दो हफ़्ते पहले रहीमदास जी का मक़बरा देखकर लौटते हुए टैक्सी से आए (रपट का लिंक टिप्पणी में)टैक्सी मतलब कैब। गाड़ी में बैठते ही बग़ल के 'गाड़ी-आले' में माचिस की डिब्बी दिखी। माचिस की डब्बी पर ‘ब्लू बार्ड’ का स्टिकर। ‘ब्लू बर्ड’ मतलब नीली चिड़िया।
लगा गाड़ी वाले ने 'सुट्टा-सवारियों' के लिए इंतज़ाम रखा है।
पूछने पर बताया गाड़ी वाले ने,' एक मैडम सिगरेट पीती हैं। उनके लिए ही माचिस रखी है।'
हमने थोड़ी उत्सुकता दिखाई तो गाड़ी वाले ने बताया, 'मैडम सुबह हमारी ही गाड़ी से आफिस जाती हैं। घर के पास ही रहती हैं। रोज सुबह की पहली सवारी मैडम ही होती हैं। किसी आफिस में बड़ी पोस्ट पर हैं। ख़ास सिगरेट पीती हैं। बताती हैं क़ि उसको सबलोग नहीं बेच सकते। लाइसेंस चाहिए उसको बेंचने के लिए।'
मैडम के बारे में और भी कई जानकारी बिना पूछे दनादन साझा की गाड़ी वाले ने। बताया कि मैडम सुबह जाती हैं आफिस, उनके हसबैंड शाम को जाते हैं। जब मैडम वापस आती हैं, साहब के आने का समय हो जाता है। सप्ताहांत में ही साथ हो पाते होंगे।
और भी तमाम बातें हुईं इधर-उधर की। उनमें से ज़्यादातर बिसरा गयीं। पता नहीं वे कैब की दीवारों, शीशों , सीटों ने भी सुनी होंगी या नहीं। कुछ खिड़की के रास्ते बाहर हो गयीं होंगी शायद। क्या किसी तकनीक से उन सब बातों को फिर से सुना जा सकता है?
क्या प्रकृति का अपना कोई रिकार्डर होता है?
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