारे मैच मन लगाकर देखा है और फुटबाल खिलाड़ी बनने का मन बना लिया है। क्या पता कल को कुत्तों के भी फुटबाल टाइप कोई मैच होने लगें और तब वह कुत्ता नामी फुटबाल खिलाड़ी बने।
एक कुत्ते को उसकी मालकिन झुककर जितने प्यार से चूम रही थी उसे अगर कोई मंचीय हास्य कवि या स्टेज परफॉर्मर देख लेता तो पक्का कोई 'काश मैं कुत्ता होता' या ' मैं कहीं कुत्ता न बन जाऊं' टाइप की कविताएं सुनाते हुए 'अगली पंक्तियों पर आपका आशीर्वाद चाहिए' टाइप बातें कहते हुए पाया जाता।
आगे सड़क पर आए तो एक जगह कपड़ों और जूते का दान केंद्र दिखा। शायद वहां लोग कपड़े और जूते रख जाते होंगे और उनको लोग जरूरतमंद लोगों को देते होंगे।
जापानी पार्क का रास्ता गूगलमैप पर देख लिया था। यहाँ रास्ते के लिए इसी का भरोसा है। अब यह कोई कानपुर नहीं जहां बिना पूछे चार लोग एक जगह जाने के लिए चार अलग-अलग रास्ते बताने वाले मिलें।
कुछ देर तक सीधे चलने के बाद रास्ता मुड़ गया। हम भी मुड़ गए। एक बार मुड़ना शुरू हुए तो फिर कई मोड़ मिले। मुक्तिबोध की कविता का अंश याद आ गया:
भागता मैं दम छोड़
घूम गया कई मोड़।
लंबे रास्ते में सड़क मिली, फुटपाथ मिले, घर मिले लेकिन नहीं मिले तो लोग। कानपुर होता तो इतनी दूर में अनगिनत लोग मिले होते। न जाने कितने लोगों से बतिया लिए होते। लेकिन कानपुर और फॉस्टर सिटी में यही अंतर है।
करीब आधे रास्ते के बाद लगा कि कोई रेस्टरूम मिले तो हल्के हों। लेकिन नहीं मिला। हर घर के बाहर नोटिस लगा दिखा -'अनाधिकृत लोगों का प्रवेश वर्जित है।'
एक जगह कुछ लोग काम करते दिखे। मजदूर टाइप। शायद उनका लंच चल रहा था। एक भाईसाहब बीड़ी पीने वाले अंदाज में बैठा सिगरेट फूंक रहे थे। हमने उनसे पूछा -'इधर कोई रेस्टरूम है क्या?' उन्होंने उचककर देखा और बताया -'है तो लेकिन बन्द है।'
हम आगे बढ़ लिये। रास्ते में कुछ पार्क मिले। राइड पार्क और कोई एक और। लेकिन वो सड़क के दूसरी तरफ थे। हमको लगा कि देर करेंगे तो जापानी पार्क बन्द हो जाएगा। सोचा अब वहीं खोजेंगे। वहां तो पक्का होगा।
एक स्कूल भी मिला रास्ते में। अंदर बच्चे खेल रहे थे। बड़ा सा गेट। खूब सारी जगह। स्कूल के पास से गुजरते तमाम स्कूलों में हुई तमाम गोलीबारी की घटनाएं याद आईं जिनमें सिरफिरे लोग गोलीबारी करते हुए कई बच्चों को मार देते हैं।
इस बीच हम मटियो शहर में दाखिल हो चुके थे। जापानी पार्क पास आ गया था। एक नन्हा सा पिल्ला टाइप कुत्ता टहलाते आदमी से पूछा तो उसने बताया -'आगे ही है। सीधे, बाएं, दाएं और वहीं।' चलते हुए पिल्ले की उम्र पूछी। उसने बताई -'नाइन।' हमको लगा नौ महीना। लेकिन उसने बताया नौ साल। कहते हुए वह आगे चल दिया।
जापानी पार्क पहुंचकर हमने सबसे पहले वहां की रेस्टरूम सुविधा का उपयोग किया। हल्के होकर फिर पार्क के अंदर गए। हमें लगा था कि पार्क खूब बड़ा होगा। तमाम फूल-पौधे होंगे। लेकिन पार्क तो मुन्ना भाई एमबीबीएस के कमरे की तरह शुरू होते ही खत्म हो गया। स्थानीय लोगों और जापानी के सहयोग से बने पार्क में पैगोडा, बुद्ध की मूर्ति और कुछ फव्वारे दिखे। कुछ देर रहकर बाहर आ गए।
बाहर आकर आसपास पार्क देखा। लोग अपने बच्चों के साथ घूम रहे थे। कुछ अकेले भी। बेंच पर बैठी एक महिला से मैंने पार्क के बारे में कुछ पूछा तो उन्होंने अंग्रेज़ी में कहा -'आई डोंट स्पीक इंग्लिश।' हम अंग्रेजी नहीं बोलते। मन किया पूंछे -'भोजपुरी बोलती है?' लेकिन नहीं पूछे। क्या पता बुरा मान जाए मजाक का।
कुछ देर बाद वापस लौट लिए। भूख लगी थी। सोचा कहीं कुछ खाया पिया जाए। नेट पर खोजा स्टारबक्स की दुकान दस मिनट की दूरी पर थी। हम बढ़ते गए , दूरी बढ़ती गयी। फिर समझ में आया कि दुकान पीछे छूट गईं। पीछे जाकर दुकान में चाय और सैंडविच आर्डर की। काउंटर कन्या ने बिल के लिए नाम पूछा। हमने बताया -अनूप। उसने बिल बनाया उसमें नाम लिखा था - Anor. हमको एक बिल में ही सही नया नाम मिल गया।
उच्चारण की समझ के कारण नाम के लफड़े बहुत होते हैं। कानपुर के ही दस स्पेलिंग बना डाली अंग्रेजों ने अब तक।
काफी और सैंडविच के कुल सवा आठ डालर करीब हुए। हमने 20 डालर का नोट दिया तो काउंटर कन्या ने मुझे 11 डालर और बाकी रेजगारी वापस की। यह देखकर अच्छा लगा कि यहां अभी भी रेजगारी चलन से बाहर नहीं हुई है। अपने यहां एक रुपये से कम का सिक्का अब बिरला ही दिखता है।
चाय पीने के बाद वापस लौटे। रास्ते में राइड पार्क मिला। कुछ देर वहां भी बैठे। पानी की कमी के कारण पानी के खेल रद्द होने की सूचना थी। रेस्टरूम के हाल यहां वैसे ही थे जैसे सार्वजनिक स्थलों पर हो सकते हैं। लोगों ने पाट में कागज ठेल रखे थे। इस मामले में हर जगह इंसान एक जैसा ही व्यवहार करता है।
आगे जहां पहले मज़दूर टाइप का आदमी मिला था उस जगह से गुजरे तो देखा वे लोग छुट्टी होने के बाद घर वापस जा रहे थे। अपनी ड्रेस को कार में डालकर। एक मजदूर से बात की तो उसने बताया कि वह कंक्रीट डालने का काम करता है। 45 डालर प्रति घण्टे के हिसाब से मजदूरी मिलती है। 21 डालर प्रति महीना वो यूनियन को देते हैं। इसके बदले यूनियन वाले उनके लिए काम खोजते हैं। काम खोजने की चिंता नहीं करनी पड़ती उनको।
अपना नाम विलियम बताया उसने। मेरा पूछा। मैंने भी बताया। कार में बैठने से पहले उसका फ़ोटो खींचा। देखकर उसने मुट्ठी मिलाई और मुस्कराते हुए चला गया।
जाने से पहले उसने यह भी बताया कि उसके सैन होजे और सनी वेल दोनों जगह घर हैं। हमारा कहने का मन हुआ -'जलवे हैं तुम्हारे तो।' लेकिन कहा नहीं। कहते तो बोलता -'हमको हिंदी नहीं आती।' हम उसको जलवे की अंग्रेजी क्या बताते।
अब शाम होने वाली थी। लौटने की जल्दी थी। मोबाइल की बैटरी भी खत्म होने वाली थी। पहले तो यह डर लगा कि कहीं ऐसा न हो कि बैटरी खत्म हो जाए और हम रास्ता न खोज पाएं। भटक जाएं। लेकिन कुछ देर में ऐसी जगह पहुंच गए जहां से आगे का रास्ता हमको पता था। हम तसल्ली से चलते हुए आगे बढ़े।
रास्ते में एक बस भी दिखी। बुजुर्गों के लिए बस। उठो और चल दो। बस खड़ी थी। बुजुर्ग लोग शायद घूमकर वापस आ गए होंगे।
घर के पास पहुंचते हुए थकान हो गयी थी। ग्यारह बजे के निकले चलते-बैठते-चलते साढ़े चार बज गए थे। इस बीच करीब तीस हजार कदम और बीस किलोमीटर की दूरी नाप चुके थे। यह अभी तक की एक दिन में स्मार्ट वाच से नाप के तय की हुई अभी तक की सबसे अधिक दूरी थी।
घर वापस आकर। सोफे सामान की तरह गिर गए और चाय का इंतजार करने लगे।

Tuesday, January 03, 2023

खबरों के बीच कैलिफॉर्निया



कल यहां बारिश का पूर्वानुमान था। निकले नहीं बाहर। घर बैठे ही इधर-उधर खबरें देखते रहे।
मोबाइल के नोटिफिकेशन में खबर देखी भारत के एक चैनल पर। खबर के हिसाब से कैलिफॉर्निया में भीषण बाढ़ आई है। सैनफ्रांसिस्को की सड़कों पर नावें चल रही हैं। लाखों घरों की बिजली गुल है।
हम यहां फॉस्टर सिटी में हैं। कैलिफोर्निया में। सैन फ्रांसिस्को से 43 किमी की दूरी पर है। आधे घण्टे की दूरी पर। लेकिन यहां बरसात, तूफान, बाढ़, बिजली गुल के कोई निशान नहीं। पता नहीं खबर कितनी सच है। यहां तो अखबार भी नहीं आता। न्यूज चैनल अलग-अलग कहानी कह रहे।
एक फटाफट खबर चैनल के अनुसार सैन फ्रांसिस्को में 5.46 इंच बारिश हुई जो कि 170 सालों में दूसरी सबसे अधिक है। चैनल के अनुसार आने वाले दिनों में बारिश आने की संभावना है।
बचाव के लिहाज से बताया गया :
1.घरों के आसपास पत्तियां और कूड़ा करकट न जमने दें।
2.अगर आपको लगता है कि आपके घर या ऑफिस में बाढ़ का खतरा है तो आपको दस बालू के बैग मुफ्त में मिल सकते हैं। सुबह आठ बजे से शाम 5 बजे तक।
3. सूचना के अनुसार शनिवार से अब तक 8500 बैग बंटे हैं। मतलब 850 लोग ही ले गए हैं बैग।
खबरों से खतरे का अंदाज नहीं लगता। अभी तो चुपचाप घर में बैठे हैं।
घर में बैठे-बैठे यहां पिक्चर देखी जा रही हैं। पिछले दिनों कोटा फैक्ट्री देखी। इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन के लिए मारा-मारी का गजब आख्यान। वापस आने तक दस-बारह पिक्चरें और देख डालेंगे। कई बातचीत सुनने को बकाया हैं। सुन डालेंगे।
यहां टहलते हुए देखा सड़क पर जगह-जगह साइकिल लेन बने हुए हैं। सड़क पर हरी पट्टी और साइकिल के निशान। लेकिन साइकिल चलाते इक्का-दुक्का ही दिखे। एक साइकिल सवार दिखे तो पता चला कि 17 मील मतलब लगभग 27 किलोमीटर चला चुके थे। लगभग डेढ़ घण्टे में। बात की ,फोटो खींची लेकिन बातचीत हो तब तक वो अपनी साइकिल स्टार्ट करके आगे बढ़ चुके थे। हम भी लौट लिए।
सड़क पर गाड़ियां इतनी तेज भागती दिखती हैं जैसे कोई आफत आई हो। इतनी तेज गाड़ियां भागते हुए अपने यहां नहीं दिखीं। सड़कें इतनी ख़ाली दिखती कि लगता है इनका उपयोग भारत में जाम की स्थिति में किया जा सके तो कितना अच्छा हो। झकरकटी पुल पर जैसे ही जाम लगे वैसे ही एकाध किलोमीटर ख़ाली सड़क अमेरिका से डाउनलोड कर ली जाये या फिर गाड़ी घूमाकर इधर से निकाल ली जाये।
भारत के शहरों में आबादी का सिलसिला कहीं नहीं टूटता। एक मोहल्ला खत्म नहीं हुआ, दूसरा शुरू हो गया। कहीं-कहीं तो मोहल्ले एक-दूसरे में घुसे हुए दिखते। यहां ऐसा लगता है मोहल्लों में आपस में बातचीत ही नहीं। सब चुपचाप एक-दूसरे से बिना बातचीत किये खड़े हैं अगल-बगल। लगता है किसी को किसी से कोई सम्बन्ध ही नहीं।
सामान लेने के लिए यहां मॉल ही जाना होता है। मॉल पहुंचते ही अपना डॉलर से रुपये वाला कैलकुलेटर चालू हो जाता है। एक डालर मतलब 84-85 रुपये। सब्जियां-फल साइज में बड़े-बड़े। कीमत भी कई गुना। अकसर हमारे हाल उदयप्रकाश की कहानी रामसजीवन की प्रेमकथा के नायक रामसजीवन की तरह होते हैं जो पहली बार गांव से शहर आता है तो किसी के जूते की कीमत सुनकर अनायास कहता है-'अरे बाप रे, बीस बोरा गेंहू पांव में पहने घूम रहा है।'
रोजमर्रा के सामान की खरीद के लिए मॉल की शरण में जाना होता है। भारतीय स्टोर थोड़ा दूरी पर है। कानपुर की तरह नहीं कि चाय का पानी चढ़ाकर पत्ती लेने के लिए किसी को दौड़ा दो और पानी खौलने तक पत्ती हाजिर।
काम चलाने के लिए एक चाइनीज़ स्टोर बगल में है। फल, सब्जी दूध तो ले आते हैं। बाकी के सामान लेने के लिए इंडियन स्टोर ही जाना होता है। चाइनीज़ स्टोर में टहलते हुए देखा कि मछली, केकड़े मिल रहे थे। जिंदा केकड़े और मछलियां भी निकले के लिये तैयार थे। बिकने के पहले पानी में खूब अठखेलियाँ कर रहे थे।
चीनी स्टोर में कुछ पूछने के लिए हमने वहां सामानों के बीच काम करने वाले से कुछ पूछा तो वह बोला -'नो इंगलिश।' मतलब अंग्रेजी नहीं आती। अब हम सामान खरीदने के लिए अंग्रेजी कहाँ से सीखें।
सर्दी के बड़े हल्ले है अमेरिका के। लेकिन यहाँ मौसम अलग-अलग जगह अलग-अलग है। कैलिफोर्निया का मौसम कानपुर की ही तरह है। बल्कि कानपुर से भी कम ठंडा। कोहरा भी नहीं होता। अलबत्ता शाम होते ही अंधेरा हो जाता है।
जब हम यहाँ अमेरिका में अपने बड़े बेटे के साथ हैं तब हमारे छोटे साहब जाड़े कश्मीर में अपने ग्रुप के साथ मज़े कर रहे हैं।
बहरहाल अभी तो यहां सुबह हुई है। दिन शुरू हुआ है। आप जहां भी हों मजे से रहिए। देखिए नए साल में जो संकल्प लिए हैं वो पूरे हो रहे हैं कि होमवर्क पिछड़ रहा है। हमने इसी डर से कोई संकल्प लिया ही नहीं। बेफालतू में हिसाब रखना। जो हो गया वही संकल्प । ठीक है न 🙂

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Monday, January 02, 2023

अमेरिका की सड़को पर टहलाईं



कल धूप निकली थी। बहुत दिनों के बाद।धूप अभी भी यहां मुफ्त है। कोई क्रेडिट कार्ड नहीं लगाना पड़ता है धूप सेंकने के लिये। लिहाजा सुबह बाहर आ गए धूप का मजा लेने।
बाहर जगह-जगह बेंच लगीं थीं। कुछ देर खड़े-खड़े धूप सेंकी। बढिया क्वालिटी की धूप थी। कोई मिलावट नहीं।
लैगून के किनारे भी बेंच लगी थीं। कुछ देर एक बेंच पर बैठकर धूप सेंकते रहे। सामने लैगून में लोगों को वोटिंग करते भी देखते रहे। लोग अपनी-अपनी नाव लेकर आते, पानी में उतारते और चप्पू चलाने लगते। कुछ लोग साथ में आये और अगल-बगल नाव चलाते रहे।
एक आदमी नाव चलाते-चलाते नाव पर ही पेट के बल लेट गया। दूर से देखकर लगा कि पेट के बल लेटकर कुछ पढ़ रहा है। कुछ देर बाद वह हाथ को चप्पू की तरह पानी में चलाने लगा। कुछ देर तक हाथ-चप्पू के सहारे ही किनारे आया और नाव उठाकर कार की छत पर रखी और कार स्टार्टकरके चल दिया।
हमारा भी मन किया हम भी पानी में कुछ देर चप्पू बाजी करें। लेकिन यहां नाव कहाँ। किसी ने पूछा भी नहीं कि आओ थोड़ा तुम भी नौका विहार कर लो। कानपुर होता तो किसी घाट पर दस-पंद्रह मिनट बैठ लिए होते नाव में।
कुछ देर नाव बाजी देखने के बाद टहलने निकले। यह सोचकर कि नाव न सही पांव तो हैं।
सड़क पर इक्का-दुक्का लोगों के अलावा और कोई आता-जाता नहीं दिखा। कारें अलबत्ता बहुत तेजी से निकलती दिखीं।
सड़क किनारे फुटपाथ पर बहुत देर तक चलते रहे। अगल-बगल से गुजरते लोगों को देखकर मन किया कि पूंछे कि यह कौन मोहल्ला है? आसपास कोई चाय की दुकान है यहाँ? आप कहाँ रहते हैं? क्या करते हैं? लेकिन नहीं पूछे। क्या पता कोई बुरा मान जाए।
अमेरिका में सबसे बड़ी कमी हमको जो खली वो यह कि यहां चाय की दुकानें नहीं दिखती। कानपुर होता तो न जाने कितनी ठेलिया चाय की दिख जाती इतनी दूर में। अमेरिका इस मसले में बहुत कमजोर है।
अलबत्ता अगल-बगल से गुज़रते लोग अपनी तरफ से कुछ-कुछ बोलते दिखे। एक महिला अपने छुटके कुत्ते के साथ आ रही थी। कुत्ता पूरी तरह कपड़े पहने था। महिला उसको बड़े प्यार से साथ लिए चली आ रही थी। हम उनको रास्ता देने से ज्यादा देखने के लिहाज से रुककर खड़े हो गए। महिला ने बगल से गुज़रते हुए हमको थैंक्यू बोला। हम कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करते तब तक महिला कुत्ते सहित आगे निकल चुकी थी। अब कोई चिल्लाकर वेलकम तो बोला नहीं जायेगा।
आगे एक जगह बोर्ड लगा था जिसका मतलब यह था कि संदिग्ध लोगों को देखते उनकी रिपोर्ट पुलिस को की जाएगी। 911 नम्बर पर। हमको लगा कि ठहरकर बोर्ड पढ़ने को भी संदिग्ध न मान लिया जाए, हम आगे लपक लिए।
आगे एक छुटके पार्क में एक नौजवान खुले जिम में नंगे बदन कसरत कर रहा था। उसकी मोटर साइकिल बग़ल में खड़ी थी। कुछ देर पसीना बहाने के बाद वह मोटरसाइकिल पर बैठ कर चला गया। अब पार्क में हमारे अलावा दो आपस मे बात करते हुई महिलाएं बचीं थी। महिलाएं इतनी तेज और इतनी टेढ़ी-मेढ़ी अंग्रेजी में बतिया रहीं थीं कि उनका बोला कुछ समझ नहीं आया।
कुछ देर पार्क में टहलने के बाद हम बाहर निकल आये। फुटपाथ पर टहलते हुए फोन पर अपने अमेरिका के कुछ ब्लॉगर दोस्तों से बतियाये। बतियाते हुए चलते रहे। एक जगह ठोकर लगी। लगा मुंह के बल गिर जाएंगे। लेकिन गिरे नहीं। हमें लगा कि कहीं स्पीड ब्रेकर तो नहीं था। पीछे मुड़कर देखे तो फुटपाथ की एक टाइल उभरी हुई थी। उसी पर पांव पड़ा था। मतलब अमेरिका में भी ठेकेदार लोग उल्टा-पुल्टा काम करके निकल लेते हैं।
घर से काफी दूर मतलब पांच किलोमीटर करीब आ गए थे। ऊपर लगातार जहाज उड़ते दिख रहे थे। मन किया कि वापस लौट लें। लेकिन फौरन मन पलट भी गया, बोला आगे चलो।
आगे चलते हुए सड़क मुड़ती गयी। हम भी सड़क के साथ चलते गए। दूर हाई वे दिख रहा था। मुझे लगा कि यह हाइवे वहीं कहीं मिलेगा जहां से हमारे घर का रास्ता है।
आगे जगह-जगह मजेदार नोटिस बोर्ड भी लगे दिखे। एक जगह फुटपाथ पर छुटकी पट्टी पर लिखा था -please do not let your dog pee on the plants. कृपया अपने कुत्ते को पौधों पर पेशाब न करने दें। पौधे के नाम पर जो लगे थे वे बहुत छोटे-छोटे जंगली टाइप के फूल थे।
पौधों की देखभाल की बात तो ठीक। लेकिन वह किस कीमत पर। कुत्तों का सहज व्यवहार होता है कि जहां कहीं कोई खम्भा या पेड़ दिखा वहां टांग उठाकर हल्के हो लेना। उस पर भी पाबन्दी। लेकिन हमें क्या करना हमारी गिनती पौधे, कुत्ते और अमेरिकन किसी में नहीं होती इसलिए आगे बढ़ गए।
आगे एक जगह फव्वारा दिखा। पहला फव्वारा। उसे देखकर शाहजहांपुर फैक्ट्री का गेट के सामने का फव्वारा याद आ गया।
सड़क किनारे एक जानवरो का अस्पताल भी दिखा। 1940 से चल रहा है। अमेरिकी अपने पालतू जानवरों के प्रति कितने जागरूक हैं। अपने पालतू जानवरों तक के लिए चिंतित रहने वाले अमेरिकी दूसरे देशों में बमबाजी करके तबाही मचा देते हैं यह अलग बात। 1940 में जब यह अस्पताल बना उसके पांच साल बाद अमेरिका ने जापान के दो शहर तबाह कर दिए बम गिराकर।
अब तक जितना टहल चुके थे उससे थकान महसूस होने लगी थी। संयोग से टहलते हुए घर के पास वाले हाई वे के नज़दीक आ गए थे। कुछ देर में कुत्ता पार्क के पास पहुंच गए। वहां लोग अपने कुत्ते टहला-खिला रहे थे।
पार्क के पास रेस्टरूम दिखा। सोचा उसका उपयोग किया जाए। लेकिन रेस्टरूम पर ताला लगा था। बगल में सूचना थी कि 25 दिसम्बर और एक जनवरी को रेस्ट रूम बन्द रहेगा। अपना इंतजाम खुद करें। अब इंतजाम क्या करते परदेश में। कोई दीवाल उठाके तो लाये नहीं थे साथ मे। वापस हो लिए।
लौटते हुए एक कुत्ता एक लड़की को जंजीर के सहारे घसीटकर ले जाते दिखा। भारी भरकम डील डॉल वाला कुत्ता आगे-आगे जा रहा था। लड़की उसकी जंजीर थामे उसके पीछे-पीछे। ऐसा लग रहा था कोई मल्टीनेशनल कारपोरेट अपने गले में जंजीर बांधे अपनी सरकार को घसीटे लिए चला जा रहा हो।
पुल पर से हमारे बगल से गुजरते हुये एक अमेरिकन दम्पति ने हमको हौले से हैप्पी न्यू ईयर बोला। इतने धीमे कि हमारे पास से गुजरते आदमी ने शायद ही सुना हो। इस बार हमने देरी नहीं की। फौरन उनको भी नए साल की बधाई बोल दी। उन्होंने सुना और बिना कुछ कहे आगे चले गए।
हम भी चुपचाप वापस घर आ गये। यह हमारा नए साल का पहला दिन था।

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Sunday, January 01, 2023

नया साल और टेस्ला की सवारी



आज हफ्ता हो गया अमेरिका आये। एक दिन छोड़ बाकी सब दिन बरसता-टपकता ही रहा आसमान। आज धूप निकलने की बात कही है मौसम विभाग ने।
आज यहां नए साल की सुबह हुई है अभी। भारत में शाम हो चुकी है। नए साल का धमाल फोटुओं में मचा पड़ा है। हर तरफ शुभकामनाओं की बारिश हो रही है।
जिस तरह कोहरा छाया हुआ है कुछ जगह उससे लगता है कि कहीं नया साल भटक न गया हो। शहर वाले इंतजार कर रहे हैं उधर नया साल कोहरे में रास्ता टटोल रहा है।
दो दिन पहले खबर पढ़ी कि एलन मस्क की दौलत में 200 बिलियन डॉलर (लगभग 16.55 लाख करोड़) कम हो गए। लोगों ने टेस्ला के शेयर से पैसा खींच लिया।
जिस दिन यह खबर पढ़ी उसके एक दिन पहले ही टेस्ला गाड़ी में बैठे थे। क्या गजब गाड़ी है। बिना डीजल-पेट्रोल चलती है बिजली से। बिजली से चलती है इसलिए इंजन की जगह खाली है। डिक्की बनी है इंजन की जगह। जो जगह छुई नहीं जाती गर्म होने के चलते, वहां झोला, सूटकेस रख लिया जाए।
टेस्ला कार की खासियत पढ़ने की बात अलग, खुद बैठकर महसूस करने का एहसास अलग। 4.5 सेकेंड में 100 किमी/घण्टे की स्पीड पकड़ लेना। अलग-अलग सीट गरम हो जाना। और भी न जाने क्या-क्या।
अलग-अलग सीट गर्म होते देखा तो मुझे अपनी 23 साल पुरानी सेंट्रो सुन्दरी की याद आ गयी। उसका हीटर आन करते हैं तो गर्म हवा की सप्लाई दस-बारह मिनट तक नहीं मिलती। लगता है कहीं भटक गई। फिर अचानक गर्म हवा आने लगती है मानो गुस्से में हो कि इत्ती सर्दी में बूढ़ी गाड़ी से हवा गर्म करवाते हो।
तमाम खूबियों वाली इस कार की कीमत भी खूब है। पचास लाख रुपये की बताई गूगल ने। यह भी कि भारत में कुल जमा चार लोगों के पास है टेस्ला। यहां अमेरिका में तो लोगों की पसंदीदा कार है। 100% आयात कर होने के कारण भारत में कार की कीमत दोगुनी से ज्यादा होगी।
यहां कार लेना थोड़ा आसान भी है शायद। लोन पर ब्याज दर कम है। नई कार पर ब्याज दर, पुरानी कारों पर ब्याज के मुकाबले कम है। भारत में कारों पर ब्याज दर दो से ढाई गुना होगी। अमेरिका में पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी कम हैं इसलिए भी लोग अपनी कार रखते हैं। सारा ताना-बाना ही इस तरह का है कि लोग झक मारकर नई कार खरीदें।
बैटरी से चलने के कारण इसमें धुंआ नहीं निकलता। सड़क पर चलती ईंधन वाली कारों और बिजली वाली टेस्ला देखकर लगा कि ईंधन वाली कारें झल्लाई सी, बौखलाई सी भागी जा रही हैं। जितनी तेज स्पीड उतना ज्यादा धुंआ। इसके मुकाबले बैटरी से चलती कार एक दम राजा बेटा की तरह बिना धुंआ उगले चलती दिखी।
टेस्ला कार की सबसे बड़ी खासियत उसका ऑटो पायलट मोड में चलना है। ऑटो पायलट मोड में गाड़ी अपने आप चलती है। लाल सिग्नल देखकर अपने आप रुक जाती है। सिग्नल हरा देखकर चलने लगती है। ड्राइवर अगर नींद में हो तो भी अपने आप चलती रहती है। शायद ड्राइवर को ऊंघते देखकर गाड़ी किनारे खड़ी हो जाती हो। सो लो आराम से फिर चलेंगे।
ऑटो पायलट और दूसरे सुरक्षा उपायों के चलते यह काफी सुरक्षित कार मानी जाती है। 35 लाख किमी की दूरी पर इसमें एक दुर्घटना या दुर्घटना जैसी रिकार्ड की गई।
दो दिन पहले ऋषभ पंत की कार दुर्घटना की खबर सुनकर लगा कि अगर वे टेस्ला से चल रहे होते तो शायद उनके साथ दुर्घटना नहीं होती। टेस्ला का ऑटो पायलट मोड गाड़ी को किनारे करके खड़ा कर दिया होता।
अपने यहाँ खरीदने को तो तमाम लोग खरीद सकते। उनके लिए कोई ज्यादा नहीं करोड़- दो करोड़ लगा देना। आने वाले समय में और कारें दिखेंगी शायद।
लेकिन ऑटो पायलट मोड वाली सुविधा के लिए ट्रैफिक का ढांचा ठीक होना जरूरी। अपने यहां जगह-जगह ट्रैफिक सिग्नल ही नहीं काम करते। पता चला चौराहों पर सिपाही सिग्नल की बत्तियों से अलग हाथ देकर गाड़ियां निकाल रहे। ट्रेफिक सिग्नल और सिपाही सिग्नल की समांतर सरकार चल रही। ऐसे में अगर टेस्ला ऑटो पायलट मोड में चले तो हर चौराहे पर सिपाही उसका चालान काटे, एक्सीडेंट हो सो अलग।
बिजली से चलने वाली गाड़ी को चार्ज करने के लिए जगह-जगह चार्जिंग प्वाइंट बने हैं। शॉपिंग मॉल्स के पास, चुनिंदा जगहों पर। चार्जिंग के जुगाड़ भी अलग-अलग। हाई रेट वाले चार्जर जल्दी चार्ज कर देते हैं। उनके दाम भी ज्यादा होते हैं।
बिजली वाली गाड़ियों का चलन अभी शुरआत में है। अमेरिका में ही कुल गाड़ियों का 4% बिजली वाली हैं। टेस्ला के कई मॉडलों के अलावा फोर्ड और शेवरलेट भी बिजली से चलती हैं।
बात फिर वहीं एलन मस्क के 200 बिलियन डॉलर का नुकसान की। उसको पता चलता कि जिस दिन अपन बैठे टेस्ला में उसके अगले दिन उसको 200 बिलियन डॉलर की चपत लगी तो वह फौरन हमने कहता -'भैया आप वापस चले जाओ। किराया हम दे देंगे।'
लेकिन हम किसी के कहने से थोड़ी वापस जाने वाले हैं। आए हैं तो थोड़ा ठहर के जाएंगे। अभी तो नए साल का पहला दिन है। महीना बिता के जाएंगे। कोई हड़बड़ी थोड़ी है।
बाहर सूरज भाई अपने काफिले के साथ जम गए हैं। रोशनी, उजाले और गर्मजोशी की कुमुक लिए मुस्करा रहे हैं। सूरज भाई का नए साल की बधाई देने का अंदाज सबसे अलग और प्यारा है।

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