Sunday, May 26, 2024

ओरछा के महलों में कुछ देर



ओरछा के राम मंदिर और चतुर्भज मंदिर दर्शन के बाद वहाँ के महल देखने के लिए आगे बढ़े। धूप तेज हो गयी थी। सड़क किनारे की दुकाने खुलने लगी थीं। दुकानदार ग्राहकों का इंतज़ार करने लगे थे। गर्मी के चलते वातावरण अलसाया सा लग रहा था। पास ही थे इसलिए पैदल ही चल दिए। सोचा महल देखने के बाद गाड़ी बुला लेंगे। फिर बाक़ी का ओरछा घूमेंगे।
महलों वाले इलाक़े में पहुँचने पर रास्ते में कई आटो महल की तरफ़ जाने वाले रास्ते में खड़े दिखे। हम कुछ सोचें तबतक एक आटो वाले ने हमको लपक लिया। आटो चालक बालक पवन ने हमसे कहा -'ओरछा के सारे स्थल घुमा देंगे। चार सौ रुपए लगेंगे।' हमको पवन का प्रस्ताव बुरा नहीं लगा। हम लपक के आटो पर चढ़ लिए।
आगे बढ़ने पर हमने अपने ड्राइवर संजय को फ़ोन किया और कहा -'तुम भी आ जाओ। गाड़ी यहीं महल के पास खड़ी कर दो। साथ में घूम लो ओरछा।' पर संजय को मेरा प्रस्ताव कुछ जंचा नहीं। बोले -'हम यहीं हैं। गाड़ी पर। आप घूम के आइए।'
अपन पवन के साथ महल की तरफ़ बढ़े। शुरुआत में ही एक जगह टिकट मिल रही थी। ओरछा के सभी पर्यटन स्थल के लिए प्रवेश पत्र। (शायद )पचास रुपए की थी टिकट। पैसे पवन ने अपने पास से दिए। हमारे देने के लिए हो गए चार सौ पचास रुपए।
महलों के प्रांगण में तीन महल अग़ल-बग़ल बने हुए हैं। जहांगीर महल, शीश महल और राजमहल। सबसे पहले अपन जहांगीर महल को देखने के लिए आगे बढ़े।
महल के प्रवेश द्वार पर ही पर्यटन विभाग के लोग बैठे थे। जहांगीर महल की तरह ऊँधती मुद्रा में। टिकट देखकर अंदर जाने दिया और फिर ऊँधने लगे।
जहांगीर महल का निर्माण बुंदेला राजा बीर सिंह देव ने मुग़ल बादशाह जहांगीर के ओरछा आगमन के समय उनके सम्मान में करवाया था। सत्रहवीं शताब्दी में बनवाए गए इस तीन मंज़िला इमारत में कुल २३६ कमरे हैं जिनमें १३६ भूमिगत हैं। जहांगीर महल को हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में भी मान्यता मिली। महल के कमरों में पेंटिंग्स के अवशेष दिखते हैं। अधिकतर चित्र रामायण महाभारत की कथाओं के लगते हैं। जब बना होगा महल तो कितना खूबसूरत और आकर्षक रहा होगा।
जहांगीर महल देखकर लगा कि पुराने जमाने में राजा महाराजाओं के सम्मान में कितना खर्च होता था। वर्षों की अवधि में बना होगा जहांगीर महल उसकी अगवानी के लिए। खर्च की परम्परा आज भी जारी है। किसी मंत्री के दौरे में रातों-रात सड़क और दीगर निर्माण रातों-रात हो जाते हैं। अधिकतर मंत्री-संतरी भी पुराने जमाने के राजे-महाराजे की तरह ही महसूस करते हैं।
जहाँगीर महल से निकलकर बाहर लगी पानी की मशीन से पानी पीकर बगल में ही बने शीशमहल का बाहर से ही दीदार किया। इस महल का निर्माण सन् 1706 में ओरछा के महाराज उद्देत सिंह ने करवाया था जो अन्यंत बलशाली एवं वीर थे। कहते हैं कि तत्कालीन मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ने इनकी वीरता से प्रभावित होकर अपनी तलवार इन्हें भेंट की थी जो आज भी ओरछा राज्य के शस्त्रालय में रखी हुई है। शीशमहल का निर्माण वास्तव में एक अतिथि गृह के रूप में करवाया गया था। विभिन्न रंगों के कांच जड़ित होने के कारण ही इसका नाम शीशमहल रखा गया था। इस महल में शाही एवं अन्य कीमती सामान लगा हुआ था जो धीरे-धीरे गायब होता गया। महल के अन्दर भव्य विशाल कक्ष एवं स्नानगृह आदि उस समय के राजाओं की विलासिता के परिचायक हैं।
आजकल शीश महल का देखरेख मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग करता है। अपन को यहाँ रहना तो था नहीं सो इसे बाहर से ही देखते हुए बगल में स्थित ओरछा के राजमहल की तरफ बढ़ गए।
अपने प्राचीन वैभव का निरंतर बखान करता हुआ ओरछा का विशाल राजमहल एक मिसाल है। इस ऐतिहासिक महल का निर्माण भी महाराज वीरसिंह जू देव ने सन् 1616 ई. में करवाया था। महल के प्रवेश द्वार पर अनमने भाव से टिकट देखने वालों के अलावा अन्दर लगभग सन्नाटा था। राजमहल के अलग-अलग भाग के बाहर आडियो लिंक के माध्यम इमारतों का परिचय दिया गया था। आडियो लिंक स्कैन करके मोबाइल में खोलकर इमारत का विवरण सुनते हुए आप महल भ्रमण कर सकते हैं।
कुछ आडियो लिंक खुर्ची हुई होने के कारण डाउनलोड नहीं हुई। राजमहल के अलग-अलग हिस्से घूमते हुए उनके किस्से सुने। जनानखाना, नहानघर, निपटानघर , रनिवास , पूजाघर , नौकरों के रहने की जगह और तमाम रिहायशी इलाके देखे । अधिकतररिहायशी कमरों की छतों, दीवारों पर हिन्दू धर्म की कथाओं से जुड़े चित्र बने हुए थे । पुराने हो जाने के चलते चित्रों का रंग फीका पड़ गया था लेकिन अंदाज लगता था कि जब बने होंगे चित्र तो कितने खूबसूरत लगते होंगे । अफसोस कि इस शानदार महल और चित्र बनाने वालों के नाम का कहीं कुछ पता नहीं चलता ।
चतुर्भज मंदिर बनवाने वाली रानी जी की इच्छा थी उनके महल के कमरे के झरोखे से मूर्ति के दर्शन हो सकें। रानी के महल के कमरे के खिड़की से देखने पर सामने स्थित चतुर्भज मंदिर की मूर्ति साफ़ दिखती है। अलबत्ता कैमरे की नजर से जब मूर्ति देखने की कोशिश की तो फोटो आया नहीं।
उस समय के नहानघर और निपटानघर भी देखने को मिले। निपटानघर तो आजकल इन्डियन स्टाइल के खुले में बने शौचालय सरीखे बने थे। पहली मंजिल पर बने इन शौचालयों की सफाई उस समय के कामगार करते होंगे। शौचालयों की यह व्यवस्था शहरों में तो पिछ्ली सदी के आखिर तक रही। नहाने के साझा नहानघर सरीखे बने थे। उनमें पानी जमा करके लोग नहाने होंगे।
महल की बनावट इस तरह की थी कि हवा का आवागमन सुचारू रहे। एक संकरे से रास्ते से ऊपर की तरफ जाते हुए हवा सरसराती हुई आती महसूस हुई। कितने कुशल रहे होंगे इसको बनाने वाले कारीगर जिनके बारे में आज कुछ पता नहीं।
राजमहल से बाहर निकलकर हम आगे की तरफ आये। पवन को फोन किया तो पता चला कि वो किसी दूसरे टूरिस्ट को ओरछा दर्शन करा रहे हैं। थोड़ी देर में आएंगे।
समय का उपयोग करने के लिए अपन सामने से अन्दर घुसे। यह हिस्सा देखने से रह गया था। सामने से दीवाने आम दिखा। दीवाने आम में आम जनता आती होगी। राजा-महाराजा उनकी फ़रियाद सुनते होंगे। मौके-मूड के हिसाब से निर्णय लेते होंगे।
हमने जब देखा दीवाने आम तब वह राजा के रूप में तो कोई नहीं था। अलबत्ता फरियादी वाली जगह पर दो कुत्ते ऊँघ रहे थे। शायद उनकी यही मांग रही होगी कि जहाँपनाह हमको इस विकट गर्मी में यहाँ से निकाला न जाए। चुपचाप पड़े रहने दिया जाए। उनके तसल्ली से पड़े रहने के अंदाज से लग रहा था कि उनकी फ़रियाद दीवाने आम ने मंजूर कर ली थी।
दीवाने आम से बाहर आकर अपन इधर-उधर घूमते हुए अपने ऑटो ड्राइवर पवन का इन्तजार कर रहे थे कि हमको देखकर किसी ने पूछा –“क्या आप अनूप जी हैं?” पता चला कि सवाल करने वाली हमारी श्रीमती जी की सहेली और हमारी फेसबुक मित्र Hina Srivastava जी हैं। हिना जी उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। उनके गाये एक गीत को 16 लाख लोग देख चुके हैं। वे अपने परिवार के साथ ओरछा घूमने आई थीं। कानपुर में रहने वाले फेसबुक मित्रों की पहली मुलाक़ात ओरछा में हुई। शायद इसी को संयोग कहते हैं।
किले से बाहर निकलते हुए गुजरात से ओरछा दर्शन करने आये एक परिवार के लोगों के अनुरोध पर हमने उनका फोटो खीचा। बाद में मेहनताने के रूप में उन्होंने हमको भी अपने साथ खडा करके फोटो खिंचवाया। इसके बाद वे अन्दर की तरफ चले गए। अपन बाहर निकल आये। पवन अपने ऑटो के साथ हमारा इन्तजार कर रहे थे।
(राममंदिर और चतुर्भुज मंदिर से सम्बद्ध पोस्ट कमेंट बॉक्स में )

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Saturday, May 25, 2024

रिटायरमेंट के बाद



25 दिन हो गए सरकारी सेवा से रिटायर हुए । तमाम काम सोचे थे करने के लिए कि ये करेंगे, वो करेंगे। बस एक बार रिटायर भर हो जाएँ। सारे के सारे काम, सिवाय निठल्लेगीरी के, उलाहना दे रहे हैं कि हम पर अमल नहीं हुआ, हमारे साथ 'इरादाखिलाफ़ी' हुई। कोई-कोई तो यह भी कह रहा है कि तुम भी बदल गए। हमें तुम से ये उम्मीद नहीं थी।
काम जो सोचे थे उनमें से एक था घूमने का। सोचा तो यह था कि रिटायर होते ही कहीं घूमने निकल जाएँगे। भूटान, बांगलादेश, श्रीलंका, यूरोप मतलब कहीं भी। देश में भी तमाम जगहें हमारे घूमने की लिस्ट में हैं। लेकिन कहीं निकलना हुआ नहीं। इस मामले में नूर साहब के शेर बहुत सहारा देते हैं :
मैं रोज़ मील के पत्थर शुमार (गिनती) करता था,
मगर सफ़र न कभी एख्तियार (शुरू) करता था।
तमाम काम अधूरे पड़े रहे मेरे
मैं ज़िंदगी पर बहुत ऐतबार (भरोसा) करता था।
पिछले दिनों मेरा बेटा अपने कजाकिस्तान गया था। वहाँ के किस्से, फ़ोटो, विडीयो लगाए अपने यहाँ तो किया कि फ़ौरन निकल लें। पहुँच जाएँ कजाकिस्तान। घूमें आसपास। बग़ल में समरकंद है जहां से बाबर आए थे। लेकिन फिर आलस्य ने और बगलिया के रोक लिया। सोचा जाएँगे तसल्ली से। कौन समरकंद और कजाकिस्तान कहीं भागे जा रहे हैं।
पढ़ने के लिए तमाम किताबें सोची थीं कि एक-एक कर पढ़ी जाएँगी। अभी तक शुरुआत नहीं हुई है। रिटायरमेंट पर तमाम दोस्तों ने किताबें भेंट की हैं। कुछ पहले की पढ़ी, कुछ नई, कुछ पसंदीदा।कुछ मित्रों ने मुझे रामायण, गीता भी भेंट की। कई प्रतियाँ हों गयीं। उन दोस्तों की शायद सलाह यही होगी कि लोक की बात ख़त्म हयी, अब परलोक सुधारने के प्रयास किया जाए।
इरादा यह भी थी कि उर्दू और स्पेनिश सीखेंगे। उर्दू सीखने की तमन्ना तो वर्षों से है। तमाम बार अलिफ, बे, ते लिखना सीखा भी लेकिन फिर छूट गया अभ्यास। स्पेनिश सीखने का चस्का पिछले साल तब लगा था जब मारखेज साहब की 'एकांत के सौ वर्ष' पढ़ी। डूओलिंगो एप से कई दिन स्पेनिश का अभ्यास भी किया। लेकिन बाद में वह भी ठहर गया। डुओलिंगो एप काफ़ी दिन तक हमारी बेवफ़ाई के संदेशे भेजता रहा। बाद में आजिज़ आकर वह भी शांत हो गया। दोनों इरादों पर से धूल झाड़कर अमली जामा पहनाने का विचार है अब।
लिखाई-पढ़ाई के तमाम छूटे हुए काम तय किए थे पूरे करने के लिए। अमेरिकी यात्रा के संस्मरण पर किताब 'कनपुरिया कोलंबस' फ़ाइनल कई बार चुके हैं । अब बस छपानी है। अलावा इसके कश्मीर, लेह-लद्धाख और दीगर घुमक्कड़ी के किस्से छाँटकर/लिखकर छपाने का इरादा है। 'व्यंग्य की जुगलबंदी' के सिलसिले में लिखे गए तमाम दोस्तों के लेख भी छाँटकर प्रकाशित करने का मन बनता है अक्सर। सबको इकट्ठा करना भी बड़ा काम है। देखते हैं कितना हो पाता है। किताब छपाने के तमाम हसीन लफड़े होते हैं। उनसे गुजरना भी रोचक अनुभव होता है।
अपने सेवाकाल के अनुभव भी लिखने के मन है। जिन लोगों के साथ काम किया उनके बारे में लिखने का विचार है। इस विचार पर अमल करने में हिचक भी है। पता नहीं कौन अपनी 'तारीफ़' पर ख़फ़ा हो जाए।
समाज सेवा में भी कुछ योगदान करने का मन है। कैसे कर पाते हैं, कितना कर पाते हैं -समय बताएगा।
सरकारी सेवा से रिटायर भले हो गए हैं लेकिन जड़त्व के नियम के हिसाब से सेवा की मन:स्थिति से अलगाव पाने में समय लगेगा। विनोद जी Vinod Srivastava की कविता याद आती है:
जैसे तुम सोच रहे साथी ,
वैसे आज़ाद नहीं हैं हम
पिंजड़े जैसी इस दुनिया में
पंछी जैसा ही रहना है
भरपेट मिले दाना-पानी
लेकिन मन ही मन दहना है।
जैसे तुम सोच रहे साथी
वैसे संवाद नहीं हैं हम
जैसे तुम सोच रहे साथी
वैसे आज़ाद नाहीं हैं हम।
सरकारी सेवा में 36 साल बिताने के बाद पिंजड़ा खुल गया है लेकिन आदतन अभी भी मन उसी हिसाब से बना हुआ है। सोच के स्तर पर उससे मुक्त होने में कुछ समय लगेगा।
लेकिन यह तय है कि सेवाकाल पूरा करने की बहुत ख़ुशी है। आने वाले समय में तमाम नए काम काम करने की तमन्ना है। ज़िंदगी जितनी हसीन अभी तक रही, आगे की उससे भी खूबसूरत होगी ऐसा मुझे लगता है।
रिटायरमेंट के मौक़े पर हुई विदाई पार्टी के विडियो हमने यूट्यूब पर अपलोड किए हैं। इनमें हमारे कुछ मित्रों के और हमारे परिवार के लोगों और अपन के भी उद्गार हैं। जिन साथियों को देखने का मन हो वो कमेंट में दिए लिंक पर जाकर देख सकते हैं।

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Sunday, May 19, 2024

हमारे पास किताबें हैं



पिछले दिनों कई किताबें खरीदीं। पुरानी जो खरीद लिस्ट में थीं वो और नई जिनके बारे में पता चला। एक के बाद एक किताबें आई। उनको खोला गया। उल्टा-पलटा गया। कुछ को पढा भी गया। आधा-अधूरा। फिर रख दिया गया तसल्ली से पढ़ने के लिए।
तसल्ली से पढ़े जाने के इंतजार में तमाम तमाम किताबें अधपढी , अनपढी हैं। इनमें से कई क्लासिक की श्रेणी में आती हैं। उनको पढ़ने के मौके का इंतजार करते हुए न जाने कितने दिन , महीने और साल भी बीत गए। लेकिन लगता है कि पढ़ ही लेंगे। तसल्ली से।
पिछले दिनों जबलपुर गए तो वहां से भी तमाम किताबें ले आये। परसाई पर केंद्रित कांतिकुमार जैन जी के संस्मरण 'तुम्हारा परसाई' पहले पढ़ चुके थे लेकिन वहां दिखी तो खरीद ली। इसके अलावा परसाई जी की जीवनी 'काल के कपाल पर हस्ताक्षर' , ज्ञानरंजन जी की कई किताबें, उनको लिखे पत्रों के संकलन जिनका सम्पादन प्रियंवद जी ने किया है, स्वदेश दीपक जी की किताब 'जिन मांडू नहीं देखा' और दीगर किताबों के अलावा और कई किताबें खरीदीं।
किताबें खरीदते समय भी एहसास होता है कि पता नहीं इनको कब पढ़ पाएंगे, पहले की भी किताबें पढ़नी हैं। लेकिन जब किताब सामने दिखती है तो लगता है खरीद ही लो। पता नहीं बाद में मिले न मिले।
किताब पढ़ने वाले सभी लोगों के साथ लगभग ऐसा ही होता होगा। अपने पास कभी किताबें नहीं मिलती थीं, अब किताबें ही किताबें हैं लेकिन उनको पढ़ना नहीं हो पाता।
दो दिन पहले भी कुछ किताबें खरीदीं। किसी पोस्ट में चे गवारा की ' मोटर साईकिल डायरी' फ़िल्म का जिक्र पढा। फ़िल्म खोजी तो मिली नहीं। फिर सोचा किताब भी तो है। किताब ही ली जाए। आर्डर करने बैठे तो एक के बाद एक कई किताबें आर्डर कर दीं।
इस बार जो किताबें आर्डर की उनमें सबसे पहले आई गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की कहानियों की किताब ‘नदी झूठ नहीं बोलती ‘ बच्चों के लिए लिखी छोटी-छोटी कहानियां। पहले भी गिरिजा जी ने अपनी दो किताबें भेजी थीं। घर बदलने के क्रम में वे किताबों के बक्से में ही रह गईं अब तक। अब नए घर में खुलेगा बक्सा तब पढ़ी जाएंगी किताबें।
कल आई Pramod Singh जी की किताब 'बेहयाई के बहत्तर दिन।' प्रमोद जी किताब में चीन के किस्से हैं। देखना है ब्लाग में लिखे किस्सों से किताब के किस्से कितना अलग हैं। प्रमोद जी आसानी से समझ में आने वाली बात को अच्छी लिखाई मानने से परहेज टाइप करते हैं। उसकी झलक उनके लिखाई में भी दिखती है।
पिछले दिनों प्रमोद जी हमारे घर आये। किताबों की जामा तलाशी ली। मुझे लगा पूछेंगे की हमारी किताब दिखाओ। उन्होंने पूछा नहीं। पुण्य मिलेगा उनको।
'बेहयाई के बहत्तर दिन ' के साथ आई चे गवारा की किताब' मोटर साइकिल डायरी'। इसकी भूमिका चे गवारा की बिटिया ने लिखी है। हमारी हम उम्र है। किताब में नक्शा बना है चे ग्वारा के मोटरसाइकिल टूर का। मन किया लेटिन अमेरिका जाएं और किसी की मोटरसाइकल मय ड्राइवर किराए पर लें और वह रास्ता तय करें जिस रास्ते चे ग्वारा गए थे। लेकिन मन करना और होता है, सही में करना और।
आज अनिल यादव की किताब 'कीड़ा जड़ी' आई। संग में चे ग्वारा की 'मोटरसाइकिल डायरी' भी। लगता है गलती से दोबारा आर्डर हो गयी। लेकिन अच्छा ही लगा। भेंट में देने के लिए रहेगी पास में। 'कीड़ाजड़ी' भी शायद मेरे पहले से है। एक भेंट भी कर चुके हैं किताब प्रेमी की । मेरे पास जो है वो किताबों के बीच कहीं छिपी होगी। दूसरी भी रहेगी। काम आएगी।
आज दूसरी खेप में आई शिवमूर्ति जी की किताब 'अगम बहै दरियाव'। किताब का परिचय लिखा है -'आपातकाल से लेकर उदारीकरण के बाद तक करीब चार दशकों में फैली ऐसी दस्तावेजी और करुण महागाथा जिसमें किसान जीवन अपनी सम्पूर्णता में सामने आता है। किताब की कई लोगों ने तारीफ की थी। कुछ दिन पहले Vineet Kumar ने अपनी पोस्ट में जिक्र किया था। याद आया तो फिर मन किया ले ही ली जाए।
आज जब पढ़ना शुरू किया तो लगा कि पढ़ते रहें तो हफ्ते भर में पढ़ लेंगे। देखते हैं।
पिछले दिनों असगर वजाहत की किताब 'उम्र भर सफर में रहा' पढ़ी। इसके अलावा नीरजा चौधरी जी की किताब 'how prime ministers decide' का पहला अध्याय पढ़ा था। इसमें इंदिरा गांधी जी द्वारा आपातकाल लगाने से लेकर हटाने तक के किस्से विस्तार से बताए गए है। दूसरे प्रधानमंत्रियों के किस्से पढ़ने हैं अभी।
नीरजा जी की किताब का जिक्र अखबार में या कहीं और पढ़ा था। इसके बाद पुण्य प्रसून बाजपेयी जी की लाइब्रेरी में रखी दिखी। उसई समय सोचा था कि यह किताब लेनी है। संयोग से रिटायरमेंट के समय दफ्तर के साथियों ने भेंट देने के लिए किताबों की पसंद पूछी तो हमने यह किताब और दूसरी मार्खेज की Love in the time of Cholera' बताई थी। साथियों ने खोजकर किताब हमको विदाई समारोह में भेंट की।
Love in the time of Cholera पहले भी कहीं से डाउनलोड की थी लेकिन पढ़ नहीं पाए थे। गए दिनों Prabhat Ranjan जी ने संगत में Anjum Sharma जी से बातचीत में जिक्र किया कि 'कसप' लिखने के पहले मनोहरश्याम जोशी जी ने यह उपन्यास पढ़ा था। इसका किस्सा सुनकर हमारे मन में यह किताब पढ़ने की इच्छा हुई। किताब तो मिल हुई। देखते हैं कब तक पढ़ पाते हैं।
रिटायरमेंट के मौके पर तमाम उपहारों के साथ किताबें खूब मिलीं। Nirupma दीदी ने ने बहुत पहले ही रघुवीर सहाय रचनावली देने की लिए कहा था। वह मिली। इसके अलावा और भी कई मित्रों ने कई किताबें भेंट कीं। इन किताबों में रामचरित मानस, गीता की की भी कई प्रतियां हैं।
एक मित्र ने जावेद अख्तर की जीवनी Jadunama भेंट की। बहुत बढ़िया आर्ट पेपर में छपी किताब। हमने किताब का हर कोना छान मारा उसमें कहीं भेंट देने वाले का नाम नहीं लिखा। पता चलता तो स्पेशल धन्यवाद देते।
हमारे घर में हमको सबसे कीमती चीजें किताबें लगती हैं। पढ़ भले न पाए लेकिन लगता है कि हैं तो पास में। कभी न कभी पढ़ ही लेंगे। दीवार पिक्चर में शशि कपूर जिस तरह अमिताभ बच्चन से कहते हैं -'हमारे पास मां है।' हमसे कोई अगर कहे -'हमारे फलाना है, ढिमाका है, तुम्हारे पास क्या है?'
इस सवाल के जवाब में हम यही कहेंगे -'हमारे पास किताबें हैं।'
किताबों के बारे में इतनी बातें करने का कारण यह रहा कि आज Jagadishwar Chaturvedi जी की पोस्ट पढ़कर जानकारी हुई कि आज राष्ट्रीय पठन दिवस है। खोजने पर पता चला कि भारत में हर साल 19 जून के दिन राष्ट्रीय पठन दिवस मनाया जाता है. पुस्तकालय आंदोलन के जनक कहे जाने वाले पुथुवायिल नारायण पणिकर के सम्मान में हर साल 19 जून के दिन राष्ट्रीय पठन दिवस मनाया जाता है।
आज जबकि किताबें पढ़ने का चलन कम होता जा रहा है तब कोशिश करें कि किताबें पढ़ते रहें और उनकी चर्चा करते रहें। इससे पढ़ने का चलन कुछ तो बनेगा।

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Sunday, May 12, 2024

गाड़ी की सर्विसिंग के बहाने मटरगस्ती

  


कल शहर जाना हुआ। गाडी की सर्विसिंग करानी थी। सर्विस सेंटर में काम करने वाले एक गोल घेरे में खडे हुये सुबह की सभा जैसी कर रहे थे। क्रिकेट मैदान में खिलाडी मैच की शुरुआत में एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर टीम भावना का प्रदर्शन करते हुये खडे होते हैं। बराबरी का मामला रहता है वहां। इसलिये गले मिलते हैं। यहां बॉस और अधींनस्थ का हिसाब था इसलिये एहतियातन इस तरह खडे थे लोग कि कहीं कोई किसी को छू न जाये। कोरोना का प्रोटोकाल चल रहा हो मानो। बॉस से सुरक्षित दूरी ,है नौकरी के लिये जरूरी।
सर्विस वाले ने पटापट गाडी के ढेर सारे फोटो अपने टैब में ले डाले। गाडी भी नयी माडल की तरह खडे-खडे पोज देती रही। फोटू देखने पर पता चला कि एक चिडिया के पंख इंजन में फंसे हुये थे। शायद नीचे से घुसी होगी छिपने के लिये जब गाडी खडी रही होगी। फिर इंजन में फंस गयी होगी। उसकी ह्ड्डियां तक सूख गयीं थीं। चिडिया के घरवालों को पता भी न चला होगा कि कहां गयी। कोई खबर भी न छ्पी होगी किसी अखबार में। एक जीवन का गुमनाम अंत। दुनिया में ऐसे न जाने कितने लोग रोज गुमनामी की मौत मर जाते होंगे।
गाडी के सर्विसिंग में करीब तीन घंटे लगने थे। वहीँ बैठे-बैठे इंतजार करने के बजाय मैंने सोचा मेट्रोबाजी की जाये। मोतीझील मेट्रो स्टेशन करीब डेढ किलोमीटर दूर था। चल दिये। पैदल।
रास्ते में सडक के सहज नजारे देखते हुये आगे बढे। एक किनारे दो लडकियां सडक किनारे जमीन पर अपनी चाय की दुकान जमाये थीं। छुटका सिलिंडर धरे एक भगौने में चाय बनाते हुये आपस में बतिय-खिलखिला रहीं थी। बगल में तीसरी लडकी मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां चलाती हुई ‘रील दर्शन’ करते हुये मुस्करा रही थी। ग्राहक शायद चाय का इंतजार कर रहे थे। बैठे थे।
एक साइकिल वाला साइकिल पर तीन गैस सिलेंडर लादे चला जा रहा था। सिलेंडर के वजन और चढाई के कारण वह साइकिल पर एकदम झुककर ,जोर लगाकर साइकिल खींच रहा था। सिलेंडर कैरियर पर जिस तरह रखे हुये थे उससे लगा कि विजय का उल्टा वाला निशान बना रहे हों। साइकिल सवार की असलियत बयान कर रहे हों।
गूगल जो रास्ता बता रहा था हम उससे अलग दूसरी गली में मुड गये। यह वीरता दिखाते हुये हमको कानपुर के भगवती प्रसाद दीक्षित ’घोडे वाले’ की कही बात याद आयी :
“चलो न मिटते पद चिन्हों पर
अपने रस्ते आप बनाओ।“
अपने रास्ते पर जाने का फायदा भी हुआ। आगे हमको शानदार स्पोर्ट्स क्लब दिखा। यह हमने पहली बार देखा था। तमाम खेल की ट्रेनिग का जिक्र था। कई गेट दिखे। विवरण पता करने पर दरबान ने बताया कि उसको कुछ पता नहीं क्लब के बारे में। उसको तो बस चौकीदारी से मतलब। दुनिया के तमाम चौकीदार ऐसे ही बिना कुछ जाने तमाम पैसेवालों के दिहाडी के नौकर बने हुये हैं।
आगे एक एक बुजुर्ग व्हील चेयर पर गोद में पतंग लिये बैठे थे। हमने पूछा-‘पतंग उडाओगे क्या?’ वो बोले-‘ चलने-फिरने से मोहताज हम क्या पतंग उडायेंगे? एक भाई जी दे गये हैं । किसी बच्चे को दे देंगे।‘ पतंग में कई चिप्पियां लगी हुई थीं। सेलो टेप की। कोई बच्चा उस पतंग को उडा रहा होगा कहीं।
बेनाझाबर के पास मोड के पास एक बच्ची अपनी छुटकी साइकिल के साथ दौडती दिखी। हमारे देखते-देखते उसने साइकिल नुक्कड पर एक साइकिल बनाने वाले की दुकान पर लिटा दी। साइकिल की चैन उतर गयी थी। उलझी हुई ,उतरी चैन को चढाना नही आता होगा बच्ची को। साइकिल लिटाकर वह खडी होकर सुस्ताने लगी। साइकिल वाले ने चुपचाप उसकी साइकिल को हाथ में ले लिया और चैन चढाने लगा।
आगे एक चाइनीज रेस्तरा दिखा। आजकल जब चीनी कब्जे के किस्से चलन में हैं तब शहर में खाने-पीने की नयी दुकाने चीनी नाम से खुले यह मजेदार है। मेट्रो स्टेशन के नीचे भी कई चमकते-दमकते खाने के अड्डे दिखे।
मेट्रो स्टेशन पर भीड बिल्कुल नहीं थी। अपन अकेले टिकट लेने वाले। तीस रुपये का टिकट मोतीझील से आई.आई.टी. तक का। काउंटर बालिका हमको टिकट देकर वापस ‘मोबाइल समुद्र’ में गोता लगाने लगी। सुरक्षा से गुजरकर स्टेशन पर आये। मेट्रो भी आ गयी कुछ देर में। बैठ गये। चल दी मेट्रो। कुल जमा तीन यात्री थे मेट्रो में। ट्रेन चली भी नहीं थी कि अगला स्टापेज आ गया। गाडी कुछ देर खडी रही। फिर चल दी।
ट्रेन की खिड्की से शहर का नजारा देखते रहे। एक जगह खूबसूरत मंदिरनुमा आकृति वाली इमारत दिखी। हमने सोचा कि यह मंदिर कब बना ? बाद में पता चला कि यह तो अपना जे.के.मंदिर है। तमाम छतों पर सोलर पैनल दिखे एंटीना की तरह।
आई.आई.टी. स्टेशन पर मेट्रो रुकी तो हम उतरे। लिफ्ट से। साथ में ट्रेन की ड्राइवर बालिका थी। एक छुटका सा सूटकेस लिये वह नीचे रेस्ट रूम में जा रही थी। बताया उसने की चालीस मिनट का रेस्ट मिलता है हर ट्रिप के बाद। उतनी देर वह सुस्ता लेती है। ट्रेन में भीड नहीं है के जवाब में उसने बताया कि जब सेंट्रल तक जाने लगेगी मेट्रो तब यात्री बढेंगे।
स्टेशन पर उतरकर एक दुकान पर बैठकर लस्सी पी। जब आर्डर दिया था तो सोचा था हुंडे में आयेगी। मलाई ऊपर होगी। लेकिन लस्सी आई ग्लास में। चुसनी पाइप के साथ। तमाम बर्फ के टुकडे सहित। साथ में लाल मीठा रस। आहिस्ते-आहिस्ते लस्सी पी। दुकान में भीड नही थी। शाम को होती है लडकों की जमघट।
वापसी में देखा कि एस्केलटर बंद था। सूचना लगी थी बिजली बचाने के लिये एस्केलेटर बंद है। सीढियों से या लिफ्ट से जायें। हमको लगा कि कहीं मेट्रो वाले अपने स्टेशन पर न लिख दें –‘ बिजली की खपत कम करने के लिये मेट्रो सेवायें स्थगित हैं। आप कृपया आटो/ओला/उबर से निकल लें।‘
ट्रेन में बैठते हुये देखा वही बालिका मेट्रो ड्राइवर अपना सूटकेस लुढकाते हुये इंजन की तरफ चली जा रही थी। इस बार थोडे यात्री थे ट्रेन में। सामने की सीट पर दो लडकियां किसी बच्चे से मोबाइल पर विडियो काल करते हुये अपना वात्सल्य उडेल रही थीं।
मोतीझील स्टेशन पर उतरे तो यहां भी बिजली की बचत के चलते स्वचालित सीढियां बंद थीं। लिफ्ट की तरफ बढे तो लिफ्ट में वही दो बच्चियां दिखीं जो मेट्रो में मिली थी। लिफ्ट चलने वाली थी। हमको लिफ्ट की तरफ आता देखकर एक बच्ची ने अपना हाथ लिफ्ट के बाहर कर दिया। ऐसा लगा मानो लिफ्ट के बाहर खडे इंसान से हाथ मिलाने का आह्वान कर रही हो। लिफ्ट उसके हाथ बाहर करते ही थम गयी। हम लिफ्टायमान हुये। लिफ्ट चलने के पहले हमने बच्ची को धन्यवाद बोल दिया।
लिफ्ट में कोरोना काल के अवशेष के रूप में केवल दो व्यक्तियों के खडे होने के लिये चौकोर खाने बने हुये थे। बहुत दिन लगेंगे उन यादों को विसराने में।
स्टेशन पर किताबों की दुकान है। वहां रखी किताबों को देखते हुये वापस चल दिये। पैदल ही।
रास्ते में एक मुल्लाजी जनरल स्टोर दिखा। बोर्ड के ऊपर ‘ अमूल गाय दूध’ भी लिखा था। दुकान पर मौजूद बच्चे ने बताया –‘यह नाम लोगों ने दिया है। इसलिये बोर्ड भी उसी तरह का लगा।‘ वैसे मुल्ला जी का नाम मकसूद है। बेटा जो दुकान पर था उसका नाम ताहिर। बीकाम की पढाई कर रहा है। पिता जी बाजार गये हैं, कालेज अभी बंद है, इसलिये दुकान पर बैठे हैं ताहिर।
सर्विस स्टेशन के पास एक खाने-पीने के दुकान का नाम दिखा –‘फूड कैसीनो’ मने खाने का जुआघर। दीवार पर ताश के पत्ते वाले चिडी के बादशाह की फोटो लगी है।
फोटो देखकर लगा कि दुनिया में आजकल खाना मिल जाना भी एक जुआ ही है। जुये में एक जीतता है, हजार लोग लुट जाते हैं। खाने के भी वही हाल हैं। हजारों की रोटियां चंद लोग खा जाते हैं। कुछ लोग मुटाते हैं,हजारों भूखे रह जाते हैं।
सर्विस सेंटर पहुंचकर पता चला कि गाडी की सर्विसिंग हो गयी है। अपन भुगतान करके, गाडी उठाकर घर आ गये।
गाड़ी की सर्विसिंग के बहाने रिटायरमेंट के बाद पहली मटरगस्ती हुई ।
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Wednesday, May 08, 2024

यादों के बगीचे में



आज सुबह टहलने निकले। घर से निकलकर मैत्री नगर की तरफ गये। मैत्री नगर का हीरक जयंती उद्यान हमारा पसंदीदा पार्क है। 2001 से 2007 तक ओएफसी में काम किया। कुछ दिन इस्टेट आफिस में रहे। उसी दौरान मैत्री नगर पार्क के रख रखाव में काफी रुचि ली। झूले लगवाये। पार्क के बीच में फव्वारा लगवाया। शाम को रंग-बिरंगा फव्वारा चलता तो देखने में बहुत अच्छा लगता। खूब सारे फूल-पौधे लगे।
पार्क के रख रखाव में रुचि का आलम यह था कि दिन में कम से कम एक बार पार्क का राउंड जरुर लेते। कोई झूला टूट जाता तो उसी दिन ठीक करवाते। आसपास से तमाम लोग आते घूमने। उस समय के हमारे वरिष्ठ महाप्रबंधक श्री एस के शर्मा जी ने लोकार्पण किया था। संयोग कि पार्क का लोकार्पण 30 अप्रैल, 2006 को हुआ था। हमारे रिटायरमेंट के दिन ठीक 18 साल पहले।
आज पार्क के हाल उतने अच्छे नहीं हैं। समय के साथ संस्थानों और उनसे जुडे लोगों की प्राथमिकतायें बदल जाती हैं।
शर्मा सर के साथ की अनेक बहुत प्यारी यादें हैं।
शर्मा सर जब इस्टेट राउंड करने आते तो उनको आर्मापुर इस्टेट गेट तक छोडने जाते। वहां याद आने पर कहते-'अरे सर, चाय तो रह गयी। चलिये पी लीजिए।' शर्मा सर,अगर कोई जरूरी मीटिंग न होती तो गेट से लौटकर हमारे दफतर वापस आते। चाय पीते। फिर वापस जाते।
इसी तरह की तमाम अनगिनत यादें सेवाकाल की हैं। सीनियर, साथ के और जूनियर लोगों की।
रिटायर हुये हफ्ते से ऊपर हो चुका है। विदाई पार्टियों का दौर उतार पर है। ज्यादातर निपट चुकीं। कुछेक बाकी हैं। सभी की फोटो वीडियो देख देखकर वापस पुराने दौर में लौट जाते हैं। यादें बहुत भटकऊआ होती हैं। न जाने कहां-कहां टहलाती हैं।
हमको विदा करने के लिये शाहजहांपुर से और हजरतपुर से साथी लोग आये। शाहजहांपुर के कुछ साथी तो बडा वाला माला लेकर आये थे जिसको पहनकर नेता लोग मंच पर भाषणबाजी करते हैं। इतनी दूर कोई साथी और माला पहनाकर ,मिठाई खिलाकर चला जाये यह बिना अपनापे के भाव के सम्भव नहीं है। मुझे इस बात की खुशी है कि मुझे अपने तमाम साथियों से मोहब्बत बेपनाह मिली है।
मेरे बेटे अनन्य ने विदाई पार्टी का संचालन करते हुये कहा-" एट द एंड ऑफ कैरियर, एट द ऐंड ऑफ लाइफ सबसे ज्यादा यही मैटर करता है कि आफ इंसान कैसे थे। इट विल नाट मैटर टु एनीवन कि आपने कितने पैसे कमाये, कितना फेमस हो गये। एंड में यही मैटर करता है कि लोग आपको कैसे जानते थे,आपसे कैसे मिलते थे। वह सिर्फ सिर्फ आपके नेचर से डिसाइड होता है। वो चीज पापा आपमें बहुत ज्यादा है। जिस तरह के आप इंसान हैं। जिस तरह यहां इतने लोग आये हैं,आपको जानते है इससे पता चलता है कि लोग इसलिये आपकी इज्जत करते हैं। उससे हम आपको बहुत प्यार करते हैंं। हमें नहीं फर्क पडता कि आप कितने पैसे कमा रहे हैं आप हमारे लिये, क्या कर रहे हैं जिस तरह के आप इंसान हैं वह हमारे साथ हमेशा रहता है।"
बच्चे अगर आपने पिता को अच्छा इंसान समझें तो समझो बुज़ुर्गियत के दिन अच्छे कटने की संभावना है।
36 साल की सेवा की अनगिनत यादे हैं। विदाई पार्टी के तमाम फोटो,वीडियो हैं। वे सब एक-एक करके अपनी यादें सुरक्षित करने की मंशा से यहां साझा करते रहेंगे। ये ऐसी यादें हैं जिनको बार-बार देखने का मन होता है। खुशी होती है। अपनी खुशी के लिये ऐसा करेंगे। आत्मनस्तु वै कामाय सर्वम प्रियम भवति।
पिछ्ली पोस्ट में मित्रों ने मेरी सेवानिवृति पर बधाई दीं, आगामी जीवन के लिये शुभकामनायें दीं। मेरी तारीफ की। इस प्यार और उदारता के लिये सभी का धन्यवाद। आभार।

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Tuesday, May 07, 2024

सरकारी सेवा से रिटायरमेंट

 और अंतत: अपन भी सरकारी सेवा से रिटायर हुए ।

30 अप्रैल, 2024 दिन मंगलवार दफ़्तरी लिहाज से साठ साल की उम्र पूरी होने के बाद दफ्तर वालों ने इज्जत के साथ विदा कर दिया। इज्जत की बात हम सोच रहे हैं। उनके मन में क्या भाव होंगे, वे ही जानते होंगे। अपन तो इसी भरम से विदा हुए।
24 साल से कुछ कम की की बाली उमर में आयुध निर्माणियों में दाखिल हुए थे। तारीख थी 30 मार्च, 1988 दिन वुधवार। आयुध निर्माणी कानपुर में पुरानी साइकिल पर आये थे ज्वाइन करने। आदरणीय मिश्रा जी D.d. Mishra साथ आये थे ज्वाइन कराने। साइकिल गेट पर खड़ी करवा ली गयी थी। अफसर तो तब माने जायेंगे, जब घुसेंगे फैक्ट्री में।
हमारे साथ उस साल आठ लोगों ने ज्वाइन किया था। आदित्यानन्द श्रीवास्तव (AN) और हमने एक ही दिन ज्वाइन किया था। बाद में दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव (DC) , राजेश अग्रवाल, अखिलेश कुमार मौर्य, दामिनी पासबोला और अमिताभ ने ज्वाइन किया। इनमें अमिताभ बाद में रेलवे में चले गए। दामिनी अमेरिका। बाकी बचे छह लोगो ने आयुध निर्माणियों में सेवा की। सभी लोग आयुध निर्माणियों से उच्चतम पदों तक पहुंचे। AN एक शानदार कैरियर के बाद गत वर्ष लम्बी बीमारी के बाद नहीं रहे। आज के दिन अखिलेश कुमार मौर्य को छोड़कर बाकी सभी रिटायर हो चुके हैं।
आयुध निर्माणी कानपुर (OFC) में कुछ दिन रहने के बाद बोलांगीर गए हम। एक ही ट्रक में हमारा, AN और नन्द किशोर गुप्ता जी जो स्माल आर्म्स फैक्टरी (SAF) में हमारे साथी थे, का सामान साथ गया। बोलांगीर के बाद अपन आयुध निर्माणी, शाहजहांपुर (OCFS) रहे आठ साल। फिर कानपुर आये। आयुध निर्माणी कानपुर (OFC) में करीब सात साल रहने के बाद बगल की फैक्ट्री स्माल आर्म्स फैक्ट्री में करीब चार साल रहे। फिर वाहन निर्माणी फैक्ट्री जबलपुर (VFJ) में करीब चार साल रहे। मई , 2016 में पैराशूट फैक्ट्री, कानपुर (OPF) आये। यहां से नवम्बर, 2019 के अंत में तबादलित हुए और 3 दिसम्बर, 2019 को आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर (OCFS) के महाप्रबंधक बने। करीब दो साल सात महीने की महाप्रबंधकी के बाद वापस कानपुर आये जुलाई ,2022 में। छह महीने ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड (TCL) में रहने के बाद फील्ड यूनिट कानपुर (DFU Kanpur) आये फरवरी ,2023 में। यहीं से विदा हुए इसी 30 अप्रैल , 2024 को।
इस दौर की अनगिनत यादें हैं। ज्यादातर खुशनुमा कुछ कम खुशनुमा। कड़वी यादें भी कुछ रहीं लेकिन उनको हमने खाने में स्वाद बढाने वाले मसालों की तरह ही ग्रहण किया। उन तमाम यादों को कभी तरतीब से लिखने की कोशिश करेंगे।
फील्ड यूनिट कानपुर में विभिन्न निर्माणियों से आये हुए लोग थे। निर्माणियों ने अपने ‘छंटे हुए’ लोगों को फील्ड यूनिट को उपहार स्वरूप दिया था। हमारे पूर्ववर्ती अजय सिंह जी ने इसको बड़ी मेहनत संवारा और स्थापित किया। बाद में अपन ने मजे –मजे में काम किया। अपने साथियों के विविधता पूर्ण गुणों के कारण हम अपनी यूनिट को ‘शंकर जी की बरात’ कहा करते थे। बिना किसी जानकारी के तमाम काम निपटते रहे। बाद में एक मीटिंग के दौरान हमारे एक साथी ने अपने लोगों के बीच प्रचलित हमारा मजे का नाम बताया –“आपको हम लोग महादेव कहते हैं।“ इसका कारण उन्होंने यह बताया-“ आपके पास जो भी आता है आप उसके काम के लिए तथास्तु कह देते हैं और करने का पूरा प्रयास करते हैं।“
यह बात सुनकर हमको अपना अपना वर्षो पुराना लेख याद आया – ‘शंकर जी बोले –तथास्तु’। इस लेख के देवांशु Devanshu बड़े मुरीद हैं।
विदाई के मौके पर साथियों और मित्रों ने खूब उदार होकर तारीफ़ की। लगा कि देश में अमृत काल की तर्ज पर उस दिन तारीफ़ का अतिशयोक्ति काल चल रहा है। हमें लगा कि किसी और की तारीफ़ कर रहे हैं लोग मेरे नाम पर। एक जगह हमने कहा भी कि अब मैं रिटायर हो चुका हूँ वरना अपने खिलाफ गुणों से अधिक तारीफ़ के लिए जांच बिठा देता। सहजता , सरलता और सर्वसुलभ होने की तारीफ़ तो लोगों ने की ही। किसी ने स्थितिप्रज्ञ कहा किसी ने भलाइयों का देवता। एक मित्र ने अजातशत्रु भी कहा। अजातशत्रु वाली बात को मेरे एक दूसरे मित्र ने दिल पर ले लिया और अगले दिन छांट के हमको व्हास्सेप सन्देश भेजा – ‘If no one hates you, you are doing something boring’ अगर आपको कोई घृणा नहीं करता तो आप कोई बोरिंग काम कर रहे हैं।
हम यह तय करने की जहमत में नहीं पड़े कि इस सन्देश के माध्यम से हमारे प्रिय मित्र हमारे अजातुशत्र होने वाली बात पर वीटो लगा रहे हैं या कहना चाह रहे हैं कि हम बोरिंग इन्सान हैं । यह भी हो सकता है कि वे बता रहे हैं कि देखो हमने जिन्दगी में बोरियत से कैसे अपनी रक्षा की। इसी बहाने हमको समझ में आया कि दुनिया में तमाम घृणा बोरियत से बचने का उपाय है।
विदा करने के लिए दफ्तर के तमाम साथी फैक्ट्री के गेट तक आये। बाहर से भी कुछ साथी आये थे। रोज अकेले निकलते थे, 30 तारीख को सब लोग आये। शायद यह सुनिश्चित करने के लिए कि अगर घर जाने में आनाकानी करे तो धकिया के बाहर कर दिया जाए बाहर से भी कुछ साथी आये थे। कुछ लोगों को गाडी में बैठाकर लोग रस्से से गाडी खींचकर बाहर ले जाते हैं । रिटायर होने वाले लोग उसे अपनी लोकप्रियता समझते हैं । मेरी समझ में यह विदा होने वाले को घसीटकर बाहर करना होता है । एक बार किसी को घसीटकर बाहर कर दिया जाए तो वह दोबारा वापस आने की नहीं सोचेगा ।
बहरहाल 36 और एक माह की सरकारी सेवा के बाद पेंशनयाफ्ता होकर अकबर इलाहाबादी का शेर याद आ रहा है :
‘बीए किया नौकर हुए,
पेंशन मिली और मर गए।‘
अब जब इस शेर के तीन काम साथ साल की उमर तक पूरे हुए तो समानुपात के नियम से अगर किसी ने भांजी नहीं मारी तो आख़िरी काम पूरा होने तक कम से कम बीस साल तो मिलेंगे ही। इन सालों में क्या करेंगे आगे यह तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन फिलहाल खूब पढ़ने, घुमने-फिरने और यथासंभव लिखने का मन है। देखिये कितना कर पाते हैं।
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