Monday, December 07, 2015

धूप की सरकार बन गयी

सूरज भाई आज सुबह होते ही ड्यूटी पर जम गए। पेड़ों, झाड़ियों के आसपास छिपे अंधेरे और कोहरे की धरपकड़ करते हुए उनका संहार करने लगे। सूरज भाई का जलवा देखते हुए बाकी का बचा अँधेरा अपने आप ही सर पर पैर रखकर फ़ूट लिया।

सर पर पैर रखकर फूटना शायद इस तरह बना होगा जैसे रेलें चुम्बकीय पटरियों पर चलने लगें तो स्पीड बढ़ जाती है उनकी ऐसे ही आदमी जब अपने दिमाग की पटरियों पर चलना शुरू कर देता होगा तो सरपट दौड़ने लगता होगा।

किरणें खिलखिलाती हुई बाग़-बगीचे, फूल-पत्ती, छत-छज्जे पर पसर गयीं। एक किरण ने... दूसरी के कंधे पर धौल जमाते हुए कहा-' क्या बात है आज घास पर ही पसरी रहेगी या किसी फूल पर बैठना है।' इस पर दूसरी किरण ने कहा -"यार फूल पर बैठने का तो तब मजा है जब ओस की बूंद की कुर्सी मिले बैठने को। ऐसे क्या मजा फूल पर बैठने को। फूल भी दिन भर सेंसेक्स की तरह दांये-बाएं होता रहता है।हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं सरककर नीचे न गिर जाएँ। मन करता है ओस की बूँद पर बैठकर झूला झूलूँ। पता नहीं कब ओस की बूँद पर बैठने को मिलेगा।"

किरणों की बातचीत सुनते हुए चिड़ियाँ चहचहाती हुई आपस में बतिया रहीं थीं। एक तेज से बोलती चिड़िया की तरफ इशारा करते हुए दूसरी चिड़िया ने कहा-" इत्ता जोर से चिल्लाती है यह बगीचा लगता है संसद बन गया है। इसकी आवाज से मेरे तो कान एकदम क़ानून व्यवस्था की तरह बहरे हो गए। अपने यहां भी कोई केजरीवाल जैसा कोई नियम लागू करने वाला होता तो कानून लागू कर देता चिड़ियाँ भी एक छोड़कर चिचियाया करेंगी।"
अरे तू भी कैसी बात करती है यार। केजरीवाल आएगा तो फिर लोकपाल भी आएगा। फिर राज्यपाल भी। अच्छा-भला बगीचा दिल्ली बनकर रह जाएगा। अपन ऐसे ही भले। ये चिंचियाती ही तो है। यह तो नहीं कहती भाषणवीर नेताओं की तरह कि हम यह करेंगे। वह करेंगे। इसको भगा देंगे। उसको फुटा देंगे। क्या पता उसकी आवाज ऊँची न हुई हो हमारे कान में ही कोई लोचा हुआ हो कि हमको अपने अलावा हर किसी की आवाज बेसुरी लगने लगी हो। क्या पता आदमियों के साथ रहने का असर हुआ हो हम पर भी और हमें भी किसी भी अलग के मुंह से निकली आवाज से एलर्जी हो गयी हो।

'सही कह रही हो यार'- कहते हुए दोनों चिड़ियाँ उड़कर दूसरे पेड़ की फुनगी पर चली गयीं। अब उस चिल्लाती चिड़िया की आवाज उनको भली और प्यारी लगने लगी। वे भी उसके संग कोरस में गाने लगीं। पेड़ की पत्तियां भी हिलते हुए ताली सी बजाती हुई कोरस में शामिल हो गयीं।

सामने सड़क पर एक ऑटो भड़भड़ाते हुए निकला। बुजुर्ग ऑटो लगता है जाड़े में सुबह-सुबह सड़क पर दौड़ाये जाने के चलते भन्नाया हुआ था। इसीलिये लगता है तेज आवाज में बड़बड़ाता हुआ सड़क पर चला जा रहा था। डीजल और इंजन के अनुशासन में बंधा बेचारा सड़क पर चला तो जा रहा था पर गुस्से का इजहार भी धुंआ उगलते हुए करता जा रहा था।

खुले हुए कमरे से उजाला अंदर घुस आया। गुड मॉर्निंग करते हुए बोला-'अंकल क्या आज ऑफिस नहीं जाना है?'
हमने कहा जाना है बच्चा। जाते हैं। जरा चाय पी लें।

चाय पीते हुए सामने सूरज भाई का जलवा देख रहे हैं। सब जगह धूप की सरकार बन गयी है। सूरज भाई आसमान से मुस्कराते हुए शायद कह रहे हैं -सुबह हो गयी।

Sunday, December 06, 2015

’पुलिया पर दुनिया’


पिछले साल लगभग इन्ही दिनों मैंने पुलिया पर लिखी पोस्टों को इकट्ठा करके ई-बुक बनाई थी--’पुलिया पर दुनिया’। उसका फ़िर ’प्रिन्ट आन डिमांन्ड’ के अंतर्गत प्रिंट संस्करण भी निकाला गया। यह काम सब कुछ एक नौसिखिये की तरह किया गया। किताबें pothi.com और onlinegatha.com पर रखी गयीं। pothi.com को मैं देखता रहा। वहां कल तक कुल 50 किताबें बिक चुकी थीं। इनमें से एक रंगीन प्रिंटिंग में किताब भी (कीमत 800 रुपये) थी जिसे Om Varma जी ने अपने पिताजी के लिये लिया था। ओम वर्मा जी ने बताया कि उनके बुजुर्ग पिताजी को मेरा लेखन बहुत पसंद है पर वे कम्प्यूटर पर पढ नहीं पाते इसलिये उन्होंने इस किताब का छपा हुआ संस्करण उनके लिये मंगाया। मैं यह सुनकर अविभूत हो गया और मैंने उनसे उनका पता मांगा यह कहते हुये कि मैं अपनी पोस्टों को हफ़्तावार उनके पिताजी के पढ़ने के लिये भेजता रहूंगा।

मेरी पोस्टों को पढे जाने के बारे में मुझे हमारे समधी जी Jai Narain Awasthi ने बताया कि मेरी हर पोस्ट वे अपने यहां होने वाले सतसंग में, जिसमें उनके साथी उनके घर में इकट्ठा होते हैं,पढकर सबको सुनाई जाती है। हमें यह सुनकर ताज्जुब हुआ और मैंने कहा -’ यह तो पढने और सुनने वाले के साथ अन्याय होता होगा जब मेरी लम्बी पोस्टें पढी जाती होंगी।’ लेकिन उन्होंने कहा -’अरे नहीं सबको बड़ा अच्छा लगता है सुनने में।’ मेरी एक और मित्र Tamanna Bansal ने एक बार बातचीत में बताया था कि मेरी सुबह की पोस्टें वे व्हाटसएप पर अपने मित्र-ग्रुप में भेजती हैं और लोग इंतजार करते मेरी पोस्टों को।

हालांकि मेरी पोस्टों पर कुल जमा लाइक्स आमतौर पर 100 -200 तक रहते हैं लेकिन जब मुझे यह पता चला कि मेरी पोस्टें ऐसे भी पढी जाती हैं तो जानकर अच्छा लगा और यह भी लगा कि मुझे लिखते रहना चाहिये। न जाने किस वेश में पाठक मिल जायें।

हां, तो बात कर रहे थे किताबों की। तो कल मुझे onlinegatha.com से सूचना मिली कि मेरी किताब उनके यहां सबसे ज्यादा बिकी है। सबसे ज्यादा मतलब ई-बुक बिकी है 100 और पेपरबैक किताबें बिकीं 5. आनलाइनगाथा पर ई-बुक जो कि आपके अपने कम्प्यूटर पर डाउनलोड करके पढी जा सकती है की कीमत मैंने रखी थी 49 रुपये और पेपरबैक संस्करण की कीमत रखी थी 251 रुपये।

ई-बुक पर 70% रायल्टी मिलती है (पोथी.काम पर यह 75% है) पेपरबैक किताब पर 113 रुपये है। आनलाइन गाथा से कल तक कुल मिलाकर मेरी रायल्टी 4731.83 INR / $ 74.07 . इसी तरह पोथी.काम पर बिकी कुल 50 किताबों (47 ई-बुक और 1 ब्लैक एंड व्हाइट 2 रंगीन) की रायल्टी Rs.1,864.80 हुई। इस तरह कुल मिलाकर साल भर में कुल 155 किताबों की बिक्री से मेरे नाम रायल्टी के कुल रुपये 6595. 80 हुये।

आनलाइन गाथा की रायल्टी मुझे तब मिलेगी जब यह 100 डालर हो जायेगी। यह तभी संभव है जब डालर रुपये के मुकाबले इतना भड़भड़ा के गिरे कि एक डालर की कीमत 47 रुपया 31 पैसे हो जाये या फ़िर करीब 50 किताबें और बिक जायें। किताबें तो बिकेंगी ही। अभी मैंने अभी अपने विभाग को सूचना नहीं दी है। 40 फ़ैक्ट्रियां और कम से कम 20 और संस्थान हैं हमारे। उनको सूचना देंगे और हर संस्थान का राजभाषा विभाग 2 किताब खरीदेगा तो मार्च तक 100 किताबें और बिक जायेंगी। तब तक रायल्टी के पैसे भी मिल भी 100 डालर मतलब 7500 करीब हो ही जायेंगे आनलाइन गाथा पर। है कि नहीं?

मेरे कई मित्रों ने अपनी किताबें प्रकाशकों को पैसे देकर छपवाई। कुछ लोगों ने तो 25 से 35 हजार रुपये तक दिये। उनको कितनी रायल्टी मिली मुझे पता नहीं पर मुझे लगता है प्रकाशकों को पैसा देकर छपवाने से बेहतर यह विकल्प है जिसमें भले ही कम पैसा मिले लेकिन गांठ से कुछ नहीं जाता।

हां यह जरूर रहा कि आनलाइन प्रकाशन के चलते इस किताब के बारे में किसी ने कुछ लिखा नहीं। किसी ने किताब के साथ फ़ोटो खींचकर नहीं छपवाई। किसी ’खचाखच भरे सभागार’ विमोचन भी नहीं हुआ मेरी किताब का रामफ़ल यादव ने पुलिया पर किया था। किताब के साथ में खड़े होकर फ़ोटो खिंचाई थी।

यह पोस्ट सिर्फ़ अपने मित्रों की जानकारी के लिये है कि हमारी पुलिया की पोस्टों की किताब भी उपलब्ध है। अगर वे चाहें तो इसे आनलाइन खरीद सकते हैं। जानकारी यह भी कि ये सारी पोस्टें मेरे फ़ेसबुक और ब्लॉग पर भी उपलब्ध हैं (यह बताना अपनी बिक्री के पैर पर कुल्हाड़ी मारना है न! smile इमोटिकॉन ) लेकिन सब पोस्टों को किताब के रूप में पढ़ने का मजा ही कुछ और है न। किताब में भूमिका भी है जो कि फ़ेसबुक और ब्लॉग पर नहीं मिलेगी।

जिन मित्रों को मेरा लिखा पसंद आता है और जो मेरे लिखे को किताब के रूप में लेना चाहते हैं वे आनलाइन इसे खरीद सकते हैं। सभी जगह से खरीदने के लिंक नीचे टिप्पणी बाक्स में दे रहा हूं।

आज इतवार है। जिनकी छुट्टी है वे मजे करें। सबका दिन मंगलमय हो।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10206860473323839
 

अति सर्वत्र वर्जयेत

 
पूरे दस साल के बाद वेतन आयोग आया । अखबार कह रहे आयोग ने खूब पैसा बढ़ाया। सरकारी कर्मचारियों पर खजाना लुटाया । उधर  कर्मचारी कह रहे हैं- यार मजा नहीं आया। ऐसा लग रहा कि आयोग ने तो मिठाई के डिब्बे की जगह लेमनचूस टिकाया।
एक सरकारी कर्मचारी का कहना है- जितना पैसा साल भर की मंहगाई भत्ते किस्तों में मिल जाता था उतना आयोग ने दस साल में बढ़ाया है। गोया नगाड़े की आवाज की जगह झुनझुना बजाया है।
ज्यादा पैसे बढ़ते तो क्या करते के जबाब में कर्मचारी बोला- तो हम ज्यादा खर्च करते। ज्यादा सामान खरीदते। ज्यादा खुश होते।
ओह ये बात है। समस्या की जड़ ज्यादा की इच्छा में हैं। यह तो भारतीय संस्कृति के संस्कृति सुभाषित –’अति सर्वत्र वर्जयेत’ की भावना के खिलाफ़ है। जो वर्जित है उसकी चाहना करोगे तो दुख तो होगा ही। दुख को खुद न्योता देने के समान है ज्यादा की इच्छा करना।
लेकिन सुख की इच्छा तो सहज भाव है मन का। उसका क्या करें ?
अरे तो उसके लिये उपाय है। संतोष की शरण में जाओ। संस्कृत में सुभाषित है न – ’संतोषम परमम सुखम।’ ऐसी कौन सी समस्या है जिसका इलाज भारतीय संस्कृति में नहीं है? संतोष की शरण में जाओ और परम सुख की प्राप्ति करो। मन करे तो गाते-बजाते हुये कोरस में जाओ- ’ज्यादा की जरूरत हमें नहीं, थोड़ी में गुजारा होता है।
लेकिन मंहगाई तो बढती जा रही है। उसका मुकाबला कैसे करेंगे? बाजार में सब कुछ तो मंहगा हो रहा है।
अरे बाजार से मुकाबला करने के लिये ही तो यह सारे उपाय किये गये हैं। सरकार पहले से ही बाजार के पर कतरने के लिये तमाम उपाय कर चुकी है। रेलवे की रिजर्वेशन का पैसा बढ़ाया, गैस की सब्सिडी कम की, सेवा शुल्क लगाया। जो रही बची कसर है वह वेतन आयोग पूरी कर देगा। बाजार के लिये पैसे की सप्लाई काट दी।
वो तो कहो आयोग ने तन्ख्वाहें कम नहीं की। वर्ना आयोग के एक सदस्य का सवाल  तो यह था कि का वेतन बढ़ना क्यों चाहिये। सरकारी कर्मचारी तो सरकार का अंग होने के नाते वेतन के लिये अयोग्य होता है। उसकी तन्खाहें तो कम होनी चाहियें।
अब बोलो क्या कहना है वेतन आयोग के बारे में?  एक लाइन में बोलो। मैंने सरकारी कर्मचारी से पूछा।
सरकारी कर्मचारी ने आंखे लाल करके झल्लाते हुये कहा- अति सर्वत्र वर्जयेत।

Saturday, December 05, 2015

'हम न मरब' -बेहतरीन उपन्यास

अभी खत्म किया यह उपन्यास। हाल के दिनों में पढ़ा सबसे बेहतरीन उपन्यास। अद्भुत।

ज्ञान चतुर्वेदी जी( Gyan Chaturvedi ) के सभी उपन्यास मैंने पढ़े हैं। अलग-अलग कारणों से वे पसन्द आये। लेकिन 'हम न मरब' पढ़ने का अनुभव सबसे अलग रहा। इस उपन्यास को पढ़ना अपने समय की विद्रूपताओं को नजदीक से देखना जैसा है।

'हम न मरब' के बारे में और कुछ लिखना मुश्किल है फिलहाल। इसके लिए इसे फिर से पढ़ना होगा इसे। लेकिन आम जीवन का का इतना सच्चा बयान इसके पहले कब पढ़ा यह याद नहीं।
...
उपन्यास पढ़ने के पहले इसके बारे में हुई आलोचनाएं पढ़ने को मिली थीं। इसकी आलोचना करते हुए कहा गया कि इसमें गालियां बहुत हैं। लेकिन उपन्यास पढ़ते हुए और अब पूरा पढ़ लेने के बाद लग रहा है कि गालियों के नाम पर उपन्यास की आलोचना करना कुछ ऐसा ही है जैसे किसी साफ़ चमकते हुए आईने के सामने खड़े होकर कोई अपनी विद्रूपता और कुरूपता देखकर घबराते हुए या मुंह चुराते हुए कहे- 'ये बहुत चमकदार है। सब साफ-साफ़ दीखता है।'

उपन्यास पढ़ने के बाद मन है कि अब इसे दोबारा पढ़ेंगे। इस बार ठहर-ठहर कर। पढ़ते हुए सम्भव हुआ तो इसकी सूक्ति वाक्यों का संग्रह करेंगे। जैसे की आखिरी के पन्नों का यह सूक्ति वाक्य:
"महापुरुष के साथ रहने को हंसी ठट्ठा मान लिए हो क्या? बाप अगर महापुरुष निकल जाए तो सन्तान की ऐसी-तैसी हो जाती है।"

इस अद्भुत उपन्यास का अंग्रेजी और दीगर भाषाओं में अनुवाद भी होना चाहिए। 500-1000 की संख्या वाले संस्करण की हिंदी पाठकों की दुनिया के बाहर भी पढ़ा जाना चाहिए इस उपन्यास को।

327 पेज का यह उपन्यास राजकमल प्रकाशन की बेवसाइट rajkamalprakashan.com से आनलाइन मंगाया जा सकता है। कीमत है 495 रूपये।

ज्ञान जी ने अपने इस उपन्यास के समर्पण में लिखा है:
"........और व्यंग्य में आ रही नई पीढ़ी को भी/
बहुत स्नेह और विश्वास के साथ समर्पित/
मुझे विश्वास है कि मैं कभी नहीं मरूंगा/इस नई पीढ़ी में, हमेशा ही जिन्दा रहने वाला हूँ मैं।"

जैसा उपन्यास लिखा है ज्ञान जी ने उससे उनकी यह हमेशा जिन्दा रहने का विश्वास सच साबित होगा। जब तक पढ़ने- लिखने का सिलसिला चलता रहेगा और जब तक जीने-मरने की कहानी जारी रहेगी तब तक उनका यह उपन्यास 'हम न मरब' प्रासंगिक रहेगा।

ज्ञान जी के बारे में लिखते हुए उनकी अगस्त में एक इंटरव्यू में कही बात याद आ रही है जब उन्होंने कहा था-" हम आज जो हैं उससे बेहतर होना है हमें। हमें बेहतर इंसान होना है, बेहतर पिता, बेहतर पुत्र, बेहतर पति, बेहतर लेखक होना है। हम आज जो कुछ भी आज हैं उससे बेहतर होना है।"

उस दिन उनकी कही बात सुनकर लगा था कि कितनी अच्छी बात कही है। आज फिर लग रहा है यह सोचते हुए।

उपन्यास अगर न पढ़ा हो तो मंगाकर पढ़िये। अच्छा लगेगा।

ज्ञान जी बहुत-बहुत दिनों तक लिखते रहें। दीर्घायु हों और स्वस्थ बनें रहें। मंगलकामनाएं।

Friday, December 04, 2015

बाबाओं के हाथ में देश


आज हम लंच के लिए निकलने वाले थे तब तक किसी ने बताया कि रामलीला मैदान में कोई कम्बल वाले बाबा आये हैं। उनका शिविर चल रहा है।हर शुक्रवार को लगेगा शिविर। पांच शुक्रवार चलेगा।

गुजरात के रहने शुक्रवारी बाबा लकवा, आर्थराइटिस, डायबिटीज आदि बीमारियों का इलाज करते हैं। इलाज में वो मरीजों के ऊपर कम्बल उढ़ाते हैं। लकवा वाले रोगियों के लकवाग्रस्त अंग खींचते हैं। गले लगाते हैं। भींचते हैं। छोड़ देते हैं। लोग मरीजों को ले जाते हैं। पांच शुक्रवार होने पर ऐसा कहते हैं कि मरीज ठीक हो जाते हैं।
हम गए रामलीला मैदान तो बाबा जी मंच पर लोगों के लाये हुए नारियल छू-छूकर उनको देते जा रहे थे। एक यन्त्र बिक रहा था 100 रूपये जिसमें कुछ मन्त्र लिखे थे उसको भी लोगों को छूकर देते जा रहे थे। 10 रूपये का काले घागे में बंधा ताबीज भी बिक रहा था।

एक महिला अपने मन्दबुद्धि बच्चे को लेकर आई थी। बताया उसने -'यह बोलता नहीं है। सब जगह इलाज करके हार गए। आज बाबाजी का पता चला तो यहां आ गए।'

कुछ देर में बाबाजी मंच से उतरकर मरीजों की भीड़ में चले गए। एक लकवाग्रस्त मरीज को कम्बल उढ़ाया। उसका हाथ पकड़कर खींचा और कसकर भींच लिया। मरीज पर पकड़ देखकर धृतराष्ट्र द्वारा भीम के लोहे को पुतले को भींचकर चकनाचूर कर देने की याद आ गई।

भींचने के बाद बाबा जी ने उस लकवाग्रस्त मरीज को छोड़कर उसके परिजनों से उसको ले जाने को कहा। परिजन उसको समेटकर पंडाल से बाहर आये तो हमने उनसे पूछा - 'क्या तबियत ठीक हो गयी? अभी आज तो पहला दिन है।' मैंने मरीज से पूछा तो उसने भी बताया कि कुछ फर्क तो नहीं लग रहा। अभी तो पहला ही दिन है। मतलब उसको आशा है कि 5 दिन कम्बल थेरेपी हो जायेगी तो उसकी बीमारी ठीक हो सकती है।

बाबा जी के वालंटियर्स में से एक ने बताया कि अभी बिहार में कैम्प लगा था छपरा में। फिर सीहोरा में। लोग ठीक होते होंगे तभी तो इतने लोग आये हैं।

हम सवाल पूछते हैं कि क्या कोई आंकड़ा है इस बात का कि कितने लोग बाबा जी में इलाज से ठीक हुए।
अगर ठीक नहीँ होते तो इतनी भीड़ क्यों लगती यहां पर इलाज के लिए? -सवाल आ जाता है।

मतलब कोई काम सही है या गलत यह भीड़ के इकट्ठे होने से तय होगा। हो ही रहा है। भीड़ को इकट्ठा करने का हुनर रखने वाले लोकतन्त्र के राजा बनते ही हैं।

पूरा मजमा लगा था वहां। मेले का सीन। मेले की सहायक खाने-पीने की दुकाने खुल गयीं थीं। कोई अमरुद बेच था था कोई गोलगप्पे। कहीं चाय चल रही थी कहीं पकौड़ी। हर तरह की तुरन्त लग जाने वाली दुकान लग गई थी वहां।

कम्बल थेरेपी के साथ-साथ एक थाली में आरती ज्योति घुमाई जा रही थी। उसमें लोग श्रद्धानुसार चन्दा डालते जा रहे थे। थाली ऊपर टक भर गयी थी। शिविर शाम तक चलना है। ऐसे ही 5 दिन चलेगा शिविर।

कम्बल बाबा के इलाज से कितने लोग ठीक होंगे यह पता नहीं पर मैदान में खिली धूप में विटामिन डी के असर से बहुतों के मन जरूर खिल गये होंगे।

बाहर निकले तो एक आदमी कहता हुआ जा रहता--'पैसा बहूत पीट रहा है कम्बल बाबा।'

अब जब इलाज मुफ़्त है तो पैसा पीटने की बात कहना कैसे ठीक कहा जाएगा? लेकिन यह पैसा कमाना भी तो ऐसा ही जैसा फेसबुक मुफ़्त है लेकिन उसकी कमाई से जुकरबर्ग जो दान सामाजिक कार्य के लिए देता है वह कई देशों के कुल राष्ट्रीय उत्पाद सरीखा है।

मुफ्तिया इलाज के लिए दूर से सैकड़ों लोग आये हैं गाड़ियों में हजारों रुपया फूंक कर। मुफ़्त में कुछ भी मिलता है तो लोग टूट पड़ते हैं। यह तो इलाज है। मुफ़्त में कोई जहर भी बेंचे तो भी शायद भीड़ लग जाए।

मुझे लगता है यह अन्धविश्वास है। कोई ठीक नहीं होता इस इलाज। अगर सही में ठीक होता हो तो देश के मेडिकल कालेज बन्द करके सब काम ठेके पर दे देना चाहिए बाबा जी को।

वैसे देखा जाये तो अपने यहां बाबा बहुत कुछ चला रहे हैं। काला धन, नोबल पुरस्कार,टैक्स नीति और प्रधानमन्त्री तक तय करने का दावा बाबाजी कर रहे हैं।

लौटते में ड्राइवर बोला-'बाबाओं का जलवा उनकी पोल खुलने तक ही रहता है। बापू आशाराम का देखिये -राम के वेश में रासलीला करते थे। आज जेल की चक्की पीस रहे हैं।'

पुलिया पर शिवप्रसाद मिले। बोले-' बाबा का इलाज करवाकर आ रहे हैं। दमा की शिकायत है।'सब्जीबेंचते हैं शिवप्रसाद। सुबह 9 बजे से लगे थे लाइन में।हमने पूछा-'कुछ ताबीज वगैरह खरीदा? बोले- नहीं। उनके चेहरे पर बेवकूफ बनने से बच जाने भाव था। पर 4 घण्टे लुट जाने और भीड़ का हिस्सा बनकर बाबाजी कमाई में अप्रत्यक्ष सहयोग का उनको अंदाज ही नहीं था।

बातचीत करते हुए जेब से निकाल कर तम्बाकू खाने लगे शिवप्रसाद।

इस बीच एक कार रुकी। उसमें बैठे लोगों ने रामलीला मैदान का पता पूछा। तेजी से चले गए।

लौटकर आते समय मैं सोच रहा था कि अपना देश भी तो इसी तरह चल रहा है। तमाम समस्याओं से लकवाग्रस्त देश। लोग आते हैं। कम्बल उढ़ाते हैं। इलाज का दावा करते हैं। कोई पूछता है कि अभी हालत सुधरी नहीं तो कह देते हैं--अभी तो इलाज शुरू हुआ है। जनता भी सालों तक इन्तजार करती रहती है। कभी एक बाबा से मन उचट जाता है तो दूसरे बाबा की शरण में चली जाती है।

बाबाओं की कमी थोड़ी है देश में। बाबाओं के हाथ में है  देश |
 

Wednesday, December 02, 2015

चले कहाँ हो तुम मेरी धड़कने बढ़ा के

चले कहाँ हो तुम
मेरी धड़कने बढ़ा के

हम चाय की दुकान पर बैठकर चाय पी ही रहे थे कि ये वाला गाना बजने लगा। हमें लगा कि हम तो अभी आये ही हैं लेकिन यह हमारे जाने की बात कौन करने लगा। यह सोचकर गुदगदी होने ही वाली थी कि हमारे कहीं से चलने पर किसी की धड़कने बढ़ सकती हैं लेकिन ऐन मौके पर रुक गयीं। खतरा टल गया।
...
दुकान पर एक आदमी एक व्हील चेयर पर बैठे आदमी से बतिया रहा था। चाय वाला भी उसमें बिना निमन्त्रण शामिल हो गया। बात करते हुए तीनों लोग माँ, बहन और भो घराने की गालियां देते जा रहे थे। बातों में गालियों की मात्रा सुनकर यह तय करना मुश्किल सा लगा कि ये लोग गाली-गलौज के लिए बातचीत कर रहे हैं या फिर बातचीत के लिए गाली-गलौज।

यह सवाल कुछ ऐसा ही था जैसे कोई यह जानने की कोशिश करे कि देश में विकास के नाम पर भ्रष्टाचार हो रहा है या भ्रष्टाचार के नाम पर विकास।

हम कुछ तय कर पाते तब तक अगला गाना बजने लगा पर वह हमको ठीक से सुनाई नहीं दिया क्योंकि चायवाला अपने ग्राहक से किसी बात पर बहस करते हुए तेज-तेज बतियाता रहा। वह क्या कह रहा था यह तो नहीं समझ में आया लेकिन बीच-बीच में जोर-जोर से यह बोलता जा रहा था कि जिसके भाग्य में जो लिखा है वह मिलकर रहेगा।

दस फ़ीट की दूरी से रेडियो से चली हुई आवाज जब बीच में खड़े लोगों के हल्ले- गुल्ले के चलते हम तक नहीं पहुंची तो हमको कुछ-कुछ यह समझ में आया कि दिल्ली से चली हुई योजनाएं बांदा, बस्तर, बलिया तक क्यों नहीं पहुंच पातीं। बीच के लोग उनको डिस्टर्ब कर देते होंगे।

सुबह जब निकले साइकिल से तो उजाला कम था। एक महिला सरपट तेजी से टहलती दिखी। उसके पीछे एक जोड़ा खरामा-खरामा टहल रहा था।

दो महिलाएं सड़क पर टहलती हुई दिखीं। दोनों शॉल ओढ़े हुए थीं। ध्यान से देखा तो एक महिला एक हाथ में माला थामे हुई थीं। माला हिडेन एजेण्डा की तरह थी। जितनी तेजी से वह टहल रही थी उससे भी तेजी से माला फेरती जा रही थी।

एक आदमी एक टपरे के पास बैठा शीशे में अपना मुंह देख रहा था।

चाय की दुकान पर अगला गाना बजने लगा-

'किसने छीना है बोलो मेरे चाँद को'

आदमी की यह आवाज सुनकर लगा कि जैसे ही उसे पता चलेगा कि उसके चाँद को किसने छीना है वैसे ही वह पास के थाने में जाकर चाँद के छीने जाने की रिपोर्ट लिखायेगा या फिर किसी टेंट हाउस से किराये पर माइक लेकर किसी चौराहे पर हल्ला मचाते हुए भाइयों और बहनों को बताएगा।

लेकिन नायिका देश की जनता की तरह समझदार निकली और उसने जबाब दिया:

'कौन छीनेगा तुझसे मेरे चाँद को'

नायिका की बात सुनकर एक बार फिर से लगा कि महिलाओं की सहज बुद्धि शानदार होती है।

दूसरी दुकान की भट्टियां जल नहीं रहीं थी। उसके आसपास किसी चुनाव हारी पार्टी के कार्यालय जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था। आज शायद दुकान बन्द थी।

अगला गाना बजने लगा:

'सारा प्यार तुम्हारा मैंने बाँध है आँचल में
तेरे नए रूप की नयी अदा हम देखा करेंगे पलपल में'

मतलब प्यार न हो गया आदमी का जीपीएस हो गया। प्यार न हुआ मानों सीसीटीवी कैमरा हो गया। इधर प्यार बंधा और उधर अदाएं दिखने लगीं। प्यार भी बाँधा तो इसलिए कि नए रूप की अदाएं दिखतीं रहें। मान लो कोई पुराने रूप की अदाएं दिखाना चाहे तो क्या आँख मूँद लोगे भाई?

यह भी लगा कि गाने में आँचल में प्यार बाँधने की बात कही गयी है। यह बात तब की है जब आँचल हुए करते थे। अब मान लो कोई जीन्स टॉप में हो तो कहां बंधेगा प्यार? जेब में धरने की सुविधा भी होनी चाहिए। या अब तो जमाने के हिसाब से मोबाईल में व्हाट्सऐप से भेजने का जुगाड़ होना चाहिए। मल्लब समय के हिसाब से सब होना मांगता भाई।

मेस के पास एक बालिका साईकल पर स्कूल जा रही थी। साथ में एक बालक मोटर साइकिल चलाते हुए बालिका से बतियाता जा रहा था। बालिका उसको मम्मी की कही कोई बात -'मेरी मम्मी कह रही थी' कहते हुए बता रही थी। बालक चातक की तरह चाँद के चहरे को देखते हुए बालिका की मम्मी की कही बात बालिका के मुंह से सुन रहा था।

टीवी पर चेन्नई की बारिश के सीन दिखाई दे रहे हैं। कानपुर से घरैतिन का फोन आया कि वहां बहुत तेज बारिश हुई रात को।लेकिन स्कूल जाना है आज। हम ऑटो वाले को फोन पर सूचना देते हुए यह शेर पढ़ रहे हैं:

तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
कि भीग तो पूरा गए,पर हौसला बना रहा।

सूरज भाई वाह-वाह करते हुए आसमान में चमक रहे हैं। चिड़ियाँ भी चिंचियाते हुए सुबह होने की घोषणा कर रही हैं। सुबह सच में हो गयी है। सुहानी भी है।

Tuesday, December 01, 2015

वेतन आयोग में गिफ़्ट वाउचर




हिन्दुस्तान अखबार में 01-12-15
पूरे दस साल के इंतजार के बाद आया वेतन आयोग। कर्मचारियों के वेतन बढे। अखबारों ने खबर छापी- सरकारी कर्मचारियों के बल्ले-बल्ले। वेतन 23 प्रतिशत तक बढा। सरकारी खजाने पर अरबों पर बोझ।सरकारी कर्मचारियों से पूछा गया- कैसी लगी  वेतन आयोग की सिफ़ारिशें? खुश तो बहुत होगे? कर्मचारी भन्नाया हुआ था। बोला- इत्ता तो हर साल डीए बढने पर मिल जाता था जितना दस साल बाद आये इस आयोग ने देने की बात की है। सत्तर सालों का सबसे खराब वेतन आयोग है यह। उसका गुस्सा देखकर लग रहा था कि वह बस- ’वेतन आयोग वापस जाओ’ का नारा लगाने के लिये मुट्ठी भींचने ही वाला है।
बड़ा बहुरुपिया है यह वेतन आयोग भी। देने वालो को दिखता है कि उसने अपना सब कुछ लुटा दिया देने में। पाने वाला सोचता है कि उसको तो लूट लिया देने वाले देने और पाने वाले दोनों समान भाव से लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं वेतन आयोग से।
देखा जाये तो मामला पैसे का ही है। पैसा बढ़ता तो भी वह बाजार ही जाता। पैसे की नियति ही है बाजार पहुंचना। जेब किसी की हो पैसा उसमें पहुंचते ही बाजार  जाने के लिये मचलता है। किसी को नये कपड़े लेने होते हैं , किसी को मोबाइल। कोई कार के लिये हुड़कता है, कोई मकान के लिये। सबके लिये बाजार ही जाना होता है। बाजार पैसे का मायका होता है। जितनी तेजी से आता है जेब में पैसे उससे तेजी से वापस जाने के लिये मचलता है। उसको बाजार में ही चैन मिलता है। किसी की जेब में रहना अच्छा लगता नहीं पैसे को।
अभी तो लोग पैसे को देख भी लेते हैं आमने-सामने। कभी दुआ सलाम भी हो लेती है पैसे से। समय आने वाला है पैसा बाजार में ही रहेगा। आपके पास आने के लिये कहा जायेगा तो बोलेगा- समझ लो पहुंच गये जेब में। बताओ हमारे बदले में क्या चाहिये तुमको। चीज तुम्हारे पास पहुंच जायेगी। हमको डिस्टर्ब न करो। यहीं रहन दो बाजार में आराम से।
क्या पता पैसे के बाजार में ही बने रहने की जिद और मनमानी के चलते  आने वाले समय में वेतन आयोग लोगों के वेतन बढने की जगह ’मियादी गिफ़्ट वाउचर’  देने की घोषणा होने लगे।   


Monday, November 30, 2015

मंगल खलीफा टाइप था

सुबह निकले तो देखा बरामदे में बहुत से पतंगे मरे पड़े थे। रात को ट्यूबलाइट से भिड़ते रहे होंगे। कुछ देर में सफाई हो जायेगी। ये कीड़े किसी कूड़ेदान में शरण पाएंगे। पता नहीं इन कीड़ों का संसार कैसा होता है। क्या पता इनके यहाँ इतिहास लिखा जाता है कि नहीं। शहीदों के सम्मान में लोकगीत गाये जाते हैं कि नहीं। अगर ऐसा कुछ होता तो कोई वीर रस का 'पतंगा कवि' इनकी शान में कविता रच चुका होगा जिसका लब्बो लुआब यह होगा कि दुश्मन ट्यूब लाइट की रौशनी का मुकाबला करते हुए ये पतंगे शहीद हुए।

विराट समय के मुकाबले इंसान की औकात की ये कविता पंक्तिया अनायास याद आ गई:
शताब्दियाँ बनकर रह जाती हैं
इतिहास की तहरीर
और उसी इतिहास से
सभ्यताओं के जनाजे निकल जाते हैं।

खैर, सुबह जब निकले तो सूरज भाई अभी निकलने का मूड बना रहे थे पर निकले नहीं थे।

सामुदायिक भवन में कुछ लोग कूड़ा जलाये आग ताप रहे थे। कुर्सियों का ढेर एक के ऊपर एक जमा हुआ था। सबसे ऊँची कुर्सी देखकर लगा कहीं वह भाईयों और बहनों कहते हुए मन की बात न शुरू कर दे।

सामने से तेजी से टहलते आते सरदार जी ने दोनों हाथ सीधे आसमान की तरफ उठाकर नमस्ते किया। हमारे हाथ में साइकिल का हैंडल था सो हम सर हिलाकर नमस्ते किये।

एक महिला सर झुकाये टहलती चली जा रही थी। सड़क पर कूड़ा बटोरता एक लड़का अचनाक बायीं तरफ से दायीं तरफ चला गया। उसके हाथ में एक लकड़ी थी जिससे कोंच-कोच कर वह पहले कूड़े का मुआइना करता फिर काम लायक कूड़ा उठाकार बोरे में भरता।

चाय की दूकान पर जैसे ही हम पहुंचे तो एक बुजुर्ग सज्जन भी वहां आये। अपने एक और मित्र के साथ। उनका एक पैर लड़खड़ा सा रहा था। उसी को लेकर बात शुरू हुई और चाय पीते हुए अपनी पूरी जीवनी उन्होंने 'अनज़िप' कर दी।

किसी इंसान का दुःख उसका वह हिस्सा होता है जहाँ हाथ रखते ही वह व्यक्ति अनायास खुल जाता है।
पता चला कि वो सज्जन जीआईएफ से रिटायर हुए। इसके पहले चांदा में और उसके पहले वीएफजे में नौकरी की। पिता भी फैक्ट्री में ही थे। छह भाई थे। पत्नी ने कुछ दिन नौकरी की फिर दिल की बीमारी के चलते छोड़ दी। एक लड़का है वह अपना काम करता है।

आज सुबह-सुबह सीजीएचएस से दवाई लेने के लिए आये हैं। सुबह 0430 पर निकले थे घर से। नंबर लगाने के लिए। 12 वां नंबर मिला है। दोपहर तक दवा मिल जायेगी। यहाँ डाक्टर सिर्फ दवा देने का काम करते हैं। देंखने के नाम पर मरीज को हाथ तक नहीं लगाते।


चाय के पैसे देने के नाम पर दोनों लोगों में थोड़ी अपनापे वाली बहस हुई। आखिर में उसकी जीत हुई जिसके पास फुटकर पैसे थे।

चलते हुए उनमें से एक ने किसी मंगल के न रहने की खबर दी। दूसरे ने इसे एक सूचना की तरह ग्रहण किया। एक ने कहा-'मंगल खलीफा टाइप था।' दूसरे ने कहा-' हां। खलीफा तो था। हम तुमसे उसके बारे में पूछने ही वाले थे।' इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई मंगल के बारे में दोनों के बीच।

मुझे यह लगा कि कोई कितने ही बड़ा खलीफा क्यों न हों लेकिन उसका दुनिया के रंगमंच से विदा होना दूसरों के लिये एक सूचना मात्र से अधिक नहीं होता।

देवेन आया और नमस्ते करके कोने में सुट्टा मारने चला गया। साथ में उसके दो लोग और थे। हमने पूछा कि आज किसने पैसे दिए गांजे के तो वो बोले-'चल जाता है अंकल। कभी कोई दे देता है कभी कोई। किसी ने चिलम के पैसे दे दिए तो किसी ने चाय के। इसी तरह मिली जुली सरकार चलती रहती है।'

देवेन की कोर्ट की अगली तारीख है 4 दिसम्बर को। विरोधी पार्टी को सम्मन दिया गया है। नहीँ आई तो ऐसे ही फैसला सुना दिया जाएगा। इस बीच एक चक्कर दिल्ली का लगाकर आ जाने की सूचना भी दी देवेन ने।

लौटते हुये मोड़ पर दो कुत्ते टहलते दिखे। उनमें से एक विकलांग था। पिछली एक टांग आधी कटी थी। उछल-उछलकर चल रहा था।

दीपा से काफी दिन बाद मिलना हुआ आज। बताया उसने कि दीपावली को जन्मदिन मनाया उसने। पापा के साथ केक काटा। खाया। स्कूल में टॉफ़ी ले गयी थी। अगले हफ्ते से वह 3 में पहुँच जायेगी।

लौटते में झील देखते हुए आये। सूरज भाई झील के एक घुसे नहा रहे थे। चिड़ियाँ झील के बीच के तार पर बैठीं थीं। दूरी के कारण क्या बोल रहीं थी मुझे सुनाई नहीं दे रहा पर जरूर कुछ आपस में गुफ्तगू कर रहीं होंगी।
कमरे पर आकर चाय पीते हुए यह पोस्ट कर रहे हैं। अब तो सही में सुबह हो गयी है।

Sunday, November 29, 2015

अरे बउआ ई गोड़ सब पिरात हैं


आज सुबह फैक्ट्री जाते हुए ये माता जी मिलीं पुलिया के पास। सर पर मोमिया का झोला धरे हाथ डुलाती हुई चली आ रही थी। हमने चलते हुए फोटो लिया और बतियाने लगे- 'कहां चली जा रही हो सबेरे-सबेरे सर पर झोला धरे।'
 
'अरे कहूँ नहीं भैया-ऐसे ही कूड़ा-कचरा से कुछ बिनि लेइति है तौ दुई पैसा मिलि जात हैं '- माता जी ने आँख मिचमिचाते हुए कहा।
 
खड़े हुये बात करने लगे माता जी से तो उन्होंने बताया- 'तीन लड़के हैं। तीनों कुछ मजूरी का काम करते हैं। लेकिन पैसा दारु और घर में उड़ा देते हैं। बहुएं कहती हैं बूढ़ा माता से कि तुम खुद कमाओ खाओ। इसीलिये कूड़ा बिनती हैं वो। कभी कोई चाय पिला देता है। नाश्ता करा देता है। दुई चार दस रुपया दे देता है।'
 
आदमी काफी पहले खत्म हो गया माताजी का।वो भी नशा पत्ती करता था। गांजा पीता था। ठेकेदारों के यहां काम करने वालों को दारू, गांजा के नशे होना तो आम बात है।

हमने कहा-'लेकिन तुम तो लगता नहीं कि नशा करती हो। क्या करती हो कुछ नशा? दारु, गांजा, तम्बाकू?'
माता जी बड़ी तेजी से हंसी यह सुनकर। ऊपर के पूरे दांत लगभग सलामत थे पर मसूड़े से 45 डिग्री का कोण सा बनाते हुए बाहर झांक रहे थे। नीचे के सामने के दांत गायब थे। बोलीं--'अरे हम न कोई नशा करती।'
हमने पूछा-'कित्ते पैसे मिल जाते हैं रोज कूड़ा बीनने से? कल कित्ते मिले?'


'अरे कुछ तय नहीं। कल कूड़ा बीने ही नहीं। कभी लकड़ी बीन लेते हैं घर के लिए। कभी कूड़ा। कभी कुछ मिल जाता है कभी कुछ।'--जानकारी देते हुए बताया माता जी।

उम्र के बारे में पूछते हुए बताया--'अरे होइ यहै कौनौ 60-65 साल।' नाम बताया- ' मुन्नी बाई।'

हमने कहा-'अरे वाह मुन्नी देवी तो हमारी अम्मा का नाम भी था। अब वो रहीं नहीं।'

'अरे नहीं रहीं? अच्छा हुआ बुढ़ापे में कढिलें (झेलने) ते बढ़िया चली गयीं तुम्हारी अम्मा। बप्पा होइहैं ?' -बुढ़िया माता जी ने पूछा।

'हमने बताया न नहीं रहे वो भी। लेकिन तुम ऐसा दुखी काहे होती हौ। बढ़िया टनाटन तौ है तुम्हार शरीर। दांत बचे हैं। चल फिर लेती हौ। और का चहिये तुमको बुढ़ापे माँ।'- हमने अनौपचारिक होते हुए कहा।

'अरे बउआ ई गोड़ सब पिरात हैं। घुटनन के मारे चलत नहीं बनत। आँखिन ते कम दिखात है। दांत सब हिलत हैं। बस कौनिउ तरन से घसिटि रही है जिंदगी।'- माता जी बोलीं।


लालमाटी इलाके में रहती हैं माताजी। बोली -'सुबह से केवल चाय पी है। कुछ खाया नहीं है।'

हमने जेब में आज आखिरी बचा दस का नोट निकाला और पूछा-' ये कित्ते रूपये का नोट है?' वो बोली-' दस रुपया का है।'

हमने कहा-' तुम तो कह रही थी कि तुम पढ़ी-लिखी नहीं हौ। फिर नोट कैसे पहचान गयीं।'

'अरे नोट देखित है तौ पहचान लेइत है।'-बूढा माता उवाची।

'20 का नोट पहचान लेती हो?' - हमने पूछा।

वो बोली -' हाँ।'

'पचास का?'

'हाँ'

'100 का?'

'हाँ।'

'500 का?'




हमने यह पूछा तो वो हंसने लगी। हमें भी हंसी आ गयी। हमें बिहार की चुनाव सभाओं में पैकेज की घोषणा करते हुए प्रधानमन्त्री जी का अंदाज याद आ गया और हमने शर्मा कर आगे पूछना छोड़ दिया। 10 का नोट माता जी के हवाले कर दिया।

पैसे पाकर माता जी खिल सी गयीं। पूछा-'बेटवा/पतोहू हुईहै तुम्हार?'

हमने कहा-'हां पत्नी हैं। दो बेटे हैं।'

जियत रहैं। ख़ुशी रहें। कहती हुई चलने लगी माता जी तो हमने कहा -'अच्छा, एक फोटो और खिंचा लेव। जरा मुस्कराते हुए।'

माता जी ने पोज दिया। हमने फोटो खींचा। उनके हाथ की झुर्रियां देखकर अपनी अम्मा के हाथ याद आ गए। मन किया उनके गाल नोच लें जैसे अम्मा के करते थे। हाथ आगे किया भी लेकिन फिर कंधे पर धरकर वापस कर लिया।

फिर दोनों लोग अपने-अपने रस्ते चले गए।

हमारा नाम बहुरुपिया है

कल रात को डिनर के बाद हम लोग शहर गए कॉफी पीने। समदड़िया के पास बनी सड़क किनारे की दुकानों में से एक के पास की फुटपाथ पर प्लास्टिक की कुर्सियों पर विराजते हुए काफी पी गयी।

दुकान पर कॉफी सर्व करने वाला बच्चा 14 साल से कम ही रहा होगा। एक ट्रे में धरकर कॉफी लाया सबके लिए। हमने कप रखने के लिए स्टूल मंगवाया। बेचारा वह भी ले आया। रात दस के ऊपर समय था। कम उम्र का बच्चा इतनी रात किसी जगह काम करे यह कानूनन जरूरत अपराध होगा। लेकिन शहर के बीचोबीच धड़ल्ले से यह सामाजिक अपराध हो रहा था। हम भी हा हा ही ही करते हुए इसमें सहयोग कर रहे थे।

इस बीच एक बच्ची हम लोगों के पास आकर भीख मांगती रही। हम लोगों में से किसी ने उसको तवज्जो नहीं दी। कुछ देर बाद झक मारकर वह दूसरे लोगों की तरफ चली गयी। बच्ची की उम्र 10-12 साल से अधिक नहीं रही होगी।

कॉफी पीकर चलने को हुए तो एक बुजुर्गवार आ गए और कुछ मांगने लगे। साथी लोग चल दिए थे लेकिन हम उनसे बतियाने लगे।

बुजुर्गवार सतना के रहने वाले थे। एक बेटा है उनका। किसी बनिए के यहां सतना में ही काम करता है। बाप को खाने को नहीं देता/दे पाता तो बाप भीख मांगता है।

बुजुर्ग ने बताया कि पिछले आठ-दस साल से मांगने के धंधे में उतरे हैं वे। इसके पहले बैलगाड़ी चलाते थे। लोगों का माल ढोते थे। जमींदारों और किसानों के लिए माल ढुलाई करते थे।

उम्र पूछी तो बताया सन 1936 की पैदाइश है। मतलब जिस साल मुंशी प्रेमचन्द नहीं रहे थे शायद। मतलब 1 साल कम अस्सी। पत्नी 20 साल पहले नहीं रहीं।

नया टाइप स्वेटर पहने थे बुजुर्गवार। बोले-'एक बिटिया ने दिया एक हफ्ते पहले।' हमने कहा-'बढ़िया लग रहा है।' तो मुस्कराने लगे। तब तक हम लोगों में से किसी ने कुछ पैसे नहीं दिए थे।

सोते कहां हो के सवाल के जबाब में बोले-'यहीं कहीं फुटपाथ में सो जाते हैं।' खाना खा चुके थे शाम को ही। दाल-रोटी।

आठ-दस दिन में सतना चले जाते हैं बुजुर्गवार। एकाध दिन रहते हैं। फिर वापस चले आते जबलपुर। मांगते-खाते हैं। बताया-'20/25 रुपया मिलि जात हैं। खाय-पिए भरे का हुई जात है।'

हमने नाम पूछा तो बोले-'नाम माँ का धरा है। समझ लेव बहुरूपिया नाम है हमार।' यह कहकर ठठाकर हंस दिए। आधे से ज्यादा दांत विदा हो गए थे। बचे हुए दांत ऐसे लग रहे मानों राज्य सभा में कोई सत्र चल रहा हो और सदन के ज्यादातर सदस्य वहां से गोल हो गए हों।

बुजुर्ग की हंसी में साथ देने के लिए हम भी हंसे। हाथ पकड़कर हिलाया कि ये तो ऊँची बात कह दी। इस समय तक हमारे एक साथी ने दस रूपये का एक नोट उनको दिया। हमने कहा-'वाह बाबा, तुम्हारे तो मजे हो गए।'

इसके बाद हमने उनका फोटो खींचने के लिए मोबाईल कैमरा उनकी तरफ किया। हमारी इस हरकत की भनक लगते ही बुजुर्गवार एकदम बच्चों की तरह उछलकर फुटपाथ पर चढ़े। कुर्सियों के पीछे से होते हुए फिर सड़क पर उतरकर दुकानों की भीड़ में मिल गए। शायद। अपनी फोटो नहीं खिंचवाना चाहते होंगे।

मैं पहली बार आया था यहां कॉफी पीने। हमारे साथी बताने लगे यह हमेशा मिलता है यहां इसी तरह मांगते हुए। आपने यह तरकीब अच्छी बताई इससे बचने के लिए।

हम अभी उस सोच रहे हैं कि कैसे बहुरूपिया समय और समाज में जी रहे हैं हम जहां 79 साल का एक बुजुर्ग और 10/12 साल की बच्ची रात के 11 बजे भीख मांगती है। ऐसे समय में जब लोगों अनगिनत लोगों को एक समय का खाना नसीब नहीं होता। प्राइम टाइम बहसों में इन पर कोई चर्चा नहीं होती। इसके बदले किसी के दिए बयान का कोई हिस्सा पकड़कर हफ्तों चेमगोइयां होती रहती हैं। बीच में उड़ती-उड़ती सी खबर आती है (और फिर हवा भी हो जाती है) कि अम्बानी लोगों ने 11000 करोड़ की गैस ज्यादा निकाल ली। इस पर जांच के बारे में किसी चैनल पर कोई बहस नहीं होती।

Saturday, November 28, 2015

बेकरारी में है करार तो क्या कीजै

बेकरारी में है करार तो क्या कीजै
आ गया जो किसी पे प्यार तो क्या कीजै।


एक चयासा आदमी लपकता हुआ आया 'यादव टी स्टाल' में घुसा। आते ही सामने की बेंच पर पसर सा गया। उसके चेहरे पर 'ब्रिस्क वॉकिंग' घराने का पसीना चमक रहा था। जेब में धरे उसके मोबाईल से गाना बज रहा था जो ऊपर लिखा मैंने।

दुकान का नाम 'यादव टी स्टॉल' वहां बिक रहा था बेनजीर तेल। बगल में 'पंडित प्रोडक्ट्स' का विज्ञापन पुता हुआ था। मतलब अगड़े, पिछड़े और अल्पसंख्यक नाम वाले चमक रहे थे। दलित और दीगर लोगों का प्रतिनिधित्व नदारत था दुकान पर।

यादव टी स्टॉल जीसीएफ फैक्ट्री के पास है। फैक्ट्री से छूटे हुए लोग वहां चाय पीते हुए बतिया रहे थे। एक आदमी ने घुसते ही सवाल उछला- सन्डे चल रहा है क्या?

सन्डे चलने का मल्लब इतवार को फैक्ट्री इतवार को खुलेगी कि नहीं। फैक्ट्री खुलने का मतलब ओवरटाइम पर काम होना। सप्ताह के बीच जब किसी दिन छुट्टी होती है तो उस दिन के बदले किसी दिन ओवरटाइम पर काम होता है। उसी के लिए सवाल किया था उस आदमी ने।

फैक्ट्री से सम्बंधित निर्णय भले ही फैक्ट्री में लिए जाते हों लेकिन उनका समुचित प्रसारण ऐसे ही नुक्कड़ों पर और चाय-पान की गुमटियों से होता है।किसी भी संस्थान के पास स्थित चाय-पान की दुकाने उन संस्थानों के सूचना प्रसारण केंद्र होते हैं।

सुबह जब निकले आज छह बजे तो सड़क पर अँधेरे और उजाले की गठबंधन सरकार चल रही थी। उजाले के नाम पर बिजली के लट्टू जल रहे थे जगह-जगह। लोग टहल रहे थे। कुछ लोग तो इतनी तेजी से टहल रहे थे मानों उनके मन में उनको उजाला फैलने पर पहचान लिए जाने का मासूम डर फुदक रहा हो।

दो महिलाएं साथ-साथ टहल रही थी। दोनों के हाथ में लाठी घराने के लंबे डंडे थे। एक महिला हाथ में डण्डा सड़क के लंबवत लिए चल रही थी। दूसरी का डण्डा सड़क के समांतर लहराता हुआ चल रहा था। एक दूसरे के साथ-साथ टहलती हुई महिलाओं के हाथ के डंडे 90 डिग्री के अंतर में देखकर लगा कि अपना देश वास्तव में विविधताओं का देश है।


आसमान पर लालिमा छाई हुई थी। सूरज भाई की सवारी निकलने ही वाली लग रही थी। आसमान के चेहरे पर लालिमा देखकर लग रहा था जैसे कायनात का मेकअप पूरा हो गया है। हल्की लालिमा उसके चेहरे रुज की तरह पसरी हुई है। बस अब कुछ देर में ही सूरज की टिकुली लगाकर सबको दिखने लगेगी।

सड़क पर चार लोग एक-दूसरे के अगल-बगल टहलते हुए चले जा रहे थे बतियाते हुए। सड़क आधी कर दी थी उन्होंने। उनके बगल से गुजरते हुए मन किया टोंक दें कि थोड़ी सड़क दूसरों के लिए भी छोड़ दो भाई। लेकिन फिर नहीं बोले। क्या पता वो भी हमको गेट आउट बोल दें जैसे कल हरियाणा में मंत्री जी ने बोल दिया एक अधिकारी को।

व्हीकल मोड़ पर चाय की सब दुकानें बन्द थीं। हम एक मिनट के लिए सोचने के लिए रुके कि जीसीएफ की तरफ बढ़ें कि रांझी की तरफ। फिर जीसीएफ की तरफ बढ़ गए।

एक आदमी एक बिजली के खम्भे के चबूतरे पर बैठा अपने मोबाइल में घुसा हुआ था। आदमी की स्थिरता देखकर लगा कि उसको डर है कि अगर कहीं हिला तो मोबाइल का नेटवर्क चला जाएगा।

मोबाईल कम्पनियों के नेटवर्क के यही हाल हैं आजकल। अभी जहां होता है कुछ देर बाद वहीं नहीं होता है। कंचनमृग सा छलिया होता है नेटवर्क। चेतक के घोड़े की तरह:
’आदमी  जगह से हिला  नहीं
तब तक नेटवर्क उड़ जाता था”


मुझे लगता है कि मोबाइल कम्पनियों को अपने विज्ञापन में यह सूचनाएँ जरूर छपवानी चाहिए--'फैशन के दौर में गारन्टी की अपेक्षा न करें के शाश्वत नियम के तहत किसी जगह पर अगर किसी तकनीकी कारणों से नेटवर्क लगातार मिलता रहता है तो उसके लिए कंपनी जिम्मेदार नहीं होगी।'

एक जगह लुकमान कोचिंग का विज्ञापन लगा हुआ था। आठवीं से आगे के बच्चों की कोचिंग के लिए। मैं यह सोच रहा था कि लुकमान के पहले का हकीम किधर गुम हो गया।

चाय पीकर लौटते हुए रॉबर्टसन झील देखते हुए आये। एक बुजुर्ग महिला हाथ में लोटा लिये झाड़ियों की तरफ जा रही थी। उसके पीछे एक बच्ची भी प्लास्टिक के मग में पानी लिये चली जा रही थी। 'जहाँ सोच वहां शौचालय' वाली बात याद करके लगा कि शायद यहाँ न सोच पहुंचा है और न शौचालय। यह अलग बात है कि सोच और शौचालय दोनों की अगवानी स्वच्छ भारत अभियान का सेस चार्ज कटना शुरू हो गया है।

झील का पानी शांत लेटा हुआ था। झील के ऊपर जाने वाला तार भी अकेला लटका हुआ अपने ऊपर बैठने वाले पक्षियों के इन्तजार में दायें-बाएं हिल रहा है।

कोई छोटा जलचर पानी में उछला। जिस जगह उछला उस जगह से पानी की लहरें गोल-गोल घूमती हुई किनारे तक पहुंची। पानी हिलने लगा। ऐसा लगा लहरों में दंगा हो गया। किनारे पहुंचकर लहरें शांत हो गयीं। दूर झील का पानी इस हलचल से शांत अपने मस्त लेटा हुआ था। उससे कुछ पूछा जाता तो शायद कहता कि वह स्थानीय हलचल है। उससे हमें क्या लेना देना।

झील के पानी को देखते हुए कमरे पर लौट आये। अभी चाय पीते हुए बाहर देख रहे हैं तो सूरज भाई का काफिला धरती पर पहुंच चुका है। धरती ने मुस्कराती घास और खिले हुए अनगिनत फूलों के गुच्छो के साथ सूरज भाई का स्वागत किया है। सुबह हो गयी है। आप के इधर क्या नजारा है?

Thursday, November 26, 2015

चुटकुले बाज और मसखरे टाइप लोग हर जगह लोकप्रिय हैं

हां तो हम क्या कह रहे थे ? अरे हत्तेरे की। हमने अभी कहना शुरू ही कहां किया। कोई नहीं अब शुरू करते हैं।
हां तो हुआ यह कि आज मोबाइल चार्ज था सो अलार्म बजा सही समय पर। फोन करके घरैतिन को जगाया। फिर देखा तो कल शाम की मजे-मजे में लिखी पोस्ट पर तमाम (50 से ऊपर) टिप्पणियॉ थीं। 150 करीब लोगों ने पसन्द किया था उसे। जबकि कल दोपहर की मेहनत करके लिखी पोस्ट पर कुल जमा टिप्पणियाँ दो अंकों से कम थीं। लाइक भी 60 के करीब लोगों ने किया था। इससे यह एहसास हुआ कि लोग हंसी-मजाक ज्यादा पसन्द करते हैं। सीरियस बात को सीरियसली नहीं लेते। शायद यही कारण है कि चुटकुले बाज और मसखरे टाइप लोग हर जगह लोकप्रिय हैं।

सुबह निकले तो साढ़े छह बज चुके थे। मोड़ पर एक आदमी टहलता हुआ अपने हाथ को ऊपर नीचे करता जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि वह अपने हाथ के पास की हवा ऊपर उठाता है यह सोचकर कि अब वह नीचे नहीं आएगी लेकिन जैसे ही वह हाथ नीचे करता था वैसे ही हवा फिर नीचे आ जाती थी।

यहां मुझे न जाने क्यों पुराने जमाने के भयंकर लड़ाके राजा याद आये। नेपोलियन खासकर। बेचारे की जिंदगी का बड़ा हिस्सा घोड़े पर ही लदे-लदे खर्च हो गया। अभी इधर किसी राज्य हो फतह करके आया तब तक कोई दूसरा जीता हुआ राज्य निकल गया हाथ से। उस पर कब्ज़ा किया तब तक कोई और सरक गया। मल्लब बेचारा लड़ाई के चलते इतना हलकान कि बेचारे को प्रेम पत्र भी युध्द के मैदान से लिखने पड़ते। मुझे तो लगता है कि नेपोलियन को उसके चमचे मैदान पर दौड़ाते रहते होंगे। बेचारा यहाँ-वहाँ तलवारबाजी करता रहा और इसके चमचे माल और मौज काटते रहे। जब उसके कल्ले में बूता नहीं बचा तो ले जाकर धर दिए सेंट हेलेना द्वीप में- भजन करो बाबू तुम यहाँ बैठकर।

लोकतान्त्रिक देशों में आजकल के नेताओं के भी यही हाल हैं। बाजार उनको दौड़ता रहता है। वो बने नेपोलियन बाजार की भरी हवा अपने देश में फूंकते रहते हैं। बाजार हवा सप्लाई करता रहता है। वे बेचारे और तेजी से फूंकते है। ऐसे ही फूंकते-फूंकते बेचारों का गला बैठ जाता है। फेफड़े फूल जाते हैं तो बाजार नया मुखौटा ट्राई करता है। पुराना बेचारा पड़ा-पड़ा कुड़कूड़ाता रहता है रागदरबारी के दूरबीनसिंह की तरह।

एक बच्ची बगल से निकली साइकिल पर। हम लपककर उसके बगल में साईकल ले जाकर पूछे -स्कूल जा रही हो? किस क्लास में पढ़ती हो? कितने बजे का स्कूल है?

अब साइकिल पर बस्ता लादे स्कूल जाती बच्ची से यह पूछना कि स्कूल जा रही हो ऐसा ही है जैसे शोले में बसन्ती से अमिताभ बच्चन बसन्ती से पूछते हैं तुम्हारा नाम क्या है बसन्ती?

बच्ची ने नमस्ते अंकल कहते हुए बताया कि वह कक्षा 7 में पढ़ती है। स्कूल भी सात बजे का ही है। और कुछ बात होती तब तक उसका स्कूल आ गया और वह स्कूल की तरफ मुड़ गयी। हम चूंकि नमस्ते नहीं कर पाये थे तो हमने उसको मुस्कराते हुए टाटा,बॉय-बॉय किया।

आगे मोड़ पर तालाब की तरफ मुड़े। एक महिला अपनी बच्ची के सर पर स्कार्फ बाँध रही थी। एक बुजुर्ग महिला वहीं बैठी एक बच्चे को साथ लिए शायद स्कूल बस का इन्तजार कर रही थी।

तालाब किनारे पहुंचे तो कल मिले राजेश वहीं अकेले बैठे थे। तालाब शांत था। तालाब के ऊपर से गुजरते एक तार पर अनगिनत पक्षी एक दूसरे की तरफ मुंह किये हुए बैठे थे। एक की पूंछ दूसरे की चोंच की तरफ। मानों विरोधी विचारधारा के पक्षी एक ही पर बैठे थे। इसके बावजूद सब शांत थे। मन किया कि यह सोच डालें कि लगता है पक्षी आदमियों से ज्यादा समझदार होते हैं क्या जो एक दूसरे से अलग तरह से बैठे होने के बावजूद फालतू हल्ला नहीं मचाते। लेकिन फिर नहीं सोचा। क्या फायदा सुबह-सुबह फालतू बयान बाजी का। कोई कहेगा--ऐसा ही है तो जाओ बैठो जाकर तार पर चिड़ियों की तरह। :)

सूरज भाई हमको देखकर ऐसा खुश हुए कि अपनी पूरी लाइट मेरे चेहरे पर मारकर मुस्कराने लगे। हमने कहा-'क्या करते हो भाई। सारी रौशनी हम पर लुटा दोगे तो कोई इल्जाम लगाएगा कि सूरज भाई पक्षपात करते हैं रौशनी अलाट करने में।' सूरज भाई मुस्कराते हुए पूरी कायनात को रोशन करते रहे।

राजेश से मैंने फिर पूछा तो उसने बताया कि 3-4 साल में ही पता चल गया था कि उसकी औरत के बच्चेदानी नहीँ है। हमने कहा कोई टेंशन नहीँ है। 20 साल साथ रहे। उसको कोई कुछ कहता भी नहीं था। बच्चा गोद नहीं लिया क्योंकि लोग अलग-अलग तरह समझाते थे। कोई बोला -आजकल अपनी औलाद तो साथ नहीं देती। पराई का क्या भरोसा। इसी तरह की और बातें। अब जो हुआ सो हुआ।

अपनी पत्नी के बारे में आगे बताया राजेश ने-'जब जली थी तो हम खा पीकर निकल गए थे। फिर फोन आया कि बीबी की तबियत खराब तुम्हारी तो हम सोचे कि हम तो ठीक छोड़ के आये थे। तबियत कैसे खराब हो गयी। पहुंचे तो अस्पताल ले गए। 60% जली थी। चार-पांच दिन जिन्दा रही। फिर खत्म हो गयी। याद आती है। बीस साल का साथ रहा। कभी लड़ाई नहीं हुई।'

राजेश को उसकी यादों के साथ छोड़कर हम पंकज टी स्टाल पहुंचे।वहां एक बुजुर्ग चाय पी रहे थे। बातचीत की तो पता चला कि नगर निगम में काम करते हैं। वीएफजे और जीसीएफ के लिए पानी खोलकर आये हैं।

वीएफजे के लिए 15 चूड़ी पानी खोलते हैं जीसीएफ के लिए फुल। फुल मतलब करीब 25 चूड़ी। कुछ दिन पहले नगर निगम के किसी अधिकारी ने जीसीएफ का पानी दस चूड़ी कर दिया था। रोज लोग आते कहते-खान साहब देख लो जरा। रोज-रोज की किचकिच से हमने कहा -आप टेंशन न लो। हम फुल खोल देंगे। फिर हमने साहब को बता दिया और फुल पानी देने लगे।

रीवां के रहने वाले खान साहब देखने में लग रहे 55 के आसपास होंगे। लेकिन बताया 44 साल के हैं। चार बच्चे हैं। बड़ी बच्ची 11 वीं पढ़ती है। 12 दिसम्बर को उसकी शादी है। हमने कहा- 11 वीं में पढ़ने वाली बच्ची की शादी ? इतनी जल्दी क्यों? वो बोले-उसकी उमर 22 साल है। एकाध साल फेल हुई। दामाद इंजीनियर है। कहीं प्राइवेट कुछ करता है। कहता है- पढाई की चिंता न करो। हम।पढ़ा लेंगे।

 अपनी छोटी बेटी की पढाई में तारीफ़ करते हुए बोले-दसवी में है। फर्स्ट आती है।

18 साल की नौकरी के बाद भी खान साहब दिहाड़ी पर काम करते हैं। 320 रूपये रोज पर। अपने बगल में स्मार्ट फोन में डूबे लड़के की तरफ इशारा करते हुए बोले-'जे हमसे बाद में आये। परमानेंट हो गए। 18 हजार पाते हैं।'
खुद के परमानेंट न हो पाने का कारण पैसा और पैरवी का अभाव बताते हैं। बोले-'पिछले महापौर ने 57 लोगों को चार-चार लाख लेकर परमानेंट कर दिया। बाहर के लोगों को। वो तो पैसा लेकर चला गया। लेकिन बाद में हाई कोर्ट ने स्टे लगा दिया भर्ती पर। बेचारों का पैसा डूब गया। पहले वाला महापौर अच्छा था। उसने 35 लोग परमानेंट किये। सब यहीं के थे।

हम चाय पीकर चले आये। हमको बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर याद आये जिन्होंने जिसके पास भी डिग्री थी उसको मेले में बुलाकर नौकरी दे दी। कम से काम कोई भर्ती घोटाला तो न हुआ। बाकी समस्याएं तो खैर अलग की बात हैं।

आप मजे से रहिये। आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो। जय हो।

Wednesday, November 25, 2015

क्यों मुंह उठाकर चले आते हो

हमारी शक्ल से त्रस्त एक पाठक Mukesh Bhalse ने मेरी ब्लॉग की एक पोस्ट के गूगल+ पर दिखने पर यह टिप्पणी की:

"साला जब भी G+ खोलो 10-15 बार तुम्हारा सड़ा मुंह देखना पड़ता है. क्या नौटँकी है यार क्यों मुंह उठाकर चले आते हो ऐसा लगता है G+ तुम्हारे बाप की बपौती है."

मुकेश भाई की तकलीफ सुनकर बड़ी शर्म आई। मन किया किया काश धरती में छह फिट का गढ्ढा होता कहीं आसपास तो उसमें पांच-दस मिनट के लिए समाकर वापस लौट आ...ते।

मुकेश भाई इंदौर से हैं जहां से कैलाश विजयवर्गीय जी हैं जो कि अपने क्रांतिकारी बयानों के लिए जाने जाते हैं। वैसे इंदौर में ही अर्चना चावजी भी रहती हैं जिनको हम उनके बेहतरीन पॉडकास्ट के लिए भी जानते हैं।

हुआ यह कि पिछले दिनों फेसबुक की तमाम पोस्टें हमने अपने ब्लॉग पर डाली। ब्लॉग पर जब पोस्ट आती है तो वह गूगल+ पर साझा हो जाती है। एक दिन में 20 से 25 पोस्टें ब्लॉग पर डालीं तो मुकेश भाई को हर बार हमारा मुखड़ा दिखा होगा जिससे झल्लाकर उन्होंने वह लिखा जो ऊपर बताया मैंने।

यह बात जरूर गुस्से में लिखी होगी मुकेश भाई ने। गुस्से के बारे में 'खोया पानी' उपन्यास में कहा गया है:

"मिजाज, जुबान और हाथ, किसी पर काबू न था, हमेशा गुस्से में कांपते रहते। इसलिए ईंट, पत्थर, लाठी, गोली, गाली किसी का भी निशाना ठीक नहीं लगता था। :)

वही हाल मुकेश का हुआ होगा। मेरी शक्ल देखते ही गुस्सा आया होगा और यह टिप्पणी लिखी उन्होंने।

हमको समझ में नहीं आया कि जबाब क्या लिखें। लेकिन कुछ देर बाद लिखा:

"हमको पता नहीं कैसे हमारा मुंह तुमको दिख जाता है। कुछ लफ़ड़ा है।

वैसे हम जानबूझकर ऐसा नहीं करते। :) 

 लेकिन इस बहाने तुम्हारी शक्ल दिख गयी। क्यूट लगते हो। थोड़ा मुस्कराया करो। और खूबसूरत लगोगे। शुभकामनाएं। :)

टिप्पणी का जबाब लिखने के बाद कारण समझ में आया। कारण वही जो बताया कि एक दिन में ही कई पोस्ट एक के बाद एक ब्लॉग पर पोस्ट करना। मतलब कई दिनों का बकाया काम एक साथ करना। इसीलिए कहा गया है-"आज का काम कल पर नहीं छोड़ना चाहिए।"

वैसे एक बात यह भी है कि आप में से कई मित्र जो किसी का दिल दुखाने वाली बात कहने में संकोच करते हैं वे कहें भले न लेकिन मन में पक्का सोच रहे होंगे कि बन्दे (मुकेश) ने मेरे मन की बात कह दी। smile इमोटिकॉन

चलिये आप मजे कीजिये। हम अपनी आज की पोस्ट ब्लाग पर सटा देते हैं। देर की तो कल को फिर कोई गरियायेगा। :)

'टीवी और न्यूज देखने की फुर्सत ही कहां


आज सुबह नींद तो भोर में ही खुल गयी थी लेकिन जगे नहीं। इंतजार करते रहे अलार्म बजने का। जब अलार्म बजे, तब सबेरा हो। बहुत देर तक इंतजार करते रहे अलार्म बजने का। पर वो पट्ठा बज के नहीं दिया। एक बार मन किया कि भाड़ में गया अलार्म अब उठ ही जाते हैं लेकिन फिर सोचा कि फिर क्या फायदा अलार्म का।सोचा तो यह भी कि अपने आप उठकर एक - दो कंटाप लगायें अलार्म को कि बजता क्यों नहीं बे? बज तू तो हम भी उठें । पर यह सोचकर की छुट्टी के दिन हिंसाबाद ठीक नहीं हम इक बार फिर करवट बदलकर लेट गए। अलार्म बजने का इन्तजार करते हुए।

अलार्म बजने पर ही जागने की जिद कुछ ऐसे ही जैसे हम सोचते रहते हैं कि अवतारी पुरुष आएगा हमारा उद्धार करने। किसी उद्धारक के बिना कुछ सुधार करना मतलब खुद की और आने वाले उद्धारक की तौहीन करना है।
जब सच्ची में बहुत देर हो गयी तो घड़ी देखी। सात बज गए थे सुबह के। मोबाईल देखा तो पता चला बैटरी खलास हो चुकी थी। बैटरी विहीन मोबाईल अलार्म कैसे बजाता।

हम फौरन मोबाईल में मुंह में चार्ज का पिन घुसेड़े। बिजली पीते ही मोबाइल की साँसे वापस आयीं।चार्ज होंने लगा।


मोबाईल के रात में बिना बताये हुए डिस्चार्ज हो जाने की बात का कनेक्शन अपनी जिंदगी से जोड़ लिए। यह सोचे कि ऐसे ही कोई सुबह होगी जो वैसे तो सुहानी होगी पर दुनिया को पता चलेगा हम डिस्चार्ज हो गए। फिर वही कि एक दिन तो होना ही था। भले आदमी थे। भले तो नहीं पर इतने बुरे भी नहीं थे। खैर होनी को कौन टाल सकता है।

इन सब बातों को हमने दौड़ा के फुटा दिया। छुट्टी का दिन था। आराम से सुबह समय बर्बाद करते हुए चाय पीते हुए कमरे के बाहर पूरे लान में बिखरी धूप को निहारते रहे। धूप में थोड़ा कोहरा मिला हुआ था। घूप गुनगुनी और नशीली टाइप लग रही थी। नशीली इसलिए कि उसको पीकर लान की घास और पौधे और फूल पत्ती भीं जहां घूप पिए बस टुन्न सा होकर पसर गए।

नहा धोकर कपड़े फ़ैलाने गए धूप में तो पता चला बनियाइन तो तीन थी लेकिन अंडरवियर दो ही धुले थे। लौटकर देखा तो अंडरवियर अरगनी में टँगा हुआ हवा के साथ झूल रहा था। उसको रस्सी से उतार कर पानी के टब में डाल दिए। कल धोएंगे।अब अंडरवियर जिस बनियाइन के साथ का रहा होगा उसका तो जोड़ा बिछड़ गया। क्या पता अंडरवियर के वियोग में आंसू बहा रही हो बनियाइन। शाम को जो बनियाइन कम सूखेगी हमें लगेगा इसी बनियाइन का जोड़ा जुदा हुआ था।


नाश्ता करके फिर तालाब की तरफ निकले। दो लोग तालाब किनारे बैठे बतिया रहे थे। मुनव्वर अली और राजेश । मुनव्वर फैक्ट्री के सामने मूंगफली और शाम को अंडे बेचने का काम करते हैं। आज फैक्ट्री की छुट्टी तो मूंगफली का ठेला नहीं लगाये। अंडे बेचेंगे शाम को।

उबले अंडे आजकल 6 रूपये का एक बेचते हैं मुनव्वर। 4.10 रूपये का एक अंडा आता है कच्चा। फिर 40 रूपये लीटर मिटटी का तेल, अंडे के लिए चटनी। सबका खर्च मिलकर लागत और बढ़ती ही है। कुछ अंडे लाने ने टूट जाते हैं उसका भी हिसाब रखना होता है।

अभी जाड़ा नहीं पड़ रहा सो अंडे कम बिक रहे। तीन बच्चों का परिवार चलाना मुश्किल। जाड़े पड़ेंगे तो बिक्री बढ़ेगी।

मूंगफली और अंडे का काम 5 साल पहले शुरू किया मुनव्वर ने। इसके पहले 20 साल रिक्शा चलाया। फिर टेम्पो आ गए और बंधी सवारियां रिटायर होती गयीं तो रिक्शे का काम छोड़ दिया। गेट नम्बर 6 से व्हीकल मोड़ तक के 2 रूपये सवारी मिलते थे। स्टेशन के दस रूपये।आज ऑटो से स्टेशन के 100 रूपये पड़ते हैं।


साथ में बैठे राजेश ऑटो चलाते हैं। इसके पहले 15 साल रिक्शा चलाया। ट्रक भी चलाते हैं। फैक्ट्री से डिलीवर करने के लिये ट्रक ले जाते हैं तो डेढ़ रुपया प्रति किलोमीटर मिलता है ड्राइवरी का।

38 साल के राजेश के कोई बच्चा नहीं है। पत्नी के बच्चे दानी नहीं थी। पत्नी पिछली 8 नवम्बर को स्टोब फटने से नहीं रही। हमने कहा-'लोग तो तुमको भी कहते होंगे कि इसमें तुमने कुछ किया होगा।' इस पर वह बोला-'सब जानते हैं वहां कि हमारे घर के लोग ऐसे नहीं हैं।'

तालाब आज बन्द था। मुनव्वर ने कहा-'हम आपसे गेट नम्बर के पास मिले थे जब आपके घर के लोग रामफल की दुकान पर आये थे।' 11 महीने पहले की बात। रामफल की बात चली तो राजेश को पता चला कि रामफल नहीं रहे। 11 महीने तक उसके जेहन में रामफल के जिन्दा रहने की खबर ही चल रही थी।

चलते हुए हमने पूछा-'टीवी देखते हो? कुछ पता है कि आमिर खान ने क्या कहा है? क्या बवाल मचा हुआ है देश में आमिर खान के बयान पर?

इस पर दोनों ने कहा-'टीवी और न्यूज देखने की फुर्सत ही कहां। दिन भर निकल जाता है दिहाड़ी कमाने में।'
यह बयान आम कामगार के हैं। उसको टीवी और मिडिया के चोंचलेबाजी की कोई खबर नहीं। उसकी तमन्ना बस यही है कि नवम्बर खतम होने वाला और अभी तक ठण्ड नहीं शुरू हुई। ठण्ड पड़े तो अंडे ज्यादा बिकें कुछ बढ़िया कमाई हो।

तालाब से लौटते हुए देखा एक बच्ची अपने भाई के साथ ड्राइंग सीट लिए जा रही थी। कोई प्रोजेक्ट बनायेगी। एक महिला कुल्हाड़ी लिए जंगली झाड़ियाँ काट रही थी। घर के सामने बाड़ के रूप में लगाने के लिए। बताकर कन्धे पर कुल्हाड़ी धरे पगडण्डी पर चलते हुए वह घनी झाड़ियों की तरफ चली गयी। कन्धे पर कुल्हाड़ी धरे वह वीरांगना सी लग रही थी।

एक ठेले पर 'इटली' बिक रही थी। लिखने की जरा सी चूक के चलते एक देश ठेले पर धड़ल्ले से बिक रहा था। किसी को कोई एतराज नहीं हो रहा था।

शोभापुर क्रासिंग की तरफ गए। ओवरब्रिज पर मजदूर लगे हुए थे। उसकी सड़क पर कांक्रीट का काम हो रहा था।
दीपा को देखने गए। वह थी नहीं घर पर। उस कारखाने गए जहां वह दिन में रहती है वहां भी नही थी वह। शायद कहीं खेलने निकल गयी थी।

कारखाने में काम चल रहा था। मालिक से बात हुई। पता चला उनके पिता जी फैक्ट्री में ही काम करते थे। 1981 में रिटायर हुए। टूल रूम से। बच्चों ने उत्पादन का काम शुरू किया। एक साधारण कमर्चारी के बेटों का आज का टर्न ओवर 1 करोड़ रूपये सालाना है।

कारखाने के एक पार्टनर बीकॉम की पढ़ाई किये हैं। बचपन से ही मशीन का काम करने लगे थे। आजकल मशीन मरम्मत का काम चल रहा है। उनसे हाथ मिलाया तो देखा उनके हाथ की दो उँगलियाँ आधी ही थीं। बताया कि एक प्रेस में काम करते हुए कट गयीं थीं। उनकी कटी उँगलियाँ देखकर मुझे अपने बेहद अजीज मित्र की याद आ गयी जिसकी एक हाथ की उँगलियाँ बचपन में किसी दुर्घटना में कट गयी थीं। लौटते हुए हमने फिर हाथ मिलाया। इस बार देर तक मिलाया यह सोचते हुए कि देरी तक मिलाया हाथ अपने दोस्त से मिला रहे हैं। अपने शाहिद रजा का शेर याद करते हुए:

हरेक बहाने तुम्हे याद करते हैं
हमारे दम से तुम्हारी दास्ताँ बाकी है।


दीपा मिली नहीं तो उसके लिए जो बिस्कुट ले गए थे वह उसी कारखाने में दे आये। आएगी तब दे देंगे वे।
रांझी मोड़ पर फल लेने की सोचे। तो याद आया कि वहीं हमारे दोस्त प्रदीप-आस्था रहते हैं। उनके यहां गए। चाय पी। साथ ही उनके भांजे जयंत से पोयम सुनी-ट्विंकल-ट्विंकल लिटल स्टार। जयंत ने पोयम सुनाने से पहले मेरा नाम भी पूछा इसलिए क्योंकि हमने उसका नाम पूछा था। फोटो के लिए पोज देते हुए पूछा भी कि किस चश्मे को लगाकर फोटो दें? अपने धूप वाले चश्मे में या मेरे नजर वाले में। फिर तय हुआ धूप वाला ही ठीक रहेगा।

लौटते हुए सड़क किनारे तमाम कपड़ों की दुकाने दिखीं। कपड़े प्लास्टिक की मैनिक्वीन में रस्सी पर झूल रहे थे। दुकानदार शायद चाय पीने गया था क्योंकि जब मैंने दुकान का फोटो लिया तो आता हुआ दिखा और पूछा-'कुछ लेना है क्या?'

सड़क किनारे की ही फल की दूकान से हमने फल लिए। पपीता 25 रूपये किलो बिक रहा था। एक पपीता और 3 केले 25 के लिए। पैसे देते हुए हमने फल की दूकान मालकिन से पूछकर फोटो खींची। दिखाई तो उसने हंसते पूछा- 'का घर में दिखाओगे जाकर कि यहां से फल लाये?'

'हमने कहा तब क्या? नाम भी बता देव तो वो भी बता देंगे।'

नाम तो नहीं बताया पर यह बताया की पाटन से आते हैं फल लेकर यहां बेचने। ऑटो वाला 100 से 125 रूपये तक लेता है।

लौटकर खरामा खरामा साइकिल हांकते हुए कमरे पर आ गए और अब पोस्ट लिख रहे। आपका बचा हुआ दिन मंगलमय हो।

Tuesday, November 24, 2015

गोया आप उस लिहाज से कह रहे हैं

आज फिर टहलने नहीं गए। 5 बजे जगे। फिर लेटे-लेटे सोचते रहे कि अब निकलें। अब निकलें। लेकिन सोचने में ही इतना समय निकल गया कि निकल ही नहीं पाये।

ऐसा अक्सर होता है मेरे साथ। काम का पूरा खाका तय है दिमाग में कि ऐसे करेंगे। वैसे करेंगे। पक्का फूल प्रूफ प्लान रहता है। पर लफ़ड़ा यह कि जो काम दिमाग में कई बार पूरा कर लेते हैं वह वास्तविकता में अक्सर शुरू भी नहीं हो पाता। काम का प्लान भी झल्लाकर 'दिमाग छोड़कर' चला जाता है।

दिमाग छोड़कर चले जाने की बात लिखते ही एक ठो आइडिया घुस गया दिमाग में, बिना में आई कम इन सर बोले। नठिया बोला-- इस बात को देश छोड़कर जाने की बात करके असहिष्णुता वाली बात और आमिर खान जी के हालिया बयान से जोड़कर एक ठो लेख घसीट दें। आज का सबसे गरम विषय है। लपक लेंगे लोग।

आज बयान भी छपा है अखबार में आमिर खान का कि उनकी पत्नी किरण इस बात से चिंतित हैं कि उनके आसपास का वातावरण कैसा हो गया है। वह रोज अखबार पढ़कर भयभीत हो जाती हैं।

अब आगे लिखने में समस्या यह है कि हम आमिर खान का समर्थन करें कि विरोध यह तय नहीँ कर पा रहे। समर्थन करते हैं तो आफत और नहीं करते तो डबल आफत। कुछ नहीं कहते तो लोग दिनकर जी के हवाले से हमारे नाम एफ आई आर लिखवा देंगे:

'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध।'


इस तरह की दुविधा वाली स्थिति से बचने के लिए सबसे सुरक्षित तरीका 'खोया पानी' व्यंग्य उपन्यास के मास्टर फ़ाख़िर हुसैन जी का है। मास्टर साहब अंग्रेजी पढ़ाते थे और कहते थे-

' जैसे हमारी गायकी की बुनियाद तबले पर है, गुफ्तगू की बुनियाद गाली पर है, इसी तरह अंग्रेजी की बुनियाद ग्रामर पर है। अगर कमाल हासिल करना है तो बुनियाद मजबूत करो।

मास्टर फ़ाख़िर हुसैन की अपनी अंग्रेजी, इमारत निर्माण का अद्भुत नमूना और संसार के सात आश्चर्यों में से एक थी, मतलब यह कि बगैर नींव की थी। कई जगह तो छत भी नहीं थी और जहाँ थी उसे चमगादड़ों की तरह अपने पैरों की अड़वाड़ से थाम रखा था। उस ज़माने में अंग्रेजी भी उर्दू में पढाई जाती थी लिहाजा कुछ गिरती हुई दीवारों को उर्दू शेरों के पुश्ते थामे हुए थे।’

ऐसी नायाब अंग्रेजी ग्रामर की बुनियाद वाले मास्टर फ़ाख़िर हुसैन अपने क्लास के हर बच्चे की राय से सहमत हो जाते यह कहते हुए--'अच्छा तो आप गोया इस लिहाज से कह रहे हैं।'

फ़ाख़िर हुसैन के फार्मूले के हिसाब से आमिर खान की बात का समर्थन करना हो तो कह सकते हैं कि देखो आमिर के बयान देते ही उनको गरियाना शुरू हो गया। उनका डर जायज है।

आमिर की बात का विरोध करने के लिए कह सकते हैं कि देखो तुम खुले आम ऐसा कह रहे हो फिर भी अभी तक पिटे नहीँ इसलिए तुम्हारी बात सिरे से ख़ारिज करने लायक है। थोड़ा और बुजुर्ग होते तो यह भी कहते- 'अरे आजकल पत्नियां न जाने क्या-क्या कहती रहतीं हैं। उनकी बात को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं।'

इसी बात का विस्तार पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी के उस बयान से किया जा सकता है जिसमें उनसे एक सभा में किसी के सवाल -'आजादी से हमें क्या हासिल हुआ?' का जबाब देते हुए उन्होंने कहा था-'देश के प्रधानमंत्री से तुम यह सवाल कर पा रहे हो यह आजादी आजादी हासिल हुई तुमको आजादी से।'

तो यहां आमिर खान जी को यह समझना चाहिए कि उनको इतनी आजादी हासिल है कि वे अपनी देश के माहौल की बुराई खुले आम कर पा रहे हैं। मीडिया भी उनके बयान को प्रमुखता से छाप रहा है। प्रसारित कर रहा है। और देश कितनी आजादी दे भाई? देश की जान लोगे क्या?

अरे हाँ याद आया कुछ लोग यह कहकर आमिर की बात का समर्थन कर सकते हैं कि उनके ख़िलाफ गाली गलौज शुरू हो गयी। लोग न जाने क्या-क्या कह रहे हैं उनके खिलाफ। इस बात की काट के लिये आप फिर से मेरे लेख के शुरू में मास्टर फ़ारिख हुसैन के हवाले से कही बात फिर से बांचिये (यही लिख देते हैं आप शुरुआत में तो जाने से रहे) -गुफ्तगू की बुनियाद गाली पर है।

तो भाई जिन लोगों को लगता है कि आमिर को गरियाया जा रहा है वो दरअसल गलत समझ रहे हैं। लोग आमिर को गरिया नहीं रहे हैं बस उनसे गुफ्तगू कर रहे हैं और उनकी गफ्तगू की बुनियाद माशा अल्लाह खासी मजबूत है (जिसको लोग गाली गलौज समझ रहे हैं) । अब सबको अख़बार में जगह तो मिल नहीँ सकती तो फेसबुक, ट्विटर के हवाले से गुफ्तगू में मशगूल हैं।

आमिर खान पता नहीं कौन से देश जाने की सोच रहे हैं। यह वे जाने लेकिन उनको कोई समझाये कि दुनिया के हाल बड़े खराब हैं। यूरोप और अमेरिका बेचारे आईएसआईएस से हलकान हैं।तगड़ी सरदी भी पड़ रही उधर। पता नहीं अंगीठी तापने को भी मिलेगी कि नहीं। अरब देशों का पता नहीं कौन देश बमबारी की चपेट में कब आ जाए। पूरे गोले में मारकाट मची हुई है।

मरीचिका उपन्यास ने ज्ञान चतुर्वेदी जी ने एक कवि का चित्रण किया है। कवि देश की स्थिति से हताश निराश है। कहता है कि कविता लिखने से कुछ नहीं होगा। कोई बदलाव नहीं होना। घटिया कवि आगे बढ़ रहे हैं। बहुत खराब समय है।

कवि की पत्नी कवि से कहती है -'अच्छे समय में कविता तो सब लिख लेते हैं। सच्चा कवि तो वही होता है जो कठिन समय में कविता लिखे। तुम्हारी कविता के लिखने के लिए सबसे उपयुक्त समय तो यही है। लिखना बन्द मत करो।लिखो।'

तो आमिर बाबू अगर समय खराब भी है तो यह समय यहां से भागने का नहीं है। बल्कि यही सबसे उचित समय यहां रहने का और देश समाज के लिए कुछ करने का।

बात अख़बार पढ़कर भयभीत होने की है तो कुछ दिन अख़बार पढ़ना बन्द कर दो। या फिर जो अख़बार पढ़कर घबराहट होती है उनके खिलाफ मोर्चा निकालो। वैसे आज के अख़बार में भी तीन खबरें हैं:
1.80 साल की उमर में सिखा रहे हैं योग।
2. माँ के दुलार से 6 महिने से कोमा में रहा बच्चा उठ बैठा।
3. महिला पायलट ने मरते-मरते बचाई बस्तीवासियों की जान।

इनखबरों को पढ़िए। घबराहट दूर होगी।

यह मैंने जो लिखा वह ऐसे ही लिखा। आपका नजरिया क्या है मुझे पता नहीं। पर जो भी होगा हम उससे मास्टर फ़ाख़िर हुसैन घराने के विद्यार्थी की तरह तड़ से सहमत हो जाएंगे यह कहते हुए- गोया आप उस लिहाज से कह रहे हैं। :)

’खोया पानी’ एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास है। आप इसको आन लाइन यहां पढ़ सकते हैं।

Monday, November 23, 2015

गरिमा-दाम्पत्य जीवन के लिये शुभकामनायें

 
गरिमा Garima से मेरा परिचय फ़ेसबुक के माध्यम से ही हुआ। एक दिन बातचीत के बाद उसके बारे में पोस्ट भी लिखी। उस पोस्ट पर बहुत सारे दोस्तों ने गरिमा को शुभकामनायें दी थीं।

पोस्ट लिखने के बाद गरिमा से कई बार बात भी हुई। कई मौकों पर उसने मुझसे कुछ सुझाव सलाह भी लीं। अपनी समझ के अनुसार मैंने उसे सलाह दीं।

आज गरिमा की शादी हो रही है। बरेली में। मुझे उसने बुलाया था। जाने का वायदा भी किया था मैंने पर जा नहीं सका। फ़ोन किया तो बात भी नहीं हो पायी। गरिमा के पापा से बात हुई। उनको ही मैंने ...गरिमा के लिये मंगलकामनायें दे दीं। इस मौके पर कुछ किताबें उपहार के रूप में कल भेजूंगा। जब भी मौका मिलेगा बरेली जाकर गरिमा-ईशान से मुलाकात करूंगा।

मैं कभी मिला नहीं नहीं गरिमा से। वह मुझे अंकल कहती है। मेरे मन में भी उसके प्रति बेटी जैसा ही स्नेह है। आज उसके विवाह के मौके पर उसको अपने पूरे मन से उसको आशीर्वाद देता हूं। मंगलकामनायें देता हूं। कामना करता हूं कि उसका दाम्पत्य जीवन सुखमय रहे। समृद्धिपूर्ण हो।

अपने मामा नन्दन जी पंक्तियां फ़िर से दोहराता हूं जो मैंने अपनी भतीजी बिटिया स्वाति के विवाह के अवसर पर लिखी पोस्ट में लिखीं में लिखी थीं:

बेटी को वाणी से संवार दे ऒ वीणा पाणि!
शक्ति दे, शालीनता दे और संस्कार दे,
लक्ष्मी तू भर दे घर उसका धन-संपदा से
गणपति से कहकर सब संकट निवार दे!
गौरी, तू शिव से दिला दे वरदान उसे
दाम्पत्य पर अक्षत तरुणाई वार दे,
मेरे सुख सपनों के सारे पुण्य ले ले मां तू ,
अपने हाथों से उसकी झोली में डाल दे!


आपसे अनुरोध है कि आप भी गरिमा को उसके मंगलमय दाम्पत्य जीवन के लिये अपनी शुभकामनायें प्रदान करें।
 

Sunday, November 22, 2015

सब मिले हुये हैं

"आप लोग बेईमान अधिकारियों का स्टिंग करिये। हम उनको जेल भेजेंगे।" -मुख्यमंत्री जी ने घोषणा की।

जनता मुख्यमंत्री जी आवाहन पर स्टिंग में जुट गयी। बाबू पकड़ा गया। जमानत , पेशी के बाद मुकदमा शुरु हुआ।

मुकदमें की गवाही के दौरान बाबू से पूछताछ हुई तो उसने बताया- "साहब को देना होता था इसलिये हमें लेना पड़ता था।" -सबूत के लिये बाबू ने साहब से बातचीत का रिकार्ड पेश कर दिया। रिकार्डिंग में साहब अपने  बाबू को वसूली के लिये धमकाते हुये सुनाई दे रहे थे।

साहब से पूछताछ हुई। उन्होंने भी बड़े साहब का स्टिंग पेश कर दिया। स्टिंग में बड़े साहब मासूमियत से साहब की बिगड़ती परफ़ार्मेंन्स की सूचना देते हुये लक्ष्य के अनुसार काम करने के लिये हड़काते पाये गये। साहब ने बताया -"हमको ऊपर पहुंचाना होता था इसलिये नीचे से मंगाना हमारी मजबूरी थी।"

बड़े साहब से बात होते हुये सचिव तक पहुंची। सबको अपने साहब को संतुष्ट करना था इसीलिये वे पूरी ईमानदारी से बेईमानी में लिप्त थे। सिस्टम की रक्षा के लिये सिस्टम को चौपट कर रहे थे।

सचिव से पूछताछ हुयी तो उन्होंने मंत्री जी का स्टिंग पेश किया। मंत्री जी उनको हड़काते हुये कह रहे थे-" हम यहां आपकी तरह जिन्दगी भर के लिये नौकरी करने नहीं आये हैं। हमारे पास समय कम है। लक्ष्य बड़ा है। इसलिये तेजी से वसूली का काम करना है।"

मंत्री जी से पूछताछ हुई तो उन्होंने बताया-" हम बेईमानों को जेल में डालने के वायदे करके सत्ता में आये हैं। अपना वायदा पूरा करने के लिये हमने अपने यहां बेईमानी को प्रोत्साहित करने के लिये यह कदम उठाया है ताकि हम ज्यादा से ज्यादा बेईमानों को सजा दिलवाकर अपना वायदा पूरा कर सकें। इसीलिये हमने अपने अधिकारियों से बेईमानी का और जनता से स्टिंग का आवाहन किया है। "

अदालत ने अंतत: जनता से पूछा- "तुम्हारे उकसावे पर ही सब लफ़ड़ा हुआ है। क्यों न तुमको जेल भेज दिया जाये।"

अगर ऐसा कर सकें तो बहुत मेहरबानी होगी साहब। जेल में कम से कम खाने-पीने की तो सहूलियत रहेगी। सच पूछिये तो इसी मंशा से हमने यह स्टिंग किया है। वर्ना जिस काम के लिये बाबू जी लेन-देन की बात तय हुई थी वह हमें कराना ही नहीं था। उस काम की हमारी औकात ही नहीं है।

 अदालत ने बाबू और अन्य अधिकारियों को बाइज्जत बरी कर दिया। अपना समय बरबाद करने के लिये जनता को चेतावनी देकर छोड़ दिया।

मुख्यमंत्री जी अखबारों में बयान दे रहे हैं- "जनता और अदालत मिले हुये हैं।" 



Saturday, November 21, 2015

हमको अपना काम करने दो

कमरे में बैठे हुए सूरज की किरणों को देख रहा हूँ। स्कूल के दिनों से पढ़ते आये हैं कि सूरज की सतह से चलकर पृथ्वी तक पहुंचने में आठ मिनट लगते हैं किरणों को। धरती पर पहुंचने के पहले लाखों किलोमीटर चलना पड़ता है किरणों को। रास्ते में भयंकर वाला अँधेरा पड़ता होगा। कहीं कोई इंतजाम नहीं रौशनी का। पता नहीं किसकी सरकार है सूरज और धरती के बीच जो करोड़ों वर्षों में दो चार ठो बिजली के पोल तक न गड़वा पाई अपने इलाके ...में।

बाहर अशोक का पेड़ नुकीला एकदम भाले की तरह खड़ा है। ऐसे लग रहा है बड़ा होकर आसमान के पेट में छेद करके ही मानेगा पट्ठा।

कुछ देर पहले पूरे लान में जहाँ कोहरे का कब्जा था वहां अब उजाले की सरकार है। मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री, राज्यपाल, सन्तरी,कलट्टर सब पदों पर सूरज के खानदान के लोगों का कब्जा है। किसी के पास कोई डिग्री नहीं है। किसी ने शपथग्रहण में समय बरबाद नहीं किया। किसी ने आने के पहले हल्ला नहीं मचाया कि मित्रों हम आते ही अँधेरे और कोहरे को उखाड़ फेकेंगे। किसी ने विज्ञापन में न समय खराब किया और न पैसे फूंके। बस आये और चुपचाप लग गए काम में। जहां कुछ देर पहले अँधेरा था वहां अब उजियारा है।

कमरे का दरवाजा खुला हुआ है। सूरज की किरणें दरवज्जे से अंदर कमरे में दाखिल हो गयी हैं। वो एक दायरे में ही रुक गयी हैं। उजाला आगे अंदर घुस आया है और जगह-जगह फैलता जा रहा है। अंदर जहाँ भी अँधेरा था वहां अब प्रकाश दिखने लगा है। लगता है सूरज के निकलते ही अँधेरे ने कुछ देर तो उजियारे से कुश्ती की होगी। फिर अपनी औकात समझकर उजाले के सामने समर्पण कर दिया होगा।

सूरज और धरती आपस में आठ मिनट की दूरी पर हैं। दोनों में आपस में क्या कभी बात होती होगी? अगर हाँ तो कौन कम्पनी का फोन प्रयोग करते होंगे दोनों। हो सकता है कि ये जो किरणें हैं न वही माध्यम हों दोनों के आपस में बतियाने का। ये जो सूरज की  किरणें बीच-बीच में मुस्कराती और खिलखिलाती सी दिखती हैं वो शायद दोनों की बातें सुनकर ही ऐसा करती हों।

क्या पता दोनों आपस में बतियाते हुए मजे लेते हों एक दूसरे से। सूरज भाई धरती से कहतें हों कि तुम काहे को चक्कर लगाती रहती हो मेरे। आ जाओ मेरे ही पास। बहुत जगह खाली पड़ी है इधर। रहो आराम से। तुम्हारे लिए रोज-रोज रौशनी भेजने का लफ़ड़ा कम होगा।

धरती शायद कहती हो -'अरे रहन दो पास होने की बात। इत्ता तो सुलगते रहते हो। तुमसे तो दूरी ही भली। तुम्हारा तो सबसे कम टेंपरेचर ही 6000 डिग्री है। इत्ते में तो हमारे सबरे बाल-बच्चे, प्राणी, जानवर सुलगकर राख बन जाएंगे। सारी हरियाली जल जायेगी, नदियां गायब हो जाएंगी, समन्दर गोल। हमारा धरतीपन खत्म हो जायेगा। हमें न आना तुम्हारे पास।'

धरती को सूरज चक्कर वाली बात लगता है ज्यादा ही लग गयी। इसीलिये वो अलग से बोली--'जहां तक रही चक्कर की बात तो जिस दिन हम चक्कर लगाना छोड़ देंगे तो ये जो तुम्हारा सौरमण्डल का टीम टामड़ा है न यह सब लड़खड़ा जाएगा। क्या पता फिर तुम भी कहीँ लड़खड़ाते हुए किसी दूसरे सौरमण्डल में शरण मांगो जाकर। ये हमारा तुम्हारे चारो तरफ घूमना जितना हमारे लिए जरूरी है उतना ही तुम्हारे लिए भी। सो इसका ज्यादा गुमान न किया करो कि हम तुम्हारे चक्कर लगाते हैं।'

सूरज भाई को लगा कि धरती कुछ ज्यादा ही गरम हो गयी सो मुस्कराते हुये बोले-'अरे मैं तो मजाक कर रहा था। तुम तो बुरा मान गयी। कितना अच्छी लग रही हो तुम स्वीट एन्ड क्यूट गोल-गोल घूमती चक्कर लगाती हुई।'

कोई फेसबुकिया होता तो इतने पर खुश होकर सूरज भाई को थॅंक्यू बोलकर चार ठो इस्माइली अलग से लगाता लेकिन चूंकि धरती का कोई फेसबुक खाता तो है नहीं सो उसने सूरज की 'चक्कर लगाती हुई' वाली बात पकड़ ली और फिर हड़काया-' मैं तो सिर्फ तुम्हारा चक्कर लगाती हूँ वह भी अपने बाल-बच्चों के लिए। रौशनी के लिए। लेकिन तुमको कौन जरुरत है जो तुम आकाश गंगा के चक्कर लगाते रहते हो। तुम्हारे पास तो खुद की रौशनी है। ज्यादा मुंह मती खुलवाओ मेरा अब सुबह-सुबह। हमको अपना काम करने दो।'

सूरज भाई चुपचाप मुस्कराते हुए एक बादल की ओट में चले गए। ऊपर से धरती को अपनी धुरी पर घुमते देखते रहे। दोनों अपने अपने काम में लग गए।

हम भी चलते हैं अपने काम पर। आप भी मस्त रहिये।

Friday, November 20, 2015

पुलिया पर गधों से मुलाक़ात

दोपहर को लंच के लिए फैक्ट्री आ रहे थे तो बंटी प्रजापति मिले पुलिया के पास। अपने तीन गधों के साथ कंचनपुर जा रहे थे। भांजा भी था साथ में।

पुलिया पर आदमी तो रोज ही मिलते रहे, दीखते रहे पर गधों से यह पहली मुलाक़ात थी।

बंटी गधों पर ईंट, गिट्टी, मौरम, बालू लादकर इधर-उधर पहुंचाने का काम करते हैं। ईंट की ढुलाई 300 रुपया प्रति हजार है। एक बार में एक गधे पर 50 ईंट करीब लद जाती हैं। मतलब एक फेरे में 3 गधों से 150 ईंट करीब ढुल जाती हैं। दिन भर में करीब 10 चक्कर लग जाते हैं। 10 चक्कर मतल...ब 1500 ईंट। 300 प्रति हजार के हिसाब से 450 रूपये करीब कमाई हो जाती है। कभी काम न मिला तो उस दिन कुछ और काम या दिहाड़ी गोल। महीने में 20 दिन का काम अगर मिला तो 9000 प्रति माह हो गए।

सातवें वेतन आयोग के हिसाब से किसी भी कर्मचारी का न्यूनतम वेतन 18000 होगा। मतलब असंगठित क्षेत्र के मजदूर का दोगुना।

बंटी के गधों की उम्र करीब 15 साल की है। आमतौर पर गधे 22 से 25 साल तक जीते हैं। आजकल एक गधा करीब 3000 रूपये का मिलता है।पहले 300से 400 में मिलता था।हाल में गधों की कीमत में बहुत बढ़ोत्तरी होती है।











सामान ढोने के बाद छुट्टा छोड़ देते हैं बंटी चरने के लिए। ऐसे ही एक गधे ने किसी पागल कुत्ते का जूठा खा लिया। वह भी पागल हो गया। मर गया।

एक बच्चा है बंटी का। आठवीं तक पढ़ा है। वह भी ढुलाई के काम में लगता है। साथ में भांजा था। वह अनपढ़ है।
बात करते हुए गधे पुलिया के पास की घास चरने लगे। बंटी प्रजापति बीड़ी फूंकने लगे। हम न घास खाते न बीड़ी पीते लिहाजा उनको वहीं छोड़कर लंच करने के लिए मेस आ गये।