Friday, June 14, 2024

दीपा से मुलाक़ात



दीपा से मुलाक़ात के लिए उसके घर की तरफ बढे हम । दो दिन पहले उसके घर का पता चला था । उससे मिलने गए तो पता चला सहेलियों से मिलाने गयी है । अगले दिन लौटेगी । उसके पति नीलू चौहान से मिले थे । अगले दिन आने की बात कहकर अपन लौट आये ।
अगले दिन शाम को जाने का प्लान था । लेकिन मित्रों के साथ घूमने चले गए । लौटना देर में होना था । फोन कर दिया दीपा को कि अगले दिन आयेंगे मिलने ।
घर के पास पहुचकर फोन किया । दीपा के पति नीलू चौहान नीचे आये । बताया कि दीपा अपने भाई के घर गयी है । आ जायेगी दोपहर तक । यह भी बताया –‘हमने कहा था कि अंकल जी आयेंगे मिलने । मत जाओ । लेकिन चली गयी ।‘
हम रुके कि वापस जायें सोच रहे थे कि नीलू ने मुझे ऊपर चलने का निमंत्रण दिया । हम गए । जमीन पर बिछे पतले गद्दे पर बैठकर बतियाने लगे । हाल-चाल पूछना हुआ । दो छुटके कमरे और एक बच्चा रसोई वाले घर में सामान बहुत कम । जरुरी से भी कम जरुरी टाइप । 2600 रुपये किराए के पड़ते हैं ।
दीपा को फोन किया तो उसने ग्यारह बजे आने को कहा । लेकिन फिर बोली अभी आते हैं । दस मिनट में ।
दस मिनट में मिनट में कुछ और मिनट लगाकर दीपा आई । अपने भाई के साथ । भाई को मैंने पहले कभी देखा नहीं था । उग्र, आक्रामक , चेहरे पर गुस्सा ,लहजे में नाराजगी का भाव । बताया कि बाप से पटती नहीं थी । उसकी दारु पीने की आदत से नाराजगी थी । पिता के मरने का कोई अफसोस नहीं था –‘मर गया अच्छा हुआ’ जैसी कुछ बात भी कही उसने ।
दीपा ने आने पर हाथ मिलाया । मुस्कराई । पास ही दीवार से टिककर बैठ गई । हमने कहा –‘तुम तो बहुत बड़ी हो गयी । शक्ल एकदम बदल गयी ।‘
उसने भी कुछ कहा । बात दीपा के मोबाइल ज्यादा उपयोग की भी होने लगी । पता चला रील्स बनाती है । सहेलियों से बात करती है । पति का मोबाइल अपने पास रखती है ।
हमने पूछा –‘रील कैसे बनाती हो? हमको तो आता नहीं बनाना ।‘
दीपा ने फ़ौरन मोबाइल का लाक खोलकर एक ठो रील बनाई । भौंहे इधर-उधर करते हुए । हमको दिखाई ।
हमने पूछा –‘ये रील्स किसलिए बनाती हो? ‘
उसने बताया कि रील्स से कमाई भी होती है । हमने बताया कि रील्स से कमाई के लिए लाखों फालोवर होने चाहिए । तुम्हारे कितने हैं? उसने दिखाया अपना खाता । उसके लगभग 1400 फालोवर थे ।
देश के लाखों युवा इसी भ्रम में रीलबाजी में जुटे हुए हैं कि इससे उनको कमाई होगी । अपना समय इसी में बरबाद करते हैं । कुछ बच्चों को तो मैं देखता हूँ कि वे देर रात तक रील्स बनाते हैं । न कोई कंटेंट , न कोई देखने लायक मसाला । सिर्फ इधर-उधर की अदाएं दिखाकर रील्स बनाते हुए काल्पनिक कमाई के ख्वाब में डूबकर रीलबाजी करते रहते हैं ।
कमाई से ज्यादा शायद उनको अपनी पहचान बनने, फालोवर होने का खुशनुमा एहसास प्रेरित करता होगा यह काम करने में।
दीपा को रील बनाते देख उसका भाई नाराज सा हो गया । बोला –‘ज्यादा रील-फील न बनाया करो। फोड़ देंगे मोबाइल-सोबाइल किसी दिन।‘
भाई की बात से बेपरवाह थी दीपा। चार साल बड़ा है दीपा से। भाई ऑटो चलाता है । महीने में बारह-पंद्रह हजार कमा लेता है । शादी नहीं हुई है अभी । कुछ देर में भाई चला गया ।
दीपा के पति को काम पर जाना था। दीपा के साथ कुछ फोटो लिए। दीपा ने विक्ट्री का निशान बनाया। हमने नीलू से भी बनाने को कहा । दीपा ने मना कर दिया । बोली –‘इनको नहीं आता बनाना।‘
इसके पहले चाय की बात हुई । दीपा के पति ने दीपा से कहा –‘दूध ले आओ । अंकल को चाय पिलाओ ।‘
दीपा ने कहा –‘तुम ले आओ दूध ।‘
उसके कहा –‘तुम ले आओ ।‘
हमने कहा –‘रहन देव । कोई न लाओ । हम चाय नहीं पीयेंगे ।‘
यह सुनकर दीपा उठी और दूध लेने चली गयी । लौटी थोड़ी देर में तो हाथ में एक छुटकी पेप्सी की बोतल और दूध का पैकेट था । हमको पेप्सी दी पीने के लिए ।
हमने मना किया –‘हम पेप्सी नहीं पीते । तुम पी लो ।‘
कुछ देर में चाय बनाकर लाई दीपा । हम लोग चाय पीते रहे । दीपा ने पेप्सी पी ।
थोड़ी देर में दीपा का पति नीलू चला गया काम पर । पास ही एक लोहा फैक्ट्री में काम करता है । सुबह नौ से शाम आठ तक की ड्यूटी के तीन सौ रोज के हिसाब से काम । प्राइवेट फर्मों में अमूमन यही रेट है दिहाड़ी का जबलपुर में ।
नीलू के जाने के बाद कुछ देर और बात होती रही दीपा से । उसने कहा –‘पापा के न रहने के कारण हमारी पढ़ाई नहीं हो पायी । वो होते तो हम पढ़ते रहते । उनके न रहने से पढ़ाई बंद हो गयी ।‘
शायद क्लास छह तक हुई है पढ़ाई दीपा की ।
हमने कहा –‘अब स्कूल में पढ़ना तो मुश्किल है । लेकिन अपने आप पढो । कौन सी किताब पढ़ना है बताओ । हम भेज देंगे ।‘
उसने कहा –‘हमको गणित पढना है ।‘
हम बोले –‘ठीक है पढ़ना । हम भेज देंगे किताब ।‘
उसके घर में पंखा नहीं है । गरमी में रहती है वो । उसके पति ने भी बताया था कि पंखे के लिए पैसे जमा कर रहे थे लेकिन इसका मोबाइल टूट गया तो वो बनवाया । उसमें खर्च हो गए पैसे ।
मोबाइल आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत हो गया है।
हमने कहा –‘तुमको पंखा खरीद देंगे । साइकिल भी ले देंगे । क्या चाहिए पहले पंखा कि साइकिल ?’
वो बोली –‘पंखा ।‘ इसके बाद बोली –‘किताब दिला दीजिये पहले ।‘
हमने कहा- ‘ ठीक ।सब दिला देंगे।’
एक मित्र का फोन आया इस बीच । वे हमारा इन्तजार कर रहे थे । दीपा के साथ बाहर आये । उसके साथ सेल्फी ली । कुछ पैसे दिए । उसने मना किये लेकिन फिर हमने जबरदस्ती दिए तो ले लिए । बाद में बताया कि उससे अपने कुछ कपडे लाई है ।
बाद में अपने दोस्त Sagwal Pradeep के हाथ रात को पंखा भेजा । उसके यहाँ लग भी गया । अब दीपा के लिए किसी काम का इंतजाम करना है । जबलपुर के दोस्तों को बोला है । आशा है उसे भी कुछ काम मिल जाएगा ।
एक बच्ची की जिन्दगी से थोड़ा जुड़ने के बाद एहसास होता है कि गरीबी और अभाव का जीवन क्या होता है । पनपने के पहले ही तमाम ताकते उसको मुरझाने के लिए ताकतें लगाती हैं । कोई बच्चा अपनी पढ़ाई न पूरी कर पाए इससे बड़ी असफलता किसी समाज के लिए और क्या हो सकती है ?
दीपा की जिन्दगी में लफड़े और भी हैं । उसका आधार कार्ड खो गया है । नंबर याद नहीं । इसका उपाय अमित चतुर्वेदी Amit Chaturvedi ने बताया कि फिंगर प्रिंट से आधार नम्बर पता चल जाएगा । उसके बाद मोबाइल नम्बर बदल कर नया आधार कार्ड बन जाएगा । बताया है दीपा को । वह कह रही थी कि उसको पता है आधारताल में सर्विस सेंटर है । वहां जाकर बनवायेगी । लेकिन इस बीच उसका नाम भी बदल गया है । दीपा से शिवानी हो गया है नाम । सबका जोड़-तोड़ , मिलान कैसे होगा ।
लेकिन होगा । कुछ न कुछ तो होगा ही । ऐसे ही होता है कुछ न कुछ । ऐसे ही होता है सब कुछ ।

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Thursday, June 13, 2024

पुलिया पर बतकही



सुबह नीद खुलते ही चाय मंगाई। कड़क चाय। चाय पीकर टहलने निकले। साथी लोग अभी सो रहे थे शायद। कोई बाहर दिखा नहीं। हो सकता है वे भी चाय-वाय पीते हुए या इन्तजार करते हुए जगने की/उठने की कोशिश में लगे हों। जड़त्व का नियम जड़/चेतन सब पर सामान रूप से लागू होता है। जो वस्तु जिस अवस्था में है उसी में बनी रहती है जब तक उस पर बाहरी बल न आरोपित किया जाए।
मेस से बाहर निकलते हुए सड़क पर आते-जाते-टहलते लोग दिखे। कोई तसल्ली से , कोई हडबडी में। दोनों पुलिया आबाद थीं।
सर्वहारा पुलिया पर राजनीति का चैनल चालू थी। स्वत: स्फूर्त। किसी एंकर की जरूरत के बिना ही बहस/ बतकही जारी थी। बतकही काफी देर से चालू थी। हमने जब श्रोता के रूप अपनी मौजूदगी दर्ज की तो सुनाई पड़ा :
-नीतीश कुमार की तो लाटरी लग गयी।
-खुद मुख्यमंत्री ही रहेगा। केंद्र में अपना आदमी बैठायेगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ेगा। यहीं से चलाएगा अपना दांव।
-मोदी का मुंह इत्ता सा रह गया एक ने हथेली को चोंच की शक्ल में दिखाते हुए कहा।
-बहुत अकड़ता था। बहुत बोलता था। दूसरी पार्टी के लोगों को छोड़ दो, अपनी पार्टी तक के लोगों से कायदे से बात नहीं करता था। अब सब नचाएंगे। देखना खेल। मजा आयेगा।
बातचीत करते हुए नेताओं का नाम आत्मीयता से लेते हुए उनके नाम के आगे ‘वा/या’ लगाते हुए राजनीतिक कमेंट्री करते रहे पुलिया पर बैठे लोग।
पुलिया, नुक्कड़, चौराहे ,चौपाल किसी भी समाज के थर्मामीटर , बैरोमीटर होते हैं। समाज का ताप और दाब बताते हैं।
बतियाने वाले वीएफजे, जीआईऍफ़, जीसीऍफ़ और खमरिया से रिटायर्ड लोग थे। कामगार। बातचीत से अंदाज लग रहा था कि बिहार के मूल निवासी हैं। काम-धाम के लिए जबलपुर आये और फिर यहीं बस गए। रोजी-रोजगार के लिए इंसान कहाँ –कहाँ नहीं भटकता है। दुनिया में विस्थापन का सबसे बड़ा कारण नौकरी रहा है। स्थायित्व की तलाश में इंसान स्थाई रूप से भटकता रहता है।
हमने उन लोगों से छट्ठू सिंह और उनके साथियो के बारे में पूछा जो आठ साल पहले यहाँ टहलते हुए मिलते थे। किसी को उनके बारे में पता नहीं था। पुलिया और उसके आसापास के तमाम किरदारों के बारे में सोचते रहे कि शायद कहीं टहलते हुए दिख जाएँ। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। रोहिणी सिंह जो अक्सर यहाँ टहलती दिखती थीं वो भी शायद कहीं और चली गयीं हों। अब तो वो पीएचडी करके डाक्टर हो गयी हैं। मिलती तो चाय पीते, मिठाई खाते ।
सामने सर्वहारा पुलिया पर एक अकेला इंसान बैठा था। कुछ अनमना सा। नाम बताया ओमप्रकाश। वीएफजे रिटायर हुए थे। कुछ देर उनसे बतियाने के बाद आगे बढ़ गए।
टहलते हुए मेन रोड तक चले गए जो बाईं तरफ रांझी , खमरिया चली जाती है। दायीं तरफ जीसीऍफ़ होते हुए रेलवे स्टेशन। यहीं दायीं तरफ पंकज टी स्टाल पर बजाते रेडियो पर गाना सुनते हुए चाय पीते थे। एक के बाद दूसरा गाना सुनते हुए चाय पीते। अक्सर एक चाय खत्म करने के पहले ही दूसरी आर्डर कर देते थे। यहीं कई चरस पीने वाले मिलते थे और चरस वाली बीडी पीते हुए चरस की खासियत बताते थे। एक चरस प्रेमी ने धुँआ उड़ाते हुए बयान जारी किया था –‘चरस दिलखुश नशा है।‘
पंकज की चाय की दूकान बंद थी। बोर्ड भी नदारद। काउंटर पर चाय की केतली की जगह एक आदमी बैठा था। बगल की दूकान वाले ने बताया कि बहुत दिन हुए बंद हो गयी उनकी दूकान। अगल-बगल की दुकाने अलबत्ता आबाद थीं। सामने ही जलेबी छन रहीं थी। बगल में पोहा जलेबी का काउंटर भी खुला था। लेकिन अपन तो चाय पीने आये थे। पंकज टी स्टाल जो कि भूतपूर्व हो चुकी थी उसकी दूकान के बगल वाली दूकान से चाय पी और पलट लिए।
रास्ते में एक दुकान में रुके। सोचा दीपा के लिए चाकलेट ले लें। पहले कभी –कभी ले जाते थे। आठ साल बाद मुलाक़ात के जाते हुए यह बात याद आई। दूकान पर चाकलेट थी नहीं। साँची के पड़े थे , ले लिए और कुछ टाफी। आठ साल का समय बीत गया इस बीच। अब बड़ी हो गयी है लेकिन हमारी याद में वह बच्ची ही थी अभी तक।
शोभापुर क्रासिंग के आगे दायीं तरफ मुड़कर थोड़ी ही दूर पर रहती है दीपा। उसके घर की तरफ जाते हुए एक नल पर कुछ लोग पानी भरते हुए दिखाए दिए। एक महिला अपना प्लास्टिक का डब्बा नल के मुंह से सटाए हुए बैठी थी। पास से देखा तो नल का पानी डब्बे में भरता जा रहा था। हम आगे बढ़ गए। दीपा से मुलाक़ात की उत्सुकता हो रही थी हमको।

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Saturday, June 08, 2024

जबलपुर की सुबह



आज सुबह टहलने निकले। जबलपुर में आठ साल बाद। साइकिल नहीं थी आज। पैदल निकले।
पुलिया पर कोई बैठा नहीं दिखा। सड़क पर लोग टहलते दिखे। बच्चे साइकिल चलाते। एक आदमी साइकिल सड़क किनारे खड़ी करके कुछ कसरत कर रहा था। एक महिला पुलिया पर बैठी अनुलोम-विलोम करती दिखी।
स्कूल के मैदान में बच्चे पीटी कर रहे थे। अलग-अलग समूहों में अलग-अलग ड्रेस में। मास्टर लोग उनकी निगरानी कर रहे थे।
रॉबर्टसनलेक की तरफ गए। रास्ते में तीन महिलाएं खड़ी बतिया रही थीं। कुछ घर गृहस्थी की बातें। सास-बहू वाली सलाहें।
रास्ते ने एक मरे हुए मेढक को चीटियाँ टुकड़ों में घसीटती ले जाती दिखीं। मेढक का सर गायब था। बाकी हिस्से पर चींटियों की टीम लगी हुई थी। कुछ देर में मेढक का सफाया हो जाएगा।
झील में पानी किनारे पर कम था। पानी में हरियाली थी। घास-फूस जमी थी। दूर नावें चलती दिखी पानी में। सूरज की किरणों ने पानी को पालिश करके चमका सा दिया था। उजाले के फेशियल से झील का चेहरा चमक रहा था।
लौटते में देखा एक आदमी बनियाइन पहने बिना हेलमेट के स्कूटर दौड़ाए लिए जा रहा था। स्कूटर के पीछे 'पुलिस' लिखा देखकर हमने उसकी फोटो लेने का इरादा बदल दिया।कौन बवाल मोल ले।
सड़क पर खड़े कुछ आदमी कहीं घूमने जाने की योजना बना रहे थे। एक आदमी को कहते सुना -'अरे अमरनाथ और बद्रीनाथ अलग-अलग जगह हैं। उनके टिकट अलग लेने पड़ेंगे।'
मैदान जहां कभी लोग क्रिकेट खेलते और लड़ते-झगड़ते दीखते थे वहां बढ़िया आफ लाईन टेस्ट ट्रैक बना हुआ था। AVNL कंम्पनी के टेस्ट ट्रैक में गाड़ियों की चलने की टेस्टिंग होती होगी।
शोभापुर रेलवे क्रासिंग ओवरब्रिज बन गया है। ओवरब्रिज के बगल की सड़क से क्रासिंग तक गए। क्रासिंग एकदम बंद हो गयी है। बगल की सड़क से रेलवे लाइन के नीचे से रास्ता गया है। लेकिन पैदल चलने वाले लोग रेलवे की पटरी क्रॉस करके ही आते-जाते दिखे। सवारी वाले अलबत्ता नीचे से जा रहे थे।
ओवरब्रिज के नीचे उस जगह गए जहां दीपा अपने पापा के साथ रहती थी। पापा उसके रिक्शा चलाते थे। कुत्ता भी साथ में था। दीपा स्कूल जाती थी। हम उससे मिलने जाते थे। उसके बारे में लिखते थे।
दीपा के रहने की जगह खाली थी। बगल में सीमेंटेड पाइप लाइन के ऊपर गद्दा बिछाए आराम करते आदमी से दीपा के बारे में पता किया तो वहीं खड़े एक आदमी ने बताया कि दीपा के पिता की गैंग्रीन से मौत हो गयी। दीपा पास ही के एक घर में रहती है।
हम दीपा से मिलने की सोचते हुए लौटे। रास्ते में पहाड़ पर खाना बनाते, पानी लाते-ले जाते लोग दिखे। सब आसपास के गांवों-कस्बों से आये थे। मेहनत-मजदूरी करने। यहीं पहाड़ पर अस्थाई निवास बना लिया है। बरसात में घर चले जाते हैं।
एक आदमी जल्दी-जल्दी दाल-भात बनाकर थाली में डालकर खा रहा था। उसके पास तसल्ली से बीड़ी पीते आदमी ने बताया कि उसको दूर जाना है , रद्दी चौकी की तरफ मजदूरी के लिए। इसीलिए जल्दी पका-खाकर जा रहा है।
दूर बैठी एक महिला शीशे में मुंह देखकर अपनी चोटी करती हुई पास जलते चूल्हे में लकड़ी खिसकाती जा रही थी। बटलोई में कुछ बन रहा था। एक के चूल्हे में कुकर चढ़ा था।
गुंडम से आये आदमी ने बताया कि उनके यहां सिचाई का साधन नहीं। इसीलिए फसल ठीक नहीं होती। इसीलिए शहर आना पड़ता है कमाने।
सरकारों के प्रति कोई गुस्सा नहीं इस बात के लिए कि उनके यहां सिंचाई के लिये कोई इंतजाम नहीं। दुष्यंत कुमार का शेर याद आया :
न हो कमीज तो पांवों से पेट भर लेंगे,
बहुत मुनासिब हैं ये लोग इस सफर के लिए।
रास्ते में एक बच्चा अपनी साइकिल पर प्लास्टिक की बाल्टियों में पानी लादे ले जाते दिखा। उसकी छुटकी साइकिल के हैंडल पर टंगी पानी की बाल्टियां हिल रहीं थीं लेकिन बच्चा बहादुरी के साथ उनको थामे था। बच्चे की मां जिसने बाल्टियां हैंडल पर लादी थीं , वह संतोष के भाव से बच्चे को पानी ले जाते देख रही थी।
दीपा का पता पूछते हुए जिस घर पर पहुंचे वह एक स्थानीय कांग्रेसी पदाधिकारी का है। नाले के किनारे बना घर। खुला नाला जिसमें वर्षों की गंदगी जमा थी।
घर के बाहर कुत्ते से सावधान का बोर्ड लगा था। हमने सावधान होकर गेट खड़खड़ाया। कुत्ते ने भौंकते हुए हमारी सावधानी का इम्तहान लिया और कुछ देर तक भौंककर चुप हो गया।
सीहोरे जी से दीपा के बारे में पूछा तो विवरण जानकर उन्होने बताया कि दीपा उनके यहां अपने पति के साथ रहती है। दीपा की शादी की बात सुनकर हमको थोड़ा ताज्जुब हुआ। मेरी नजर में वह अभी बच्ची ही थी। आठ साल पहले स्कूल जाती थी। उसकी शादी हो गयी।
दीपा के पति से मुलाकात हुई। पता चला कि दीपा शहर गयी है अपनी सहेलियों से मिलने। कल आएगी। दीपा के नम्बर पर बात करने की कोशिश की लेकिन हर बार कट गया। शायद ऐसी जगह होगी जहां नेटवर्क न मिलता हो।
दीपा से कल मुलाकात की बात तय करके अपन लौट लिए।

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Friday, June 07, 2024

एक बार फिर पुलिया पर



एक बार फिर जबलपुर आना हुआ। पूरे आठ साल एक महीना और सात दिन बाद । 30 अप्रैल, 2016 को जबलपुर से कानपुर जाते समय तुरन्त लौटकर आने का प्लान था। प्लान बदलता गया और आठ साल निकल गए। इस बीच कानपुर, शाहजहांपुर होते हुए वापस कानपुर आकर रिटायर भी हो गए।
जबलपुर आने की खबर जानकर दोस्त लोगों ने स्टेशन आने के लिये कहा। गाड़ी सबेरे साढ़े पांच बजे पहुंचती है। हमने सबको मना कर दिया। लेकिन प्रदीप Sagwal Pradeep जबरियन आ गए। स्टेशन से उठाकर मेस तक लाये।
रिटायर इंसान की बात लोग मानते कहाँ हैं।
प्रदीप-आस्था के साथ हम लोग लंबे समय तक मेस में रहे। अपन ने रहने के लिए वही कमरा खुलवाया जिसमें चार साल रहे थे। कमरा नम्बर 14 । बताया गया कमरे का एसी खराब है। हमने कहा कोई बात नहीं। बन जायेगा। रहेंगे इसी कमरे में। चार साल रहे हैं इस कमरे में। इसी में रहेंगे।
कमरा खुल गया। सामान जमा लिया। दरवज्जा खोलकर बैठे हैं। सूरज भाई अपनी किरण-उजाला के कुनबे के साथ हमको देखकर मुस्करा रहे थे।
अजय कुमार राय Ajai Kumar Rai बनारस के लिए निकलने वाले थे। बहुत छुटकी मुलाकात हुई। आठ साल के भूले-बिसरे गीत आठ-दस मिनट में गा लिए गए।
अजय राय और प्रदीप के साथ शुरआती चाय पानी के बाद उनको विदा करके पुलिया की तरफ गए।
पुलिया के पहले एक आदमी अपना स्कूटर खोले स्टार्ट करने में जुटा था। किक पर किक मारे जा रहा था लेकिन स्कूटर स्टार्ट ही नहीं हो रहा था। स्कूटर वाला झुककर उससे विनती सरीखी करता हुआ किक मारे जा रहा था।
पुलिया पर एक आदमी बैठा था। हाथ में पट्टी बंधी हुई थी। यही बातचीत की शुरुआत का बहाना बनी। हमने पूछा -'चोट कैसे लगी?'
कूलर ठीक कर रहे थे। सीट लग गयी।
नाम,काम-धाम पूछने पर पता चला कि वीएफजे से रिटायर हुए हैं 2017 में। नाम इतवारी लाल। इतवार को पैदा होने के कारण नाम पड़ा इतवारी लाल। पिता खरिया में काम करते थे। इतवारी लाल एम पी वी में स्टोर का काम देखते थे। सामान रखने, इशू करने का।
सामने वाली पुलिया पर कोई था नहीं। सुबह लोग बैठते होंगे। कल देखेंगे।
लौटते हुए देखा स्कूटर वाला चला गया था। स्कूटर स्टार्ट हो गया होगा।
अपन भी स्टार्ट हो गये जबलपुर में।

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Monday, June 03, 2024

चाह गयी चिंता मिटी,मनुआ बेपरवाह



आज सुबह टहलने निकले तो गेट के बाहर ही कुत्ते भौंकते दिखे। ऐसा लगा कि किसी बड़े चैनल में प्राइम टाइम बहस हो रही हो। थोड़ी देर में अपने आप शांत भी हो गए जैसे बहस के बीच कमर्शियल ब्रेक होने पर होता है।
थोड़ा आगे सड़क पर पत्तियां बिखरी हुई थी। मानों यूकेलिप्टिस के पेड़ ने हमारे रास्ते में पलक पांबड़े बिछा दिए हों। वीआईपी भाव ने मन पर क़ब्ज़ा कर लिया।
एक मोर सड़क पर इतराता हुआ टहल रहा था। ऐसे जैसे सड़क रैम्प हो और वह कोई सुंदर मॉडल। टहलते हुए मोड़ उचककर एक घर के अंदर टहलने लगा।
पार्क के पास कुछ बच्चे नीचे उतरकर पोज देते हुए पालथी मारकर बैठे फोटो खिंचा रहे थे। टेढ़े होते हुए उँगली से वी बनाते हुए। फोटोबाजी के बाद बच्चे चले गए।
टहलते हुए उस जगह से गुजरे जहां शाखा लगती है। पुलिया पर बैठे हुए दो बुजुर्ग एक्जिट पोल की चर्चा करते हुए अपने जननायकों को ठेठ अंदाज में गरियाते हुए याद कर रहे थे। गाली निकालकर कुछ डायलॉग जो याद रह गए:
-अरे उसने पेंशन बंद करवा दी।
-अब तो मर गया वो।
-अरे ये भी जाएगा। मरेगा। दस साल से आंख मूंदे बैठा है। कुछ करना धरना नहीं बस झूठ बोलवा लेव।
इसके बाद मुफ़्त बंटने वाले अनाज की खराब क्वालिटी, महंगाई और दीगर समस्याओं का जिक्र करते हुए सरकार के प्रति मुक्तकंठ , सेन्सरविहीन प्रेम प्रदर्शन करते रहे दोनों बुजुर्ग। अपन चुपचाप उनके द्वारा अभिव्यक्ति के अधिकार का उपयोग होते सुनते रहे।
अपन तमाम सरकार समर्थक मित्रों की बातें भी इसी तरह सुनते रहते हैं। आजकल दुनिया में हर बात के समर्थन में अनगिनत रेडीमेड तर्क सर्वसुलभ हैं। हाल यह कि इंसान अपना कत्ल करने वाले के पक्ष में भी तर्क करते हुए अपनी गर्दन उसके सामने झुकाने में लिए तैयार रहता है -'ले भाई काट ले गर्दन मेरी बिना किसी संकोच के।'
शाखा में एक नए बुजुर्ग का स्वागत पहले से मौजूद बुजुर्गों ने 'युवा साथी' कहते हुए किया। मेसेजिंग घराने की बातचीत का पुराना चलन है यह। बिना ‘बेबी’ कहे लोगों को जवानी का एहसास नहीं होता।
सारे ‘बुजुर्ग बेबी’ लोग आपस में मजे लेते हुए बतियाने लगे। अपन बाहर निकल आये।
पार्क में कुछ बच्चे क्रिकेट खेलने के लिए टीम बना रहे थे। टीम बनाने के बाद बच्चों ने चंदा जमा करके 'दांव'लगाया। दस-दस, बीस-बीस रुपये इकट्ठा करके सौ रुपये का 'दांव'लगाया एक टीम ने। दूसरी ने उकसाते हुए कहा -'अरे, बढा के दांव लगावो यार।'
लेकिन शायद उस टीम के साथियों के पास और पैसा नहीं था इसलिए दांव आगे नहीं बढ़ा।
खेल शुरू हुआ। ओपनिंग करने वाले बच्चे ने पहले ओवर में ही 20 रन बना डाले। बॉलर बिना विचलित हुए गेंद फेंकता रहा। ईंटो का विकेट था। एक बच्चा गेंदबाज के पास से अंपायरिंग कर रहा था। दूसरा अंपायर विकेट के पीछे फिसलपट्टी पर बैठा लेग अंपायर का रोल निभा रहा था।
दूसरे ओवर की पहली गेंद टेढ़ी-मेढ़ी पड़ी। उस पर भी छक्का पड़ गया। कप्तान ने पहली गेंद के बाद ही बॉलर बदल दिया। खेल आगे बढ़ गया। अपन भी।
रास्ते में यूट्यूब पर जस्टिस काटजू जी का इंटरव्यू सुनते गए। काटजू जी अपने अंदाज में बोल रहे थे। किसी सवाल के जवाब में एंकर को हड़का भी दे रहे थे-'आप सुनती तो हैं नहीं। हम जवाब दे तो रहे हैं।'
काटजू जी के बेबाक इंटरव्यू के खत्म होने से पहले एंकर ने पूछा -'आप सरकार की इतनी खिलाफत करते हैं। कहीं आपके खिलाफ कोई कार्रवाई हो गई तो क्या होगा।'
काटजू जी ने जबाब में दोहा सुनाया:
चाह गई, मिटी , मनुआ बेपरवाह,
जिनको कछू न चाहिए, वे शाहन के शाह।
(इंटरव्यू का लिंक टिप्पणी कमेंट बॉक्स में)
हमारा भी मन करता है कि अपन भी अपना यूट्यूब चैनल शुरू करें। रोजनामचा का वीडियो बनाया करें। लेकिन फिर सोचते है कि इतने यूट्यूब चैनल चैनल चल रहे हैं। एक ठो और चालू करके ध्वनि प्रदूषण फैलाने से क्या फायदा। लिखना होता रहे नियमित यही बहुत है।
है कि नहीं?

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Friday, May 31, 2024

ईमानदार आदमी बेवकूफ होता है


आज सुबह नींद खुली साढ़े तीन बजे। मतलब तब जब ब्राह्ममुहूर्त भी ड्यूटी पर हाजिर नहीं हुआ था। कई लिखाई-पढ़ाई के काम याद आए। उनको याद करके फिर पलट के सो गए। सोचा थोड़ा और सो लिया जाए फिर उठा जाएगा।मतलब नींद की 'एक बाइट' और ले ली जाए।
थोड़ा सोने के बाद नींद खुली तो पांच बज गए थे। मतलब नींद की 'एक बाइट डेढ़' घण्टे की हुई।
'नींद की बाइट' भी हर एक के लिए अलग-अलग होती है। किसी की घण्टे भर की, किसी की पांच मिनट की। जितनी देर में घण्टे भर की 'नींद की बाइट' वाला एक बाइट लेता है उतनी देर में पांच मिनट की बाइट वाला दर्जन भर बाइट ले लेता होगा। कभी-कभी घण्टे भर की नींद की बाइट वाला इंसान भी पांच-पांच मिनट की नींद की बाइट ले लेता होगा।
यह तो बात हुई नींद की। उनके क्या हाल होते होंगे जिनको नींद नहीं आती या कम आती है। उनकी भी क्या 'उनींदे' की 'अनींद' की बाइट होती होगी?
जगने के बाद टहलने निकले। सड़क पर इक्का-दुक्का लोग टहल रहे थे। पंछी हल्ला मचा रहे थे। क्या पता कह रहे हों हमारा नाम लेते हुए -'निकल लिया, निकल लिया आज भी टहलने निकल लिया।'
सामने से एक महिला बीच सड़क पर टहलती आ रही थी। हाथ में छुटका तौलिया लिए थी। शायद पसीना पोंछने के लिए। पसीना अभी आया नहीं था लेकिन महिला तौलिया चेहरे पर घुमाती जा रही थी। शायद पसीना सुखाने की नेट प्रैक्टिस कर रही हो। यह भी हो सकता है सम्भावित पसीने को धमका रही हो-'ख़बरदार, जैसे ही निकले, सुखा दिए जाओगे।'
एक दूसरी महिला टहलते हुए बगल से गुजरी तो दिखा की उसके कान में ईयरप्लग ठुंसा था और वह कोई प्रवचन टाइप सुन रही थी। बगल से गुजरते हुए प्रवचन के बोल मेरे भी कानों में जबरियन धंस गए। प्रवचनिया कह रहा था-'काम, क्रोध, मद, लोभ से बचकर रहना चाहिए।' महिला जब यह सुन रही थी तब वह इन सभी तथाकथित विकारों से एकदम मुक्त थी।
कोई इंसान जब काम, क्रोध, मद, लोभ आदि विकारों से मुक्त हो तब उसको उनसे बचने के लिए कहा जाए तो सहज रूप से इनके बारे में जो सोचेगा।
आगे के पार्क के बाहर पुलिया पर बैठे कुछ लोग अपने शरीर को टेढ़ा-मेढ़ा करते हुए बतिया भी रहे थे। एक की आवाज सुनाई पड़ी -'ईमनदार आदमी को कमजोर समझते हैं। सब समझते हैं कि ईमनदार आदमी बेवकूफ होता है। पहले ऐसा नहीं होता था।' 'ईमानदार' को 'ईमनदार' कहते हुये पूरे आत्मविश्वास से ईमानदारी को बेवकूफी का सीधा कनेक्शन करवा रहे थे।
अगले ने भी कुछ कहा होगा। हम सुन नहीं पाए। हमको बस यही दिखा कि वह अपने पेट को कपड़े की तरह निचोड़ते हुए कसरतिया रहा था।
वहीं सामने के पार्क में कुछ महिलाएं भी बच्चों के साथ हाथ और पेट घुमाते हुए कसरत कर रहीं थीं।
आगे एक आदमी अपनी दोनों चप्पल हाथ में लिए आता दिखा। हमें लगा शायद किसी नागवार गुजरती बात पर बिना समय बर्बाद किये चप्पलियाने के इरादे से वह चप्पल हाथ में लिए था। लेकिन बात करने पर पता चला कि उसको डॉक्टरों ने नंगे पैर चलने के लिए बोला है। उसकी मजबूरी को हम उसकी मजबूती समझ लिए थे।
चौराहे पर एक 'स्लिमिंग सेंटर' वाले अपना होर्डिंग लगाए खड़े थे। पतला होने की तरकीब बताने के लिए। कोर्स करवाने के लिए। एक आदमी ने अपना पुराना फोटो दिखाया जिसमें वह काफी स्वस्थ दिख रहा था। अभी वह 'स्लिम-ट्रिम' टाइप दिख रहा था। बताया कि ये थे ये हो गए हैं। हमको बोला -'खाली टहलने से नहीं होगा। खानपान ठीक करना होगा।'
अपन आगे बढ़ गए। हड़बड़ी में वजन नहीं कम करना। फैट बुरा मान जाएगा। आहिस्ते से कम करेंगे। फुसलाते हुए। इतने दिन साथ दिया उसने मेरा। अब हम उसको झटके से दफा कर दें। ऐसे बेवफा हम हरगिज नहीं।
लौटते हुए एक रेलिंग पर कुछ बच्चे बैठे दिखे। कल भी दिखे थे लेकिन कल बात नहीं हुई थी। आज पास खड़े होकर बात की। पता चला कि स्कूल के घरों में रहते हैं। टहलने आये हैं तो आराम करने के लिए बैठ गए रेलिंग पर।
रेलिंग पर बैठना बच्चों के थकने से ज्यादा बतियाने की मंशा से रहा होगा। तसल्ली से बतिया रहे थे वे। एक बच्चा अपना मोबाइल में कोई वाल पेपर छांट रहा था। हमने सबको रेलिंग पर बिठाकर फोटो खींचा। दिखाकर कहा -'इसे बना लो वाल पेपर। बच्चे मेरी बात पर हंसने लगे। हमको लगा कि देश में हमारा जिक्र करते हुए इस बात पर बहस न छिड़ जाए कि एक और भी नमूना है देश में जिस पर लोग हंसते हैं।
एक बच्ची के हाथ में एक छोटा पक्षी दुबका सा बैठा था। बच्चों ने उसे रास्ते से उठाया था। पक्षी की पीठ में हल्का सा घाव था। उसकी हड्डियां दिख रहीं थीं। शायद किसी बड़े पक्षी ने उस पर हमला किया होगा। बच्ची कह रही थी-'इसे घर ले जाएंगे। इलाज करेंगे।'
बच्चों से बात करने के बाद घर लौट आये। हमको पुलिया पर बैठे आदमी की बात याद आ रही है-'ईमानदार आदमी बेवकूफ होता है।'
क्या सच में ऐसा होता है?

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Tuesday, May 28, 2024

मुस्कान अभी तक टैक्स फ्री है

  


सबेरे-सबेरे टहलते हुए बड़े रोचक नजारे दिखते हैं। दिखते तो हर समय हैं लेकिन टहलने का काम आमतौर पर सुबह होता है तो उसी समय दिखते हैं।
सुबह टहलने निकले तो सामने से एक जोड़ा आता दिखा। उनके अंदाज-ए-टहलाई से लगा कि मियां-बीबी रहे होंगे। साथ-साथ टहलते हुए भी दोनों के बीच इतनी दूरी थी कि उनके बीच से एक पूरा परिवार निकल जाए। कोरोना काल की टहलाई कर थे। दूरी अलबत्ता दो की जगह चार से भी ज्यादा गज हो गयी थी।
दूसरे जोड़े ने अगल-बगल की दूरी को आगे-पीछे की दूरी में बदल दिया था। पति आगे, पत्नी पीछे। अनुगामिनी सी। ऐसा नहीं कि मियां की स्पीड तेज हो, बीबी की धीमी। दोनों समान गति से एक दूसरे से समान दूरी बनाए टहल रहे थे।
एक आदमी कुत्तों के साथ टहल रहा था। कुत्ते उसके इशारे पर जीभ निकाले इधर-उधर मुंह करते टहल रहे थे। कुत्ते उछल-कूद करते हुए अपनी मर्जी से टहलने का नाटक कर रहे थे लेकिन चल आदमी के पीछे ही रहे थे। कुत्तों की हरकतें किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के इशारे पर चलती सरकारों सरीखी लग रही थीं जो नाटक भले अपनी जनता के भलाई का करें लेकिन नीतियां उन कम्पनियों की अनुमति से ही बनाती हैं जिनके चंदे से वे सत्ता में आईं हैं।
सरकारें भी एहसान फरामोश होने से परहेज करती हैं।
टहलते हुए नहर किनारे चले गए। जगह-जगह छठ पूजा की शुभकामनाओं के होर्डिंग लगे थे जिनको विधायक निधि से बनवाया गया था। ताकतवर जनप्रतिनिधियों की शुभकामनाओं की इतनी भरमार देखकर लगा कि इंच दर इंच पसरी शुभकामनाओं के बावजूद कैसे इतना अशुभ होता रहता है। लगता है शुभकामनाओं में मिलावट है। कौन जांच करवाए।
नहर के पानी का बहाव हमारे विपरीत था। हमारी सोच में तमाम दिनों से नहर के पानी का बहाव जिधर अंकित है, वास्तव में पानी उसकी उल्टी तरफ बहता है। जब भी पानी देखते हैं , बहाव की दिशा दिमाग में दुरुस्त करते हैं। लेकिन अगली बार फिर लगता है कि पानी उल्टी तरफ बह रहा है। दिमाग में नहर के पानी की दिशा 'सेव' नहीं होती।
यह बात देश-दुनिया पर भी लागू होती है। दुनिया चाहे जिधर जा रही हो लेकिन लोग उसको अपनी सोची हुई दिशा में जाते ही देखते हैं। दुनिया की तमाम आबादी इसी तरह 'दिशा मण्डूक' होती है। ऐसे लोग अपनी सोच के कुतुबनुमें तोड़कर अपने नायक के पास धर देते हैं यह सोचते हुए कि हम क्यों सोचने का काम करें। जो करेगा यही करेगा, इसको नायक बना लिया, हमारा काम खत्म। उनको पता नहीं होता कि उनका नायक भी अपनी अक़्क़ल का क़ुतुबनुमा किसी और के पास रखकर आया है।
थोड़ी दूर तक पक्की सड़क के बाद कच्ची जमीन और पगडण्डी शुरू हो गयी। लगा किसी जंगल में आ गए। दाईं तरफ एक आदमी उकड़ू बैठा अपने सामने मोबाइल का पर्दा लगाए निपटने में तल्लीन था। उसकी साइकिल बगल में खड़ी थी। सामने पनकी पावर हाउस की चिमनी धुंआ उगल रही थी।
लौटते में एक जगह कुछ लोग खड़े दिखे। हम उनके बगल से होते हुए अंदर हो गए। देखा सड़क किनारे तरण ताल बना था। पानी अलबत्ता नहीं था। आधे में घास उगी थी, आधा सूखा था तरण ताल। सूखे सीमेन्ट वाले हिस्से में कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे।
तरण ताल के किनारे कुछ लोग , जिनमें अधिकांश बुजुर्ग थे, बाबा रामदेव घराने की एक्सरसाइज करने में जुटे थे। एक बुजुर्ग अपने पेट को इतनी तेजी से घुमा रहे थे कि हमको डर लगा कहीं उनके पेट की चूड़ियां न खुल जाएं।
बगल में शाखा का झंडा लगा था। किसी ने कहा कि झण्डा उतारने की जिम्मेदारी जिसकी है वह तो दौरे पर गया है।बुजुर्ग लोग ही दिखे वहाँ। लगता है इस वाली शाखा में युवा लोग कम आते हैं।
झंडे की बात आगे बढ़ी तो किसी ने कहा -'हमारा समर्थन नहीं चाहिए अब उनको।' बात और भी आगे बढ़ी। कुछ हंसने लगे तो कुछ बतियाने। उनकी बातें सुनते हुए लगा कि सोशल मीडिया में चलने वाली बहसें हमारे आस-पास भी कितनी तेजी से पसरती हैं।
रास्ते में तमाम जान-पहचान के लोग मिले। कई लोगों ने नमस्ते किया। हमने भी किया। कई लोगों के नाम हमको नहीं पता। पूछने की हिम्मत भी नहीं होती। डर लगता है कि अगला सोचेगा कि पचीसों नमस्ते डकारने के बाद अब नाम पूछ रहा है।
सड़क किनारे आदमी तेजी से टहलते हुए अचानक उल्टे चलने लगा। ऐसा लगा जैसे कोई विकास की बात करता हुआ नेता अचानक कहे-'प्यारे देश वासियों, मैं आपको स्वर्णिम अतीत में ले चलता हूँ। जो मजा वहाँ है वो यहाँ नहीं मिलेगा।' हमारे देखते-देखते वह आदमी फिर पलट गया और सीधे चलने लगा।
लोग अपने नेताओं से कितना कुछ सीखते हैं।
आगे एक महिला सड़क के बीच के डिवाइडर पर बैठी दूसरी महिला से बतिया रही थी जो कि डिवाइडर के नीचे सड़क पर बेतकुल्फ़ी से फसक्का मारकर बैठी थी। सड़क से गुजरते वाहन उससे बचते हुए निकलते जा रहे थे।
एक बच्ची सड़क पर रनिंग करती जा रही थी। धीरे-धीरे। एक आदमी उसके बगल में साइकिल चलाते हुए उसको कुछ निर्देश दे रहा था। बच्ची उसके निर्देशों को चुपचाप सुनते हुए दौड़ती जा रही थी। क्या पता कल को किसी अखबार में बच्ची इंटरव्यू देते हुए कहे-'मैंने अपने दौड़ने का अभ्यास अर्मापुर में किया था। रोज दौड़ती थी मैं।'
लौटते हुए सूरज भाई आसमान से मुस्कराते हुए गुडमार्निंग कर रहे थे। उनकी देखादेखी सड़क किनारे के अमलताश और गुलमोहर भी सुप्रभात करने लगे। हमने भी कर दिया। दोनों मुस्कराने लगे।
सबकी मुस्कान को याद करके अपन भी मुस्करा रहे हैं। मुस्कान अभी तक टैक्स फ्री है। आप भी मुस्करा लीजिए।

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Monday, May 27, 2024

लक्ष्मीनारायण मंदिर, कल्पवृक्ष, बेतवा नदी और छतरियां



ओरछा के महल देखते हुए दोपहर हो गयी थी । धूप तेज । बाहर निकलकर हम उधर गए जिधर हमारी गाडी खडी थी । हमारे ड्राइवर संजय धूप में गाडी खडी किये हमारा इन्तजार कर रहे थे । हमने उनको साथ लिया और आगे बढे । अब ऑटो हमारा पायलट वाहन था और हम अपनी गाडी में ।
राममंदिर के सामने गन्ने के रस वाला दिखा । दस रुपये का छोटा ग्लास । बीस का बड़ा । गाडी रोककर गन्ने का रस पिया । गर्मी में ठंडा गन्ने का रस पीकर तृप्त हुए । मजा आया ।
थोड़ी दूर पर ही लक्ष्मी नारायण मंदिर था । पवन हमको मंदिर के पास छोड़कर अपना ऑटो लेकर अपनी दूसरी सवारी को किले तक छोड़ने चले गए । अपन मंदिर देखने लगे ।
लक्ष्मी नारायण मंदिर 1622 ई. में वीरसिंह देव ने बनवाया था। पूरे देश में यह इकलौता मंदिर है जिसका निर्माण तत्कालीन विद्वानों द्वारा श्रीयंत्र के आकार में उल्लू की चोंच को दर्शाते हुए किया गया है। इस मंदिर की मान्यता है कि दीपावली के दिन इस सिद्ध मंदिर में दीपक जलाकर मां लक्ष्मी की पूजा करने से वह प्रसन्न होती हैं। 1983 में मंदिर में स्थापित मूर्तियों को चोरों ने चुरा लिया था। तब से आज तक मंदिर के गर्भगृह का सिंहासन सूना पड़ा है।
कहते हैं कि मंदिर से मूर्तियां चोरी होने के कुछ समय बाद ही लक्ष्मी नारायण की प्रतिमाएं बरामद कर ली थी, लेकिन मूर्तियां खंडित होने के चलते दोबारा स्थापित नहीं हो सकीं।
इस मंदिर में सत्रहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के चित्र बने हुए हैं। चित्रों के चटकीले रंग इतने जीवंत लगते हैं। जैसे वह हाल ही में बने हों। मंदिर में झांसी की लड़ाई के दृश्य और भगवान कृष्ण की आकृतियां बनी हैं।
मंदिर से बाहर आते हुए जैसे ही हम गाडी में बैठे वैसे ही मंदिर दर्शन करके निकलने वाले एक परिवार के मुखिया ने हमने अनुरोध किया कि हम उनको , जहां तक जा रहे हों वहां तक छोड़ दें। धूप तेज थी। कोई सवारी थी नहीं। अपन ने उनको गाडी में बैठाया और बस स्टैंड तक छोड़ दिया। रास्ते में बतियाते हुए उनके बारे में जाना।
पता चला कि परिवार सूरत से आया था ओरछा दर्शन को। मेवों का व्यापार करते हैं वो। काजू, किसमिस, अखरोट आदि खरीदना, बेंचना। पांच मिनट के लगभग लगे इनको बस स्टैंड तक छोड़ने में। इतने में ही ढेर सारे धन्यवाद और सूरत आने और उनके घर ठहरने का निमंत्रण मिल गया। देखिये कब जाना होता है सूरत।
लक्ष्मी नारायण मंदिर देखने के बाद कल्पवृक्ष देखने गए। शहर के बाहर स्थित यह पेड़ लगभग पांच सौ साल पुराना बताया जाता है। कहते हैं कि इसके नीचे खड़े होकर जो मुराद मानो पूरी होती है। इसे मनोकामना पेड़ भी कहा जाता है। पेड़ दो हिस्सों में है। लगभग एकरूप हैं दोनों हिस्से। एक का कोई भी हिस्सा हिलाओ तो दूसरा हिस्सा भी हिलता है। पवन ने हिलाकर भी दिखाया।
हमने पूछा पवन से कि तुमने भी कोई मनोकामना की होगी इस पेड़ के नीचे। बोले –‘की थी लेकिन अभी पूरी नहीं हुई है।‘ हमने पूछा क्या थी मनोकामना ? तो बोले –‘बताई थोड़ी जाती है मनोकामना। बताने से पूरी नहीं होती।'
इस बीच पवन ने अपने बारे में बताया कि वे गुजरात में एक जगह खाना बनाने का काम करते थे। कोरोना काल में सब ठप्प हो गया। घर वापस आना पड़ा। यहाँ भी कोई काम नहीं था शुरू में । फिर ऑटो चलाना शुरू किया। दिन में दो टूर तक मिल जाते हैं लोकल के। उसी से काम चलता है। कभी-कभी नहीं भी मिलता है काम। लेकिन ठीक है।
मनोकामना वृक्ष देखने के बाद अपन बेतवा तट की तरफ बढे। बेतवा नदी के पास ही छतरियां बनी हुईं थी। पवन हमको बेतवा किनारे छोड़कर चले गए।
बेतवा नदी में लोग नहा रहे थे। अपन का भी मन हुआ नहाने का। पानी में उतरकर खड़े हो गए। गाडी से अटैची मंगवाई। उसमे कपडे थे। लेकिन तौलिया नहीं थी। सोचा कि नहाने के बाद कपडे कैसे बदलेंगे। तमाम तरकीबें सोचते रहे लेकिन कोई उपाय सूझा नहीं। यह भी सोचा कि कहीं आड़ में खड़े होकर बदल लेंगे कपडे, गाडी में बदल लेंगे। लेकिन संकोच ने हमला कर दिया। हम संकोच-घायल हो गये। पानी के अन्दर उतरकर नहाए नहीं। लोगों को मस्ती से नहाते देखते रहे।
नहाए भले नही लेकिन काफी देर तक बेतवा के पानी में घुटने तक भीगे खड़े रहे। पानी में तमाम लोग नहाते रहे हैं। पानी में कई टूटी हुई चूड़ियाँ और इसी तरह के श्रृंगार के सामान दिख रहे थे। लोग वहां नहा रहे थे, मोटर वोट में लोग बेतवा दर्शन कर रहे थे। अपन पानी में खड़े-खड़े सबको देखते हुए आनंदित होते रहे।
बेतवा नदी से निकलकर बाहर आये और वहां पास ही बनी छतरियां देखी। ओरछा के राजाओं के स्मारक उनके वैभव की कहानी कहते हैं। शानदार इमारतों में कोई रहता नहीं लेकिन राजाओं की कहानी किस्से चलते रहते हैं इसी बहाने।
लौटते समय गाडी में बैठे तो देखा कि सीट पर तौलिया लगी थी। आगे भी तौलिया। जिस तौलिया के न होने के कारण बेतवा नहान से वंचित रह गए वे तो अनेक थीं गाडी में। लेकिन अपन केवल अपनी अटैची ही देखते रह गए। ऐसी ही संकुचित खोज के कारण जीवन में अनगिनत चीजों से अपन वंचित रह जाते हैं।
लेकिन बेतवा अभी कहीं गयी नहीं है। फिर जायेंगे और जी भरकर नहायेंगे बेतवा में।
लौटते समय रास्ते एक एक जगह चाय पी। वहां एक मोटर साइकिल वाले ने बताया कि उसका लाइसेंस नहीं है। इस चक्कर में पिछले सालों में वह दसियों हजार घूस/नजराने के रूप में दे चुका है पुलिस वालों को। पुलिस वाले कभी कोल्डड्रिंक मंगा लेते हैं, कभी पानी की बोतल , कभी कोई और सामान। हमने पूछा तो लाइसेंस बनवा काहे नहीं लेते? पता चला कि उसका घर गोरखपुर में हैं। पता वहां का है। जब जाएगा तब बनवाएगा।
हमको लगा कि बताओ भला एक लाइसेंस न होने के चलते कोई हजारों रुपये हलाक करा सकता है। लेकिन हमारे सोचने से क्या होता है? दुनिया में न जाने कितने काम होते हैं जिनके बारे में अपन सोच भी नहीं सकते। सोचते भी नहीं। लेकिन वे हुए चले जा रहे हैं धड़ल्ले से। बिना हमसे पूछे। क्या कर सकते हैं अपन। कुछ भी तो नहीं।

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