Saturday, February 17, 2024

बहुवचन प्रतिभाओं की संगत में

 



पुस्तक मेले में कई मित्रों की पुस्तके थीं। उनके विमोचन हो रहे थे। उन पर बातचीत हो रही थी। पुस्तक मेले में ऐसे तमाम रचनाकार उपस्थित थे जिनकी रचनाएं पुस्तकों के रूप में मौजद थीं। ये रचनाकार कम चर्चित भले हों लेकिन अपने लोगों के बीच उनकी अहमियत और पहचान तो है ही। अपने इन रचनाकार मित्रों के बारे में सोचते हमको पंकज चतुर्वेदी Pankaj Chaturvedi जी की बात याद आती है:
"आज का समय बहुवचन प्रतिभाओं का समय है। प्रतिभाएं विराट भले न हों , लेकिन हैं और बहुतायत में हैं।"
ऐसी बहुवचन प्रतिभाओं की संगत में उनकी रचनाओं से रूबरू होते हुए पुस्तक मेले का आनंद लिया गया।
पुस्तक मेले में विमोचनबाजी का सिलसिला शुरू होते ही सामने से भाई प्रमोद Pramod Kumar से मुलाक़ात हुई। लगभग आठ साल पहले प्रमोद जी से मंडी हाउस में पहली मुलाक़ात हुई थी। उस मुलाक़ात का जिक्र करते हुए लिखा था (लिंक टिप्पणी में ):
"....वहां प्रमोद कुमार जी भी आ गये। प्रमोद जी से भी पहली मुलाकात थी। आलोक जी Alok Puranik के पुराने मुरीद और पाठक। दस साल पुराने ’गुप्त पाठक’ से मिलकर आलोक जी भी खुश हो गये। हमारे मामा नदन जी कई कवितायें प्रमोद जी को याद हैं और वे उन्होंने जिस तरह वहां दोहराई उससे लगा कि कितने गहरे साहित्य प्रेमी हैं प्रमोदजी। फ़तेहपुर, कानपुर की कितनी यादे हैं उनके। ऐसे प्रेमी पाठक मित्र से मिलकर मन खुश हो जाना सहज बात है। इस चक्कर में आलोक जी विदा लेने के बाद फ़िर रुक गये कुछ देर के लिये।"
प्रमोद जी अपनी फेसबुक वाल पर नियमित रूप से बेहतरीन शेर साझा करते हैं। आज उन्होंने बशीर बद्र का ये शेर साझा किया है:
भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियां वही फासले !
न कभी हमारे कदम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई !!
बशीर बद्र के शेर के उलट हमारी जब मुलाक़ात हुई तो लपक कर हाथ मिलाते हुए प्रमोद जी ने कन्हैयालाल नंदन जी कविता सुनानी शुरू की जिसे हमने भी साथ दोहराया। चुनाव शीर्षक यह कविता नंदन जी अक्सर मंचो पर सुनाया करते थे:
"पहाड़ी के चारों तरफ
जतन से बिछाई हुई सुरंगों पर
जब लगा दिया गया हो पलीता
तो शिखर पर तनहा चढ़ते हुए इंसान को
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि वह हारा या जीता।
उसे पता है कि
वह भागेगा तब भी
टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा
और अविचल होने पर भी
तिनके की तरह बिखर जायेगा
उसे करना होता है
सिर्फ चुनाव
कि वह अविचल खड़ा होकर बिखर जाये
या शिखर पर चढ़ते-चढ़ते बिखरे-
टुकड़े-टुकड़े हो जाये।"
नंदन जी की याद आई तो यह भी याद आया कि वे बाद के दिनों में ईश्वर से अपना उलाहना देते हुए पढ़ते थे :
सब पी गए , पूजा नमाज बोल प्यार के,
ज़रा नखरे तो देखिये,परवरदिगार के।
प्रमोद जी से थोड़ी देर बातचीत के बाद वो मेला देखने निकल लिए । अपन भी इधर - उधर विमोचनबाजी में व्यस्त हो गए।
थोड़ी देर बाद प्रभात गोस्वामी जी Prabhat Goswami और फारुख अफ़रीदी जी Farooq Afridy Jaipur स्टाल पर आये। जयपुर से सुबह चलकर मेले में पहुंचते-पहुंचते शाम सी हो गई थी। प्रभात जी और फारुख जी की किताबें भी न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन पर मौजूद थीं। उनका भी विमोचन हुआ । शाम को मैंने फोन किया तो दोनों जयपुर के रास्ते पर थे।
न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन पर तमाम व्यंग्यकारों की चयनित व्यंग्य रचनाएं मौजूद थीं। सबके कवर पेज लेखक की फोटो को छोड़कर एक जैसे थे। अनुशासित जैसे कवर पेज। आजकल अधिकतर व्यंग्य लेख एक जैसे लगते हैं तो कवरपेज एक जैसे लगना सहज सा है।
मेले में ज्योति त्रिपाठी से भी मुलाकात हुई। करीब दस साल की फेसबकिया मित्रता के बाद पहली मुलाक़ात। कभी ज्योति हमारे लेखन को बहुत पसंद करतीं थी। एक बार टिप्पणी करते हुए लिखा -' आपकी पोस्ट पढ़ते हुए समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला।'
ज्योति अपने आसपास के जीवन के बारे में कवितायें लिखती हैं। कविताओं में स्त्री विषयक मसलों पर अपनी राय व्यक्त करती हैं। उनकी कविताओं का बड़ा पाठक वर्ग है। कविताओं के साथ ज्योति ने कई धारावाहिक उपन्यास भी अपनी फेसबुक वाल पर पोस्ट करते हुए लिखे हैं। इन उपन्यासों में जनता की राय का ख्याल रखते हुए भी पात्रों के साथ ट्रीटमेंट किया गया है। इनमे से एक उपन्यास 'रुप्पू' प्रकाशित भी हुआ है। यह उपन्यास जब छपा था तब मैंने इसे खरीद कर इस पर अपनी टिप्पणी भी लिखी थी। मेले में ज्योति से मुलाक़ात होने पर अगले दिन यह उपन्यास फिर से खरीदा गया और लेखिका के आटोग्राफ लिए गए।
ज्योति के साथ उनके चाचा कमलाकर मिश्र जी भी थे। पता चला उन्होंने भी एक उपन्यास लिखा है जो कि उनके खुद के अदालती अनुभवों पर आधारित है -'पिताजी और तारीख।' पता चलने पर हमने हिन्द युग्म स्टाल पर उनके साथ जाकर किताब खरीदी और कमलाकर जी के आटोग्राफ लिए। इसके बाद सबने साथ में मिलकर चाय पी।
मेले में पता चला अनूप मणि त्रिपाठी Anoop Mani Tripathi भी मौजूद थे अपनी नई किताब के साथ। साथ में 'जे बिनु काज दाहिने बाएं' संतोष त्रिवेदी भी थे। संतोष त्रिवेदी ने इस बार व्यंग्य पर एहसान करते हुए इस बार कोई किताब नहीं छपवाई ।
अनूपमणि त्रिपाठी के स्टाल पर उनकी किताब के साथ फोटो खिंचाया और किताब खरीदी भी। अनूप मणि की यह तीसरी किताब है। पहली दो किताबों हमने खरीदकर पढी भी हैं लेकिन उनके बारे में लिखना अभी तक उधार है। इस किताब से एक और उधर चढ़ गया।सब चुकाया जाएगा आहिस्ते-आहिस्ते।
अनूप मणि के साथ राजीव तनेजा जी से भी मुलाक़ात हुई । राजीव तनेजा आजकल नियमित रूप से किताबें पढ़कर उनके बारे में नियमित रूप से लिखते हैं। ऐसा काम जो कम लोग करते हैं। बल्कि बहूत कम लोग करते हैं।
लौटते हुए पंकज सुबीर और मनीषा कुलश्रेष्ठ जी से शिवना प्रकाशन पर मुलाक़ात हुई। कुछ दिन पहले मनीषा जी की संगत में हुई बातचीत की तारीफ़ की शुरुआत करते कुछ और तारीफ़ की। पंकज सुबीर जी ने भी तारीफ़ में कुछ और जोड़ा। इसके बाद हम पंकज सुबीर जी से अगले दिन आने के लिए कहकर चले आये। बगल की दूकान पर नीरज शर्मा Neeraj Sharma और डा शर्मा मौजूद थे। उनको भी अगले दिन आने की बात कहकर निकल लिए।
पुस्तक मेले Abhishek Awasthi से भी मुलाक़ात हुई। अभिषेक की मृगया के बाद दूसरी किताब आनी है। किताब तो सौरभ जैन सौरभ जैन की भी आनी है दूसरी। अभिषेक और सौरभ दोनों इस मामले में लखनउवा अंदाज में पहले आप , पहले आप कहते पाए गए। सौरभ इस बीच डाक्टर भी हो गये हैं पीएचडी वाले। सौरभ के बनाये मीम के जलवे दैनिक भास्कर में दिखते रहते हैं।
जब हम न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन पर थे तो वहीं कनपुरिया पत्रकार , रचनाकार संजीव मिश्र Sanjiv Mishra भी आये। मिलते ही हमारे नामराशि अनूप शुक्ला Anoop Shukla के हिस्से की तारीफ़े हमारे लिए करनी शुरू की। हमने बताया कि हम वो वाले अनूप नहीं हैं तो उन्होंने कुछ कम करके नये सिरे से हमारे लेखन की तारीफ़ की। नामराशि मित्रों के साथ का यह फ़ायदा तो होता है कि तारीफ़ मुफ़्त में मिल जाती है।
संजीव मिश्र जी ने हाल में कानपुर के चर्चित माफिया विकास दुबे पर किताब लिखी है -बवाली कनपुरिया। इसमें विकास दुबे के अपराध जगह में प्रवेश करने से शुरू करके उसके दबदबा बनने और मारे जाने की विस्तार से चर्चा है। पठनीयता ग़ज़ब की है। किताब के बारे में अलग से। किताब पेंगुइन बुक स्टाल पर मौजूद थी। हमने स्टाल पर जाकर किताब ली और संजीव जी के ऑटोग्राफ़ भी लिए।
पुस्तक मेले में हमारे आने की सूचना पाकर हमारे कालेज के मित्र विनोद अग्रवाल जी Vinod Kumar Agrawal भी आये मिलने। उस समय तक मेले के टिकट मिलने बंद हो गए थे। हमने जब सबेरे आनलाइन टिकट खरीदा था तो रास्ते में किसी ने चेक नहीं किया था। विनोद भाई ने जब बताया कि टिकट मिला नहीं है तो अपने ने अपना टिकट व्हाट्सेप से उनको भेज दिया। हमको आशा नहीं थी कि उनको उस पर आने को मिलेगा लेकिन कुछ देर बाद वे हमारे स्टाल पर मौजूद थे। हमारे साथ काफी देर रहे। तमाम पुरानी यादें साझा की गईं। लौटते में घर तक छोड़ने भी आये।

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Tuesday, February 13, 2024

पुस्तक मेले में विमोचनबाजी

  

पुस्तक मेले में किताबों की दुनिया में पहुँचते ही विमोचन दृश्य दिखने लगे। हर अगली स्टाल पर विमोचन होता दिखा। कुछ मिशनरी विमोचक भी दिखे। लेखक के साथ आये, दुकान से किताब उठाई, किताब को सीने से सटाया, फ़ोटो खिंचाई, लेखक से हाथ मिलाया और किताब सहित अगले विमोचन के लिए निकल लिए।
हमने एक दुकान वाले से पूछा भी कि ये पुस्तक विमोचक तुम्हारी किताबें क़ब्ज़े में करके निकल लिए तुम देखते रह गए।
उसने बताया कि -‘देखते नहीं रह गये। हम ध्यान से देखते रहते हैं। किताब विमोचक के नाम चढ़ा देते हैं। उनको बिल भेजेंगे। छोड़ेंगे नहीं।’
हमको दुकानदार की निष्ठुरता पर बड़ा ग़ुस्सा आया। समझ में नहीं आया कि जिस चीज की चोरी तक को अपराध नहीं माना जाता उसको सामने-सामने ले जाने पर उसके पैसे बाद में देने पड़ें। मतलब इंसानियत का चलन ही ख़त्म हो गया।
विमोचन करने वाले कभी-कभी किताब विमोचन करते हुए लोग यह भी सुनिश्चित करते दिखे कि सीने से सटी किताब उल्टी नहीं पकड़े हैं।
हमारे न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन पहुँचते ही वहाँ प्रेम जनमेजय जी और साथ ही लालित्य ललित जी वहाँ पहुँचे। प्रेम जी , लालित्य ललित जी और अपन की किताब का किताब वहाँ विमोचन हुआ । फ़ोटो भी हुए। पता नहीं किसने खींचें थे फ़ोटो। लालित्य भाई जुगाड़ करके मँगवा दें तो मेले में हुए पहले विमोचन की याद साथ रहेगी।
प्रेम जी ने आरिफ़ा एविस से हमारी किताब ख़रीदी। लेकिन हमारी हिम्मत नहीं हुई कि फ़ौरन हम भी उनकी किताब ख़रीद लें। बाद में अगले दिन हालाँकि हमने प्रेम जी की, हरीश नवल जी की और कई व्यंग्यकार साथियों की किताब ख़रीदी। अरविंद तिवारी जी और प्रमोद ताम्बट जी किताबें हम पहले ही आज लाइन मँगवा चुके थे।
श्रीलाल शुक्ल जी ने अपने लेखन के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा है -‘मेरा अधिकतर लेखन मुरव्वत का लेखन है।’
इसी तर्ज़ पर पुस्तक मेले से अधिकतर ख़रीद मुरव्वत की ख़रीद होती है। मित्र लेखकों की किताबें ख़रीदने में सोच की गुंजाइश कहाँ होती है।
न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशंस के सामने ही डा पवन विजय खड़े दिखे। देखते ही कस के गले पड़ गये। हड्डी जकड़ गई, साँस उखड़ने को हुई। अपने हाल देखकर हमको उन राष्टाध्यक्षों के हाल याद आए जो बुज़ुर्गियत की उम्र में विश्व सम्मेलनों लपक के आपस में कड़क आलिंगन करते हैं।
पवन विजय जिस गर्मजोशी से गले मिले उसको संतुलित करने के लिये उन्होंने मिसरा पढ़ा -‘ तुम्हई देखि शीतल भई छाती।’ यह एहसास हुआ कि हम आदतन बात और व्यवहार में 36 का आँकड़ा रखने के लिए कितना सजग रहते हैं। हमको अंदेशा हुआ सर्दी के मौसम में कहीं ठंड न लग जाये। लेकिन फिर बात किताबों की होनी लगी और बात आई-गई हो गई।
किताबों की बात शुरू हुई तो पता चला कि डॉ किरण मिश्रा का ताज़ा आया कविता संकलन ‘ब्रह्मांड का घोषणापत्र एवं अन्य कवितायें’ सामने सर्व भाषा ट्रस्ट पर मौजूद था। कविता संकलन ख़रीद कर उसका विमोचन किया गया। कविता संकलन के विमोचन के बाद पवन विजय ने अपने उपन्यास ‘जोगी-बीर’ के साथ भी फ़ोटो खिंचवा ली। किताब ख़रीदकर उसका भी विमोचन किया गया।
इस बीच मनु कौशल जी भी सपत्नीक वहाँ पधारे। मनु जी आजकल आलोक पुराणिक जी के साथ दिल्ली के लोगों को टहलाते हुए दिल्ली की विरासत से लोगों को रूबरू कराते हैं। वाक कराते समय मनु जी के अंदर ग़ालिब , खुसरों और दीगर बुजुर्गों की आत्मायें आकर लोगों को गुजरे जमाने की दास्तान सुनाती रहती हैं। मनु जी ने भी हमारी ख़िताब ख़रीदकर उसका विमोचन किया।
इस सिलसिले को आगे बढ़ाते आयुध निर्माणी के वरिष्ठ कथाकार गोविंद उपाध्याय जी ने अपना नवीनतम संग्रह ‘बिना पते वाला आदमी’ हमको भेंट किया। देश की हर प्रतिष्ठित पत्रिका में गोविंद जी की कहानियाँ छप चुकी हैं। तीन दशक से भी अधिक समय से लिखते हुए गोविंद जी के छपने का सिलसिला बीस साल पहले 2004 में शुरू हुआ और अभी तक कुल जमा 19 कहानी संग्रह और उपन्यास आ चुके हैं। हमने भी अपनी लेखकीय प्रतियों में से एक प्रति वहीं से लेकर गोविंद जी को भेंट की। उसके साथ फ़ोटो भी खिंचवा ली। एक और विमोचन संपन्न हुआ।
फ़ेसबुक पर हमारे मेले में आने की सूचना पढ़कर कालेज के साथी भोपाल सिंह और उनसे जानकारी लेकर मनोज भी वहाँ आये और किताब लेकर साथ में फ़ोटो खिंचायी। मनोज अपने तख़ल्लुस ‘जानी’ के नाम से व्यंग्य लेख भी लिखते रहे हैं पिछली सदी से। कई सम्मान भी पाये हैं किताबों पर। फ़ोटो खिंचाते हुए भोपाल सिंह ने कहा -‘ऐसे फ़ोटो लीजिए ताकि लगे कि आप हमको किताब भेंट कर रहे हैं। फ़ोटो देखकर और दोस्त आयेंगे। हमने फ़ोटो अभी तक लगाया ही नहीं लिहाज़ा दोस्त लोग अभी तक आये नहीं।
भोपाल सिंह और मनोज के वहाँ रहते हुए राजीव भी सपरिवार पहुँचे वहाँ। राजीव हमारे कॉलेज के हैं और जबलपुर में हमारे साथ काम भी कर चुके हैं। चार साल। काम के सिलसिले की राजीव की एक मज़ेदार अदा यह थी थोड़ा सा भी लीक से हटकर काम हुआ तो करने से रस्मी तौर मना कर देते फिर हमारे कहने पर कॉलेज और दफ़्तर को दोहरी वरिष्ठता के लिहाज़ करते हुए राजी हो जाते कहते हुए -‘होना तो नहीं चाहिए लेकिन आप कह रहे हैं तो कर देते हैं।’ इस तरह कई काम हमारे खाते में चढ़ाते हुए राजीव ने किए। आजकल लोक सेवा आयोग में प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली में तैनात हैं।
राजीव की पत्नी हिमानी भी साथ में थीं। हिमानी बहुत अच्छी चित्रकार और कथाकार हैं। बच्चों के लिए शिक्षाप्रद स्केच और कहानी की किताबें लाना चाहती हैं। जल्द ही आनी चाहिए।
राजीव और हिमानी के साथ भी किताब के फ़ोटोबाज़ी हुई ।
फ़ोटो और विमोचन का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए आरिफ़ा ने भी अपनी ही दुकान से किताब ख़रीदकर विमोचन किया। आरिफ़ा से वर्षों पुरानी जान पहचान और बातचीत के बाद मुलाक़ात पहली बार हुई। आरिफ़ा की कोशिश और बार-बार आग्रह के चलते ही मेरा यह व्यंग्य संकलन आ पाया। सजग संपादक का काम करने के चलते इधर आरिफ़ा की लिखाई में कुछ रुकावट आई है। उम्मीद है कि सिलसिला फिर ज़ोर पकड़ेगा।
आलोक निगम भी इतवार होने के चलते छुट्टी के कारण आये मेले और फिर घटनास्थल पर भी। आलोक अपनी पोस्टों में गणित के सवालों से लोगों के बीच अपने ज्ञान का आतंक मचाते रहते हैं। ग़नीमत है कि पुस्तक मेले में उनकी गणित की पाठशाला का शटर गिरा रहा।
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Monday, February 12, 2024

पुस्तक मेले में

 पुस्तक मेला जाना हुआ कल। नोएडा में एक मांगलिक कार्यक्रम में रहना जरूरी था। गए भी। लेकिन फिर घण्टे भर बाद क्लास बंक करने की तरह निकल लिए प्रगति मैदान।जिन दोस्तों को सुचित भी किया था उनमें से कुछ पहुँच भी गए। बाकी ने हमारे इस विश्वास की रक्षा की कि किसी न किसी कारण पहुंच न पाएंगे। कुछ ने मेसेज रात में देख पाने की बात भी बताई।

इस बार हमारी किताब भी आई थी -चयनित व्यंग्य। न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से। जितनी संख्या में व्यंग्यकारों के चयनित व्यंग्य आये हैं न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से उससे यह कहे जाने की संभावना भी बनती है कि व्यंग्यकार वही जिसके चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से आ गए हैं। इस बात की तसदीक Alok Puranik जी ने करते हुए सूचना दी कि वे भी अपने चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड से छपवाने के लिए छाँट रहे हैं ताकि लोग उनको सिर्फ आवारा घुम्मकड़ ही न समझें।
चयनित व्यंग्य छपने के साथ ही अपन ने दो प्रतियां मंगवा ली थीं। आते ही श्रीमती जी से विमोचन करवा लिया था। विमोचन करने के बमुश्किल तैयार हुई श्रीमती जी ने कड़क हिदायत दी थी कि उनके विमोचन की फ़ोटो कहीं लगाई न जाये। उनको इस बात का अंदेशा था कि कहीं लोग उनको भी मिशनरी 'पुस्तक विमोचक' न समझ लें जो रोज किसी न किसी किताब को सीने से सटाये विमोचन करते पाया जाता है।
एक प्रति के साथ विमोचन के बाद दूसरी प्रति भेंट की गई आयुध निर्माणी कानपुर के कार्यकारी निदेशक अजय सिंह जी को। शनिवार को किताब भेंट करने के कारण उन्होंने इसे पढ़ने की तस्दीक़ करते हुए कुछ लेखों का ज़िक्र करते हुए मजे भी लिए यह कहते हुए कि आपके लेख पढ़ते हुए परसाई जी की याद आती है। हम कुछ बोले नहीं। मित्रों की बात का बुरा नहीं माना जाता।
अजय सिंह ने मजे लेते आगे भी कहा -‘आप इतने काम-धाम के साथ इतना सब लिख कैसे लेते हैं?’ इस मज़ाक़ का मतलब आप समझ ही गए होंगे।
नोयडा से प्रगति मैदान किराए की कार से गये। 20 किलोमीटर की दूरी के चार सौ रुपये खर्च हुए। मतलब 20 रुपया प्रति किलोमीटर । चयनित व्यंग्य की किताब 225 रुपये की किताब मेले में 200 रुपये में मिल रही थी। दो किताब के बराबर खर्च करके मेले में पहुंचे।
पुस्तक मेले में गेट पर ही यादव जी के मशहूर शुध्द शाकाहारी छोले के कई ठेले लगे हुए थे। सब पर दनादन छोले बिक रहे थे। बिना विमोचन।
गेट नम्बर 5 से जाना था पुस्तक मेले। लम्बी, घुमावदार, ढीली-ढाली टाइप लाइन लगी थी मेले के अंदर जाने के लिए। टिकट हमने पहले ही खरीद लिया था। आन लाइन। बड़ों का 20 रुपये का। बच्चों का 10 रुपये का। हमको लगा कि काश बच्चे होते तो दस रुपये बचते। बाद में जब पता चला कि सीनियर सिटीजन के लिये मुफ्त व्यवस्था है मेले में आने की तो लगा काश वरिष्ठ नागरिक हो गए होते। पहले दस और बाद में बीस रुपये के लालच में बच्चा और फिर बूढ़ा हो जाने की ललक लिए हम जैसे लोग ही अपने माननीयों के दलबदल की आलोचना करते हैं। कितनी खराब बात है।
मेले के अंदर पहुंचने तक किसी ने हमारा टिकट चेक नहीं किया तो लगा कि टिकट बेफालतू ही लिया। लेकिन बाद में काम आया वही टिकट। उसकी कहानी आगे।
मेले में हमारी कितबिया हाल नम्बर एक में थी। सबसे आखिर में हाल था। भीड़ भारी थी। लोग आते-जाते दिख रहे थे। हमको लगा कि मेला साल में कई बार लगना चाहिए। लेकिन हमारे लगने से क्या होता है।
मेले में मित्रों से हमने तीन बजे पहुंचने को लिखा था। पहुंचते हुए 4 मिनट कम तीन बजे गए थे। हाल में घुसते ही वाणी प्रकाशन के स्टाल के किनारे की बरामदे टाइप की जगह पर किसी किताब पर विमोचन के बाद वाली बातचीत हो रही थी। सवाल-जबाब का सिलसिला चल रहा था। हम बातचीत को उड़ती-उचटती निगाह से देखते हुए आगे बढे और न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल पर पहुंचे।
स्टॉल पर Arifa Avis मौजूद थीं। आरिफ़ा से वर्षो की फेसबुकिया मित्रता के बावजूद यह पहली मुलाकात थी। आरिफा के आग्रह के कारण ही यह चयनित व्यंग्य आया। वहीं पर एम.एम. चन्द्रा भी टहलते हुए पाए गए। एम एम चंद्रा पहले डायमंड बुक्स में थे। दो साल से न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन शुरू किया है। बताया कि करीब 500 किताबें निकाल चुके हैं। कई कवियों-व्यंग्यकारों के चयनित-संकलित संकलन दिखे स्टॉल पर।

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पुस्तक मेला जाने के पहले किताब का विमोचन

 


पुस्तक मेला जाना हुआ कल। नोएडा में एक मांगलिक कार्यक्रम में रहना जरूरी था। गए भी। लेकिन फिर घण्टे भर बाद क्लास बंक करने की तरह निकल लिए प्रगति मैदान।जिन दोस्तों को सुचित भी किया था उनमें से कुछ पहुँच भी गए। बाकी ने हमारे इस विश्वास की रक्षा की कि किसी न किसी कारण पहुंच न पाएंगे। कुछ ने मेसेज रात में देख पाने की बात भी बताई।
इस बार हमारी किताब भी आई थी -चयनित व्यंग्य। न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से। जितनी संख्या में व्यंग्यकारों के चयनित व्यंग्य आये हैं न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से उससे यह कहे जाने की संभावना भी बनती है कि व्यंग्यकार वही जिसके चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से आ गए हैं। इस बात की तसदीक Alok Puranik जी ने करते हुए सूचना दी कि वे भी अपने चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड से छपवाने के लिए छाँट रहे हैं ताकि लोग उनको सिर्फ आवारा घुम्मकड़ ही न समझें।
चयनित व्यंग्य छपने के साथ ही अपन ने दो प्रतियां मंगवा ली थीं। आते ही श्रीमती जी से विमोचन करवा लिया था। विमोचन करने के बमुश्किल तैयार हुई श्रीमती जी ने कड़क हिदायत दी थी कि उनके विमोचन की फ़ोटो कहीं लगाई न जाये। उनको इस बात का अंदेशा था कि कहीं लोग उनको भी मिशनरी 'पुस्तक विमोचक' न समझ लें जो रोज किसी न किसी किताब को सीने से सटाये विमोचन करते पाया जाता है।
एक प्रति के साथ विमोचन के बाद दूसरी प्रति भेंट की गई आयुध निर्माणी कानपुर के कार्यकारी निदेशक अजय सिंह जी को। शनिवार को किताब भेंट करने के कारण उन्होंने इसे पढ़ने की तस्दीक़ करते हुए कुछ लेखों का ज़िक्र करते हुए मजे भी लिए यह कहते हुए कि आपके लेख पढ़ते हुए परसाई जी की याद आती है। हम कुछ बोले नहीं। मित्रों की बात का बुरा नहीं माना जाता।
अजय सिंह ने मजे लेते आगे भी कहा -‘आप इतने काम-धाम के साथ इतना सब लिख कैसे लेते हैं?’ इस मज़ाक़ का मतलब आप समझ ही गए होंगे।
नोयडा से प्रगति मैदान किराए की कार से गये। 20 किलोमीटर की दूरी के चार सौ रुपये खर्च हुए। मतलब 20 रुपया प्रति किलोमीटर । चयनित व्यंग्य की किताब 225 रुपये की किताब मेले में 200 रुपये में मिल रही थी। दो किताब के बराबर खर्च करके मेले में पहुंचे।
पुस्तक मेले में गेट पर ही यादव जी के मशहूर शुध्द शाकाहारी छोले के कई ठेले लगे हुए थे। सब पर दनादन छोले बिक रहे थे। बिना विमोचन।
गेट नम्बर 5 से जाना था पुस्तक मेले। लम्बी, घुमावदार, ढीली-ढाली टाइप लाइन लगी थी मेले के अंदर जाने के लिए। टिकट हमने पहले ही खरीद लिया था। आन लाइन। बड़ों का 20 रुपये का। बच्चों का 10 रुपये का। हमको लगा कि काश बच्चे होते तो दस रुपये बचते। बाद में जब पता चला कि सीनियर सिटीजन के लिये मुफ्त व्यवस्था है मेले में आने की तो लगा काश वरिष्ठ नागरिक हो गए होते। पहले दस और बाद में बीस रुपये के लालच में बच्चा और फिर बूढ़ा हो जाने की ललक लिए हम जैसे लोग ही अपने माननीयों के दलबदल की आलोचना करते हैं। कितनी खराब बात है।
मेले के अंदर पहुंचने तक किसी ने हमारा टिकट चेक नहीं किया तो लगा कि टिकट बेफालतू ही लिया। लेकिन बाद में काम आया वही टिकट। उसकी कहानी आगे।
मेले में हमारी कितबिया हाल नम्बर एक में थी। सबसे आखिर में हाल था। भीड़ भारी थी। लोग आते-जाते दिख रहे थे। हमको लगा कि मेला साल में कई बार लगना चाहिए। लेकिन हमारे लगने से क्या होता है।
मेले में मित्रों से हमने तीन बजे पहुंचने को लिखा था। पहुंचते हुए 4 मिनट कम तीन बजे गए थे। हाल में घुसते ही वाणी प्रकाशन के स्टाल के किनारे की बरामदे टाइप की जगह पर किसी किताब पर विमोचन के बाद वाली बातचीत हो रही थी। सवाल-जबाब का सिलसिला चल रहा था। हम बातचीत को उड़ती-उचटती निगाह से देखते हुए आगे बढे और न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल पर पहुंचे।
स्टॉल पर Arifa Avis मौजूद थीं। आरिफ़ा से वर्षो की फेसबुकिया मित्रता के बावजूद यह पहली मुलाकात थी। आरिफा के आग्रह के कारण ही यह चयनित व्यंग्य आया। वहीं पर एम.एम. चन्द्रा भी टहलते हुए पाए गए। एम एम चंद्रा पहले डायमंड बुक्स में थे। दो साल से न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन शुरू किया है। बताया कि करीब 500 किताबें निकाल चुके हैं। कई कवियों-व्यंग्यकारों के चयनित-संकलित संकलन दिखे स्टॉल पर।

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Sunday, January 28, 2024

पटना की खुदाबख्श लाइब्रेरी



हमको दीपक नें अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाकर खुदाबख्श लाइब्रेरी तक छोड़ दिया। मजे की बात जब हमने प्लेन में मिली बालिका से खुदाबख्श लाइब्रेरी के बारे पूछा तो उसको लाइब्रेरी के बारे में कुछ नहीं पता था। मुझे कुछ अचंभा नहीं हुआ। एक बड़ी आबादी अपने शहर में मौजूद ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के बारे में नहीं जानती।
पटना की खुदाबख्श लाइब्रेरी के बारे में बचपन से पढ़ते आये थे। लेकिन इसके बारे में पता नहीं था कि किसने शुरू करवाई । लाइब्रेरी देखकर आ गए तब भी जानकारी नहीं की। आज जब लिखने बैठे तो खोजा इसके बारे में। पता चला कि खुदाबख्शजी के पिता जी को किताबें पढ़ने और जमा करने का शौक था। उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा किताबे खरीदने में जाता था। उनका निधन 1876 में हुआ । तब तक उनके पास 1700 किताबें जमा हो गयीं थीं।
1876 में जब वे अपनी मृत्यु-शैय्या पर थे उन्होंने अपनी पुस्तकों की ज़ायदाद अपने बेटे को सौंपते हुये एक पुस्तकालय खोलने की इच्छा प्रकट की।
खुदाबख्श ने अपने पिता द्वारा सौंपी गयी पुस्तकों के अलावा और भी पुस्तकों का संग्रह किया तथा 1888 में लगभग अस्सी हजार रुपये की लागत से एक दोमंज़िले भवन में इस पुस्तकालय की शुरुआत की और 1891 में 29 अक्टूबर को जनता की सेवा में समर्पित किया। उस समय पुस्तकालय के पास अरबी, फारसी और अंग्रेजी की चार हजार दुर्लभ पांडुलिपियाँ मौज़ूद थीं। क़ुरआन की प्राचीन प्रतियां और हिरण की खाल पर लिखी क़ुरानी पृष्ठ भी मौजूद हैं।
1908 में अपने निधन तक खुदाबक्श ने लाइब्रेरी के काम को लगातार आगे बढ़ाया। पुस्तकों के निज़ी दान से शुरू हुआ यह पुस्तकालय देश की बौद्धिक सम्पदाओं में काफी प्रमुख है। भारत सरकार ने संसद में 1969 में पारित एक विधेयक द्वारा इसे राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान के रूप में प्रतिष्ठित किया।।यह स्वायत्तशासी पुस्तकालय जिसके अवैतनिक अध्यक्ष बिहार के राज्यपाल होते हैं, पूरी तरह भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय के अनुदानों से संचालित है।
लाइब्रेरी में घुसते ही काउंटर पर एक रजिस्टर रखा था। उसमे दस्तखत कराये गए। हमसे पहले आठ-दस लोग दस्तखत कर चुके थे। अधिकतर के आने का उद्धेश्य रिसर्च लिखा था। अन्दर घुसने से पहले बैग रखवा लिया गया। हमने बताया उसमें लैपटाप भी है। काउंटर पर बैठे शख़्स ने कहा -'रख दो चिंता न करो।' हमने उसकी पहली बात मान ली। बैग रखा दिया लेकिन दूसरी बात पूरी नहीं मानी- ' थोड़ी -थोड़ी चिंता करते रहे।'
लाइब्रेरी के हाल में कुछ लोग बैठे किताबें पढ़ रहे थे। कुछ के सामने किताबों का ढेर लगा था। वे शायद नोट्स ले रहे थे।
हमने सोचा था कि लाइब्रेरी में बड़ा सा हाल होगा जिसमे किताबें ही किताबें दिखेंगी। लेकिन वहां ऐसा नहीं था। पता लगा कि किताबो की सूची कम्प्यूटर में दर्ज है। आप अपनी पसंद की किताब कंप्यूटर से खोजकर बताइये तो लाइब्रेरी के लोग किताब लाकर आपको देंगे फिर आप उसको पढ़ सकते हैं। खुद किताबें देखने की अनुमति नहीं है। हाल में पीछे की तरफ दुर्लभ किताबों का कमरा भी दिखा लेकिन वहां भी जाने की अनुमति नहीं नहीं थी लाइब्रेरी देखने का मजा कम हो गया। किताबें खुद उलट-पलट के न देख सकें तो काहे की लाइब्रेरी।
पता चला कि लाइब्रेरी में करीब तीन लाख किताबें हैं उनमें से बमुश्किल तीस हजार किताबें सर्कुलेशन में हैं मतलब नियमित रूप से पढी जाती हैं। बाकी किताबें न जाने कब से पाने पढ़े जाने का इन्तजार करती रहती होंगी। कभी वीआइपी रहीं किताबों को अब कोई पूछने वाला नहीं।
बहरहाल कुछ देर हाल में इधर-उधर देखते रहे। कंप्यूटर में किताबें देखी। क्लिक करने पर किताब का विवरण दिख जाता। लेकिन हमको बैठकर किताबें पढ़नी तो थीं नहीं। देखनी थी लाइब्रेरी। कुछ देर में हाल से बाहर आ गए।
हाल से बाहर आते हुए शौचालय दिखा। हमने उसका भी उपयोग किया। देशी स्टाइल के शौचालय में पानी के लिए प्लास्टिक के टोंटीदार बड़े लोटे रखे थे। नल में तो पानी आ रहा था लेकिन फ्लस जलविहीन था। क्या फर्क पड़ता है किसी को। हर जगह पानी कम हो रहा है आजकल।
बाहर आकर हमने पहले तो बैग अपने कब्जे में किया। फिर पूछा कि हम यहाँ अकबर की लिखाई देखने आये हैं। सबने नकार दिया कि ऐसी कोई लिखाई मौजूद है यहाँ। हमने शाजी जमां की किताब का कवर दिखाया कि इस किताब के लेखक ने एक बातचीत में कहा है कि यहाँ अकबर की लिखाई का नमूना मौजूद है। लेकिन किसी ने माना नहीं। लोगों ने वहां मौजूद तमाम मुगलकालीन बादशाहों के दरबारों के फोटो दिखाते हुए कहा -'यहाँ तो यही है' उनके कहने का मतलब था -'इसी को देखकर काम चलाओ।'
हम उन सबको देख लिए। तमाम पुरानी वस्तुएं तो राजे-महाराजे-बादशाह-नवाब और उनकी रानियाँ उपयोग में लाती थी वहां मौजूद थीं। एक जगह महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की हस्तलिपि में लिखे उनके उदगार मौजूद थे जो उन्होंने लाइब्रेरी आने पर लिखे थे। करीब सौ साल पहले की अंगरेजी में लिखे सन्देश। गांधी जी ने अपने सन्देश में लिखा था कि करीब नौ साल पहले उन्होंने लाइब्रेरी के बारे में सुना था। लाइब्रेरी देखकर होने वाली खुशी उन्होंने बहुत उदारता पूर्वक जाहिर की थी।
लाइब्रेरी में ही मोबाइल की बैटरी ख़त्म होती दिखी। वहीं काउंटर के पास चार्जर में लगा दिया मोबाइल। बतियाने लगे वहाँ मौजूद लोगों से। पता चला क़रीब चालीस लोग काम करते हैं लाइब्रेरी में । हम बतिया रहे थे कि मोबाइल हिला और छिपकली की तरह पेट के बल जमीन पर गिरा । गनीमत कि टूटा नहीं। हम सामान समेट के बाहर निकल आये।
बाहर लाइब्रेरी के दूसरे हिस्से में कम्पटीशन के लिए पढ़ने वाले बच्चों के लिए बैठने और पढ़ने की व्यवस्था थी। सैकड़ों बच्चे मोबाइल, किताबें, कम्पटीशन की पत्रिकाएं लिए जुटे थे पढ़ने में। एक हिस्सा लड़कियों के पढ़ने के लिए आरक्षित था। कुछ बच्चे खुसफुसाते हुए बतिया रहे थे। क्या पता हाल ही में पेपर आउट होने की कारण निरस्त हुए इम्तहान की चर्चा कर रहे हों -'फिर देना होगा इम्तहान।'
वहीं पास में एक आँगन नुमा जगह में खुदाबख्श के परिवार के लोगों की कब्रें मौजूद थीं। उसके बगल में भी पढ़ने की जगह पर बच्चे पढ़ रहे थे। जन्नतनशीन खुदाबख्श जी अपनी बनवाई लाइब्रेरी में बच्चों को पढ़ते देख जरुर खुश होते होंगे।
लाइब्रेरी के सामने संकरी सड़क पर भारी भीड़ थी। ओवरब्रिज बन रहा था। पता चला ओवरब्रिज के कारण लाइब्रेरी का कुछ हिस्सा तोड़े जाने के निर्णय का भरपूर विरोध स्थानीय लोगों ने किया है। विरासत की क़ीमत पर विकास का विरोध। लाइब्रेरी से जुड़ी तमाम रोचक और आत्मीय जानकारी के लिए फेसबुक में 'खुदाबख्श' सर्च करके पढ़ें।
लाइब्रेरी में कैसे किताबें इशू होती हैं इस बारे में इस पोस्ट के बाद साझा की गयी पोस्ट पढिये।
हम कुछ देर लाइब्रेरी परिसर में टहलने में के बाद बाहर आ गए।

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Thursday, December 28, 2023

पांडिचेरी में चहलकदमी



पांडिचेरी में रहने का ठिकाने का जुगाड़ हो गया तो तसल्ली हुई । समुद्र की तरफ वाले कमरे के यहाँ एक हजार रुपये अतिरिक्त लगे थे। हमें लगा कि जो लोग समुद्र के किनारे रहते हैं वो साल भर में तीन लाख पैसठ हजार तो बचा ही लेते हैं।
इसी तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि समुद्र तट के किनारे बसे लोग दूर बसे लोगों के मुक़ाबले अमीर होते हैं।
अपने रहने के इंतजाम के बाद ड्राइवर के लिए जुगाड़ किया गया। होटल में कोई इंतजाम नहीं था। पास ही गाडी रखने और रुकने का इंतजाम बताया ड्राइवर ने। अगले दिन मिलने की कहकर चला गया ड्राइवर।
बालकनी से समुद्र साफ़, एक दम नजदीक दिखता था। लोग किनारे की बेंचो, पत्थरों पर बैठे समुद्र की लहरों को उठते-गिरते , किनारे तक आते , किनारे से टकरा कर लौट जाते देख रहे थे। हमने भी देखा। हमको लगा समुद्र की लहरें उत्साह और उमंग से किनारे की तरफ आती हैं । ऐसे लगता है मानों लहरें किनारे से गहन आलिंगन के लिए व्याकुल होकर भागती चली आ रहीं हैं। लौटते समय वह उत्साह नहीं दिखा लहरों में। ऐसे लौटती दिखीं मानो बेमन से वापस जा रही हों। मिलन और विछोह का अंतर दिखा लहरों के आने -जाने में।
कुछ देर आराम करने के बाद खाना खाने निकले। पास ही स्थित उडुपी होटल बंद हो चुका था। थोड़ा और आगे एक रेस्टोरेंट , जिसका नाम होटल वाली बालिका ने बताया था, खुला था। पहली मंजिल पर मौजूद भोजनालय में लंचार्थियो की भीड़ थी । एक किनारे की मेज पर जगह मिली। बैठकर आर्डर दिया। बालक मोबाइल में आर्डर नोट करके चला गया। जबतक वह वापिस आया , हम अगल-बगल के और सामने मनचले समुद्र के नज़ारे देखते रहे।
आसपास अधिकतर लोग अपने मोबाइल में डूबते-तैरते-उतराते दिखे। बगल वाली टेबल वालों के साथ छोटे बच्चे थे। उन्होंने आते ही मोबाइल में वीडियो लगाकर बच्चे को थमा दिया। बच्चे मोबाइल में और वो लोग अपने में मशगूल हो गए। आने-वाले समय में मोबाइल दादी-नानी की भूमिका निभायेंगे।
खाना खाकर होटल लौटे। कुछ देर आराम फर्माने के बाद घुमने निकले। अधिकतर घूमने की जगहें, जिनका जिक्र इधर-उधर दिखा, आसपास ही , एक-दो किलोमीटर के दायरे में थीं। पैदल ही निकले। समुद्र की लहरों और आते-जाते लोगों को देखते हुए।
सड़कें लोगों, गाडियों और सड़क किनारे ठेलियों से भरी-पूरी थीं। दोनों किनारे गाड़ियों , सामान के ठेलों की लाइन। दूर-दूर तक ऐसा कोई हिस्सा नहीं दिखा सड़क का जिसके दोनों किनारों पर गाड़ियां , ठेले न खड़ी हों। सड़क के बीच में थोड़ी जगह गाड़ियों और लोगों के आने-जाने के लिए भी छोडी गयी थी। इतनी भीड़ के बावजूद कहीं कोई अफरा-तफरी, हल्ला-गुल्ला या हडबडी नहीं दिखी। लगता है सब यहाँ शान्ति के साथ ही आये हैं।
सबसे पहले अरविन्द आश्रम देखने की बात तय हुई। रास्ते में मिलने वाले भारती पार्क , म्यूजियम, रोम्या रैला लाइब्रेरी, आर्ट गैलरी से कहते गए –‘आते अभी लौटकर, कहीं जाना नहीं, इन्तजार करना।‘
अरविन्द आश्रम में अन्दर जाने के पहले जूते-चप्पल बाहर ही उतारने थे। आश्रम के सामने फुटपाथ पर मुफ्त जूते-चप्पल रखने की व्यवस्था थी। एक बुजुर्ग महिला निर्लिप्त जिम्मेदारी वाले भाव से लोगों के जूते रैक में रखकर टोकन देती । लौटने पर टोकन के हिसाब से जूते-चप्पल वापस लौटा देती।
कहीं कोई साम्य नहीं लेकिन वहां जूते-चप्पल रखने की व्यवस्था देखकर मुझे शरीर-आत्मा-यमदूत के सुने किस्से याद आये। क्या पता यमदूत इसी शरीर को आत्मा से अलग करते हुए आत्मा को एक टोकन थमाते हों। अगले जन्म में आत्मा अपने टोकन के हिसाब से शरीर धारण करके नया जीवन शुरु करती हो।
अन्दर आश्रम में फोटो लेना मना था। घुसते समय सबके मोबाइल बंद करा दिए गए। अन्दर लोग अरविंद जी और माँ मीरा की समाधि पास शान्ति से बैठे थे। समाधि पर ताजे फूल सजे हुए थे। कुछ देर वहां बैठने के बाद हम लोग बाहर आ गए।
बाहर आकर हमने अपने जूते -चप्पल वापस लिए और लौट लिए। रास्ते में अरविंदो आश्रम पोस्ट आफिस दिखा । पोस्ट ऑफिस के बाहर सूचना लिखी थी -'यह डाकघर महिला डाक कर्मचारियों द्वारा संचालित है।'
शाम होने के कारण डाकघर बंद हो चुका था। बाहर एक लड़की मोबाइल पर कुछ देख रही थी। वहीं चौराहे के नुक्कड़ पर एक महिला नारियल पानी बेंच रही थी। मन किया नारियल पानी पिया जाए। लेकिन फिर बिना पिये आगे बढ़ गए।
आगे म्यूजियम , लाइब्रेरी और आर्ट गैलरी देखी। म्यूजियम में मूर्तियाँ , सिक्के, कलाकृतियाँ , फर्नीचर, पुराने जमाने के वाहन और तमाम चीजें रखीं थीं। बाहर रखी मूर्तियों के साथ लोग फोटो खिंचा रहे थे। म्यूजियम का टिकट दस रुपये था।
म्यूजियम से बाहर बगल आर्ट गैलरी में कुछ पेंटिंग्स लगी थी। पेंटर के फोटो बाहर लगे थे। अंदर घुसकर पेंटिंग्स देखते हुए एक का फोटो भी ले लिए। गेट पर बैठे आदमी ने टोंका -'डोंट टेक फोटो।' हम थम गये। पेंटिंग्स बिक्री के लिए भी उपलब्ध थीं। हमने दाम नहीं पूछे। देखकर ही लौट आये।
बगल की रोम्यां रैला लाइब्रेरी में लोग लम्बी मेज के दोनों तरफ बैठे अखबार पढ़ रहे थे। ज्यादातर अखबार तमिल के थे। हमने वहां बैठकर फोटो खिंचाया।हमको फोटो खिंचाते देखकर सामने वाले ने हमारी तरफ अंग्रेजी का अखबार सरका दिया। उसको पता लग गया होगा कि अपन तमिल नहीं जानते।
किताबों की तरफ वाले सेक्शन ने नीचे तमिल की ही किताबें थीं। ऊपर गए तो अंग्रेजी और हिंदी के अलावा और भाषाओं की किताबें भी दिखीं। हिंदी की ढेर सारी किताबें थीं। एक किताब नामवर सिंह जी से बातचीत की थी। किताब पलटते हुए जो पन्ना खुला उसमें एक जबाब में नामवर जी ने बताया था कि उनके गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी जी मुक्तिबोध जी की कविता को पसंद नहीं करते थे। उस समय तय किया था कि यह किताब मंगवाएँगे।
लाइब्रेरी से वापस आते हुए वहां मौजूद लोगों से पूछा-'लाइब्रेरी कितनी पुरानी है।' सबने एक दूसरे की तरफ देखा। इधर-उधर देखते हुए एक ने दराज से एक किताबिया निकालकर हमको थमा दी। मतलब इसमें लिखा है लाइब्रेरी के बारे में। पढ़ लो।
पढ़ने पर पता चला कि पांडिचेरी में, जहां करीब तीन शताब्दियों तक फ्रांसीसियों का शासन रहा, लाइब्रेरी मूवमेंट की शुरुआत 1827 में हुई। पब्लिक लाइब्रेरी होने के बावजूद शुरुआत में इसमें केवल यूरोपीय लोगों को आने की अनुमति थी। सन 1850 में यहां किताबों की संख्या 6500 थी। आज की तारीख में करीब 334865 किताबें हैं। करीब 35000 लोग लाइब्रेरी के सदस्य हैं। साल भर में करीब 2 लाख किताबें पढ़ने के लिए इशू की जाती हैं। औसतन करीब एक हजार लोग लाइब्रेरी की सुविधा का उपयोग करते हैं।
1966 में रोम्यां रैला जी की जन्मशताब्दी के मौके पर लाइब्रेरी का नामकरण उनके नाम पर किया गया।
लाइब्रेरी से बाहर निकल कर हम वापस लौटे। शाम को सड़क और गुलजार हो गयी थी। समुद्र किनारे लोग चहलकदमी करते हुए टहल रहे थे। तमाम लोग समुद्र की लहरों को देखते हुए फोटोबाजी कर रहे थे।
अपन भी टहलते हुए एक चट्टान पर बैठ गए और समुद्र और जनसमुद्र दर्शन में जुट गए।

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Wednesday, December 27, 2023

पांडिचेरी की ओर



पिछले दिनों महाबलिपुरम और पांडिचेरी जाना हुआ। पांडिचेरी इसके पहले चालीस साल पहले आये थे। इलाहाबाद से कन्याकुमारी तक साइकिल यात्रा के दौरान अगस्त , 1983 के दूसरे हफ्ते । एक दिन रुके थे। अरविंद आश्रम और समुद्र तट की बहुत धुंधली यादें थीं पिछली यात्रा की।
पिछली बार पांडिचेरी से चेन्नई की तरफ आये थे। इस बार महाबलिपुरम से पांडिचेरी जाना हुआ। पांडिचेरी को पुदुचेरी और कहीं-कहीं पोंडी भी लिखा देखा।
पांडिचेरी में रुकने के लिए होटल बुक नहीं कराया था। सोचा वहीं देखेंगे। चलने के एक दिन पहले आनलाइन बुकिंग की बात सोची तो लोगों ने बताया कि वहां सब होटल भरे हैं। कहीं कोई जगह नहीं है। हमने सोचा कि अब समय आ गया बुकिंग कराने का। यात्राओं में रोमांच लाने का यह भी एक तरीका है कि इंतजाम में देरी की जाए ताकि परेशानी आये और फिर उस परेशानी को हल करने की कोशिश की जाए।
आनलाइन बुकिंग की कोशिश की तो तमाम होटल में जगह दिखी। लगभग हर जगह एक ही कमरा बाकी दिखा रहा था। शायद हमारे लिए ही बचा रखा था। कमरे का किराया हजार-पन्द्रह सौ से लेकर पचीस-तीस हजार तक बताया जा रहा था।
बहरहाल एक कमरा बुक करा लिया । फ्रेंच कालोनी में एक विला था। कमरे के फोटो भी ठीक-ठीक ही दिख रहे थे। बुकिंग के कोई पैसे एडवांस में नहीं देने पड़े थे । सोचा अगर अच्छा नहीं होगा तो दूसरा खोजेंगे होटल।
महाबलीपुरम से पांडिचेरी की दूसरी लगभग 95 किलोमीटर है। कानपुर से लखनऊ की दूरी के बराबर। बढ़िया सड़क। सड़क के दोनों तरफ आबादी, गाँव , खेत । सबको देखते हुए पांडिचेरी की तरफ बढे। सड़क किनारे दीवारों पर इश्तहार। ज्यादातर तमिल में। कहीं-कहीं अंग्रेज़ी भी दिख जाती।
रास्ते में एक जगह चाय पी गयी। काउंटर पर मौजूद महिला तमिल ही जानती थी। लेकिन चाय लेने और पैसे देने में कोई अड़चन नहीं आई। पैसे की भाषा सबकी सबको फ़ौरन समझ में आ जाती है। दस रुपये की एक चाय । भुगतान गूगल पे से किया। आजकल पूरे देश में आनलाइन भुगतान की व्यवस्था हो गयी है।
पांडिचेरी पहुंचकर ठहरने की जगह गए। एक घर को होटल में बदल दिया गया था । अँधेरे कमरे । फ़ोटो में जितना अच्छा दिख रहा था होटल , उतना अच्छा दिखा नहीं। पास में स्थित मछली बाजार से ‘मछली गंध’ की मुफ्त व्यवस्था। मन नहीं हुआ रुकने का। दूसरा होटल खोजने निकले।
जिस भी होटल में पता किया वो भरा मिला। लोगों ने बताया कि महीनो पहले से बुकिंग कराते हैं लोग। कोई होटल खाली नहीं मिलेगा।
आसपास तमाम होटल देखने के बाद भी कहीं जगह नहीं मिली। तय किया कि जो बुक किया था उसी में रुक जाते हैं। रात को सोना ही तो है। एक दिन की बात । वापस चल दिए होटल की तरफ। उसको फोन भी कर दिए। आ रहे हैं रुकने के लिए।
लेकिन होटल की तरफ चलते हुए उसके कमरे के हाल याद आये। रुकने का मन नहीं किया। एक बार यह भी सोचा कि शाम तक घूमकर वापस लौट जायें पांडिचेरी से।
एक बार फिर होटल-होटल पूछते फिर। आनलाइन खोजा। एक होटल दिखा। हमने बुक करके पूछा तो बताया गया आ जाओ। खाली है। होटल वाले ने लोकेशन भी भेज दी। हम चल दिए।
होटल की तरफ चलते हुए उसी नाम का एक और होटल दिखा होटल वाले ने लोकेशन भी भेज दी।
होटल की तरफ जाते हुए उसी नाम का एक और होटल दिखा। हम लपके होटल वाले बताया कि एक कमरा खाली है। दाम एक हजार ज्यादा बताये। हमने पूछा इसी नाम का तुम्हारा और होटल भी है ? तो उसने बताया हाँ है ! हमने कहा आते उसको देखकर । उसने कहा- ठीक।
होटल के रास्ते में हमको यही लगता रहा कि कहीं वहां पहुँचने के पहले कमरा उठ न जाए इसलिए हम उससे बतियाते रहे। होटल पहुंचकर तसल्ली हुई कि कमरा अभी उठा नहीं था। काउंटर पर तीन लड़कियाँ थीं। उनमें से दो बाहर से यहाँ काम करने आईं थी। हर सवाल के जबाब फुर्ती से मुस्कराते हुए ' मुझे पता नहीं' कह रहीं थीं। तीसरी लड़की ने लडके को कमरा दिखाने के लिए भेजते हुए बताया -'सी फेसिंग रूम थाउजेंड एक्स्ट्रा।' कुल किराया 7499 रुपये । मतलब दिल्ली या किसी और शहर के फाइव स्टार होटल के एक कमरे के किराए के बराबर !
आखीर में जिस कमरे में सामान रखा गया समुद्र वहां से कुल जमा बीस-तीस मीटर दूर था। समुद्र की लहरें इठलाते हुए हमारा स्वागत कर रहीं थी।
इस बीच उस होटल से फोन भी आ रहा था जिसकी बुकिंग हमने महाबलीपुरम से कराई थी और जहाँ हम आने के लिए कह आये थे। जब हमने उसको बताया कि हम दूसरी जगह रुक गए हैं तो उसने कहा -'आप आनलाइन बुकिंग कैंसल कर दें।' हमने उसकी आज्ञा का पालन किया और कुछ देर में पांडिचेरी दर्शन के लिए निकल लिए।

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