Wednesday, January 16, 2019

पुस्तक मेले के किस्से-1



अब जब कुंभ मेला शुरु हो गया है तो पुस्तक मेले के किस्से क्या सुनायें। लेकिन यादें हल्ला मचा रही हैं कि हमको भी सुनाओ। हमारे बारे में नहीं बताओगे तो समर्थन वापस ले लेंगे । यादों की सरकार गिर जायेगी। मजबूरन हमको पुस्तक मेले की यादें साझा करनी पड़ रही हैं। क्या करें मजबूरी है ! सरकार बचाने के लिये सब कुछ करना पड़ता है !
पुस्तक मेले के लिये रिजर्वेशन काफ़ी पहले से करा लिया था। इतवार के दिन छुट्टी थी। उसी हिसाब से शनिवार को रिजर्वेशन कराया। यह सोचकर की इतवार को पांव फ़िराकर वापस आ जायेंगे।
मेले में कमलेश पांडेय Kamlesh Pandey जी के साथ पहुंचे। उनकी शानदार कार में। मेले के एकदम बगल में कमलेश जी का दफ़्तर ! वहीं पार्किंग में कार खड़ी करने की मंशा से वे दफ़्तर पहुंचे। लेकिन वहां तैनात दरबान ने कार अंदर लाने से मना कर दिया। बोले-’ आज छुट्टी है।’ शायद उसने यह समझा कि ये भी कोई मेले के फ़ोकटिया दर्शक हैं जो पार्किंग का खर्च बचाने के लिये खुद को दफ़्तर का बता रहे हैं।
कमलेश जी ने तमाम दलीलें दी। खुद को असली दफ़्तर वाला बताया। परिचय पत्र दिखाया। लेकिन दरबान टस हुआ । पहलू बदला। लेकिन 'टस से मस' नहीं हुआ। धीमे से लेकिन साफ मना करके मुंडी अखबार में घुसा ली। कमलेश जी ने फ़िर विनम्रता का चोला त्यागकर रौद्र रूप धारण किया। चोला बदलते ही उनकी गाड़ी को उनके ही दफ़्तर में प्रवेश मिला।
गाड़ी को दफ्तर में प्रवेश भले मिल गया लेकिन काम भर की बेइज्जती का एहसास करा गया भाई जी को। वो तो कहो कि हम साथ में थे इसलिये बेइज्जती आधी बंटवा ली इसलिये मामला निपट गया वर्ना फ़ुल बेइज्जती भारी पड़ती कमलेश भाई को। हमको अपने दफ़्तरों पर एक बार फ़िर से प्यार उमड़ा जहां से दसियों साल बाद भी जाते हैं तब भी गेट फ़ौरन खुल जाते हैं। दिल्ली भौत बेइज्जती कराती है। रमानाथ जी गल्त नहीं कहते थे:
सम्मान सहित हम सब कितने अपमानित हैं (दिल्ली के लिये ही कहा होगा)
यह बात गांव की पगडंडी बतलाती है।
बहरहाल उस संक्षिप्त बेइज्जती को हमने अपनी गांठ में बांधा और तय किया कि इस पर एक लेख लिखा जायेगा। लेखक अपनी बेइज्जती पर और कर भी क्या सकता है सिवाय लेख लिखने के।
मेले के पहले खूब सारी चाट-पकौड़े की दुकाने खुली चल रहीं थी। छोले-भटूरे धड़ल्ले से बिना विमोचन के बिक रहे थे। बिना लोकार्पण के सब कुछ उदरस्थ हो रहा था।
मेले में घुसे। घुसने के पहले टिकट कटाया। टिकट खिड़की पर ही लिखा था - ’ दिव्यांगों, वरिष्ठ नागरिकों और स्कूली बच्चों के लिये प्रवेश मुफ़्त।’ हमको लगा कि काश दिव्यांगों की तुक मिलाते हुये व्यंग्यांगकों को भी छूट मिल जाये। यह भी सोचा कि किसी व्यंग्य के स्कूल का छात्र बताकर छूट ले ली जाये। लेकिन उसमें लफ़ड़ा था। पता लगा जिस व्यंग्य के स्कूल का छात्र बतायें अपन को उसका हेडमास्टर मना कर दे यह कहते हुये कि यह दूसरे स्कूल के फ़ंक्शन में पाया गया था इसलिये इसका यहां से ’स्कूल निकाला’ हो गया है।
बहरहाल चूंकि टिकट कटा चुके थे इसलिये अंदर घुसने के अलावा कोई चारा नहीं था। घुसे। मेले में घुसते ही कई जगह पसरी गीली मिट्टी ने हमको अपने आलिंगन में लेने में की कोशिश की। लेकिन हम सावधान रहे। रपटे लेकिन संभल गये।

मेले में घुसते ही सब तरफ़ दुकानें ही दुकानें दिख रहीं थीं। किताबों की दुकानें। उनका किस्सा इंशाअल्लाह फ़िर जल्ली ही।

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