Friday, November 20, 2015

हम तो 'सड़कपंथी' हैं 'साइकिल पंथी' हैं

आज सबेरे नींद खुली करीब साढ़े चार बजे। पर जगे नहीं काहे से कि अलार्म लगाया था 4.59 का। पहले जग जाते तो अलार्म नाराज होता और कहता- 'पहले काहे उठ गए भाई। का हमपे भरोसा नई है। हमको भी चुनी हुआ सरकार समझ लिया का और सोच भी लिया कि हम अपनी जिम्मेदारी नई निभाएंगे। खाली लफ्फाजी करेंगे।' और भी न जाने क्या-क्या कहता। लोकतन्त्र में किसी का मुंह थोड़ी पकड़ सकते। सो सब आगा-पीछा सोचकर लेटे रहे। इंतजार किया कि अलार्म बजे, फिर जगें।

अलार्म टाइम पर बजा। फिर हम भी जग गए। घर फोनकर घरैतिन को जगाया और कहा आधा घण्टा और सो लो फिर जगा देंगे। वो सो गयीं। हम जगे तो थे ही अब उठ भी गए। कुछ देर मोबाईल पर खुटुर-पुटुर किये फिर ज्ञान चतुर्वेदी की 'हम न मरब' का पारायण करते रहे। आधा घण्टा से कुछ देर और बाद पत्नीजी को जगाया। फिर कपड़े पहनकर दरवज्जे पर कुलुप मार के (ताला बन्द करके) निकल लिए।

मेस के बाहर निकलते ही दो महिलायें तेज चाल से चलती हुई और उससे भी तेज बतियाती हुई दिखीं। वे बहुत जल्दी-जल्दी अपने परिवारों के बारे में कुछ बतिया रहीं थीं। मार्च के महीने में जैसे सरकारी महकमें इस चिंता में फुर्ती से पैसा खर्चते हैं कि कहीं साला बजट न लैप्स हो जाये, अनखर्चा रह गया तो बवाल तो होगा ही बेइज्जती अलग से होगी कि बताओ ससुर बजट तक न हिल्ले लगा पाये। उसी तरह महिलाएं भी लगता है अपनी टहलाई पूरी होने के पहले अपनी बातों का कोटा पूरा कर लेना चाहतीं थीं शायद। इसीलिये वे बहुत जल्दी-जल्दी बतिया रहीं थीं। इफरात बातें उनके मुंह से निकल कर इधर-उधर हवा में टहलने लगतीं।


नाले के पास खेत की फसल कोहरे की चादर ओढ़े तसल्ली से सो रही थी। सूरज की किरणें कोहरे की चद्दर खींचती होंगी पर फसल फिर वापस चद्दर खींचकर, कुनमुनाते हुए, करवट बदलकर सो जाती होगी। आसपास के बुजुर्ग पेड़ फसल को इस काम में बाहर से समर्थन सा दे रहे थे। सूरज की किरणों को अपनी पत्तियों, टहनियों में उलझाकर खेत के पास जाने से रोक रहे थे। ऐसे ही जैसे नकल कराने वाले स्कूलों के प्रबन्धक फ़्लाइंग स्क्वायड की जीप रोकने के लिए स्कूल के बाहर या तो सड़क खुदवा देते हैं या कोई और मुफीद इंतजाम करते हैं।

आगे सड़क पर एक महिला सर पर तसले में गोबर लिए फुर्ती से चली जा रही थी। हमने फोटो लिया तो बोली--'गोबर का फोटो ले रहे हो?' हमारा मन किया कहें-'यही तो आजकल चर्चा के केंद्र में है।यही तो भरा है बहुतों के दिमाग में आजकल।' पर फिर बोले नहीं। यह कहा-'अरे न। तुम्हारा खींचा फोटो। बढ़िया आया है।' पर यह सुनने के लिए उसे फुर्सत नहीं थी। वह तो सरपट चली गयी आगे।

एक जगह सड़क की फुटपाथ पर कब्जा करके चबूतरा बनाया गया था। चबूतरा सड़क से मात्र 6 इंच ही ऊँचा रहा होगा। कुछ इस तरह कि चबूतरा वाला मोहल्ले वालों से ऐंठकर कह सकता है ' जे तो हमाओ चबूतरा है।' पर अगर पुलिस पूछे तो कह सके- 'साहब जे तो सड़क है। यहां सवारी नहीँ चलती ऊंचा होने के चलते तो हम बैठ जाते हैं।।बैठते हैं तो लीप भी देते हैं।'

आदमी चबूतरे पर तीन कुर्सियां जमा रहा है। लगा मानो महागठबन्धन का शपथ समारोह यहीं होगा। थोड़ी धूप निकल आने पर इन्हीं कुर्सियों पर विराजकर पचास मीटर दायें पचास मीटर बाएं सड़क पर आने जाने वालों को निहारते-ताड़ते हुये गर्दन और आँख की कसरत करेंगे। यही सौ मीटर की दूरी इनके लिए कश्मीर से कन्याकुमारी होगी जिसे इन कुर्सियों पर बैठने वाले सूरज भाई से मुफ़्त और इफरात में मिलने वाली विटामिन डी टूंगते हुए देखते रहेंगे।


आगे खेत की फसल उलझी हुई सी दिखी। जैसे सोकर उठी नायिका के बाल उलझ जाते हैं वैसे ही खेत में बालियां एक दूसरे पर लस्टम-पस्टम पड़ी हुईं थी। अलसाई सी। कोहरे का चादर सूरज की किरणों ने खींचकर अलग कर दिया था।हल्की सर्दी थी इसीलिये बालियां अपने में सिकुड़ी चुप बैठीं थीं। कुछ देर में हवा जब बाग़-बगीचों से टहलकर वापस आएगी तब इनकी उलझी लटें सुलझाएगी। तब ये फिर से इठलाते हुए झूमेंगी।
बिरसा मुंडा चौराहे पर अर्से बाद चाय पी। हफ्तों पहले के बकाया पांच रूपये की चाय पीकर सुकून हुआ कि पैसा वापस मिल गया।

वहीं चौराहे पर हरनारायण रजक मिले। ठेले पर चने की सब्जी और मूली बेंच रहे थे। चना 15 रूपये किलो। 1000 रूपये की सब्जी थी ठेले पर। बोले- घण्टे-दो घण्टे में बिक जायेगी।100/150 निकल आएंगे। फिर और रखी है पास में बोरे में वो बेंचेगे। पाटन से आती है सब्जी।

हमने कहा-'खड़े-खड़े थक जाते होगे। स्टूल रख लो।' बोले-'आदत हो गयी है। 12 घण्टे खड़े/टहलते रहते हैं। थक जाते हैं तो 'क्रेट' पर बैठ जाते हैं। नीचे सड़क पर पड़े मूली के पत्ते के लिए हमने कहा कि उनको इकट्ठा करके रख लिया करो। खिला दिया करो किसी जानवर को। सड़क पर गन्दगी भी न होगी। इस पर वह बोले-'यहीं खा लेती है आकर गाय। सड़क की सफाई वाले भी आते हैं।'

वहीं दुकान पर पांच महिलाये फुटपाथ पर बैठी चाय पी रहीं थीं। भंगिमा से ही लगा कि वे कामगार हैं। पता चला सड़क सफाई कर्मचारी हैं। 'पलमामेंट' वाली। सुबह 5 बजे से ड्यूटी है। सात बजे चाय पीते हुए दिखीं। सफाई अभी शायद शुरू नहीं हुई थी।

लौटते में एक आदमी सड़क पार करता दिखा। वह अपना दांया हाथ हिलाता हुआ सड़क सीधे पार कर रहा था। एकदम अनुशासित 'सड़क सिपाही' सा। सड़क पार करते ही उसने हाथ सिग्नल की तरह नीचे गिरा लिया।
दाईं तरफ हाथ देते हुए सड़क सीधे पार करने की कार्रवाई को कोई वामपंथी देखता तो शायद कहता - 'ये दक्षिणपंथी लोग हमेशा से ऐसा करते आये हैं। सिग्नल दायीं तरफ का देंगे पर जायेंगे सीधे।इनकी किसी बात का भरोसा नहीँ। ' पर हम तो वामपंथी हैं नहीं सो हम इस बात को नहीं न कहेंगे। हम तो 'सड़कपंथी' हैं 'साइकिल पंथी' हैं उसी का किस्सा कहेंगे।

आगे एक ऑटो पर दो बच्चे बैठे थे। ड्राइवर ऑटो को स्टार्ट मोड में छोड़कर कहीं चला गया था। बच्चे ड्राइवर का इन्तजार करते बैठे थे ऑटो में। इंजन भी लगता है था कि झल्लाते हुए चल रहा था भड़भड़ाते हुए। इंजन को गुस्सा आ रहा होगा कि वह तो सरपट चल रहा है पर ससुरे पहिये आराम फर्मा रहे हैं सड़क पर खड़े खड़े। हरेक को दूसरे का आराम अखरता है भाई।

दीपा के घर में आज भी कोई नहीं दिखा। ओवरब्रिज के नीचे महिला खाना बना रही थी। जिस टीन की चादर में सड़क बनाने का कोलतार और गिट्टी गरम की जाती है उसी तरह की टीन की चादर पर रोटी सेंक रही थी वह। उसके पीछे उसका आदमी दांये-बाएं झांकता हुआ बीड़ी सुलगाते हुए फेफड़े और फिर बाहर की हवा को गरम कर रहा था।

क्रासिंग बन्द थी। टेम्पो में केंद्रीय विद्यालय की बच्चे ठुंसे हुए बैठे थे। उनके पीछे उनके बस्ते ठुंसे थे। क्रासिंग खुलने पर हम आगे बढ़े।

एक आदमी सड़क पर तेजी से टहलता हुआ दातून करता हुआ जा रहा था। वह जिस तरह से केवल एक तरफ के ही दांत पर दातुन रगड़ रहा था उसे देखकर लगा कि कहीं दूसरी तरफ के दांत छोड़ तो नहीं देगा वह। ऐसा होगा तो फिर छूटे हुए दांत हल्ला मंचायेंगे। इस सोच के पीछे कल की एक खबर थी जिसके अनुसार फसल मुआवजा केवल उन्हीं इलाके के लोगों मिला जहां से सत्ताधारी पार्टी के लोगों को वोट मिला। बाकियों को ऐसे ही टहला दिया।

कहां-कहां टहला दिया आपको सुबह-सुबह। चलिए अब आप मजे कीजिये। हम भी चलते हैं दफ्तर। बोलो सन्तोषी माता की जय। अरे आज शुक्रवार है न भाई इसलिए बोला। और कोई खास बात नहीं।

Thursday, November 19, 2015

निर्रथक और बेनतीजा बहस

सुबह जल्दी जग गए। जग गए का मतलब उठ जाना नहीं होता न। जल्दी जगे तो फिर सो गए। फिर जगे। मल्लब किस्तों में कई बार सोये। जब सोये तो जगे भी। फाइनली 5 बजे जगे और हिम्मत करके टीवी खोल दिया। 'पेरिस पर्दा' खुला गया। धड़ाधड़ फायरिंग हो रही थी। हम सहमकर सिकुड़ गए। न सिकुड़ते तो क्या पता एकाध गोली के साथ हमारा भी गठबंधन हो जाता। फिर तो पक्का प्रमुख समाचार बनता।

टीवी पर फायरिंग खत्म होते ही बहस होने लगी। आतंकवादियों पर आतंककारी बहस। किसी ने बताया कि पुतिन बोले हैं कि 40 देश आईएसआईएस वालों को पैसा देते हैं। हथियार देते हैं।पेट्रोल खरीदते हैं उनसे। पता नहीँ कौन देश हैं। पर आतंकवादी गतिविधियों पर विकसित देश के रवैये देखकर मेरे जेहन में मेराज फैजाबादी का यह शेर चहलकदमी करने लगता है:
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फिर जलते हुए शहरों में पानी बेचना ।


बाजार है भाई। अपना हथियार भी बेचना हैं यहां और सुरक्षा तकनीक भी। मजबूरी है यह सब करना।
जब ज्यादा सुबह हुई तो निकल लिए साइकिल स्टार्ट करके। मेस से निकलते ही दो टेम्पो धड़धड़ाते हुए सामने से निकले।स्कूल जाने वाले बच्चे अंदर बैठे थे। उनके बस्ते टेम्पो की छत पर थे। बच्चे टेम्पो के अंदर और बस्ते छत पर ठिठुर रहे थे।

मोड़ पर एक गाय खड़ी पूंछ उठाकर जलधार से धरती को सींच रही थी। उठी पूँछ के नीचे पतला गीला गोबर चिपका हुआ था। ऐसा लग रहा था कि गाय का पेट खराब है। दस्त लगे हुए हैं। शायद बाजार की कोई उल्टी-पुल्टी चीज खा ली। आम इंसान होता हो सब खाना बन्द करके खिचड़ी पर उतर आता। पर ये तो गौ माता हैं। ये या तो पूजा के काम आती हैं या फिर दंगे के। इनको कहां नसीब यह सब सुविधाएँ। इनके पेट के लिए तो वही सड़क का खाना और इफरात में पालीथीन ही सुरक्षित हैं।

एक बुजुर्ग धोती पहने तेजी से चलते चले जा रहे थे। धोती दोनों तरफ घुटनो के ऊपर तक उठी हुई थी। सड़क की हवा उचककर घुटनों से होते हुए और ऊपर जाँघों तक पहुंच रही थी। शायद हवा की ठंडक से बचने के लिए ही बुजुर्ग वार तेजी से चले जा रहे थे।

स्कूल के सामने बच्चे जमा होकर अंदर जाने की तैयारी कर रहे थे। कुछ बच्चे गाड़ियों से आ रहे थे। सामने से आने वाली गाड़ियों के इंडिकेटर बायीं तरफ और पीछे से आने वाली गाड़ियों के इंडिकेटर दायीं तरफ का बल्ब जलाते दिख रहे थे। इससे एक बार फिर लगा कि कहीं पहुँचने के लालच में आदमी तो आदमी गाड़ी तक अपनी सुविधा के हिसाब से वामपंथी या दक्षिणपंथी हो जाती है।

आज फिर दीपा से मिलने गए। वह थी नहीं अपने ठीहे पर। न उसके पापा का रिक्शा। शायद गाँव गए हों।
वहीं ओवर ब्रिज के नीचे एक आदमी अपनी पत्नी के साथ खाना बनाते हुए एक जंग लगे लोहे की बेडौल प्लेट पर अपनी बीड़ियां सुखा रहा था। बताया कि खुद बनाता है अपने लिये बीड़ी। तम्बाकू गांव से लाता है। पत्ती शहर से। कैंची से पत्ता काटकर तम्बाकू भरकर बीड़ी बना लेता है। दिन में 10-15 बीड़ी फूंक लेता है।

कुंडम के रहने वाले उस दिहाड़ी मजूर ने बताया कि आजकल कटाई का सीजन चल रहा है इसलिए ज्यादातर लोग गाँव गए हैं। इसीलिये पुल के नीचे मजदूर दिख नहीं उसके अलावा। वह भी गया था घर। धान काटकर लौट आया। दिहाड़ी में रोज 250/- मिल जाते हैं।

बात करते हुए दातुन चबाते हुए उस आदमी की साथिन कपड़े उठाकर नहाने चल दी। कुछ देर बाद वह आदमी भी। चूल्हे पर दाल अकेले चुपचाप धीरे-धीरे फुदकती हुई चुरती रही।

'चुरती' से याद आया कि हरदोई में लोग हरद्रोही मतलब भगवान का विरोधी होने की परम्परा निभाते हुए 'र' का उच्चारण नहीं करते। हरदोई को 'हद्दओई' कहते हैं। उरद(उड़द) की दाल फुदुर-फुदुर चुरती है का 'र' गोल करके 'उद्द की दाल फुद्द-फुद्द चुत्त है' कहने का रोचक चलन है।

लौटते हुए एक बुजुर्ग बेंत लेकर टहलते हुए दिखे। हाथ से बेंत जिस तेजी से हिला रहे थे उससे लगा कि वे बेंत से अपने आगे की हवा को धकियाकर अपने आगे निकलने की जगह बना रहे हों।

सड़क पर चहल पहल बढ़ गयी थी। ऊपर आसमान में भी सूरज भाई पूरे धज के साथ बिराजे हुए थे। उनको देखकर ऐसा लग रहा था कि आसमान के स्टूडियो में किसी एंकर सरीखे बैठे हैं। बस बाकी के प्रवक्ता आ जायें तो निर्रथक और बेनतीजा बहस शुरू करें।

सामने बगीचे में धूप खिली हुई है। कठिन समय में खुशनुमा उम्मीद सी। चिड़ियां चहचहा कर गुडमार्निंग कह रहीं हैं। आपको भी सुनाई दे रहा होगा। अब चलिये। दिन की शुरुआत कीजिये। अच्छे से रहिये। मस्त। बिंदास।

Wednesday, November 18, 2015

दम मारो दम

सुबह निकले आज तो लगा सर्दी होने लगी है। लोग सड़क पर कम दिख रहे थे। एक बुजुर्गवार पूरे शरीर को गरम कपड़े में ढंके खरामा-खरामा चले जा रहे थे। पुलिया पर एक सुबह टहलुआ बैठे खांसते हुए सड़क ताक रहे थे।

दो बच्चे पीठ पर बस्ता लादे, कन्टोपा पहने बतियाते हुए चले जा रहे थे। स्कूल के सामने अभी भीड़ नहीं थी। जाड़े में देर से खुलने लगे होने स्कूल।

आगे महिलाओं की दो पीढियां टहलती , गपियाती जाती दिखीं। युवा पीढ़ी स्वेटर, जीन्स में चुस्त, दुरुस्त टाइप और बुजुर्ग पीढ़ी शाल सलवार कुर्ते में सहज विस्तार के साथ चली जा रही थीं। उनके आगे टहलते एक आदमी को देखकर लगा कि प्रकृति ने महिलाओं को सृजन की महती जिम्मेदारी दी है तो सहज सौंदर्य भी उसी के साथ पुरुष के मुकाबले बेहतर प्रदान किया है।

एक जगह एक आदमी सड़क पर बनी हनुमान जी की प्रतिमा के सामने झुका पूजा जैसी कुछ कर रहा था। सर जमीन पर टिका था हनुमान जी की अर्चना में। उसके नितम्ब पीछे तोप की तरह ऐसे उठे थे मानों उससे सूरज भगवान को सलामी दे रहा हो। 'मल्टी टास्किंग' की तर्ज पर दो भगवानों को एक साथ पटा रहा था। पता नहीं किससे काम बन जाए।

पूजा करते हुए वह कुछ बोलता भी जा रहा था। उसके बोल शिकायती से थे। वो तो कहो हनुमान जी सड़क पर थे जो उसकी आवाज सुन ले रहे थे क्योंकि कोई और भक्त था नहीं वहां। किसी प्रसिद्ध मन्दिर जहां प्रसाद ज्यादा चढ़ता है वहां इत्ती देर बात करने की परमिशन थोड़ी देता पुजारी। बाहर कर देता दो मिनट में--'चलो आगे बढ़ो' कहते हुए।

पंकज टी स्टॉल पर एक आदमी चाय पीता हुआ मिला। नाम राजू । उम्र करीब 32 साल।उसके पैर के नाखून आगे को निकले हुए थे। उसी से बात शुरू हुई - 'नाखून दर्द करते होंगे?' बोला -'हां, बहुत दर्द करते हैं किनारे'।
हमने बताया-'दवा कराओ। ये फंगस है। हमारे भी है नाखून में। साल भर इलाज चलेगा।ठीक हो जाएगा।' बोला-'हौ। कराएंगे। दवाई ली थी। फायदा हुआ। दर्द कम रहा। दवा बन्द कर दी। अब फिर दिखाएँगे।'

पता चला वह नगर निगम में सफाई का काम करता है। सड़क पर झाड़ू लगाता है। 1 बजे तक ड्यूटी करता है। आठ घण्टे की ड्यूटी। मतलब 5 बजे आया होगा। ठेकेदार 4000 रूपये महीना देता है। महीने में काम के दिन अगर 25 मान लें तो 160 रुपया रोज के। आज के दिन जबलपुर में न्यूनतम वेतन 260 से ऊपर ही है। मतलब इससे काम भुगतान देने वाले को जुर्माना लगेगा। सजा होगी।

पर ऐसा धड़ल्ले से हो रहा है। 100 रुपया रोज काम दिया जा रहा है। महीने में 2500 रूपये प्रति आदमी काम भुगतान हो रहा है। जबकि नगर निगम या किसी भी संस्थान से भुगतान पूरा होता है। यहाँ कम से कम 100 रूपये का प्रति आदमी का हेर फेर बिचौलियों के पास जाता है। इसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता। कोई कर नहीँ दिया जाता इस पर। यह 'ब्लैक मनी' किसी स्विस बैंक में नहीं जाती। यहीं टहलती है सीना ताने संस्कारधानी की सड़कों पर, दुकानों पर, माल्स में, बाजार में। देश भर का हिसाब देखा जाए तो अरबों रूपये रोज का काला धन पैदा होता देश में और यहीं खप जाता है।

जहां भी सरकारी पद समाप्त करके व्यवस्थाएं ठेके पर दी गयीं हैं वहां और कुछ भले न हुआ हो पर मजदूरों का शोषण और न्यूनतम वेतन क़ानून को ठेंगा दिखाते हुए काले धन का सृजन सुनिश्चित हुआ है।

राजू की आँखें बड़ी-बड़ी। चेहरा एकदम काला। दांत सफेद। बांदा के रहवासी। हमने पूछा -वहाँ टुनटुनिया पहाड़ देखा है, केन नदी में नहाये कभी तो वो बोला नहीं। बहुत पहले गए थे।

एक और आदमी आ गया वहां। उसके साथ आड़ में जाकर चिलम संवारने लगा राजू।। बताया कि 11 साल के थे तबसे गांजा पी रहे। साथ के आदमी ने बताया -'बेनीबाग थाने के सामने खुल्ले आम बिकता है गांजा। बोरी भर गांजा रोज बिकता है। जे मोटी गड्डी नोटन की थाने वालन को मिलती हैं। कोउ कछू न बोलत। हम 20 रुपया की पुड़िया लाये। दो टाइम की फुरसत। सुबह मिल जात। दोपहर बाद तो 500 के नीचे मांग लेव तो ऐसे देखत कि न जाने कहां ते चले आये।'

हमने उससे कहा-'तुम लोग सुबह-सुबह गांजा पीते हो। सांस लेते नहीँ बनती। हाँफते हो। ऐसा भी क्या नशा करना?'

इस पर उसने नई पीढ़ी के किस्से सुनाने शुरू कर दिए- 'आज कल के लौंडे तो 20 रुपया की कच्ची लेत ग्लास में और 2 रुपया की उबली टांग और पी के मुंह पोंछ के चल देत।' उसके बयान से लग रहा था किसी राजनैतिक पार्टी का प्रवक्ता अपनी सरकार के किसी घपले-घोटाले के बचाव में दूसरी पार्टी की सरकारों के बड़े घपले-घोटाले गिनाने लगा हो।

राजू की शादी नहीं हुई है। करना चाहते हैं ताकि कोई रोटी बनाने वाली आये। औरत का सुख मिले। हमने कहा-'तुम गांजा पीते हो तो कौन लड़की तुमसे शादी करेगी?' इस पर वह बोला-'अब छोड़ देंगे।'

32 साल का आदमी जो 21 साल से गांजे का लती हो कहे कि अब गांजा छोड़ देंगे सुनकर ऐसा ही लगा जैसा किसी नई सरकार का मुखिया कहे-'हम भृष्टाचार जड़ से मिटा देंगे।'

वहीं एक बच्चा बैठा चाय पी रहा था। 12 वीं में पढ़ता है। कामर्स की ट्यूशन पढ़ने जा रहा था सुबह 7 बजे। पापा पीडब्ल्यूडी में काम करते हैं। हमने पूछा चाय पीकर घर से नहीं चले? बोला- नहीं।

इतने में जीसीएफ के कर्मचारी आ गए। हमने बताया की 7 वें पे कमीशन में 33/60 की रिटायरमेंट स्कीम नहीं लागू होगी। सुनते ही वह लपककर खुश हुई। चेहरे पर चमक धारण करके पूछा- कब आई यह खबर। हमने कहा- कल रात देखी टीवी पर। वे खुश तो हुए सुनकर पर मुझे लगा कि जब भी खबर देखेंगे अखबार में या टीवी पर तो उलाहना देंगे- हम तुम्हारा यहाँ इन्तजार करते रहे और तुम मेरे पास इत्ती देर से आयी। बहुत नटखट खबर हो तुम।

हम तो बस प्राणपंथी हैं, जानपंथी हैं

चाय की दुकान से तालाब की तरफ चले आज। रास्ते में एक उजाड़ सी जगह पर उगी घास को गाय और सांड ब्रेकफास्ट की तरह चर रहे थे। वहीँ के रहवासी एक लडके को गोवंश का यह सुख देखा नहीं गया। उसने घटनास्थल से ही एक पत्थर उठाकर चरते हुए जानवरों की तरफ फेंका। विकसित देशों के ड्रोन हमलों की तरह उसका भी निशाना चूका और पत्थर दूर जाकर सुस्ताने लगा।

पत्थर लगा भले न हो लेकिन गोवंश के लोग वहां से हड़बड़ाकर फूट लिये जैसे लाठीचार्ज के समय पुलिस के लाठी सड़क पर पटकते ही सड़क की भीड़ तितर-बितर हो जाती है। जवान सांड़ तेजी से भागा तो उसकी पीठ पर का तिकोना मांस दायें-बाएं हिलने लगा। मांस का त्रिभुज इतनी तेजी से हिल रहा था कि पता लगाना मुश्किल कि वास्तव में वह वामपंथी है या दक्षिणपंथी।अगर कोई उसको रोककर उस समय पूंछता कि बताओ तुम्हारी आस्था वामपंथ में है या दक्षिणपंथ में तो शायद वह कहता कि भैये हमारी आस्था न वामपन्थ में है न दक्षिणपन्थ में। हमारी आस्था तो 'प्राणपंथ' में हैं।जिस पंथ पर चलने में हमारे प्राण बचे उसी पंथ के अनुगामी हैं हम। हम न वामपंथी हैं न दक्षिणपंथी। हम तो बस प्राणपंथी हैं, जानपंथी हैं।


सांड के आगे ही एक बछिया भी, जो जल्दी ही गाय कहलाने लायक बड़ी हो जायेगी, तेजी से भागते हुए पीछे देखती जा रही थी। युवा सांड उसके पीछे अब ब्रिस्क वाक सा करता हुआ जा रहा था। जिन लोगों ने इन लोगों का घास चरना और इन पर पत्थर से हमला नहीं देखा वे अभी इनको आगे- पीछे भागते-चलते देखें तो शायद कहें कि देखो ससुरा सांड जवान बछिया के पीछे लगा है दिन दहाड़े। क्या पता कोई इसी बात पर सांड को गरियाते हुए पत्थर न मारने लगे। हो तो यह भी सकता है कि कोई बछिया को ही गरियाये -बहुत गर्मी चढ़ी गई है इसको सुबह-सुबह।

यह सब इस बात का बस एक उदाहरण है कि किसी घटना पर आपकी प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि आप उससे कब और कैसे जुड़े। कोई जान बचाकर भागते जानवरों को सहज कामुक इरादे से सड़क पर भागता समझ सकता है। कोई अपने घर के पीछे उगी घास की रक्षा करने के लिए लड़के द्वारा आवारा पशुओ पर चलाये ठेले को गोवंश पर खुलेआम अत्याचार मानते हुए उसे थपड़िया सकता है। है कि नही?

मैदान पर एक आदमी सामने उगे सूरज की सीधे आराधना करता हुआ ऐसी मुद्रा में खड़ा हो जिसे देखकर लगा मानो वह सूरज भाई से विडियोचैट कर रहा हो।

तालाब किनारे पहुंचे तो देखा कि लोग तालाब खेलने के लिए तैयार हो रहे थे। कुछ लोग ट्यूब में मुंह से हवा भर रहे थे। कुछ नाव से पानी उलीचकर बाहर कर रहे थे। उलीचने के लिए स्टील की प्लेट का इस्तेमाल कर रहे थे लोग। लोग अपने पैंट उतारकर किनारे रखकर पटरा वाले जांघिये या अंडरवियर में 'ट्यूबनाव' पर सवार होकर लकड़ी की छोटी-छोटी डंडियों को चप्पू बनाये पानी में उतर गए।


नाव वाले चप्पू लिए हुए थे। एक नाव वाले के पास शायद चप्पू नहीं था तो वह जिस प्लेट से वह नाव का पानी उलीच रहा था उसी से तालाब का पानी इधर-उधर करते हुए प्लेट को चप्पू की तरह चलाते हुए उधर की तरफ चल दिया जिधर बाकी साथी गए थे।

तालाब में आज छोटे जाल डाले गये हैं क्योंकि बाजार में मछली की खपत कम है। मछली भी कम हैं तालाब में। जब बड़ा जाल डाला जाता है तो ज्यादा लोग आते हैं 'तालाब खेलने'। कुल 80 लोगों में आज 26 लोग आये थे।
किनारे कुछ लोग थे। वे मछली पकड़ने नहीँ गए। वे व्यवस्था देखते हैं। मछली पकड़कर लाने पर 30/- किलो मिलता है मछुआरों को। अगर कोई मछुआरा मछली खरीदना चाहें तो 80/- किलो मिलती है। कोई ग्राहक चाहे तो 120/- किलो। जो पैसा बचता है सोसाइटी में उसको तालाब में ही लगा दिया जाता है।

तरह-तरह की मछलियाँ हैं तालाब में। कोई मौरम में फलती है तो किसी को कीचड़ रास आता है। तालाब दिन पर दिन देखते-देखते सिकुड़ गया। तालाब किनारे के तमाम मकान तालाब को पाटकर बनाये गए हैं।
तालाब किनारे कई जगह घाट पर छठ पूजा का कार्यक्रम चल रहा था। भजन आरती की आवाज सुनाई दे रही थी।

इतने में दो पुलिस वाले मौका मुआइना के लिए आये फटफटिया पर वहां। हमने पूछा कि इनको भी कुछ देना पड़ता है क्या मछुआरों की तरफ से? वो बोले- नहीं।

तालाब से लौटते हुए साइकिल में हवा भरवाई एक जगह। दीपा से मिलने गए। उसका घर बंद था। शायद स्कूल चली गयी हो। अब शाम को या कल जाएंगे।

कमरे पर आकर चाय पीते हुए पहला हिस्सा पोस्ट किया आज के रोजनामचे का। बाकी का हिस्सा यह रहा। आज छठ की छुट्टी है।अब आप मजे कीजिये। मस्त रहिये। आपका दिन शुभ हो मंगलमय हो। जय हो। विजय हो।।
 

बूँद-बूँद से घड़ा भरता है


Monday, November 16, 2015

आलस्य की संगत हिंसाबाद भी रोकती है

कल जब स्टेशन पहुंचे तो अँधेरा हो गया था। ट्रेन समय से चल रही थी। पिछले स्टेशन पर 8 मिनट पहले ही पहुंचकर सुस्ता रही थी।

दो आदमी आपस में गाय के बारे में बात कर रहे थे। इतने विस्तार से गोया 'गाय पर निबन्ध' प्रतियोगिता में भाग ले रहे हों। एक ने कहा-'दूध छूटने पर सब छुट्टा छोड़ देते हैं। अरे भाई जब दूध के लिए पाली है तो बाद में भी निभाओ।' दूसरा बोला-'हमारे इधर तो 'परक' गयी हैं गायें। सबेरे-सबेरे मुंडी... मारती हैं दरवाजे पर। जीभ से कुण्डी हिलाती हैं। भैंस कभी कोई नहीं दिखती सड़क पर।' दोनों लोग इस बात पर एकमत थे कि आजकल कोई मुसलमान गाय नहीं रखना चाहता इस डर से कि पता नहीं कब कोई बवाल कर दे।

एक लड़की लोहे की सन्दूक पर बैठे सन्दूक बजाती जा रही थी।

ट्रेन समय पर आई। बैठकर फिर से चेक किया कि बोगी और सीट वही है न जिसका रिजर्वेशन है। चेक करके जो सांस ली उसके बारे में अब्भी तक तय नहीं कर पाये कि वह सुकून की थी कि सन्तोष की। चैन की या फिर इत्मिनान की। बस यही कन्फर्म है कि वह थी।

डब्बे में भीड़ थी। पूरा भरा। जितनी बर्थ उससे ज्यादा यात्री। शायद इसीलिये टीटी डब्बे में आया नहीँ। उसके करने के लिए कुछ था नहीं डब्बे में। कोई खाली बर्थ थी नहीं अलाट करने के लिए तो काहे को समय बर्बाद करता।

3 टायर स्लीपर कोच होने के चलते डब्बा पूरा गुलजार था। लोग खूब बतिया रहे थे। चुहल कर रहे थे। एसी डब्बे में होते तो ज्यादातर यात्री अब तक कम्बल ओढ़कर लुढ़क गए होते।

एक लड़का फोन पर किसी को प्रेमपूर्ण ढंग से हड़का रहा था-'हम आपको बहुत इज्जत से बता रहे हैं कि गुरसहायगंज की पुलिस जब कलकत्ता पहुंचकर आपसे मेरे मोबाइल के बारे में पूछताछ करे तो हैरान मत होना।हम जिसकी इज्जत करते हैं उससे दो बार जी लगाकर बात करते हैं। इसीलिये आपको जी जीजा जी कहा।'

एक लड़का गैलरी से गुजरा तो उसने शीशे में चेहरा देखा अपना। सर के बाल उँगलियों के कंघे से काढ़े। फाइनली चेहरा एक बार फिर से देखा। फिर से झटककर आगे चला गया।

बगल का लड़का कोलकता का रहने वाला है। लखनऊ आया था काम से तो जबलपुर अपनी बहन से मिलने जा रहा है। नहीं जाएगा तो शिकायत करेगी बहन -'लखनऊ तक आये और मिलने नहीं आये।' आधारताल में रहते हैं जीजाजी उसके।

ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी। कुछ देर ज्यादा रुकी रही तो यात्रियों ने उतरकर प्लेटफार्म की दुकान वाले के सब समोसे खरीदकर खा लिए और उसकी सारी चाय पी डाली। समोसे खत्म करने के बाद रेलवे को गरियाना शुरू किया कि गाड़ी कहाँ बीच में खड़ी कर दी ससुरों ने। कुछ देर बाद जब ट्रेन चल दी तो प्लेटफार्म से उचककर लोग ट्रेन में धँस लिए। एक ने कहा -'यार मेरा तो मन किया कि यहीं प्लेटफार्म पर चद्दर तान के सोया जाये।'

कुछ लोगों ने प्लेटफार्म वाले दुकानदार की किस्मत से ईर्ष्या की कि उसके सारे समोसे बिक गए। भला हो कि यह किसी ने नहीं कहा कि दुकानदार की सिग्नल वाले से सेटिंग थी कि वह सिग्नल तब तक नहीं देगा जब तक उसके सब समोसे बिक न जाएँ।

रात होते होते यात्री लोग मुंडी झुकाकर अपने-अपने घर से लाया हुआ खाना टूंगने लगे। खाना खाकर बीच वाली बर्थ को जंजीर से टांगकर लोग अपनी-अपनी बर्थ पर जमा हो गए। जिनके रिजर्वेशन नहीं थे और जो अभी तक सर ऊँचा किये बैठे थे सीटों पर वे अब जहाँ-जहाँ सर झुकाकर नीचे वाली रिजर्व सीटों के पैताने बैठ गए।

रिजर्व सीटों वाले लोग उनको बैठने से मना भले न कर रहे हों पर चद्दर/कम्बल ठीक करने के बहाने जाने/अनजाने पैताने बैठे लोगों को लतियाने लगे। वे लोग बेचारे कुनमुनाकार रिजर्व बर्थ की सवारी की लातों के हिसाब से खुद को एडजस्ट करते रहते।

और रात होने पर कुछ लोग दो सीटों के बीच की जगह पर पसरकर लेट गए और कालान्तर में सो भी गए। कहीं-कहीं दो लोग चिपटकर सोये। उनके चेहरे पर अंतत पीठ टिकाकर सोने के सुकून का झंडा फहरा रहा था।

सुबह आँख खुली तो ट्रेन कटनी पहुँच चुकी थी। मन किया उठकर चाय पी जाए। लेकिन आलस्य ने बरज दिया-'अरे अभी कहाँ। आगे पीना। अभी आराम करो कुछ देर और यार।' हमने भी अपने जिगरी दोस्त आलस्य की बात मान ली और करवट बदलकर फिर से सो गए।

आगे सिहोरा स्टेशन पर चाय वाले ने चाय-चाय का हल्ला मचाया। हल्ला मचते ही हम हड़बड़ाकर उठे। कुछ ज्यादा ही हड़बड़ हुई तो आलस्य बिदककर दूर चला गया। हमने उस समय तो ध्यान नहीं दिया पर जब चाय पीते हुए ध्यान गया तो पुचकारा तो फिर पास आ गया आलस्य। हमने आराम से अलसाते हुए चाय पी। बीच में मन किया कि चाय वाले को कोसें कि वह पनियल, मीठी चाय 10 रूपये में थमाकर चला गया। पर आलस्य ने बरज दिया-'काहे को फालतू में खून जलाओगे? मस्त रहो।' हमने गरियाना स्थगित कर दिया।

आलस्य की संगत इस मामले में बहुत अच्छी है कि वह हिंसाबाद भी रोकती है।

स्टेशन आने वाला जानकर हलके होने के लिए चले। देखा कि एक भैया अपने चौड़े मोबाईल में कोई पत्ते मिलाने वाला खेल खेल रहे थे। अगल-बगल के चार यात्री उनके मोबाईल में मुंडी घुसाये खेल देख रहे थे। पत्तों का जोड़ा बनते ही पत्ते सीन से गायब हो जा रहे थे। ऐसे जैसे प्रेम करने वालों के बीच से रोमांच और प्रेम गायब हो जाता होगा - उनका विवाह होने के बाद।

शौचालय की खिड़की टूटी हुई थी। नीचे पड़े कांच से लग रहा था कि किसी का ताजा शौर्य प्रदर्शन है। कांच टुकड़े-टुकड़े होकर फर्श पर पड़ा था। कुछ कांच के टुकड़े जो क्रांतिकारी टाइप के रहे होंगे वो फ्लश होकर शौचालय के रस्ते बाहर हो गए होंगे। किसी जगह पटरी पर पड़े गिट्टियों की गोद में पड़े अपने घाव सहला रहे होंगे। कोई उनका नाम लेने वाला भी नहीं होगा।

गाड़ी रुकी स्टेशन पर। हम उतरकर मेस में आ गए। अब्बी कमरे पर पहुंचकर सबसे पहला काम चाय मंगाने का किया। चाय आ रही है।

येल्लो देखो सूरज भाई भी आ गए। किरणें, उजाला, रौशनी, उजास अपने संगी-साथियों के साथ धड़धड़ाकर कमरे में घुस आये। कमरा पूरा गुलजार हो गया इत्ते दिन बाद सबसे मिलकर। हमको भूल ही गया निगोड़ा। हम सूरज भाई के साथ बतियाते हुए चाय पी रहे हैं। आप भी आइये फटाक देना वर्ना चाय ठण्डी हो जायेगी।

आपका दिन मंगलमय हो। हफ्ते की शुरुआत चकाचक हो। जय हो।

Saturday, November 14, 2015

ज्ञानजी सबसे प्रयोग धर्मी ब्लागर हैं

आज बाल दिवस है। बाल दिवस पर ज्ञान दिवस भी होता है।।ज्ञान दिवस मतलब Gyan Dutt जी का जन्मदिन। ब्लॉगिंग के दिनों में ज्ञान जी की पोस्ट सबसे पहले आया करती थी। सुबह की नियमितता ऐसी थी कि हम कहते थे - ज्ञानजी ब्लॉगजगत के मार्निंग ब्लागर हैं।

रिटायरमेंट के बाद ज्ञानजी अपने गाँव में बसे हैं। कटका इलाहाबाद से 65 किमी और बनारस से 35 किमी दूर है। गंगा नदी गाँव से 3 किमी दूर है। साईकिल से रोज गंगा दर्शन करते हैं। हमको भी करवाते हैं।... गंगा और सूरज के गठबंधन की मनोरम तस्वीरें फेसबुक पर अपलोड करते रहते हैं चुटकी भर विवरण के साथ। फोटो इतनी बोलती हुई होती हैं कि ज्यादा विवरण की जरूरत भी नहीं होती।

आज सुबह जब फोन किया तो ज्ञानजी गंगा तट पर ही थे। बताया कि खूब सारी गौरैया हैं वहां तट पर जिनकी कल्पना भी शहर में रहते नहीं की जा सकती। एक बबूल के पेड़ को पतंगों ने घेर रखा है। पतंगों से घिरा बबूल का पेड़ धूसर दिख रहा है।

अभी कटका में सुचारू इंटरनेट कनेक्शन न होने के चलते ठीक से पोस्ट्स नहीं कर पाते सारा कुछ लिखा हुआ। इलाहाबाद के शिवकुटी के गंगातट पर लिखी पोस्ट्स को संकलित करके बनाई जाने वाली प्रस्तावित ई बुक भी लटक गयी है।


ज्ञान जी की 'चाहत सूची' में नाव से गंगा दर्शन भी शामिल था। फिलहाल वह स्थगित हो गया है। कारण कि गांव में नाविक नहीँ हैं। बुनकरों का गांव है। साईकल यात्रा के लिए आज उकसाया गया तो ज्ञान जी ने कटका से बनारस 35 किमी साइकिलियाने के बारे में प्लान बनाया है। देखिये कब होता है।

ब्लॉगिंग के बहाने जितने भी लोगों से परिचय हुआ उनमें से ज्ञानजी सबसे प्रयोग धर्मी हैं। अभिव्यक्ति के नए नए प्रयोग ब्लॉग, ट्विटर और फेसबुक पर करते रहे।

आज ज्ञान जी का जन्मदिन है। ज्ञान दिवस है। आज इस मौके पर ज्ञान जी को जन्मदिन की बधाई। मंगलकामनाएं। उनकी इच्छा सूची में संकलित इच्छाओं में सभी धीरे-धीरे पूरी हों। वे स्वस्थ रहें। नियमित अपने अनुभव हम तक पहुंचाते रहें इसके लिए उनके यहां इंटरनेट की अबाध आपूर्ति बनी रहे।

Thursday, November 12, 2015

पूँजी बाजार की मासूम गुंडागर्दी

5800 सिनेमाघरों में लगी है फ़िल्म 'प्रेमरतन धन पायो'। हर दिन 12 से 15 शो होंगे। टिकट का खर्च 200 रुपया मान लें और यह भी कि हर शो में 50 लोग देखेंगे पिक्चर तो प्रतिदिन की कमाई होगी

5800×12 ×200× 50=
69600000 रूपये
मतलब 7 करोड़
...
100 लोग देखेंगे तो 14 करोड़ प्रतिदिन। कुल लागत 80 करोड़ मल्लब हफ्ते भर में पैसा वसूल। फ़िल्म सबसे सफल कहलायेगी।

सब जगह जब एक ही फ़िल्म लगी होगी और कई न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम में सिनेमा का प्रोमोशन होगा तो लोग झक मारकर फ़िल्म देखने आएंगे।

यह पूँजी बाजार की मासूम गुंडागर्दी है। बातें हवाई हों। फ़िल्म औसत लेकिन देखने तो तुमको आना पड़ेगा बाबू। कहां तक बचोगे?

Wednesday, November 11, 2015

लगे रौशनी की झड़ी झूम ऐसी

कल कानपुर के लिए चित्रकूट पकड़ने स्टेशन पहुंचे। स्लीपर में आधी बर्थ पक्की थी। आधी बर्थ मतलब RAC । कोई निरस्त कराये तो पूरी हो जाए। RAC बर्थ के अलावा तत्काल प्रीमियम में शाम तक बर्थ उपलब्ध थीं पर उनमें स्लीपर 3 गुना एसी 3 टियर 8 गुना और एसी 2 टियर 9 गुना महंगा था। हमने सोचा -300 में आधी बर्थ में जाएंगे। दीवाली के लिये पैसा बचाएंगे।

चार्ट में देखा कुल 6 लोग थे RAC वाले। हमारी बर्थ की साझीदार कोई महिला थीं F- 29. हम सोचे बर्थ कन्फर्म हुई तो अच्छा न हुई तो और अच्छा। कन्फर्म हुई तो सोते हुई, न हुई तो बतियाते हुए जाएंगे।

एक खाकी वर्दी वाले सज्जन फोन पर किसी को बता रहे थे--बुआ के लड़के ने फांसी लगा ली है। तुरन्त निकलना पड़ रहा है। सुनकर मन खराब हुआ। क्यों लोग खूबसूरत जिंदगी का अंत कर लेते हैं।

ट्रेन में सामने की बर्थ पर दो नौजवान बतिया रहे थे। एक ने दूसरे से पूछा- कुछ जुगाड़ हुआ कि नहीं। दूसरे ने कहा-नहीं हुआ यार। बस बियर से काम चलाएंगे। दूसरे ने कहा-'अरे मुझे बताया होता बे। हम दिला देते। मेरे डीएससी में बहुत जान पहचान के दोस्त हैं।' पता चला कि वे दारू की बात कर रहे थे। डीएससी में आर्मी से ही आये लोग होते हैं। आर्मी के लोगों को सस्ती शराब की सुविधा होती है। सेना से जुड़े लोगों कई मित्र उनको मिलने वाली इस सुविधा का लाभ उठाते हैं।

ट्रेन चल दी। F-29 नहीं आई। टीटी ने बर्थ हमारे नाम कर दी। हम खुश कि आराम से फैलकर जाने की सुविधा मिली। लेकिन ख़ुशी कुछ ही देर रही। कुछ देर बाद एक आदमी आया और बोला कि आधी बर्थ उसकी है। हमने कहा यह तो किन्ही महिला के नाम है। पता चला कि वो उनकी पत्नी हैं। रिजर्वेशन ने दोनों को अलग अलग कर दिया। आधी सीट यहां दी आधी वहां। हमने कहा-'आओ। बैठकर और फिर लेटकर चलेंगे।'

इसके बाद चले टीटी की शरण में कि कोई बर्थ बची हो तो मिल जाये। टीटी 'भला टीटी' टाइप था। 4/6 बर्थ गिना दिया कि चित्रकूट तक वहां लेट लो, मानिकपुर तक वहां, कर्बी में सवारी वहां से आएगी।हम लौटकर आये खाना खाने लगे। तब तक कुछ सवारियां आई और उन बर्थ पर पसर गयीं पिंडारियों की तरह जिनके नंबर हमको बताये थे टीटी ने। हमने पूछा तो उन्होंने कहा कि टीटी ने कहा है चित्रकूट/मानिकपुर/कर्बी तक बैठ जाओ उसमें। हमने टीटी के आगे से 'भला' हटाया। वह सिर्फ एक टीटी ही था।

खाना खाने के बाद हम अहा जिंदगी पढ़ने लगे। ऊपर की बर्थ वाले न ऊपर से ट्यूब लाइट घुमाकर बंद कर दिया। उसको सोना था। हमने कहा- 'बताते तो यहीं नीचे से बंद कर देते। अब तो यहाँ से खुलेगी भी नहीं।' पर वह कुछ बोला नहीं सो गया। ट्यूबलाइट घुमाकर भी बन्द की जा सकती है यह हुनर उसको आता था। उसी का उपयोग उसने किया और फिर सो गया।

हमारी बर्थ का साझीदार आया नहीं। हम चादर बिछाकर लेट गए। फिर सुबह तक नहीं आया वह यात्री। वहां बर्थ मिला गयी होगी। शायद पत्नी के साथ ही एडजस्ट हो गया।लगा सम्बन्ध मधुर हैं उनके। साथ रहने की इच्छा बनी हुई है।

रात में ट्रेन में यात्रियों का भभ्भड़ मचा। डब्बे का गलियारा फुटपाथ बन गया। कई लोग बर्थ के बीच की जगहों पर अखबार या चादर या खुद को ही बिछाकर लेट गए। दुष्यंत कुमार की तर्ज पर कहा जा सकता है:
'न मिली बर्थ तो बीच में लेट लेंगे
बहुत मुनासिब हैं लोग इस सफर के लिए'


पता चला चित्रकूट में 'दीपदान' मेला लगता है। वहां जाने के लिए ही इस रास्ते की ट्रेनों में भीड़ है। दीपदान मेले के बारे में बताते हुए एक आदमी कहा-'मंदाकिनी नदी के किनारे लगता है दीपदान का मेला। मंदाकिनी के आगे गंगा तक फ़ैल है। पिछले साल डेढ़ करोड़ लोग आये थे मेला में। इस बार मंहगाई के कारण चौथाई लोग भी नहीं जुटे मेले में।

मेले की बात चली तो कोई और बोला-' पहले तो हर गाँव में मेला लगता था। लोग ख़रीदारी मेले में ही करते थे। अब खरीददारी के लिए साल भर बाजार खुला रहता है। मेले कम हो गए। जहां लगते हैं वहां वहां भी खतम हो रहे हैं।

चित्रकूट स्टेशन पर कुछ सवारियां चढ़ी। कुछ बर्थ पर लेटी सवारियों को उठने को कहकर वे उनसे बहस करने लगीं। पहले से लेटी सवारियां भी उनसे उलझ गयीं कि उनको टीटी ने बोला है। पैसे दिए हैं बर्थ के उन्होंने। दोनों बर्थ पर कब्जे के लिए उसी तरह लड़ने लगे जैसे किसी पार्टी में कब्जे के लिए पार्टी के सक्रिय सदस्य पार्टी के मार्गदर्शक सदस्यों से लड़ते हैं।

बहस के दौरान पता चला कि पुरानी सवारियों को चित्रकूट ही उतरना था। यह पता चलते ही सवारियां बहस करना छोड़कर पुरानी सवारियों को उतारने का उपाय सोचने लगीं। नई-पुरानी सवारियों का महागठबंधन टाइप बन गया। कोई बोला -चेन खींच दो, कोई बोला-गाडी धीमी है उतर लो। बहुमत इस बात का था कि अगली स्टेशन पर उतरकर वापस आ जाएँ। लेकिन सबसे तेज आवाज चेन खींचने वाले की गूँज रही थी। इससे मुझे एक बार फिर एहसास हुआ कि जरूरी नहीं कि सबसे तेज और चिल्लाती आवाज जरूरी नहीं कि बहुमत का प्रतिनिधित्व करती हो।

गोविंदपुरी स्टेशन पहुंचे दो घण्टे लेट। हमारे ऑटो वाले 10 मिनट की दूरी पर थे। बाहर 'बाबा टी स्टाल' पर उनका इंतजार किया। टी स्टाल पर चाय थी नहीं। दूध खत्म हो गया था। ब्लैक टी पीने का मन हुआ नहीं सो इंतजार ही किया महेश का। जब वो आये तब हम घर पहुंचे।

घर के बाहर ही कुछ देर बैठे रहे बरामदे में। सुव्यवस्थित घर में अव्यवस्था फैलाने का मन नहीं हुआ कुछ देर। बरामदे में ही मेज पर ये खिलौने रखे हुए थे। काले चिंपैंजी की गोद में गुड़िया लेते देख लगा कि मानो 15 सेक्टरों में एफडीआई सीमा बढ़ने की खबर सुनते ही अपनी अर्थव्यवस्था निश्चिन्त होकर विश्वबाजार की गोद में निश्चिन्त होकर लेट गयी हो। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए विश्वपूंजी के चेहरे का वात्सल्य देखकर मन अश् अश् करने का हुआ लेकिन तब तक चाय आ गयी और हम उसको इज्जत देने में जुट गए।
आप सभी को दीपावली की मंगलकामनाएं। आपके जीवन में:
लगे रौशनी की झड़ी झूम ऐसी
निशा की गली में तिमिर राह भूले।

Monday, November 09, 2015

"प्यार से पुकार लो जहां हो तुम"

"प्यार से पुकार लो जहां हो तुम"

यह गीत बज रहा था पंकज टी स्टाल पर आज सुबह जब हम वहां पहुंचे।
पर सुबह की सुनाएँ इसके पहले रात का किस्सा सुन लीजिये। रात के बाद ही सुबह आएगी न। कोई राजनीति थोड़ी है कि रात बीत गयी तो उसको मार्गदर्शक मण्डल में डालकर भूल जाएँ।

कल रात हम क्लब गए थे। धनतेरस पर क्लब में आतिशबाजी फिर पार्टी का इंतजाम था। क्लब से लौटते समय सड़क के किनारे से आवाज सुनी। कोई हवा में बड़बड़ाता हुआ सड़क किनारे लेटा हुआ था। अपनी साईकल किनारे खड़ी करके अपन उसके पास गए। सड़क की दूसरी तरफ।

देखा कि एक साईकल सड़क पर पड़ी हुई थी। पड़ी क्या, धराशायी टाइप थी।

एक आदमी साईकल के हैंडल को तकिया सरीखा बनाये हुए पड़ा हुआ था। नशे में धुत वह न कुछ-कुछ बड़बड़ाता जा रहा था। पता चला कि मढ़ई में रहता है।
हमने उसको उठाने की कोशिश की तो उसने एकल असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया और उठने से मना कर दिया। हमने फिर उसको जबरिया उठाया तो उठ तो गया लेकिन लड़खड़ाता रहा। घर कितनी दूर है पूछने पर कभी 15 मिनट की दूरी पर और कभी 2 घण्टे की दूरी पर बताता। हमें लगा कि यार इसका घर न हुआ अच्छे दिन हो गए। कोई कहता कि चुनाव बाद आएंगे कोई कहता दस साल लगेंगे आने में।


बात करने पर पता चला कि उसके मालिक ने उसको तनख्वाह के पैसे नहीं दिए तो गुस्से में वह दारू पीकर आ गया। साईकल के करियर पर रखा लोहे का रॉड निकालकर मेरे सामने लहराते हुए बोला- ये भी उठा लाये (मालिक के यहाँ से)। हमें लगा कहीँ वह अपने मालिक का गुस्सा हमारे ऊपर न उतार दे।

वह घर जाने के लिए राजी नहीं हो रहा था। पर यह समझाने पर कि यहाँ लेटोगे तो कोई कीड़ा-वीड़ा काट लेगा वह घर जाने के लिए राजी हुआ। साईकल की चैन उतर गयी थी। हमने उसे ऐसे ही जाने को कहा। साईकल से जाता तो कहीं फिर लड़खड़ाकर गिर सकता था। वह धीरे-धीरे चलते हुए घर की तरफ चला गया।हम भी कमरे पर आकर सो गए।

सुबह उठे तो साईकल स्टार्ट करके पहुंचे पंकज टी स्टाल। वहां हमारे जीसीएफ का स्टाफ मिला। मिलते ही लपककर उसने बिहार चुनाव के परिणाम पर ऐसे खुशी जाहिर की जैसे उसको ही जाना है गांधी मैदान पर शपथ लेने। उसको अपने 33/60 (नौकरी की अवधि 33 साल या उम्र 60 साल में जो पहले हो उसमें रिटायर होना) की चिंता है। उसको लग रहा है कि अगर केंद्र सरकार 33/60 लागू करती है तो उसकी 5 साल की नौकरी मारी जायेगी।

गंजेड़ी गठबंधन बारी-बारी से चिलम घुमाते हुए आनन्दमग्न था। 100 के नशे में 3 लोग दोपहर तक मस्त। दीपावली की छुट्टियां तो कोई ट्रक बाहर जाना नहीं था।


एक बच्ची चाय की दुकान से टॉफ़ी, बिस्कुट लेकर अपने साथ की दूसरी बच्ची के हाथ में पकड़ी प्लास्टिक की छुटकी डोलची में सामान रखती जा रही थी। चलते हुए उसने दो मसाले की पुड़िया भी लीं। पूछने पर बताया कि अपनी मम्मी के लिये ले जारी है। छुटकी ने अपना नाम आयशा बताया। फोटो देखकर मुस्कराई।

चाय की दुकान पर ही एक लड़का हाथ में टिफिन लटकाते चाय पी रहा था। पता चला कि कटनी जा रहा है। घर है वहां। आठवीं पास छोटू(राहुल) अपने चाचा राजू के साथ ट्रक हांकने के हुनर सीख रहा है। चचा राजू दस साल से ट्रक चला रहे हैं। उनको एक पंडित जी ने सिखाया था ट्रक चलाना। छोटू के पिता बेलदारी करते हैं। घर सबका कटनी में है। जबलपुर में किराये के कमरे में रहते हैं। खाना होटल में खाते हैं। अभी दीपावली में ट्रक मालिक के यहां खड़ा करके घर जा रहे हैं चचा-भतीजे।

चचा बिल्कुल पढ़े नहीं हैं। बिना पढ़ा इंसान 'अक्षर अँधा' होता है। कुछ भी लिखा हो पर समझ न आएगा। हमने उससे पूछा- 'फिर पैसे गिन लेते हो?' मेरे सवाल पर वह मुस्कराया। बोला कुछ नहीं। पर मुस्कान देखकर लगा कि शायद वह कहना चाहता हो--'पत्तल्कार हो क्या?'

हमारा मन किया कि पूंछे कि बिहार के हालिया चुनाव पर क्या कहना है चचा भतीजे का। पर वे चाय का ग्लास दुकान पर धरकर सरपट निकल लिए। उनको कटनी के लिए बस पकड़नी थी।

मैं भी साइकिलियाते हुए कमरे पर आ गया। मुझे भी फैक्ट्री जाना है। आते हुए पंकज टी स्टाल पर बजता हुआ गाना याद आ रहा था- 'प्यार से पुकार लो जहाँ हो तुम........।' हमने पुकार भी लिया। जिसको सुनना है उसको सुनाई भी दे रहा होगा।

आज धनतेरस है। आप सभी को मुबारक हो।
 

Saturday, November 07, 2015

शुरुआत ही अपने आप में बहुत है

बिहार में किसकी सरकार बनेगी यह तो कल पता चलेगा पर अपन के शरीर में आलस्य की सरकार चल रही है। जग जाते हैं पर उठने का मन नहीं करता। पहले देर करते हैं उठने में। फिर जब काम भर की देरी हो जाती है तो उठ जाते हैं। उठकर सोचते हैं आज बहुत देर हो गयी। अब चला जाए फैक्ट्री। इसी चक्कर में रोज बाहर निकलना स्थगित हो जाता है।

आज भी यही क्रम चला। जगे, उठने में देर की, देर करने के बाद उठे, बाहर निकले, देखा कि उजाला काम भर का हो गया था। एक बार फिर सोचा कि आज फिर देर हो गयी। निकलना कैन्सल। पर फिर झटके में कमरा बन्द करके बाहर निकल ही लिए।

साईकल स्टार्ट करके सड़क पर आये तो मौसम और हवा की ख़ूबसूरती देखकर एहसास हुआ कि तीन दिन क्या मिस क़िया। फौरन मन किया आलस्य को हड़काएं। लेकिन फिर याद आया कि आलस्य को तो हम कमरे पर ही छोड़ आये हैं। फिर सोचा जब मिलेगा हड़कायेंगे।

साईकल चलाते हुए याद आया कि कहा जाता है -'वेल बिगिन इज हाफ डन' अच्छी शुरुआत मतलब आधा काम पूरा। हमारी समझ में शुरुआत ही अपने आप में बहुत है।

चाय की दुकान पर फैक्ट्री के एक साथी मिले। बातचीत हुई तो बताने लगे कि घर 6-7 किलोमीटर दूर है। मोटर साईकल से आते हैं। पहले साइकिल से आते थे। पिछले साल तक मोटर साईकल भाई के पास थी। फिर भाई की शादी हुई तो उसको मोटर साईकल दहेज में मिली। उसकी वाली गाड़ी इनको मिल गई। इनकी साईकल छूट गयी। शरीर आराम तलब हो गया। घुटने जल्दी खराब होंगे। सांस जल्दी फूलेगी। मतलब दहेज की प्रथा दूर तक मार करती है।


चाय पीकर लौटे तो देखा एक दृष्टिबाधित व्यक्ति सड़क पर लाठी इधर-उधर करता हुआ आगे चला आ रहा था। बीच सड़क पर चलते हुए डिवाइडर पर चढ़ गया। ऊंचाई का एहसास होते ही उतर गया। इसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह सड़क पर इधर इधर टहलते हुए आगे बढ़ता रहा। फैक्ट्री गेट के सामने खड़े लोग हल्ला मचाकर उसको रास्ता बताते रहे।

पता चला कि वह फैक्ट्री के गेट नंबर 3 के पास बैठता है। वहीँ माँगता रहता है। कुछ लोग कुछ दे देकर अपना परलोक सुधार लेते हैं। यह भी पता चला कि कुछ मसाला पुड़िया भी बेंचता है। उससे भी कुछ आमदनी हो जाती है।

मंदिर के सामने बैठकर भीख माँगने और फैक्ट्री के बाहर भीख माँगने में अंतर होता है। मन्दिर वाला भिखारी तो कभी चला जाए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा। लेकिन फैक्ट्री गेट पर मांगने वाले को फैक्ट्री शुरू होंते समय अपने धंधा स्थल पर पहुंचना होता है। देर किये तो कामगार अंदर हुए और गयी दिहाड़ी।

किसी की जन्मजात आँख न होना कितना बड़ा नुकसान है उस व्यक्ति के लिए यह एहसास हम नहीं कर सकते हैं। सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं कि वह सूरज की किरणों को नहीं देख सकता। फूल नहीं देख सकता। खूबसूरत से खूबसूरत वस्तु उसके लिए वैसी ही है जैसी कोई खराब दिखने वाली वस्तु।

भगवान के खिलाफ इस बात का कोई एक्शन नहीं होता कि कैसे वे किसी को बिना आँख के धरती पर भेज देते हैं। उनका क्वालिटी विभाग इतना लापरवाह क्यों है? उसके खिलाफ वे कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते। लेकिन कार्रवाई करे कौन। भगवान की पहुंच हर जगह है। केस ही रजिस्टर नहीं होगा उनके खिलाफ। समरथ को नहिं दोष गुसाईं।

सड़क पर हम बाईं तरफ साईकल चला थे। एक कुत्ता दायी तरफ हमारी साईकल के साथ-साथ चल रहा था। दुलकी चाल से चलता हुआ कुत्ता बड़ा स्मार्ट लग रहा था। हम उसके साथ साईकल चलाते रहे।कुछ देर बाद वह मैदान की तरफ मुड़ गया। एक झाड़ी के पास हल्का होने लगा। झाड़िया कुत्तों का वाशरूम होती हैं।

हमारे आगे एक बुजुर्ग महिला तेज-तेज टहलती हुई जा रही थी। उनकी पीठ की झुर्रियां उसके हर कदम के साथ हिलते हुए शायद उससे कह रहीं थीं -'अरे जरा धीरे चलो माता जी।'

देर हो गई थी इसलिए हम आगे नहीं गए फिर। लौट आये। लौटकर अख़बार में छपी कई खबरों में से एक पर रुक गए। अमेरिका में एक बेटी ने अपने विक्षिप्त हो चुके पिता को ठीक करने में सहायता की और एक तरह से उनको नई जिंदगी दी। कई दिनों तक बेटी पिता के साथ लगातार कैमरा थामे चलती रही। पूरा समाचार आप खुद पढ़िए।

सप्ताहांत है। आप अच्छे से रहिये। स्वस्थ रहिये। सानन्द रहिये।

कद ढाई फ़ीट, हौसला आसमान पर


Friday, November 06, 2015

सो नहीं जाना अभी मेरी कहानी चल रही है


स्कूली शिक्षा के हाल

कल यह सूचना साझा की थी मैंने। भिंड जिले में एक कलेक्टर ने हेडमास्टर को इसलिए निलम्बित कर दिया कि बच्चे ने देश और प्रदेश का नाम भिंड बताया था।

9 मित्रों की प्रतिक्रिया थी कि कलेक्टर ने सही किया। 3 लोगों ने कहा कि निलम्बन ठीक नहीं था। एक मित्र की प्रतिक्रिया थी कि फिर तो कलेक्टर का भी निलम्बन होना चाहिए। Santosh Mishra ने कहा कि कलेक्टर का काम प्रकाशक का होता है।परीक्षक का नहीं। कलेक्टर ने उचित नहीं किया।Anupma Upadhyay और
Ashok Kumar Avasthi दोनों ही शिक्षा क्षेत्र से जुड़े ...हैं। दोनों के हिसाब से ही कलेक्टर का निर्णय ठीक नहीं था।

मेरी समझ में भी कलेक्टर का निर्णय बहुत बचकाना है। एक बच्चा देश और प्रदेश का नाम नहीं बता पाया इस बात के लिए प्रधानाध्यापक को निलम्बित करना और शिक्षक की वेतनवृद्धि रोकना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता। ऐसे तो फिर कल को कोई सचिव आएगा और किसी सार्वजनिक जगह टूटी हुई सड़क देखकर या कहीं गन्दगी देखकर कलेक्टर को निलम्बित कर देगा।

आईएएस अधिकारियों का यह रवैया बहुत बचकाना है। प्रचार प्रिय अधिकारी अपने साथ पत्रकारों का अमला लेकर चलते हैं। कोई सख्त कदम उठाया और वाह-वाही लूटकर खुश हो लेते हैं।

सरकारी स्कूलों की व्यवस्था आज सबसे खराब स्तर पर है। समाज के सबसे वंचित तबके के ही लोग अपने बच्चे वहां भेजते हैं। बच्चे भी जितना आते हैं उससे ज्यादा नहीं आते हैं। कुछेक स्कूलों में तो एडमिशन सत्र शुरू होने के चार–पांच माह तक चलते रहते हैं। ऐसे में बच्चे क्या पढ़ेंगे और क्या सीखेंगे।

स्कूलों में संसाधन नहीं हैं। अध्यापक नहीं हैं। अधिकारी ग्रांट का पैसा दायें-बाएं करने में लगे रहते हैं।

अध्यापकों का तबादला पैसे के लेन देन से होता है। भ्रष्टाचार का हाल यह है कि अध्यापकों अपनी छुट्टी स्वीकृत कराने और खुद का फंड का पैसा निकालने के लिए बाबू को पैसे देते हैं। नकल के लिए स्कूल नीलाम होते हैं।
अध्यापकों की ड्यूटी कई तरह के काम के लिए अधिकारी लगा देते हैं। कभी चुनाव, कभी फ़ार्म जाँच , कभी छत्रवृत्ति वितरण और कभी कहीँ।कई जगह मिड डे मील की व्यवस्था भी अध्यापक के जिम्में है।

हमारी भतीजी के ससुर अभी पिछले साल जून में रिटायर हुए। प्रधाना अध्यापक थे वे। कक्षा 6,7 और 8 तक स्कूल था। उनके अलावा कोई और मास्टर भी नहीं था स्कूल में। अकेले 3 क्लास को पढ़ाते थे। मिड डे मील का खाना बंटवाना होता था। रिटायरमेंट तक उनके स्कूल में दूसरा अध्यापक नहीँ आया। आखिरी दिन बगल के गाँव के स्कूल के अध्यापक को स्कूल की चाबी सौंपकर घर आये।

अब ऐसे में कोई अधिकारी जाए और बच्चे से कुछ पूछे और फिर मास्टर साहब को सस्पेंड कर दे और समझे कि उसने शिक्षा व्यवस्था सुधार दी तब तो हो चूका।

अध्यापक भी कम दोषी नहीँ हैं इस सब के लिए लेकिन ज्यादा बड़ा दोष ऊपर के लोगों का है जो जानबूझकर या अनजाने में सरकारी शिक्षा को चौपट कर रहे हैं।

निलम्बन तो अध्यापक का वापस हो ही जायेगा और अध्यापक का इन्क्रीमेंट भी बहाल होगा लेकिन दोनों ही काम जिस तरह होंगे उसमें भ्रष्टाचार की भूमिका भी होगी। बाबुओं और अधिकारियों की उस कला में कोई निलम्बित नहीं होगा न किसी का इन्क्रीमेंट रुकेगा। सिर्फ श्रीलाल शुक्ल की बात सही साबित होगी--'हमारे देश की शिक्षा नीति रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे कोई भी लात लगा जाता है।'

कलेक्टर को व्यवस्था देखनी चाहिए कि स्कूल ठीक से चलें। अध्यापक समय से आएं। पढ़ायें।मास्टर के निलम्बन से बच्चे सीख़ने लगते तो फिर तो कलेक्टर के निलम्बन से शहर भी जगमगाने लगेंगे। लेकिन यह सच नहीं है।

संवेदना की मिशाल


Thursday, November 05, 2015

सुअर समुदाय की निजता

अनूप शुक्ल की फ़ोटो.परसों हमने रोजनामचा में लिखा था:
"झील के रास्ते में एक जगह सुअर समुदाय इकट्ठा था। एक युवा सूअर दूसरे सूअर के ऊपर चढ़ा हुआ पीछे से उस पर धक्का लगा रहा था। बाकी सूअर इधर-उधर मुंह किये गन्दगी का नाश्ता कर रहे थे। एक बूढ़ा, मोटा सूअर वहां से हटकर दूर की तरफ चला गया। दूर की तरफ जाने की बात से मुझे दुष्यंत कुमार का यह शेर याद आ गया:

लहूलुहान नजारों का जिक्र आया तो...
शरीफ लोग उठे और दूर जाकर बैठ गए।"


आज बातचीत के दौरान एक पाठक मित्र ने मुझसे पूछा–'आपने सूअर समुदाय का फोटो क्यों नहीं लगाया? उसके साथ अन्याय क्यों?'

हमने कहा कि असल में मैं सुअर समुदाय की निजता के हनन की बात सोंचकर संकोच कर गया। आपको भेज देता हूँ वह फोटो। तो उन्होंने कहा कि हमको नहीं भेजिए। अपने स्टेट्स पर लगाइये। रोजनामचा आप सबके लिए लिखते हैं तो सबको देखने का हक़ है।

देखिये दूर से सूअर, कूड़ा और पानी/कीचड़ से गीली घास भी कितनी आकर्षक सी लगती है। कुछ न करने के वावजूद अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने वाली राजनीतिक पार्टियों के पोस्टरों की तरह आकर्षक।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10206700060433617&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=3&theater

संकीर्णता दुर्गुण है, उदारता सद्गुण है

प्रश्न: भारत में मुसलमान साम्प्रदायिक हैं, ईसाई साम्प्रदायिक हैं, सिख साम्प्रदायिक हैं –तब बेचारे हिन्दू ही क्यों धर्मनिरपेक्ष रहें?

–गोंदिया से गोविन्द रामचन्द्र देशमुख

उत्तर: जो बात आप कह रहे हैं वह हिन्दुओं में सघन साम्प्रदायिक प्रचार का नतीजा है। मैंने विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, डॉक्टरों, अफसरों के मुंह से भी यह बात सुनी है।

पहली बात तो यह है कि सारे मुसलमान, ईसाई, सिख साम्प्रदायिक नहीं हैं। इनका एक हिस्सा ही साम्प्रदायिक है। यदि सारे सिख साम्प्रदायिक होते तो पंजाब में कांग्रेस की सरकार नहीं बनती। सारे मुसलमान साम्प्रदायिक होते, तो चुनाव में हिन्दू उम्मीदवार बहुत कम जीतते। जिस अनुपात में मुसलमान सांप्रदायिक हैं उससे ज्यादा अनुपात में हिन्दू पहले से ही साम्प्रदायिक हैं।

दूसरी बात यह है की संकीर्णता दुर्गण है, उदारता सद्गुण है। आप संकीर्णता को सदगुण समझते हैं। चाहते हैं कि हिन्दू भी संकीर्ण हो जाएँ। इस देश का भला उदारता, सहिष्णुता और धर्मनिपेक्षता पर है। लेकिन धर्म एक अधिरचना है, आधारभूत रचना नहीं। मगर धर्म का उपयोग साधारण मनुष्यों को बहकाने के लिए इस तरह किया जाता है गोया इस्लाम या हिन्दू धर्म से ही आर्थिक–सामाजिक समस्याएं सुलझ जाती हों। सही यह है कि धर्म शोषक वर्ग के हाथ में बहुत धारदार हथियार है। पाकिस्तान इस्लाम के लिए नहीं बना। वह पंजाब के जमीदारों और उत्तर प्रदेश के रईसों द्वारा शोषण की सुविधा के लिए बना।

धर्म पर आधारित राष्ट्र–राज्य में लोकत्रंत्र नहीं रहता। किसी इस्लामी देश में लोकतंत्र नहीं है। हिन्दू को सम्प्रदायिक बनाने की साजिश वे शक्तियां करती हैं जो सामन्तवाद और पूंजीवाद को जीवित रखना चाहती हैं।
आप इस तरह बात को रख रहे हैं जैसे हिंदुओं का धर्मनिरपेक्ष होना कोई सजा हो। जैसे यह कोई बुराई हो। यदि बहुसंख्यक हिन्दू भी साम्प्रदायिक हो जायेंगे तो उनका अपना नाश तो होगा ही, साथ ही देश में लोकतंत्र भी नहीं रहेगा और न हम स्वाधीन राष्ट्र रह सकेंगे।
–‪#‎परसाई‬
–16, दिसम्बर 1984 को देशबन्धु समाचार में
'पूछो परसाई से' स्तम्भ में।

शाहरुख खान, सहिष्णुता-असहिष्णुता

मेस से बाहर निकलते ही बनी पुलिया पर आराम करते मिले अजय रायकवार। रांझी में रहते हैं। हाईस्कूल तक पढ़ाई किये हैं। बेलदारी का काम करते हैं। बेलदारी मतलब भवन निर्माण के काम में सामान उठाने धरने का काम। मेहनत मजूरी। रोज के 180/- मिल जाते हैं।

पहले पुताई का काम करते थे। दीवाली के बाद वह काम खत्म हो जाएगा यह सोचकर बेलदारी करने लगे। रांझी में रहते हैं। आज घर से निकले काम पर जाने के लिए लेकिन तबियत कुछ ठीक नहीं लगी तो गए नहीं काम पर। पुलिया पर लेटकर आराम करने लगे।

अजय के पिता सब्जी बेचते हैं। दो बहनें थीं उनकी शादी हो गयी है। शादी अजय की भी हो गयी। एक बिटिया है 6 महीने के। नाम है आरोही।

बात करके हम दफ्तर की तरफ चल दिए। फिर कुछ याद आया तो वापस लौटे। पूछा अजय से-'टीवी देखते हो?'
अजय बोले-'हाँ, देखते हैं। कभी-कभी।'

हमने पूछा-'आजकल टीवी पर शाहरुख खान पर बहस हो रही है। बयानबाजी हो रही है। उसके बारे में कुछ पता है'

वो बोला-' नहीं हमको कुछ नहीं पता इस बारे में।'

आगे वह कुछ नहीं बोला। पर बिना उसके चेहरे पर जो भाव आया उसका मतलब शायद यही था कि ये सब बातें हमारी समझ से बाहर हैं। बड़े लोगों के चोंचले हैं यह।

अच्छा हुआ हम शाहरुख खान की बात पूछकर ही चुप हो रहे। सहिष्णुता-असहिष्णुता की बात करते तो पता नही क्या जबाब देता वह।

है कि नहीँ :)

सस्ती किताबें- एक सच यह भी

ब्लॉग और फेसबुक से जुड़े कई बेहतरीन लेखकों की पिछले दिनों कई किताबें आई। लगभग सभी मैंने खरीदी हैं। कुछ लोगों को उपहार में भी दी हैं।

आम जानकारी के हिसाब से लेखक को 10% रॉयल्टी मिलती है। कुछ प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देते और बदले में कुछ किताबें लेखक को मुफ़्त दे देते हैं जिसे वह रॉयल्टी के रूप में समझ सकता है।Shefali Pande ने जितने पैसे दिए प्रकाशक को उतने मूल्य की किताबें प्रकाशक से लीं। (किताब का नाम- मजे का अर्थशास्त्र)

कुछ लेखक खुद किताबें छपवाते हैं। छपाई का पूरा पैसा प्रकाशक को देते हैं। सारी किताबें खुद लेकर फिर अपने हिसाब से बांटते हैं। Neelam Trivedi ने अपनी किताब ( Zenith of Love - http://www.amazon.in/Zenith-love-Dr-Neelam-Tr…/…/ref=sr_1_1… )खुद छपवाई। सारी किताबें खुद ऑनलाइन बेंची/भेजी । मतलब छपाने में जो भी खर्च किया उसके बाद अपने हिसाब से किताबों का वितरण किया। 

इधर किताबों की छपाई का नया तरीका पता चला है।इसमें लेखक प्रकाशक को 25 से 30 हजार रूपये तक देता है। प्रकाशक कुछ किताबें छपता है। बेंचता है। बदले में लेखक को न रॉयल्टी देता है और न ही दिए गए पैसे के बराबर किताबें। प्रकाशक किताब छापता है। बेचता है। कमाता है। लेखक लिखता है। छपने के पैसे देता है। बदले में उसको न किताबें मिलती हैं न रॉयल्टी। सिर्फ एक लेखक बनने का एहसास होता है उसको। मतलब लेखक ख़ुशी-खुशी अपना आर्थिक शोषण करवाता है।

मेरी किताब 'पुलिया पर दुनिया' मैंने पोथी.काम से ई-बुक और प्रिंट आन डिमांड के तहत छपवाई।मुफ़्त में। ई-बुक के दाम 50/- रखे थे। साल भर करीब हुए कुल जमा 50 से भी कम किताबें ई-बुक और एकाध छपी हुई बिकीं। 2000/- करीब रॉयल्टी के पोथी.कॉम से अभी तक नहीं मंगाई है। यह सूचनार्थ ही है बस।

पिछले दिनों अख़बारों में इस तरह के लेख छपे कि हिंदी में अच्छे और सस्ते लेखन सामग्री का नया दौर शुरू हो गया है। उन लेखों में लेखकों ने इस मुद्दे पर कोई बात नहीं की थी कि उन किताबों के छपने के लेखक ने पैसे दिए। प्रकाशक ने लेखक से पैसे लेकर किताब छापी। किताब छापने का खर्च लेखक से लिया। किताब बेंचकर आगे भी कमाई की। लेखक का शोषण करके सस्ती और अच्छी किताबें छापने का श्रेय भी लिया।

जिन लेखकों ने पैसे देकर किताबें छपवाई सम्भव हो तो उनको इस बारे में भी लिखना चाहिए कि

1. उनको क्या बिकी हुई किताबों पर रॉयल्टी भी मिली।
2. क्या उनको उतने मूल्य की किताबें मिलीं जितने पैसे उन्होंने किताब छपवाने के लिए दिए।
3. उनका किताब छपवाने का अनुभव कैसा रहा?

ये प्रश्न किसी खास लेखक प्रकाशक से सम्बंधित नहीं हैं। न मुझे किसी प्रकाशक से कोई शिकायत है। यह सिर्फ उस प्रचार के संदर्भ में है जिसके अनुसार यह बताया जा रहा है कि हिंदी में अच्छी किताबें सस्ती दरों पर छपने लगी हैं। इस प्रचार में जानबूझकर या अनजाने में यह सच नहीं बताया गया कि इस सस्ताई में लेखक का पैसा लगा है। सस्ती किताबों की बुनियाद लेखक के आर्थिक शोषण पर टिकी है।

Tuesday, November 03, 2015

'क्या करते हो? कोई देख लेगा

सुबह उठे तो सोचते रहे कि आज किधर की तरफ हैंडल मोड़ा जाए साईकल का। फिर अचानक याद आया तालाब। और हम फ़ौरन निकल लिए।

नदी, झील, तालाब, हम भरसक खत्म करते जा रहे हैं। वो हमारे आसपास से सिकुड़ते जा रहे हैं। इसीलिये जैसे ही वो जेहन में जैसे ही नदी और झील की याद उभरती है, उनके पास जाने का मन करता है। कुछ ऐसे ही जैसे घर की याद आते ही वहां जाने के लिये मन करता है।


दो महिलाएं साथ जाती हुई बतिया रहीं थीं। एक के हाथ में पालीथीन में ताजे तोड़े हुए चांदनी के फूल थे। पालीथीन को तर्जनी ऊँगली पर नचाती, घुमाती हुई वह अपनी सहेली से बतियाती चली जा रही थी।
एक जगह एक गढ्ढे के पास एक आदमी बोरी में भरकर मिटटी अपनी साईकल पर लाद रहा था। डंडे के नीचे कैंची के बीच की जगह पर बोरी जमाकर रख रहा था। गढढे में एक महिला कुदाल लिए मिट्टी खोदकर एक स्टील की प्लेट से बोरी में भर रही थी। आदमी ने बताया कि वह चबूतरा बनाने के लिए मिटटी इकट्ठा कर रहा है। आदमी से बात करते हुए हमने देखा कि मिट्टी खोदती महिला ने खड़े होकर सर पर पल्लू रखा और फिर मिटटी बोरी में भरने लगी।


वहीं एक जगह खड़े होकर देखा कि बिजली के तारों पर कुछ पक्षी चहचहा रहे थे। सूरज भाई पूरब की तरफ निकल रहे थे पर आसमान दूसरी तरफ भी लाल कर रहे थे। शायद वे भी जनरल डिब्बे के यात्रियों की तरह उधर अपना रुमाल रखकर आसमान में जगह पर कब्जा कर रहे थे जिधर उनको शाम को जाना था।

एक दूसरे तार पर दो पक्षी एक दूसरे दूर बैठे हुए थे। उनके बीच पसरे अबोले को देखकर लगा कि पक्का ये लोग मियां-बीबी हैं। हमारी तरफ उनकी पीठ मतलब पूँछ थी। चोंच दूसरी तरफ। कुछ देर बाद पलट कर वे एक दूसरे की तरफ आये। एक पक्षी ने दूसरी को 'चोंच चुम्बन' दिया। कुछ देर 'चोंचियाने' के बाद दोनों जिस तेजी से एक दूसरे से दूर हुए उसे देखकर लगा कि मादा पक्षी में नर पक्षी की चोंच परे करते हुए कहा होगा-'क्या करते हो? कोई देख लेगा।' क्या पता यह भी कहा हो-'चार चिड़ियों के बाप हो गए। जवानी वाली आदतें नहीं गयी अब तक।' देखते-देखते दोनों पक्षी आसमान में फुर्र से उड़ गए। हवा में तार बहुत देर तक हिलता रहा।

झील के रास्ते में एक जगह सुअर समुदाय इकट्ठा था। एक युवा सूअर दूसरे सूअर के ऊपर चढ़ा हुआ पीछे से उस पर धक्का लगा रहा था। बाकी सूअर इधर-उधर मुंह किये गन्दगी का नाश्ता कर रहे थे। एक बूढ़ा, मोटा सूअर वहां से हटकर दूर की तरफ चला गया। दूर की तरफ जाने की बात से मुझे दुष्यंत कुमार का यह शेर याद आ गया:
लहूलुहान नजारों का जिक्र आया तो
शरीफ लोग उठे और दूर जाकर बैठ गए।


झील के किनारा शांत था। आज 'तालाब को आराम' दिया गया था। मछुआरे नहीं थे। उनके बैठने की जगह पर कुत्ते अलसाये से लेटे हुए थे। हमको फोटो लेते देखकर थोड़ा आँख खोलकर देखा और फिर मूंदकर सो गए।
एक छोटी चिड़िया झील के पानी के ऊपर आसमान में उड़ रही थी। कभी ऊपर जाती कभी नीचें। कभी लगता लड़खडाई और पानी में गिरी पर फिर चोंच ऊपर की तरफ करके उड़ने लगती। कुछ देर उड़ने के बाद वह किनारे आ गयी और घास पर बैठकर सुस्ताने लगी।

सामने से सूरज भाई चमकते दिखे। फोटो खींचा तो ऐसा लगा कि किरणों का हाथ फैलाकर हमसे हाथ मिला रहे हों।

कुछ देर झील के पानी को देखते रहे। जितना देख सके देखा बाकी को दूसरे के देखने के लिए छोड़कर वापस लौट लिए।

लौटते में देखा कि एक महिला लोटे में जल लिए सर पर पल्लू डाले कुछ मुस्काती सी चली जा रही थी। शायद मन्दिर जा रही हो। एक आदमी एक पालीथीन में दही लिए पालीथीन हिलाता चला जा रहा था।पालीथीन हिलाने से दही को हड्डी-पसली एक होने का एहसास हो रहा था या झूला झूलने का एहसास यह मैं तय नहीं कर पाया।
वहीं एक चाय की दुकान पर चाय पी। अख़बार में सम्पादकीय पेज पर यशवन्त सिन्हा का लेख देखा। उसमें जार्ज फर्नांडीज के ताबूत घोटाले से सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 अक्टूबर को बरी करने की खबर का जिक्र करते हुए मिडिया की आलोचना की गयी थी कि उसने इस खबर को खबर नहीं बनाया।

यह लगा कि मीडया को कालिख पोतने की खबर में रूचि रहती है। किसी के उजले होने की सूचना मीडिया को मजा नहीं आता। पता नहीं Chanchal Bhu जी ने यह खबर साझा की थी या नहीं। चंचल जी ने जार्ज फर्नांडीज से जुड़े कई संस्मरण साझा किये हैं।

जार्ज फर्नांडीज की बात से याद आया कि मैंने एक बार उनको लंका चौराहे पर किसी उम्मीदवार के समर्थन में भाषण देते सुना था। कुल जमा लोग इतने ही थे कि चौराहे पर लोग आराम से आ जा रहे थे। जार्ज की राजनीति और अन्य बातों के बारे में नहीं पता पर उनकी सादगी, ईमानदारी और बिना तामझाम के जिया सार्वजनिक जीवन अनुकरणीय लगता है।

एक जगह हनुमान मन्दिर के ऊपर श्री सार्वजनिक हनुमान मन्दिर लिखा देखकर सोचा कि कहीँ निजी हनुमान भी होंगे किसी मन्दिर में।

एक महिला सड़क के एक किनारे नल के पानी से पानी भरकर सरपट सड़क पार कर रही थी। उसके एक हाथ में स्टील की गगरिया थी और दूसरे में प्लास्टिक का डब्बा।

आगे सड़क पर जाती एक महिला हर पांचवे कदम पर दांये-बाएं देखते हुए चौकन्नी चाल से जा रही थी। उसकी चाल देखकर लगा कि अपने देश की आधी आबादी को सड़क तक पर चलते हुए कितना सावधान रहना पड़ता है। इसके बावजूद अगर वे पुरुषों की बराबरी कर रहीं हैं तो यह तारीफ़ की बात है।

लौटते में देखा स्कूल के पास एक लड़की पीठ पर बस्ता लादे अपने से 4 फ़ीट की दूरी पर मोटर साइकिल पर बैठे एक लड़के से कुछ बात कर रही थी। बात करते हुए दोनों बच्चे ऐसे बिजली के तारों की तरह लगे जिनसे होकर बिजली गुजर रही हो। यह भी कि दोनों के बीच 4 फिट की दूरी की हवा उनके बीच कुचालक का काम कर रही हो और बीच की दूरी कम होते ही उनके बीच का फ्यूज उड़ जाएगा। फ्यूज उड़ने के डर से ही शायद दोनों सुरक्षित दूरी पर रहकर बात करते रहे।

लौटकर आने के बाद पोस्ट लिखी। अब जा रहे हैं दफ्तर। आप मजे से रहिये। आपका दिन शुभ हो।
 

बूंद टपकी एक नभ से

बूंद टपकी एक नभ से
किसी ने झुक कर झरोखे से
कि जैसे हंस दिया हो।
हंस रही-सी आंख ने जैसे...
किसी को कस दिया हो।

ठगा सा कोई किसी की
आंख देखे रह गया हो।
उस बहुत से रूप को
रोमांच रोके सह गया हो।

--भवानीप्रसाद मिश्र

कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं मन चाहिए


Monday, November 02, 2015

मिलो न तुम तो हम घबरायें

मिलो न तुम तो हम घबरायें
मिलो तो आँख चुराएं, हमें क्या हो गया है।

यह गाना बज रहा था आज जब हम पहुंचे 'पंकज टी स्टाल' पर।

सुबह निकलते हुए आज साढ़े छह बज गए । साईकिल निकाली तो लगा पैसे नहीं रखे। देखा तो जेब छूँछी। सोचा ऐसे ही निकल लें। आज की चाय उधार रहेगी। फिर सोचा किसी की बोहनी का बखत होगा। सुबह की शुरुआत उधार से करना ठीक नहीं। साइकिल स्टैंड पर खड़ी की। कमरे पर गए। पैसे लिए। जेब में डाले फिर साईकल स्टार्ट की।

निकलते ही सूरज भाई दिखे। सुबह की धूप हल्की थी। कोहरीली धूप। ऐसा लगा जैसे जाड़े में धूप की बढ़ी हुई मांग को सूरज भाई धूप में कोहरा मिलाकर पूरा कर रहे हों- जैसे गर्मी में दूध में पानी और त्यौहारो में खोये में मिलावट बढ़ जाती है।

यह बात हमने सूरज भाई से कही तो वे हंसने लगे। किरणें भी खिलखिलाने लगीं। ऐसा लगा मानों मेरी शिकायत सुनते ही सूरज भाई ने मुझसे कहा हो-'अरे यार बाकियों की चिंता छोड़ । ये लो तुम्हारे लिए बढ़िया प्योर खिली हुई स्पेशल धूप।'

सुनहरी , खिली हुई धूप और खिलखिलाती किरणों ने मुझे चुप कर दिया। हम और कुछ कह नहीं पाये। आगे चल दिए।

मोड़ पर ही छट्ठू सिंह के साथी मिल गए। आज छट्ठू सिंह नहीं आये थे। दो दिन से तबियत ढीली है। हमने उनके साथियों से कहा-"आप लोग बाहर जाओ कहीँ घूमने के लिए। अच्छा लगेगा। क्या यहीं टहलते रहते हैं।" उन्होंने हामी भरी और फिर नमस्ते करके चले गए।

सरिया लेकर टहलती बुजुर्ग महिला आज भी सरिया लिए टहल रहीं थी। अलबत्ता आज सरिया का मुड़ा हुआ हिस्सा सड़क की तरफ था। पहले दिन वह हाथ की तरफ था।

बस स्टैंड पर लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए बस का इंतजार कर रहे थे। एक बच्ची एकदम सावधान मुद्रा में खड़ी किसी पतली सी किताब से कुछ पढ़ रही थी। तल्लीन थी पढ़ने में वह। शायद उसका कोई टेस्ट या इम्तहान हो। यह लगा 'पीके' फ़िल्म की तरह ऐसी सुविधाएं आने लगें कि बच्चे किताब का मसाला किताब छूकर ही दिमाग में डाउनलोड कर सकें।

आगे एक बस रुकी। हार्न दिया। एक महिला लपकती हुई आई। साथ की बच्चे को बस में लपककर जमा सा करके नीचे से बस्ता उसको थमाया।बस स्टार्ट ही रही। बच्चे के जमा होते ही चल दी। महिला ने बच्चे को बस में बैठाने के पहले की हड़बड़ाहट चेहरे से पोंछ कर मुस्कराते हुए बच्चे को टाटा किया। बस जब दूर हो गयी तो उसने चेहरे की मुस्कान को भी समेट कर चेहरा सामान्य कर लिया।


महिला को देर तक मुस्कराना शायद उसको फिजूलखर्ची लगा हो। शायद उसको लगता हो कि मुस्कान अनमोल है। फिजूल में खर्च नहीं करना चाहिये। पता नहीं कब किस गम को छिपाने के लिए जरूरत पढ़ जाए। वो गाना है न:

तुम इतना क्यों मुस्करा रहे हो
क्या गम है जो मुझसे छिपा रहे हो।

पंकज टी स्टाल पर वही गाना बज रहा था जो ऊपर बताया:
मिलो न तुम तो हम घबराएं
मिलो तो आँख चुराएं, हमें क्या हो गया है।

चाय की दूकान पर दो चिलमची चिलम सुलगा रहे थे। एक ने माचिस की तीली सुलगाई। दूसरे ने नीचे झुककर आँख मूँदकर जल्दी-जल्दी सांस खींचकर चिलम सुलगाई। चिलम जब सुलग गयी तो जल्दी-जल्दी वाली साँस बन्द करके उसने चैन की सांस ली। थोड़ा सन्तोष भी मिला हुआ था चैन की सांस में कि जल्दी सुलग गयी चिलम।

दोनों चिलमची काले कपड़े पहने हुए थे।नीचे बैठकर चिलम सुलगाते हुये व्यक्ति की मुद्रा कुछ वैसी ही थी जैसे प्रेमी अपनी प्रेमिका को शादी के लिए प्रस्ताव पेश करते समय झुकता है। चिलम सुलगते ही वे दोनों एक कोने में चले गए।

इस बीच जीसीएफ फैक्ट्री में काम करने वाला एक स्टाफ वहां आ गया। फैक्ट्री के पुराने जीएम की बुराई कर रहा कि वो बहुत टाइट करके चले गए फैक्ट्री। अब भी वैसा ही हाल बना हुआ है। इत्ता टाइट थोड़ी करना चाहिए था। हर बात में सख्ती।

फिर वह मुझसे पूछने लगा कि ये बताइये कि 33 का क्या हो रहा है? मुझे कुछ समझ में नहीं आया तुरन्त। मैंने कहा-'देखो क्या होता है।'

फिर वह सरकार पर अपनी नाराजगी उतारने लगा और बिना रुके कहता रहा:

"इनकी बस मुंडी मटकती है, इसकी बुराई, उसकी बुराई। बोलना बहुत अच्छा आता है। जब आये थे तब बोले कि- ये विकास होगा होगा, वो नौकरी लगेगी। लेकिन हुआ कुछ नहीं। सब ऐसे ही खाईबाजी चल रही है। कहीं डिजिटल इण्डिया, कहीं स्वच्छ भारत। कीमत पर कोई कंट्रोल नहीं। मास्टर 5000 में काम कर रहा है। न बच्चे हैं न कुछ। न सरकारी स्कूल हैं न डॉक्टर। ऐसे ही पांच साल निकाल देंगे। फिर कहेंगे पांच साल और चाहिये। हमें यह लगता है कि कहीं अपनी फैक्ट्रियों को भी न सड़क पर ला दें। बीएसएनएल को बर्बाद कर ही दिया। प्रमोद महाजन ने किया था। बिहार में जीते तो 33 साल कर देंगे।"


33 से मुझे याद आया कि उनकी नाराजगी का कारण वह सम्भावित योजना है जिसके अनुसार कोई भी व्यक्ति सरकार की नौकरी से 33 साल की नौकरी या फिर 60 साल की उम्र में से जो पहले होगा सेवा से रिटायर हो जायेगा। इन भाई साहब के 35 साल नौकरी के हो चुके हैं। 5 साल अभी भी बाकी हैं। मतलब 20 साल की उम्र में आये थे नौकरी में। यही इनके लिए चिंता का विषय है कि सेवा अवधि 33 साल की हो जायेगी तो फौरन पेंशन पेपर थमा दिए जाएंगे।

अपनी चिंता को विस्तार देते हुए उन्होंने बताया कि पहले 19-20 साल की नौकरी में आ जाते थे लोग। आज अगर 33/60 लागू होगा तो 500 से 1000 लोग हर फैक्ट्री से बाहर हो जाएंगे।

मेरा मन हुआ कहें कि नए लड़कों की नौकरी मिलेगी भी तो। लेकिन फिर कहा नहीं। वह भी ड्यूटी जाने की जल्दी में था। चला गया।

इस बीच तीन बच्चे मेरी बगल में आकर बैठ गए। बात की तो पता चला कि उनके दादा जीसीएफ में काम करते हैं। पिता प्राइवेट काम करते हैं। क्या करते हैं बच्चों को पता नहीं। बच्ची 5 में पढ़ती है, बच्चे 2 में। आज स्कूल नहीं गए। गाँव जाना है।कुछ काम है। मम्मी के साथ जाएंगे। बिहार के हसनपुर में गाँव है।

बच्चे बड़े प्यारे लग रहे थे। छोटे बच्चे के गाल का एक हिस्सा कुछ गुलाबी रंगत लिए बहुत प्यारा लग रहा था। मैंने फोटो के लिए पूछा तो पहले तो मना कर दिया बच्ची ने। पर बातचीत के बाद दुबारा पूछा तो कहा- ले लीजिये। फोटो दिखाई तो खुश हुए बच्चे।

लौटते में दीपा को देखने गए। उसके हाथ में चोट लगी दिखी। बताया-खेलते में गिर गयी थी। चोट हल्की ही थी पर कोई दवाई न लगाने से बढ़ गयी थी। हल्का सा मवाद भी आ रहा था। हमने उसके पिता से पूछा कि इसको दवा क्यों नहीं लगवाई तो बोला- 'कल जाएंगे।आधार कार्ड भी बनवा लेंगे।'

हमें लगा कि यह हाल हैं अपने समाज में स्वास्थ्य सुविधाओं के कि एक साधारण खरोंच तक के लिए लोग दवा नहीं लेते या ले पाते। स्कूल में भी प्राथमिक चिकित्सा की कोई सुविधा होती तो चोट अब तक ठीक हो जाती।
उसके स्कूल का समय हो रहा था। इसलिए यह सोचकर कि शाम को उसको अस्पताल से पट्टी करवा देंगे हम चले आये वापस। चलने से पहले दीपा का एक फोटो लिया तो दीपा ने कहा -'हम शेरू का फोटो लेंगें।' लिया उसने और खुश हुई कि अच्छा आया।

क्रासिंग बन्द थी। हमने खुलने का इंतजार करते हुए वहीं साइकिल पर बैठे-खड़े पोस्ट का शुरूआती हिस्सा टाइप किया। डबल क्रास था। दोनों ट्रेने निकल गयीं तब फाटक खुला। हम वापस कमरे पर आये। चाय पीते हुए पोस्ट लिखी।

अब जा रहे हैं फैक्ट्री के लिए। आज गुणवत्ता माह की शुरुआत है। सबको मुबारक हो।

आपका दिन मंगलमय हो शुभ हो।

डॉक्टर हो तो ऐसा


Sunday, November 01, 2015

किताबों के बहाने कुछ बातचीत

कल Diwas Mishra से मिलना हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के क़ानून के छात्र हैं। कुछ दिन पहले दिवस ने कहा था कि आएंगे मिलने। हमने कहा- ठीक। फिर तय हुआ कि मंगलवार को आएंगे। हमने कहा-ठीक। फिर कल फोन आया कि कब मिल सकते हैं। हमें लगा समय के बारे में पूछ रहे। हमने कहा-जब मन आये। दिन में हम दफ्तर में और उसके बाद मेस में मिलते हैं। फोन है ही।

कुछ देर बाद मेस के गेट से फोन आया कि मेस के गेट पर खड़े हैं। हम कहे -अरे तुम तो मंगल की बात किये थे। आज तो शनिवार है। इस पर बोले दिवस- 'आपने यह भी कहा था कि कभी भी आ सकते हो।'

हमने कहा-अच्छा किया। आओ। फिर फटाक से कुर्सी पर रखे कपड़े अलमारी में धरे। एक कुर्सी खाली हो गयी। एक कुर्सी बहुत थी एक जन के लिए। लेकिन न्यूटन के जड़त्व के नियम के झांसे में हम एक के बाद दूसरी भी खाली कर दिए। हफ्ते भर पहले से कुर्सी पर रखा सामान ठीहे पर रख दिए। फिर पता चला कि दिवस अपने मित्र अनुभव ओझा के साथ आये थे तो अनजाने में की गयी मेहनत सफल हुई।


खूब सारी बातें हुईं दोनों से। साल भर हम और दिवस मित्र हैं फेसबुक पर। मेरी कई पोस्टों का उल्लेख किया उन्होंने तो लगा कि मेरे लेखन के ऊपर तमाम लोग निगाह रखते हैं। यह भी अच्छा लगा कि कोई मित्र शहर आये तो मिलने आये इसलिए कि उसको मेरा लिखना पसंद है।

यह अलग बात है कि दिवस को शिकायत है कि उनकी पोस्ट्स हम नहीँ पढ़ते। कई कविताएं और कहानियां लिखी हैं उन्होंने। हमने वायदा किया अब पढ़ेंगे।

ढेर बातचीत और चायपानी के बाद फोटो सेशन हुआ। हमारे साथ फोटो खिंचाने के अलावा दिवस ने हमारे यहां रैक पर बिखरी पड़ी किताबें देखीं और उनके साथ फोटो भी खिंचाई। किताबों के कलेक्शन की तारीफ भी की। हमने कहा-'यह हवा-पानी के लिये रखी हैं।'

हमारा किताबों का भी मजेदार हिसाब है। जब भी कानपुर जाते हैं तो घर से एकाध - दो किताब ले आते हैं। यहां किताब बढती जा रहीं। यात्रा में भी किताब साथ ले जाते हैं। पर किताबें अक्सर जैसी की तैसी वापस आ जाती हैं। महीनों हुए कोई किताब मैंने पूरी नहीँ पढ़ी। पढ़ने की क्षमता जबरदस्त प्रभावित हुई है पिछले सालों में। यह तब है जबकि मैं कहता हूँ कि अगर मुझे आज दुनिया से विदा होने को कहा जाये तो एकमात्र अफ़सोस अगर होगा तो यह होगा कि मैं दुनिया की कई बेहतरीन किताबें पढ़े बिना चला गया।

कुछ सालों पहले तक मेरी पढ़ने की गति ठीक-ठाक थी। 'मुझे चाँद चाहिए' और 'पहला गिरमिटिया' जैसे हजारेक पन्ने वाली (बकौल श्रीलाल शुक्ल- मुगदर साहित्य) मैंने तीन दिन से एक हफ्ते में पढ़े। अब हाल यह है कि ऑनलाइन खरीदे गैर कई बेस्ट सेलर पहले पन्ने से दूसरे तक पहुंचने का इन्तजार कर रहे हैं।

आज सुबह देर से उठे तो टहलने नहीं गए। कुछ देर बाद जाने की सोची। पर फिर अचानक मन किया किताबें सरिया लीं जाएँ। बिखरी हुई पुस्तक निधि को सहेज लिया जाए।


किताबें सहेजते हुए हर किताब से जुडी हुई कोई न कोई घटना याद आती गयी। आधी से भी अधिक किताबें मैंने शुरू भी नहीं की हैं। कुछ शुरू की तो अधबीच में किसी न किसी कारण रुक गयीं। उनमें पुस्तक चिन्ह भी नहीं हैं कि कहां तक पढ़ चुके हैं। दो ऐसी किताबें हैं- दूधनाथ सिंह की 'आखिरी कलाम' और ज्ञान चतुर्वेदी की 'हम न मरब'। और भी कई हैं। मन किया की तय करते हैं कि दीवाली के पहले इनको बांच लेंगें। लेकिन फिर नहीं किया। क्या फायदा -क्या पता इधर-उधर फंस जाएँ। न पढ़ पाएं।तो काहे का अपराध बोध का वायस तैयार किया जाये।

बहुत अच्छी किताबें पूरी न पढ़ पाने के पीछे मेरा अवचेतन मन का बेवकूफी का वह तर्क भी काम करता है कि यह किताब खत्म हो गयी तो फिर क्या रहेगा पढ़ने के लिए। कोई किताब जब यह सोचकर पढता हूँ कि उसकी बहुत तारीफ़ हो चुकी है और वह बहुत अच्छी है तो फिर उसके पूरा पढ़ने में कोई न कोई बाधा आ ही जाती है। कोई नहीं तो यह कि इसके पढने के बाद क्या पढ़ेंगे।

कई किताबों की धूल झाड़ते हुए उदय प्रकाश के लेखों के संकलन की किताब 'ईश्वर की आँख' के कई बार पढ़े अंश फिर से पढ़ता हूँ। बचपन में सोन नदी में डूबने से बचने का किस्सा बयान करते हुए उदय प्रकाश ने लिखा है:
" सोन नदी के जल में मेरी वह अंतिम छटपटाहट अमर हो जाती। मृत्यु के बाद। लेकिन नदी के घाट पर कपड़े धो रही धनपुरिहाईन नाम की स्त्री ने इसे जान लिया। नदी की धार में तैरकर, खोजकर, उसने मुझे निकाला और जब मैं उसके परिश्रम के बाद दुबारा जिन्दा हुआ तो उसे इतना आश्चर्य हुआ कि वह रोने लगी।

तब से मैं स्त्रियों को बहुत चाहता हूँ। सिर्फ स्त्रियां जानती हैं कि किसी जीव को जन्म या पुनर्जन्म कैसे दिया जाता है।"

इसी किताब के एक और लेख जो शायद 90 के दशक में लिखा गया में उन्होंने लिखा-" वे लोग कौन हैं, जिनका हित साधने के लिए हमारे लोकतंत्र में, हम नब्बे करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार के प्रधानमंत्री समेत एक-चौथाई कैबिनेट आज न्यायालय के सामने ठगी, बेईमानी, षड़यन्त्र और गबन का मुजरिम बना खड़ा है।"

इस लेख का शीर्षक है-" ब्रह्मराक्षसों की छायाएं गांधी जी की चप्पल पहने घूम रहीं हैं।"

अपने लेखन यात्रा के दौरान उदयप्रकाश जी कई लेखन से इतर कारणों से आलोचना और चर्चा में रहे लेकिन यह निर्विवाद है कि उदयप्रकाश आज के हिंदी साहित्य के बेहतरीन कथाकारों में से एक हैं।

पिछले दिनों जब उदय प्रकाश जी ने साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाया तो उसके बाद कई लोगों ने भी वह इनाम लौटाया। इनाम लौटाते ही उनकी आलोचना होनी शुरू हुई। किसी ने बोला लेखक चुक गया, कोई बोला- पब्लिसिटी स्टंट है। किसी ने कहा- पैसा लौटाओ, कोई बोला-'ब्याज सहित लौटाओ।'

मजे कि बात इस पर लोगों ने व्यंग्य लिखे, चुटकुले बने, कार्टून बने। किसी समाज के 40 लेखक किसी बात पर अपनी उपाधियाँ लौटाए, पैसे लौटाए। इसपर समाज के लोग उनकी बात सुनने की बजाए उनकी खिल्ली उड़ायें, उन पर चुटकुलें बनाएं यह देखकर परसाई जी का लेख का वाक्य याद आता है-' शर्म की बात पर ताली पीटना।'
विदेश खासकर रूस, यूरोप से वापस आये लोग अक्सर यह बात कहते पाये जाते हैं कि वहां लेखकों के स्मारक हैं। उनका बड़ा सम्मान है। अपने यहाँ ऐसा नहीँ है शर्मनाक है यह। वही लोग अपने लेखकों की खिल्ली उड़ाते हुए उनको चुका हुआ बताते हैं। मजे कि बात है कि इनमें लेखक बिरादरी के वे लोग भी शामिल हैं जिनका लेखन उनके लेखन के कहीं आसपास नहीं हैं। लेखकों को चुका हुआ और बकवास बताने वालों में से बहुत बड़े प्रतिशत लोगों ने उनका लिखा पढ़ा भी नहीं होगा।

अगर समाज के लोगों को उपाधि लौटाने वालों का रवैया गलत लगता है, उसमें राजनीति लगती है तो उनको समझाना चाहिए, उनको आश्वस्त करना चाहिए कि भाई तुम्हारा सोचना ठीक नहीँ। हाल इतने खराब नहीं हैं। यह न करके लोग उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। उनको गरिया रहे हैं। उनके विरोध को मतलब से प्रेरित बता रहे हैं। उनके विरोध को पब्लिसिटी की भूख बता रहे हैं। मानों लेखक की किताबें फिल्म हैं जिनकी पब्लिसिटी होने से उनकी बिक्री बढ़ जाये। अगर सच में ऐसा कुछ होता तो जिन लेखकों ने उपाधियाँ लौटाई उनकी किताबों की बिक्री बढ़ गयी होती।

बाजार अपने हिसाब से इस घटना को कैश कर रहा है। इनाम वापसी की घटना के चुटकुले को आगे बढ़ाते हुए व्हाट्सऐप पर पत्नी वापसी का चुटकुला तैर रहा है। पत्नी भी सामान हो गयी।

घर-परिवार का कोई सदस्य किसी बात पर नाराज होता है तो बाकी के लोग उसको लुलुहाते हुए घर से बाहर नहीं कर देते। उनकी बात सुनते हैं और मुद्दे का समाधान खोजते हैं। अपने यहां हम जिस भी लेखक ने विरोध किया उसके चरित्र और लेखन प्रमाण पत्र में प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज करके उसको खारिज कर दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति मेरी समझ में बहुत घातक है।

कहाँ से चलते हुए बात कहां तक पहुंच गयी। कहना सिर्फ यही चाहता था कि जो समाज अपने समय के बेहतरीन लेखकों की इज्जत नहीं कर सकता। जो उनके उठाये मुद्दे ,भले ही वह बाद में गलत साबित हों, खुले मन से बात करने को तैयार होने की बजाय उनकी खिल्ली उढाता है, उनकी मंशा को मतलब से प्रेरित बताकर उनके विरोध को खारिज करके छुट्टी पा लेता है वह भले ही जीडीपी में सरपट आगे निकल जाये, विकास के कुलांचे भरने लगे लेकिन वह समाज कभी भी संवेदनशील समाज नहीं हो सकता।

आज न इतवार था। अच्छा बीता होगा। जो बचा उसे भी मजे से बिताएं। मस्त रहें।