Saturday, August 06, 2005

अधूरे कामों का बादशाह


सबेरे से दोपहर तक का समय सफलतापूर्वक बरबाद करके देश की प्रगति में भरपूर योगदान कर चुकने के बाबजूद तिवारी जी अपने काम से खुश नहीं दिख रहे थे। मन कुछ बेचैन सा था।लंच होने ही वाला था लेकिन न जैने कैसे झटके से उठे। सामनेपर पड़ी फाईलों से कुछ बिना देखे उठाकर वे साहब के कमरे की तरफ चल दिये। रास्ते में अपने चेहरे पर ६७:३३ के अनुपात में जिम्मेदारी और बेचैनी का मिश्रण पोतकर वह साहब के कमरे के सिस्टम में चुपके से किसी वायरस की तरह घुसे तथा हालात का जायजा लेने लगे।
दफ्तर में सुव्यवस्थित अव्यवस्था फैली थी। साहब की मेज पर करीब १०० किलो फाईलें तथा सामने की कुर्सियों पर करीब ५०० किलो शरीर पसरे थे। साहब के मुंह के दांये कोने में ‘पारकर’ का पेन घुसा था तथा बायें कोने में पान का कब्जा था। मुंह के बीच का रास्ता आवाज की आवा-जाही के लिये था।माथे के ऊपर रंगीन चश्मा किसी कार के बोनट सा टंगा था।साहब की दशा फिलहाल सोचनीय थी लिहाजा यह अंदाज लगा पाना जरा कठिन था कि साहब के चेहरे से जो टपक रहा था उसे तनाव कहा जाय या तेज!
जैसा कि सर्वविदित है कि अधिकारी चाहे कर्मठ हो या कामचोर ,उसके काम करने का विशिष्ट तरीका होता है। इस सिद्धांत के अनुपालन में साहब के काम करने का भी खास तरीका था। वे मंजिल पाने से ज्यादा यात्रा करते रहने के हिमायती थे। कोई काम निपटाने की बजाय उसे करते रहने में साहब को ज्यादा सुकून मिलता। मातहतों से बातचीत करते तो भी इस अंदाज को नहीं छोड़ते। वे एक बार में कभी भी किसी व्यक्ति से कभी भी पूरी बात नहीं करते। दो-तीन मिनट किसी से बतियाते । फिर उसके बगलवाले से । फिर उसके भी बगल वाले से। उनके दफ्तर में लोग आते भले ही अलग-अलग समय पर हों पर जा हमेशा साथ-साथ ही पाते थे।
कुछ लोग मजाक में कहते कि साहब को किसी फकीर ने बताया है – ‘जिस दिन तुमने कोई काम पूरा कर दिया उसी दिन तुम्हारे दिन पूरे हो जायेंगे।’
अधिकारी चाहे कर्मठ हो या कामचोर ,उसके काम करने का विशिष्ट तरीका होता है।
शायद इसीलिये साहब की सक्रियता वहीं तक रहती जहां तक काम मुश्किल दिखता। जहां लगा कि काम को पूरा होने अब कोई नहीं रोक सकता ,वहीं साहब निष्क्रिय हो जाते। फिर भी यदि कहीं काम पूरा होने की आशंका दिखती तो अपने स्तर से काम को ‘लंबित’सूची में डाल देते।साहब के साथी प्यार से उन्हें अधूरे कामों का पूरा बादशाह कहते थे। मातहतों में वे कटियागुरु के नाम से जाने जाते थे-जो लोगों को हमेशा अपने से उलाझाये रखते।
बहरहाल साहब को लगा कि काम तेजी से बढ़ना चाहिये।सो उन्होंने डांटते हुये कहा-
मि.मिश्रा,यह लेटर मैंने आपको’पर्सनली लास्ट वीक’ दिया था-फोटोकापी कराके। दफ्तर की फोटो कापी मशीन तीन महीने से खराब थी है तो अपने पैसे से फोटो कापी करा यी। पर अभी तक आपने इसे पढ़ातक नहीं । कमाल है। कोई’ सेंस आफ अरजेंसी’ ही नहीं।
मिश्राजी शायद स्वामी रामतीर्थजी के झांसे में आकर सीखी ध्यानवस्था में थे। साहब ने दोबारा झल्लाहट बढ़ाकर सवाल दोहराया तो तिवारीजी ,जो कि बगलवाले साथी द्वारा कोहनियाये जाने की साजिस के कारण ध्यानावस्था से जाग्रतावस्था में आ चुके थे, बोले- साहब ,आपका यह आरोप मिथ्या है कि मैंने यह पत्र पढ़ा नहीं। अंग्रेजी का हर पत्र मैं कम से कम तीन बार पढ़ता हूं- अच्छी तरह समझने के लिये। इसे भी तीन बार पढ़ा। हां,यह संभव है कि पत्र को हमारे तथा आपके समझने में समझने में अंतर हो।क्योंकि समय की स्वाभाविक कमी की वजह से आप शायद एक बार ही पढ़ पायें हों।
साहब बोले-अरे,हमारे तुम्हारे पढ़ने से क्या पत्र का मतलब बदल जायेगा?
मिश्राजी बोले-निश्चित हुजूरेआला! अब आप यह समझिये कि पत्र लिखने वाले तथा पढ़ने वालों(मेरे,आपके) के अंग्रेजी सीखने के कार्यकाल में कुछ तो अंतराल होगा। इस अंतराल में शब्दों के मायने बदल गये होंगे। जैसे कि हमारे जमाने में फ्रेंडशिप का मतलब मित्रता होता था। अब इसका मायने अवसरानुकूलता जैसा हो गया है।
मिश्राजी ने जब दूसरे उदाहरण देने के लिये सांस ली तो पाया कि साहब उनके बगलवाले से मुखातिब थे तथा किंचित रोष से पूछ रहे थे-
आपको तीन दिन पहले दिया था यह काम मैंने ।अभी तक किया नहीं। क्या मजाक बना रखा है!
वर्माजी ने सहमने का नाटक करते हुये कहा-साब,सच कह रहे हैं आप। पर तमाम कोशिश के बावजूद मैं इसे कर नहीं सका। काफी मुश्किल है। समझ के ही नहीं दे रहा कि कैसे होगा?साहब उखड़ गये- क्या खाक मुश्किल है! तीस साल हो गये कलम घिसते ,बाबूगिरी करते हुये आपको। इतना छोटा सा काम नहीं कर पाये-तीन दिन में। ये तो कोई अफसर भी कर सकता है।
वर्माजी साहब के रोष के झांसे में आये बिना बोले-हां साब, सच कह रहे हैं आप। अब अफसर सिर्फ बाबूगिरी करने लायक तो रह गये है। सारी अफसरी तो नेताओं को ‘आउटसोर्स ‘कर दी है।तभी तो काम और देश ठहरा हुआ है।
काम के बीच में देश को फंसा पाकर साहब को लगा कि जरूर कोई ऊंची बात है। जिसको तुरंत समझना जरूरी है। लिहाजा वे सोचने के लिये लपककर चिंतनकक्ष ,जो कि दुनिया में बाथरूम के नाम से जाना जाता है,अंतर्ध्यान हो गये। लोग गप्पाष्टक में जुट गये।
अब अफसर सिर्फ बाबूगिरी करने लायक तो रह गये है। सारी अफसरी तो नेताओं को ‘आउटसोर्स ‘कर दी है।तभी तो काम और देश ठहरा हुआ है।
-यार ये कटिया गुरु कब छोड़ेगे?
-देखते जाओ आगे-आगे होता है क्या?
-समय की इतनी बरबादी! तीन घंटे से मीटिंग कर रहे हैं। नतीजा सिफर।
-तो तुम क्या समझते हो मींटिंग नतीजे के लिये होती है। मीटिंग ,मीटिंग के लिये होती है।
-हमें समझ में नहीं आता कि तुम लोग घंटे बरबादी के लिये काहे रोते हो? क्या डाक्टर ने बताया है घड़ी बांधने को? हम तो पिछले तीस साल से कैलेंडर से काम कर रहे हैं। आजतक कभी घड़ी के मोहताज नहीं रहे।
बातें शायद और से चलतीं तब तक कमरे में इधर से साहब तथा उधर से मातहतों की नयी खेप घुसी।घुसते ही सबने बची कुर्सियों पर पिंडारियों की तरह कब्जा कर लिया। एक व्यक्ति एक पद के सिद्धान्त के अनुसार कमरे की सारी कुर्सियों पर लोगों का कब्जा हो गया। साहब ने कमरे के बाहर लगा लाल बल्ब जला दिया।कमरा रेड लाइट एरिया में तब्दील हो गया।
साहब दुबारा लोगों से मुखातिब हुये। बोलना शुरु करते ही दरवाजा ‘फ्लडगेट’ की तरह झटके से खुला। तथा पांडेजी हड़बड़ाते हुये अंदर घुसे।वे कुर्सियों को अनदेखा करके साहब के बगल में जाकर खड़े हो गये।कागज साहब के सामने फैलाते हुये बोले-साहब जरा इनमे दस्तखत कर दीजिये।
साहब- देखिये ,अभी मैं कुछ जरूरी मीटिंग कर रहा हूं। इसीलिये बाहर लाल बल्ब जला रखा है।
पांडे जी को लगा जैसे उनको किसी होमगार्ड ने चौराहे पर लाल बत्ती क्रास करते गाड़ी सहित पकड़ लिया हो तथा आखों ही आंखों में पूछ रहा हो -मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये!
वर्माजी बोले-हुजूरेआला, आप मीटिंग करते रहिये। हम कौन होते हैं रोकने वाले आपको। रही बात लालबत्ती को अनदेखा करने की तो इसे मेरी बेअदबी या गुस्ताखी न समझा जाये । हम तो हुजूर के दरबार में सर झुकाकर सजदा करने आते हैं देखते ही नहींकि ऊपर लाल-बल्ब जल रहा है या नीला।आप तो फिर भी कमरे में बल्ब जला के बैठते हैंकमरे में । पहले वाले साहब तो कमरे के बाहर बल्ब जला के तड़ी पार कर जाते थे। हम लोग दिन भर बल्ब लाल से हरा होने के इन्तजार में रहते । शाम को पता चलता कि साहब दूसरे शहर में बास के कमरे के बाहर बत्ती हरी होने का इंतजार कर रहे होते हैं। खैर आप दस्तखत कर दीजिये ।हम चलें
साहब बोले-अरे पहले पढ़ तो लेने दो।
वर्माजी बोले- अरे साहब,क्या फायदा ! आपकी समझ में कुछ आयेगा नहीं। मैं बीस साल से रिपोर्ट बना रहा हूं मुझे कुछ नहीं समझ आया आज तक तो आप क्या समझेंगे।आज आखिरी तारिख है रिपोर्ट भेजने की। अगर आज नहीं गयी तो सोमवार को रिमान्डर आ जायेगा।
साहब को हेडक्वार्टर ,रिमान्डर के अलावा कुछ समझ में नहीं आया। जब किसी अधिकारी को कुछ नहीं समझ आता तो वह दस्तखत कर देता है यह मानते हुये उन्होंने दस्तखत कर दिये।
साहब ने काम में मन लगाने की कोशिश की । एक काम पूरा होने के नजदीक पहुंच गया । यह देखकर साहब घबरा गये। तब तक फोन बजा। साहब ने हलो किया। उधर से फोन कट गया ।फिर भी साहब बोले,तुम खाना लगाओ मैं आ रहा हूं। मातहतों से बोले-सी इज वेटिंग फार लंच।
तिवारीजी कैंटीन की तरफ बढ़ते हुये सोच रहे हैं जब मेमसाहब घर में है तो वे कौन मैडम हैं जिनके आदेश पर उनकी पत्नी उनको कैंटीन के भरोसे छोड़कर किटी पार्टी में शामिल होने गयी हैं!
अधूरे कामों के बादशाह उर्फ कटिया गुरु की कार धुंआ उड़ाते हुये उनके सामने से गुजर गई।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “अधूरे कामों का बादशाह”

  1. प्रत्यक्षा
    बहुत अच्छे !क्या खाका खींचा है……..मज़ा आ गया…
    प्रत्यक्षा
  2. Atul
    एक हास्य पढा था शायद अभिव्यक्ति पर “भाबू”, उसकी याद ताजा हो गयी। वह और यह लेख दोनो हमारी कार्य संसकृति का जीवंत चित्रण हैं।
  3. syllable
    syllable
  4. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] कैसे छोड़ दिये जायें ? 2.अधूरे कामों का बादशाह 3.हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा [...]
  5. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] कैसे छोड़ दिये जायें ? 2.अधूरे कामों का बादशाह 3.हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा [...]

Monday, August 01, 2005

संस्कार कैसे छोड़ दिये जायें ?













मैं जब भी कुछ लिखने की सोचता हूं तोपिछली पोस्ट याद आती है।लगता है कि कुछ छूट गया जो कि लिखा जाना जरूरी है।इस पोस्ट पर कुछ साथियों के सुझाव भी हैं।स्वामीजी, पद्मजा तथा तरुणका मानना है कि लड़का-लड़की विवाह के बाद घरवालों से अलग रहें।अतुलका कहना है कि अन्तरराज्यीय,अन्तरजातीय संबंध बनाने से स्थितियां सुधर सकती हैं।आलोक का मानना है कि यह लड़के का फर्ज है कि वह मौके की नजाकत को समझे तथा लड़की को लड़की को विश्वास दिलाये कि वह उसका शुभचिंतक है।
लगता है कि कुछ छूट गया जो कि लिखा जाना जरूरी है।इस पोस्ट पर कुछ साथियों के सुझाव भी हैं।
मैं खुद क्या सोच रहा था कहना बड़ा मुश्किल है।जब हम दूर होते हैं समस्याओं के हल बड़े सरल दिखते हैं।पास से देखने पर तमाम पेंच दिखते हैं।समाजशास्त्री हीइसका सम्यक विवेचन कर सकते हैं।पर जो मुझे लगा वह लिखने का प्रयास करता हूं। शुरुआत पात्र-परिचय से:-
लड़का:- लड़का अपने मां-बाप का अकेला पुत्र है। पिता राज्य सरकार में राजपत्रित अधिकारी हैं।बेटे को भरपूर प्यार मिला है। शिक्षा-दीक्षा में बहुत अच्छा न रहा पाने के कारण नौकरी कुछ बहुत अच्छी नहीं मिली।स्वभाव से उग्र-गुस्से को मर्दों का आभूषण मानने वाला।मारपीट से परहेज नहीं।तुनकमिजाजी के कारण कोई स्थायी दोस्त नहीं। ढींग हांकने की आदत से मजबूर। कमाई बहुत अच्छी न होने के कारण आर्थिक रूप से पिता पर काफी कुछ निर्भर। पिता से अल्पसंवाद, डर को श्रवणकुमार का रूप देता है।
लड़की:- तीन बहनों तथा एक भाई में सबसे छोटी।पढ़ी-लिखी,खूबसूरत। शादी के पहले तीन बहनों में सबसे चुलबुली।पिता की बचपन में मृत्यु।दोनों बड़ी बहने तथा भइया का सुखी वैवाहिक जीवन।सीधी तथा डरपोक की हद तक विनम्र।
लड़के के पिता:- स्वभाव से गरम मिजाज के स्वामी। सामंतवादी सोच। लंबे अर्से से एक ही जगह पोस्टेड। दफ्तरी दांव-पेंच के चलते हर बात में शंका करने कीस्वाभाविक आदत। मर्दाने गुणों को धारण करने की आदतन ललक। वायदे के अनुसार काम करने की कोशिश।अधिकार भाव।विरोध सहन करने में कमजोर। अपनी सोचके अनुसार तर्क का जामा पहनाने के लिये सदैव तत्पर। दुनियावी अर्थ में सफल।
लड़के की मां:-आम मध्यम वर्गीय मां। पति की जायदतियों को स्वाभाविक मानकर सहन करने की शिक्षा देने वाली।लड़के के प्रति अतिशय प्रेम। लड़के को हमेशा साथ रखने की कोशिश।
लड़के की बहन:- पढ़ी-लिखी,तेज-तर्रार-स्मार्ट सी युवा कन्या। विवाह होना है। भाभी से बदतमीजी को वह सामान्य व्यवहार मानती है।उम्र में भाभी के लगभग बराबर। भइया से दो साल छोटी।
लड़की के घरवाले:- आम लड़की वालों की तरह। विनम्र, सशंकित,डरे-सहमे।पिता की मौत के बाद सारी जिम्मेदारियां सबसे बड़े लड़के ने पूरी कीं।मां लड़के पर निर्भर।दो दामाद भले- स्वभाव से खुशमिजाज।
जितना मैं समझ पाया वह यह कि सब लोग अपने हिसाब से सही आचरण कर रहे थे। लड़के का पालन-पोषण दुलार-प्यार में हुआ।उसके अवगुणों को बहादुरी से बखाना गया। एकबार लड़के की मां ने बखाना-हमारा लड़का अपने साथ के लड़कों को पीट देता था। बड़े-बड़े गुंडे लड़कों को इसने धूल चटा दी है।आमबात है कि जिस पक्ष की वाह-वाही होती है हम उसका अधिक मात्रा में अंगीकरण करते जाते हैं।इसी तरह के धूल चटाने वाली तमाम आदतों से जाने-अनजाने लड़का विभूषित होता गया।
शादी के बाद अपना कहने को बीबी मिली तो वह सारे गुण अपने बीबी पर प्रदर्शित करने लगा।प्रेम में गहराई लाने के लिये यदा-कदा मारपीट भी करने लगा। जब लड़की ने यह बात अपनी सास को बताई तो उनका कहना था -ये सब तो होता ही है। निभाना ही पड़ेगा।वे शायद भुक्त भोगी थीं। लड़का अपने बाप द्वारा स्थापित स्वर्णिम परम्परा का निर्वाह कर रहा था।
जबतक लड़का बिना किसी रोक-टोक के पीटता रहा तबतक ससुराल वालों का प्यार लड़की के प्रति बना रहा।कुछ दिन बाद रोज-रोज की हरकतों से तंग आकर लड़की अपने मायके चली आयी तब से ससुराल वालों का रुख बदल गया। लड़की में बुराइयां दिखने लगीं। लड़का कुछ दिन बेचैन रहा। रोज-रोज माफी मांगकर तथा आइंदा सही व्यवहार करने का वायदा करके पत्नी को वापस ले आया।अपनी हर बात घर में बताता था लिहाजा इस घटना को उसके घर वालों ने व्यक्तिगत अपमान के रूप में लिया। तथा हर तरह से लड़की वालों को गलत ठहराने के प्रयास शुरु कर दिये।वे उस मानसिकता में जीते हैं -मायके से लड़की की डोली उठती है,ससुराल से लड़की की अर्थी ही निकलती है।
लड़का अमरबेल की तरह पिता पर हर तरह से निर्भर था।वह परतंत्र भारत के पुलिसवालों की तरह देशवासियों पर मजबूरी के अत्याचार करता रहा।लड़की इतनाआतंकित होती गई कि विरोध करने की हिम्मत भी न जुटा पायी। वह ससुराल वालों के रसूख से इतना सहमी थी कि कोई भी कदम उठाने की सोचने के पहले सोचती कि अगर प्रयास असफल रहा तो मायके वाले परेशानी में पड़ जायेंगे। आज कानूनी हालत यह है कि यदि शादी के बाद लड़की ससुराल वालों के खिलाफ किसी भी प्रकार के उत्पीड़न की रिपोर्ट लिखाती है तो सारा परिवार (ससुराल) नाचा-नाचा फिरता है लेकिन उसको इसका अंदाजा नहीं था। जब हालात बहुत बिगड़ गये। लड़की का फोन सुना जाने लगा तब वह चिड़चिड़ी होती गई। जिन घर वालों से बात करने के लिये वह परेशान रहती थी उनका फोन आने पर कहती-आपलोग फोन किसलिये करते हैं? मत किया करें फोन। इसके बाद फिर जो हुआ वह बताया गया।
दुनिया में उस व्यक्ति से अभागा कोईनहीं होता जिसको ,निस्वार्थ भाव से, गलत बात पर टोंकने वाले साथी नहीं मिले होते
घटना के बाद लड़का अगले दिन लड़का मेरे पास आया । पूछा- मैं अपनी पत्नी को बिना कैसे रहूंगा? मैंने कहा-यह तो तुम्हे तय करना होगा। पर यह भी है कि कुछ न कुछ गड़बड़ तुम्हारी तरफ से जरूर है वर्ना तुम्हारी पत्नी तुम्हें इस तरह छोड़ के न जाती। मैंने सलाह भी दी कि उसको अपने पैरों पर खड़े होनेका प्रयास करना चाहिये। उसने माना कि घर में उसकी हालत कमजोर है ।वह यह भी सोच रहा था कि अब दोनों पक्ष केस दायर करेंगे। तथा बीबी से उसकी मुलाकात की संभावनायें कम होती जायेंगी। मैंने आश्वस्त किया कि लड़की वालों की तरफ से ऐसा कुछ नहीं होगा। पर वह डरा हुआ था कि कहीं उसके पिता अपने बचाव में कुछ न लिखा-पढ़ी न कर दें। अनुरोध भी किया कि मैं उसके पिता को समझाऊँ कि वे कुछ बिगाड़ वाला काम न करें। मैंने कहा -ठीक है। तब उसने यह भी कहा -मेरे पिताजी को पता न चले कि मैं आपके पास आया था। मैंने यह भी मान लिया। गया भी तथा समझाने का प्रयास भी किया।अभी तक दोनों पक्ष शान्त हैं।लड़का इधर-उधर से प्रयास करके पत्नी से बात करने की कोशिश करता रहता है।लड़की फिलहाल किसी भी तरह से वापस आने की नहीं सोचती।
जो कारण मुझे पता लगे उससे मेरी धारणाओं की पुष्टि हुई कि लड़का घरवालों पर कई तरह से निर्भर है।इसीलिये भी वह अपनी पत्नी के खिलाफ ऊलजलूल हरकतेंकरता रहता है। लड़के के कोई ऐसे दोस्त भी नहीं हैं जो उसे सही बात के लिये सलाह सकें तथा गलत बात पर टोंक सके।दुनिया में उस व्यक्ति से अभागा कोई नहीं होता जिसको ,निस्वार्थ भाव से, गलत बात पर टोंकने वाले साथी नहीं मिले होते।उसकी बहन भी भाई की कमजोर हालत के चलते भाभी से बदतमीजी करने को स्वाभाविक समझती है। लड़का कुछ दिन घर से बाहर रहा जिस शहर में लड़की का मायका है। इससे लड़के की मां को यह अहसास हुआ कि लड़का जाने-अनजाने हाथ से निकलता जा रहा है ।वह लड़का, जो आर्थिक रूप से बाप पर निर्भर हो,हाथ से निकल जाये यह कोई मां कैसे बरदास्त करसकती है? लिहाजा वे हर संभव प्रयास करती रहीं कि लड़का मजनूपने की हालत से निकले। यह मौका भी जल्द ही आ गया जब लड़के का तबादला दूसरे प्रदेश हो गया। इकलौते लड़के को दूसरे प्रदेश भेजने की बजाय उसको इस्तीफा दिलाकर घर बैठा दिया गया। फिर यही सब हुआ।
जिस देश के मर्यादा पुरुषोत्तम तक ने दुनिया के कहने पर अपनी पत्नी को त्याग दिया उस देश के, बाप पर डरने की हद तक निर्भर ,लड़के बीबी के साथ कैसे खड़े होने का हौसला जुटायेंगे ?
तमाम मत जो व्यक्त किये गये वे सब अलग-अलग हालात के लिये ठीकहो सकते हैं।पर मुझे जो लगता है वह यह है कि लड़की को अपने अधिकार की जानकारी तथा जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की सीख बेहद जरूरी है।आर्थिक आत्मनिर्भरता भी जरूरी है ।हालांकि भारत में आमतौर पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलायें भी पूरी जिंदगी पिटते हुये बिता देती हैं।मानसिक मजबूती तथा आत्मनिर्भरता ज्यादा जरूरी हैं।लड़के को भी अपनी समझ रखनी चाहिये तथा बीबी को गुलाम न समझ करसाथी समझने की तमीज आनी चाहिये।
पर समस्या यह है कि जिस देश के धर्मराज तक मां के कहने पर बीबी को बांटने के लिये तैयार हो गये तथा जिस देश के मर्यादा पुरुषोत्तम तक ने दुनिया के कहने पर अपनी पत्नी को त्याग दिया उस देश के, बाप पर डरने की हद तक निर्भर ,लड़के बीबी के साथ कैसे खड़े होने का हौसला जुटायेंगे ?वह भी तब जब बीबी को पीटने का संस्कार उन्हें विरासत में मिला है। संस्कारों को कैसे छोड़ दिया जाये?
लड़की की तारीफ मैं इस बात के लिये करूंगा कि मौका मिलने के बावजूद उस दिन पुलिस से तथा आज तक भी उसने ससुराल वालों पर झूठे इल्जाम नहीं लगाये। बहरहाल फिलहाल वह अपने मायके में है । दुबारा चहकना सीख रही है।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

10 responses to “संस्कार कैसे छोड़ दिये जायें ?”

  1. Jitu
    व्देखो भइया, इस समस्या का समाधान थोड़ा विचित्र है
    पहले पहल तो लड़के के बापजी को साधा जाये, और उन्हे दुनियादारी समझायी जाये, कुछ बुजुर्ग लोगो के द्वारा दहेज उत्पीड़न कानून की धाराये, बहुत ही विनम्र शब्दो मे समझायी जाये. साथ ही उनसे बहुत विनम्र अन्दाज मे बताया जाय कि सिर्फ एक रिपोर्ट करने पर पूरा का पूरा परिवार फ्री मे जेल मे हालीडेज मनायेगा, और इज्जत मे वृद्दि होगी सो अलग. तब शायद वे कुछ पिघलें.
    गलती लड़की वालों की भी है, निकम्मे लड़के से अपनी फूल जैसी बेटी ब्याहने के लिये किसी डाक्टर ने कहा था क्या? खैर अब क्या हो सकता है, एक बात तो है, लड़का लड़की को बहुत प्यार करता है, यही प्यार ही इस समस्या के समाधान का बेस बनेगा. लड़की वालों को चाहिये, लड़के को स्वावलम्बी बनाने मे कुछ सहयोग करें और धीरे धीरे समस्या को सुलझाने की कोशिश करें.
    फिर भी समस्या एक दिन मे नही सुलझने वाली, एक जरा सी गलती या जल्दबाजी मे दो दिलो बिछड़ जायेंगे. जो दुनिया का सबसे बड़ा जुर्म होगा.
  2. आलोक कुमार
    आत्मनिर्भरता नहीं होने से ही पङ्गा शुरू हुआ है। अभी भी समय है।
  3. Atul
    कूपमँडूकता
    “इकलौते लड़के को दूसरे प्रदेश भेजने की बजाय उसको इस्तीफा दिलाकर घर बैठा दिया “, यह अनजानी टेरीटरी में पैर जमाने से डरने की सोच हमारे क्षेत्र के लोगो को अपनी चौहद्दी से आगे नही जाने देती। घर के शेर बने रहते हैं और बने रहना चाहते हैं।
  4. आशीष
    सवाल मानसिकता का है। मैं पूछता हूं कि इस समाज में कितने लोगों की शादियां बिना दानदहेज और शोशे बाजी के बिना हुई हैं। जब किसी का लड़का है तो उसको दहेज अच्छा लगता है और जब लड़की की बात आती है तो वही चीज गंदी लगने लगती है। सवाल ये है कि क्या भारतीय लोग इस लेन देन से मुक्ति पा सकते हैं? दहेज धारा वगैरह से कुछ नहीं होने वाला। ऐसी धारायें बनती रहती हैं और लोग दहेज लेते रहते हैं। जैसे कि दलित उत्पीढ़न चलता रहता है जबकि सबको मालूम है कि ये कानूनी अपराध है।
    ये इस पर निर्भर है कि समाज क्या चाहता है?
  5. राजेश कुमार सिंह
    बहुत बढिया कहा , आशीष जी आपने।
    -राजेश

Wednesday, July 27, 2005

बारिश में भीगते हायकू का छाता

पानी बरसा,
छत टपक गई
अरे बाप रे!

मिट्टी थी जो,
कीचड़ बन गई,
अरे बाप रे!

सड़कें जाम,
स्कूल बंद हुये,
मज़ा आ गया!

पानी भी क्या,
हचक के बरसा
सब हैरान!

बाढ़ आ गई,
सब कुछ चौपट,
अब क्या होगा!

सांप-नेवला,
एक पेड़ के नीचे
वाह रे भैया!

बाजार बंद,
बोहनी के भी लाले
आगे क्या होगा!

सब्जी कड़की
सब सामान सुने
दाम उछालें!

चूल्हा सिसका,
कैसे आग जलेगी
लकड़ी गीली!

नेता जी बोले,
जहाज मंगा लेव
दौरा कर लें!

साहब बोला,
ये तो होता ही है,
छान पकौड़ी!

फाइल बोली,
चल भाग जा सूखे
मेरी बारी है!

लैला चहकी,
किधर हो मजनू
लव हो जाये!

ये जी मुस्काई,
आज जान सकी मैं,
बड़े वैसे हो!

टूटी छत है,
खुली व्यवस्था सी
कोई भी आये!

दरारें बोली,
मेरे पानी भइया
धीरे निकलो!

छाता चहका,
सुन मेरी छतरी
पूरी बिक जा!

गौमाता बोली,
राहें चौराहे सूने
चलों बैठ लें!

देहली बोली,
मेरी जान मुंबई
फिर फंस ली!

नदी बावरी,
तट को खा गयी
बड़ी बुरी है!

बूँद बैठकी
में हल ये निकला
काम शुरु हो!

जर्जर छज्जा,
घोटाले के बाद के
ग्राफ सा गिरा!

बीमारी बोली
सब जान निकालो
मौका बढिया!

मोर नाचता
बड़ा बेशर्म,बना
अमेरिका है!

बरखा रानी!
बहुत बरस लीं
अब तो बक्सो!

बदरी बोली
सुन मेरे बदरे
अब तो छोड़ो!

काफी हो गया
फुरसतिया बोले
पोस्ट कर दे!



15 responses to “बारिश में भीगते हायकू का छाता”

  1. इहाँ मालवा मे पानी नाहीं है
    त्राहि-त्राहि मची है
    अगले साल क्या पियेंगे ?
  2. बहुत अच्छे!
  3. झूमता रहा
    मना मयूर क्यों
    बरसात में
    काले बादल
    कितने मनमौजी
    बरसे कहाँ
  4. एक हायकू और……
    एकाकी बैठे
    पानी की टपटप
    सुनते हम…
  5. ये मेरी ओर से
    पानी मिलाने
    का काम बरखा का
    ग्वाले खुश।
    खुले गटर
    कमर भर पानी
    हड्डी संभालो।
    सिली माचिस
    फूल गये किवाड़
    वर्षा है आई।
  6. Achhe hain saare haiku lekin itne saare ek hi din kaiku
  7. [...] ��ी रहती हैं-चाहे वो फिर फुरसतिया के हायकू हों अनूप भार्गव की नज़्म या फिर सा [...]
  8. [...] इसके बाद मैंने अपने बारिश के मौसम के बारे में लिखे अपने हायकू सुनाना शुरू किया और सारे नहीं सुना पाये कि पब्लिक हक्का-बक्का से रह गये| हमने तुरंत मौके की नजाकत को देखते हुये हायकू-कतरन समेट लिया और कविता का पूरा थान फैला दिया| कविता पढ़ी:- आओ बैठे कुछ देर पास में, कुछ कह लें,सुन लें बात-बात में| [...]
  9. [...] पहले तो मेरा मन हुआ कि बरसात में कुछ हायकू की बौछार कर दी जाये- पानी बरसा, छत टपक गई अरे बाप रे! [...]
  10. [...] ये भी पढें: बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  11. anitakumar
    देहली बोली,
    मेरी जान मुंबई
    फिर फंस ली!
    :) मुंबई को फ़ंसने में भी मजा आता है, न फ़ंसे तो बच्चों को पानी में चलने का मजा, स्कूलों से अचानक मिली छुट्टी का मजा कैसे मिले। हम तो कहत है बरसो रे हाय बैरी बदरवा बरसो रे, जोर से बरसो, रोज बरसो, ताकि हम रोज पकौड़ी का मजा ले सके मसालेदार चाय के साथ्। बारिश में भीगने का अपना ही एक मजा है। जिस दिन बारिश होती है हम तो जानबूझ कर छाता भूल जाते हैं ।
  12. [...] 1. त्रिवेणी: एक विधा 2. गुलजार की कविता,त्रिवेणी 3.बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  13. [...] 1.तुलसी संगति साधु की 2.बदरा-बदरी के पिछउलेस 3.एक ब्लागर मीट रेलवे प्लेटफार्म पर 4.घर बिगाड़ा सालों ने 5.बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  14. very nice. keep on writting.

Sunday, July 24, 2005

घर बिगाड़ा सालों ने


हवा देश की प्रगति की तरह ठहरी थी। मौसम न अच्छा था न बुरा-बस था। तब तक फोन की घंटी बजी। पता लगा कि हमें पास में एक मित्र की बहन की ससुराल जाना है। वहां उसकी बहन को उसकी ससुराल वाले तंग करते हैं। मित्र भी पहुंचने वाले थे। लेकिन जब तक वे पहुंचे तब तक कन्या की रक्षा का दायित्व मेरे ऊपर सौंप दिया गया था।


मैंनें अपने चहेरे पर स्थायी रूप से कब्जा जमाये लापरवाह अंदाज को अतिक्रमण की तरह उखाड़ फेंका। कुछ जिम्मेदारी चेहरे पर तथा पता बताने के लिये एक साथी को कार में भरकर चल दिया तथा दस मिनट में उस बंद फाटक इस पार पहुंच गया जिसके उस पार एक कन्या अपनी ससुराल में परेशान थी।

तब तक लड़की की माता तथा भाई भी वहीं पहुंच गये थे। घंटी बजाने पर लड़की के ससुर बाहर आये तथा उन्होंने अपनी समधन तथा लड़की के भाई को अंदर बुलाने से मना कर दिया।लेकिन हमें ‘सादर सा’ अंदर बुला लिया। दरवाजे पर ताला फिर लगा दिया।


हम अंदर घुस गये। लगा ,हालात जितनी जिम्मेदारी हम चेहरे पर लादे हैं ,उससे कुछ ज्यादा ही गंभीर हैं। लिहाजा हमने अपने चेहरे और आवाज में गंभीरता भी लपेट ली। बाहर जाकर गेट के उस पार खड़े लड़की के घर वालों से कहा -आप चिंता मत करो। बाहर कार में बैठो । मैं सब देख लूंगा। लड़की की मां बाहर कार में बैठ गयीं। भाई पुलिस का सहयोग लेने के लिये चला गया। हम वीरोचित गंभीरता तथा जिम्मेदारी चेहरे पर चस्पा करके अंदर सोफे में धंस गये।


मैं कुछ पूँछूँ उससे पहले ही लड़की के ससुर ने लड़की की मां तथा भाई को अंदर आने न देने का कारण बताया ।कारण सिर्फ इतना था कि एक बार उनका लड़का जब अपनी ससुराल गया था तो उसे चार घंटे बाहर इन्तजार करना पड़ा था। समानता के समर्थक होने के नाते वे चाहते थे कि उनको भी कम से कम उतनी देर तो इंतजार कराया जाये जितनी देर उनके लड़के को करना पड़ा। उनकी बात को तर्कपूर्ण न मानने का बहाना मुझे तुरंत कुछ नहीं सूझा।


हम कुछ इधर-उधर की बातों में भटकें तभी मुझे आया याद कि हम ऐसे काम के लिये आये हैं जिसमें मुझसे जिम्मेदारी तथा समझदारी की अपेक्षा की जाती है। हमने तुरंत लड़की से मिलने की इच्छा जाहिर की। इच्छा तुरंत पूरी की गयी। सहमी सी लड़की मेरे बगल में आकर बैठ गयी। मैं अचानक एक निर्लिप्त शख्स से लड़की के भाई में तब्दील हो गया। मैंने अपना हाथ लड़की के सर पर रखा। वह किसी उस पुल की तरह थरथरा रही थी जिस पर से अभी-अभी कोई रेलगाड़ी गुजरी हो। समय के साथ यह थरथराहट कम होती गयी। वह धीरे-धीरे सहज होने का प्रयास कर रही थी। लेकिन बोल अभी भी नहीं पा रही थी। कमरे में हमारे अलावा लड़की का पति, ननद, सास,ससुर तथा लड़की की हाल में ही पैदा हुई लड़की थी। घर के बाहर लड़की की मां ताला लगे गेट के उस पार अंदर आने को छटपटा रहीं थीं। मैं फिर बाहर गया कहने -आप चिंता न करें। बिटिया सकुशल हैं। मैं अंदर हूं ।वे कुछ आश्वस्त सी हुईं।


दुबारा अंदर आकर मैंने माहौल को हल्का करने का प्रयास किया तथा कुछ हल्की-फुल्की बातें शुरु की। सास से पूंछा-क्या बात है क्या आप लोग सास-बहू के सीरियल ज्यादा देखतीं हैं?


सुनते ही सास झपट पड़ीं-आप तो इस तरह की बातें करेंगे ही। आप तो लड़की वालों की ही तरफदारी करेंगे। हमने तुरंत अपनी सारी ताकत अपने को गुटनिरपेक्ष साबित करने में झोंक दी। आवाज में बला की गंभीरता ठेलते हुये कहा- न हम लड़की की तरफ से आयें न लड़के की तरफ से। हम सिर्फ आयें हैं। हम सिर्फ लड़के-लड़की की भलाई चाहते हैं। इसी घराने के कुछ और डायलाग मारकर हम गुटनिरपेक्ष की मान्यता पाने में सफल हुये।


हमने अधिकारपूर्वक लड़की की तेजतर्रार ननद को लगभग डांटते हुये चाय का आदेश दे दिया।फिर लड़की की तरफ मुखातिब हुये। पूछा -तुम्हें यहां क्या तकलीफ है? क्यों घर जाना चाहती हो? उसने लगभग हकलाते हुये कहा-मुझे यहाँ कोई तकलीफ नहीं हैं। पर मैं अपने पति से ‘एडजस्ट’ नहीं कर पा रहीं हूं। मैं कुछ दिन के लिये अपने घर जाना चाहती हूं। मैंने -पूछा – क्यों ‘एडजस्ट’ नहीं कर पा रही हो? वह बोली- मैं बहुत कोशिश के बावजूद अपने को पति के अनुरूप नहीं बना पा रहीं हूं। अपने में सुधार नहीं कर पा रही हूं।


यह सुनते उस घर के सारे लोग लगभग झपट पड़े । क्या तकलीफ है इसे यहां ? कोई काम नहीं करना पड़ता है। बच्ची को दूध पिलाने के अलावा कोई काम नहीं करना पड़ता। लड़की ने फिर कहा-मुझे कोई तकलीफ नहीं है। पर मैं एडजस्ट नहीं कर पा रही हूं। कुछ दिन के लिये घर जाना चाहती हूं।


सास ने लड़के को ताना मारा- देख लो ! बहुत मजनूं बने घूमते हो। बहुत चाहते हो अपनी बीबी को। यह तुम्हारे साथ रहना तक नहीं चाहती। सुन लो असलियत।

पति अपनी पत्नी को बहुत चाहता है यह रहस्योद्‌घाटन होते ही हमने बातचीत की दिशा में बदलाव किया। लड़के से बातचीत शुरु की। पता चला कि लड़की तो बहुत मासूम है। सारा कसूर लड़की की मां का है जो फोन पर लड़की को ऊटपटांग सलाह देती रहती हैं। बातचीत में थोड़ा गणित ठेलते हुये उसने बताया – मैं बहुत कोशिश करके अपने संबंध को १० प्वांइट तक ले जाने की कोशिश करता हूं तभी इसकी मम्मी(मेरी सास) कोई ऊलजलूल हरकत करके संबंध को शून्य पर ले आती हैं। मुझे नये सिरे से मेहनत करनी पड़ती है। मैं सोच ही रहा था कि यहां मेहनत से जी नहीं चुराना चाहिये की सलाह ठीक रहेगी कि नहीं तबतक लड़का थोड़ा और खुल गया। अपनी आधुनिकता तथा खुलेपन का परचम लहराते हुये वह बोला- इसकी मम्मी का दखल हमारे संबंधों में इतना अधिक है कि यह तक वे तय करती हैं कि हम कब यौन संबंध स्थापित करें कब न करें।


तमाम ऊलजलूल किस्से सुनाता रहा लड़का अपने जीवन में अपनी ससुराल वालों के अनावश्यक हस्तक्षेप के । उसके घर वाले भी लगातार आरोप लगाते रहे। सब लोग इतना चिल्ला रहे थे कि मुझे लगा यदि इस ध्वनिऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित किया जा सके तो शायद इनकी साल भर की बिजली समस्या हल हो जाये।


कोई बेवकूफी की बात सुनकर बिना कोई जवाब दिये या सगूफा छोड़े चुप रहने का बिल्कुल अभ्यास नहीं है मेरा। फिर भी जिम्मेदारी का अहसास मुझे चुप किये था।इस बीच तमाम दुनियावी डायलाग बोलकर तथा लड़की के पक्ष में कुछ भी न बोलकर मैं एक गुटनिरपेक्ष समझदार के रूप में स्थापित हो चुका था।


देखते-देखते चार घंटे बीत चुके थे। तथा मैं यह समझाने में सफल हो चुका था कि यह उचित नहीं कि लड़की की मां बाहर इंतजार करे। पसीज कर लड़के वाले उदार हो गये। लड़की की मां तथा उनके साथ कुछ अन्य हितैषी अंदर आ गये थे। मेरी पत्नी लगातार मुझे मोबाइल फोन पर हिदायत दे रहीं थीं – किसी भी हालत में लड़की को अकेले मत छोड़ना तथा हर हाल में लड़की को वहां से मायके लाना है। पत्नी की तत्परता से प्रभावित होने के बावजूद हम वहां से कुछ जवाब देने की हालत में नहीं थे। उनको हमने एस.एम.एस. किया -हमको पता है कि हमें क्या करना है। तुम निश्चिंत रहो।


इधर आरोपों का सिलसिला नये सिरे सेचल पड़ा सारी बातें मुझे नये सिरे से सुननी पड़ीं। लड़के वाले थके होने के बावजूद कोसने में कंजूसी नहीं कर रहे थे। बल्कि उम्र के कारण शायद लड़की की मां की सुनने की ताकत कम हो गयी होगी यह मानकर उनकी आवाज की ऊँचाई और तल्खी में इजाफा हो गया था।घंटों चली इस एक तरफा बहस का कोई नतीजा तो खैर क्या निकलना था। पर लड़के वालों की सक्रियता तथा लड़की वालों की मजबूरी के चलते कुछ स्थापनायें हो चुकी थीं:-


१.लड़की को कोई तकलीफ नहीं है ससुराल में । हमारे सामने ही जो खुशहाली ठूंसी जा रही थी सहमी सी लड़की में उससे यह बात पुष्ट होती थी।

२.लड़की में कोई कमी नहीं है। सिर्फ वह बहुत सीधी है तथा बेवकूफ भी है इसीलिये अपने मायके वालों के बहकावे में आ जाती है।

३.सारी कमी लड़की के घर वालों खासतौर पर मां की है जो जब-तब लड़की को ऊट-पटांग सलाह देती रहती हैं।

४. लड़का अपनी बीबी को बहुत चाहता है। इसलिये किसी भी कीमत पर अपनी बीबी को फिलहाल मायके नहीं भेजना चाहता।

५.लड़की चूंकि दुबली पतली है तथा लड़का तंदुरस्त लिहाजा कभी प्यार में कुछ झटके लग गयें होंगे उन्हें किसी भी तरह इस रूप में नहीं लिया जाना चाहिये कि लड़का लड़की को मारता है।

६.(बकौल लड़की के सास-ससुर)अगर लड़की को जाना ही है तो तलाक के कागज में दस्तखत करके जाना होगा।ताकि वे(मायके वाले) बाद में उन्हें ब्लैक मेल न कर सकें।


मैं काफी देर तक लड़के के भाई का इंतजार करता रहा। लड़की के भाई के ‘एक्शन’ का इंतजार था।लड़के वालों का अड़ियल रुख देखकर इस बात पर मैंने राजी कर लिया था कि ठीक है अगर लड़के वाले किसी भी हालत में लड़की को भेजने को राजी नहीं है तो कम से कम यह करें कि लड़की -लड़का मेरे घर शाम को आयें तब मैं उन दोनों के बीच की गलतफहमियां दूर करने का प्रयास करूंगा। यह तय करके तथा शाम को वापस फिर आने की बात कहकर मैं घर चला आया। हमारे आने तक माहौल बोझिल तो था लेकिन आरोपों का सिलसिला कुछ थम गया था। शायद लड़के वाले थक गये थे, चिल्लाते-चिल्लाते।


शाम के पहले ही अचानक बुलाये जाने पर जब मैं दुबारा घटनास्थल पर पहुंचा तब नजारा बदला हुआ था। शांत हो चुके लड़के के बाप दुबारा परशुराम बन गये थे। तथा पूरे कमरे में नाच-नाचकर हाथ को फरसे की तरह हिलाते हुये चीख रहे थे कि यहां पुलिस बुलाकर हमारी बेइज्जती करा दी।पता चला कि दो पुलिस वाले लड़की के भाई की शिकायत पर आये थे पर भाई खुद नहीं आ पाया था।पुलिस वालों को तो, कोई समस्या नहीं है ,कहकर वापस कर दिया गया था। लेकिन समस्या पैदा हो गयी थी।


हमने सोचा कहें- कि पुलिस तो आपके दरवाजे उतनी देर भी नहीं रुकी जितनी देर लाल बत्ती होने पर आप पुलिस वाले के बगल में चौराहे पर खड़े होते हैं।पर समझदारी के टैंक ने हमारी सोच को कुचल दिया।

बहरहाल उन्होंने भी अपना पक्ष मजबूत करने के लिये स्थानीय महिला नेता को पति समेत बुला लिया था। महिला नेता ने आते ही सबको नमस्कार करके घोषणा की कि मैं सिर्फ लड़की से बात करूंगी।वे लड़की को लेकर साथ वाले में कमरे में चली गयीं। इधर मंचपर नेता पति का नेता का कब्जा हो गया।


तमाम तरह की अंगूठियों के गिरफ्त में फंसे हाथ नचाते हुये उन्होंने बताया कि शादी के बाद लड़की परायी हो जाती है ।कि लड़की के घर वालों का उसकी ससुराल में हस्तक्षेप से मामला बिगड़ जाता है। चूँकि यह बाते सामान्य समझ की हैं लिहाजा कोई खास तवज्जो नहीं दे पाये लोग। ताव में आकर उन्होंने यह बात दुबारा कही तथा इस बार एक कहावत भी साथ में लपेट दी:-

दीवार बिगाड़ी आलों ने,
घर बिगाड़ा सालों ने। 


लड़के के पिता के आफिस वाले भी उनके समर्थन में आ गये थे।सभी लोग लगभग यह स्थापित कर चुके थे कि अलग होने में अंतत: नुकसान लड़की का ही होता है। लड़के के पिता दिल के बहुत अच्छे हैं। आदि-इत्यादि।


इस बीच लड़की का भाई पुलिस की नयी खेप लेकर आ गया था। साथ में महिला पुलिस भी थी। जिस तरह उन लोगों ने नेताजी से दुआ-सलाम की उससे हमें लगा कि हम विरोधियों से घिर गये हैं-हारी लड़ाई लड़ रहे हैं।


महिला पुलिस अंदर चली गयी लड़की से बात करने । नेताजी को कुछ याद आ गया काम वे चले गये।हम इंतजार करने लगे-बुझे मन से। बहुमत (जाहिर है लड़के वालों का)लड़की वालों को समझाने में जुट गया कि लड़की की भलाई इसी में है कि उसे फिलहाल वापस ले जाने की जिद समेत यहीं छोड़ दिया जाये।


काफी इंतजार के बाद महिला नेता मय महिला पुलिस अधिकारी तथा लड़की के बाहर आयीं तथा उन्होंने जो कहा उससे मुझे पहली बार लगा कि नेता भी समझदारी की बात कर सकते हैं। उनका मानना था कि चाहें जितना चाहते हों ससुराल वाले,चाहें कोई तकलीफ न हो उसे यहां लेकिन अगर वह मायके जाना चाहती है तो उसे रोकने का कोई कारण नहीं बनता।


इस पर लड़का बिफर गया -ये नहीं जायेगी। लड़के की बहन भी कुछ तीखा बोली। मां ने भी अपनी कुछ भडास निकाली।


इसके बाद जो हुआ वह मेरी आंखों के सामने अभी भी नाच रहा है तथा कानों में अभी भी गूंज रहा है। लगभग सामान्य सी दिखने वाली महिला पुलिस अधिकारी ने कड़ककर लड़के को फटकारा -क्यों नहीं जायेगी वह मायके? क्या वह तुम्हारी लौंडी है या जरखरीद गुलाम? सलीका सीखो बीबी को अपना बना के रखने का । उससे पहले तमीज सीखो बात करने की। लड़के की बहन जो अपनी कान्वेन्टी अंग्रेजी से अपनी बेवकूफियां छितरा रही थी उसने अंग्रेजी में हड़काते हुये कहा- विहैव योरसेल्फ एंड लर्न हाऊ टु टाक इन फ्रन्ट आफ अदर्स ।अपनी भाभी से इतनी बदतमीजी से बात करती हो शर्म नहीं आती। शादी के बाद तुम्हारे घर वालों की ही तरह ससुराल वाले वाले मिले तो सारी स्मार्टनेस हवा हो जायेगी। लड़के की मां को झिड़कते हुये कहा-जब हमारे सामने अपनी बहू से ऐसा बर्ताव कर रहे हैं आप लोग तो अकेले में कैसा करते होंगें? एक घंटे में मुझे आपलोंगो से बात करने में इतना ‘सफोकेशन’ हो रहा है तो वह लड़की कैसा महसूस करती होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
कुछ देर बाद हम लड़की को अपने साथ लेकर घर की तरफ बढ़ रहे थे।लड़की ने बहुत देर बाद अपने चुटकी काटी तथा सहमते हुये भाई से पूँछा कि क्या सच में मैं घर चल रही हूं। भाई ,जिसने पिता की मौत के बाद बहन को बाप की तरह पाला था , ने उसे सीने से चिपटा लिया ।


मैं सोच रहा था कि जिस समाज में दिनभर की जद्दोजहद के बावजूद अपनी बहन को विदा कराने के लिये लड़की के भाई को पुलिस बुलानी पड़े तथा यह धमकी देनी पड़े कि यदि बहन को विदा न किया तो जान दे दूंगा उस देश में महिलाओं की स्थिति क्या होगी। यह तो तब है जबकि जब लड़की खूबसूरत, पढ़ी-लिखी( एम.ए. अंग्रेजी में फर्स्ट क्लास पास) है तथा शादी के दौरान तथा बाद में दहेज या पैसे की कोई बात नहीं थी।
आप क्यों चुप हैं, क्या विचार है आपका?

6 responses to “घर बिगाड़ा सालों ने

  1. शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन का सेट-अप – ससुराल और माईका दोनो दो दूसरे शहरों मे हों और आप सपत्नीक तीसरे शहर मे, आजीविका के बहाने. ;-) 
  2. बिल्कुल सही कहा स्वमीजी आपने.
  3. मुझे तो शुक्ला जी सारिका जी के गुरू की बात सही लग रही है। अधिक से अधिक अँतरराज्यीय ‌और अँतर्जातीय सँबध , जो समाज की बनायी मान्यताऐं और दीवारे ढहा दें।
  4. antarrajiy agar India ke hi hon aur antarjatiy bhi India se to yeh problem to tab bhi rahegi abhi tak to swamiji ka idea sahi hai,
    agar hum dusre shabdi me bole to – ek sasural north pole, dusra south pole aur aap rahe GMT me aajivika kamane Sath me jo phone aap use kar rahe hon contact banaye rakhne ke liye usper laga ho koi accha sa anti virus program.
  5. यह पता लगा पाना मुश्किल है कि गड़बड़ किस तरफ़ है, या शायद व्यर्थ ही हो। मियाँ बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी? पर लड़कियों की अभी तक ऐसी हालत नहीं है कि हर समय अपना मुँह खोल सकें। लड़के का ही फ़र्ज़ है कि मौके की नज़ाकत को समझे। आख़िर लड़की जिनके साथ बचपन से रही है, उन्ही से सलाह मशवरा करना बेहतर समझेगी न। साफ़ है कि लड़का, लड़की को विश्वास नहीं दिला पाया है कि वह उसका शुभचिन्तक है। लड़के को ही आगे बढ़ के जताना ही पड़ेगा कि हाँ, आप मेरी जीवन सङ्गिनी हैं, और इसलिए मैं आपकी परेशानियों सुलझाने के लिए कदम पहले उठाऊँगा, और बाद में अपने माता, पिता, बहन की चिन्ता करूँगा। एक बार इस बात का अहसास लड़की को हो जाए तो वह लड़के के परिवार को अपने से भी बढ़ कर अपना मान के चलेगी, बल्कि यह कोशिश करेगी कि उन्हें कोई दिक्कत न आए, भले ही पति को आ जाए। इसके बजाय अग़र लड़का अग़र हर मौके पर माँ और बहन के पल्लू में छिप कर उन्हें ही आगे कर दे तो लड़की को भला अपनापन कैसे लगेगा।
    आपने सही कहा है, पढ़ लिख लेने से समानता नहीं आ जाती। महिलाओं की हालत का सुधार अग़र किसी चीज़ से हुआ है तो उनकी आर्थिक स्वतन्त्रता से हुआ है।
    दाद लेकिन मैं इस बात की देता हूँ कि आपने इस विषय पर लिखा। हममें से अधिकतर लोग शायद लिखते हैं ज़िन्दगी की असलियतों से भागने के लिए, उनका सामना करने के लिए नहीं।
  6. [...] मैं जब भी कुछ लिखने की सोचता हूं तो पिछली पोस्ट याद आती है। लगता है कि कुछ छूट � [...]

Wednesday, July 20, 2005

एक ब्लागर मीट रेलवे प्लेटफार्म पर

वेंकट-सारिका
वेंकट-सारिका
सबेरे जब हम आफिस पहुंचे तो मेज पर काम बहुत था। लिहाजा हम राउन्ड पर निकल गये। लौटा तो बताया गया कि जीतेन्द्र चौधरी का फोन आया था। हमने तमाम गैरजरूरी काम भी निपटा
लिये तब फोन करने की हिम्मत जुटा पाये।जो हमेशा सिर्फ एक मेल की दूरी पर रहता है वह चन्द मील दूर था। घंटी गयी तो जीतेन्द्र बजे। हाल-चाल का दर्द बांटा गया।हमने कहा-देख लो भइये,तुम्हारा लिखा साइट तक नहीं झेल पायी। शटर गिरा है मेरा पन्ना का। और लिखो-ब्राम्हण कहता है सालअच्छा है। जब हिंदी न जानने वाले इतना त्रस्त हो गये कि साइट जब्त कर ली तब हिंदी भाषियों का क्या हाल होगा!इसीलिये कहा गया है-अतिसर्वत्र वर्जयेत।पर जीतेन्द्र अविचिलित थे। बोले -सालों को वापस जाकर देखूंगा। मैंने पूंछा भी कि सालों को वहां देखोगे तो यहां किसको देखोगे? क्या वहां और सालों का जुगाड़ करोगे? कार्यक्रम पूछने पर बताया गया कि तमाम जगह जाना है। गोविंदनगर, रतनलालनगर, रामबाग वगैरह। बताने के अन्दाज से लग रहा था कि जैसे कोई बस स्टैंड वाला बसों के आवागमन की घोषणा कर कर रहा हो ।


बहरहाल जीतेन्द्र के तमाम बेतरतीब कार्यक्रमों ने हमें बचा लिया उनसे मुलाकात से। बोले शायद कल मिलेंगे। हमें लगा- चलो आज तो बचे। फिर भी एहतियातन हमने अपने पीए को बता दिया कि अगर हमारी अनुपस्थिति में जीतेन्द्र आयें तो जब तक हम आयें तबतक उनसे निरंतर का उनके हिस्से का अनुवाद का काम करा लें। जीतेन्द्र की तरफ से कम से एक दिन के लिये हम निश्चिन्त हो गये।

शाम को चार बजे फोन की घंटी बजी। सुरीली आवाज बोली-अनूपजी,नमस्ते। हमने कहा-नमस्ते क्या हाल हैं? पूछा गया-आपने पहचान लिया। हम सोच में डूबते-उतराते हुये बोले-पहचानने के नजदीक पहुंच रहा था कि इस सवाल से क्रमभंग हो गया।

क्षणिक सस्पेन्स का पटाक्षेप करते हुये बताया गया-मैं सारिका सक्सेना बोल रहीं हूं। नये सिरे से नमस्कार-खुशी का आदान -प्रदान हुआ। पता चला -रात की गाड़ी से वो कोलकता जा रहे हैं। तय हुआ शाम को स्टेशन में मिला जाये। घरों में तो लोग करते ही रहते हैं ब्लागर मीट। एक मुलाकात स्टेशन पर हो जाये।

हमने जीतेन्द्र को फिर खोजा। अटके थे गोविंदनगर में। पूछा चलोगे ब्लागर मीट को ऐतिहासिक बनाने। उनकी आवाज का भूगोल बिगड़ा हुआ था। बोले -यार ,इतना थका हूं कुछ पूछो मत। हम भी बोले -तुम बताओ मत हम समझ गये।

बहरहाल शाम को घर से जब मैं चला स्टेशन की ओर तो रात के आठ बज चुके थे। शब्दांजलि तथा अनकही बातें की सारिका से मिलने की उत्सुकता थी। कुछ देर भी हो गयी थी निकलने में। आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता ।
आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता ।
स्टेशन पहुंचकर हमने प्लेटफार्म नंबर एक पर गोरे ,गोल-मटोल चेहरे की तलाश में अपनी गरदन तथा आंखों को लगा दिया। दस मिनट बाद दोनों सर्च इंजन मुंह लटकाके बोले-सारी ,जो बताया आपने वो हम नहीं खोज पाये। मैंनेसोचा -मौका अच्छा है। सारी खूबसूरत महिलाओं से पूछ लिया जाये-माफ कीजियेगा आप सारिका सक्सेना तो नहीं हैं जो अमेरिका से आयी हैं। फिर हमें लगा कि वे तो माफ कर देंगी पर हम कैसे माफ करेंगे अपने को? राजधानी एक्सप्रेस छूटने में मात्र एक घंटा बचा था।

तो पीसीओ की शरण में जाना तय किया गया। पता चला कि आज गाड़ी प्लेटफार्म एक की जगह छह पर आनी थी । वहीं वे लोग मौजूद थे। हम पहुंचे । मुलाकात हुयी। सारिका अपने पति वेंकट,भाई सुधांशु तथा बिटिया कांति के साथ प्लेटफार्म नं छह पर मौजूद थी। बिटिया हमें देखते ही निद्रागति को प्राप्त हुयी। तमाम जरूरी-गैरजरूरी सूचनाओं के आदान-प्रदान से वार्ता-चक्र शुरु हुआ।

सारिका,कान्ति,वेंकट तथा अनूप
सारिका,कान्ति,वेंकट तथा अनूप
वेंकट आई.आई.टी.मुम्बई से मेकेनिकल इंजीनियर स्नातक हैं । फिलहाल डेट्रायट,अमेरिका में है। बिना दान-दहेज के शादी किया यह जोड़ा हमें अनायास बहुत प्यारालगा। वेंकट हमें कोकाकोला पिलाने लगे। सारिका से भी ब्लागिंग के बारे में बाते होने लगीं। बताया कि पहले मैं बहुत बोर होती थी जब वेंकट अपने काम में जुटे रहते थे कम्प्यूटर पर। फिर इनके प्रोत्साहन से बेव डिजाइनिंग सीखना शुरु किया तथा ब्लागिंग और फिर शब्दांजलि पत्रिका शुरु की। अब तो हाल यह है कि समय कहाँ सरक जाता है ,पता ही नहीं लगता।


मैंने वेंकट से पूछा -तुम तेलगू ब्लाग के बारे में हमें रिपोर्टिंग किया करो भाई। तो पता चला कि तेलगू बस काम भर की ही जानते हैं वे। उतने से काम बनेगा नहीं। सारिका के ब्लाग पढ़ते हैं कि नहीं के जवाब में बताया गया-पढ़ता हूं पर गति धीमी रहती है।

सारिका ने फिर कुछ ब्लागर्स की तारीफ शुरु की। अतुल की सबसे ज्यादा तारीफ कर रहीं थी कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं। इसके अलावा प्रत्यक्षा , रविरतलामी तथा निरंतर की टीम से प्रभावित थीं। ईस्वामी के बारे में पूछा-ये स्वामीजी कौन हैं। हमने बताया-यह तो शायद स्वामीजी भी नहीं जानते होंगे पर लिख-पढ़ - बोल लेते हैं उससे लगता है कि मानव योनि में अवतार लिया है।

निरंतर की बात चली तो फिर मजबूरन देवाशीष ,पंकज,रमणकौल,रविरतलामी तथा जीतेन्द्रकी नये सिरे से तारीफ करनी पड़ी। जल्दी-जल्दी सबका नाम जाप किया गया। पर मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ अतुल की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम पशुरोग विशेषज्ञ ज्यादा हो गये हैं
मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ अतुल की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम पशुरोग विशेषज्ञ ज्यादा हो गये हैं
तथा भैंस के दर्द पर शोधरत हैं।

पर हम कोकाकोला का घूंट पी कर रह गये। प्रत्यक्षा की जब ज्यादा ही तारीफ की सारिका ने तो मैंने बहाने से बुराई करनी चाही कि प्रत्यक्षा की कहानियों का खास पैटर्न है कि लगभग हर कहानी में औरत दुखी है । वह अपना संक्षिप्त सुख का समय बिता करे लंबे दुख वियोग के पाले में आ जाती है । उसका चरित्र उदात्त भले ही दिखाया जाये पर मिलता दुख ही है। मेरी कोशिश सफल नहीं हुई क्योंकि सारिका कहने लगी कि पर उनकी कहानियों में पुरुष का पक्ष भी रखा गया है। फिर झेलना तो नारी को ही ज्यादा पड़ता है। हमने आगे कुछ नहीं कहा-चुपचाप दूसरों की सारी तारीफ झेल गये।

एक दूसरे की रचना-प्रकियाओं पर भी बात हुयी। पहले मैं भी कागज में लिखता था लेकिन धीरे-धीरे मामला पेपरलेस होता
गया। शुरुआत दोनों लोगों ने ही अभिव्यक्ति में रविरतलामी का लेख पढ़कर की। मतलब यह कि अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है।

मैंने कहा कि तुम्हारी कुछ कविताओं की जिन लाईनों की मैं तारीफ करना चाहता था दूसरे लोग पहले ही उनकी तारीफ कर चुके हैं। थे । इसलिये नहीं की तारीफ। सारिका ने कहा तो कुछ नहीं इस पर लेकिन लगा कि कहना चाहती थीं कि ज़रा जल्दी विचार बनाकर तारीफ किया करें।मुझे बताया गया कि मेरा दीवारों का प्रेमालाप बहुत पसंद किया लोगों ने । तो मैंने बताया - निहायत चलताऊ अन्दाज में शुरु किया गया वह लेख बस यूं ही लिख गया था। अनूप भार्गव की कविताओं से लंबाई मिल गयी। बहरहाल मेरा यह विचार भी बना कि ज्यादा सोच-विचार के लिखने से लेख अच्छा हो जायेगा यह भ्रम रखना फिजूल है। इस बात पर साथी लोग विचार करें खासकर इंद्र अवस्थी जो अभी तक बचपने में ही अटके हैं।
अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है।


मां-बेटी
मां-बेटी
बातें और तमाम सारी हुईं । सारिका -वेंकट परिणय के बारे में भी जानकारी मिली। दोनों के गुरुजी ने एक-दूसरे के अनुरुप देखकर इनकी शादी कराई। बिना किसी ताम-झाम दान-दहेज के।
विभिन्न रुचि-स्वभाव रखने के बावजूद खुशहाल मियां-बीबी को देखकर लगा कि देश को ऐसे आदर्श गुरुओं की जरूरत हैं जो ताम-झाम,दान-दहेज के बिना शादी कराकर समाज को नयी गति दें।बातचीत में कबसमय सरक गया पता ही नहीं चला।राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई। सामान लेकर हम पास के ही केबिन में लपके। हालांकि कुली था फिर भी हमने सबसे हल्का झोलापकड़लिया।

डिब्बे के पास सारिका के भाई ने कहा-लाइये मैं पकड़ लेता हूं। मैंने कहा अब क्या यार,गाड़ी तक ही पहुंचा देता हूं। सारिका बोली -आप लिखेंगे कि सारिका ने मुझसे झोला उठवाया। मैंने कहा -नहीं ऐसा कुछ नहीं । यह सब भी कोई लिखने की बातें हैं? इसीलिये इस बारे में कुछ नहीं लिखा गया।

ट्रेन चल दी। हम कानपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर छह पर हुयी ब्लागर मीट की तमाम यादें सहेजे लौटे। जो याद रहीं वे यहां लिख दीं। रास्ते भर हमें अगले दिन जीतेन्द्र से संभावित मुलाकात का 'पिलान' बनाते रहे।

Saturday, July 16, 2005

बदरा-बदरी के पिछउलेस


लू के थपेड़ों से आहत ,बिजली के वियोग में विरहाकुल ,सूखा-राहत घोटाले की खबर वाले अखबार को अंपायर डेविड शेफर्ड के ‘चउआ’ वाले अंदाज में लहराकर पसीना सुखाते हुये कविवर चकाचक बनारसीकी नज़र अचानक आसमान की तरफ गई तथा उनका मन-मयूर नृत्य करने लगा। लुगाई पूछिस – का हो रउआ ! केकरा के देखके चमकत बाटी? चकाचक बनारसी बोले-
बदरा-बदरी के पिछउलेस,
सावन आयल का!
खटिया चौथी टांग उठइलेस,
सावन आयल का!
(बादल ने बदली का पीछा किया ,खटिया ने अपना चौथा पैर उठा लिया लगता है सावन आ गया)बादल और बदली चूंकि दोनों काले थे अत: इस बात का कोई खतरानहीं रह गया था कि बदली चिट्ठा लिखेगी ये मुआकलुआ मुझे छेड़ रहा था। वो छेड़ने लगा ,ये छिड़ने लगी। गर्मी बिछड़ने लगी।झमाझम बारिश होने लगी।बादल जब बरसते-बरसते हांफने लगा तो काम पर लगा दिया बरखा रानी को:-
बरखा रानी जरा जम के बरसो!
पानी बहुत देर तक सुकूनदेह विदेशी पूंजी सा खुशनुमा अहसासदेता रहा। फिर उसने छत पर व्यवस्था की दरारें टटोल लीं। उनके माध्यम से घर में दाखिल हो गया। सारा देशी ताम-झाम अस्तव्यस्त कर दिया। अपने घर में ही हम अपने रहने की जगह तलाशने लगे। उधर सन्नी देओल कह रहे थे-बनना है तो बनो अंदर से स्ट्रांग, पहनो लक्स कोजी बनियान । पता नहीं कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देश अपनी-अपनी अर्थव्यवस्था को लक्स-कोजी बनियान क्यों नहीं पहना देते।
शहर में जब भी पानी बरसता है सड़कें भर जातीं हैं। मिट्टी पहले ही मौजूद रहती है। दोनों के संयोग से जो दिव्य पदार्थ बनता है वह कीचड़ के नाम से जाना जाता है। पहले सड़कों के किनारे नालियां पायीं जाती थीं। अब वे सारी नालियां हड़प्पा संस्कृति का अंग हो गयीं हैं। फुटपाथ तथा सड़क का सीधा संबंध स्थापित हो गया है। कुछ वैसे ही जैसे ‘एमवे’ पदार्थ की बिक्री में उत्पादनकर्ता तथा उपभोक्ता की हाटलाइन जुड़ी होती है। लगभग सारी सड़कें बरसात के ऐन पहले अपना मेकअप बजरी -तारकोल से करती हैं। बरसात बीतते -बीतते यह मेकअप भी पुछ जाता है। नेताजी वैसे भी कहते हैं कि सड़के हेमामालिनी के गाल जैसी बनवायेंगे।ये बारिश का मौसम कुछ शूटिंग टाइप का होता है जिसमें सड़कें हीरोइनों की तरह मेकअप करती हैं। शूटिंग खतम-मेकअप हजम।असल में सड़कें भी स्वाभाविक रहना चाहती हैं। बारिश का आगमन उनके लिये अतिथि का आगमन होता है। तब दिखाने के लिये बजरी का मेकअप करती हैं। बरसात गयी, बजरी की बात गयी। मेहनतकश सड़क के चेहरे पर गढ्ढे उभर आते हैं।
सड़क तथा गढ्ढों का बहुत पुराना याराना लगता है। अटलबिहारीजी कहा करते हैं-यहां पता नहीं चल पाता कि सड़क पर गड्डा है या गढ्ढे में सड़क है।कुछ इलाकों में तो पानी इतना भर जाता है कि थोड़ा प्रयास करके साल भर की जरूरत भर का पानी इकट्ठा किया जा सकता है। तरणताल बनाने की सोची जा सकती है। अब सरकार से कोई उम्मीद करना तो ठीक नहीं लिहाजा जनता जागरूक हो रही है। जागरूक जनता प्रयास करती है कि शहर को जो पानी वरूण देवता ने इनायत किया वह कहीं गलती से बच गयी नालियों में न चला जाये। इसके लिये लोग यथा संभव प्रयास करते हैं कि नालों तक पानी को ले जाने वाली नालियों का समय रहते संहार कर दिया जाये। इस सद्प्रयास के चलते ऐन नालियों के ऊपर निर्माण कराना पड़ता है उन्हें। पहचान बनी रहे इसलिये निर्माण में नालियों की ईंटोका प्रयोग करने के बाद ही ईंट के भट्टे का पता पूछते हैं। नालिंयों के संहार के बावजूद कुछ राणा सांगा टाइप नालियां बची रहती हैं जो सैकड़ों झटके खाने के बावजूद आजादी का झण्डा फहराती रहती हैं। ऐसी सिरफिरी नालियों का मुंह बंद करने के लिये मलबे तथा मोमियां (पालीथीन) की खुराक उनको नियमित दी जाती है। मोमिया चूंकि सड़क पर घूमती गाय भी खाती हैं आनन्दातिरेक से ,लिहाजा नालियां भी संकोच नहीं करतीं इस प्रसाद को ग्रहण करने में। जैसे ही वे इसे ग्रहण करती हैं उनका मुंह बंद हो जाता है।
ऐसा नहीं कि बारिश में सबकुछ बंद ही हो जाता है। कुछ जगहें हैं जो हर मौसम में बाहें खोले आपको अपने पहलू में समा लेने को आतुर होती हैं।जब सड़क के किनारे की नालियां पानी तक को अपने दिल में जगह देने से इंकार कर रही होती हैं तो इन्ही निष्ठुर नालियों से चंद कदम दूर कुछ जगहें अपना दिल हाथियों तक के लिये खोल के रखती हैं। इन दरिया दिल जगहों को लोग मेनहोल के नाम से जानते हैं। पहले इनके मुंह बंद रहा करते थे। अब अर्थव्यवस्था की देखादेखी ये भी मुक्त हो गये हैं। लोहे के गोल ढक्कनों से इन मेनहोलों की मुक्ति दिलाने वालों में ,दम मारो दम का नारा लगाने वाले बेदम टाइप ,हिप्पी समुदाय के लोगों का खासा योगदान है। बंधन के प्रतीक इन लोहे के ढक्कनों को ये लोग कौड़ियों के भाव बेच देते हैं तथा पायी गयी कौड़ियों को पाप का धन समझकर तुरंत ठिकाने लगाने के लिये जिस कालकूट का सेवन करती है उसे दुनिया स्मैक के नाम से जानती है। भारत की पुलिस अगर किसी चीज से डरती है तो इन क्रान्तिकारी स्मैकियों से। ये ऐसे मेहमान हैं जिनका रखरखाव करने में पुलिस बेहद बिखर जाती है।
यह बारिश का मौसम ही कुछ ऐसा है लोगों को बेईमान बना देता है। ‘आने वाला फिर कोई तूफान है’ सुनकर ऐसा लगता है कि तूफान शायद विश्व बैंक की कोईसहायता राशि है जिसके आगमन पर स्वागत गीत गाया जा रहा है। मन की बेईमानी की इंतहा हो जाती है जब लोग पत्नी में माशूका की देखने लगते हैं। सारे पेड़ कट जाने के बावजूद बालिकायें झूला-गीत गुनगुनाने लगती हैं। हमारे एक मित्र जो बोलने तक में शरमाते हैं अपने को वर्षा की बूंदों से सुरक्षित करके बच्चों को समेट के(खुद के कान बंद करके ) गुनगुनाने लगते हैं:-
“…मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज की कस्ती ,बारिश का पानी।”
हम बोले -काहे भइया अंदर बैठ के रो रहे हो। वैसे ही पानी घर में घुस रहा है तुम नयननीर से बाढ़ की आशंका काहे बढ़ा रहे हो ? बाहर बारिश में भीगते हुये गाओ। वे बोले -यार ,मन तो बहुत कर रहा है पर सबेरे आफिस जाना है।छुट्टियां खतम हो चुकी हैं। कहीं ज्यादा भीग गया तो कल आफिस जाने में लफड़ा होगा।
पर लफड़ा कहां नहीं है? गंगा बैराज जो बना था पानी की उपलब्धता तथा बाढ़ को रोकने के लिये वह ढहने का मूड बना रहा है। पतित पावनी गंगा लगता है अब भरोसे लायक नहीं रहीं। पांच करोड़ रुपये का घपला नहीं सह पायीं। थोड़ी मिट्टी कम पड़ी तो इसका मतलब यह थोड़ी कि अपनी धारा ‘ रिवर्स स्वीप ‘ की तरह मोड़ दो और सारे घाटों तथा कटरी के गांव डुबो दो। जब गारन्टी पीरियड में यह हाल है मैया तो आगे क्या गुल खिलाओगी? बाढ़ में बहा दिया ,गर्मी में सुखा दोगी। आपको यह व्यवहार शोभा नहीं देता । करना न पड़ गया सस्पेंड बिचारे मुख्य अभियंता को महजपांच करोड़ रुपये के लिये।इतना जरा सा घपला नहीं हजम कर पायीं। बहुत कमजोर है आपका हाजमा। आपको तो स्ट्रांग बनना पड़ेगा।अगर आपको भी बनना है तो अंदर से बनो स्ट्रांग,पहनो लक्स कोजी अंडरवियर -बनियान।

3 responses to “बदरा-बदरी के पिछउलेस”

  1. sanjay vidrohi
    फ़ुरसत से आपको पढा… मजा आ गया..
    -सँजय विद्रोहि
  2. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] बाल गिरते क्यों हैं? [...]
  3. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] बाल गिरते क्यों हैं? [...]