Saturday, July 12, 2025

कांवड़ धारी बच्चे

 


गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर कुछ कांवड़ धारी बच्चे दिखे। शंकर जी की फ़ोटो लगी टी शर्ट, बरमूडा टाइप नेकर पहने कांवर टांगे बच्चे ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। हाथ में स्मार्टफोन लिए बतिया रहे थे।

पास गए तो देखा उन बच्चों के साथ एक बच्ची भी थी। पता चला हरिद्वार तक ट्रेन से जाएंगे। लौटेंगे पैदल ,जल लेकर। चार-पांच दिन लगेंगे वापस लौटने में। तय नहीं किया वापसी में कहां-कहां रुकेंगे।
बच्चों में उत्साह है। उनके साथ उनके परिवार के लोग भी हैं लेकिन उनके पास कांवर नहीं हैं। बातचीत से पता लगता है कि वे भी जाएंगे हरिद्वार ।
पढ़ाई के बारे में पूछने पर बच्ची ने बताया -"बाहरवीं करके छोड़ दी पढ़ाई। भैया लोग भी ऐसे ही हैं। पढ़ाई छोड़ चुके हैं।
"खाली हैं इसीलिए कांवर यात्रा पर जा रहे हैं।" -मैं ऐसी धारणा बनाता हूँ। हर साल कांवर यात्रा, तीर्थ यात्रा पर जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। लोग इसे भक्ति भाव से जोड़कर देखते हैं। मुझे लगता है भक्तों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रतीक है कि लोगों के पास काम नहीं है। पढ़ाई छूट गयी है, काम करते नहीं, खाली हैं तो तीर्थ यात्रा ही सही। सरकार भी कांवर यात्रा करने वालों के लिए खास इंतजाम करके उनको यात्रा के लिए उकसाती रहती है। इसी बहाने अपना एजेंडा भी सेट करती रहती है।
कांवर धारी युवाओं को देखकर लगा कि ये आधुनिक श्रवणकुमार हैं जो अपने कंधे पर सरकारें ढो रहे हैं। सरकारें इनकी कांवरो की बँहगियो पर बैठी आनंद कर रही है। ये युवा आंख मूंदकर , अपने भविष्य से निर्लिप्त, अपने बुजुर्गों को अपने कंधे पर लादे घूम रहे हैं ।
" वापसी ने चार-पांच दिन की यात्रा में कहाँ रुकना है, कहाँ खाना-पीना है इसका कोई प्लान बनाया है?" पूछने पर बच्ची ने बताया -"कोई प्लान नहीं बनाया। जहां रात हो जाएगी , जब थक जाएंगे, रुक जाएंगे।"
"पहले भी गए होंगे, पैदल चलने में पैर में छाले पड़ जाते होंगे" इस सवाल के जवाब में एक महिला ने कहा-"सच्चे भक्त छाले नहीं पड़ते।" उसके साथ की महिला ने उसकी बात को काटते हुए कहा -"शुरू में पड़ते हैं, फिर ठीक हो जाते हैं।" अपने साथ के बच्चे की तरफ इशारा करते हुये उस महिला ने कहा -" पिछली बार इसकी चप्पल चोरी हो गयी थीं। इसके छाले पड़ गए थे।"
बच्चों के साथ उनके घर वालों का उत्साह देखकर लगा कि कांवड़ यात्रा उनके लिए घर से बाहर निकलने का एक जरिया है। धार्मिक स्वरूप होने के कारण यात्रा पर जाने को सामाजिक स्वीकृति भी मिली हुई है।
कांवर यात्रियों से और कुछ बात करते तब तक ट्रेन आ गयी। आसपास के स्टेशनों से कानपुर आने वाली पैसेंजर गाड़ियों में दूधिया लोग दूध के डब्बे टांगे रहते हैं उसी तरह कई कांवर ट्रेन की खिड़कियों से टंगी थीं।कांवरियों की ड्रेस से दूर से पता चल रहा था कि वे हरिद्वार जा रहे हैं। टीटी शायद उनसे टिकट के बारे में पूछता भी नहीं होगा।
कांवर यात्रियों को लेकर ट्रेन हरिद्वार की तरफ चल दी। हमारी गाड़ी भी आ गयी। हम गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी में कोई कांवर वाला दिखा नहीं।

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Friday, July 11, 2025

हम भारत के लोग


 हर जगह का बाजार का हिसाब अलग-अलग होता है। कानपुर में नीबू, खीरा, केला आदि गिनती के हिसाब से मिलते हैं। दिल्ली/NCR में तौल के भाव। कानपुर में आधा दर्जन केला, पाँच नीबू के हिसाब से ख़रीद होती है। नोयडा, दिल्ली में किलो, पाव के हिसाब से। और भी जगह तौल के हिसाब से मिलती होंगी चीजें जो कानपुर और दूसरी जगह गिनती के हिसाब से मिलती हैं।

ग्राहक और दुकानदार के बीच में तराजू एक बिचौलिये के रूप में शामिल है दिल्ली/एनसीआर में। बिना बिचौलिए के यहाँ काम नहीं होता।
क्या पता कल को और मामलों में भी तराजू घुस जाये। गिनती में गिनी जाने वाली चीजें तौल के हिसाब से गिनी जाने लगें।
क्या पता कल को इंसान की गिनती भी तौल के हिसाब से होने लगे। इंसान की क़ीमत उसके वजन के हिसाब से लगने लगे। किसी घर में पाँच वोट के तर्ज पर कहा जाये वहाँ -350 किलो वोट हैं। जिसको सबसे ज्यादा वजन के वोट मिलेंगे वह उम्मीदवार जीता हुआ कहा जाएगा। धर्मकाँटे मतदान केंद्र के रूप में प्रयोग होंगे।
यह भी हो सकता है लोगों की संपत्ति के आधार पर उनके वोट की क़ीमत आँकी जाये। जिसके पास जितना ज्यादा संपत्ति उसके वोट की उतनी ज्यादा क़ीमत। ऐसा हो तो फिर किसी दल को सरकार बनाने के लिए दुनिया भर के ताम-झाम की जरूरत नहीं होगी। देश के पचीस-तीस लोग मिल-बैठ कर सरकार बना लेंगे। देश का समय, संसाधन, पैसा बचेगा। एक दिन में चुनाव निपट जायेगा।
हालांकि हो तो अभी भी वैसा ही रहा है। लेकिन अभी दबे-छुपे तरीक़े से होता है, फिर सीधे होने लगेगा। मामला पारदर्शी हो जाएगा।
दुनिया के लगभग सभी देशों में जहाँ चुनाव होते हैं, वहाँ के पैसे वाले लोग चुनाव का नतीजा तय करते हैं। अमेरिका के हालिया चुनाव में एलन मस्क के सहयोग की चर्चा है। अमेरिका के बारे में वहीं के एक भूतपूर्व राष्ट्रपति ने कहा था -"अमेरिका में कारपोरेट सड़क चलते किसी आदमी को पकड़कर अमेरिका के लोगों से कहता है -यह तुम्हारा राष्ट्रपति है।"
अभी तो आम जनता अपने वोट से सरकार बनाती है। वोट डालने के लिए देश का नागरिक होना अनिवार्य है। नागरिकता के लिए देश में जन्म लेना अनिवार्य है या फिर नागरिकता मिलना जरूरी है।
बिहार में कुछ दिन बाद होने वाले चुनाव के लिए चुनाव आयोग मतदाता सूची को तैयार कर रहा है। 2004 के बाद पैदा हुए लोगों से जन्म प्रमाण पत्र जमा करने को कहा गया है। उनके पिता का भी जन्मप्रमाण चाहिये नागरिकता साबित करने के लिए। इसका विरोध हो रहा है अलग-अलग कारणों। लोगों का कहना है कि उनके पास जन्मप्रमाण पत्र है ही नहीं तो कहाँ से लायें?
जन्मप्रमाण पत्र की कहानी भी अनूठी है। अपने सेवा काल में हमने देखा कि पेंशन वगैरह के लिए लोग अपने परिवार के जन्म प्रमाण अलग-अलग हिसाब से बदलवा लेते। एक केस में एक पिता ने अपने बच्चे की जन्मतिथि दो-साल आगे-पीछे करवाने की अनुमति मांगी। हमको चूँकि असलियत पता थी इसलिए हमने मना कर दिया था। नाम और दूसरे विवरण भी बदलते ही रहते हैं लोग। फोटो के लिए तो लोग मजे लेते हुए कहते हैं -"हमारी शक्ल इतनी ख़राब हो गई है कि आधार कार्ड/वोटर कार्ड से मिलने लगे है।"
बिहार मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने आधार कार्ड और राशन कार्ड को नागरिकता का आधार मानने का सुझाव दिया है। माननीय न्यायाधीश महोदय ने कहा -"ये कागज तो हमारे पास भी नहीं है।"
लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय का सुझाव चुनाव आयोग मानता है या नहीं यह अभी पता नहीं है। माननीय उच्चतम न्यायालय का सुझाव दफ़्तरी भाषा में कोई पत्र "जारी करने के पहले/बाद में देखना चाहें" घराने का है। अब यह देखने वाले पर निर्भर है कि वह इस पर क्या रूख अपनाता है।
चुनाव आयोग क्या निर्णय लेता है , इसका बिहार के चुनाव पर क्या असर पड़ता है यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन अगर एक बड़ी आबादी कागजी कार्यवाही के कारण वोट डालने से वंचित रह गई तो इसका गंभीर परिणाम हो सकता है।
इसी सिलसिले में मुझे अपने पढ़ाई के दिनों का एक क़िस्सा याद आता है। हम लोग बीएचयू में पढ़ते थे। एम टेक में हम लोगों को स्कालरशिप मिलती थी। एक बार मिलने में देरी हुई। हम बार -बार पूछताछ करते थे, जबाब नहीं मिलता था।
एक दिन हम लोग दफ़्तर में संबंधित बाबू के पास गए। पूछा। बाबू ने झुँझलाकर थोड़ा ऊँची आवाज़ में कहा -"हम तुम्हारे नौकर नहीं है।"
यह सुनते ही हमारे साथी यादव जी का पारा हाई हो गया। उन्होंने बाबू से दोगुनी ऊँची आवाज में कहा -" सुनो, तुम हमारे नौकर हो और सामने जो HOD बैठे हैं वो भी हमारे नौकर हैं।"
अपनी बात को समझाते हुए यादव जी ने आगे कहा -"हम लोग यहाँ इस लिए नहीं पढ़ने आते हैं कि तुम लोग यहाँ नौकरी करते हो। तुमको नौकरी यहाँ इसलिए मिली है क्योंकि हम यहाँ पढ़ने आते हैं।"
ऊँची आवाज़ में यादव जी की कही यह बात सामने कमरे में बैठे विभागाध्यक्ष महोदय ने सुनी या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन यह जरूर हुआ कि हमारी स्कालरशिप अगले दिन हमारे खाते में आ गई।
यह घटना करीब 39 साल पुरानी है। यादव जी और हम भी पढ़ाई करके और अपनी-अपनी नौकरी करके रिटायर हो चुके हैं। लेकिन यादव जी की कही बात हमको अभी आज सुनी लगती है। अपने क़रीब 36 साल के सेवा काल में लोगों से जुड़े निर्णय लेते समय हमेशा याद रही कि हमारी नौकरी लोगों की सेवा के लिए है।
चुनाव आयोग और किसी भी सरकार को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे जनता के लिए हैं, जनता उनके नहीं है। भारत का संविधान भी यही कहता है -"हम भारत के लोग।"
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Thursday, July 10, 2025

प्रधानमंत्री संग्रहालय

 


कल प्रधानमंत्री संग्रहालय देखने गए। तीन मूर्ति भवन। लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन से तीन मूर्ति भवन की तरफ़ पैदल जाते हुए तमाम सांसदों, मंत्रियों के बड़े-बड़े बंगले दिखे। प्रवेश द्वार के पास बंदूक लिए सुरक्षा पर तैनात जवान। बंगलों की सुरक्षा के लिए लगाए गए तार अलबत्ता कई जगह टूटे दिखे।

तीन मूर्ति भवन से पहले 1 , सफदरजंग दिखा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी का निवास स्थान। उसको देखने चले गए अंदर। सुरक्षा के लिए तैनात लोगों ने बैग ले जाने दिया लेकिन पानी की बोतल बाहर धरवा ली।
इस घर में इंदिरा जी अपने पिता जवाहर लाल नेहरू जी के निधन के बाद रहने आयीं थीं और बाद में प्रधानमंत्री बनने से लेकर मृत्यु पर्यंत रहीं। उनके निधन के बाद इस घर को उनकी स्मृति के रूप में संरक्षित किया। इंदिरा जी और उनके परिवार के लोगों से जुड़ी अनेक यादें यहाँ मौजूद हैं। उनका ड्राइंग रूम, पढ़ने का कमरा और उनके जीवन से जुड़ी अनेक यादें यहाँ संरक्षित हैं।
राजीव गांधी जी भी इस घर में रहे। उनसे जुड़ी अनेक यादें भी यहाँ संरक्षित हैं। राजीव जी जो कम्प्यूटर प्रयोग करते थे (T5200) यहाँ रखा हुआ है। राजीव गांधी की हत्या के बाद बने जाँच आयोग (वर्मा कमीशन) की रिपोर्ट का अंश भी वहाँ लगा हुआ है। उसके अनुसार :
" प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी नवंबर, 1984 से नवंबर 1989 तक देश के ऐसे व्यक्ति थे जिनकी जान को सर्वाधिक खतरा था और उनकी जान को यह खतरा उनकी हत्या तक कम नहीं हुआ । यह स्पष्ट है कि उनके सुरक्षा प्रबंधों के लिए एस.पी. जी. कवर अथवा समान प्रभावकारी उपयुक्त विकल्प की आवश्यकता थी। मंत्रिमंडल सचिवालय के दिनांक 30/01/1990 के नोट में निहित केंद्रीय सरकार के निर्णय के परिणाम स्वरूप फ़रवरी, 1990 में एस.पी. जी. कवर हटाने के बाद उनमें से कोई सी भी सुरक्षा व्यवस्था उनके लिए उपलब्ध नहीं थी।"
यह जानकर दुख हुआ कि देश के एक महत्वपूर्ण नेता के लिए कोई भी सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी।
वहीं पर राजीव गांधी जी का पायलट के रूप में त्यागपत्र की प्रति भी दिखी।
इंदिरा गांधी जी की जिस जगह हत्या हुई थी वह जगह काँच की छड़ों से ढँकी हुई है। दूर से ही उसे देखा जा सकता है। इंदिरा जी के बनाए स्केच और दूसरी ड्राइंग भी दिखीं।
इंदिरा गांधी स्मृति स्थल के बाद तीन मूर्ति संग्रहालय देखने गए। 50 रुपये का प्रवेश शुल्क है यहाँ। इसके अलावा प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी और कई दीगर गतिविधियों के लिए अलग से फ़ीस है। हमने केवल संग्रहालय देखने के लिए टिकट लिया। अंदर जाने के पहले हमारा बैग एक लाकर में रखकर उसकी चाबी हमको थमा दी गई।
तीन मूर्ति भवन पहले केवल जवाहर लाल नेहरू जी से सबंधित चीजों का संग्रहालय था। बाद में इसमें उनके बाद के प्रधानमंत्रियों से जुड़ी स्मृतियाँ भी संजोयी गई हैं। मुझे पता नहीं क्या बदलाव किए गए इस प्रक्रिया में लेकिन अधिकतर यादें डिजिटल मोड में संग्रहित हैं। इससे उससे जुड़ाव में यान्त्रिकता का पुट तो रहता है। जवाहर लाल जी का शयन कक्ष, उनका ड्राइंग रूम और उनकी लाइब्रेरी देखकर बहुत अच्छा लगा। आजादी के मौके पर उनके उनके प्रख्यात संबोधन को उनकी हस्तलिपि में देखकर अच्छा लगा। उनके उस भाषण की वीडियो क्लिप भी कई सुनी।
कुछ दिन पहले Kanak Tiwari जी ने संविधान पर अनूठी बातचीत में नेहरू जी को याद करते हुए कहा था -" बिना किसी पूर्व तैयारी के दुनिया के किसी भी विषय पर जवाहरलाल नेहरू जैसा बेहतरीन वक्ता कोई नहीं था।" नेहरूजी का भाषण सुनकर कनक तिवारी जी की बात याद आ गई।
गैलरी में तमाम किताबें रखी थीं। पता नहीं क्यों? क्या पहले भी वे इसी तरह रखीं थीं या बाद में यह व्यवस्था की गई।
नेहरू जी से संबंधित संग्रहालय देखने के बाद अन्य प्रधानमंत्रियों से संबंधित संग्रहालय देखने गए। देश के सभी प्रधानमंत्रियों से जुड़ी प्रमुख घटनाओं का डिजिटल प्रदर्शन वहाँ किया गया था। उनका प्रदर्शन देखकर एहसास हुआ कि उसमें घटनाओं के प्रस्तुति करण में वर्तमान सरकार के रूख का भी ख्याल रखा गया है। नेहरू जी के प्रधानमंत्री बनते समय पटेल जी के पक्ष में लोगों का बहुमत था इस घटना को तफ़सील से बताया गया है, आपातकाल से जुड़ी घटनाओं और संविधान में धर्मनिपेक्षता जोड़ने की घटना का विस्तार से विवरण दिया है।
अन्य प्रधानांत्रियों से जुड़ी जानकारियाँ भी वहाँ मौजद हैं। नरेंद्र मोदी जी के हिस्से में उस स्टेशन का फ़ोटो भी मौजूद है जहाँ वे जवानों को चाय पिलाते थे (चाय बेंचने का जिक्र नहीं है वहाँ) ।
मोरारजी देसाई जी से जुड़े विवरण से पता चलता है कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए बंबई में 109 लोग पुलिस की गोली से मारे गए थे। इसके बावजूद वे मुख्यमंत्री बने रहे। आज ऐसी कोई घटना हो जाये तो बवाल हो जाये। (वैसे अपवाद आज भी हैं, सैकड़ों लोग कई राज्यों में प्रशासनिक लापरवाही के कारण मारे गए, मारे जा रहे हैं लेकिन देश/प्रदेश के कर्णधारों को कोई फर्क नहीं पड़ता)।
देश के कर्णधारों द्वारा एक-दूसरे को लिखे पत्र भी मौजद हैं वहाँ। लाल बहादुर शास्त्री द्वारा जय प्रकाश नारायण जी को लिखे पत्र, चरण सिंह जी द्वारा आपातकाल हटाने को लेकर लिखा पत्र और भी कई पत्र। इंदिरा जी और नेहरू जी के आपसी पत्र भी मौजुद हैं वहाँ।
प्रधानमंत्री दीर्घा से नीचे आते हुए गैलरी में एक तरफ़ अलग-अलग प्रधानमंत्रियों से जुड़ी घटनायें और दूसरी तरफ़ वर्ष वार देश से जुड़ी उल्लेखनीय घटनाओं का जिक्र करते हुए फोटो लगे हैं। इनमें देश में टीवी कब आया , केरल का जिला पूर्ण साक्षर कब हुआ, विश्वसुंदरी कब बनी, आधार कार्ड कब शुरू हुआ, अभिनव बिंद्रा ने कब स्वर्ण पदक जीता, मिल्खा सिंह के रोम ओलंपिक , राकेश शर्मा का अंतरिक्ष में जाना आदि घटनाओं के वर्षवार विवरण और सबंधित फोटो हैं।
वर्षवार इन उल्लेखनीय घटनाओं के जिक्र में मैं खोज रहा था कि कहीं नोटबंदी से जुड़ी खबर का भी जिक्र होगा। लेकिन हाल के समय की इस सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक का कहीं कोई जिक्र नहीं दिखा।
स्मारक देखने के बाद वहीं मौजूद कैंटीन में खाना खाया। 75 रुपए की थाली में दो रोटी, दाल, सब्जी, चावल और पापड़ भी था। पापड़ आधा खाया, आधा थाली में रखे-रखें तेज हवा में उड़ गया। बगल की मेज़ पर बच्चे हुए खाने को तल्लीनता से खाते हुए चिड़िया का वीडियो बनाने का विचार उसकी निजता के उल्लंघन की बात सोचकर छोड़ दिया।
प्रधानमंत्री संग्रहालय से निकलकर गेट के बाहर बनी पहले विश्वयुद्ध में मारे गए और लापता शहीदों के नाम का जिक्र करते हुए बने स्मारक को देखा।
जाते समय मेट्रो में एक बच्चा मेरी घड़ी से खेलने लगा। हमने घड़ी उतारकर उसे दे दी, क़ायदे से खेलने के लिए। उसने कुछ देर खेलने के बाद घड़ी फेंक दी। संयोग से हमने उसे कैच कर लिया। इसके बाद उसको अपने हाथ में ही बाँधे-बाँधे खेलने दिया, उसको दी नहीं घड़ी।
मेट्रो स्टेशन के सुलभ शौचालय के बाहर बैठी महिला ने सुलभ शौचालय की सुविधा के लिए दो रुपए फुटकर मांगे। हमारे पास दस का नोट था। उसके पास पाँच रुपए का ही नोट था। तीन रुपए की चपत लगी। महिला वहीं बैठे-बैठे अख़बार के लिफ़ाफ़े बनाती जा रही थी। बताया कि इस तरह सौ पचास रुपए बच जाते हैं।
हमने बताया कि बचपन में हम भी खूब लिफ़ाफ़े बनाते थे। इस पर उसने कहा -"मायके में यह सब नहीं करते नहीं थे, ससुराल में आकर करने लगे। करना पड़ता है।"
अचानक उसको याद आया कि वह शौचालय की देखभाल कर रही है। उसने अपनी तरफ़ से ही कहा -" हम बनिया हैं, सफ़ाई कर्मी नहीं हैं । पहले दूसरा काम करते थे, अब होता नहीं तो यहाँ करते हैं काम। बैठे-बैठे।"
उसकी बात सुनकर हमको हँसी आ गई। उसको मन में यह डर था कि कहीं हम उसको सफ़ाई कर्मी न समझ लें। उसका फ़ोटो लेने के लिए पूछा तो उसने मना कर दिया। हम बाहर आ गए। तीन मूर्ति भवन की तरफ़ चल दिए। उसके बाद का किस्सा तो आप पढ़ ही चुके हैं।
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Wednesday, July 09, 2025

अभी तो मैं जवान हूँ - सैंट्रो सुंदरी


 दिल्ली में पुरानी गाड़ियों को 15/10 साल बाद हटाने की चर्चा अक्सर होती है। आजकल फिर हो रही है। इस बार यह भी जुड़ गया कि पुरानी गाड़ियों को तेल भी नहीं देंगे।

गाड़ियों को हटाना एक बात लेकिन उनको तेल न देना अलग बात है। बुजुर्ग गाड़ियों को तेल न देना कुछ ऐसा ही है जैसे परिवार के किसी बुजुर्ग को खाना-पीना न देकर कसाईघर में भेज देना। कटने-पीटने के लिए। गाड़ियों का कोई वृद्धाश्रम तो होता नहीं। जायेंगी तो कटने-पिटने के लिए ही। गाड़ियाँ भी सोचती होंगी, कितना कठकरेजा है समाज।
पुरानी गाड़ियों के हटाने के पीछे अदालती आदेश का हवाला देने वाले यह बात छिपा जाते हैं कि इतनी गाड़ियाँ क्यों बढ़ीं सड़क पर। सार्वजनिक परिवहन की सुचारू व्यवस्था न कर पाना एक बड़ा कारण है निजी वाहनों के बढ़ने का। बाकी और भी कारण होंगे लेकिन सड़क पर निजी वाहन बढ़ने का एक प्रमुख कारण सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का सुचारू इंतजाम न होना है। सरकारें अदालती आदेश की आड़ में अपनी नाकामी छिपा रही हैं।
जिस तरह आज की समस्याओं का दोष लोग पुराने समय में हुए निर्णयों पर थोपते हैं उसे पुराने समय के लोग अगर देख पाते तो अपना माथा पीट लेते। शायद कहते -"इतने बहानेबाज और नाकारा लोग हमने तो सपने में भी नहीं सोचे थे।"
ऐसे समय में हमें अपनी सैंट्रो सुन्दरी याद आ रही है। 26 साल की उमर में भी जवान गाड़ियों की तरह फटाक से कहीं भी चलने के लिए तैयार हो जाती है। आधी चाबी घुमाते ही स्टार्ट हो जाती है, खिलखिलाते हुए चल देती है। गाड़ियों की उमर के लिहाज से वह बुजुर्ग हो चुकी है लेकिन चलने के मामले में किसी युवा गाड़ी की तरह ही चपल है।
हमारी सैंट्रो सुंदरी गाड़ियों में राणा सांगा की तरह है। न जाने कितनी जगह चोटों के निशान हैं उसमें। इन निशानों के बावजूद वह हमको बहुत खूबसूरत लगती है। उसकी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती उसकी बहादुरी है। भीड़-भाड़ में कहीं भी बेख़ौफ़ घुस जाती है। बाकी गाड़ियाँ जब जहाँ अगल-बगल की गाड़ियों को देखकर सहम जाती हैं, बचाने का संकेत देने लगती हैं ऐसी जगह भी हमारी सैंट्रो सुन्दरी बिना डरे, बिना हल्ला मचाये चलती रहती है। जहाँ नई गाड़ी, जिसकी मरम्मत में केवल फ़ाइल चार्ज लगता है, की एक खरोंच भी हमें दहला देती है वहीं हमारी थर्ड पार्टी बीमा वाली सैंट्रो सुन्दरी के घाव हमने आज तक नहीं गिने।
हमारी सैंट्रो सुंदरी का रजिस्ट्रेशन तीस साल तक के लिए है। 1999 के दिसंबर में खरीदी थी, जनवरी 2030 तक चलेगी । इसके बाद पता नहीं कि उसका क्या होगा? आगे रजिस्ट्रेशन होगा या विंटेज कार बनेगी, कुछ पता नहीं। हमको तो यह भी पता नहीं कि विंटेज कार का रजिस्ट्रेशन कैसे होता है।
फ़िलहाल तो बिंदास चल रही है, आगे क्या होगा यह चार साल बाद देखा जाएगा। अभी तो हर बार चलते हुए सैंट्रो सुन्दरी गाती लगती है -अभी तो मैं जवान हूँ।
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Monday, July 07, 2025

एलिगेटर एलकार्ट्ज़ मतलब मगरमच्छ से घिरी दुर्गम जेल


 पिछले दिनों अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों को उनके मूल देश वापस भेजा गया। उनमें भारत के लोग भी थे। प्रवासियों को वापस भेजते समय उनको हथकड़ी बेड़ी लगाकर भेजा गया था। इसकी कड़ी प्रतिक्रिया भी हुई। लोगों ने विरोध किया। इस पर भारत के विदेश मंत्री ने संसद में बयान देते हुए कहा -"अमेरिका वाले ऐसा ही करते हैं। पहले भी ऐसा हुआ है।"

भारत के लोगों को हथकड़ी बेड़ी लगाकर भेजे पर हुई आलोचना और तीखी प्रतिक्रिया के बाद विदेश मंत्री ने आश्वासन दिया था -"इस बारे में हम अमेरिका से बात करेंगे।"
अमेरिका से क्या बार हुई, और कितने लोग आए, हथकड़ी-बेड़ी में आए या खुले हाथ-पैर यह तो पता नहीं चला लेकिन यह पता चला कि अमेरिका में अवैध प्रवासियों को वापस भेजने से पहले रखने के लिए एक डिटेंशन कैंप बन रहा है। डिटेंशन कैंप (हिरासत केंद्र) का मतलब है एक ऐसा स्थान जहां उन लोगों को रखा जाता है जो किसी देश में अवैध रूप से रह रहे हैं या जिनके पास देश में रहने के लिए वैध दस्तावेज नहीं हैं. उन्हें तब तक हिरासत में रखा जाता है जब तक कि उनकी स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती या उन्हें उनके देश वापस नहीं भेज दिया जाता।
फ्लोरिडा राज्य के जंगल के दलदली इलाके में बन रही हिरासत केंद्र के पास एक हवाई पट्टी भी है। योजना है कि इस जगह क़ैद अवैध अप्रवासियों को यहीं से हवाई जहाज से उनके मूल देश वापस भेज दिया जाएगा। इस खुली जेल की क्षमता 5000 कैदियों को रखने की है जिसे बढ़ाकर 10000 तक किया जा सकता है। कैदियों के लिए चारपाई वाले बिस्तरों की कतारें और जंजीरों से बंधे पिंजरे हैं।
दलदली ज़मीन होने के कारण इलाके में मगरमच्छ और अजगरों की भरमार है। कैदियों को उनकी जान का ख़तरा है। कैदियों को ऐसी अमानवीय स्थितियों में रखने के इंतजाम को लेकर अमेरिका सरकार की आलोचना हो रही है।
इस अवैध प्रवासी हिरासत केंद्र (Immigration detention ) का नाम Alligator Alcatraz है। एलिगेटर मतलब मगरमच्छ । अलकाट्राज जेल दुनिया की दुर्गमतम जेलों में से मानी जाती थी। पूरे अमेरिका भर के छँटे हुए कैदी और दूसरी जेलों में हुड़दंग करने वाले कैदी यहां लाए जाते थे। समुद्र की तेज लहरों और बहुत ठंडे पानी के चलते यहां समुद्र के रास्ते भागना भी बहुत कठिन काम था।
जेल के दौरे के दौरान एक संवाददाता ने अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प से सवाल पूछा -" क्या यह विचार था कि भागने की कोशिश करने वाले बंदियों को मगरमच्छ खा जाएंगे?"
" मुझे लगता है कि यही अवधारणा है। सांप तेज़ होते हैं लेकिन मगरमच्छ - हम उन्हें (कैदियों को) मगरमच्छ से दूर भागना सिखाएंगे।" ट्रम्प ने जवाब दिया।
आगे ट्रम्प ने जानकारी दी -" सीधी रेखा में मत भागो, इस तरह भागो, उन्होंने ज़िगज़ैग की तरह इशारा करते हुए कहा। तुम्हें पता है कि तुम्हारी संभावना लगभग एक प्रतिशत बढ़ जाती है।"
अपने देश के लोकतंत्र और मानवीय गरिमा और उच्चादर्शों पर गर्व करने वाले देश का मुखिया दूसरे देशों को नागरिकों को , भले ही वह अवैध रूप से वहाँ आ गए हों, इस तरह की परिस्थितियों में रखता है जहाँ से भागने की कोशिश में उनको मगरमच्छ खा सकते हैं। सवाल पूछने पर वह कहता है -"हम उनको भागना सिखायेंगे जिससे उनके बचने की संभावना एक प्रतिशत बढ़ जाएगी।"
मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का नारा लगाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति को याद भी नहीं होगा कि आज अमेरिका की कमान संभालने वाले लोगों के पूर्वजों ने यहाँ के मूल निवासियों को मारकर देश पर कब्जा किया है। अगर अमेरिका के मूल निवासी बाहर से आए लोगों के साथ ऐसा कर पाते तो शायद ट्रम्प यहाँ आते भी नहीं, अपने मूल देश में ही कुछ काम-धाम कर रहे होते।
हर घटना का व्यापारीकरण करने वाले देश में राष्ट्रपति के दौरे के दौरान फ्लोरिडा रिपब्लिकन पार्टी ने व्यापारिक वस्तुएं लांच (टी शर्ट, कैप और दूसरे पेय) कीं और इस कैंप को एक उपनाम दिया, "एलीगेटर अल्काट्राज़", जिसे राज्य ने आधिकारिक बना दिया। अब 'एलिगेटर अलकार्ट्स' के चित्रों वाली T शर्त और कैप बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। T शर्ट पर जेल जैसी सुविधा के बाहर मगरमच्छ और का सांप लोटते हुए चित्र देखकर ऐसा लगता है कि मैल शर्ट से नीचे गिर रहा है।
अमेरिकी प्रशासन द्वारा अवैध प्रवासियों के मुद्दे को जिस अमानवीय तरीके और तमाशे पूर्ण अंदाज़ में निपटा जा रहा है, उसकी आलोचना करते हुए अमेरिकी पत्रकार मोनिका हेसे (Monika Hesse) ने वासिंगटन पोस्ट अख़बार में अपने लेख में लिखा :
"एलीगेटर अल्काट्राज़ एक अमानवीय स्थान है, लेकिन जब इसे तमाशा माना जाता है, तो सिर्फ़ कैदी ही अपनी मानवता नहीं खोते। हम सभी ऐसा करते हैं। इसका प्रभाव अमेरिकियों को यह बताना है कि वे इसे बहुत गंभीरता से न लें। परिवारों को तोड़ा जा रहा है, लेकिन यह सब हंसी-मज़ाक के लिए है। हम संवैधानिकता की सीमा पर नाच रहे हैं, लेकिन यह बढ़िया टेलीविज़न बना रहा है। हम पूरी तरह से असंगत हो गए हैं, यहाँ तक कि स्वर निर्धारित करने में भी असमर्थ हैं। अगर ग्वाटेनामो बे आज खुल जाता है, तो वहाँ एक थीम वाला रेस्तरां होगा जिसमें हैप्पी आवर स्पेशल टैगलाइन होगी "गिट मोट गिटमो।"
एलीगेटर अल्काट्राज़ की अवधारणा में छिपी अमानवीयता और तमाशेबाजी की तुलना रोमन गुलामों के साथ हुए अन्याय से करते हुए मोनिका ने लिखा :
"मैं रोमन ग्लैडिएटर लड़ाइयों के बारे में सोचा करती थी । किस तरह का समाज पिकनिक लंच पैक करके दूसरे इंसानों को, गुलामों या युद्धबंदियों को, मौत तक एक दूसरे से लड़ते हुए देखता है? ग्लैडिएटर किंवदंती का एक और हिस्सा यह है कि इन लोगों को बड़े जानवरों, बड़े मांसाहारी जानवरों से लड़ने के लिए मजबूर किया जाता था। लेकिन इसके लिए कोई भौतिक सबूत नहीं था, कुछ महीने पहले अप्रैल में, जब पुरातत्वविदों ने 1800 साल पुराने ग्लैडिएटर के खोदे गए कंकाल पर विशाल काटने के निशानों का विश्लेषण किया। तब इसकी पुष्टि हुई - शेर। किस समाज में दोपहर बिताने का यह सबसे अच्छा तरीका होगा? मैं सोचा करता था कि क्या यह क्रूरता विकास का मुद्दा था या धर्म का मुद्दा था या बस वैकल्पिक गुणवत्ता वाले मनोरंजन की कमी थी, उनके पास निकोलस केज (अमेरिका मनोरंजन कर्ता कलाकार) नहीं था।"
इस कैंप का समर्थन करने वाले बेजी जॉनसन ने एलीगेटर अल्काट्राज़ के चित्र की कैप लगाते हुए फोटो लगायी है और इस परियोजना का समर्थन किया है। उनकी इस ट्विटर पोस्ट पर उनको जमकर गालियाँ मिली हैं।
एलीगेटर अल्काट्राज़ की भावना की आलोचना करते हुए मोनिका लिखती हैं :
"लेकिन फिर आप बेनी जॉनसन को लाखों मगरमच्छों के लिए ऑनलाइन जयकार करते हुए देखते हैं और आप फ्लोरिडा जीओपी के स्टोरफ्रंट को देखते हैं और आपको पता चलता है कि यह लगभग 4 जुलाई है, अमेरिका का 249वां जन्मदिन और हमारे देश के बहुमत के अधिकारी छुट्टी का सप्ताह इस तथ्य का जश्न मनाने में बिता रहे हैं कि अन्य देशों के प्रवासियों को संयुक्त राज्य अमेरिका से इतना प्यार है कि वे यहां आने के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालते हैं और हमारी प्रतिक्रिया यह है कि हम आशा करते हैं कि उन्हें मगरमच्छ खा जाएंगे।
आप यह सब देखते हैं और सोचते हैं, कोई बात नहीं। हम ऐसे ही हैं। रॉक में आपका स्वागत है। क्या आपका मनोरंजन नहीं हुआ?"
पर्यावरण विद, मूल अमेरिकी नागरिक और मानवाधिकार समर्थक इस कैम्प का कर रहे हैं। लेकिन अमेरिकी प्रशासन इस सबसे बेपरवाह हिरासत केंद्र बनाने के तत्पर हैं। इस बारे में हम कुछ कर भी नहीं सकते। हमारे विदेश मंत्री जी कह ही चुके हैं -"अमेरिका वाले ऐसा ही करते हैं। पहले भी ऐसा हुआ है।"
आपका क्या सोचना है इस बारे में ?
1. अमेरिका की दुर्गम जेल अलकार्ट्ज़ के बारे में जानकारी का लिंक
2. एलिगेटर एलकार्ट्ज़ का इलाक़ा देखने के लिए बेनी जॉनसन का एक्स का लिंक

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Saturday, July 05, 2025

मशरूम पंचर

 कल सुबह पोस्ट में मशरूम पंचर का जिक्र किया था पोस्ट में। पता नहीं था क्या होता है मशरूम पंचर। शाम को टहलते हुए गए पंचर की दुकान पर। पता करने कि क्या होता मशरूम पंचर।


दुकान की तरफ़ जाते हुए डर भी लग रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि कुछ और लिखा हो जिसे हमने मशरूम पंचर पढ़ लिया हो।
नुक्कड़ पर पहुंचकर देखा तो बोर्ड पर लिखा था -मशरूम पंचर। ख़ुशी हुई कि चलते-चलते जो पढ़ा था वह ठीक ही पढ़ा था। यह भी की पंचर वाले मनोज थे। लगा कि सिर्फ़ अब्दुल ही नहीं मनोज भी पंचर बनाते हैं।
दुकान पर बैठे मनोज से पता किया तो उन्होंने बताया कि जो पंचर बड़े हो जाते हैं, बाहर से नहीं बनते उनको अंदर से बनाया जाता है। मशरूम मतलब कुकुरमुत्ता। कुकुरमुत्ता में ऊपर छतरी सरीखी बनी होती है वही ट्यूब में अंदर फँस जाती है और पंचर टिक जाता है। अपने सर की क़ुर्बानी देकर ट्यूब की रक्षा करता है कुकुरमुत्ता पंचर।
जानकारी ली तो पता चला कि मशरूम पंचर, जिसे प्लग या पैच रिपेयर भी कहा जाता है, एक प्रकार की टायर रिपेयर है जिसमें एक मशरूम के आकार का रबर प्लग इस्तेमाल किया जाता है। यह पंचर को अंदर और बाहर दोनों तरफ से सील करके एक स्थायी समाधान प्रदान करता है।
कुकुरमुत्ता पंचर की जगह मशरूम पंचर लिखने का कारण वही होगा कि अंग्रेजी नाम का ज़्यादा असर पड़ता है। यह बहुत पहले की बात है जब निराला जी ने कुकुरमुत्ता कविता लिखते हुए गुलाब को हड़काया था -“अबे सुन बे गुलाब।”
निराला जी के बाद से समय बहुत बदल गया है। निराला जी की बात अलग थी। उनकी हिम्मत थी कि कुकुरमुत्ता की तरफ़दारी करते हुए गुलाब को फटकार सकते था कहते हुए-“इतरा रहा कैपिटलिस्ट।” आज कोई ऐसा कहे तो ज़मानत का इंतज़ाम पहले करके कहे।

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विकास कब तक पहुँचेगा


 आज सबेरे टहलने निकले तो सड़क किनारे की एक दुकान से आवाज सुनाई दी -“पेटीएम से 12 रुपए प्राप्त हुए।”

मतलब 12 रुपये का डिजिटल भुगतान हुआ।
डिजिटल पेमेंट आजकल शहरों में आम है। छोटे-छोटे दुकानदार , ठेले वाले, मोची, चाय वाले सब जगह लोगों के पास स्मार्ट फ़ोन है और वे डिजिटल भुगतान स्वीकार करते हैं। होटल में बेयरे तक टिप के लिए अपना मोबाइल नंबर बताते हैं। आजकल भारत तेजी से डिजिटल इंडिया बन रहा है।
डिजिटल इंडिया से लगता है भारत तेजी से उन्नति कर रहा है। लेकिन कभी भाजपा के थिंक टैंक माने जाने वाले गोविंदाचार्य जी ने भारत के डिजिटल इंडिया माडल की आलोचना करते हुए लिखा है नीतिगत रूप से डिजिटल इंडिया देश के विकास के लिए ठीक नहीं है। उनका कहना है -डिजिटल इंडिया का प्रारूप ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ पर आधारित है। मतलब देश में संपन्नता ऊपर से नीचे आयेगी। उनका कहना है कि यह व्यवस्था ग़लत है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब देश के आम लोगों के चलने के लिए ट्रेंने नहीं मुहैया करा पा रहे हैं तो कुछ लोगों के लिए बुलेट ट्रेन पर पैसा फूंकना ठीक नहीं है।
एक बातचीत में प्रधानमंत्री जी को बुलेट ट्रेन के बारे में जो कहा उसका मतलब था -"बुलेट ट्रेन विकास के लिए जरूरी है। "
बहरहाल यह तो बड़े लोगों के विचार। अपन तो सड़क की बात कर रहे थे।
आगे एक जगह एक जगह एक कुत्ता सड़क पर एक प्लास्टिक की कटोरी में दूध पीता दिखा। पास में दूसरा भी था , वह भी दूसरा पी रहा था। वहीं पास में एक आदमी थर्मस से दूध निकालकर और भी कुत्तों को दूध पिला रहा था।
बातचीत करते हुए उसने बताया कि वह वहीं पास में ही प्रेस का काम करता है। दुकान के पास जो कुत्ते बैठते हैं उनको सुबह दूध पिलाता है, शाम को खाना खिलाता है।
कुत्तों के नाम भी रखे हैं उसने -शेरू, टाइगर, कालू। दो मादा कुत्ते भी हैं -काली, भूरी। खुद का नाम बताया -राजकुमार।
सबकी देखभाल करता है, खाना खिलाता है। रोज़ एक लीटर दूध पिलाता है। खाना का हिसाब भी कुछ होगा।
और बात करने पर पता चला कि राजकुमार उन्नाव के रहने वाले हैं। उन्नाव में कहाँ के पूछने पर बताया -सफीपुर। सफीपुर में हमारे मित्र गौड़ साहब रहते हैं। हमने उनके बारे में राजकुमार से पूछा तो उनको पता नहीं था। हमने सोचा -“बताओ भारत सरकार के वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड (SAG) से रिटायर हुए अधिकारी को वहाँ रहने वाला एक आम आदमी नहीं जानता तो काहे का प्रशासन का भौकाल।
बहरहाल आगे बढ़ने पर नुक्कड़ पर फुटपाथ पर रहने वाले लोग दिखे। छोटे-छोटे बच्चे एक बाल्टी पानी से चुल्लू-चुल्लू लेकर नहा रहे थे। नहा क्या शरीर भिगा रहे थे। उनकी माएँ आपस में लड़ते हुए तेज-तेज बतिया रही थीं। आदमी लोग बगल में सो रहे थे। बाक़ी लोग शायद काम-धंधे पर निकल गए थे।
उनके बगल से गुजरते हुए सोचा कि ये लोग और इनके वंशज फुटपाथ से हटकर कब किसी घर में जा सकेंगे? ट्रिकल डाउन थ्योरी से विकास टपकते हुए कब इन तक पहुँचेगा? कभी पहुँचेगा भी क्या ?
हमको पता है कि इस तरह के सवालों के कोई जवाब नहीं होते। लेकिन सोचने में कोई फीस नहीं इसलिए सोच लिया।

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Friday, July 04, 2025

टहलते हुए मास्टर स्ट्रोक

 टहलने निकलते समय हर बार ज़ेहन में सवाल उठता है -'किधर चलें?' हर बार की तरह आज भी उठा यह सवाल। पहले हमने  पार्क में जाकर टहलने की सोची। चल भी दिए उस तरफ़। लेकिन  पार्क की तरफ़ जाने वाले गेट तक पहुंचकर अचानक दूसरी तरफ़ मुड़ गए और सड़क पर आकर टहलने लगे। 


पार्क जाने की जगह सड़क पर आ जाना एक सामान्य इंसान के लिए  सामान्य घटना है। लेकिन किसी असामान्य इंसान के साथ यह घटना होती तो उसके भक्त लोग इसे उसका 'मास्टर स्ट्रोक' बताते। क्या 'मास्टर स्ट्रोक' मारा है कहते हुए उसकी वंदना के स्वरों में अपना सुर मिलाने के आह्वान करते। जो न मानता उसे सामान्य नागरिक के पद  से बर्खास्त करके विधर्मी, देशद्रोही के खाते में डाल देते। 


श्रीलाल शुक्ल जी अपने उपन्यास 'रागदरबारी ' में लिखते हैं : "उत्तम कोटि का सरकारी आदमी, कार्य के अधीन दौरा नहीं करता। वह जिधर निकल जाता है उधर ही उसका दौरा हो जाता है।" इसी तर्ज पर बड़े लोगों से  जो भी काम हो जाता  वह उनका 'मास्टर स्ट्रोक' होता हैं।बड़े लोग किसी के सामने मुर्गा बनते हुए घिघियाते भी हैं तो उनके भक्त लोग कहते हैं -"वाह, क्या मास्टर स्ट्रोक मारा है। अगले के सामने मुर्गा बनकर दिखा दिया और उसकी हिम्मत नहीं हुई कुछ बोल सके। 


सड़क पर लोग आने-जाने लगे थे। बच्चे स्कूल जा रहे थे, बड़े लोग काम पर। हम न स्कूल जाने वालों में, न काम पर जाने वालों में बेमतलब सड़क पर टहल रहे थे। 

पहले ही मोड़ पर नुक्कड़ पर एक पंचर वाले की दुकान पर पंचर के रेट लिखे थे। 'मशरूम पंचर'  दाम   300 रुपए लिखे थे। हमें मशरूम के बारे में पता था, पंचर के बारे में पता था लेकिन  'मशरूम पंचर' के बारे में नहीं पता था। दुकान बंद थी वरना पूछ लेते। अगली बार पूछेंगे अगर याद रहा। 

लेकिन यहाँ 'मशरूम पंचर' रिपेयर रेट  बताकर मुझे डर लग रहा है कि कहीं कोई अगले चुनाव में देश की महँगाई का ठीकरा पंचर बनाने वालों पर न फोड़ दे। कहे -"भाइयों और बहनों, ये पंचर बनाने वाले लोग 300 रुपये में पंचर बनाते हैं। मंहगाई बढ़ने का कारण ये पंचर बनाने वाले हैं।"

सड़क के सामने से जिला अस्पताल का बोर्ड दिख रहा था। 'अस्पताल' के बोर्ड से 'स्प' ग़ायब था। हालांकि यह कोई बड़ी बात नहीं  अस्पताल जब बिना जरूरी दवाओं और मेडिकल स्टाफ के काम कर सकते हैं तो बोर्ड में  डेढ़ अक्षर न होना कोई बड़ी बात नहीं। 

सामने सड़क अभी चलने को काफ़ी उपलब्ध थी लेकिन हम अचानक बिना हाथ दिए बायीं तरफ़ मुड़ गई। इससे एक बार फिर तय हुआ कि आदतें दूर तक पीछा करती हैं।  गाड़ी चलाते अक्सर बिना हाथ/इंडीकेटर  दिए मुड़ जाने वाली आदत पैदल चलते समय भी हावी है। गाड़ी चलाते समय तो अक्सर मुड़ने के बाद हाथ दे देते हैं लेकिन पैदल चलते हुए वह ज़हमत भी नहीं उठाई हमने। मुड़ गए तो मुड़ गए। जो होगा देखा जाएगा। 

आगे एक सीवर सफाई गाड़ी नाली के पानी में पाइप डाले उसको साफ़ कर रही थी। गाड़ी के पीछे रोमन में लिखा था -चकाचक।  हमसे कोई हालचाल पूछता है तो बिना सोचे आदतन कहते हैं -'चकाचक।' हमको लगा कि हमारी बातचीत सुनकर गाड़ी वाले ने नक़ल कर ली है। 

तिराहे पर कबूतर दाना चुगकर शायद अपने-अपने ठीहे पर जा चुके थे। कोई किसी दफ़्तर के मुंडेर पर, कोई किसी धार्मिक स्थल पर, कोई वीराने में, कोई कहीं बाग-बगीचे में। अब कबूतरों की दुनिया का मुझे पता नहीं लेकिन क्या पता वहाँ भी कोई वर्गीकरण होता हो। दफ़्तरों के कोटरों में बैठने वाले कबूतर कामकाजी कबूतर कहलाते होने,  बाग-बग़ीचों , वीरानों में घूमने वाले कबूतर आवारा/ बेरोजगार/मजनू कबूतर, धर्मस्थलों में घूमने वाले धार्मिक कबूतर। और भी तमाम  श्रेणियाँ होंगी। 

क्या पता कबूतरों के यहाँ भी चुनाव होते हों, उनके भी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति होते हों, उनका भी  कोई 'गुटरगूँ मीडिया' होता हो जो अपने नायक के कसीदे काढ़ता हो, उसके हर स्ट्रोक को 'मास्टर स्ट्रोक' बताता हो। उनके यहाँ भी कबूतरों के दो गुटों में लड़ाई होती हो जिसके रुकने पर कोई तीसरा  कबूतर कहता हो -"हमने सीज फायर करवा दिया।"

आगे और भी तमाम बातें सोचीं कबूतरों के बारे में लेकिन यह सोचकर नहीं लिख रहे कि न जाने कौन कबूतर बुरा मान जाए और मान मानहानि का मुकदमा कर दे। पापुलर मेरठी का शेर भी या आ गया :

"अजब नहीं जो तुक्का भी तीर हो जाए, फटे जो दूध तो पनीर हो जाए

मवालियों को  देखो हिकारत से, न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाए।"

तुक्का-तीर, दूध-पनीर वाली बातें तो न जाने कब से होती आई हैं। लेकिन गुंडों के वजीर बनने वाली बात जो पहले अपवाद होती थीं अब वे आम होती हैं। हमें डर है कि कहीं इसके लिए भी पापुलर मेरठी साहब को दोषी न ठहरा दिया जाये। 


कबूतर कथा को पीछे छोड़कर आगे बढ़े तो फुटपाथ पर ही गुजारा करने कुछ महिलाएं, बच्चे, पुरुष दिखे। एक महिला अपने बच्चे को सड़क किनारे बैठाये पेशाब करा रहा थी, दूसरी महिला अपने बच्चे की सड़क पर की हुई टट्टी को सड़क पर पड़ी एक पालीथीन से पोंछते हुए साफ़ कर रही थी। उनसे कुछ दूरी पर बना गुलाबी शौचालय (Pink Toilet) शायद उनके लिए नहीं था। आज के समय में  कोई सुविधा   होना लेकिन सबके लिए न होना सभ्य समाज की निशानी हैं। बुनियादी सुविधाएं भी इससे अलग नहीं है।

उन लोगों में से कुछ बच्चे और कुछ बड़े एक बोतल से कोई पेय निकालकर ग्लास में डालकर चुस्की लेते हुए पी रहे थे। पास से गुजरते हुए देखा बोतल पर स्प्राइट लिखा था। कोई इसे भी अपने समाज की संपन्नता से जोड़कर देख सकता है -"हमारे यहाँ बेघर और फुटपाथ पर रहने वाले तक स्प्राइट पीते हैं।" 

स्प्राइट पीने वालों से थोड़ा दूर एक कोने में बैठी बच्ची सर झुकाये एक आम से कुश्ती सी लड़ती हुई आम से गूदा निकालकर खा रही थी। गुठली चूस रही थी। सौ रुपए किलो से ऊपर का आम बच्ची को चूसते देखकर मुझे लगा कि कोई इसके ख़िलाफ़ केस न कर दे कि यह आम बच्ची के पास आया कैसे? पाँच किलो राशन में फल तो शामिल नहीं हैं।

घूमते हुए उसी पार्क की तरफ़ आ गए जहाँ टहलने के लिए जाने की बात हमने सबसे सोची थी। हम पार्क में घुसकर टहलने लगे। टहलते हुए सोचा कि कोई देखेगा तो इसे हमारा यू टर्न बताएगा। कहेगा जहाँ न जाने को हम अपना 'मास्टर स्ट्रोक' बता रहे थे अब उसी जगह पर आकर टहल रहे हैं। लेकिन किसी के कहने से क्या? हमारा 'मास्टर स्ट्रोक' हम तय करेंगे। किसी दूसरे को क्या हक कि हमारा मास्टर स्ट्रोक तय करे? 

यह निर्णय पर पहुंचते ही हमें लगा -"अरे यार यह तो एक और 'मास्टर स्ट्रोक' हो गया।" सुबह-सुबह टहलते हुए तीन मास्टर स्ट्रोक हो जायें इससे ज़्यादा और किसी को क्या चाहिए?  है कि नहीं?