Saturday, February 17, 2024

बहुवचन प्रतिभाओं की संगत में

 



पुस्तक मेले में कई मित्रों की पुस्तके थीं। उनके विमोचन हो रहे थे। उन पर बातचीत हो रही थी। पुस्तक मेले में ऐसे तमाम रचनाकार उपस्थित थे जिनकी रचनाएं पुस्तकों के रूप में मौजद थीं। ये रचनाकार कम चर्चित भले हों लेकिन अपने लोगों के बीच उनकी अहमियत और पहचान तो है ही। अपने इन रचनाकार मित्रों के बारे में सोचते हमको पंकज चतुर्वेदी Pankaj Chaturvedi जी की बात याद आती है:
"आज का समय बहुवचन प्रतिभाओं का समय है। प्रतिभाएं विराट भले न हों , लेकिन हैं और बहुतायत में हैं।"
ऐसी बहुवचन प्रतिभाओं की संगत में उनकी रचनाओं से रूबरू होते हुए पुस्तक मेले का आनंद लिया गया।
पुस्तक मेले में विमोचनबाजी का सिलसिला शुरू होते ही सामने से भाई प्रमोद Pramod Kumar से मुलाक़ात हुई। लगभग आठ साल पहले प्रमोद जी से मंडी हाउस में पहली मुलाक़ात हुई थी। उस मुलाक़ात का जिक्र करते हुए लिखा था (लिंक टिप्पणी में ):
"....वहां प्रमोद कुमार जी भी आ गये। प्रमोद जी से भी पहली मुलाकात थी। आलोक जी Alok Puranik के पुराने मुरीद और पाठक। दस साल पुराने ’गुप्त पाठक’ से मिलकर आलोक जी भी खुश हो गये। हमारे मामा नदन जी कई कवितायें प्रमोद जी को याद हैं और वे उन्होंने जिस तरह वहां दोहराई उससे लगा कि कितने गहरे साहित्य प्रेमी हैं प्रमोदजी। फ़तेहपुर, कानपुर की कितनी यादे हैं उनके। ऐसे प्रेमी पाठक मित्र से मिलकर मन खुश हो जाना सहज बात है। इस चक्कर में आलोक जी विदा लेने के बाद फ़िर रुक गये कुछ देर के लिये।"
प्रमोद जी अपनी फेसबुक वाल पर नियमित रूप से बेहतरीन शेर साझा करते हैं। आज उन्होंने बशीर बद्र का ये शेर साझा किया है:
भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियां वही फासले !
न कभी हमारे कदम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई !!
बशीर बद्र के शेर के उलट हमारी जब मुलाक़ात हुई तो लपक कर हाथ मिलाते हुए प्रमोद जी ने कन्हैयालाल नंदन जी कविता सुनानी शुरू की जिसे हमने भी साथ दोहराया। चुनाव शीर्षक यह कविता नंदन जी अक्सर मंचो पर सुनाया करते थे:
"पहाड़ी के चारों तरफ
जतन से बिछाई हुई सुरंगों पर
जब लगा दिया गया हो पलीता
तो शिखर पर तनहा चढ़ते हुए इंसान को
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि वह हारा या जीता।
उसे पता है कि
वह भागेगा तब भी
टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा
और अविचल होने पर भी
तिनके की तरह बिखर जायेगा
उसे करना होता है
सिर्फ चुनाव
कि वह अविचल खड़ा होकर बिखर जाये
या शिखर पर चढ़ते-चढ़ते बिखरे-
टुकड़े-टुकड़े हो जाये।"
नंदन जी की याद आई तो यह भी याद आया कि वे बाद के दिनों में ईश्वर से अपना उलाहना देते हुए पढ़ते थे :
सब पी गए , पूजा नमाज बोल प्यार के,
ज़रा नखरे तो देखिये,परवरदिगार के।
प्रमोद जी से थोड़ी देर बातचीत के बाद वो मेला देखने निकल लिए । अपन भी इधर - उधर विमोचनबाजी में व्यस्त हो गए।
थोड़ी देर बाद प्रभात गोस्वामी जी Prabhat Goswami और फारुख अफ़रीदी जी Farooq Afridy Jaipur स्टाल पर आये। जयपुर से सुबह चलकर मेले में पहुंचते-पहुंचते शाम सी हो गई थी। प्रभात जी और फारुख जी की किताबें भी न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन पर मौजूद थीं। उनका भी विमोचन हुआ । शाम को मैंने फोन किया तो दोनों जयपुर के रास्ते पर थे।
न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन पर तमाम व्यंग्यकारों की चयनित व्यंग्य रचनाएं मौजूद थीं। सबके कवर पेज लेखक की फोटो को छोड़कर एक जैसे थे। अनुशासित जैसे कवर पेज। आजकल अधिकतर व्यंग्य लेख एक जैसे लगते हैं तो कवरपेज एक जैसे लगना सहज सा है।
मेले में ज्योति त्रिपाठी से भी मुलाकात हुई। करीब दस साल की फेसबकिया मित्रता के बाद पहली मुलाक़ात। कभी ज्योति हमारे लेखन को बहुत पसंद करतीं थी। एक बार टिप्पणी करते हुए लिखा -' आपकी पोस्ट पढ़ते हुए समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला।'
ज्योति अपने आसपास के जीवन के बारे में कवितायें लिखती हैं। कविताओं में स्त्री विषयक मसलों पर अपनी राय व्यक्त करती हैं। उनकी कविताओं का बड़ा पाठक वर्ग है। कविताओं के साथ ज्योति ने कई धारावाहिक उपन्यास भी अपनी फेसबुक वाल पर पोस्ट करते हुए लिखे हैं। इन उपन्यासों में जनता की राय का ख्याल रखते हुए भी पात्रों के साथ ट्रीटमेंट किया गया है। इनमे से एक उपन्यास 'रुप्पू' प्रकाशित भी हुआ है। यह उपन्यास जब छपा था तब मैंने इसे खरीद कर इस पर अपनी टिप्पणी भी लिखी थी। मेले में ज्योति से मुलाक़ात होने पर अगले दिन यह उपन्यास फिर से खरीदा गया और लेखिका के आटोग्राफ लिए गए।
ज्योति के साथ उनके चाचा कमलाकर मिश्र जी भी थे। पता चला उन्होंने भी एक उपन्यास लिखा है जो कि उनके खुद के अदालती अनुभवों पर आधारित है -'पिताजी और तारीख।' पता चलने पर हमने हिन्द युग्म स्टाल पर उनके साथ जाकर किताब खरीदी और कमलाकर जी के आटोग्राफ लिए। इसके बाद सबने साथ में मिलकर चाय पी।
मेले में पता चला अनूप मणि त्रिपाठी Anoop Mani Tripathi भी मौजूद थे अपनी नई किताब के साथ। साथ में 'जे बिनु काज दाहिने बाएं' संतोष त्रिवेदी भी थे। संतोष त्रिवेदी ने इस बार व्यंग्य पर एहसान करते हुए इस बार कोई किताब नहीं छपवाई ।
अनूपमणि त्रिपाठी के स्टाल पर उनकी किताब के साथ फोटो खिंचाया और किताब खरीदी भी। अनूप मणि की यह तीसरी किताब है। पहली दो किताबों हमने खरीदकर पढी भी हैं लेकिन उनके बारे में लिखना अभी तक उधार है। इस किताब से एक और उधर चढ़ गया।सब चुकाया जाएगा आहिस्ते-आहिस्ते।
अनूप मणि के साथ राजीव तनेजा जी से भी मुलाक़ात हुई । राजीव तनेजा आजकल नियमित रूप से किताबें पढ़कर उनके बारे में नियमित रूप से लिखते हैं। ऐसा काम जो कम लोग करते हैं। बल्कि बहूत कम लोग करते हैं।
लौटते हुए पंकज सुबीर और मनीषा कुलश्रेष्ठ जी से शिवना प्रकाशन पर मुलाक़ात हुई। कुछ दिन पहले मनीषा जी की संगत में हुई बातचीत की तारीफ़ की शुरुआत करते कुछ और तारीफ़ की। पंकज सुबीर जी ने भी तारीफ़ में कुछ और जोड़ा। इसके बाद हम पंकज सुबीर जी से अगले दिन आने के लिए कहकर चले आये। बगल की दूकान पर नीरज शर्मा Neeraj Sharma और डा शर्मा मौजूद थे। उनको भी अगले दिन आने की बात कहकर निकल लिए।
पुस्तक मेले Abhishek Awasthi से भी मुलाक़ात हुई। अभिषेक की मृगया के बाद दूसरी किताब आनी है। किताब तो सौरभ जैन सौरभ जैन की भी आनी है दूसरी। अभिषेक और सौरभ दोनों इस मामले में लखनउवा अंदाज में पहले आप , पहले आप कहते पाए गए। सौरभ इस बीच डाक्टर भी हो गये हैं पीएचडी वाले। सौरभ के बनाये मीम के जलवे दैनिक भास्कर में दिखते रहते हैं।
जब हम न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन पर थे तो वहीं कनपुरिया पत्रकार , रचनाकार संजीव मिश्र Sanjiv Mishra भी आये। मिलते ही हमारे नामराशि अनूप शुक्ला Anoop Shukla के हिस्से की तारीफ़े हमारे लिए करनी शुरू की। हमने बताया कि हम वो वाले अनूप नहीं हैं तो उन्होंने कुछ कम करके नये सिरे से हमारे लेखन की तारीफ़ की। नामराशि मित्रों के साथ का यह फ़ायदा तो होता है कि तारीफ़ मुफ़्त में मिल जाती है।
संजीव मिश्र जी ने हाल में कानपुर के चर्चित माफिया विकास दुबे पर किताब लिखी है -बवाली कनपुरिया। इसमें विकास दुबे के अपराध जगह में प्रवेश करने से शुरू करके उसके दबदबा बनने और मारे जाने की विस्तार से चर्चा है। पठनीयता ग़ज़ब की है। किताब के बारे में अलग से। किताब पेंगुइन बुक स्टाल पर मौजूद थी। हमने स्टाल पर जाकर किताब ली और संजीव जी के ऑटोग्राफ़ भी लिए।
पुस्तक मेले में हमारे आने की सूचना पाकर हमारे कालेज के मित्र विनोद अग्रवाल जी Vinod Kumar Agrawal भी आये मिलने। उस समय तक मेले के टिकट मिलने बंद हो गए थे। हमने जब सबेरे आनलाइन टिकट खरीदा था तो रास्ते में किसी ने चेक नहीं किया था। विनोद भाई ने जब बताया कि टिकट मिला नहीं है तो अपने ने अपना टिकट व्हाट्सेप से उनको भेज दिया। हमको आशा नहीं थी कि उनको उस पर आने को मिलेगा लेकिन कुछ देर बाद वे हमारे स्टाल पर मौजूद थे। हमारे साथ काफी देर रहे। तमाम पुरानी यादें साझा की गईं। लौटते में घर तक छोड़ने भी आये।

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Tuesday, February 13, 2024

पुस्तक मेले में विमोचनबाजी

  

पुस्तक मेले में किताबों की दुनिया में पहुँचते ही विमोचन दृश्य दिखने लगे। हर अगली स्टाल पर विमोचन होता दिखा। कुछ मिशनरी विमोचक भी दिखे। लेखक के साथ आये, दुकान से किताब उठाई, किताब को सीने से सटाया, फ़ोटो खिंचाई, लेखक से हाथ मिलाया और किताब सहित अगले विमोचन के लिए निकल लिए।
हमने एक दुकान वाले से पूछा भी कि ये पुस्तक विमोचक तुम्हारी किताबें क़ब्ज़े में करके निकल लिए तुम देखते रह गए।
उसने बताया कि -‘देखते नहीं रह गये। हम ध्यान से देखते रहते हैं। किताब विमोचक के नाम चढ़ा देते हैं। उनको बिल भेजेंगे। छोड़ेंगे नहीं।’
हमको दुकानदार की निष्ठुरता पर बड़ा ग़ुस्सा आया। समझ में नहीं आया कि जिस चीज की चोरी तक को अपराध नहीं माना जाता उसको सामने-सामने ले जाने पर उसके पैसे बाद में देने पड़ें। मतलब इंसानियत का चलन ही ख़त्म हो गया।
विमोचन करने वाले कभी-कभी किताब विमोचन करते हुए लोग यह भी सुनिश्चित करते दिखे कि सीने से सटी किताब उल्टी नहीं पकड़े हैं।
हमारे न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन पहुँचते ही वहाँ प्रेम जनमेजय जी और साथ ही लालित्य ललित जी वहाँ पहुँचे। प्रेम जी , लालित्य ललित जी और अपन की किताब का किताब वहाँ विमोचन हुआ । फ़ोटो भी हुए। पता नहीं किसने खींचें थे फ़ोटो। लालित्य भाई जुगाड़ करके मँगवा दें तो मेले में हुए पहले विमोचन की याद साथ रहेगी।
प्रेम जी ने आरिफ़ा एविस से हमारी किताब ख़रीदी। लेकिन हमारी हिम्मत नहीं हुई कि फ़ौरन हम भी उनकी किताब ख़रीद लें। बाद में अगले दिन हालाँकि हमने प्रेम जी की, हरीश नवल जी की और कई व्यंग्यकार साथियों की किताब ख़रीदी। अरविंद तिवारी जी और प्रमोद ताम्बट जी किताबें हम पहले ही आज लाइन मँगवा चुके थे।
श्रीलाल शुक्ल जी ने अपने लेखन के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा है -‘मेरा अधिकतर लेखन मुरव्वत का लेखन है।’
इसी तर्ज़ पर पुस्तक मेले से अधिकतर ख़रीद मुरव्वत की ख़रीद होती है। मित्र लेखकों की किताबें ख़रीदने में सोच की गुंजाइश कहाँ होती है।
न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशंस के सामने ही डा पवन विजय खड़े दिखे। देखते ही कस के गले पड़ गये। हड्डी जकड़ गई, साँस उखड़ने को हुई। अपने हाल देखकर हमको उन राष्टाध्यक्षों के हाल याद आए जो बुज़ुर्गियत की उम्र में विश्व सम्मेलनों लपक के आपस में कड़क आलिंगन करते हैं।
पवन विजय जिस गर्मजोशी से गले मिले उसको संतुलित करने के लिये उन्होंने मिसरा पढ़ा -‘ तुम्हई देखि शीतल भई छाती।’ यह एहसास हुआ कि हम आदतन बात और व्यवहार में 36 का आँकड़ा रखने के लिए कितना सजग रहते हैं। हमको अंदेशा हुआ सर्दी के मौसम में कहीं ठंड न लग जाये। लेकिन फिर बात किताबों की होनी लगी और बात आई-गई हो गई।
किताबों की बात शुरू हुई तो पता चला कि डॉ किरण मिश्रा का ताज़ा आया कविता संकलन ‘ब्रह्मांड का घोषणापत्र एवं अन्य कवितायें’ सामने सर्व भाषा ट्रस्ट पर मौजूद था। कविता संकलन ख़रीद कर उसका विमोचन किया गया। कविता संकलन के विमोचन के बाद पवन विजय ने अपने उपन्यास ‘जोगी-बीर’ के साथ भी फ़ोटो खिंचवा ली। किताब ख़रीदकर उसका भी विमोचन किया गया।
इस बीच मनु कौशल जी भी सपत्नीक वहाँ पधारे। मनु जी आजकल आलोक पुराणिक जी के साथ दिल्ली के लोगों को टहलाते हुए दिल्ली की विरासत से लोगों को रूबरू कराते हैं। वाक कराते समय मनु जी के अंदर ग़ालिब , खुसरों और दीगर बुजुर्गों की आत्मायें आकर लोगों को गुजरे जमाने की दास्तान सुनाती रहती हैं। मनु जी ने भी हमारी ख़िताब ख़रीदकर उसका विमोचन किया।
इस सिलसिले को आगे बढ़ाते आयुध निर्माणी के वरिष्ठ कथाकार गोविंद उपाध्याय जी ने अपना नवीनतम संग्रह ‘बिना पते वाला आदमी’ हमको भेंट किया। देश की हर प्रतिष्ठित पत्रिका में गोविंद जी की कहानियाँ छप चुकी हैं। तीन दशक से भी अधिक समय से लिखते हुए गोविंद जी के छपने का सिलसिला बीस साल पहले 2004 में शुरू हुआ और अभी तक कुल जमा 19 कहानी संग्रह और उपन्यास आ चुके हैं। हमने भी अपनी लेखकीय प्रतियों में से एक प्रति वहीं से लेकर गोविंद जी को भेंट की। उसके साथ फ़ोटो भी खिंचवा ली। एक और विमोचन संपन्न हुआ।
फ़ेसबुक पर हमारे मेले में आने की सूचना पढ़कर कालेज के साथी भोपाल सिंह और उनसे जानकारी लेकर मनोज भी वहाँ आये और किताब लेकर साथ में फ़ोटो खिंचायी। मनोज अपने तख़ल्लुस ‘जानी’ के नाम से व्यंग्य लेख भी लिखते रहे हैं पिछली सदी से। कई सम्मान भी पाये हैं किताबों पर। फ़ोटो खिंचाते हुए भोपाल सिंह ने कहा -‘ऐसे फ़ोटो लीजिए ताकि लगे कि आप हमको किताब भेंट कर रहे हैं। फ़ोटो देखकर और दोस्त आयेंगे। हमने फ़ोटो अभी तक लगाया ही नहीं लिहाज़ा दोस्त लोग अभी तक आये नहीं।
भोपाल सिंह और मनोज के वहाँ रहते हुए राजीव भी सपरिवार पहुँचे वहाँ। राजीव हमारे कॉलेज के हैं और जबलपुर में हमारे साथ काम भी कर चुके हैं। चार साल। काम के सिलसिले की राजीव की एक मज़ेदार अदा यह थी थोड़ा सा भी लीक से हटकर काम हुआ तो करने से रस्मी तौर मना कर देते फिर हमारे कहने पर कॉलेज और दफ़्तर को दोहरी वरिष्ठता के लिहाज़ करते हुए राजी हो जाते कहते हुए -‘होना तो नहीं चाहिए लेकिन आप कह रहे हैं तो कर देते हैं।’ इस तरह कई काम हमारे खाते में चढ़ाते हुए राजीव ने किए। आजकल लोक सेवा आयोग में प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली में तैनात हैं।
राजीव की पत्नी हिमानी भी साथ में थीं। हिमानी बहुत अच्छी चित्रकार और कथाकार हैं। बच्चों के लिए शिक्षाप्रद स्केच और कहानी की किताबें लाना चाहती हैं। जल्द ही आनी चाहिए।
राजीव और हिमानी के साथ भी किताब के फ़ोटोबाज़ी हुई ।
फ़ोटो और विमोचन का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए आरिफ़ा ने भी अपनी ही दुकान से किताब ख़रीदकर विमोचन किया। आरिफ़ा से वर्षों पुरानी जान पहचान और बातचीत के बाद मुलाक़ात पहली बार हुई। आरिफ़ा की कोशिश और बार-बार आग्रह के चलते ही मेरा यह व्यंग्य संकलन आ पाया। सजग संपादक का काम करने के चलते इधर आरिफ़ा की लिखाई में कुछ रुकावट आई है। उम्मीद है कि सिलसिला फिर ज़ोर पकड़ेगा।
आलोक निगम भी इतवार होने के चलते छुट्टी के कारण आये मेले और फिर घटनास्थल पर भी। आलोक अपनी पोस्टों में गणित के सवालों से लोगों के बीच अपने ज्ञान का आतंक मचाते रहते हैं। ग़नीमत है कि पुस्तक मेले में उनकी गणित की पाठशाला का शटर गिरा रहा।
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Monday, February 12, 2024

पुस्तक मेले में

 पुस्तक मेला जाना हुआ कल। नोएडा में एक मांगलिक कार्यक्रम में रहना जरूरी था। गए भी। लेकिन फिर घण्टे भर बाद क्लास बंक करने की तरह निकल लिए प्रगति मैदान।जिन दोस्तों को सुचित भी किया था उनमें से कुछ पहुँच भी गए। बाकी ने हमारे इस विश्वास की रक्षा की कि किसी न किसी कारण पहुंच न पाएंगे। कुछ ने मेसेज रात में देख पाने की बात भी बताई।

इस बार हमारी किताब भी आई थी -चयनित व्यंग्य। न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से। जितनी संख्या में व्यंग्यकारों के चयनित व्यंग्य आये हैं न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से उससे यह कहे जाने की संभावना भी बनती है कि व्यंग्यकार वही जिसके चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से आ गए हैं। इस बात की तसदीक Alok Puranik जी ने करते हुए सूचना दी कि वे भी अपने चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड से छपवाने के लिए छाँट रहे हैं ताकि लोग उनको सिर्फ आवारा घुम्मकड़ ही न समझें।
चयनित व्यंग्य छपने के साथ ही अपन ने दो प्रतियां मंगवा ली थीं। आते ही श्रीमती जी से विमोचन करवा लिया था। विमोचन करने के बमुश्किल तैयार हुई श्रीमती जी ने कड़क हिदायत दी थी कि उनके विमोचन की फ़ोटो कहीं लगाई न जाये। उनको इस बात का अंदेशा था कि कहीं लोग उनको भी मिशनरी 'पुस्तक विमोचक' न समझ लें जो रोज किसी न किसी किताब को सीने से सटाये विमोचन करते पाया जाता है।
एक प्रति के साथ विमोचन के बाद दूसरी प्रति भेंट की गई आयुध निर्माणी कानपुर के कार्यकारी निदेशक अजय सिंह जी को। शनिवार को किताब भेंट करने के कारण उन्होंने इसे पढ़ने की तस्दीक़ करते हुए कुछ लेखों का ज़िक्र करते हुए मजे भी लिए यह कहते हुए कि आपके लेख पढ़ते हुए परसाई जी की याद आती है। हम कुछ बोले नहीं। मित्रों की बात का बुरा नहीं माना जाता।
अजय सिंह ने मजे लेते आगे भी कहा -‘आप इतने काम-धाम के साथ इतना सब लिख कैसे लेते हैं?’ इस मज़ाक़ का मतलब आप समझ ही गए होंगे।
नोयडा से प्रगति मैदान किराए की कार से गये। 20 किलोमीटर की दूरी के चार सौ रुपये खर्च हुए। मतलब 20 रुपया प्रति किलोमीटर । चयनित व्यंग्य की किताब 225 रुपये की किताब मेले में 200 रुपये में मिल रही थी। दो किताब के बराबर खर्च करके मेले में पहुंचे।
पुस्तक मेले में गेट पर ही यादव जी के मशहूर शुध्द शाकाहारी छोले के कई ठेले लगे हुए थे। सब पर दनादन छोले बिक रहे थे। बिना विमोचन।
गेट नम्बर 5 से जाना था पुस्तक मेले। लम्बी, घुमावदार, ढीली-ढाली टाइप लाइन लगी थी मेले के अंदर जाने के लिए। टिकट हमने पहले ही खरीद लिया था। आन लाइन। बड़ों का 20 रुपये का। बच्चों का 10 रुपये का। हमको लगा कि काश बच्चे होते तो दस रुपये बचते। बाद में जब पता चला कि सीनियर सिटीजन के लिये मुफ्त व्यवस्था है मेले में आने की तो लगा काश वरिष्ठ नागरिक हो गए होते। पहले दस और बाद में बीस रुपये के लालच में बच्चा और फिर बूढ़ा हो जाने की ललक लिए हम जैसे लोग ही अपने माननीयों के दलबदल की आलोचना करते हैं। कितनी खराब बात है।
मेले के अंदर पहुंचने तक किसी ने हमारा टिकट चेक नहीं किया तो लगा कि टिकट बेफालतू ही लिया। लेकिन बाद में काम आया वही टिकट। उसकी कहानी आगे।
मेले में हमारी कितबिया हाल नम्बर एक में थी। सबसे आखिर में हाल था। भीड़ भारी थी। लोग आते-जाते दिख रहे थे। हमको लगा कि मेला साल में कई बार लगना चाहिए। लेकिन हमारे लगने से क्या होता है।
मेले में मित्रों से हमने तीन बजे पहुंचने को लिखा था। पहुंचते हुए 4 मिनट कम तीन बजे गए थे। हाल में घुसते ही वाणी प्रकाशन के स्टाल के किनारे की बरामदे टाइप की जगह पर किसी किताब पर विमोचन के बाद वाली बातचीत हो रही थी। सवाल-जबाब का सिलसिला चल रहा था। हम बातचीत को उड़ती-उचटती निगाह से देखते हुए आगे बढे और न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल पर पहुंचे।
स्टॉल पर Arifa Avis मौजूद थीं। आरिफ़ा से वर्षो की फेसबुकिया मित्रता के बावजूद यह पहली मुलाकात थी। आरिफा के आग्रह के कारण ही यह चयनित व्यंग्य आया। वहीं पर एम.एम. चन्द्रा भी टहलते हुए पाए गए। एम एम चंद्रा पहले डायमंड बुक्स में थे। दो साल से न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन शुरू किया है। बताया कि करीब 500 किताबें निकाल चुके हैं। कई कवियों-व्यंग्यकारों के चयनित-संकलित संकलन दिखे स्टॉल पर।

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पुस्तक मेला जाने के पहले किताब का विमोचन

 


पुस्तक मेला जाना हुआ कल। नोएडा में एक मांगलिक कार्यक्रम में रहना जरूरी था। गए भी। लेकिन फिर घण्टे भर बाद क्लास बंक करने की तरह निकल लिए प्रगति मैदान।जिन दोस्तों को सुचित भी किया था उनमें से कुछ पहुँच भी गए। बाकी ने हमारे इस विश्वास की रक्षा की कि किसी न किसी कारण पहुंच न पाएंगे। कुछ ने मेसेज रात में देख पाने की बात भी बताई।
इस बार हमारी किताब भी आई थी -चयनित व्यंग्य। न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से। जितनी संख्या में व्यंग्यकारों के चयनित व्यंग्य आये हैं न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से उससे यह कहे जाने की संभावना भी बनती है कि व्यंग्यकार वही जिसके चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से आ गए हैं। इस बात की तसदीक Alok Puranik जी ने करते हुए सूचना दी कि वे भी अपने चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड से छपवाने के लिए छाँट रहे हैं ताकि लोग उनको सिर्फ आवारा घुम्मकड़ ही न समझें।
चयनित व्यंग्य छपने के साथ ही अपन ने दो प्रतियां मंगवा ली थीं। आते ही श्रीमती जी से विमोचन करवा लिया था। विमोचन करने के बमुश्किल तैयार हुई श्रीमती जी ने कड़क हिदायत दी थी कि उनके विमोचन की फ़ोटो कहीं लगाई न जाये। उनको इस बात का अंदेशा था कि कहीं लोग उनको भी मिशनरी 'पुस्तक विमोचक' न समझ लें जो रोज किसी न किसी किताब को सीने से सटाये विमोचन करते पाया जाता है।
एक प्रति के साथ विमोचन के बाद दूसरी प्रति भेंट की गई आयुध निर्माणी कानपुर के कार्यकारी निदेशक अजय सिंह जी को। शनिवार को किताब भेंट करने के कारण उन्होंने इसे पढ़ने की तस्दीक़ करते हुए कुछ लेखों का ज़िक्र करते हुए मजे भी लिए यह कहते हुए कि आपके लेख पढ़ते हुए परसाई जी की याद आती है। हम कुछ बोले नहीं। मित्रों की बात का बुरा नहीं माना जाता।
अजय सिंह ने मजे लेते आगे भी कहा -‘आप इतने काम-धाम के साथ इतना सब लिख कैसे लेते हैं?’ इस मज़ाक़ का मतलब आप समझ ही गए होंगे।
नोयडा से प्रगति मैदान किराए की कार से गये। 20 किलोमीटर की दूरी के चार सौ रुपये खर्च हुए। मतलब 20 रुपया प्रति किलोमीटर । चयनित व्यंग्य की किताब 225 रुपये की किताब मेले में 200 रुपये में मिल रही थी। दो किताब के बराबर खर्च करके मेले में पहुंचे।
पुस्तक मेले में गेट पर ही यादव जी के मशहूर शुध्द शाकाहारी छोले के कई ठेले लगे हुए थे। सब पर दनादन छोले बिक रहे थे। बिना विमोचन।
गेट नम्बर 5 से जाना था पुस्तक मेले। लम्बी, घुमावदार, ढीली-ढाली टाइप लाइन लगी थी मेले के अंदर जाने के लिए। टिकट हमने पहले ही खरीद लिया था। आन लाइन। बड़ों का 20 रुपये का। बच्चों का 10 रुपये का। हमको लगा कि काश बच्चे होते तो दस रुपये बचते। बाद में जब पता चला कि सीनियर सिटीजन के लिये मुफ्त व्यवस्था है मेले में आने की तो लगा काश वरिष्ठ नागरिक हो गए होते। पहले दस और बाद में बीस रुपये के लालच में बच्चा और फिर बूढ़ा हो जाने की ललक लिए हम जैसे लोग ही अपने माननीयों के दलबदल की आलोचना करते हैं। कितनी खराब बात है।
मेले के अंदर पहुंचने तक किसी ने हमारा टिकट चेक नहीं किया तो लगा कि टिकट बेफालतू ही लिया। लेकिन बाद में काम आया वही टिकट। उसकी कहानी आगे।
मेले में हमारी कितबिया हाल नम्बर एक में थी। सबसे आखिर में हाल था। भीड़ भारी थी। लोग आते-जाते दिख रहे थे। हमको लगा कि मेला साल में कई बार लगना चाहिए। लेकिन हमारे लगने से क्या होता है।
मेले में मित्रों से हमने तीन बजे पहुंचने को लिखा था। पहुंचते हुए 4 मिनट कम तीन बजे गए थे। हाल में घुसते ही वाणी प्रकाशन के स्टाल के किनारे की बरामदे टाइप की जगह पर किसी किताब पर विमोचन के बाद वाली बातचीत हो रही थी। सवाल-जबाब का सिलसिला चल रहा था। हम बातचीत को उड़ती-उचटती निगाह से देखते हुए आगे बढे और न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल पर पहुंचे।
स्टॉल पर Arifa Avis मौजूद थीं। आरिफ़ा से वर्षो की फेसबुकिया मित्रता के बावजूद यह पहली मुलाकात थी। आरिफा के आग्रह के कारण ही यह चयनित व्यंग्य आया। वहीं पर एम.एम. चन्द्रा भी टहलते हुए पाए गए। एम एम चंद्रा पहले डायमंड बुक्स में थे। दो साल से न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन शुरू किया है। बताया कि करीब 500 किताबें निकाल चुके हैं। कई कवियों-व्यंग्यकारों के चयनित-संकलित संकलन दिखे स्टॉल पर।

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