Monday, November 09, 2015

"प्यार से पुकार लो जहां हो तुम"

"प्यार से पुकार लो जहां हो तुम"

यह गीत बज रहा था पंकज टी स्टाल पर आज सुबह जब हम वहां पहुंचे।
पर सुबह की सुनाएँ इसके पहले रात का किस्सा सुन लीजिये। रात के बाद ही सुबह आएगी न। कोई राजनीति थोड़ी है कि रात बीत गयी तो उसको मार्गदर्शक मण्डल में डालकर भूल जाएँ।

कल रात हम क्लब गए थे। धनतेरस पर क्लब में आतिशबाजी फिर पार्टी का इंतजाम था। क्लब से लौटते समय सड़क के किनारे से आवाज सुनी। कोई हवा में बड़बड़ाता हुआ सड़क किनारे लेटा हुआ था। अपनी साईकल किनारे खड़ी करके अपन उसके पास गए। सड़क की दूसरी तरफ।

देखा कि एक साईकल सड़क पर पड़ी हुई थी। पड़ी क्या, धराशायी टाइप थी।

एक आदमी साईकल के हैंडल को तकिया सरीखा बनाये हुए पड़ा हुआ था। नशे में धुत वह न कुछ-कुछ बड़बड़ाता जा रहा था। पता चला कि मढ़ई में रहता है।
हमने उसको उठाने की कोशिश की तो उसने एकल असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया और उठने से मना कर दिया। हमने फिर उसको जबरिया उठाया तो उठ तो गया लेकिन लड़खड़ाता रहा। घर कितनी दूर है पूछने पर कभी 15 मिनट की दूरी पर और कभी 2 घण्टे की दूरी पर बताता। हमें लगा कि यार इसका घर न हुआ अच्छे दिन हो गए। कोई कहता कि चुनाव बाद आएंगे कोई कहता दस साल लगेंगे आने में।


बात करने पर पता चला कि उसके मालिक ने उसको तनख्वाह के पैसे नहीं दिए तो गुस्से में वह दारू पीकर आ गया। साईकल के करियर पर रखा लोहे का रॉड निकालकर मेरे सामने लहराते हुए बोला- ये भी उठा लाये (मालिक के यहाँ से)। हमें लगा कहीँ वह अपने मालिक का गुस्सा हमारे ऊपर न उतार दे।

वह घर जाने के लिए राजी नहीं हो रहा था। पर यह समझाने पर कि यहाँ लेटोगे तो कोई कीड़ा-वीड़ा काट लेगा वह घर जाने के लिए राजी हुआ। साईकल की चैन उतर गयी थी। हमने उसे ऐसे ही जाने को कहा। साईकल से जाता तो कहीं फिर लड़खड़ाकर गिर सकता था। वह धीरे-धीरे चलते हुए घर की तरफ चला गया।हम भी कमरे पर आकर सो गए।

सुबह उठे तो साईकल स्टार्ट करके पहुंचे पंकज टी स्टाल। वहां हमारे जीसीएफ का स्टाफ मिला। मिलते ही लपककर उसने बिहार चुनाव के परिणाम पर ऐसे खुशी जाहिर की जैसे उसको ही जाना है गांधी मैदान पर शपथ लेने। उसको अपने 33/60 (नौकरी की अवधि 33 साल या उम्र 60 साल में जो पहले हो उसमें रिटायर होना) की चिंता है। उसको लग रहा है कि अगर केंद्र सरकार 33/60 लागू करती है तो उसकी 5 साल की नौकरी मारी जायेगी।

गंजेड़ी गठबंधन बारी-बारी से चिलम घुमाते हुए आनन्दमग्न था। 100 के नशे में 3 लोग दोपहर तक मस्त। दीपावली की छुट्टियां तो कोई ट्रक बाहर जाना नहीं था।


एक बच्ची चाय की दुकान से टॉफ़ी, बिस्कुट लेकर अपने साथ की दूसरी बच्ची के हाथ में पकड़ी प्लास्टिक की छुटकी डोलची में सामान रखती जा रही थी। चलते हुए उसने दो मसाले की पुड़िया भी लीं। पूछने पर बताया कि अपनी मम्मी के लिये ले जारी है। छुटकी ने अपना नाम आयशा बताया। फोटो देखकर मुस्कराई।

चाय की दुकान पर ही एक लड़का हाथ में टिफिन लटकाते चाय पी रहा था। पता चला कि कटनी जा रहा है। घर है वहां। आठवीं पास छोटू(राहुल) अपने चाचा राजू के साथ ट्रक हांकने के हुनर सीख रहा है। चचा राजू दस साल से ट्रक चला रहे हैं। उनको एक पंडित जी ने सिखाया था ट्रक चलाना। छोटू के पिता बेलदारी करते हैं। घर सबका कटनी में है। जबलपुर में किराये के कमरे में रहते हैं। खाना होटल में खाते हैं। अभी दीपावली में ट्रक मालिक के यहां खड़ा करके घर जा रहे हैं चचा-भतीजे।

चचा बिल्कुल पढ़े नहीं हैं। बिना पढ़ा इंसान 'अक्षर अँधा' होता है। कुछ भी लिखा हो पर समझ न आएगा। हमने उससे पूछा- 'फिर पैसे गिन लेते हो?' मेरे सवाल पर वह मुस्कराया। बोला कुछ नहीं। पर मुस्कान देखकर लगा कि शायद वह कहना चाहता हो--'पत्तल्कार हो क्या?'

हमारा मन किया कि पूंछे कि बिहार के हालिया चुनाव पर क्या कहना है चचा भतीजे का। पर वे चाय का ग्लास दुकान पर धरकर सरपट निकल लिए। उनको कटनी के लिए बस पकड़नी थी।

मैं भी साइकिलियाते हुए कमरे पर आ गया। मुझे भी फैक्ट्री जाना है। आते हुए पंकज टी स्टाल पर बजता हुआ गाना याद आ रहा था- 'प्यार से पुकार लो जहाँ हो तुम........।' हमने पुकार भी लिया। जिसको सुनना है उसको सुनाई भी दे रहा होगा।

आज धनतेरस है। आप सभी को मुबारक हो।
 

Saturday, November 07, 2015

शुरुआत ही अपने आप में बहुत है

बिहार में किसकी सरकार बनेगी यह तो कल पता चलेगा पर अपन के शरीर में आलस्य की सरकार चल रही है। जग जाते हैं पर उठने का मन नहीं करता। पहले देर करते हैं उठने में। फिर जब काम भर की देरी हो जाती है तो उठ जाते हैं। उठकर सोचते हैं आज बहुत देर हो गयी। अब चला जाए फैक्ट्री। इसी चक्कर में रोज बाहर निकलना स्थगित हो जाता है।

आज भी यही क्रम चला। जगे, उठने में देर की, देर करने के बाद उठे, बाहर निकले, देखा कि उजाला काम भर का हो गया था। एक बार फिर सोचा कि आज फिर देर हो गयी। निकलना कैन्सल। पर फिर झटके में कमरा बन्द करके बाहर निकल ही लिए।

साईकल स्टार्ट करके सड़क पर आये तो मौसम और हवा की ख़ूबसूरती देखकर एहसास हुआ कि तीन दिन क्या मिस क़िया। फौरन मन किया आलस्य को हड़काएं। लेकिन फिर याद आया कि आलस्य को तो हम कमरे पर ही छोड़ आये हैं। फिर सोचा जब मिलेगा हड़कायेंगे।

साईकल चलाते हुए याद आया कि कहा जाता है -'वेल बिगिन इज हाफ डन' अच्छी शुरुआत मतलब आधा काम पूरा। हमारी समझ में शुरुआत ही अपने आप में बहुत है।

चाय की दुकान पर फैक्ट्री के एक साथी मिले। बातचीत हुई तो बताने लगे कि घर 6-7 किलोमीटर दूर है। मोटर साईकल से आते हैं। पहले साइकिल से आते थे। पिछले साल तक मोटर साईकल भाई के पास थी। फिर भाई की शादी हुई तो उसको मोटर साईकल दहेज में मिली। उसकी वाली गाड़ी इनको मिल गई। इनकी साईकल छूट गयी। शरीर आराम तलब हो गया। घुटने जल्दी खराब होंगे। सांस जल्दी फूलेगी। मतलब दहेज की प्रथा दूर तक मार करती है।


चाय पीकर लौटे तो देखा एक दृष्टिबाधित व्यक्ति सड़क पर लाठी इधर-उधर करता हुआ आगे चला आ रहा था। बीच सड़क पर चलते हुए डिवाइडर पर चढ़ गया। ऊंचाई का एहसास होते ही उतर गया। इसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह सड़क पर इधर इधर टहलते हुए आगे बढ़ता रहा। फैक्ट्री गेट के सामने खड़े लोग हल्ला मचाकर उसको रास्ता बताते रहे।

पता चला कि वह फैक्ट्री के गेट नंबर 3 के पास बैठता है। वहीँ माँगता रहता है। कुछ लोग कुछ दे देकर अपना परलोक सुधार लेते हैं। यह भी पता चला कि कुछ मसाला पुड़िया भी बेंचता है। उससे भी कुछ आमदनी हो जाती है।

मंदिर के सामने बैठकर भीख माँगने और फैक्ट्री के बाहर भीख माँगने में अंतर होता है। मन्दिर वाला भिखारी तो कभी चला जाए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा। लेकिन फैक्ट्री गेट पर मांगने वाले को फैक्ट्री शुरू होंते समय अपने धंधा स्थल पर पहुंचना होता है। देर किये तो कामगार अंदर हुए और गयी दिहाड़ी।

किसी की जन्मजात आँख न होना कितना बड़ा नुकसान है उस व्यक्ति के लिए यह एहसास हम नहीं कर सकते हैं। सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं कि वह सूरज की किरणों को नहीं देख सकता। फूल नहीं देख सकता। खूबसूरत से खूबसूरत वस्तु उसके लिए वैसी ही है जैसी कोई खराब दिखने वाली वस्तु।

भगवान के खिलाफ इस बात का कोई एक्शन नहीं होता कि कैसे वे किसी को बिना आँख के धरती पर भेज देते हैं। उनका क्वालिटी विभाग इतना लापरवाह क्यों है? उसके खिलाफ वे कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते। लेकिन कार्रवाई करे कौन। भगवान की पहुंच हर जगह है। केस ही रजिस्टर नहीं होगा उनके खिलाफ। समरथ को नहिं दोष गुसाईं।

सड़क पर हम बाईं तरफ साईकल चला थे। एक कुत्ता दायी तरफ हमारी साईकल के साथ-साथ चल रहा था। दुलकी चाल से चलता हुआ कुत्ता बड़ा स्मार्ट लग रहा था। हम उसके साथ साईकल चलाते रहे।कुछ देर बाद वह मैदान की तरफ मुड़ गया। एक झाड़ी के पास हल्का होने लगा। झाड़िया कुत्तों का वाशरूम होती हैं।

हमारे आगे एक बुजुर्ग महिला तेज-तेज टहलती हुई जा रही थी। उनकी पीठ की झुर्रियां उसके हर कदम के साथ हिलते हुए शायद उससे कह रहीं थीं -'अरे जरा धीरे चलो माता जी।'

देर हो गई थी इसलिए हम आगे नहीं गए फिर। लौट आये। लौटकर अख़बार में छपी कई खबरों में से एक पर रुक गए। अमेरिका में एक बेटी ने अपने विक्षिप्त हो चुके पिता को ठीक करने में सहायता की और एक तरह से उनको नई जिंदगी दी। कई दिनों तक बेटी पिता के साथ लगातार कैमरा थामे चलती रही। पूरा समाचार आप खुद पढ़िए।

सप्ताहांत है। आप अच्छे से रहिये। स्वस्थ रहिये। सानन्द रहिये।

कद ढाई फ़ीट, हौसला आसमान पर


Friday, November 06, 2015

सो नहीं जाना अभी मेरी कहानी चल रही है


स्कूली शिक्षा के हाल

कल यह सूचना साझा की थी मैंने। भिंड जिले में एक कलेक्टर ने हेडमास्टर को इसलिए निलम्बित कर दिया कि बच्चे ने देश और प्रदेश का नाम भिंड बताया था।

9 मित्रों की प्रतिक्रिया थी कि कलेक्टर ने सही किया। 3 लोगों ने कहा कि निलम्बन ठीक नहीं था। एक मित्र की प्रतिक्रिया थी कि फिर तो कलेक्टर का भी निलम्बन होना चाहिए। Santosh Mishra ने कहा कि कलेक्टर का काम प्रकाशक का होता है।परीक्षक का नहीं। कलेक्टर ने उचित नहीं किया।Anupma Upadhyay और
Ashok Kumar Avasthi दोनों ही शिक्षा क्षेत्र से जुड़े ...हैं। दोनों के हिसाब से ही कलेक्टर का निर्णय ठीक नहीं था।

मेरी समझ में भी कलेक्टर का निर्णय बहुत बचकाना है। एक बच्चा देश और प्रदेश का नाम नहीं बता पाया इस बात के लिए प्रधानाध्यापक को निलम्बित करना और शिक्षक की वेतनवृद्धि रोकना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता। ऐसे तो फिर कल को कोई सचिव आएगा और किसी सार्वजनिक जगह टूटी हुई सड़क देखकर या कहीं गन्दगी देखकर कलेक्टर को निलम्बित कर देगा।

आईएएस अधिकारियों का यह रवैया बहुत बचकाना है। प्रचार प्रिय अधिकारी अपने साथ पत्रकारों का अमला लेकर चलते हैं। कोई सख्त कदम उठाया और वाह-वाही लूटकर खुश हो लेते हैं।

सरकारी स्कूलों की व्यवस्था आज सबसे खराब स्तर पर है। समाज के सबसे वंचित तबके के ही लोग अपने बच्चे वहां भेजते हैं। बच्चे भी जितना आते हैं उससे ज्यादा नहीं आते हैं। कुछेक स्कूलों में तो एडमिशन सत्र शुरू होने के चार–पांच माह तक चलते रहते हैं। ऐसे में बच्चे क्या पढ़ेंगे और क्या सीखेंगे।

स्कूलों में संसाधन नहीं हैं। अध्यापक नहीं हैं। अधिकारी ग्रांट का पैसा दायें-बाएं करने में लगे रहते हैं।

अध्यापकों का तबादला पैसे के लेन देन से होता है। भ्रष्टाचार का हाल यह है कि अध्यापकों अपनी छुट्टी स्वीकृत कराने और खुद का फंड का पैसा निकालने के लिए बाबू को पैसे देते हैं। नकल के लिए स्कूल नीलाम होते हैं।
अध्यापकों की ड्यूटी कई तरह के काम के लिए अधिकारी लगा देते हैं। कभी चुनाव, कभी फ़ार्म जाँच , कभी छत्रवृत्ति वितरण और कभी कहीँ।कई जगह मिड डे मील की व्यवस्था भी अध्यापक के जिम्में है।

हमारी भतीजी के ससुर अभी पिछले साल जून में रिटायर हुए। प्रधाना अध्यापक थे वे। कक्षा 6,7 और 8 तक स्कूल था। उनके अलावा कोई और मास्टर भी नहीं था स्कूल में। अकेले 3 क्लास को पढ़ाते थे। मिड डे मील का खाना बंटवाना होता था। रिटायरमेंट तक उनके स्कूल में दूसरा अध्यापक नहीँ आया। आखिरी दिन बगल के गाँव के स्कूल के अध्यापक को स्कूल की चाबी सौंपकर घर आये।

अब ऐसे में कोई अधिकारी जाए और बच्चे से कुछ पूछे और फिर मास्टर साहब को सस्पेंड कर दे और समझे कि उसने शिक्षा व्यवस्था सुधार दी तब तो हो चूका।

अध्यापक भी कम दोषी नहीँ हैं इस सब के लिए लेकिन ज्यादा बड़ा दोष ऊपर के लोगों का है जो जानबूझकर या अनजाने में सरकारी शिक्षा को चौपट कर रहे हैं।

निलम्बन तो अध्यापक का वापस हो ही जायेगा और अध्यापक का इन्क्रीमेंट भी बहाल होगा लेकिन दोनों ही काम जिस तरह होंगे उसमें भ्रष्टाचार की भूमिका भी होगी। बाबुओं और अधिकारियों की उस कला में कोई निलम्बित नहीं होगा न किसी का इन्क्रीमेंट रुकेगा। सिर्फ श्रीलाल शुक्ल की बात सही साबित होगी--'हमारे देश की शिक्षा नीति रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे कोई भी लात लगा जाता है।'

कलेक्टर को व्यवस्था देखनी चाहिए कि स्कूल ठीक से चलें। अध्यापक समय से आएं। पढ़ायें।मास्टर के निलम्बन से बच्चे सीख़ने लगते तो फिर तो कलेक्टर के निलम्बन से शहर भी जगमगाने लगेंगे। लेकिन यह सच नहीं है।

संवेदना की मिशाल


Thursday, November 05, 2015

सुअर समुदाय की निजता

अनूप शुक्ल की फ़ोटो.परसों हमने रोजनामचा में लिखा था:
"झील के रास्ते में एक जगह सुअर समुदाय इकट्ठा था। एक युवा सूअर दूसरे सूअर के ऊपर चढ़ा हुआ पीछे से उस पर धक्का लगा रहा था। बाकी सूअर इधर-उधर मुंह किये गन्दगी का नाश्ता कर रहे थे। एक बूढ़ा, मोटा सूअर वहां से हटकर दूर की तरफ चला गया। दूर की तरफ जाने की बात से मुझे दुष्यंत कुमार का यह शेर याद आ गया:

लहूलुहान नजारों का जिक्र आया तो...
शरीफ लोग उठे और दूर जाकर बैठ गए।"


आज बातचीत के दौरान एक पाठक मित्र ने मुझसे पूछा–'आपने सूअर समुदाय का फोटो क्यों नहीं लगाया? उसके साथ अन्याय क्यों?'

हमने कहा कि असल में मैं सुअर समुदाय की निजता के हनन की बात सोंचकर संकोच कर गया। आपको भेज देता हूँ वह फोटो। तो उन्होंने कहा कि हमको नहीं भेजिए। अपने स्टेट्स पर लगाइये। रोजनामचा आप सबके लिए लिखते हैं तो सबको देखने का हक़ है।

देखिये दूर से सूअर, कूड़ा और पानी/कीचड़ से गीली घास भी कितनी आकर्षक सी लगती है। कुछ न करने के वावजूद अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने वाली राजनीतिक पार्टियों के पोस्टरों की तरह आकर्षक।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10206700060433617&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=3&theater

संकीर्णता दुर्गुण है, उदारता सद्गुण है

प्रश्न: भारत में मुसलमान साम्प्रदायिक हैं, ईसाई साम्प्रदायिक हैं, सिख साम्प्रदायिक हैं –तब बेचारे हिन्दू ही क्यों धर्मनिरपेक्ष रहें?

–गोंदिया से गोविन्द रामचन्द्र देशमुख

उत्तर: जो बात आप कह रहे हैं वह हिन्दुओं में सघन साम्प्रदायिक प्रचार का नतीजा है। मैंने विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, डॉक्टरों, अफसरों के मुंह से भी यह बात सुनी है।

पहली बात तो यह है कि सारे मुसलमान, ईसाई, सिख साम्प्रदायिक नहीं हैं। इनका एक हिस्सा ही साम्प्रदायिक है। यदि सारे सिख साम्प्रदायिक होते तो पंजाब में कांग्रेस की सरकार नहीं बनती। सारे मुसलमान साम्प्रदायिक होते, तो चुनाव में हिन्दू उम्मीदवार बहुत कम जीतते। जिस अनुपात में मुसलमान सांप्रदायिक हैं उससे ज्यादा अनुपात में हिन्दू पहले से ही साम्प्रदायिक हैं।

दूसरी बात यह है की संकीर्णता दुर्गण है, उदारता सद्गुण है। आप संकीर्णता को सदगुण समझते हैं। चाहते हैं कि हिन्दू भी संकीर्ण हो जाएँ। इस देश का भला उदारता, सहिष्णुता और धर्मनिपेक्षता पर है। लेकिन धर्म एक अधिरचना है, आधारभूत रचना नहीं। मगर धर्म का उपयोग साधारण मनुष्यों को बहकाने के लिए इस तरह किया जाता है गोया इस्लाम या हिन्दू धर्म से ही आर्थिक–सामाजिक समस्याएं सुलझ जाती हों। सही यह है कि धर्म शोषक वर्ग के हाथ में बहुत धारदार हथियार है। पाकिस्तान इस्लाम के लिए नहीं बना। वह पंजाब के जमीदारों और उत्तर प्रदेश के रईसों द्वारा शोषण की सुविधा के लिए बना।

धर्म पर आधारित राष्ट्र–राज्य में लोकत्रंत्र नहीं रहता। किसी इस्लामी देश में लोकतंत्र नहीं है। हिन्दू को सम्प्रदायिक बनाने की साजिश वे शक्तियां करती हैं जो सामन्तवाद और पूंजीवाद को जीवित रखना चाहती हैं।
आप इस तरह बात को रख रहे हैं जैसे हिंदुओं का धर्मनिरपेक्ष होना कोई सजा हो। जैसे यह कोई बुराई हो। यदि बहुसंख्यक हिन्दू भी साम्प्रदायिक हो जायेंगे तो उनका अपना नाश तो होगा ही, साथ ही देश में लोकतंत्र भी नहीं रहेगा और न हम स्वाधीन राष्ट्र रह सकेंगे।
–‪#‎परसाई‬
–16, दिसम्बर 1984 को देशबन्धु समाचार में
'पूछो परसाई से' स्तम्भ में।

शाहरुख खान, सहिष्णुता-असहिष्णुता

मेस से बाहर निकलते ही बनी पुलिया पर आराम करते मिले अजय रायकवार। रांझी में रहते हैं। हाईस्कूल तक पढ़ाई किये हैं। बेलदारी का काम करते हैं। बेलदारी मतलब भवन निर्माण के काम में सामान उठाने धरने का काम। मेहनत मजूरी। रोज के 180/- मिल जाते हैं।

पहले पुताई का काम करते थे। दीवाली के बाद वह काम खत्म हो जाएगा यह सोचकर बेलदारी करने लगे। रांझी में रहते हैं। आज घर से निकले काम पर जाने के लिए लेकिन तबियत कुछ ठीक नहीं लगी तो गए नहीं काम पर। पुलिया पर लेटकर आराम करने लगे।

अजय के पिता सब्जी बेचते हैं। दो बहनें थीं उनकी शादी हो गयी है। शादी अजय की भी हो गयी। एक बिटिया है 6 महीने के। नाम है आरोही।

बात करके हम दफ्तर की तरफ चल दिए। फिर कुछ याद आया तो वापस लौटे। पूछा अजय से-'टीवी देखते हो?'
अजय बोले-'हाँ, देखते हैं। कभी-कभी।'

हमने पूछा-'आजकल टीवी पर शाहरुख खान पर बहस हो रही है। बयानबाजी हो रही है। उसके बारे में कुछ पता है'

वो बोला-' नहीं हमको कुछ नहीं पता इस बारे में।'

आगे वह कुछ नहीं बोला। पर बिना उसके चेहरे पर जो भाव आया उसका मतलब शायद यही था कि ये सब बातें हमारी समझ से बाहर हैं। बड़े लोगों के चोंचले हैं यह।

अच्छा हुआ हम शाहरुख खान की बात पूछकर ही चुप हो रहे। सहिष्णुता-असहिष्णुता की बात करते तो पता नही क्या जबाब देता वह।

है कि नहीँ :)

सस्ती किताबें- एक सच यह भी

ब्लॉग और फेसबुक से जुड़े कई बेहतरीन लेखकों की पिछले दिनों कई किताबें आई। लगभग सभी मैंने खरीदी हैं। कुछ लोगों को उपहार में भी दी हैं।

आम जानकारी के हिसाब से लेखक को 10% रॉयल्टी मिलती है। कुछ प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देते और बदले में कुछ किताबें लेखक को मुफ़्त दे देते हैं जिसे वह रॉयल्टी के रूप में समझ सकता है।Shefali Pande ने जितने पैसे दिए प्रकाशक को उतने मूल्य की किताबें प्रकाशक से लीं। (किताब का नाम- मजे का अर्थशास्त्र)

कुछ लेखक खुद किताबें छपवाते हैं। छपाई का पूरा पैसा प्रकाशक को देते हैं। सारी किताबें खुद लेकर फिर अपने हिसाब से बांटते हैं। Neelam Trivedi ने अपनी किताब ( Zenith of Love - http://www.amazon.in/Zenith-love-Dr-Neelam-Tr…/…/ref=sr_1_1… )खुद छपवाई। सारी किताबें खुद ऑनलाइन बेंची/भेजी । मतलब छपाने में जो भी खर्च किया उसके बाद अपने हिसाब से किताबों का वितरण किया। 

इधर किताबों की छपाई का नया तरीका पता चला है।इसमें लेखक प्रकाशक को 25 से 30 हजार रूपये तक देता है। प्रकाशक कुछ किताबें छपता है। बेंचता है। बदले में लेखक को न रॉयल्टी देता है और न ही दिए गए पैसे के बराबर किताबें। प्रकाशक किताब छापता है। बेचता है। कमाता है। लेखक लिखता है। छपने के पैसे देता है। बदले में उसको न किताबें मिलती हैं न रॉयल्टी। सिर्फ एक लेखक बनने का एहसास होता है उसको। मतलब लेखक ख़ुशी-खुशी अपना आर्थिक शोषण करवाता है।

मेरी किताब 'पुलिया पर दुनिया' मैंने पोथी.काम से ई-बुक और प्रिंट आन डिमांड के तहत छपवाई।मुफ़्त में। ई-बुक के दाम 50/- रखे थे। साल भर करीब हुए कुल जमा 50 से भी कम किताबें ई-बुक और एकाध छपी हुई बिकीं। 2000/- करीब रॉयल्टी के पोथी.कॉम से अभी तक नहीं मंगाई है। यह सूचनार्थ ही है बस।

पिछले दिनों अख़बारों में इस तरह के लेख छपे कि हिंदी में अच्छे और सस्ते लेखन सामग्री का नया दौर शुरू हो गया है। उन लेखों में लेखकों ने इस मुद्दे पर कोई बात नहीं की थी कि उन किताबों के छपने के लेखक ने पैसे दिए। प्रकाशक ने लेखक से पैसे लेकर किताब छापी। किताब छापने का खर्च लेखक से लिया। किताब बेंचकर आगे भी कमाई की। लेखक का शोषण करके सस्ती और अच्छी किताबें छापने का श्रेय भी लिया।

जिन लेखकों ने पैसे देकर किताबें छपवाई सम्भव हो तो उनको इस बारे में भी लिखना चाहिए कि

1. उनको क्या बिकी हुई किताबों पर रॉयल्टी भी मिली।
2. क्या उनको उतने मूल्य की किताबें मिलीं जितने पैसे उन्होंने किताब छपवाने के लिए दिए।
3. उनका किताब छपवाने का अनुभव कैसा रहा?

ये प्रश्न किसी खास लेखक प्रकाशक से सम्बंधित नहीं हैं। न मुझे किसी प्रकाशक से कोई शिकायत है। यह सिर्फ उस प्रचार के संदर्भ में है जिसके अनुसार यह बताया जा रहा है कि हिंदी में अच्छी किताबें सस्ती दरों पर छपने लगी हैं। इस प्रचार में जानबूझकर या अनजाने में यह सच नहीं बताया गया कि इस सस्ताई में लेखक का पैसा लगा है। सस्ती किताबों की बुनियाद लेखक के आर्थिक शोषण पर टिकी है।

Tuesday, November 03, 2015

'क्या करते हो? कोई देख लेगा

सुबह उठे तो सोचते रहे कि आज किधर की तरफ हैंडल मोड़ा जाए साईकल का। फिर अचानक याद आया तालाब। और हम फ़ौरन निकल लिए।

नदी, झील, तालाब, हम भरसक खत्म करते जा रहे हैं। वो हमारे आसपास से सिकुड़ते जा रहे हैं। इसीलिये जैसे ही वो जेहन में जैसे ही नदी और झील की याद उभरती है, उनके पास जाने का मन करता है। कुछ ऐसे ही जैसे घर की याद आते ही वहां जाने के लिये मन करता है।


दो महिलाएं साथ जाती हुई बतिया रहीं थीं। एक के हाथ में पालीथीन में ताजे तोड़े हुए चांदनी के फूल थे। पालीथीन को तर्जनी ऊँगली पर नचाती, घुमाती हुई वह अपनी सहेली से बतियाती चली जा रही थी।
एक जगह एक गढ्ढे के पास एक आदमी बोरी में भरकर मिटटी अपनी साईकल पर लाद रहा था। डंडे के नीचे कैंची के बीच की जगह पर बोरी जमाकर रख रहा था। गढढे में एक महिला कुदाल लिए मिट्टी खोदकर एक स्टील की प्लेट से बोरी में भर रही थी। आदमी ने बताया कि वह चबूतरा बनाने के लिए मिटटी इकट्ठा कर रहा है। आदमी से बात करते हुए हमने देखा कि मिट्टी खोदती महिला ने खड़े होकर सर पर पल्लू रखा और फिर मिटटी बोरी में भरने लगी।


वहीं एक जगह खड़े होकर देखा कि बिजली के तारों पर कुछ पक्षी चहचहा रहे थे। सूरज भाई पूरब की तरफ निकल रहे थे पर आसमान दूसरी तरफ भी लाल कर रहे थे। शायद वे भी जनरल डिब्बे के यात्रियों की तरह उधर अपना रुमाल रखकर आसमान में जगह पर कब्जा कर रहे थे जिधर उनको शाम को जाना था।

एक दूसरे तार पर दो पक्षी एक दूसरे दूर बैठे हुए थे। उनके बीच पसरे अबोले को देखकर लगा कि पक्का ये लोग मियां-बीबी हैं। हमारी तरफ उनकी पीठ मतलब पूँछ थी। चोंच दूसरी तरफ। कुछ देर बाद पलट कर वे एक दूसरे की तरफ आये। एक पक्षी ने दूसरी को 'चोंच चुम्बन' दिया। कुछ देर 'चोंचियाने' के बाद दोनों जिस तेजी से एक दूसरे से दूर हुए उसे देखकर लगा कि मादा पक्षी में नर पक्षी की चोंच परे करते हुए कहा होगा-'क्या करते हो? कोई देख लेगा।' क्या पता यह भी कहा हो-'चार चिड़ियों के बाप हो गए। जवानी वाली आदतें नहीं गयी अब तक।' देखते-देखते दोनों पक्षी आसमान में फुर्र से उड़ गए। हवा में तार बहुत देर तक हिलता रहा।

झील के रास्ते में एक जगह सुअर समुदाय इकट्ठा था। एक युवा सूअर दूसरे सूअर के ऊपर चढ़ा हुआ पीछे से उस पर धक्का लगा रहा था। बाकी सूअर इधर-उधर मुंह किये गन्दगी का नाश्ता कर रहे थे। एक बूढ़ा, मोटा सूअर वहां से हटकर दूर की तरफ चला गया। दूर की तरफ जाने की बात से मुझे दुष्यंत कुमार का यह शेर याद आ गया:
लहूलुहान नजारों का जिक्र आया तो
शरीफ लोग उठे और दूर जाकर बैठ गए।


झील के किनारा शांत था। आज 'तालाब को आराम' दिया गया था। मछुआरे नहीं थे। उनके बैठने की जगह पर कुत्ते अलसाये से लेटे हुए थे। हमको फोटो लेते देखकर थोड़ा आँख खोलकर देखा और फिर मूंदकर सो गए।
एक छोटी चिड़िया झील के पानी के ऊपर आसमान में उड़ रही थी। कभी ऊपर जाती कभी नीचें। कभी लगता लड़खडाई और पानी में गिरी पर फिर चोंच ऊपर की तरफ करके उड़ने लगती। कुछ देर उड़ने के बाद वह किनारे आ गयी और घास पर बैठकर सुस्ताने लगी।

सामने से सूरज भाई चमकते दिखे। फोटो खींचा तो ऐसा लगा कि किरणों का हाथ फैलाकर हमसे हाथ मिला रहे हों।

कुछ देर झील के पानी को देखते रहे। जितना देख सके देखा बाकी को दूसरे के देखने के लिए छोड़कर वापस लौट लिए।

लौटते में देखा कि एक महिला लोटे में जल लिए सर पर पल्लू डाले कुछ मुस्काती सी चली जा रही थी। शायद मन्दिर जा रही हो। एक आदमी एक पालीथीन में दही लिए पालीथीन हिलाता चला जा रहा था।पालीथीन हिलाने से दही को हड्डी-पसली एक होने का एहसास हो रहा था या झूला झूलने का एहसास यह मैं तय नहीं कर पाया।
वहीं एक चाय की दुकान पर चाय पी। अख़बार में सम्पादकीय पेज पर यशवन्त सिन्हा का लेख देखा। उसमें जार्ज फर्नांडीज के ताबूत घोटाले से सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 अक्टूबर को बरी करने की खबर का जिक्र करते हुए मिडिया की आलोचना की गयी थी कि उसने इस खबर को खबर नहीं बनाया।

यह लगा कि मीडया को कालिख पोतने की खबर में रूचि रहती है। किसी के उजले होने की सूचना मीडिया को मजा नहीं आता। पता नहीं Chanchal Bhu जी ने यह खबर साझा की थी या नहीं। चंचल जी ने जार्ज फर्नांडीज से जुड़े कई संस्मरण साझा किये हैं।

जार्ज फर्नांडीज की बात से याद आया कि मैंने एक बार उनको लंका चौराहे पर किसी उम्मीदवार के समर्थन में भाषण देते सुना था। कुल जमा लोग इतने ही थे कि चौराहे पर लोग आराम से आ जा रहे थे। जार्ज की राजनीति और अन्य बातों के बारे में नहीं पता पर उनकी सादगी, ईमानदारी और बिना तामझाम के जिया सार्वजनिक जीवन अनुकरणीय लगता है।

एक जगह हनुमान मन्दिर के ऊपर श्री सार्वजनिक हनुमान मन्दिर लिखा देखकर सोचा कि कहीँ निजी हनुमान भी होंगे किसी मन्दिर में।

एक महिला सड़क के एक किनारे नल के पानी से पानी भरकर सरपट सड़क पार कर रही थी। उसके एक हाथ में स्टील की गगरिया थी और दूसरे में प्लास्टिक का डब्बा।

आगे सड़क पर जाती एक महिला हर पांचवे कदम पर दांये-बाएं देखते हुए चौकन्नी चाल से जा रही थी। उसकी चाल देखकर लगा कि अपने देश की आधी आबादी को सड़क तक पर चलते हुए कितना सावधान रहना पड़ता है। इसके बावजूद अगर वे पुरुषों की बराबरी कर रहीं हैं तो यह तारीफ़ की बात है।

लौटते में देखा स्कूल के पास एक लड़की पीठ पर बस्ता लादे अपने से 4 फ़ीट की दूरी पर मोटर साइकिल पर बैठे एक लड़के से कुछ बात कर रही थी। बात करते हुए दोनों बच्चे ऐसे बिजली के तारों की तरह लगे जिनसे होकर बिजली गुजर रही हो। यह भी कि दोनों के बीच 4 फिट की दूरी की हवा उनके बीच कुचालक का काम कर रही हो और बीच की दूरी कम होते ही उनके बीच का फ्यूज उड़ जाएगा। फ्यूज उड़ने के डर से ही शायद दोनों सुरक्षित दूरी पर रहकर बात करते रहे।

लौटकर आने के बाद पोस्ट लिखी। अब जा रहे हैं दफ्तर। आप मजे से रहिये। आपका दिन शुभ हो।
 

बूंद टपकी एक नभ से

बूंद टपकी एक नभ से
किसी ने झुक कर झरोखे से
कि जैसे हंस दिया हो।
हंस रही-सी आंख ने जैसे...
किसी को कस दिया हो।

ठगा सा कोई किसी की
आंख देखे रह गया हो।
उस बहुत से रूप को
रोमांच रोके सह गया हो।

--भवानीप्रसाद मिश्र

कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं मन चाहिए


Monday, November 02, 2015

मिलो न तुम तो हम घबरायें

मिलो न तुम तो हम घबरायें
मिलो तो आँख चुराएं, हमें क्या हो गया है।

यह गाना बज रहा था आज जब हम पहुंचे 'पंकज टी स्टाल' पर।

सुबह निकलते हुए आज साढ़े छह बज गए । साईकिल निकाली तो लगा पैसे नहीं रखे। देखा तो जेब छूँछी। सोचा ऐसे ही निकल लें। आज की चाय उधार रहेगी। फिर सोचा किसी की बोहनी का बखत होगा। सुबह की शुरुआत उधार से करना ठीक नहीं। साइकिल स्टैंड पर खड़ी की। कमरे पर गए। पैसे लिए। जेब में डाले फिर साईकल स्टार्ट की।

निकलते ही सूरज भाई दिखे। सुबह की धूप हल्की थी। कोहरीली धूप। ऐसा लगा जैसे जाड़े में धूप की बढ़ी हुई मांग को सूरज भाई धूप में कोहरा मिलाकर पूरा कर रहे हों- जैसे गर्मी में दूध में पानी और त्यौहारो में खोये में मिलावट बढ़ जाती है।

यह बात हमने सूरज भाई से कही तो वे हंसने लगे। किरणें भी खिलखिलाने लगीं। ऐसा लगा मानों मेरी शिकायत सुनते ही सूरज भाई ने मुझसे कहा हो-'अरे यार बाकियों की चिंता छोड़ । ये लो तुम्हारे लिए बढ़िया प्योर खिली हुई स्पेशल धूप।'

सुनहरी , खिली हुई धूप और खिलखिलाती किरणों ने मुझे चुप कर दिया। हम और कुछ कह नहीं पाये। आगे चल दिए।

मोड़ पर ही छट्ठू सिंह के साथी मिल गए। आज छट्ठू सिंह नहीं आये थे। दो दिन से तबियत ढीली है। हमने उनके साथियों से कहा-"आप लोग बाहर जाओ कहीँ घूमने के लिए। अच्छा लगेगा। क्या यहीं टहलते रहते हैं।" उन्होंने हामी भरी और फिर नमस्ते करके चले गए।

सरिया लेकर टहलती बुजुर्ग महिला आज भी सरिया लिए टहल रहीं थी। अलबत्ता आज सरिया का मुड़ा हुआ हिस्सा सड़क की तरफ था। पहले दिन वह हाथ की तरफ था।

बस स्टैंड पर लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए बस का इंतजार कर रहे थे। एक बच्ची एकदम सावधान मुद्रा में खड़ी किसी पतली सी किताब से कुछ पढ़ रही थी। तल्लीन थी पढ़ने में वह। शायद उसका कोई टेस्ट या इम्तहान हो। यह लगा 'पीके' फ़िल्म की तरह ऐसी सुविधाएं आने लगें कि बच्चे किताब का मसाला किताब छूकर ही दिमाग में डाउनलोड कर सकें।

आगे एक बस रुकी। हार्न दिया। एक महिला लपकती हुई आई। साथ की बच्चे को बस में लपककर जमा सा करके नीचे से बस्ता उसको थमाया।बस स्टार्ट ही रही। बच्चे के जमा होते ही चल दी। महिला ने बच्चे को बस में बैठाने के पहले की हड़बड़ाहट चेहरे से पोंछ कर मुस्कराते हुए बच्चे को टाटा किया। बस जब दूर हो गयी तो उसने चेहरे की मुस्कान को भी समेट कर चेहरा सामान्य कर लिया।


महिला को देर तक मुस्कराना शायद उसको फिजूलखर्ची लगा हो। शायद उसको लगता हो कि मुस्कान अनमोल है। फिजूल में खर्च नहीं करना चाहिये। पता नहीं कब किस गम को छिपाने के लिए जरूरत पढ़ जाए। वो गाना है न:

तुम इतना क्यों मुस्करा रहे हो
क्या गम है जो मुझसे छिपा रहे हो।

पंकज टी स्टाल पर वही गाना बज रहा था जो ऊपर बताया:
मिलो न तुम तो हम घबराएं
मिलो तो आँख चुराएं, हमें क्या हो गया है।

चाय की दूकान पर दो चिलमची चिलम सुलगा रहे थे। एक ने माचिस की तीली सुलगाई। दूसरे ने नीचे झुककर आँख मूँदकर जल्दी-जल्दी सांस खींचकर चिलम सुलगाई। चिलम जब सुलग गयी तो जल्दी-जल्दी वाली साँस बन्द करके उसने चैन की सांस ली। थोड़ा सन्तोष भी मिला हुआ था चैन की सांस में कि जल्दी सुलग गयी चिलम।

दोनों चिलमची काले कपड़े पहने हुए थे।नीचे बैठकर चिलम सुलगाते हुये व्यक्ति की मुद्रा कुछ वैसी ही थी जैसे प्रेमी अपनी प्रेमिका को शादी के लिए प्रस्ताव पेश करते समय झुकता है। चिलम सुलगते ही वे दोनों एक कोने में चले गए।

इस बीच जीसीएफ फैक्ट्री में काम करने वाला एक स्टाफ वहां आ गया। फैक्ट्री के पुराने जीएम की बुराई कर रहा कि वो बहुत टाइट करके चले गए फैक्ट्री। अब भी वैसा ही हाल बना हुआ है। इत्ता टाइट थोड़ी करना चाहिए था। हर बात में सख्ती।

फिर वह मुझसे पूछने लगा कि ये बताइये कि 33 का क्या हो रहा है? मुझे कुछ समझ में नहीं आया तुरन्त। मैंने कहा-'देखो क्या होता है।'

फिर वह सरकार पर अपनी नाराजगी उतारने लगा और बिना रुके कहता रहा:

"इनकी बस मुंडी मटकती है, इसकी बुराई, उसकी बुराई। बोलना बहुत अच्छा आता है। जब आये थे तब बोले कि- ये विकास होगा होगा, वो नौकरी लगेगी। लेकिन हुआ कुछ नहीं। सब ऐसे ही खाईबाजी चल रही है। कहीं डिजिटल इण्डिया, कहीं स्वच्छ भारत। कीमत पर कोई कंट्रोल नहीं। मास्टर 5000 में काम कर रहा है। न बच्चे हैं न कुछ। न सरकारी स्कूल हैं न डॉक्टर। ऐसे ही पांच साल निकाल देंगे। फिर कहेंगे पांच साल और चाहिये। हमें यह लगता है कि कहीं अपनी फैक्ट्रियों को भी न सड़क पर ला दें। बीएसएनएल को बर्बाद कर ही दिया। प्रमोद महाजन ने किया था। बिहार में जीते तो 33 साल कर देंगे।"


33 से मुझे याद आया कि उनकी नाराजगी का कारण वह सम्भावित योजना है जिसके अनुसार कोई भी व्यक्ति सरकार की नौकरी से 33 साल की नौकरी या फिर 60 साल की उम्र में से जो पहले होगा सेवा से रिटायर हो जायेगा। इन भाई साहब के 35 साल नौकरी के हो चुके हैं। 5 साल अभी भी बाकी हैं। मतलब 20 साल की उम्र में आये थे नौकरी में। यही इनके लिए चिंता का विषय है कि सेवा अवधि 33 साल की हो जायेगी तो फौरन पेंशन पेपर थमा दिए जाएंगे।

अपनी चिंता को विस्तार देते हुए उन्होंने बताया कि पहले 19-20 साल की नौकरी में आ जाते थे लोग। आज अगर 33/60 लागू होगा तो 500 से 1000 लोग हर फैक्ट्री से बाहर हो जाएंगे।

मेरा मन हुआ कहें कि नए लड़कों की नौकरी मिलेगी भी तो। लेकिन फिर कहा नहीं। वह भी ड्यूटी जाने की जल्दी में था। चला गया।

इस बीच तीन बच्चे मेरी बगल में आकर बैठ गए। बात की तो पता चला कि उनके दादा जीसीएफ में काम करते हैं। पिता प्राइवेट काम करते हैं। क्या करते हैं बच्चों को पता नहीं। बच्ची 5 में पढ़ती है, बच्चे 2 में। आज स्कूल नहीं गए। गाँव जाना है।कुछ काम है। मम्मी के साथ जाएंगे। बिहार के हसनपुर में गाँव है।

बच्चे बड़े प्यारे लग रहे थे। छोटे बच्चे के गाल का एक हिस्सा कुछ गुलाबी रंगत लिए बहुत प्यारा लग रहा था। मैंने फोटो के लिए पूछा तो पहले तो मना कर दिया बच्ची ने। पर बातचीत के बाद दुबारा पूछा तो कहा- ले लीजिये। फोटो दिखाई तो खुश हुए बच्चे।

लौटते में दीपा को देखने गए। उसके हाथ में चोट लगी दिखी। बताया-खेलते में गिर गयी थी। चोट हल्की ही थी पर कोई दवाई न लगाने से बढ़ गयी थी। हल्का सा मवाद भी आ रहा था। हमने उसके पिता से पूछा कि इसको दवा क्यों नहीं लगवाई तो बोला- 'कल जाएंगे।आधार कार्ड भी बनवा लेंगे।'

हमें लगा कि यह हाल हैं अपने समाज में स्वास्थ्य सुविधाओं के कि एक साधारण खरोंच तक के लिए लोग दवा नहीं लेते या ले पाते। स्कूल में भी प्राथमिक चिकित्सा की कोई सुविधा होती तो चोट अब तक ठीक हो जाती।
उसके स्कूल का समय हो रहा था। इसलिए यह सोचकर कि शाम को उसको अस्पताल से पट्टी करवा देंगे हम चले आये वापस। चलने से पहले दीपा का एक फोटो लिया तो दीपा ने कहा -'हम शेरू का फोटो लेंगें।' लिया उसने और खुश हुई कि अच्छा आया।

क्रासिंग बन्द थी। हमने खुलने का इंतजार करते हुए वहीं साइकिल पर बैठे-खड़े पोस्ट का शुरूआती हिस्सा टाइप किया। डबल क्रास था। दोनों ट्रेने निकल गयीं तब फाटक खुला। हम वापस कमरे पर आये। चाय पीते हुए पोस्ट लिखी।

अब जा रहे हैं फैक्ट्री के लिए। आज गुणवत्ता माह की शुरुआत है। सबको मुबारक हो।

आपका दिन मंगलमय हो शुभ हो।

डॉक्टर हो तो ऐसा


Sunday, November 01, 2015

किताबों के बहाने कुछ बातचीत

कल Diwas Mishra से मिलना हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के क़ानून के छात्र हैं। कुछ दिन पहले दिवस ने कहा था कि आएंगे मिलने। हमने कहा- ठीक। फिर तय हुआ कि मंगलवार को आएंगे। हमने कहा-ठीक। फिर कल फोन आया कि कब मिल सकते हैं। हमें लगा समय के बारे में पूछ रहे। हमने कहा-जब मन आये। दिन में हम दफ्तर में और उसके बाद मेस में मिलते हैं। फोन है ही।

कुछ देर बाद मेस के गेट से फोन आया कि मेस के गेट पर खड़े हैं। हम कहे -अरे तुम तो मंगल की बात किये थे। आज तो शनिवार है। इस पर बोले दिवस- 'आपने यह भी कहा था कि कभी भी आ सकते हो।'

हमने कहा-अच्छा किया। आओ। फिर फटाक से कुर्सी पर रखे कपड़े अलमारी में धरे। एक कुर्सी खाली हो गयी। एक कुर्सी बहुत थी एक जन के लिए। लेकिन न्यूटन के जड़त्व के नियम के झांसे में हम एक के बाद दूसरी भी खाली कर दिए। हफ्ते भर पहले से कुर्सी पर रखा सामान ठीहे पर रख दिए। फिर पता चला कि दिवस अपने मित्र अनुभव ओझा के साथ आये थे तो अनजाने में की गयी मेहनत सफल हुई।


खूब सारी बातें हुईं दोनों से। साल भर हम और दिवस मित्र हैं फेसबुक पर। मेरी कई पोस्टों का उल्लेख किया उन्होंने तो लगा कि मेरे लेखन के ऊपर तमाम लोग निगाह रखते हैं। यह भी अच्छा लगा कि कोई मित्र शहर आये तो मिलने आये इसलिए कि उसको मेरा लिखना पसंद है।

यह अलग बात है कि दिवस को शिकायत है कि उनकी पोस्ट्स हम नहीँ पढ़ते। कई कविताएं और कहानियां लिखी हैं उन्होंने। हमने वायदा किया अब पढ़ेंगे।

ढेर बातचीत और चायपानी के बाद फोटो सेशन हुआ। हमारे साथ फोटो खिंचाने के अलावा दिवस ने हमारे यहां रैक पर बिखरी पड़ी किताबें देखीं और उनके साथ फोटो भी खिंचाई। किताबों के कलेक्शन की तारीफ भी की। हमने कहा-'यह हवा-पानी के लिये रखी हैं।'

हमारा किताबों का भी मजेदार हिसाब है। जब भी कानपुर जाते हैं तो घर से एकाध - दो किताब ले आते हैं। यहां किताब बढती जा रहीं। यात्रा में भी किताब साथ ले जाते हैं। पर किताबें अक्सर जैसी की तैसी वापस आ जाती हैं। महीनों हुए कोई किताब मैंने पूरी नहीँ पढ़ी। पढ़ने की क्षमता जबरदस्त प्रभावित हुई है पिछले सालों में। यह तब है जबकि मैं कहता हूँ कि अगर मुझे आज दुनिया से विदा होने को कहा जाये तो एकमात्र अफ़सोस अगर होगा तो यह होगा कि मैं दुनिया की कई बेहतरीन किताबें पढ़े बिना चला गया।

कुछ सालों पहले तक मेरी पढ़ने की गति ठीक-ठाक थी। 'मुझे चाँद चाहिए' और 'पहला गिरमिटिया' जैसे हजारेक पन्ने वाली (बकौल श्रीलाल शुक्ल- मुगदर साहित्य) मैंने तीन दिन से एक हफ्ते में पढ़े। अब हाल यह है कि ऑनलाइन खरीदे गैर कई बेस्ट सेलर पहले पन्ने से दूसरे तक पहुंचने का इन्तजार कर रहे हैं।

आज सुबह देर से उठे तो टहलने नहीं गए। कुछ देर बाद जाने की सोची। पर फिर अचानक मन किया किताबें सरिया लीं जाएँ। बिखरी हुई पुस्तक निधि को सहेज लिया जाए।


किताबें सहेजते हुए हर किताब से जुडी हुई कोई न कोई घटना याद आती गयी। आधी से भी अधिक किताबें मैंने शुरू भी नहीं की हैं। कुछ शुरू की तो अधबीच में किसी न किसी कारण रुक गयीं। उनमें पुस्तक चिन्ह भी नहीं हैं कि कहां तक पढ़ चुके हैं। दो ऐसी किताबें हैं- दूधनाथ सिंह की 'आखिरी कलाम' और ज्ञान चतुर्वेदी की 'हम न मरब'। और भी कई हैं। मन किया की तय करते हैं कि दीवाली के पहले इनको बांच लेंगें। लेकिन फिर नहीं किया। क्या फायदा -क्या पता इधर-उधर फंस जाएँ। न पढ़ पाएं।तो काहे का अपराध बोध का वायस तैयार किया जाये।

बहुत अच्छी किताबें पूरी न पढ़ पाने के पीछे मेरा अवचेतन मन का बेवकूफी का वह तर्क भी काम करता है कि यह किताब खत्म हो गयी तो फिर क्या रहेगा पढ़ने के लिए। कोई किताब जब यह सोचकर पढता हूँ कि उसकी बहुत तारीफ़ हो चुकी है और वह बहुत अच्छी है तो फिर उसके पूरा पढ़ने में कोई न कोई बाधा आ ही जाती है। कोई नहीं तो यह कि इसके पढने के बाद क्या पढ़ेंगे।

कई किताबों की धूल झाड़ते हुए उदय प्रकाश के लेखों के संकलन की किताब 'ईश्वर की आँख' के कई बार पढ़े अंश फिर से पढ़ता हूँ। बचपन में सोन नदी में डूबने से बचने का किस्सा बयान करते हुए उदय प्रकाश ने लिखा है:
" सोन नदी के जल में मेरी वह अंतिम छटपटाहट अमर हो जाती। मृत्यु के बाद। लेकिन नदी के घाट पर कपड़े धो रही धनपुरिहाईन नाम की स्त्री ने इसे जान लिया। नदी की धार में तैरकर, खोजकर, उसने मुझे निकाला और जब मैं उसके परिश्रम के बाद दुबारा जिन्दा हुआ तो उसे इतना आश्चर्य हुआ कि वह रोने लगी।

तब से मैं स्त्रियों को बहुत चाहता हूँ। सिर्फ स्त्रियां जानती हैं कि किसी जीव को जन्म या पुनर्जन्म कैसे दिया जाता है।"

इसी किताब के एक और लेख जो शायद 90 के दशक में लिखा गया में उन्होंने लिखा-" वे लोग कौन हैं, जिनका हित साधने के लिए हमारे लोकतंत्र में, हम नब्बे करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार के प्रधानमंत्री समेत एक-चौथाई कैबिनेट आज न्यायालय के सामने ठगी, बेईमानी, षड़यन्त्र और गबन का मुजरिम बना खड़ा है।"

इस लेख का शीर्षक है-" ब्रह्मराक्षसों की छायाएं गांधी जी की चप्पल पहने घूम रहीं हैं।"

अपने लेखन यात्रा के दौरान उदयप्रकाश जी कई लेखन से इतर कारणों से आलोचना और चर्चा में रहे लेकिन यह निर्विवाद है कि उदयप्रकाश आज के हिंदी साहित्य के बेहतरीन कथाकारों में से एक हैं।

पिछले दिनों जब उदय प्रकाश जी ने साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाया तो उसके बाद कई लोगों ने भी वह इनाम लौटाया। इनाम लौटाते ही उनकी आलोचना होनी शुरू हुई। किसी ने बोला लेखक चुक गया, कोई बोला- पब्लिसिटी स्टंट है। किसी ने कहा- पैसा लौटाओ, कोई बोला-'ब्याज सहित लौटाओ।'

मजे कि बात इस पर लोगों ने व्यंग्य लिखे, चुटकुले बने, कार्टून बने। किसी समाज के 40 लेखक किसी बात पर अपनी उपाधियाँ लौटाए, पैसे लौटाए। इसपर समाज के लोग उनकी बात सुनने की बजाए उनकी खिल्ली उड़ायें, उन पर चुटकुलें बनाएं यह देखकर परसाई जी का लेख का वाक्य याद आता है-' शर्म की बात पर ताली पीटना।'
विदेश खासकर रूस, यूरोप से वापस आये लोग अक्सर यह बात कहते पाये जाते हैं कि वहां लेखकों के स्मारक हैं। उनका बड़ा सम्मान है। अपने यहाँ ऐसा नहीँ है शर्मनाक है यह। वही लोग अपने लेखकों की खिल्ली उड़ाते हुए उनको चुका हुआ बताते हैं। मजे कि बात है कि इनमें लेखक बिरादरी के वे लोग भी शामिल हैं जिनका लेखन उनके लेखन के कहीं आसपास नहीं हैं। लेखकों को चुका हुआ और बकवास बताने वालों में से बहुत बड़े प्रतिशत लोगों ने उनका लिखा पढ़ा भी नहीं होगा।

अगर समाज के लोगों को उपाधि लौटाने वालों का रवैया गलत लगता है, उसमें राजनीति लगती है तो उनको समझाना चाहिए, उनको आश्वस्त करना चाहिए कि भाई तुम्हारा सोचना ठीक नहीँ। हाल इतने खराब नहीं हैं। यह न करके लोग उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। उनको गरिया रहे हैं। उनके विरोध को मतलब से प्रेरित बता रहे हैं। उनके विरोध को पब्लिसिटी की भूख बता रहे हैं। मानों लेखक की किताबें फिल्म हैं जिनकी पब्लिसिटी होने से उनकी बिक्री बढ़ जाये। अगर सच में ऐसा कुछ होता तो जिन लेखकों ने उपाधियाँ लौटाई उनकी किताबों की बिक्री बढ़ गयी होती।

बाजार अपने हिसाब से इस घटना को कैश कर रहा है। इनाम वापसी की घटना के चुटकुले को आगे बढ़ाते हुए व्हाट्सऐप पर पत्नी वापसी का चुटकुला तैर रहा है। पत्नी भी सामान हो गयी।

घर-परिवार का कोई सदस्य किसी बात पर नाराज होता है तो बाकी के लोग उसको लुलुहाते हुए घर से बाहर नहीं कर देते। उनकी बात सुनते हैं और मुद्दे का समाधान खोजते हैं। अपने यहां हम जिस भी लेखक ने विरोध किया उसके चरित्र और लेखन प्रमाण पत्र में प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज करके उसको खारिज कर दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति मेरी समझ में बहुत घातक है।

कहाँ से चलते हुए बात कहां तक पहुंच गयी। कहना सिर्फ यही चाहता था कि जो समाज अपने समय के बेहतरीन लेखकों की इज्जत नहीं कर सकता। जो उनके उठाये मुद्दे ,भले ही वह बाद में गलत साबित हों, खुले मन से बात करने को तैयार होने की बजाय उनकी खिल्ली उढाता है, उनकी मंशा को मतलब से प्रेरित बताकर उनके विरोध को खारिज करके छुट्टी पा लेता है वह भले ही जीडीपी में सरपट आगे निकल जाये, विकास के कुलांचे भरने लगे लेकिन वह समाज कभी भी संवेदनशील समाज नहीं हो सकता।

आज न इतवार था। अच्छा बीता होगा। जो बचा उसे भी मजे से बिताएं। मस्त रहें।

Saturday, October 31, 2015

मछली पकड़ना नहीं तालाब खेलना

रॉबर्टसन लेक के किनारे एक झोपडी में कुछ लोग बैठे दिखे। बात की तो पता चला कि वे मछुआरे हैं। सबने अपने-अपने जाल झील में डाल रखे हैं। अभी आठ-दस लोग थे वहां पर। सुबह 7 बजे तक। और लोग आ जाएंगे तब उतरेंगे झील में मछलियाँ पकड़ने।

मछलियाँ पकड़ने तो मैंने कहा। झील में उतरकर मछलियाँ पकड़ने को मछली पकड़ने वाले 'तालाब खेलना' कहते हैं। हमने पहली बार सुना यह। कामकाज से सीधे जुड़े लोगों के शब्द अक्सर उनसे अलग होते हैं जो किताबों में होते हैं। ऐसे ही याद आया कि ट्रक के टायर और ट्यूब के बीच लगने वाले रबड़ के टुकड़े को 'फ्लैप' ख़ास जाता है पर कामगार लोग उसको 'लंगोट' कहते हैं। जनभाषा के शब्द जीवन के ज्यादा नजदीक और सीधे समझ में आने वाले होते हैं।

मछली पकड़ने को तालाब खेलना शायद इसलिए नाम दिया हो लोगों ने क्योंकि जाल डालने मात्र से मछली फंसने की गारंटी नहीं होती। कभी मिली, कभी न मिली। कभी कम, कभी ज्यादा। तालाब में उतरने के बाद खेल की ही तरह होता होगा सब।इसीलिये नाम दिया तालाब खेलना।

बात करते हुए पता चला कि सबने अपने-अपने जाल डाल रखे हैं। जाल कहां पड़ा है उसका निशान रहता है हरेक का। किसी ने कोई प्लास्टिक की बोतल बांध रखी है जाल के ऊपर किसी ने थर्मोकोल का टुकड़ा। कुछ ने कोई निशान नहीं रखा। पर उसको पता रहता है कि कहां है उसका जाल।


मछली पकड़ने का काम सहकारी समिति की देख-रेख में होता है। कुल 87 सदस्य (मछुआरे)हैं समिति के। जब सब आ जाते हैं तभी 'तालाब खेलने' उतरते हैं झील में लोग।सबका इन्तजार शायद इसलिए ताकि किसी के जाल में फंसी मछली कोई दूसरा न ले ले। पर दो-चार-दस कम भी हुए तो भी उतर जाते हैं।

तालाब में उतरने के लिए लोग ट्रक के ट्यूब में हवा भरकर उस पर बांस की खपच्चियां का बैठने के लिए जुगाड़ बनाकर इस्तेमाल करते हैं। इस 'ट्यूब नौका' को क्या कहते हैं ये लोग यह अगली बार पता करेंगे।

 कुछ लोगों के ट्यूब में हवा कम हो गयी थी। लोग उनमें मुंह से हवा भर रहे थे। कुछ लोग नाव से भी जाते हैं तालाब खेलने।

अगर किसी ट्यूब की हवा तालाब में निकल गयी तो क्या होता है? यह पूछने पर बताया गया कि हवा एकदम नहीं निकलती। निकलना शुरू होने पर वह किनारे आ जाता है। कुछ समस्या हुई तो नाव वाले तो होते ही हैं सहायता के लिए।

'तालाब खेलने' के बाद जितनी मछली मिलती है उसको तौला जाता है। 30 रूपये किलो मछली के मिलते हैं मछुआरों को। सोसाइटी इसे 70 किलो बेचती है। फायदे का पैसा सोसाइटी के पास ही रहता है। उससे वह आगे मछली पैदा करने के उपाय के लिए खर्च करती है। जितनी बार पलटी (बिक्री होती) जाती है मछली उतनी ही उसकी कीमत बढ़ती जाती है।

मछली पकड़ने का काम कभी बन्द भी रखते हैं क्या? हमें लगा जबाब मिलेगा -नहीं। पर उन्होंने बताया कि
हां, तालाब को भी रेस्ट दिया जाता है। मतलब कुछ दिन मछली नहीं पकड़ी जाती मतलब तालाब नहीं खेलते। कब रेस्ट देना है यह सोसाइटी के लोग तय करते हैं। सबको मोबाइल पर सूचना दे देते हैं। कल से एक हफ्ते तालाब को रेस्ट देना तय हुआ है।

'मछली पकड़ना भी जीव हत्या है। हम उनको मारते हैं तो इसकी सजा हमको भी मिलेगी। कहां मिलेगी यह तय नहीं होता।' एक मछुआरे ने दार्शनिक अंदाज में कहा।

क्या पता मछलियों को मारने पकड़ने और उनके मारने के अपराध बोध से मन को मुक्त रखने के लिए ही मछली पकड़ने को 'तालाब खेलना' और मछली के लिए 'जल तरोई' जैसे शब्द गढ़े गए हों।

इकट्ठा हुये लोग आपस में चुहल भी कर रहे थे। लोग आते-जाते जा रहे हैं। बैठकर बाकी लोगों का इंतजार कर रहे थे। आमतौर पर आठ बजे तक सब लोग आ जाते हैं। उसके बाद सभी 'तालाब खेलने' के लिए उतर जाते हैं। 12 बजे तक रहते है झील में। इसके बाद अपने-अपने हिस्से की मछलियाँ लेकर बाहर आ जा जाते हैं।

मछुआरों का झील में उतरने का समय हो रहा था और मेरा फैक्ट्री का। लौटते में मैदान में खिले फूल दिखे। इनको किसी ने पूजा के लिए तोड़ा नहीं था। जंगल में खिले खूबसूरत फूलों को देखकर अजय गुप्त जी की कविता पंक्तियाँ याद आ गयीं:

"जो सुमन बीहड़ों में वन में खिलते हैं
वो माली के मोहताज नहीं होते
जो डीप उम्र भर जलते हैं
वो दीवाली के मोहताज नहीँ होते।"


कमरे पर पहुंचकर पोस्ट लिखी।आधी लिख पाये थे कि फैक्ट्री जाने का समय हो गया। बाकी ब्रेक के बाद लिखने की बात कही थी। अब लिखकर पोस्ट कर रहे हैं।

बाकी बचे हुए दिन का आनन्द लीजिये। जो होगा देखा जायेगा।