Friday, January 11, 2019

धूप की संगत की चाहना




सुबह दफ्तर जाते हुए लोगों को सड़क पर आरामफर्मा देखता हूँ तो मन करता है वहीं ठहर जाऊं। घंटा आध घण्टा धूप की संगत में बिताऊं। किलो दो किलो धूप पचा जाऊं।
लेकिन मनचाहा हमेशा हो कहाँ पाता है। सुबह से शाम दिन तमाम हो जाता है। शाम को लगता है कि दिन कल फिर निकलेगा। सूरज फिर निकलेगा। निकलता भी है लेकिन मुलाकात नहीं हो पाती। पहले किसी न किसी बहाने सामने आ जाते थे। मुस्कराते थे। बतियाते थे। चाय-चुस्कियाते थे। टिपियाते हुए तिड़ी-बिड़ी हो जाते थे।
शायद आजकल सूरज भाई को भी व्यस्त होने का शौक चर्राया हो। लेकिन व्यस्त होने का काम तो निठल्लों का है। उनको व्यस्त होने की क्या जरूरत। अनगिनत काम हैं उनके पास। यह भी हो सकता है कि दिल्ली निकल गए हों पुस्तक मेले में किसी विमोचन में। किताब सीने पर सटाकर फोटो खिंचाने का मन किया हो उनका भी।
हो तो यह भी सकता है कि सूरज भाई के मोहल्ले में भी चुनाव का डंका बजा हो और सूरज भाई भी इस बार चुनाव लड़ने का मूड बना रहे हों।


अच्छा मान लीजिये सूरज भाई के मोहल्ले में चुनाव होने को हों और उनको भाषण देना हो किसी चुनाव सभा मे तो क्या बोलेंगे वे? कल्पना कीजिये। क्या वे अपने यहाँ ताजी हीलियम की सप्लाई की बात करेंगे या फिर बहुत उजले जगह में काम भर के अंधेरे की। हो तो यह भी सकता है कि वे अपने यहां भ्रष्टाचार के खात्मे पर बतियाये। कहे हमारे केंद्र पर लाखों डिग्री का तापमान सतह तक पहुंचते हुए कुछ हजार डिग्री ही रह जाता है। यह अंतर कम करके रहेगें हम।
अभी हम सूरज भाई के भाषण का ड्राफ्ट तैयार कर ही रहे थे कि उन्होंने हल्ला मचाकर हमको बाहर बुला लिया।झल्लाते हुए बोले -'तुम लफ्फाजी कर रहे हो बिस्तर पर बैठे हुए, हम यहाँ सुबह से तुम्हारे यहां के कोहरे के झाड़-झंखाड़ उखाड़ रहे हैं।'
हम सूरज भाई की तारीफ करके अंदर आ गए। काम में लगे हुए इंसान को डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए। क्या पता वह अपना काम निपटाने के पहले डिस्टर्ब करने वाले को ही निपटा दे।
अंदर आने के पहले हमने सूरज भाई की एक फोटो खींच ली थी। तारीफ सुनकर वे झल्लाने की जगह मुस्कराने लगे थे। तारीफ इंसान को मुलायम बना देती है।
है कि नहीं?

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